॥ १ ॥
अध्याय १०
सद्योमरणीयमिन्द्रियम्
शीघ्र मृत्यु के लक्षण
इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २१)
तत्र श्लोकः-एतानि खलु लिङ्गानि यः सम्यगवबुध्यते।स जीवितं च मर्त्यानां मरणं चावबुध्यते॥
श्लोक २१ →मुख्य शब्द (६) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
- इन्द्रिय
- इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
- शरीर
- शरीर - देह
विस्तार
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
- मारुत
- मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।
चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।
- वात
- वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
- लिङ्ग
- लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
- आतुर
- आतुर - रोगी
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।
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॥ २ ॥
सद्यस्तितिक्षतः प्राणां(अनुनासिक)ल्लक्षणानि पृथक् पृथक्।अग्निवेश! प्रवक्ष्यामि संस्पृष्टो यैर्न जीवति॥ ३ ॥
। ॥ ४ ॥
। ॥ ५ ॥
। ॥ ६ ॥
। ॥ ७ ॥
। ॥ ८ ॥
। ॥ ९ ॥
। ॥ १० ॥
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। ॥ १२ ॥
। ॥ १३ ॥
। ॥ १४ ॥
शरीरं शोफितं यस्य वाताशोफेन देहिनः।भिन्नं पुरीषं तृष्णा च सद्यो जह्यात् स जीवितम्॥ १५ ॥
। ॥ १६ ॥
। ॥ १७ ॥
पक्वाशयमधिष्ठायं हत्वा संज्ञां च मारुतः।कण्ठे घुर्घुरकं कृत्वा सद्यो हरति जीवितम्॥ १८ ॥
। ॥ १९ ॥
। ॥ २० ॥
- । ॥ २१ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने सद्योमरणीयमिन्द्रियं नाम दशमोऽध्यायः॥१०॥