॥ १ ॥
अब हम यस्यश्यावनिमित्तीय नामक इन्द्रिय (अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
अध्याय ९
जिसके अंग श्याव हों
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यह इन्द्रियस्थान का नौवाँ अध्याय है, जिसका नाम यस्यश्यावनिमित्तीय है, यानी "जिसके अंग श्याव हों"। नाम अध्याय के पहले श्लोक के आरम्भिक शब्दों "यस्य श्यावे ..." से लिया गया है, जिसमें आँखों के श्याव (गहरे भूरे) या हरे हो जाने को अन्त का सूचक बताया गया है। भगवान् आत्रेय इसमें अरिष्ट-लक्षणों, यानी मृत्यु के पूर्व-चिह्नों, का वर्णन करते हैं।
अध्याय का क्रम सीधा है। आरम्भ में आँखों के रंग-रूप का बदलना बताया गया है। फिर एक के बाद एक ऐसे रोगियों के लक्षण गिनाए गए हैं: जिनका मुख सूख गया है या होश चला गया है, जिनकी सिराएँ हरी हैं, जिन्हें हिचकी, रक्त की उल्टी या साँस ऊपर की ओर चढ़ने के कष्ट हैं, और जिनमें बल तथा मांस का तेज़ी से क्षय हो रहा है। बीच में वातव्याधि, अपस्मार, कुष्ठ, शोफ, उदर, गुल्म, मधुमेह और राजयक्ष्मा जैसे रोगों का भी उल्लेख है, जो बल और मांस के क्षय के साथ अचिकित्स्य माने गए हैं।
अध्याय में रोग के अचानक छूट जाने, दुर्बल रोगी के विरेचन के बाद फिर फूलने, और स्वर के बिगड़ने जैसे संकेत भी हैं। थूक, मल और वीर्य के जल में डूबने की जाँच बताई गई है, और शङ्खक नाम के उस रोग का वर्णन है जो तीन रात में प्राण ले लेता है। जहाँ रोगी के सम्बन्धी प्रार्थना करें, वहाँ के लिए भी चरक संहिता का कथन दिया गया है।
अन्त में दो श्लोकों में सार है: मृत्यु निकट आने पर मनुष्यों में ये और ऐसे ही अन्य लक्षण होते हैं, पर सब लक्षण हर रोगी में प्रकट नहीं होते, इसलिए वैद्य को सब ओर से इन्हें जानना चाहिए। पाठक के लिए ध्यान देने की बात यह है कि यह अध्याय लक्षणों की पहचान का शास्त्रीय वर्णन है, उपचार की सलाह नहीं है।
तत्र श्लोकौ-विज्ञानानि मनुष्याणां मरणे प्रत्युपस्थिते।भवन्त्येतानि संपश्येदन्यान्येवंविधानि च॥
श्लोक २३ →इस विषय में दो श्लोक (हैं)- मनुष्यों की मृत्यु के निकट आने पर ये विज्ञान (लक्षण) होते हैं; इनके और ऐसे ही अन्य (लक्षणों) को भी (वैद्य) भली-भाँति देखे।
तानि सर्वाणि लक्ष्यन्ते न तु सर्वाणि मानवम्।विशन्ति विनशिष्यन्तं तस्माद्बोध्यानि सर्वतः॥
श्लोक २४ →वे सब लक्षण दिखाई देते हैं, परन्तु सभी लक्षण नष्ट होने वाले (मरणासन्न) मनुष्य में प्रवेश नहीं करते (सब एक साथ नहीं होते); इसलिए सब ओर से (सभी प्रकार से) लक्षण जानने चाहिए।
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।
अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।
चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।
चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।
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॥ १ ॥
अब हम यस्यश्यावनिमित्तीय नामक इन्द्रिय (अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।
। ॥ ३ ॥
जिसके दोनों नेत्र (दर्शन) श्याव (गहरे भूरे), परिध्वस्त (क्षीण या बिगड़े हुए) अथवा हरे हों, उसका रोग अन्त (मृत्यु) के लिए आया हुआ है, ऐसा जानने वाले (वैद्य) को जानना चाहिए।
। ॥ ४ ॥
जो मनुष्य संज्ञाहीन हो, जिसका मुख सूख गया हो और जो रोगों से घिरा हो, उसे क्षीण आयु वाला जानकर धीर (बुद्धिमान्) वैद्य छोड़ दे।
। ॥ ५ ॥
जिसकी सिराएँ हरी हों और रोमकूप बन्द हों, खट्टे की इच्छा करने वाला वह पुरुष पित्त के कारण मृत्यु को प्राप्त होता है।
। ॥ ६ ॥
जिसके शरीर के अन्त (छोर) चमकते हैं, शरीर सूखता जाता है और बल घटता है, उसे राजयक्ष्मा मार डालता है।
। ॥ ७ ॥
कन्धों में ताप, हिचकी, रक्त की उल्टी, आनाह और पसली में शूल - ये शोषी (शोष रोग वाले) के अन्त (मृत्यु) के लिए होते हैं।
। ॥ ८ ॥
जो मनुष्य वातव्याधि, अपस्मार, कुष्ठ, शोफ, उदर रोग, गुल्म, मधुमेह और राजयक्ष्मा से पीड़ित हो
। ॥ ९ ॥
बल और मांस के क्षय होने पर ये (रोगी) अचिकित्स्य (चिकित्सा के अयोग्य) हो जाते हैं; अन्य विकारों में भी (बल-मांस का क्षय हो तो) उन्हें वैद्य छोड़ दे।
। ॥ १० ॥
जिसका आनाह विरेचन से दूर हो गया हो और जो प्यास से घिरा हो, वह मनुष्य विरेचन के बाद फिर आध्मान (पेट के फूलने) से ग्रस्त होता है; जैसे प्रेत (मृत शरीर) फूलता है, वह वैसा ही होता है।
। ॥ ११ ॥
जो मनुष्य कण्ठ, मुख और छाती के अत्यन्त सूख जाने के कारण पेय (पीने की वस्तु) पी नहीं सकता, वह जीवित नहीं रहता।
। ॥ १२ ॥
स्वर की दुर्बलता, बल और वर्ण (रंग) की हानि, और अयुक्ति से (उचित कारण या उपचार के बिना) रोग की वृद्धि देखकर मृत्यु बताए।
। ॥ १३ ॥
जिसकी साँस ऊपर की ओर चढ़ती हो (ऊर्ध्वश्वास), जिसकी ऊष्मा चली गई हो, जिसका वंक्षण (जाँघ का जोड़) शूल से पीड़ित हो और जो सुख न पा रहा हो, उसे बुद्धिमान् वैद्य छोड़ दे।
। ॥ १४ ॥
जो बेसुरा बोल रहा हो, जिसे अपनी मृत्यु प्राप्त हो गई हो (निकट आ गई हो) और जो अशब्द (जहाँ कोई शब्द नहीं) का श्रोता हो, उसे वैद्य दूर से ही छोड़ दे।
। ॥ १५ ॥
जिस दुर्बल मनुष्य को रोग अचानक छोड़ देता है, आत्रेय उसके जीवन को संशय (खतरे) में पड़ा हुआ मानते हैं।
। ॥ १६ ॥
और यदि उसके सम्बन्धी विनय से (दण्डवत् प्रणाम करके) प्रार्थना करें, तो (वैद्य) कहे कि "यह रस (रसयुक्त आहार) के साथ खाए"; इसे विशोधन (शोधन चिकित्सा) न दे।
। ॥ १७ ॥
यदि एक मास में उसमें कोई शुभ विशेषता (अच्छा सुधार) न दिखे, और अन्य अनेक प्रकार के रसों से भी नहीं, तो उसका जीवन दुर्लभ है।
। ॥ १८ ॥
जिसका थूक, मल और वीर्य जल में डूब जाता है, उसकी आयु का अन्त आया हुआ मनीषी (विद्वान्) लोग कहते हैं।
। ॥ १९ ॥
जिसके थूक में अलग-अलग अनेक प्रकार के रंग दिखाई देते हैं और वह थूक जल में पहुँचकर डूब जाता है, वह जीने योग्य नहीं है।
। ॥ २० ॥
जिसका पित्त ऊष्मा के साथ चलता हुआ दोनों शङ्ख (कनपटियों) में पहुँचकर विशेष रूप से जम जाता है (फैल जाता है), वह रोग शङ्खक नाम का है और तीन रात में जीवन का नाश कर देता है।
। ॥ २१ ॥
जिसके मुख से झाग सहित रक्त बार-बार निकलता है और जिसकी कुक्षि शूलों से चुभती है, ऐसा रोगी प्रत्याख्येय (छोड़ देने योग्य) है।
। ॥ २२ ॥
जिस रोगी में बल और मांस का तीव्र क्षय, रोग की वृद्धि और अरुचि दिखाई दें, वह तीन पक्ष (डेढ़ मास) तक जीवित नहीं रहता।
- । ॥ २३ ॥
इस विषय में दो श्लोक (हैं)- मनुष्यों की मृत्यु के निकट आने पर ये विज्ञान (लक्षण) होते हैं; इनके और ऐसे ही अन्य (लक्षणों) को भी (वैद्य) भली-भाँति देखे।
। ॥ २४ ॥
वे सब लक्षण दिखाई देते हैं, परन्तु सभी लक्षण नष्ट होने वाले (मरणासन्न) मनुष्य में प्रवेश नहीं करते (सब एक साथ नहीं होते); इसलिए सब ओर से (सभी प्रकार से) लक्षण जानने चाहिए।
॥॥
इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा संस्कारित तन्त्र के इन्द्रियस्थान में यस्यश्यावनिमित्तीय नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ (९)।