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अब इसके बाद हम कतमानिशरीरीय (कौन-से शरीर) नामक इन्द्रिय-सम्बन्धी अध्याय की व्याख्या करेंगे।
अध्याय ६
कौन-से शारीरिक लक्षण
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कतमानिशरीरीय चरक संहिता के इन्द्रियस्थान का छठा अध्याय है। इसका नाम इसके पहले शब्दों 'कतमानि शरीराणि' से पड़ा है, जिनका अर्थ है 'कौन-से शरीर'। अध्याय का विषय है वे शारीरिक लक्षण, जिनके दिखने पर वैद्य रोगी को छोड़ दे, क्योंकि उसमें चिकित्सा-कर्म सफल नहीं होता।
अध्याय का आरम्भ अग्निवेश के प्रश्न से होता है: हे महामुनि, रोग से ग्रस्त कौन-से शरीर ऐसे हैं जिन्हें वैद्य छोड़ दे। भगवान् आत्रेय इसका उत्तर लक्षणों को एक-एक करके गिनाते हुए देते हैं। पहले छाती की पीड़ा, खाया हुआ अन्न बाहर निकलना, बल का शीघ्र घटना, प्यास और हृदय का शूल आते हैं। फिर हिचकी, रक्त का अतिसार, आनाह, ज्वर, खाँसी, हाथ-पैरों और पेट की सूजन, कफ का निरन्तर निकलना और दोनों पिण्डलियों का ढीला होना बताए गए हैं।
आगे के श्लोकों में तीनों दोषों का कुपित होना, ज्वर और अतिसार तथा सूजन का एक-दूसरे के पीछे आना, हनुमन्याग्रह, प्राणों का छाती में रहना, बेचैनी और शीघ्र मृत्यु के चित्र हैं। अन्त में कहा गया है कि जिसके बल, विज्ञान, आरोग्य, ग्रहणी, मांस और रक्त शीघ्र-शीघ्र क्षीण होते हैं, और जिसका आरोग्य तथा प्रकृति घटती जाती है, उसके जीवन को मृत्यु अचानक हर लेती है।
अध्याय का सार अन्तिम श्लोक में दिया गया है: ये रोग से ग्रस्त शरीर छोड़ने योग्य हैं, क्योंकि धीर लोग इनमें किसी भी उपचार से सफलता नहीं देखते। यह ज्ञान ग्रन्थ के कथन के रूप में दिया गया है, किसी उपचार की सलाह के रूप में नहीं।
तत्र श्लोकः-इत्येतानि शरीराणि व्याधिमन्ति विवर्जयेत्।न ह्येषु धीराः पश्यन्ति सिद्धिं काञ्चिदुपक्रमात्॥
श्लोक २५ →इस विषय में यह श्लोक है: इस प्रकार इन रोग से ग्रस्त शरीरों को छोड़ दे, क्योंकि धीर (विद्वान्) लोग इनमें किसी भी उपचार से सफलता नहीं देखते।
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।
अर्थ: औषध, उपचार।
चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।
शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।
अर्थ: रोग दूर करने का साधन।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।
शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।
चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।
अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।
चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।
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॥ १ ॥
अब इसके बाद हम कतमानिशरीरीय (कौन-से शरीर) नामक इन्द्रिय-सम्बन्धी अध्याय की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
भगवान् आत्रेय ने ऐसा कहा।
!। ॥ ३ ॥
हे महामुनि, कौन-से शरीर रोग से ग्रस्त हैं, जिन्हें वैद्य छोड़ दे और जिनमें चिकित्सा-कर्म सिद्ध (सफल) नहीं होता?
। ॥ ४ ॥
इस प्रकार अग्निवेश के द्वारा अत्यन्त कठिन (उत्तर वाला) प्रश्न पूछे जाने पर भगवान् आत्रेय ने उन्हें जैसा बताया, उसे तुम सब सुनो।
। ॥ ५ ॥
जिसे बोलते समय छाती का ऊपरी भाग अत्यन्त पीड़ा करता है, खाया हुआ अन्न (बाहर) गिर जाता है और पेट में ठहरा हुआ (अन्न) भी नहीं पचता,
। ॥ ६ ॥
(तथा) जिसका बल शीघ्र घट जाता है, प्यास अत्यन्त बढ़ती है और हृदय में शूल (चुभने वाली पीड़ा) होता है, उसे वैद्य छोड़ दे।
। ॥ ७ ॥
जिसे गहराई से उत्पन्न (गम्भीर स्थान से उठी) हिचकी हो और जिसके रक्त का अतिसार (रक्त मल के रूप में निकलना) हो रहा हो, उसे आत्रेय के उपदेश का स्मरण करते हुए (वैद्य) औषध न दे।
। ॥ ८ ॥
आनाह और अतिसार, ये दोनों रोग जिस दुर्बल और रोगी मनुष्य में प्रवेश करते हैं, उसका जीवन दुर्लभ (बचना कठिन) है।
। ॥ ९ ॥
आनाह और अत्यधिक प्यास, ये दोनों जिस दुर्बल मनुष्य में प्रवेश करते हैं, प्राण उस मनुष्य को बहुत देर न लगाकर (शीघ्र) छोड़ देते हैं।
। ॥ १० ॥
जिसे पूर्वाह्न (दोपहर से पहले) में आने वाला ज्वर हो और भयानक सूखी खाँसी हो, तथा जो बल और मांस से रहित हो, वह प्रेत (मरे हुए) के समान ही है।
। ॥ ११ ॥
जिसका मूत्र और मल गाँठदार (गुँथा हुआ) निकलता है, जो ठण्डे शरीर वाला, उदर रोग (जठर) से पीड़ित और हाँफने वाला है, वह जीवित नहीं रहता।
। ॥ १२ ॥
जिसकी पेट में स्थित सूजन हाथ-पैरों की ओर फैलती है, वह अपने सम्बन्धियों के समूह को कष्ट देकर उस रोग से मारा जाता है।
। ॥ १३ ॥
जिसके पैर में सूजन हो, दोनों पिण्डलियाँ ढीली (शिथिल) हों और दोनों जंघाएँ भी धँस रही हों, उसे वैद्य छोड़ दे।
।॥ १४ ॥
जिसके हाथ, पैर, गुह्य अंग और पेट सूजे हुए हों तथा जो वर्ण (रंग), बल और आहार से हीन हो, ऐसे मनुष्य का औषधों से उपचार न करे।
। ॥ १५ ॥
जिसके छाती से जुड़ा, बहुत कफ वाला, नीला, पीला और रक्त-मिला (कफ) निरन्तर निकलता रहता है, उसे दूर से ही छोड़ दे।
। ॥ १६ ॥
जिसके रोंगटे खड़े हों, मूत्र गाढ़ा हो, जो सूजा हुआ, खाँसी और ज्वर से पीड़ित तथा क्षीण मांस वाला हो, ऐसा मनुष्य जानकार वैद्य के द्वारा दूर से ही छोड़ने योग्य है।
। ॥ १७ ॥
जिसके तीनों दोष कुपित हों और कष्टदायक लक्षणों से पहचाने जाते हों, ऐसे दुबले और बलहीन (रोगी) की चिकित्सा नहीं है।
। ॥ १८ ॥
सूजन के अन्त में ज्वर और अतिसार, अथवा उन दोनों के क्षीण होने पर सूजन, विशेषकर दुर्बल मनुष्य के अन्त (मृत्यु) के लिए होते हैं।
। ॥ १९ ॥
जो पीला (पाण्डुर), अत्यन्त दुबला और प्यास से अत्यन्त ग्रस्त हो, डम्बर वाला हो और जिसकी साँस कुपित (विकृत) हो, उसे जानकार (वैद्य) छोड़ दे।
। ॥ २० ॥
जिसके जबड़े और गर्दन का जकड़ना (हनुमन्याग्रह), प्यास तथा अत्यधिक बलहीनता हो और जिसके प्राण छाती में ही बने रहते हैं, उसे (वैद्य) छोड़ दे।
। ॥ २१ ॥
जो बेचैनी में घिरा रहता है, (अंगों को) तानता है, कुछ भी सुख नहीं पाता, और जिसके मांस, बल तथा आहार क्षीण हो गए हैं, वह मनुष्य शीघ्र ही मरने वाला है।
। ॥ २२ ॥
जिसके भयंकर रोग विरुद्ध कारणों से उत्पन्न हों और जिनके उपचार भी परस्पर विरुद्ध हों, वे अत्यन्त बढ़ते हैं और वह बहुत शीघ्र मारा जाता है।
। ॥ २३ ॥
बल, विज्ञान, आरोग्य, ग्रहणी, मांस और रक्त, ये जिसके शीघ्र-शीघ्र क्षीण होते हैं, वह मारा जाता है।
। ॥ २४ ॥
जिसका आरोग्य घटता जाता है और प्रकृति (स्वाभाविक स्थिति) भी पूरी तरह क्षीण हो जाती है, उसके जीवन को मृत्यु अचानक ही हर लेती है।
- । ॥ २५ ॥
इस विषय में यह श्लोक है: इस प्रकार इन रोग से ग्रस्त शरीरों को छोड़ दे, क्योंकि धीर (विद्वान्) लोग इनमें किसी भी उपचार से सफलता नहीं देखते।
॥॥
अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा संस्कारित तन्त्र के इन्द्रियस्थान में कतमानिशरीरीय नामक इन्द्रिय-सम्बन्धी छठा अध्याय (पूरा हुआ)।