॥ १ ॥
अब इसलिए हम पन्नरूपीय (क्षीण रूप के लक्षणों वाले) इन्द्रिय (स्थान के अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
अध्याय ७
क्षीण रूप (छाया और रूप के अरिष्ट)
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यह चरक संहिता के इन्द्रियस्थान का सातवाँ अध्याय है। इसका नाम "पन्नरूपीय" अध्याय के आरम्भ में आने वाले शब्द "पन्नरूप" से लिया गया है, जिसका अर्थ है क्षीण या बिगड़े रूप वाला। इन्द्रियस्थान में मृत्यु के पूर्व-लक्षणों, यानी अरिष्टों, का वर्णन है, और यह अध्याय उनमें से उन लक्षणों को बताता है जो छाया, प्रभा और रूप के बिगड़ने से दिखते हैं।
आत्रेय सबसे पहले यह बताते हैं कि आँख की पुतली में दिखने वाला प्रतिबिम्ब और चाँदनी, धूप, दीपक, जल या दर्पण में दिखने वाली छाया यदि बिगड़ी हुई दिखे, तो उसे मृत्यु का सूचक माना गया है। इसके बाद वे छाया के बदलने के चार पक्ष, यानी आकृति, माप, रंग और प्रभा, परिभाषित करते हैं, और छाया तथा प्रतिच्छाया का भेद समझाते हैं।
फिर आत्रेय पाँच महाभूतों के अनुसार छाया के पाँच प्रकार और उनके लक्षण गिनाते हैं, जिनमें वायु की छाया निन्दित कही गई है। इसके बाद प्रभा के सात रंग बताए गए हैं और यह कहा गया है कि प्रभा का फैलना, चिकनापन और भरपूर होना शुभ है, जबकि रूखा, मैला और सिकुड़ा होना अशुभ। छाया और प्रभा का आपसी भेद भी स्पष्ट किया गया है।
अध्याय का दूसरा भाग छाया-प्रभा से हटकर शरीर के लक्षणों पर आता है: आँखों और मुख की स्थिति, बिस्तर से उठाए जाने पर बार-बार बेहोशी, खान-पान और मल-मूत्र की उलटी मात्रा, साँस, गर्दन की नाड़ियाँ, सूजन और क्षीणता। हर लक्षण के साथ ग्रन्थ बताता है कि ऐसा रोगी जीवित नहीं रहता, या कुछ दिन या एक मास ही जीता है।
अध्याय का सार यह है कि चरक संहिता के अनुसार ये अरिष्ट-लक्षण जिसे भली-भाँति ज्ञात हों, वही कुशल वैद्य "आयुर्वेद का ज्ञाता" कहलाता है। यह ग्रन्थ का कथन है, इसे किसी के लिए चिकित्सा-सलाह के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।
तत्र श्लोकः-इदं लिङ्गमरिष्टख्यमनेकमभिजज्ञिवान्।आयुर्वेदविदित्याख्यां लभते कुशलो जनः॥
श्लोक ३२ →इस विषय में श्लोक- अरिष्ट नाम के इन अनेक लक्षणों को जानने वाला कुशल मनुष्य "आयुर्वेद का ज्ञाता" यह नाम पाता है।
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।
अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।
चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।
चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
शब्द-रचना: आयुस् (आयु, जीवन) + वेद (ज्ञान; √विद् 'जानना' से)।
अर्थ: आयु का वेद, अर्थात् जीवन का ज्ञान।
चरक संहिता में: आयुर्वेद वह शास्त्र है जिसमें हित और अहित, सुख और दुःख वाली आयु, आयु के लिए क्या हितकर और क्या अहितकर है, आयु का मान, और स्वयं आयु बताई गई हो (सू. १/४१)। इसलिए आयुर्वेद केवल रोगों की दवा नहीं, पूरे जीवन को स्वस्थ और सार्थक रखने की विद्या है।
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॥ १ ॥
अब इसलिए हम पन्नरूपीय (क्षीण रूप के लक्षणों वाले) इन्द्रिय (स्थान के अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।
।॥ ३ ॥
जिसकी दृष्टि (आँख) में दोनों आँखों की प्रतिच्छायामयी (प्रतिबिम्बरूप) कुमारिका (पुतली) को क्षीण रूप वाली जाने, उसकी चिकित्सा करने की इच्छा न करे।
। ॥ ४ ॥
चाँदनी में, धूप में, दीपक में तथा जल और दर्पण में भी जिसके अंगों की छाया विकृत (बिगड़ी हुई) दिखे, वह वैसा ही प्रेत (मृतक के समान) है।
। ॥ ५ ॥
छाया जो कटी हुई, फटी हुई, व्याकुल (अस्त-व्यस्त), घटी हुई या बढ़ी हुई, नष्ट, पतली, दो भागों में कटी हुई, विकृत और विशिता हो,
। ॥ ६ ॥
ये और दूसरी भी जो कोई निन्दित प्रतिच्छायाएँ (प्रतिबिम्ब) हैं, वे सब मरने वालों की जाननी चाहिए, यदि वे लक्ष्य (प्रत्यक्ष) कारण से उत्पन्न न हों।
। ॥ ७ ॥
आकृति, माप, रंग और प्रभा से भी जिसकी छाया बदल जाती है, वह स्वस्थ होते हुए भी प्रेत (मृतक के समान) ही है।
। ॥ ८ ॥
संस्थान को आकृति जानना चाहिए; वह सुषम (सुन्दर, सम) और विषम (असम) होती है। मनुष्यों का प्रमाण (माप) मध्यम, अल्प और महत् (बड़ा), इस प्रकार तीन तरह का कहा गया है।
। ॥ ९ ॥
जल, दर्पण, धूप आदि में जो छाया प्रमाण और संस्थान के अनुरूप दिखती है, वह प्रतिच्छाया है; छाया वह है जो वर्ण और प्रभा के आश्रित है।
। ॥ १० ॥
आकाश आदि पाँच (महाभूतों) की पाँच छायाएँ अनेक लक्षणों वाली हैं: आकाश की (छाया) निर्मल, नीली, स्निग्ध और मानो प्रभा सहित होती है, और
। ॥ ११ ॥
जो रूखी, श्याव (धूसर) और अरुण (लालिमा लिए) हो, वह वायवी (वायु-सम्बन्धी) छाया है, वह हत (मन्द) प्रभा वाली होती है; और विशुद्ध लाल, दीप्त (चमकती) आभा वाली, देखने में प्रिय (छाया) आग्नेयी (अग्नि-सम्बन्धी) है।
। ॥ १२ ॥
शुद्ध वैदूर्य (मणि) जैसी निर्मल और अत्यन्त स्निग्ध (छाया) आम्भसी (जल-सम्बन्धी) मानी गई है, और स्थिर, स्निग्ध, घन (सघन), श्लक्ष्ण (चिकनी), श्याम (गहरी काली) और श्वेत (सफेद) छाया पार्थिवी (पृथ्वी-सम्बन्धी) है।
। ॥ १३ ॥
इनमें वायवी (छाया) निन्दित है; (शेष) चार छायाएँ सुख को उत्पन्न करने वाली होती हैं। वायवी (छाया) तो विनाश के लिए, या बड़े क्लेश के लिए भी होती है।
। ॥ १४ ॥
सभी प्रभा तैजसी (तेज-सम्बन्धी) होती है; वह सात प्रकार की कही गई है: रक्त (लाल), पीत (पीली), सित (सफेद), श्याव (धूसर-भूरी), हरित (हरी), पाण्डुर (हल्की पीली-सफेद) और असित (काली)।
। ॥ १५ ॥
उन (प्रभाओं) में जो विकासिनी (फैलने वाली), स्निग्ध और विपुल (भरपूर) हैं, वे शुभ हैं; और जो रूखी, मैली और संक्षिप्त (सिकुड़ी हुई) हैं, वे अशुभ फल उत्पन्न करने वाली हैं।
। ॥ १६ ॥
छाया वर्ण (रंग) पर छा जाती है, और प्रभा वर्ण को प्रकाशित करने वाली है। छाया निकट दिखाई देती है, (जबकि) प्रभा दूर तक फैलकर चमकती है।
। ॥ १७ ॥
कोई भी (मनुष्य) न छायारहित है, न प्रभारहित; छाया और प्रभा के आश्रित विशेष (भेद) समय आने पर मनुष्यों के शुभ और अशुभ की उत्पत्ति को सूचित करते हैं।
। ॥ १८ ॥
जिसकी दोनों आँखों में कामला (पीलापन) हो, मुख भरा हुआ (सूजा हुआ) हो, दोनों कनपटियों का मांस ढीला (घट गया) हो, और जिसे भय (घबराहट) तथा शरीर में उष्णता हो, उसे छोड़ दे (उसकी चिकित्सा न करे)।
। ॥ १९ ॥
जो मनुष्य बिस्तर से उठाए जाने पर बार-बार मूर्छा (बेहोशी) को प्राप्त हो जाता है, वह विकत्थन (बढ़-चढ़कर बोलने वाला) सात दिन भी जीवित नहीं रहता।
। ॥ २० ॥
जिसके मिले-जुले (संसृष्ट) रोग प्रतिलोम और अनुलोम (उलटी और सीधी दिशा में) जाने वाले हों और ग्रहणी प्रायः बिगड़ गई हो, वह आधे महीने तक भी जीवित नहीं रहता।
। ॥ २१ ॥
रोग से घिरे हुए (पीड़ित), दुबले हुए और थोड़ा खाने वाले जिस व्यक्ति के मूत्र और मल बहुत हों, उसे छोड़ दे।
। ॥ २२ ॥
जो दुर्बल रोगी पहले खाए हुए (भोजन) से अधिक अन्न खाता है, और जिसके मल-मूत्र थोड़े होते हैं, वह प्रेत के समान ही है।
। ॥ २३ ॥
जो मनुष्य प्रिय और गुणों से युक्त भोजन खाता है, फिर भी निरन्तर बल और वर्ण से क्षीण होता जाता है, वह जीवित नहीं रहता।
। ॥ २४ ॥
जो कराहता है, साँस लेता है, ढीला मल बार-बार निकालता है, बलहीन है, प्यास से पीड़ित है और जिसका मुँह सूखा है, वह जीवित नहीं रहता।
। ॥ २५ ॥
जो छोटी साँस लेता है और जो झटके से फड़कता है, उसे आत्रेय पुनर्वसु ने मरा हुआ ही कहा।
। ॥ २६ ॥
जो ऊपर की ओर साँस खींचता है और कफ से घिर जाता है, तथा जो मनुष्य वर्ण, बल और आहार से हीन है, वह जीवित नहीं रहता।
। ॥ २७ ॥
जिसकी दोनों आँखें ऊपर की ओर चढ़ी हों और गर्दन की दोनों मन्या नाड़ियाँ निरन्तर काँपती हों, तथा जो बलहीन, प्यास से पीड़ित और सूखे मुँह वाला हो, वह जीवित नहीं रहता।
। ॥ २८ ॥
जिसके दोनों गाल सूजे हुए हों, भयंकर ज्वर और खाँसी हो, जो शूल से पीड़ित हो और भोजन से भी द्वेष करे, उसमें कर्म सिद्ध नहीं होता।
। ॥ २९ ॥
जिसका सिर, जीभ और मुँह मुड़ गए हों, जिसकी दोनों भौंहें अपनी जगह से खिसक गई हों और जिसकी जीभ काँटों से ढकी हो, वह प्रेत के समान ही है।
। ॥ ३० ॥
सूजन बहुत अधिक फैली हो और दोनों अण्डकोष अत्यन्त बाहर निकल आए हों; इसी प्रकार विकृति के कारण उलट-फेर हो जाना, प्रेत (मृत्यु) का लक्षण है।
। ॥ ३१ ॥
जिसका मांस जमा हुआ हो, पर त्वचा और हड्डियों में ही दिखाई देता हो, उस क्षीण और भोजन न करने वाले की आयु अधिक से अधिक एक मास की होती है।
- । ॥ ३२ ॥
इस विषय में श्लोक- अरिष्ट नाम के इन अनेक लक्षणों को जानने वाला कुशल मनुष्य "आयुर्वेद का ज्ञाता" यह नाम पाता है।
॥॥
इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संशोधित तन्त्र के इन्द्रियस्थान में पन्नरूपीय इन्द्रिय नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ। ७।