भारत संहिता

अध्याय ८

अवाक्शिरसीयमिन्द्रियम्

सिर नीचे (उलटी छाया आदि अरिष्ट)

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भूमिका

अवाक्शिरसीय चरक संहिता के इन्द्रियस्थान का आठवाँ अध्याय है। इसका नाम इसके पहले श्लोक के शब्द 'अवाक्शिरा' (नीचे की ओर सिर वाली) से पड़ा है, जहाँ उस छाया का उल्लेख है जिसका सिर उलटा दिखाई देता है। अध्याय का विषय अरिष्ट है, यानी वे चिह्न जिन्हें ग्रन्थ मृत्यु के निकट होने का संकेत मानता है।

अध्याय भगवान् आत्रेय के कथन के रूप में चलता है। सबसे पहले परछाईं के बिगड़े रूप गिनाए गए हैं, फिर आँखें, पलकें और बाल; उसके बाद नाक, मुख, कान, होंठ, दाँत और जीभ के बिगड़े रूप। आगे साँस की गड़बड़ी, हाथ-पैर और तालु का ठण्डा पड़ना, और रोगी की बेचैन तथा बेमेल चेष्टाएँ आती हैं: घुटने रगड़ना, पैर पटकना, नाखून या बाल काटना, बिना कारण हँसना और रोना। अन्त में उन लक्षणों का वर्णन है जिनमें पहले के सुख की वस्तुओं में रुचि न रहना, गर्दन और पीठ का भार न सँभाल पाना, अचानक ज्वर, प्यास और मूर्च्छा, जोड़ों का ढीला पड़ना तथा बहुत पसीना आना शामिल हैं।

कुछ चिह्नों के साथ ग्रन्थ यह भी बताता है कि उनके बाद कितने दिन शेष रहते हैं: एक लक्षण में रोगी तीन दिन तक जीता है और निरोगी अधिक से अधिक छह रात तक; बाल उखाड़ने पर भी पता न चलने वाले के लिए छह रात कही गई है। अध्याय के कई श्लोक यह भी कहते हैं कि ऐसे लक्षण दिखने पर धीर वैद्य रोगी का उपचार नहीं करता।

अध्याय का सार यह है कि ग्रन्थ के अनुसार इन चिह्नों को सावधान होकर परखना चाहिए। समापन का श्लोक कहता है कि कुछ लक्षण क्षण भर में प्रकट हो जाते हैं और यहाँ बताया गया कोई भी लक्षण निष्फल नहीं है। यह सब ग्रन्थ का अपना कथन है, कोई चिकित्सा-सलाह नहीं।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २७)

तत्र श्लोकः-इमानि लिङ्गानि नरेषु बुद्धिमान् विभावयेतावहितो मुमूर्षुषु।क्षणेन भूत्वा ह्युपयान्ति कानिचिन्नचाफलं लिङ्गमिहास्ति किञ्चन॥

श्लोक २७ →

इस विषय में श्लोक (यह है)। बुद्धिमान् वैद्य सावधान होकर मरणासन्न मनुष्यों में इन लक्षणों को पहचाने। कुछ लक्षण क्षण भर में प्रकट होकर आ पहुँचते हैं, और यहाँ कोई भी लक्षण निष्फल नहीं है।

मुख्य शब्द (७) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

आरोग्य
आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार

शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।

अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।

चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

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च. इं. ८/१

॥ १ ॥

अब हम अवाक्शिरसीय (जिसमें उलटी छाया जैसे मृत्यु-सूचक चिह्न बताए गए हैं) इन्द्रिय-स्थान के अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. इं. ८/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।

च. इं. ८/३

। ॥ ३ ॥

जिस प्राणी के रूप की प्रतिच्छाया (परछाईं) नीचे की ओर सिर वाली, टेढ़ी, अथवा बिना सिर की हो, उसकी चिकित्सा करने की (वैद्य) इच्छा न करे।

च. इं. ८/४

। ॥ ४ ॥

जिस प्राणी की पलकें जटा की तरह उलझ जाएँ और दृष्टि भी रुक (दब) जाए, उसे धीर (विवेकी वैद्य) औषधि से उपचार न दे।

च. इं. ८/५

। ॥ ५ ॥

जिसकी पलकें सूजी हुई हों और सूखते (क्षीण होते) हुए उस व्यक्ति की पलकें आपस में मिलती न हों, तथा दोनों आँखें (मैल आदि से) लिप्त हो जाएँ, वह प्रेत के समान ही है।

च. इं. ८/६

। ॥ ६ ॥

भौंहों पर अथवा सिर पर जिसके बहुत-से, पहले कभी न देखे हुए, बिना किए (अपने आप बने), स्पष्ट सीमन्त (माँग जैसी रेखाएँ) और आवर्त (भँवर) दिखाई दें, उसे देखकर मृत्यु बताए।

च. इं. ८/७

। ॥ ७ ॥

इस लक्षण से रोगी मनुष्य तीन दिन तक जीते हैं; किन्तु निरोगों के लिए यही (लक्षण) अधिकतम छह रात तक का कहा जाता है।

च. इं. ८/८

। ॥ ८ ॥

जो मनुष्य खींचकर उखाड़े गए बालों को (उखड़ने का) अनुभव नहीं करता, चाहे वह रोगी न हो अथवा रोगी हो, वह छह रात का समय पार नहीं करता।

च. इं. ८/९

। ॥ ९ ॥

जिसके बाल बिना तेल लगे हुए भी तेल लगे हुए जैसे दिखाई दें, उसे जिसकी आयु रुक गई है ऐसा जानकर धीर (वैद्य) छोड़ दे।

च. इं. ८/१०

। ॥ १० ॥

जिसकी नासिका का वंश (नाक का बाँसा) मुरझा जाए और चौड़ापन प्राप्त कर ले, जो बिना सूजन का होकर भी सूजे हुए जैसा दिखे, उसे जानकार (वैद्य) त्याग दे।

च. इं. ८/११

। ॥ ११ ॥

जिसकी नासिका बहुत अधिक खुली हुई हो, अथवा जिसकी बहुत अधिक बन्द हो, या टेढ़ी अथवा बिल्कुल सूखी हो, वह नहीं जीता।

च. इं. ८/१२

। ॥ १२ ॥

जिसका मुख, और दोनों कान तथा दोनों होंठ सफ़ेद, गहरे भूरे या अत्यन्त लाल हो जाएँ, अथवा विकार के कारण नीले हो जाएँ, वह रोग से नहीं छूटता।

च. इं. ८/१३

। ॥ १३ ॥

जिसके दाँत हड्डी की तरह सफ़ेद, पुष्पित (फूले हुए जैसे) अथवा कीचड़ से ढके हुए जैसे हों, वह विकृति के कारण उस रोग को छोड़कर आरोग्य नहीं पाता।

च. इं. ८/१४

। ॥ १४ ॥

(जीभ) जड़, संवेदनाहीन, भारी, काँटों से अत्यन्त भरी हुई, गहरे भूरे रंग की, सूखी अथवा सूजी हुई, प्रेत की जीभ जैसी और रेंगने वाली हो।

च. इं. ८/१५

। ॥ १५ ॥

जो मनुष्य लम्बी साँस ऊपर खींचकर और छोटी साँस छोड़कर घुटन से व्याकुल होता है, उसे जिसकी आयु रुक गई है ऐसा जानकर धीर (वैद्य) छोड़ दे।

च. इं. ८/१६

। ॥ १६ ॥

हाथ, पैर, मन्या (गर्दन की नसें) और तालु भी अत्यन्त ठण्डे हो जाते हैं; आयु के क्षय के समय (ये अंग) कठोर भी होते हैं, अथवा मुलायम भी।

च. इं. ८/१७

। ॥ १७ ॥

जो रोगी घुटने से घुटने को रगड़ता हुआ और दोनों पैर उठाकर पटकता हुआ बार-बार मुँह को (इधर-उधर) फेंकता है, वह नहीं जीता।

च. इं. ८/१८

। ॥ १८ ॥

जो रोगी दाँतों से नखों के अग्र भाग काटता हुआ, नखों से सिर के बाल काटता हुआ, और काठ (लकड़ी) से भूमि को कुरेदता हुआ है, वह रोग से नहीं छूटता।

च. इं. ८/१९

। ॥ १९ ॥

जो रोगी जागते हुए बेमेल ढंग से (बिना उचित कारण के) दाँतों को चबाता है, रोता और हँसता है, और यदि दुःख को नहीं जानता (अनुभव नहीं करता), वह रोग से नहीं छूटता।

च. इं. ८/२०

। ॥ २० ॥

जो रोगी बार-बार हँसता हुआ, बार-बार गुर्राता (अस्पष्ट आवाज़ करता) हुआ पैर से शय्या को मारता है, और ऊपर के छिद्रों को टटोलता है, वह नहीं जीता।

च. इं. ८/२१

। ॥ २१ ॥

जिन पदार्थों (भावों) के मिलने से मनुष्य पहले परम सुख पाता था, उन्हीं में रमण न करने वाले, थके-मुरझाए (रोगी) की मृत्यु बताए।

च. इं. ८/२२

। ॥ २२ ॥

मरणासन्न रोगी की गर्दन सिर को नहीं सँभालती, पीठ अपने भार को नहीं सँभालती, और दोनों जबड़े मुख में स्थित ग्रास (कौर) को नहीं (सँभालते)।

च. इं. ८/२३

। ॥ २३ ॥

मरने वाले रोगी को अचानक ज्वर का ताप, प्यास, मूर्च्छा, बल का क्षय और जोड़ों का ढीला पड़ना होता है।

च. इं. ८/२४

। ॥ २४ ॥

जिसके मुख से गोसर्ग (अर्थ अस्पष्ट) जैसा पसीना बहुत अधिक टपकता है, लेपज्वर से पीड़ित उस रोगी का जीवन दुर्लभ है।

च. इं. ८/२५

। ॥ २५ ॥

आहार कण्ठ तक नहीं पहुँचता, जीभ कण्ठ में चली जाती है, और आयु के अन्त को पहुँचे प्राणी का बल घटता है।

च. इं. ८/२६

। ॥ २६ ॥

मरने वाला रोगी कठिनाई से सिर को इधर-उधर पटकता है, दोनों हाथों को छोड़कर (छोड़ता हुआ), उसके माथे से पसीना बहता है और उसके बन्धन ढीले पड़ गए होते हैं।

च. इं. ८/२७

- । ॥ २७ ॥

इस विषय में श्लोक (यह है)। बुद्धिमान् वैद्य सावधान होकर मरणासन्न मनुष्यों में इन लक्षणों को पहचाने। कुछ लक्षण क्षण भर में प्रकट होकर आ पहुँचते हैं, और यहाँ कोई भी लक्षण निष्फल नहीं है।

च. इं. ८

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संस्कार किए गए तन्त्र में इन्द्रियस्थान में अवाक्शिरसीय इन्द्रिय नामक आठवाँ अध्याय (समाप्त हुआ)।