अब इसके बाद हम सुधाकल्प (सुधा, अर्थात् स्नुही के योग) की व्याख्या करेंगे।
अध्याय १०
सुधाकल्पोऽध्यायः
सुधा (स्नुही, थूहर) के योग
इस पृष्ठ का हिन्दी पाठ AI (Claude) द्वारा तैयार किया गया ड्राफ्ट है। चिह्न वाले अंशों की सम्पादक द्वारा जाँच अभी बाकी है।
भूमिका
यह कल्पस्थान का दसवाँ अध्याय है। इसका नाम सुधाकल्प है, यानी सुधा नामक पौधे (स्नुही, जिसे थूहर भी कहते हैं) के कल्प, अर्थात् उससे बनने वाले योग। अध्याय आत्रेय के कथन के रूप में चलता है, जैसा चरक संहिता के हर अध्याय में होता है।
आरम्भ में आत्रेय बताते हैं कि विरेचन करने वाले सभी द्रव्यों में सुधा सबसे तीक्ष्ण मानी गई है, क्योंकि वह दोषों के जमाव को शीघ्र तोड़ती है। इसी कारण ग्रन्थ उसके लिए सावधानी भी बताता है: मृदु कोष्ठ वाले व्यक्ति में और दोषों का संचय थोड़ा होने पर उसका प्रयोग नहीं बताया गया। फिर उन रोगों की सूची आती है जिनमें, ग्रन्थ के अनुसार, इसे बलवान् रोगी में ठीक से प्रयुक्त किया जाता है।
इसके बाद पौधे का परिचय है: उसके दो प्रकार, काँटों की कमी और अधिकता के आधार पर, उसके नाम, और उसका दूध निकालने का समय और ढंग। फिर दूध को काढ़ों के साथ सुखाकर अनेक अनुपानों के साथ लेने, कई द्रव्यों को उसके दूध से भावना देने, लेह, घी, सुरा और सूखी मछली या मांस वाले योगों का क्रम चलता है। एक योग में सूँघने भर से मृदु कोष्ठ वाले राजाओं के विरेचन की बात भी कही गई है।
अध्याय का अन्त दो श्लोकों के सार से होता है, जो योगों को रूप के अनुसार गिनाते हैं और उनकी कुल संख्या बीस बताते हैं। पाठक के लिए ध्यान रखने की बात यह है कि यह चरक संहिता का वर्णन है; इस पर पढ़ते हुए ऐसा समझना चाहिए कि ग्रन्थ क्या कहता है, न कि किसी के लिए चिकित्सा की सलाह।
इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २१-२२)
तत्र श्लोकौ-सौवीरकादिभिः सप्त सर्पिषा च रसेन च।पानकं घ्रेयलेहौ च योगा यूषादिभिस्त्रयः॥
श्लोक २१ →वहाँ दो श्लोक हैं- सौवीरक आदि के साथ सात, घी के साथ और रस के साथ, पानक, घ्रेय और लेह, तथा यूष आदि के साथ तीन योग।
द्वौ शुष्कमत्स्यमांसाभ्यां सुरैका द्वे च सर्पिषी।महावृक्षस्य योगास्ते विंशतिः समुदाहृताः॥
श्लोक २२ →दो शुष्क मत्स्य और मांस के साथ, एक सुरा का, और दो घी के; महावृक्ष (सुधा) के वे योग बीस बताए गए हैं।
मुख्य शब्द (५) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
- विरेचन
- विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार
शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।
- दोष
- दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
- आतुर
- आतुर - रोगी
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।
- भिषज्
- भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
- रस
- रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।
॥ २ ॥
भगवान् आत्रेय ने ऐसा कहा था।
। ॥ ३ ॥
सभी विरेचन द्रव्यों में सुधा सबसे अधिक तीक्ष्ण मानी गई है, क्योंकि वह दोषों के संघात (जमाव) को शीघ्र तोड़ देती है और कष्ट देने वाले विभ्रम (उपद्रव) वाली है।
। ॥ ४ ॥
इसलिए इसका प्रयोग मृदु कोष्ठ वाले व्यक्ति में कभी नहीं करना चाहिए, और न तब, जब दोषों का संचय थोड़ा हो और मार्गपरिक्रम (दोषों का मार्ग में विचरण) हो रहा हो।
। ॥ ५ ॥
पाण्डुरोग और उदर रोग में, गुल्म में, कुष्ठ में, दूषीविष से पीड़ित में, शोथ में, मधुमेह में, और दोषों से भ्रान्त चित्त वाले में
। ॥ ६ ॥
ऐसे रोगों से ग्रस्त रोगी को, जो प्राणवान् (बलवान्) हो, जानकर महावृक्ष (सुधा) का भलीभाँति प्रयोग करे, क्योंकि वह भलीभाँति प्रयुक्त होने पर
। ॥ ७ ॥
तुरन्त दोषों के बड़े संचय को भी हर लेता है। वह काँटों के कम और बहुत होने के आधार पर दो प्रकार का माना गया है।
। ॥ ८ ॥
अत्यन्त तीक्ष्ण और थोड़े काँटों वाली (किस्म) श्रेष्ठ है; (दूसरी) बहुत काँटों वाली है। वह (सुधा) नाम से स्नुग्गुडा, नन्दा, सुधा और निस्त्रिंशपत्रक (कही जाती है)।
। ॥ ९ ॥
बुद्धिमान् वैद्य उन दोनों को शस्त्र से चीरकर उनका दूध निकाले, दो वर्ष या तीन वर्ष (का होने पर), विशेषतः शिशिर ऋतु के अन्त में।
। ॥ १० ॥
उस (दूध) को बिल्व आदि के, या बृहती के, तथा कण्टकारी के, एक-एक के कषाय (काढ़े) के साथ बराबर भाग वाला करके अंगारों पर सुखाए।
। ॥ ११ ॥
फिर बेर के बराबर मात्रा सौवीरक के साथ पिए, या तुषोदक के साथ, या बेरों के रस के साथ, या आँवले के रस के साथ।
। ॥ १२ ॥
या सुरा के साथ, दधिमण्ड के साथ, या मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू) के रस के साथ। सातला, काञ्चनक्षीरी, श्यामा आदि (द्रव्यों) और कटुत्रिक (सोंठ, पिप्पली, मरिच) को
। ॥ १३ ॥
जैसी उपलब्धि हो उसके अनुसार एक सप्ताह तक सुधा के दूध से भावना दे। फिर इसकी बेर के बराबर मात्रा घी के साथ पिए, या मांसरस के साथ।
। ॥ १४ ॥
त्र्यूषण (सोंठ, पिप्पली, मरिच), त्रिफला, दन्ती, चित्रक तथा त्रिवृता को स्नुही के दूध से भावित करके भलीभाँति गुड़ का पानक तैयार करे।
। ॥ १५ ॥
त्रिवृता, आरग्वध (अमलतास), दन्ती, शङ्खिनी और सप्तला को बराबर (मात्रा में) लेकर, गोमूत्र में रात भर रखकर, फिर धूप में सुखाए।
। ॥ १६ ॥
इस प्रकार एक सप्ताह भावना देकर, फिर दूसरे सप्ताह स्नुही के दूध से पुनः भावना दे, सुखाए हुए को; तब उसी से भी भावित (वह)
। ॥ १७ ॥
उसे गन्धमाल्य (सुगन्धित माला) की भाँति सूँघकर और वस्त्र ओढ़कर ही, मृदु कोष्ठ वाले राजा सुखपूर्वक शीघ्र विरेचित हो जाते हैं।
। ॥ १८ ॥
श्यामा-त्रिवृत् के काढ़े, स्नुही के दूध, घी और फाणित (राब) के साथ लेह पकाकर, विरेचन के लिए उचित मात्रा में मनुष्य को चटाए।
। ॥ १९ ॥
सुधा का दूध यूषों, मांसरसों या घी के साथ पिलाए; अथवा (उससे) भावित सूखी मछलियाँ या मांस मनुष्य खाए।
। ॥ २० ॥
दूध और आमलक के फलों के साथ घी को चतुरङ्गुल (आरग्वध) वाले योग की तरह पकाए; अथवा दूध में सुरा बनवाए; या घी को पहले की तरह दूध में पकाए।
- । ॥ २१ ॥
वहाँ दो श्लोक हैं- सौवीरक आदि के साथ सात, घी के साथ और रस के साथ, पानक, घ्रेय और लेह, तथा यूष आदि के साथ तीन योग।
। ॥ २२ ॥
दो शुष्क मत्स्य और मांस के साथ, एक सुरा का, और दो घी के; महावृक्ष (सुधा) के वे योग बीस बताए गए हैं।
॥॥
इस प्रकार अग्निवेश के रचे, चरक द्वारा संशोधित, और जो भाग अप्राप्त था उसे दृढबल द्वारा पूरा किए हुए तन्त्र के कल्पस्थान में सुधाकल्प नामक दसवाँ अध्याय (समाप्त हुआ)। ॥१०॥