भारत संहिता

अध्याय ११

सप्तलाशाङ्खिनीकल्पोऽध्यायः

सप्तला और शङ्खिनी के योग

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भूमिका

यह कल्पस्थान का ग्यारहवाँ अध्याय है। इसका नाम "सप्तला-शङ्खिनी-कल्प" है, यानी सप्तला और शङ्खिनी नाम की दो औषधीय वनस्पतियों के योगों का अध्याय। यहाँ "कल्प" का अर्थ औषधि बनाने और प्रयोग करने की विधियाँ हैं। अध्याय का आरम्भ उसी सूत्र से होता है जिससे ग्रन्थ के अध्याय आरम्भ होते हैं: भगवान् आत्रेय बताते हैं कि अब इस कल्प की व्याख्या की जाएगी।

अध्याय पहले दोनों वनस्पतियों के पर्यायवाची नाम गिनाता है: सप्तला के नाम चर्मसाह्वा और बहुफेनरसा हैं, और शङ्खिनी के नाम तिक्तला, यवतिक्ता और अक्षिपीडक। इसके बाद ग्रन्थ के अनुसार इनके गुण बताए गए हैं: ये विकासी, तीक्ष्ण और रूक्ष हैं, इसलिए गुल्म, हृद्रोग, कुष्ठ, शोफ और उदर जैसे रोगों में तथा कफ की अधिकता वाले रोगों में प्रयोग के योग्य कही गई हैं।

फिर योगों का क्रम आता है। पहले शङ्खिनी के फल और सप्तला की जड़ का पिण्ड बनाने की विधि है, फिर इस कल्प को मैरेय, दधिमण्ड, सौवीरक, तुषोदक और सीधु जैसे द्रवों के साथ विरेचन के लिए लेने की बात। इसके बाद तैल और घी के योग आते हैं, जिनमें त्रिवृत् और श्यामा जैसे द्रव्य मिलाए जाते हैं। अन्त में बताया गया है कि यही कल्प दन्ती, द्रवन्ती, अजशृङ्गी, अजगन्धा, क्षीरिणी, नीलिका और करञ्ज जैसी अन्य वनस्पतियों के लिए भी है।

अध्याय दो सार-श्लोकों पर समाप्त होता है। उनमें कषाय, तैल, घी, मद्य, लेह और कम्पिल्लक के योगों की गिनती दी गई है, और कहा गया है कि सप्तला और शङ्खिनी से कुल उनतालीस योग बताए गए हैं, जो दोनों को मिलाकर तथा अकेले-अकेले भी हितकर हैं। पाठक के लिए ध्यान देने की बात यह है कि इस अध्याय में विरेचन के योग अलग-अलग द्रवों और स्नेहों में बनाने के कई ढंग एक साथ गिनाए गए हैं। कुछ स्थानों पर पाठ संक्षिप्त है और उसका अर्थ निश्चित नहीं है; ऐसे स्थान व्याख्या में चिह्नित हैं। यहाँ जो कुछ है वह ग्रन्थ का कथन है, चिकित्सकीय सलाह नहीं।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १८-१९)

तत्र श्लोकौ-कषाया दश षट् तैलेऽष्टौ च सर्पिषि।पञ्च मद्ये त्रयो लेहा योगः कम्पिल्लके तथा॥

श्लोक १८ →

इस विषय में दो श्लोक (हैं)- दस कषाय, तैल में छह और घी में आठ, मद्य में पाँच, तीन लेह तथा कम्पिल्लक में योग।

सप्तलाशङ्खिनीभ्यां ते त्रिंशदुक्ता नवाधिकाः।योगाः सिद्धाः समस्ताभ्यामेकशोऽपि च ते हिताः॥

श्लोक १९ →

सप्तला और शङ्खिनी से वे तीस और नौ अधिक (अर्थात् उनतालीस) योग कहे गए हैं; वे सिद्ध योग दोनों को मिलाकर तथा एक-एक से भी हितकर हैं।

मुख्य शब्द (५) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
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शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

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च. क. ११/१

॥ १ ॥

अब हम सप्तला और शङ्खिनी के कल्प की व्याख्या करेंगे।

च. क. ११/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।

च. क. ११/३

। ॥ ३ ॥

सप्तला, चर्मसाह्वा और वह बहुफेनरसा (ये सप्तला के नाम हैं)। शङ्खिनी, तिक्तला और यवतिक्ता, अक्षिपीडक (ये शङ्खिनी के नाम हैं)।

च. क. ११/४

। ॥ ४ ॥

वे दोनों गुल्म, हृद्रोग, कुष्ठ, शोफ, उदर आदि (रोगों) में, तथा विकासी, तीक्ष्ण और रूक्ष होने के कारण कफ की अधिकता वाले (रोगों) में प्रयोग करने योग्य हैं।

च. क. ११/५

। ॥ ५ ॥

शङ्खिनी का अधिक सूखा न हुआ, छिलका उतारा हुआ फल लेना चाहिए, और सप्तला की जड़ें लेकर पात्र में डाले।

च. क. ११/६

। ॥ ६ ॥

उन दोनों का अक्ष (नामक तौल) मात्रा का पिण्ड, प्रसन्ना और लवण के साथ मिलाकर, कफ और वात से उत्पन्न हृद्रोग में तथा गुल्म में प्रयोग करे।

च. क. ११/७

।॥ ७ ॥

प्रियाल, पीलु, कर्कन्धु, कोल, आम्रातक और दाडिम से, तथा द्राक्षा, पनस, खर्जूर, बदर, अम्ल और परूषक से

च. क. ११/८

। ॥ ८ ॥

मैरेय में, खट्टे दधिमण्ड में, सौवीरक और तुषोदक में तथा सीधु में भी यह कल्प सुखपूर्वक शीघ्र विरेचन करने वाला होता है।

च. क. ११/९

। ॥ ९ ॥

तैल को विदारिगन्धा आदि (द्रव्यों) से उबाले हुए दूध में, सप्तला और शङ्खिनी के कल्क में, जो त्रिवृत् और श्यामा के आधे भाग से युक्त हो, पकाए।

च. क. ११/१०

। ॥ १० ॥

दधिमण्ड के साथ मिलाकर सिद्ध किए हुए उसे पिलाए। शङ्खिनी के चूर्ण के दो भाग और तिल के चूर्ण का एक और भाग

च. क. ११/११

। ॥ ११ ॥

हरीतकी के कषाय के साथ उस (मिश्रण) से निकाला हुआ तैल पिए। अतसी, सर्षप, एरण्ड और करञ्ज (के तैलों) में यही विधि है।

च. क. ११/१२

। ॥ १२ ॥

शङ्खिनी और सप्तला से सिद्ध किए हुए दूध से जो घी निकले, (उसे) उन्हीं दोनों के कल्क के भाग में, त्रिवृत् और श्यामा के आधे भाग से युक्त (करके)

च. क. ११/१३

। ॥ १३ ॥

दूध में घोलकर भली-भाँति पकाए हुए (उस घी) को पिए; वह विरेचन है। यह कल्प दन्ती और द्रवन्ती का तथा अजशृङ्गी और अजगन्धा का (भी) है।

च. क. ११/१४

। ॥ १४ ॥

क्षीरिणी का, और नीलिका का, उसी प्रकार दोनों करञ्ज का, मसूरविदला का और प्रत्यक्पर्णी का (कल्प) भी,

च. क. ११/१५

। ॥ १५ ॥

द्विवर्ग के आधे अंश के कल्क से उसी प्रकार घी सिद्ध करना चाहिए; और फिर शङ्खिनी, सप्तला और धात्री (आँवला) के कषाय में घी सिद्ध करे।

च. क. ११/१६

। ॥ १६ ॥

त्रिवृत् के कल्प से घी (सिद्ध करे), और तीन लेह लोध्र के समान (होते हैं); सुरा और कम्पिल्लक का योग भी लोध्र के समान ही करना चाहिए।

च. क. ११/१७

। ॥ १७ ॥

दन्ती और द्रवन्ती के कल्प से सौवीरक और तुषोदक (विरेचन के लिए) हों; अजगन्धा और अजशृङ्गी के (कल्प से) भी वैसे ही विरेचन में (हों)।

च. क. ११/१८

- । ॥ १८ ॥

इस विषय में दो श्लोक (हैं)- दस कषाय, तैल में छह और घी में आठ, मद्य में पाँच, तीन लेह तथा कम्पिल्लक में योग।

च. क. ११/१९

। ॥ १९ ॥

सप्तला और शङ्खिनी से वे तीस और नौ अधिक (अर्थात् उनतालीस) योग कहे गए हैं; वे सिद्ध योग दोनों को मिलाकर तथा एक-एक से भी हितकर हैं।

च. क. ११

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश के रचे हुए, चरक द्वारा संस्कार किए हुए तन्त्र में, जो (भाग) अप्राप्त था और दृढबल द्वारा पूरा किया गया, कल्पस्थान में सप्तला-शाङ्खिनी-कल्प नामक ग्यारहवाँ अध्याय (पूर्ण हुआ)।