भारत संहिता

अध्याय ९

तिल्वककल्पोऽध्यायः

तिल्वक के योग

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भूमिका

यह अध्याय कल्पस्थान का नौवाँ अध्याय है। इसका नाम "तिल्वककल्प" है: तिल्वक वृक्ष, जिसे ग्रन्थ लोध्र और तिरीटक भी कहता है, और कल्प यानी उससे बनने वाले औषध-योग। अध्याय का हिन्दी नाम है "तिल्वक के योग"। अध्याय के आरम्भ में भगवान् आत्रेय इसकी व्याख्या करने की घोषणा करते हैं।

अध्याय पहले तिल्वक की पहचान बताता है और यह कि उसकी जड़ की सूखी छाल, भीतर के छिलके से अलग करके, ली जाती है। फिर इस छाल के चूर्ण को लोध्र और दशमूल के काढ़े से भावित करने की विधि आती है। इसके बाद चूर्ण को दही, छाछ, सुरामण्ड, मूत्र, बेर की सीधु या आँवले के रस के साथ लेने का क्रम है।

आगे सौवीरक, लोध्र के काढ़े से बनी सुरा और कम्पिल्लक के काढ़े से भावित योग बताए गए हैं। फिर त्रिफला के काढ़े से और तिल्वक के काढ़े-कल्क से सिद्ध किए हुए दो लेह आते हैं, और तब घृत के योग, जिनमें त्रिवृत् आदि द्रव्य और लोध्र का कल्क काम में आते हैं।

अन्त में दो श्लोक पूरे अध्याय की गिनती देते हैं: दही आदि के साथ पाँच योग, सुरा, सौवीरक, अरिष्ट और कम्पिल्लक के साथ एक-एक, तीन लेह और चार घृत, कुल सोलह योग। पाठक के लिए ध्यान देने की बात यह है कि यह अध्याय विधियाँ बताता है, जिनमें भावना, काढ़ा, कल्क और लेह जैसे शब्द बार-बार आते हैं; कुछ मापों और द्रव्यों का आशय पाठ से पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता, और व्याख्याओं में वह बताया गया है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १७-१८)

तत्र श्लोकौ-पञ्च दध्यादिभिस्त्वेका सुरा सौवीरकेण च।एकोऽरिष्टस्तथा योग एकः कम्पिल्लकेन च॥

श्लोक १७ →

इस विषय में दो श्लोक हैं- दही आदि के साथ पाँच (योग), एक सुरा का, सौवीरक के साथ एक, एक अरिष्ट, और कम्पिल्लक के साथ भी एक योग।

लेहास्त्रयो घृतेनापि चत्वारः संप्रकीर्तिताः।योगास्ते लोध्रमूलानां कल्पे षोडश दर्शिताः॥

श्लोक १८ →

तीन लेह, और घृत से भी चार (योग) बताए गए हैं। लोध्र की जड़ों के कल्प में वे सोलह योग दिखाए गए हैं।

मुख्य शब्द (२) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

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च. क. ९/१

॥ १ ॥

अब इसके बाद हम तिल्वक के कल्प (योगों) की व्याख्या करेंगे।

च. क. ९/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।

च. क. ९/३

। ॥ ३ ॥

तिल्वक को ही लोध्र माना गया है; वह बड़े पत्तों वाला है और तिरीटक भी कहलाता है। उसकी जड़ की सूखी छाल को, भीतर के छिलके से रहित करके,

च. क. ९/४

। ॥ ४ ॥

चूर्ण बना ले; फिर उसके तीन भाग करके दो भागों को लोध्र के ही काढ़े से सींचे (भिगोए), और तीसरे भाग को उसी (काढ़े) से भावित करे।

च. क. ९/५

। ॥ ५ ॥

उस (तीसरे) भाग को फिर दशमूल के क्वाथ से भावित करे। फिर उसे सुखाकर दोबारा चूर्ण बना ले, और उसके बाद (उसका) प्रयोग करे।

च. क. ९/६

। ॥ ६ ॥

(उस चूर्ण को) दही, छाछ, सुरामण्ड और मूत्र के साथ, या बेर की सीधु के साथ, अथवा आँवलों के रस के साथ; तब एक हथेली भर (मात्रा) पिए।

च. क. ९/७

। ॥ ७ ॥

मेषशृङ्गी, अभया (हरीतकी), कृष्णा और चित्रक के साथ जल में पकाए जाने पर, मरुज (अन्न) को उसमें डाले; और जब वह सौवीरक के रूप में बन जाए,

च. क. ९/८

। ॥ ८ ॥

तब अञ्जलि (भर) उसकी (मात्रा) हो; और उसके साथ सदा लोध्र का कल्क पिए। लोध्र के काढ़े से बनी और पन्द्रह दिन रखी हुई सुरा को भी पिए।

च. क. ९/९

। ॥ ९ ॥

दन्ती और चित्रक के द्रोण (भर) में, अलग-अलग एक आढक जल लेकर भली-भाँति काढ़ा करके, एक तुला गुड़ और एक अञ्जलि लोध्र के

च. क. ९/१०

। ॥ १० ॥

(उसमें) डाले; पन्द्रह दिन के बाद वह मद्य पीने वालों के लिए विरेचन हो जाता है। कम्पिल्लक के काढ़े से दस बार भली-भाँति भावित (मात्रा को)

च. क. ९/११

। ॥ ११ ॥

मात्रा को कम्पिल्लक के ही काढ़े से फिर पिए। और चतुरङ्गुल के कल्प की विधि से एक दूसरा लेह भी बनाना चाहिए।

च. क. ९/१२

। ॥ १२ ॥

त्रिफला के काढ़े से, घी, मधु और फाणित सहित, लोध्र के चूर्ण से युक्त, सिद्ध किया हुआ लेह विरेचन में श्रेष्ठ है।

च. क. ९/१३

। ॥ १३ ॥

तिल्वक के काढ़े और कल्क से, शर्करा और घी सहित सिद्ध किया हुआ लेह भी विरेचन में श्रेष्ठ है।

च. क. ९/१४

। ॥ १४ ॥

त्रिवृत् आदि (द्रव्यों) की आठ-आठ मुट्ठियाँ, नाखून सहित, अलग-अलग द्रोण भर जल में पकाए; चौथाई शेष रहने पर एक प्रस्थ घी पकाए।

च. क. ९/१५

। ॥ १५ ॥

उन्हीं (द्रव्यों) को पीसकर, बिल्व के अंशों, मूत्र और लवण के साथ (पकाए गए घी को), तब उचित समय पर मात्रा भर पिए; यह श्रेष्ठ विरेचन है।

च. क. ९/१६

। ॥ १६ ॥

लोध्र के कल्क तथा मूत्र, अम्ल और लवणों के साथ घी पकाए; और चतुरङ्गुल के कल्प की विधि से दो घी भी तैयार करे।

च. क. ९/१७

- । ॥ १७ ॥

इस विषय में दो श्लोक हैं- दही आदि के साथ पाँच (योग), एक सुरा का, सौवीरक के साथ एक, एक अरिष्ट, और कम्पिल्लक के साथ भी एक योग।

च. क. ९/१८

। ॥ १८ ॥

तीन लेह, और घृत से भी चार (योग) बताए गए हैं। लोध्र की जड़ों के कल्प में वे सोलह योग दिखाए गए हैं।

च. क. ९

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा पुनः संस्कारित, अप्राप्त (लुप्त) भाग में दृढबल द्वारा पूर्ण किए गए तन्त्र के कल्पस्थान में तिल्वककल्प नामक नौवाँ अध्याय (पूर्ण हुआ)। ९।