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अब हम इक्ष्वाकुकल्प (कड़वी तुम्बी के योग) अध्याय की व्याख्या करेंगे।
अध्याय ३
इक्ष्वाकु (कड़वी तुम्बी) के योग
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इक्ष्वाकुकल्प चरक संहिता के कल्पस्थान का तीसरा अध्याय है। इसका नाम इसके विषय से पड़ा है: इक्ष्वाकु कड़वी तुम्बी का नाम है, और कल्प का अर्थ है किसी औषध द्रव्य को शोधन के लिए तैयार करने के प्रयोग और विधियाँ। अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है; वे आरम्भ में ही कहते हैं कि अब वे इक्ष्वाकुकल्प बताएँगे, और उसी द्रव्य के कई नाम गिनाते हैं: लम्बा, कटुकालाबू, तुम्बी, पिण्डफला और फलिनी।
आरम्भ में आत्रेय बताते हैं कि इसका प्रयोग वमन के लिए उन अवस्थाओं में कहा गया है जिनमें कफ बहुत पीड़ा दे रहा हो: कास, श्वास, विष, छर्दि और ज्वर। इसके बाद योग एक-एक करके आते हैं। कोई योग इसकी कोंपलों को दूध में पकाकर बनता है, कोई फल के रस को तिगुने दूध में सिद्ध करके, कोई बीजों को बकरी के दूध की भावना देकर, और कोई फल के गूदे को मस्तु या तक्र के साथ। हर योग के साथ उन रोगों के नाम दिए गए हैं जिनमें, ग्रन्थ के अनुसार, वह प्रयुक्त होता है।
आगे की विधियाँ और भी तरह की हैं: माला सूँघकर वमन, फल का गूदा गुड़ और पलल के साथ, फल से बना तेल और सिद्ध घृत, और अलग-अलग काढ़ों में बीजों की क्रमशः बढ़ती संख्या। फिर बिल्व की जड़ के काढ़े में बीज पकाकर लेह बनाने की विस्तृत विधि है, जिसमें बताया गया है कि पकाते समय उसे कब तैयार माना जाए। अन्त में सत्तू से बना मन्थ और मांसरस के साथ पिया जाने वाला कल्क आता है, जिनके बारे में कहा गया है कि इनसे मनुष्य ठीक से वमन करता है और दुर्बल नहीं होता।
अध्याय का सार-श्लोक योगों को उनके माध्यम के अनुसार गिनता है: दूध में, सुरामण्ड, मस्तु और तक्र में, तेल में, फलों में, काढ़ों और मधुक आदि में, फिर वर्तिक्रिया, लेह, मन्थ और रस में। अन्त में कहा गया है कि इक्ष्वाकुकल्प में ये योग पैंतालीस हैं, जिन्हें महर्षि ने प्रजा के हित की कामना से बताया है। पाठक के लिए सार यह है कि एक ही द्रव्य को अनेक माध्यमों और मात्राओं में, भिन्न-भिन्न अवस्थाओं के लिए, कैसे तैयार किया जाता है, यह ग्रन्थ क्रम से गिनाता है। यह ग्रन्थ का वर्णन है, किसी के लिए चिकित्सा-सलाह नहीं; और कुछ द्रव्यों, मापों और शब्दों का अर्थ यहाँ पूरी तरह निश्चित नहीं है, जिसे अलग-अलग श्लोकों की व्याख्या में कहा गया है।
तत्र श्लोकाः-पयस्यष्टौ सुरामण्डमस्तुतक्रेषु च त्रयः।घ्रेयं सपललं तैलं वर्धमानाः फलेषु षट्॥
श्लोक २१ →इस विषय में श्लोक- दूध में आठ, सुरामण्ड, मस्तु और तक्र में तीन, सूँघने योग्य पलल सहित तेल, और फलों में बढ़ते हुए छह (योग कहे गए हैं)
घृतमेकं कषायेषु नवान्ये मधुकादिषु।अष्टौ वर्तिक्रिया लेहाः पञ्च मन्थो रसस्तथा॥
श्लोक २२ →कषायों (काढ़ों) में एक घृत (योग), मधुक आदि में नौ अन्य, आठ वर्तिक्रिया, पाँच लेह, तथा मन्थ और रस
योगा इक्ष्वाकुकल्पे ते चत्वारिंशच्च पञ्च च।उक्ता महर्षिणा सम्यक् प्रजानां हितकाम्यया॥
श्लोक २३ →इक्ष्वाकुकल्प में वे योग पैंतालीस (चालीस और पाँच) हैं, जिन्हें महर्षि ने प्रजा के हित की कामना से भली-भाँति कहा है।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।
अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।
चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।
सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।
शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
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॥ १ ॥
अब हम इक्ष्वाकुकल्प (कड़वी तुम्बी के योग) अध्याय की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।
। ॥ ३ ॥
जिनके लिए यह प्रशस्त है, उन (रोगियों) के लिए मैं सिद्ध (परीक्षित) इक्ष्वाकुकल्प कहूँगा। लम्बा, कड़वी लौकी (कटुकालाबू), तुम्बी तथा पिण्डफला,
। ॥ ४ ॥
इक्ष्वाकु और फलिनी भी कही जाती है। उसकी कल्पना (तैयार करने की विधि) कास, श्वास, विष, छर्दि और ज्वर से पीड़ित तथा कफ से कर्षित (दुःखी) व्यक्ति में
। ॥ ५ ॥
और जो मनुष्य घबरा रहा हो (प्रताम्यति) उसमें वमन के लिए वह अपेक्षित है। बिना फूल वाली (लता) के प्रवालों (कोंपलों) की प्रादेश (अँगूठे और तर्जनी के फैलाव) जितनी मुट्ठी
। ॥ ६ ॥
उसे एक प्रस्थ दूध में पकाकर पित्त की अधिकता वाले कफज्वर में दे। फूल आदि में भी चार (योग) हैं, जैसे दूध में जीमूतक के।
। ॥ ७ ॥
ये (चार) योग हरित और पाण्डु (रोगियों) के लिए हैं, पाँचवाँ सुरामण्ड के साथ। फल के स्वरस का भाग, तिगुने दूध में सिद्ध किया हुआ,
। ॥ ८ ॥
छाती में स्थित कफ में, स्वरभेद (आवाज बैठने) में और पीनस (जुकाम) में दे। पक जाने पर, बीच का (भाग) निकाल लेने पर, दूध डाले, जब वह दही
। ॥ ९ ॥
बन जाए, तब उसे कफ सहित खाँसी में, श्वास में और वमन में पिए। बकरी के दूध से बीजों को भावित करे (भिगोकर संस्कारित करे) और पिलाए,
। ॥ १० ॥
विष, गुल्म, उदर (रोग), ग्रन्थि, गण्ड (गण्डमाला) और श्लीपद (फीलपाँव) में; अथवा मस्तु के साथ फल का मध्य (गूदा) पाण्डु, कुष्ठ और विष से पीड़ित (व्यक्ति) को,
। ॥ ११ ॥
उससे (बना) तक्र, अथवा पकाया हुआ (तक्र) शहद और नमक सहित पिए; तुम्बी के सूखे फलरसों और फूलों से चूर्ण छिड़का हुआ।
। ॥ १२ ॥
सुगन्ध की समृद्धि (अच्छी गन्ध) में सुख पाने वाला (व्यक्ति) माला सूँघकर वमन करे। अथवा फल का गूदा गुड़ और पलल के साथ खाए।
। ॥ १३ ॥
अथवा इक्ष्वाकु के फल का तेल, अथवा पहले की तरह सिद्ध घृत। फल आदि के पचास, क्रम से दस-दस बढ़ाते हुए,
। ॥ १४ ॥
बीजों को मसलकर, काढ़ों में अलग-अलग, सौ तक पिए। यष्टि नाम वाले (यष्ट्याह्व), कोविदार आदि के (काढ़ों से) मुट्ठी भर, नख के भीतर (मुट्ठी बन्द कर) पिए।
। ॥ १५ ॥
कोविदार आदि के कषायों (काढ़ों) की मात्राएँ फल की तरह ही कही गई हैं। बिल्व की जड़ के काढ़े में तुम्बी के बीजों की अञ्जलि पकाए।
। ॥ १६ ॥
इस छाने हुए (काढ़े) के तीन भाग, और चौथा फाणित (राब) का; घी सहित बीजों का भाग; तथा अर्धांश वाले पिसे हुए (द्रव्य)
। ॥ १७ ॥
(पिछले श्लोक में कहे अनुसार पिसे हुए) महाजालिनी, जीमूत, कृतवेधन और वत्सक को (उसमें डालकर) उस लेह को कलछी से हिलाते हुए मृदु आग पर पकाए।
। ॥ १८ ॥
जब तक वह तार वाला (तन्तुमान्) हो जाए और पानी में डालने पर बिखरे नहीं, (तब तक पकाए)। उस लेह को मात्रा के अनुसार चाटते हुए, उसके बाद प्रमथ्या भी पिए।
। ॥ १९ ॥
यह कल्प अग्निमन्थ आदि चतुष्क (चार के समूह) में अलग से कहा जाता है। अथवा तुम्बी के स्वरस की भावना दिए हुए सत्तुओं से (बना) मन्थ पिए।
। । ॥ २० ॥
कफ से उत्पन्न ज्वर में तथा कास, कण्ठ के रोगों, अरोचक, गुल्म, मेह और प्रसेक में (इस) कल्क को मांसरसों के साथ पिए। (ऐसा करने पर) मनुष्य भली-भाँति वमन करता है और दुर्बलता को प्राप्त नहीं होता।
- । ॥ २१ ॥
इस विषय में श्लोक- दूध में आठ, सुरामण्ड, मस्तु और तक्र में तीन, सूँघने योग्य पलल सहित तेल, और फलों में बढ़ते हुए छह (योग कहे गए हैं)
। ॥ २२ ॥
कषायों (काढ़ों) में एक घृत (योग), मधुक आदि में नौ अन्य, आठ वर्तिक्रिया, पाँच लेह, तथा मन्थ और रस
। ॥ २३ ॥
इक्ष्वाकुकल्प में वे योग पैंतालीस (चालीस और पाँच) हैं, जिन्हें महर्षि ने प्रजा के हित की कामना से भली-भाँति कहा है।
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इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संस्कार किए गए तन्त्र में (जिसका वह भाग) अप्राप्त होने पर दृढबल द्वारा पूर्ण किया गया, कल्पस्थान में इक्ष्वाकुकल्प नामक तीसरा अध्याय (समाप्त हुआ) (३)।