॥ १ ॥
अब इसके बाद हम धामार्गव कल्प (धामार्गव के योगों) की व्याख्या करेंगे।
अध्याय ४
धामार्गव के योग
इस पृष्ठ का हिन्दी पाठ AI (Claude) द्वारा तैयार किया गया ड्राफ्ट है। चिह्न वाले अंशों की सम्पादक द्वारा जाँच अभी बाकी है।
यह चरक संहिता के कल्पस्थान का चौथा अध्याय है। इसका नाम धामार्गवकल्प है, यानी धामार्गव नामक औषधि के कल्प। कल्प का अर्थ है किसी एक द्रव्य को बनाने और बरतने की विधियों का समूह। अध्याय का विषय पूरी तरह धामार्गव और उसके योग हैं। भगवान् आत्रेय के कथन के रूप में यह उपदेश आता है।
अध्याय पहले धामार्गव के चार नाम गिनाता है: कर्कोटकी, कोठफला, महाजालिनी और राजकोशातकी। फिर वे रोग बताए जाते हैं जिनमें इसका प्रयोग कहा गया है, जैसे गर, गुल्म, उदर रोग, खाँसी और कफ से जुड़े विकार। इसके बाद यह बताया गया है कि फल, फूल और कोंपल कैसे लिए जाएँ।
आगे योग एक-एक करके आते हैं: कोंपल के रस की गोलियाँ, दूध और सुरा के योग, गुड़ के साथ रात भर रखा हुआ फल, सूँघने के लिए भावित द्रव्य, पशुओं के मल के रस के साथ योग, लेह, कल्क और घी। बीच-बीच में अनुपान और यूष का भी उल्लेख है। इनमें कई वाक्य एक श्लोक में शुरू होकर अगले श्लोक में पूरे होते हैं, इसलिए श्लोकों को क्रम से पढ़ना ठीक रहता है।
अध्याय का अन्त दो श्लोकों के सार से होता है। वह बताता है कि धामार्गव के कल्प में माध्यम के अनुसार कितने योग हैं: कोंपल में नौ, दूध में चार, सुरा और आसव में एक, कषाय में बीस, कल्क में दस, मल के रस में दो, और आगे अन्न, घ्रेय, लेह तथा घी में। कुल योग साठ कहे गए हैं।
पाठक के लिए ध्यान रखने की बात यह है कि यह प्राचीन ग्रन्थ का वर्णन है। कुछ वनस्पतियों और शब्दों की पहचान पाठ में स्पष्ट नहीं दी गई है, और यहाँ के योग किसी के लिए नुस्खा नहीं हैं।
तत्र श्लोकौ-पल्लवे नव चत्वारः क्षीर एकः सुरासवे।कषाये विंशतिः कल्के दश द्वौ च शकृद्रसे॥
श्लोक १९ →उस विषय में दो श्लोक हैं- पल्लव (कोंपल) में नौ, दूध में चार, सुरा और आसव में एक, कषाय (क्वाथ) में बीस, कल्क में दस और शकृद्रस (मल के रस) में दो (योग) हैं
अन्न एकस्तथा घ्रेये दश लेहास्तथा घृतम्।कल्पे धामार्गवस्योक्ताः षष्टिर्योगा महर्षिणा॥
श्लोक २० →अन्न में एक, घ्रेय (सूँघने योग्य) में, दस लेह, तथा घृत (घी में भी योग) - इस प्रकार धामार्गव के कल्प में महर्षि ने साठ योग बताए हैं।
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।
चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।
अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।
चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।
सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।
मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।
॥ १ ॥
अब इसके बाद हम धामार्गव कल्प (धामार्गव के योगों) की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।
। ॥ ३ ॥
कर्कोटकी, कोठफला, महाजालिनी, और राजकोशातकी, ये धामार्गव के पर्याय (दूसरे नाम) हैं।
। ॥ ४ ॥
गर (कृत्रिम विष) में, गुल्म और उदर रोग में, खाँसी में, कफ के स्थान में स्थित वात में, कण्ठ और मुख में स्थित कफ में, और कफ के संचय से उत्पन्न रोगों में
। ॥ ५ ॥
इन रोगों में (धामार्गव) प्रयोग करना चाहिए। जो (फल, पुष्प, प्रवाल) स्थिर और भारी हों, उस (धामार्गव) के फल, पुष्प और प्रवाल (कोंपल) को विधि से इकट्ठा करे।
। ॥ ६ ॥
प्रवाल (कोंपल) के स्वरस को सुखाकर और अलग-अलग गोलियाँ बनाकर, कोविदार आदि के कषायों से और मधुक के कषाय से (उन्हें) पीना चाहिए।
। ॥ ७ ॥
पुष्प आदि में दूध के चार योग हैं और पाँचवाँ सुरा का (योग) है। इसके बाद जीर्ण और सूखे (फल आदि) का कल्प पहले की तरह कहा जाएगा।
। ॥ ८ ॥
मधुक के कषाय के साथ, बीज और लण्ठ निकाला हुआ फल, गुड़ सहित रात भर रखा हुआ, तथा कोविदार आदि के (कषाय) के साथ
। ॥ ९ ॥
गुल्म और उदर रोग से पीड़ित लोगों को दे, और जो दूसरे कफ के रोग हैं (उनसे पीड़ित को भी); अन्न से मिलाकर छर्दि (उल्टी) और हृदय रोग की शान्ति के लिए दे।
। ॥ १० ॥
अथवा (धामार्गव के) चूर्णों से बार-बार भावित किए हुए उत्पल आदि (द्रव्य) हों, तो रस, दूध, यवागू आदि से तृप्त हुआ (व्यक्ति) उन्हें सूँघकर सुखपूर्वक वमन करे।
। ॥ ११ ॥
चूर्ण किए हुए (धामार्गव) की बेर के बराबर बत्ती बनाकर, अञ्जलि भर गाय और घोड़े के मल के रस में डालकर पीए।
। ॥ १२ ॥
इसी प्रकार पृषत, ऋष्य, कुरङ्ग नामक (मृग), हाथी, ऊँट, खच्चर और भेड़ तथा श्वदंष्ट्र, गधे और गेंडे के मल के रस में पीना चाहिए।
। ॥ १३ ॥
जीवक और ऋषभक, वीरा, आत्मगुप्ता, शतावरी, काकोली, श्रावणी, मेदा, महामेदा और मधूलिका (को)
। ॥ १४ ॥
(इनमें से) एक-एक को अच्छी तरह चूर्ण करके धामार्गव के साथ वे (चूर्ण) शर्करा और मधु मिलाकर लेह (चाटने की औषध) बनें; वे लेह हृदय की जलन और खाँसी वालों के लिए (हैं)।
। ॥ १५ ॥
पित्त की गर्मी से युक्त कफ में (ये लेह) सुखद (गुनगुने) जल के अनुपान वाले हों; धनिया और तुम्बुरु के यूष के साथ कल्क सब विषों को दूर करने वाला है।
। ॥ १६ ॥
जाती, सौमनसायिनी, रजनी, चोरक, वृश्चीर, महाक्षुद्रा, सहा और हैमवत (इनके)
। ॥ १७ ॥
बिम्बी, पुनर्नवा या कासमर्द के (क्षाय) में अलग-अलग एक या दो धामार्गव को मसलकर
। ॥ १८ ॥
मानसिक विकारों में छाने हुए (उस योग) को उत्तम वमन के रूप में पीना चाहिए; अथवा उस पकाए हुए दूध से उत्पन्न घी को, या फल आदि (द्रव्यों) के साथ सिद्ध किए हुए (घी) को।
- । ॥ १९ ॥
उस विषय में दो श्लोक हैं- पल्लव (कोंपल) में नौ, दूध में चार, सुरा और आसव में एक, कषाय (क्वाथ) में बीस, कल्क में दस और शकृद्रस (मल के रस) में दो (योग) हैं
। ॥ २० ॥
अन्न में एक, घ्रेय (सूँघने योग्य) में, दस लेह, तथा घृत (घी में भी योग) - इस प्रकार धामार्गव के कल्प में महर्षि ने साठ योग बताए हैं।
॥॥
अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संशोधित, (जिसका कुछ भाग) अप्राप्त था और दृढबल द्वारा पूर्ण किए गए तन्त्र के कल्पस्थान में धामार्गवकल्प नामक चौथा अध्याय (समाप्त हुआ)। ४।