भारत संहिता

अध्याय ८

चतुरङ्गुलकल्पोऽध्यायः

चतुरङ्गुल (अमलतास) के योग

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भूमिका

यह कल्पस्थान का आठवाँ अध्याय है, चतुरङ्गुल (अमलतास) के योग। अध्याय का नाम चतुरङ्गुल से पड़ा है, जो अमलतास (आरग्वध) का एक नाम है; कल्प का अर्थ है किसी औषधि के विधान और उसके योग। भगवान् आत्रेय के उपदेश के रूप में यह अध्याय एक ही द्रव्य, चतुरङ्गुल, पर टिका है।

अध्याय की शुरुआत में चतुरङ्गुल के आठ नाम गिनाए गए हैं। फिर बताया गया है कि ग्रन्थ के अनुसार वह किन रोगों में हितकर माना गया है और किन लोगों के लिए अनुकूल है: बालक, वृद्ध, क्षत, क्षीण और सुकुमार। इसके बाद फल को पकने पर लेने, रेत में रखने, सात रात बाद निकालकर धूप में सुखाने और उसका गूदा निकालकर शुद्ध पात्र में रखने का क्रम आता है।

आगे गूदे के अनेक योग बताए गए हैं। कहीं वह द्राक्षा के रस, सुरामण्ड, सीधु, दधिमण्ड, आँवले के रस या सौवीरक के साथ दिया जाता है, कहीं त्रिवृत् या बिल्व के कषाय के साथ। कहीं उससे लेह बनता है, कहीं घृत सिद्ध किया जाता है, और कहीं अरिष्ट। अन्त में विरेचन को रोगी के प्रिय पेय या अन्न में मिलाकर देने की बात कही गई है।

अध्याय के अन्त में 'तत्र श्लोकाः' के बाद सार के श्लोक आते हैं, जो बताते हैं कि इस कल्प में बारह योग कहे गए हैं और वे सुकुमार तथा सुखपूर्वक फल देने वाले हैं। पाठक के लिए ध्यान देने की बात यह है कि यहाँ एक ही औषधि कई अनुपानों और रूपों में कैसे दी जाती है, यह चरक संहिता के कथन के रूप में दिया गया है; यह चिकित्सा की सलाह नहीं है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १७-१८)

तत्र श्लोकाः-द्राक्षारसे सुरासीध्वोर्दध्नि चामलकीरसे।सौवीरके कषाये च त्रिवृतो बिल्वकस्य च॥

श्लोक १७ →

इस विषय में श्लोक (ये हैं)- द्राक्षा के रस में, सुरा और सीधु में, दही में, आँवले के रस में, सौवीरक में, और त्रिवृत् तथा बिल्व के कषाय में

लेहेऽरिष्टे घृते द्वे च योगा द्वादश कीर्तिताः।चतुरङ्गुलकल्पेऽस्मिन् सुकुमाराः सुखोदयाः॥

श्लोक १८ →

लेह में, अरिष्ट में, घृत में और दो (अन्य) में - इस प्रकार इस चतुरङ्गुल कल्प में बारह योग कहे गए हैं, जो सुकुमार (कोमल) और सुख से फल देने वाले हैं।

मुख्य शब्द (४) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

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च. क. ८/१

॥ १ ॥

अब इसके बाद हम चतुरङ्गुल (अमलतास) कल्प की व्याख्या करेंगे।

च. क. ८/२

॥ २ ॥

इस प्रकार भगवान् आत्रेय ने कहा।

च. क. ८/३

। ॥ ३ ॥

आरग्वध, राजवृक्ष, शम्पाक, चतुरङ्गुल, प्रग्रह, कृतमाल, कर्णिकार और अवघातक (ये इस वृक्ष के नाम हैं)।

च. क. ८/४

। ॥ ४ ॥

ज्वर, हृदय के रोग, वातरक्त, उदावर्त आदि रोगों के रोगियों में राजवृक्ष (आरग्वध) अधिक हितकर है; वह मृदु, मधुर और शीतल है।

च. क. ८/५

। ॥ ५ ॥

बालक, वृद्ध, क्षत (चोट खाए), क्षीण और सुकुमार मनुष्य में चतुरङ्गुल का प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि वह मृदु है, हानि नहीं करता, और विशेष रूप से (हितकर है)।

च. क. ८/६

। ॥ ६ ॥

फल के समय उसका जो फल पका हुआ हो, उसे लेना चाहिए। उन गुणवान् (फलों) का एक भार रेत में रखवा दे।

च. क. ८/७

। ॥ ७ ॥

सात रात के बाद (उन्हें) निकालकर वैद्य धूप में सुखा ले। फिर गूदा निकालकर शुद्ध पात्र में रखवा दे।

च. क. ८/८

। ॥ ८ ॥

(इस गूदे को) द्राक्षा के रस के साथ मिलाकर दे, जब बालक दाह और उदावर्त से पीड़ित हो, चार वर्ष से लेकर बारह वर्ष की आयु तक।

च. क. ८/९

। ॥ ९ ॥

अथवा चतुरङ्गुल के गूदे का एक प्रसृत (पसर) या अञ्जलि भर, सुरामण्ड से मिलाकर, अथवा कोल (बेर) की सीधु से मिलाकर

च. क. ८/१०

। ॥ १० ॥

अथवा दधि के मण्ड (पानी) से मिलाकर, या आँवले के रस से मिलाकर; उसका शीतकषाय (ठण्डे पानी में भिगोकर बनाया कषाय) बनाकर उसे पिए, अथवा सौवीरक के साथ।

च. क. ८/११

। ॥ ११ ॥

अथवा त्रिवृत् के कषाय से, या बिल्व के कषाय से, नमक और शहद मिलाकर, (चतुरङ्गुल के) गूदे का कल्क पिए।

च. क. ८/१२

। ॥ १२ ॥

अथवा उस (चतुरङ्गुल) के कषाय के साथ त्रिवृत् का चूर्ण और गुड़ मिलाकर, धीरे-धीरे पकाकर लेह बनाए और मात्रा के अनुसार मनुष्य को चटाए।

च. क. ८/१३

। ॥ १३ ॥

अथवा चतुरङ्गुल के साथ सिद्ध किए गए दूध से जो घी उत्पन्न हो, उसे; गूदे के कल्क के साथ आँवलों के रस में सिद्ध करके पिए।

च. क. ८/१४

। ॥ १४ ॥

वही घी, दशमूल, कुलत्थ और जौ के कषाय में, श्यामा आदि के कल्कों के साथ सिद्ध करके पिए।

च. क. ८/१५

। ॥ १५ ॥

दन्ती के क्वाथ में शम्पाक (चतुरङ्गुल) के गूदे की एक अञ्जलि और गुड़ डालकर, एक मास या आधे मास तक रखे हुए अरिष्ट को पिलाए।

च. क. ८/१६

। ॥ १६ ॥

जिसे जो पेय और अन्न प्रिय हो, मीठा हो, या कटु या नमकीन हो, उसके साथ मिलाकर विरेचन दे।

च. क. ८/१७

- । ॥ १७ ॥

इस विषय में श्लोक (ये हैं)- द्राक्षा के रस में, सुरा और सीधु में, दही में, आँवले के रस में, सौवीरक में, और त्रिवृत् तथा बिल्व के कषाय में

च. क. ८/१८

। ॥ १८ ॥

लेह में, अरिष्ट में, घृत में और दो (अन्य) में - इस प्रकार इस चतुरङ्गुल कल्प में बारह योग कहे गए हैं, जो सुकुमार (कोमल) और सुख से फल देने वाले हैं।

च. क. ८

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश के रचे तन्त्र में, जिसे चरक ने संस्कारित किया और जिसका जो (अंश) प्राप्त नहीं था, उसे दृढबल ने पूरा किया, कल्पस्थान में चतुरङ्गुलकल्प नामक आठवाँ अध्याय (समाप्त हुआ)॥८॥