भारत संहिता

अध्याय ३

गुल्मनिदानम्

गुल्म का निदान

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भूमिका

गुल्मनिदान चरक संहिता के निदानस्थान का तीसरा अध्याय है। निदानस्थान वह खण्ड है जिसमें रोगों के कारण और उन्हें पहचानने के साधन बताए गए हैं। अध्याय का नाम उसके पहले वाक्य से आया है, जिसमें कहा गया है कि अब गुल्मनिदान की व्याख्या की जाएगी; हिन्दी में इसका अर्थ है 'गुल्म का निदान'। वातगुल्म के वर्णन में अध्याय बताता है कि कुपित वायु महास्रोत में प्रवेश करके हृदय-प्रदेश, बस्ति, दोनों पार्श्वों या नाभि में पिण्ड (गोले) के रूप में इकट्ठा होकर टिक जाता है, और पिण्ड बन जाने के कारण ही इसे गुल्म कहते हैं। इस अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है।

भगवान् आत्रेय बताते हैं कि गुल्म पाँच हैं: वातगुल्म, पित्तगुल्म, श्लेष्मगुल्म, निचयगुल्म और शोणितगुल्म। अग्निवेश पूछते हैं कि इन पाँचों का भेद कैसे पहचाना जाए, क्योंकि जो वैद्य रोगों का भेद नहीं जानता, वह औषध जानकर भी रोग को शान्त नहीं कर पाता। आत्रेय उत्तर देते हैं कि गुल्मों का, और दूसरे रोगों का भी, भेद समुत्थान (कारण), पूर्वरूप, लिङ्ग (लक्षण), वेदना (पीड़ा) और उपशय (जिससे रोगी को आराम मिले) के अन्तर से जाना जाता है, और फिर वे हर गुल्म का वर्णन इसी आधार पर करते हैं।

वातगुल्म में वात कुपित होता है वात बढ़ाने वाले या ठंडे आहार, वेगों को रोकने, झटके देने वाली सवारी, चोट, और व्यवाय, व्यायाम, मद्य और शोक की अति जैसे कारणों से, विशेषकर उस व्यक्ति में जो ज्वर, वमन, विरेचन या अतीसार से दुबला हो गया हो। यह गुल्म बार-बार फूलता और घटता है, उसकी पीड़ा अनियत रहती है, और त्वचा, नख, नेत्र, मुख, मूत्र और मल काले या अरुण हो जाते हैं। ऐसे ही दुबले व्यक्ति में खट्टे, नमकीन, तीखे, गरम और जलन करने वाले पदार्थों से पित्त, और बहुत चिकने, भारी, मीठे और ठंडे भोजन से श्लेष्मा (कफ) वायु के साथ कुपित होता है, और वायु उसे आमाशय के एक भाग में समेटकर वातगुल्म जैसी ही पीड़ाएँ उत्पन्न करता है। पित्तगुल्म में पेट, हृदय, छाती और कण्ठ में जलन होती है और रंग हरापन लिए या हल्दी जैसा पीला होता है; श्लेष्मगुल्म स्थिर, भारी, कठोर और गहराई में बैठा होता है, उसमें शीतज्वर, अरुचि और भारीपन होते हैं और रंग सफेद-सा होता है। इन तीनों की पहचान उपशय से भी पक्की होती है: जो चीज़ें उसके कारणों में गिनाई गई हैं वे रोगी को अनुकूल नहीं पड़तीं, और उनकी विपरीत चीज़ें अनुकूल पड़ती हैं। जब तीनों दोषों के कारण और लक्षण एक साथ मिलें, तो वह सान्निपातिक गुल्म, यानी निचयगुल्म, है, जिसे अध्याय असाध्य बताता है, क्योंकि उसके उपचार एक-दूसरे के विरोधी हैं।

शोणितगुल्म केवल स्त्रियों को होता है, पुरुषों को नहीं, क्योंकि उनके गर्भाशय होता है और उन्हें आर्तव आता है। जो स्त्री पराधीनता, अनुभव की कमी या सदा उपचार (सेवा या शिष्टाचार) का ध्यान रखने के कारण उठे हुए वेगों को रोकती है, या कच्चा गर्भ गिरने या प्रसव के थोड़े ही दिन बाद, या ऋतुकाल में, वात बढ़ाने वाला आहार-विहार अपनाती है, उसका वात शीघ्र कुपित होता है। यह वात योनि के मुख में जाकर आर्तव को रोक देता है, और रुका हुआ आर्तव महीने-दर-महीने पेट को बढ़ाता है। अध्याय उसके अनेक लक्षण गिनाता है, जैसे स्तनों में दूध, होठों का काला पड़ना, दोहद और पैरों में सूजन; उसका गुल्म पूरा का पूरा एक पिण्ड के रूप में ही फड़कता है, और नासमझ लोग गर्भ न होने पर भी ऐसी स्त्री को गर्भवती कह देते हैं।

अध्याय पाँचों गुल्मों के पूर्वरूप भी गिनाता है: भोजन की इच्छा न होना, अरुचि, अपच, अग्नि की विषमता, खाने के बाद जलन, अधोवायु, मूत्र और मल के वेगों का न उठना या ठीक से न निकलना, पेट फूलना, आँतों में गुड़गुड़ाहट, दुर्बलता और भरपेट भोजन न सह पाना। चिकित्सा का वह केवल एक अंश, उसके मूल नियम, देता है, और उनका आधार यह सिद्धान्त है कि कोई भी गुल्म वात के बिना नहीं होता। अध्याय के अनुसार सान्निपातिक गुल्म की चिकित्सा आरम्भ नहीं की जाती; एक दोष के गुल्म में उसी दोष के अनुसार उपचार होता है, दो दोषों के मेल में ऐसा उपचार जो दोनों के लिए उपयुक्त हो, और गम्भीर उपद्रवों का उपचार पहले और शीघ्रता से। जब शीघ्रता हो और दोष का भेद पहचाना न जा सके, तब अध्याय वात की चिकित्सा का विधान करता है, क्योंकि वात के शान्त होने पर दूसरा दोष थोड़े से प्रयत्न से भी वश में आ जाता है। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि गुल्म पाँच प्रकार का है, हर प्रकार अपने कारणों, लक्षणों, रंग और उपशय से पहचाना जाता है, और हर गुल्म में वात रहता है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १८)

तत्र श्लोकः-संख्या निमित्तं रूपाणि पूर्वरूपमथापि च।दिष्टं निदाने गुल्मानामेकदेशश्च कर्मणाम्॥

श्लोक १८ →

इस विषय में (सार रूप) श्लोक (है): गुल्मों के निदान (के इस अध्याय) में (उनकी) संख्या, निमित्त (कारण), रूप (लक्षण), और पूर्वरूप भी, और कर्मों (चिकित्सा) का एक अंश बताया गया है।

मुख्य शब्द (२०) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

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च. नि. ३/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम गुल्मनिदान (गुल्म रोग के निदान सम्बन्धी अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. नि. ३/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. नि. ३/३

; , , , , ॥ ३ ॥

यहाँ (इस शास्त्र में) निश्चय ही गुल्म पाँच होते हैं; वे इस प्रकार हैं: वातगुल्म, पित्तगुल्म, श्लेष्मगुल्म, निचयगुल्म और शोणितगुल्म।

च. नि. ३/४

; ॥ ४ ॥

ऐसा कहने वाले भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा: भगवन्, यहाँ (इस विषय में) हम पाँचों गुल्मों का भेद कैसे पहचानें? क्योंकि रोगों के भेद को न जानने वाला वैद्य औषध का ज्ञाता होकर भी (रोग को) शान्त करने में समर्थ नहीं होता।

च. नि. ३/५

! ॥ ५ ॥

भगवान् आत्रेय ने उससे कहा: अग्निवेश, समुत्थान (कारण), पूर्वरूप, लिङ्ग (लक्षण), वेदना (पीड़ा) और उपशय के भेदों से गुल्मों का और अन्य रोगों का भी भेद-ज्ञान होता है। उस (भेद) को (तुम) गुल्मों के विषय में कहा जाता हुआ समझो।

च. नि. ३/६

, , , , , , , , , , , ॥ ६ ॥

जब वातल (जिसके शरीर में वात अधिक हो) मनुष्य, विशेष रूप से (जब वह) ज्वर, वमन, विरेचन और अतीसार में से किसी एक के होने से दुबला हुआ हो, वात बढ़ाने वाला आहार लेता है, या शीतल (आहार), विशेष रूप से मात्रा से अधिक (लेता है), या पहले स्नेहन किए बिना वमन और विरेचन (की औषधियाँ) पीता है, या न उठी हुई उलटी को (बलपूर्वक) उठाता है, (या) उठे हुए वात (अधोवायु), मूत्र और पुरीष (मल) के वेगों को रोकता है, या बहुत अधिक खाकर मात्रा से अधिक नया जल पीता है, या बहुत झटके देने वाले वाहन से यात्रा करता है, या अत्यधिक व्यवाय (मैथुन), व्यायाम, मद्य और शोक में लगा रहता है, या चोट खाता है, या विषम ढंग से बैठने, लेटने, खड़े होने और चलने वाला होता है, या इसी प्रकार का कोई और विषम या अत्यधिक परिश्रम आरम्भ करता है, (तब) उसके इस अनुचित आचरण से वात प्रकोप को प्राप्त होता है (प्रकुपित हो जाता है)।

च. नि. ३/७

; , , ; , ; , , ; , , , , ; ; , , ॥ ७ ॥

वह कुपित वायु महास्रोत (आहार के बड़े मार्ग) में प्रवेश करके, और रूक्षता के कारण कठोर हुए (भाग) को व्याप्त करके, पिण्डित (गोले के रूप में इकट्ठा) होकर हृदय (प्रदेश), बस्ति (मूत्राशय), दोनों पार्श्वों (बगलों) या नाभि में टिक जाता है; वह शूल और अनेक प्रकार की ग्रन्थियाँ (गाँठें) उत्पन्न करता है, और पिण्डित होकर टिका रहता है; पिण्डित होने के कारण वह 'गुल्म' कहलाता है। वह बार-बार फूल जाता है और बार-बार छोटा हो जाता है; वायु के चल (गतिशील) होने के कारण उसकी पीड़ा अनियत होती है, कभी अधिक और कभी थोड़ी; बार-बार अंगों में मानो चींटियाँ रेंगती हैं; उसमें तोद, भेद, स्फुरण, आयाम, सङ्कोच, सुप्ति, हर्ष, और (कभी) लुप्त होना और (कभी) उभर आना अधिक होते हैं। तब रोगी अपने को मानो सुई से और कील से बिंधा हुआ अनुभव करता है; इसके अतिरिक्त दिन के अन्त में उसे ज्वर होता है, उसका मुख सूखता है, साँस रुकती है, और पीड़ा प्रकट होने पर उसके रोएँ खड़े हो जाते हैं। प्लीहा (तिल्ली) का रोग, आटोप (पेट का फूलना), आँतों में गुड़गुड़ाहट, अविपाक (अपच), उदावर्त, अङ्गमर्द (अंगों में टूटन), मन्या (गर्दन के पीछे का भाग), सिर और शङ्ख (कनपटी) में शूल, और ब्रध्नरोग उपद्रव बनकर उसे घेर लेते हैं; उसकी त्वचा, नख, नेत्र, मुख, मूत्र और मल कृष्ण (काले), अरुण (लाली लिए भूरे) और परुष (रूखे) हो जाते हैं; जो (आहार-विहार) निदान में (कारण के रूप में) कहे गए हैं वे उसे अनुकूल नहीं होते, और उनके विपरीत अनुकूल होते हैं। यह वातगुल्म है।

च. नि. ३/८

॥ ८ ॥

उन्हीं कर्शनों (शरीर को कृश करने वाले कारणों) से कृश हुए व्यक्ति का पित्त, अम्ल (खट्टे), लवण (नमकीन), कटुक (तीखे), क्षार, उष्ण और तीक्ष्ण (पदार्थों), शुक्त, बिगड़े हुए मद्य, हरितक (हरे शाक) और खट्टे फलों के, तथा विदाही (जलन उत्पन्न करने वाले) शाक, धान्य, मांस आदि के उपयोग से, अजीर्ण में भोजन करने से, और आमाशय के रूक्षता से युक्त होने पर सीमा से अधिक वमन, (वेगों का) संधारण (रोकना) तथा हवा और धूप का अति सेवन करने से, वायु के साथ प्रकोप को प्राप्त होता है।

च. नि. ३/९

, ; ; , ; ; ; , ॥ ९ ॥

उस कुपित (पित्त) को वायु आमाशय के एक भाग में समेटकर पीड़ा के वही प्रकार उत्पन्न करता है जो वातगुल्म में कहे गए हैं; पर पित्त इस (रोगी) के कुक्षि (पेट), हृदय, छाती और कण्ठ में दाह (जलन) उत्पन्न करता है। जलन से पीड़ित वह (रोगी) मानो धुएँ सहित, खट्टेपन से युक्त डकार निकालता है; और उसके गुल्म का स्थान जलता है, तपता है, उसमें धुआँ-सा उठता है, गरमी निकलती है, वह पसीजता है, गीला होता है, और ढीला-सा, स्पर्श न सह सकने वाला और थोड़े रोमांच वाला होता है। ज्वर, भ्रम (चक्कर), दवथु (जलन), पिपासा (प्यास), गले, तालु और मुख का सूखना, प्रमोह (बेसुधी) और विड्भेद (मल का पतला होकर निकलना) उपद्रव बनकर उसे घेर लेते हैं; उसकी त्वचा, नख, नेत्र, मुख, मूत्र और मल हरित (हरापन लिए) और हारिद्र (हल्दी जैसे पीले) हो जाते हैं; जो (आहार-विहार) निदान में कहे गए हैं वे उसे अनुकूल नहीं होते, उनके विपरीत अनुकूल होते हैं। यह पित्तगुल्म है।

च. नि. ३/१०

॥ १० ॥

उन्हीं कर्शनों (शरीर को दुबला करने वाले कारणों) से दुबले हुए (व्यक्ति) का श्लेष्मा (कफ) अधिक खाने से, बहुत स्निग्ध, गुरु, मधुर और शीत भोजन करने से, पिष्ट (आटा), इक्षु (ईख), क्षीर (दूध), तिल, माष (उड़द) और गुड़ से बनी वस्तुओं का सेवन करने से, मन्दक मद्य बहुत पीने से, हरितक (हरी वनस्पतियों) का अधिक सेवन करने से, आनूप, औदक और ग्राम्य (पशुओं का) मांस बहुत खाने से, (वेगों को) रोकने से, भूख न होने पर बहुत अधिक जल पीने से, अथवा शरीर के संक्षोभण (ज़ोर से हिलने-डुलने) से वायु के साथ प्रकोप को प्राप्त होता है।

च. नि. ३/११

; , , , , , ॥ ११ ॥

उस प्रकुपित (श्लेष्मा) को वायु आमाशय के एक भाग में समेटकर पीड़ा के वही प्रकार उत्पन्न करता है जो वातगुल्म में कहे गए हैं; परन्तु श्लेष्मा इस (रोगी) में शीतज्वर, अरोचक (अरुचि), अविपाक (अपच), अङ्गमर्द (शरीर में टूटन), हर्ष (रोमांच), हृद्रोग, छर्दि (उल्टी), निद्रा, आलस्य, स्तैमित्य (जड़ता), गौरव (भारीपन) और शिरोभिताप (सिर का ताप और पीड़ा) उत्पन्न करता है, और इसके अतिरिक्त गुल्म की स्थिरता, भारीपन, कठोरता, गहराई में होना और सुन्नता भी, तथा बहुत बढ़ जाने पर कास (खाँसी), श्वास, प्रतिश्याय (जुकाम) और राजयक्ष्मा भी; त्वचा, नख, नेत्र, मुख, मूत्र और मल में श्वेतता (सफेदी) उत्पन्न करता है; जो (आहार-विहार) निदान में कहे गए हैं वे उसे अनुकूल नहीं होते, और उनके विपरीत अनुकूल होते हैं। यह श्लेष्मगुल्म है।

च. नि. ३/१२

। ॥ १२ ॥

तीनों दोषों के हेतु (कारण) और लिङ्ग (लक्षण) एक साथ मिलने पर तो कुशल (वैद्य) सान्निपातिक गुल्म बताते हैं। परस्पर विरोधी उपक्रम (उपचार) होने के कारण वह निचयगुल्म असाध्य है।

च. नि. ३/१३

, । ॥ १३ ॥

शोणितगुल्म (रक्त का गुल्म) तो निश्चय ही स्त्री को ही होता है, पुरुष को नहीं, गर्भकोष्ठ (गर्भाशय) और आर्तव (मासिक स्राव) के आने की विशेषता के कारण। जो स्त्री पराधीनता से, अनुभव की कमी से, अथवा सदा उपचार (सेवा या शिष्टाचार) का ध्यान रखने के कारण उठे हुए वेगों को रोकती है, उसका; अथवा कच्चा गर्भ गिरे अभी थोड़े ही दिन हुए हों, अथवा प्रसव किए अभी थोड़े ही दिन हुए हों, अथवा ऋतुकाल हो, (तब) वात को प्रकुपित करने वाले (आहार-विहार) का सेवन करती हुई स्त्री का वात शीघ्र प्रकोप को प्राप्त होता है।

च. नि. ३/१४

, । , , , , , , , , , , , , ॥ १४ ॥

वह कुपित (वात) योनि के मुख में प्रवेश करके आर्तव (मासिक रक्त) को रोक देता है; महीने-महीने रुकता हुआ वह आर्तव कुक्षि (पेट) को बढ़ाता है। उस (स्त्री) को शूल, कास, अतीसार, छर्दि, अरोचक, अविपाक, अङ्गमर्द, निद्रा, आलस्य, स्तैमित्य और कफप्रसेक (मुँह से कफ का बहना) उत्पन्न होते हैं; और (ये भी होते हैं:) स्तनों में स्तन्य (दूध), होठों और स्तनमण्डलों (स्तन के घेरों) का कालापन, आँखों की अत्यधिक ग्लानि (थकान), मूर्च्छा, हृल्लास (जी मिचलाना), दोहद (गर्भिणी जैसी इच्छाएँ), पैरों में श्वयथु (सूजन), रोमराजी (पेट पर रोमों की रेखा) का थोड़ा उभरना और योनि का आटालत्व (फैलाव); इसके अतिरिक्त योनि की दुर्गन्ध और स्राव भी उत्पन्न होता है; और उसका गुल्म पूरा का पूरा पिण्ड (गोले) के रूप में ही स्पन्दित होता (फड़कता) है; गर्भ से रहित उस (स्त्री) को मूढ (नासमझ) लोग 'गर्भिणी' कहते हैं।

च. नि. ३/१५

; , , , , , , , , , , ॥ १५ ॥

इन पाँचों गुल्मों के प्रकट होने से पहले ये पूर्वरूप होते हैं; जैसे: अन्न (भोजन) की इच्छा न होना, अरोचक और अविपाक, अग्नि की विषमता, खाए हुए (भोजन) का विदाह (जलन), और पाचन के समय अनुचित रूप से छर्दि (उल्टी) और उद्गार (डकार), और वात (अधोवायु), मूत्र और पुरीष (मल) के वेगों का प्रकट न होना, और प्रकट हुए (वेगों) का न निकलना या थोड़ा-थोड़ा निकलना, वातशूल, आटोप (पेट का फूलना), आँतों में गुड़गुड़ाहट, अपरिहर्षण (सम्भवतः अप्रसन्नता) और मल का अतिवृत्त (सम्भवतः बहुत गोल) होना, भूख न लगना, दुर्बलता, और सौहित्य (भरपेट भोजन) को न सह पाना।

च. नि. ३/१६

। , , । , । , ; । ॥ १६ ॥

इन सभी गुल्मों में भी, निश्चय ही, कोई भी गुल्म वात के बिना उत्पन्न नहीं होता। उनमें से सान्निपातिक (तीनों दोषों से बने गुल्म) को असाध्य जानकर (वैद्य) उसकी चिकित्सा आरम्भ ही न करे; एक दोष से उत्पन्न (गुल्म) में तो (उस दोष के) अपने-अपने अनुसार उपचार करे; और संसृष्ट (दो दोषों के मेल से बने गुल्मों) की चिकित्सा साधारण (दोनों दोषों के लिए उपयुक्त) कर्म से करे। और जो कुछ दूसरा (उपचार) भी (वह) अविरुद्ध (प्रतिकूल नहीं) माने, उपद्रवों की गम्भीरता और हल्केपन का विचार करके उसका भी प्रयोग करे; गम्भीर उपद्रवों की चिकित्सा शीघ्रता से करे और दूसरों की बाद में। परन्तु शीघ्रता करने वाला (वैद्य), (दोष का) विशेष (भेद) न पहचानते हुए, गुल्मों में आत्ययिक (तुरन्त करने योग्य) कर्म में वात की चिकित्सा करे: वात को हरने वाले स्नेह और स्वेद, स्नेह से युक्त मृदु विरेचन और बस्तियाँ; और अम्ल, लवण और मधुर रसों का युक्ति से प्रयोग करे। क्योंकि गुल्मों में मारुत (वात) के शान्त हो जाने पर दूसरा दोष भी बहुत थोड़े प्रयत्न से नियन्त्रित किया जा सकता है।

च. नि. ३/१७

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और इस विषय में (यह श्लोक) है: गुल्म के रोगियों के अनिल (वात) की शान्ति सब प्रकार के उपायों से विधिपूर्वक की जानी चाहिए। क्योंकि मारुत (वात) के जीत लिए जाने पर थोड़ा-सा कर्म (उपचार) भी बढ़े हुए दूसरे दोष को नष्ट कर सकता है।

च. नि. ३/१८

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इस विषय में (सार रूप) श्लोक (है): गुल्मों के निदान (के इस अध्याय) में (उनकी) संख्या, निमित्त (कारण), रूप (लक्षण), और पूर्वरूप भी, और कर्मों (चिकित्सा) का एक अंश बताया गया है।

च. नि. ३

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इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के निदानस्थान में गुल्मनिदान नामक तीसरा अध्याय (पूरा हुआ)।