भारत संहिता

अध्याय ४

प्रमेहविधानम्

प्रमेह का निदान

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भूमिका

प्रमेहनिदान चरक संहिता के निदानस्थान का चौथा अध्याय है। निदानस्थान वह खण्ड है जिसमें रोगों के कारण और उन्हें पहचानने के साधन बताए गए हैं। अध्याय अपने पहले वाक्य में अपना नाम प्रमेहनिदान बताता है, यानी 'प्रमेह का निदान', जबकि अन्त की पुष्पिका में इसका नाम प्रमेहविधान है। प्रमेह मूत्र से जुड़े रोगों का एक समूह है, जिनमें मूत्र का रंग, स्वाद, गाढ़ापन, मात्रा या निकलने का ढंग बिगड़ जाता है; 'मेह' का अर्थ है मूत्र त्यागना। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। वे आरम्भ में बताते हैं कि तीनों दोषों (वात, पित्त और कफ) के प्रकोप से बीस प्रमेह होते हैं, जबकि दोषों से होने वाले दूसरे रोग अनगिनत हैं, और यह अध्याय समझाता है कि दोषों का प्रकोप प्रमेहों को किस प्रकार उत्पन्न करता है।

पहले एक सामान्य नियम आता है: रोग तीन बातों के मिलने से बनता है, निदान (रोग का कारण), दोष, और दूष्य (शरीर के वे अंश जिन्हें दोष बिगाड़ते हैं)। जब ये तीनों आपस में नहीं जुड़ते, तो रोग नहीं बनता; देर से या दुर्बल होकर जुड़ें, तो रोग देर से, हल्का या अधूरे लक्षणों वाला होता है; और इसके उलट स्थिति में परिणाम भी उलटा होता है। फिर कफ के प्रमेहों के ये तीनों बताए गए हैं। निदान में नए अनाजों का बहुत अधिक बार और अधिक मात्रा में सेवन, घी वाली नई दालें, पालतू, जलप्राय प्रदेश के और जल में रहने वाले प्राणियों का मांस, तिल, खीर, ईख से बने पदार्थ, दूध, दही और नई मदिरा का सेवन, शरीर की सफ़ाई और व्यायाम छोड़ देना, और सोते, लेटे या बैठे रहना गिनाए गए हैं, और साथ में यह नियम कि जो कुछ भी श्लेष्मा (कफ), मेद और मूत्र को बढ़ाए, वह सब कारण है। दोष है बहुत द्रव वाला श्लेष्मा, और दूष्य हैं बहुत और ढीला मेद, मांस, शरीर का क्लेद (गीलापन), शुक्र, रक्त, वसा, मज्जा, लसीका, रस और ओज।

इसके बाद अध्याय क्रम से बताता है कि प्रमेह शरीर में कैसे बनता है। तीनों के मिलने पर कफ शीघ्र भड़कता है, ढीले शरीर में फैलता है और सबसे पहले मेद से मिलता है, क्योंकि मेद बहुत है, ढीला है और उसके गुण कफ जैसे हैं। मेद को दूषित करके वह शरीर के क्लेद और मांस तक पहुँचता है; मांस बिगड़ने से शराविका, कच्छपिका जैसी सड़े मांस की पिडकाएँ होती हैं, और क्लेद को मूत्र में बदलकर वह मूत्र ले जाने वाले स्रोतों के मुखों पर रुक जाता है, जिससे प्रमेह बनते हैं। मूत्र में कफ के जिस गुण की अधिकता होती है, उसी से प्रमेह का नाम पड़ता है। इस प्रकार कफ के दस प्रमेह हैं: उदकमेह, इक्षुवालिकारसमेह, सान्द्रमेह, सान्द्रप्रसादमेह, शुक्लमेह, शुक्रमेह, शीतमेह, सिकतामेह, शनैर्मेह और आलालमेह; श्लोकों में हर एक की पहचान मूत्र के रूप से दी गई है, जैसे जल जैसा, ईख के रस जैसा, गाढ़ा, सफ़ेद, ठण्डा, रेत जैसे कणों वाला, धीरे-धीरे निकलने वाला या लार जैसे तारों वाला। ये दसों साध्य हैं, यानी चिकित्सा से ठीक हो सकते हैं, क्योंकि इनका स्थान कफ जैसे गुणों वाला मेद है, कफ ही प्रधान है और चिकित्सा एक-सी है।

पित्त के प्रमेह उष्ण, खट्टे, नमकीन, क्षार वाले और तीखे पदार्थों, अजीर्ण में भोजन, तेज़ धूप, आग के ताप, श्रम, क्रोध और विषम आहार से होते हैं: प्रकुपित पित्त उसी क्रम से, और अधिक शीघ्र, छह प्रमेह बनाता है। ये हैं क्षारमेह, कालमेह, नीलमेह, लोहितमेह (रक्तमेह), माञ्जिष्ठमेह और हारिद्रमेह, जिनमें मूत्र क्षार जैसा, स्याही जैसा काला, चाष पक्षी के पंख जैसा, लाल, मजीठ के जल जैसा या हल्दी के जल जैसा होता है। ये याप्य हैं, यानी केवल नियन्त्रण में रखे जा सकते हैं, क्योंकि इनका स्थान दोष से मिला हुआ मेद है और उपचार परस्पर विरोधी हैं। वात कसैले, तीखे, कड़वे, रूखे, हल्के और ठण्डे आहार से, मैथुन, व्यायाम और शोधन चिकित्साओं की अति से, वेगों को रोकने, उपवास, चोट, धूप, घबराहट, शोक, अधिक रक्त निकलने, रात में जागने और शरीर को विषम ढंग से रखने से प्रकुपित होता है, और चार प्रमेह बनाता है: वसा को मूत्र के मार्गों में ले जाकर वसामेह, मज्जा को बस्ति में खींचकर मज्जमेह, लसीका को मूत्राशय में ले जाकर हस्तिमेह, जिसमें रोगी मतवाले हाथी की तरह लगातार मूत्र बहाता है, और स्वभाव से मधुर ओज को अपनी रूक्षता से कसैला बनाकर मधुमेह। वैद्य इन चारों को असाध्य कहते हैं, क्योंकि ये बहुत शीघ्र सङ्कट लाने वाले हैं और इनके उपचार परस्पर विरुद्ध हैं। आज की हिन्दी में मधुमेह डायबिटीज़ का नाम है; इस अध्याय में यह वात से होने वाले चार प्रमेहों में से एक का नाम है।

अन्त में अध्याय प्रमेह के पूर्वरूप, यानी रोग प्रकट होने से पहले के संकेत, गिनाता है: बालों का उलझकर जटा-सा होना, मुँह में मिठास, हाथ-पैरों में सुन्नपन और जलन, मुँह, तालु और गले का सूखना, प्यास, आलस्य, शरीर पर मैल, कीटों और चींटियों का शरीर और मूत्र की ओर आना, शरीर से कच्चे मांस जैसी गन्ध, नींद और हर समय ऊँघ। फिर उपद्रव, यानी रोग के रहते जुड़ने वाले कष्ट: प्यास, अतीसार, ज्वर, जलन, दुर्बलता, अरुचि, अपच, और सड़े मांस की पिडकाएँ, अलजी और विद्रधि। चिकित्सा का केवल सूत्र दिया गया है, कि साध्य प्रमेहों की चिकित्सा संशोधन और उपशमन से, जैसा उचित हो, की जाए। श्लोकों में ग्रन्थ कहता है कि खाने-पीने के लोभी और नहाने तथा चलने-फिरने से बचने वाले के पास प्रमेह वैसे ही शीघ्र पहुँचता है जैसे पक्षी अपने घोंसले वाले पेड़ पर, और सुस्त, बहुत स्थूल, बहुत स्निग्ध और बहुत खाने वाले को मृत्यु प्रमेह के रूप में ले जाती है; जबकि धातुओं को सम रखने वाला आहार और विविध चेष्टाएँ करने वाला सुख पाता है। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि प्रमेह एक नाम के नीचे बीस रोग हैं, जिनकी पहचान मूत्र से होती है, और जिस दोष से कोई प्रमेह बना है, वही बताता है कि वह साध्य है, याप्य है या असाध्य।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ५३-५५)

तत्र श्लोकाः-हेतुर्व्याधिविशेषाणां प्रमेहाणां च कारणम्।दोषधातुसमायोगो रूपं विविधमेव च॥

श्लोक ५३ →

यहाँ (अध्याय के सार के) श्लोक हैं: रोगों के भेदों का हेतु, और प्रमेहों का कारण, दोषों और धातुओं का समायोग (मेल), और (प्रमेहों के) विविध रूप (लक्षण),

दश श्लेष्मकृता यस्मात् प्रमेहाः षट् च पित्तजाः।यथा च वायुश्चतुरः प्रमेहान् कुरुते बली॥

श्लोक ५४ →

जिस कारण से दस प्रमेह श्लेष्मा (कफ) से उत्पन्न होते हैं और छह पित्त से, और जिस प्रकार बलवान वायु (वात) चार प्रमेहों को उत्पन्न करता है,

साध्यासाध्यविशेषाश्च पूर्वरूपाण्युपद्रवाः।प्रमेहाणां निदानेऽस्मिन् क्रियासूत्रं च भाषितम्॥

श्लोक ५५ →

और प्रमेहों के साध्य और असाध्य होने के भेद, पूर्वरूप और उपद्रव, तथा क्रियासूत्र (चिकित्सा का संक्षिप्त नियम), (ये सब) इस निदान (अध्याय) में कहे गए हैं।

मुख्य शब्द (१६) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. नि. ४/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम प्रमेहनिदान (प्रमेह के निदान सम्बन्धी अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. नि. ४/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. नि. ४/३

। ॥ ३ ॥

तीनों दोषों के प्रकोप से होने वाले प्रमेह बीस हैं, और (ऐसे) दूसरे विकार अनगिनत हैं। उनमें से, तीनों दोषों का प्रकोप जिस प्रकार प्रमेहों को उत्पन्न करता है, उसकी हम आगे क्रम से व्याख्या करेंगे।

च. नि. ४/४

। , , ; ; ॥ ४ ॥

यहाँ निश्चय ही निदान, दोष और दूष्य की विशेषताओं से विकार के विघात (रुकावट) के होने या न होने के भेद होते हैं। क्योंकि जब ये तीनों निदान आदि विशेष (कारक) आपस में नहीं जुड़ते, अथवा काल (समय) के अधिक बीतने पर (जुड़ते हैं), अथवा दुर्बल होकर जुड़ते हैं, तब विकार की उत्पत्ति नहीं होती, या (विकार) देर से उत्पन्न होते हैं, या वे हल्के होते हैं, या उनमें बताए गए सब लक्षण नहीं होते; (इसके) विपरीत होने पर (परिणाम भी) विपरीत होते हैं। इस प्रकार सब विकारों के विघात के होने या न होने के भेदों की उत्पत्ति का कारण कह दिया गया।

च. नि. ४/५

; , , , , , , , , ॥ ५ ॥

इस विषय में ये तीन निदान आदि विशेष (कारक) श्लेष्मा (कफ) से होने वाले प्रमेहों को शीघ्र उत्पन्न करने वाले होते हैं। वे इस प्रकार हैं: नए हायनक, यवक, चीनक, उद्दालक, नैषध, इत्कट, मुकुन्दक, महाव्रीहि, प्रमोदक और सुगन्धक (अनाजों) का बहुत अधिक बार और अधिक मात्रा में उपयोग; तथा घी से युक्त नए हरेणु और माष (उड़द) की सूप्य (दालों) का, ग्राम्य (पालतू), आनूप (जलप्राय प्रदेश के) और औदक (जल में रहने वाले) प्राणियों के मांस का, शाक, तिल, पलल, पिष्टान्न (पिसे अन्न से बने भोजन), पायस (खीर), कृशरा, विलेपी और इक्षुविकारों (ईख से बने पदार्थों) का, और दूध, नई मदिरा, मन्दक दही तथा तरल, मधुर और तरुण (नए) पदार्थों की अधिकता वाले (आहार) का उपयोग; मृजा (शरीर की सफाई) और व्यायाम को छोड़ देना; सोने, लेटे रहने और बैठे रहने में लगे रहना; और दूसरी जो कोई भी विधि श्लेष्मा, मेद और मूत्र को उत्पन्न करने वाली हो, वह सब निदानविशेष है।

च. नि. ४/६

॥ ६ ॥

बहुत द्रव (तरल अंश) वाला श्लेष्मा (कफ) दोषविशेष है।

च. नि. ४/७

॥ ७ ॥

बहुत (मात्रा में) और अबद्ध (ढीला) मेद, मांस, शरीर में उत्पन्न क्लेद, शुक्र, शोणित (रक्त), वसा, मज्जा, लसीका, रस और ओज कहलाने वाला (पदार्थ), ये दूष्यविशेष हैं।

च. नि. ४/८

, ; , ; , ; , ; , ; , ; , ; , ॥ ८ ॥

इन तीनों निदान आदि विशेषों के एक साथ मिलने पर श्लेष्मा (कफ) शीघ्र प्रकोप को प्राप्त होता है, क्योंकि वह पहले से ही बहुत अधिक (बढ़ा हुआ) होता है। वह प्रकुपित (भड़का हुआ) श्लेष्मा, शरीर के शिथिल (ढीला) होने के कारण, शीघ्र ही शरीर में फैल जाता है। शरीर में फैलता हुआ वह आरम्भ में मेद से ही मिलता है, क्योंकि मेद बहुत (मात्रा में) और अबद्ध (ढीला) होता है, और (उसके गुण) मेद के गुणों से अधिकतर समान होते हैं। मेद से मिलता हुआ वह उसे दूषित करता है, क्योंकि वह (स्वयं) विकृत है। वह विकृत (श्लेष्मा), दूषित मेद से युक्त होकर, शरीर के क्लेद और मांस से संसर्ग करता है, क्योंकि क्लेद और मांस अत्यधिक मात्रा में बढ़े हुए होते हैं। वह मांस में, मांस के दूषित होने से, शराविका, कच्छपिका आदि सड़े मांस की पिडकाएँ उत्पन्न करता है, क्योंकि (वह) अपनी प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) में नहीं रहता। फिर शरीर के क्लेद को दूषित करता हुआ वह उसे मूत्र के रूप में बदल देता है, और वङ्क्षण (जाँघ के जोड़) और बस्ति (मूत्राशय) से निकलने वाले मूत्रवह स्रोतों (मूत्र ले जाने वाले मार्गों) के मुखों पर, जो मेद और क्लेद से भरे और भारी होते हैं, पहुँचकर रुक जाता है। तब, प्रकृति के विकृति बन जाने के कारण, वह प्रमेहों को, और उनकी स्थिरता या असाध्यता को उत्पन्न करता है।

च. नि. ४/९

; , ॥ ९ ॥

शरीर का क्लेद तो, श्लेष्मा और मेद से मिला हुआ, मूत्राशय में प्रवेश करते हुए और मूत्र का रूप लेते हुए, श्लेष्मा के इन दस गुणों से, जो विषमता से युक्त होते हैं, प्रभावित हो जाता है; वे इस प्रकार हैं: श्वेत, शीत, मूर्त, पिच्छिल, अच्छ, स्निग्ध, गुरु, मधुर, सान्द्र, प्रसाद और मन्द। उनमें जिस एक या अनेक गुण से वह अधिक प्रभावित होता है, उसी (गुण) के नाम वाला गौण (गुण पर आधारित) विशेष नाम वह पाता है।

च. नि. ४/१०

; , , , , , , , , , ॥ १० ॥

(कफ से होने वाले) वे ये दस प्रमेह तो विशेष (अलग-अलग) नामों से (जाने जाते) हैं; जैसे: उदकमेह, इक्षुवालिकारसमेह, सान्द्रमेह, सान्द्रप्रसादमेह, शुक्लमेह, शुक्रमेह, शीतमेह, सिकतामेह, शनैर्मेह और आलालमेह।

च. नि. ४/११

; , , ॥ ११ ॥

वे दस प्रमेह साध्य (चिकित्सा से ठीक होने योग्य) हैं; क्योंकि (उनका) स्थान (कफ के) समान गुणों वाला मेद है, (उनमें) कफ की प्रधानता है, और (उनकी) चिकित्सा एक-सी है।

च. नि. ४/१२

-॥ १२ ॥

इस विषय में श्लेष्मा (कफ) से होने वाले प्रमेहों के भेद जानने के लिए (ये) श्लोक हैं।

च. नि. ४/१३

। ॥ १३ ॥

श्लेष्मा (कफ) के प्रकोप से उदमेही (उदकमेह का रोगी) मनुष्य साफ़, बहुत, सफ़ेद, ठण्डा, गन्धहीन और जल जैसा मूत्र त्यागता है।

च. नि. ४/१४

। ॥ १४ ॥

श्लेष्मा (कफ) के प्रकोप से (मनुष्य) अत्यन्त मीठा, ठण्डा, थोड़ा पिच्छिल (चिपचिपा), आविल (गँदला) और काण्डेक्षु के रस जैसा (मूत्र) त्यागता है।

च. नि. ४/१५

। ॥ १५ ॥

जिसका मूत्र रात भर बर्तन में रखा रहने पर गाढ़ा हो जाता है, कफ के प्रकोप से (रोगी हुए) उस पुरुष को सान्द्रमेही कहते हैं।

च. नि. ४/१६

। ॥ १६ ॥

जिसका मूत्र कुछ गाढ़ा हो जाता है और कुछ साफ़ हो जाता है, उसे श्लेष्मा (कफ) के प्रकोप से (हुआ) सान्द्रप्रसादमेही कहते हैं।

च. नि. ४/१७

। ॥ १७ ॥

जो सफ़ेद, पिष्ट (आटे) जैसा मूत्र बार-बार त्यागता है, कफ के प्रकोप से (रोगी हुए) उस पुरुष को शुक्लमेही कहते हैं।

च. नि. ४/१८

। ॥ १८ ॥

जो मनुष्य शुक्र (वीर्य) जैसा या शुक्र मिला (मूत्र) बार-बार त्यागता है, उस पुरुष को श्लेष्मा (कफ) के प्रकोप से (हुआ) शुक्रमेही कहते हैं।

च. नि. ४/१९

। ॥ १९ ॥

जो अत्यन्त मीठा और ठण्डा मूत्र बहुत (अधिक) त्यागता है, उस पुरुष को श्लेष्मा (कफ) के प्रकोप से (हुआ) शीतमेही कहते हैं।

च. नि. ४/२०

। ॥ २० ॥

जो मनुष्य मूत्र में आए हुए ठोस, सूक्ष्म दोषों (के कणों) को (मूत्र के साथ) त्यागता है, उस मनुष्य को श्लेष्मा (कफ) के प्रकोप से (हुआ) सिकतामेही जानना चाहिए।

च. नि. ४/२१

। ॥ २१ ॥

जो धीरे-धीरे, बिना वेग के और कठिनाई से, धीमे-धीमे मूत्र त्यागे, उस पुरुष को श्लेष्मा (कफ) के प्रकोप से (हुआ) शनैर्मेही कहते हैं।

च. नि. ४/२२

। ॥ २२ ॥

जो धागों में बँधा हुआ-सा, आलाल (लार जैसा) और पिच्छिल (चिपचिपा) (मूत्र) त्यागता है, उस मनुष्य को श्लेष्मा (कफ) के प्रकोप से (हुआ) आलालमेही जानना चाहिए।

च. नि. ४/२३

॥ २३ ॥

इस प्रकार श्लेष्मा (कफ) के प्रकोप के कारण होने वाले ये दस प्रमेह समझा दिए गए हैं।

च. नि. ४/२४

, ॥ २४ ॥

उष्ण, अम्ल (खट्टे), लवण (नमकीन), क्षार (खारे) और कटु (तीखे) (पदार्थों) तथा अजीर्ण में भोजन का सेवन करने वाले, और अत्यन्त तीक्ष्ण धूप, अग्नि के ताप, श्रम, क्रोध और विषम आहार का सेवन करने वाले, ऐसे शरीर वाले (व्यक्ति) का ही पित्त शीघ्र प्रकोप को प्राप्त होता है; और वह प्रकुपित (पित्त) उसी क्रम से इन छह प्रमेहों को (कफ के प्रमेहों से) अधिक शीघ्र उत्पन्न करता है।

च. नि. ४/२५

; , , , , , ॥ २५ ॥

उनके भी विशेष (अलग-अलग) नाम पित्त के गुणों के भेद से ही होते हैं; जैसे: क्षारमेह, कालमेह, नीलमेह, लोहितमेह, माञ्जिष्ठमेह और हारिद्रमेह।

च. नि. ४/२६

॥ २६ ॥

वे (छह प्रमेह) पहले की तरह पित्त के छह ही गुणों से युक्त होते हैं: क्षार, अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (तीखा), विस्र (कच्चे मांस जैसी गन्ध वाला) और उष्ण (गरम)।

च. नि. ४/२७

, ॥ २७ ॥

वे सभी (पित्त के प्रमेह) याप्य (केवल नियन्त्रण में रखे जा सकने वाले) हैं, क्योंकि उनका स्थान दोष से मिला हुआ मेद है, और (उनके) उपचार परस्पर विरोधी हैं।

च. नि. ४/२८

-॥ २८ ॥

इस विषय में पित्त से होने वाले प्रमेहों के भेद जानने के लिए (ये) श्लोक हैं।

च. नि. ४/२९

। ॥ २९ ॥

पित्त के प्रकोप से क्षारमेही (क्षारमेह का रोगी) मनुष्य गन्ध, रंग, स्वाद और स्पर्श में जैसा क्षार (खार) होता है, वैसा ही मूत्र त्यागता है।

च. नि. ४/३०

। ॥ ३० ॥

जो स्याही (मसी) के रंग का, गरम मूत्र लगातार त्यागता है, उसे पित्त के परिकोप (अत्यधिक प्रकोप) से (हुआ) कालमेही जानना चाहिए।

च. नि. ४/३१

। ॥ ३१ ॥

जो मनुष्य चाष (पक्षी) के पंख जैसा (नीला) और खट्टा मूत्र त्यागता है, उसे पित्त के परिकोप (अत्यधिक प्रकोप) से (हुआ) नीलमेही जानना चाहिए।

च. नि. ४/३२

। ॥ ३२ ॥

जो मनुष्य विस्र (कच्चे मांस जैसी गन्ध वाला), लवण (नमकीन), उष्ण (गरम) और रक्त (लाल, रक्त जैसा मूत्र) त्यागता है, उसे पित्त के परिकोप से (हुआ) रक्तमेही जानना चाहिए।

च. नि. ४/३३

। ॥ ३३ ॥

(जो मनुष्य) मञ्जिष्ठा (मजीठ) के जल जैसा, बहुत विस्र (कच्चे मांस जैसी गन्ध वाला) (मूत्र) त्यागता है, उसे पित्त के परिकोप से (हुआ) माञ्जिष्ठमेही जानना चाहिए।

च. नि. ४/३४

। ॥ ३४ ॥

जो हरिद्रा (हल्दी) के जल जैसा, कटु (तीखा) (मूत्र) त्यागता है, उसे पित्त के परिकोप से (हुआ) हारिद्रमेही जानना चाहिए।

च. नि. ४/३५

॥ ३५ ॥

इस प्रकार पित्त के प्रकोप के कारण होने वाले ये छह प्रमेह बता दिए गए।

च. नि. ४/३६

॥ ३६ ॥

कषाय, कटु, तिक्त, रूक्ष, लघु और शीत (आहार) का, व्यवाय (मैथुन), व्यायाम, वमन, विरेचन, आस्थापन और शिरोविरेचन के अतियोग (अति) का, (वेगों के) संधारण (रोकने), अनशन (उपवास), अभिघात (चोट), आतप (धूप), उद्वेग (घबराहट), शोक, शोणित के अतिषेक (बहुत अधिक रक्त निकलने), जागरण (रात में जागने) और शरीर के विषम न्यास (शरीर को अनुचित ढंग से रखने) का सेवन करने वाले, वैसे ही शरीर वाले (व्यक्ति) का वात शीघ्र प्रकोप को प्राप्त होता है।

च. नि. ४/३७

; ; , , ; , ॥ ३७ ॥

वह (वात) प्रकुपित होकर वैसे शरीर में फैलता हुआ जब वसा को लेकर मूत्र ले जाने वाले स्रोतों (मार्गों) में पहुँचता है, तब वसामेह उत्पन्न करता है; और जब मज्जा को मूत्र की बस्ति (मूत्राशय) में खींच लाता है, तब मज्जमेह उत्पन्न करता है; और जब लसीका को मूत्राशय में ले जाता हुआ मूत्र को लगातार टपकाता है, (और) लसीका के अत्यधिक होने से और वायु के विक्षेपण (उसे इधर-उधर उछालने) से निश्चय ही इस (रोगी) में मूत्र की अति प्रवृत्ति (बहुत अधिक आना) और सङ्ग (रुकावट) करता है, तब वह (रोगी) मत्त (मद में आए) हाथी की तरह लगातार, बिना वेग के, मूत्र बहाता है; उसे (वैद्य) हस्तिमेही कहते हैं; और ओज तो मधुर स्वभाव वाला है; जब वायु (अपनी) रूक्षता के कारण उसे कषायपन से युक्त करके मूत्राशय में ले जाता है, तब मधुमेह उत्पन्न करता है।

च. नि. ४/३८

, ॥ ३८ ॥

भिषक् (वैद्य) इन चार वातज (वात से उत्पन्न) प्रमेहों को असाध्य कहते हैं, क्योंकि वे महात्ययिक (बहुत गम्भीर और तुरन्त सङ्कट वाले) हैं और उनके उपक्रम (उपचार) परस्पर विरुद्ध हैं।

च. नि. ४/३९

; , , , ॥ ३९ ॥

उनके भी, पहले की तरह, गुणों की विशेषता से विशेष नाम होते हैं; वे इस प्रकार हैं: वसामेह, मज्जमेह, हस्तिमेह और मधुमेह।

च. नि. ४/४०

-॥ ४० ॥

इस विषय में वात से होने वाले प्रमेहों के भेद जानने के लिए (ये) श्लोक हैं।

च. नि. ४/४१

। ॥ ४१ ॥

जो मनुष्य वसा मिला हुआ या वसा जैसा दिखने वाला (मूत्र) बार-बार त्यागता है, उसे (वैद्य) वात के प्रकोप से (हुआ) असाध्य वसामेही कहते हैं।

च. नि. ४/४२

। ॥ ४२ ॥

जो मनुष्य मूत्र के साथ मज्जा बार-बार त्यागता है, उसे (वैद्य) वात के प्रकोप से (हुआ) असाध्य मज्जमेही कहते हैं।

च. नि. ४/४३

। ॥ ४३ ॥

जो मत्त (मद में आए) हाथी की तरह लगातार और बहुत अधिक मूत्र बहाता है, उसे (वैद्य) वात के प्रकोप से (हुआ) असाध्य हस्तिमेही कहते हैं।

च. नि. ४/४४

। ॥ ४४ ॥

जो मनुष्य कषाय (कसैला) और मधुर (मीठा), पाण्डु (पीलापन लिए सफेद) और रूक्ष (रूखा) (मूत्र) त्यागता है, उसे वात के प्रकोप से (हुआ) असाध्य मधुमेही जानना चाहिए।

च. नि. ४/४५

॥ ४५ ॥

इस प्रकार वात के प्रकोप के कारण होने वाले ये चार प्रमेह बता दिए गए।

च. नि. ४/४६

॥ ४६ ॥

इस प्रकार तीनों दोषों के प्रकोप के कारण होने वाले बीस प्रमेह बता दिए गए।

च. नि. ४/४७

; , , , , , , , , , , , , , ॥ ४७ ॥

कुपित हुए तीनों दोष तो, जब प्रमेहों को उत्पन्न करने वाले होते हैं, तब निश्चय ही ये पूर्वरूप दिखाते हैं; जैसे: बालों का जटिल हो जाना (उलझकर आपस में चिपक जाना), मुख का मीठापन, हाथों और पैरों में सुन्नपन और जलन, मुख, तालु और कण्ठ का सूखना, प्यास, आलस्य, शरीर पर मैल, शरीर के छिद्रों में लेप-सा जमना, अंगों में चारों ओर जलन और सुन्नपन, षट्पदों (छह पैरों वाले कीटों) और चींटियों का शरीर और मूत्र की ओर आना, मूत्र में मूत्र के दोष, शरीर की विस्र (कच्चे मांस जैसी) गन्ध, निद्रा, और हर समय तन्द्रा (ऊँघ)।

च. नि. ४/४८

॥ ४८ ॥

प्रमेह के रोगियों में तो, उस (प्रमेह) के बने रहने से, निश्चय ही तृष्णा (अधिक प्यास), अतीसार (दस्त), ज्वर, दाह (जलन), दुर्बलता, अरोचक (भोजन में अरुचि) और अविपाक (अपच), और पूतिमांस पिडका (सड़े मांस वाली फुंसियाँ), अलजी, विद्रधि आदि उपद्रव होते हैं।

च. नि. ४/४९

॥ ४९ ॥

उनमें से साध्य प्रमेहों की चिकित्सा (वैद्य) संशोधन और उपशमन (उपचारों) से, जैसा जिसके योग्य हो, (रोगी का) उपचार करते हुए करे।

च. नि. ४/५०

- । ॥ ५० ॥

और यहाँ (इस विषय में श्लोक) हैं: खाने-पीने की वस्तुओं के लोभी, और स्नान तथा चलने-फिरने से द्वेष करने वाले (व्यक्ति) के पास प्रमेह शीघ्र आ पहुँचता है, जैसे अण्डज (पक्षी) अपने घोंसले वाले वृक्ष पर।

च. नि. ४/५१

। ॥ ५१ ॥

मन्द उत्साह वाले, अत्यन्त स्थूल (मोटे), अत्यन्त स्निग्ध (चिकनाई-युक्त) और बहुत खाने वाले (व्यक्ति) को मृत्यु प्रमेह के रूप में शीघ्र लेकर चली जाती है।

च. नि. ४/५२

। ॥ ५२ ॥

परन्तु जो मनुष्य शरीर की धातुओं का साम्य (सन्तुलन) करने वाले आहार का, और विविध अन्य चेष्टाओं (शारीरिक क्रियाओं) का सेवन करता है, वह सुख पाता है।

च. नि. ४/५३

- । ॥ ५३ ॥

यहाँ (अध्याय के सार के) श्लोक हैं: रोगों के भेदों का हेतु, और प्रमेहों का कारण, दोषों और धातुओं का समायोग (मेल), और (प्रमेहों के) विविध रूप (लक्षण),

च. नि. ४/५४

। ॥ ५४ ॥

जिस कारण से दस प्रमेह श्लेष्मा (कफ) से उत्पन्न होते हैं और छह पित्त से, और जिस प्रकार बलवान वायु (वात) चार प्रमेहों को उत्पन्न करता है,

च. नि. ४/५५

। ॥ ५५ ॥

और प्रमेहों के साध्य और असाध्य होने के भेद, पूर्वरूप और उपद्रव, तथा क्रियासूत्र (चिकित्सा का संक्षिप्त नियम), (ये सब) इस निदान (अध्याय) में कहे गए हैं।

च. नि. ४

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के निदानस्थान में प्रमेहविधान नामक चौथा अध्याय (पूरा हुआ)।