भारत संहिता

अध्याय ५

कुष्ठनिदानम्

कुष्ठ का निदान

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भूमिका

कुष्ठनिदान चरक संहिता के निदानस्थान का पाँचवाँ अध्याय है। निदानस्थान वह खण्ड है जिसमें रोगों के कारण और उन्हें पहचानने के साधन बताए गए हैं। अध्याय का नाम उसके पहले वाक्य से आया है, जिसमें कहा गया है कि अब कुष्ठनिदान की व्याख्या की जाएगी; हिन्दी में इसका अर्थ है 'कुष्ठ का निदान'। अध्याय में कुष्ठ किसी एक रोग का नाम नहीं, बल्कि रोगों का एक वर्ग है, जिसके भेद, कारण, पूर्वरूप, रूप और उपद्रव यहाँ गिनाए गए हैं। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है।

अध्याय आरम्भ में बताता है कि सात द्रव्य बिगड़कर कुष्ठों की प्रकृति, यानी मूल कारण, बनते हैं: वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ), ये तीन दोष, जो प्रकोप से बिगड़े हों; और शरीर के चार धातु, त्वचा, मांस, शोणित (रक्त) और लसीका (शरीर का पतला, पानी जैसा द्रव), जिन्हें दूष्य कहा गया है, क्योंकि दोष उन्हें दूषित करते हैं। कोई भी कुष्ठ एक ही दोष के प्रकोप से नहीं होता। फिर भी एक जैसी प्रकृति वाले कुष्ठों में दोषों के अंशों, अनुबन्ध और स्थान के भेद से पीड़ा, रंग, आकार, प्रभाव, नाम और चिकित्सा अलग हो जाते हैं, इसलिए कुष्ठ सात, अठारह या अनगिनत प्रकार का गिना जा सकता है। सब भेदों को गिनने में बहुत विस्तार देखकर भगवान् आत्रेय केवल सात भेदों का उपदेश करते हैं, जो इस पर टिके हैं कि कौन-सा दोष अधिक है: वात अधिक हो तो कपालकुष्ठ, पित्त अधिक हो तो औदुम्बर, श्लेष्मा अधिक हो तो मण्डलकुष्ठ, वात और पित्त अधिक हों तो ऋष्यजिह्व, पित्त और श्लेष्मा अधिक हों तो पुण्डरीक, श्लेष्मा और वात अधिक हों तो सिध्मकुष्ठ, और सभी दोष बढ़े हों तो काकणक।

इसके बाद सभी कुष्ठों का साझा निदान (कारण) आता है, जो अधिकतर आहार और आचरण से जुड़ा है: ठंडे और गरम का, और पोषण देने वाले और कृश करने वाले भोजन का, बिना उचित क्रम के अदल-बदल; मधु, फाणित, मछली, लकुच (बड़हल), मूलक (मूली) और काकमाची (मकोय) को लगातार, बहुत अधिक मात्रा में और अजीर्ण में खाना; चिलिचिम मछली को दूध के साथ, और हायनक, यवक, चीनक, उद्दालक और कोरदूष (कोदो) जैसे अन्नों को दूध, दही, छाछ, कोल, कुलत्थ (कुलथी), माष (उड़द) और अतसी (अलसी) तथा कुसुम्भ के तेल के साथ खाना; भरपेट होकर मैथुन, व्यायाम और ताप का अधिक सेवन; भय, थकान या ताप से पीड़ित होकर अचानक ठंडे पानी में उतरना; विदग्ध भोजन को वमन से निकाले बिना जलन करने वाले पदार्थ खाना; उल्टी को रोकना; और स्नेहों के प्रयोग में मर्यादा लाँघना। इनसे तीनों दोष एक साथ प्रकुपित होते हैं और त्वचा आदि चारों शिथिल पड़ जाते हैं; तब दोष उन्हीं में टिककर उन्हें दूषित करते हैं और कुष्ठ उत्पन्न करते हैं। रोग प्रकट होने से पहले उसके पूर्वरूप दिखते हैं, जैसे पसीना न आना या बहुत आना, खुरदुरापन या बहुत चिकनापन, त्वचा का रंग बदलना, खुजली, चुभन, सुन्नपन, जलन, झनझनाहट, रोंगटे खड़े होना, भारीपन, सूजन, बार-बार वीसर्प, छोटी चोट में भी बहुत पीड़ा, और छोटे घावों का भी बिगड़ना और न भरना।

फिर अध्याय सातों कुष्ठों की पहचान उनकी वेदना, वर्ण, आकार, प्रभाव और नाम से कराता है, और उनके नाम उनके रूप से जुड़ते हैं: कपालकुष्ठ काले-लाल कपाल (ठीकरे) के रंग का होता है, औदुम्बर पके उदुम्बर (गूलर) के फल के रंग का, मण्डलकुष्ठ गोल, ऋष्यजिह्व ऋष्य मृग की जीभ के आकार का, पुण्डरीक पुण्डरीक (कमल) की पंखुड़ी जैसा, सिध्म अलाबु (लौकी) के फूल जैसा, और काकण आरम्भ में काकणन्तिका (गुंजा) के रंग का, जो बाद में सब कुष्ठों के लक्षणों से युक्त होकर अनेक रंगों का हो जाता है। इनमें काकण असाध्य है और बाकी छह साध्य हैं। पर अध्याय बताता है कि साध्य कुष्ठ भी चिकित्सा न होने पर, या अपचार (अनुचित आचरण) से दोषों के बढ़ते जाने पर, असाध्य हो जाते हैं। उपेक्षा होने पर उनमें कृमि पनपते हैं, जो त्वचा आदि चारों को, और सिराओं, स्नायुओं और कोमल अस्थियों तक को खा जाते हैं, और वात, पित्त और श्लेष्मा अपने-अपने अलग उपद्रव उत्पन्न करते हैं। अध्याय के अनुसार जिस कुष्ठ के रोगी को रिसाव, अङ्गों का फटना और उनके हिस्सों का गिरना, प्यास, ज्वर, अतीसार, जलन, दुर्बलता, अरुचि और अपच जैसे उपद्रव घेर लें, वह कुष्ठ असाध्य है।

अन्त के श्लोक यही बात एक उदाहरण से कहते हैं। जो मनुष्य रोग को साध्य मानकर उसकी उपेक्षा करता है, वह कुछ समय बीतने पर 'मरा हुआ ही' अपनी भूल समझता है; और जो रोग से पहले ही, या उसके नए रहते, ठीक प्रकार से उपचार करता है, वह लम्बे समय तक सुख पाता है। जैसे नया पेड़ थोड़े प्रयत्न से कट जाता है पर बहुत बढ़ जाने पर बहुत प्रयत्न माँगता है, वैसे ही रोग भी नया होने पर आसानी से ठीक होता है, और बढ़ जाने पर कठिनाई से, या असाध्य हो जाता है। अन्तिम श्लोक अध्याय के विषय गिनाता है: कुष्ठों की संख्या, द्रव्य, दोष, हेतु, पूर्वलक्षण, रूप और उपद्रव। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि हर कुष्ठ में तीनों दोष और चारों दूष्य, यानी त्वचा, मांस, रक्त और लसीका, मिलकर बिगड़ते हैं, उसके सात मुख्य भेद इस पर टिके हैं कि कौन-सा दोष अधिक है, और साध्य कुष्ठ भी उपेक्षा से असाध्य हो सकता है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १६)

तत्र श्लोकः-संख्या द्रव्याणि दोषाश्च हेतवः पूर्वलक्षणम्।रूपाण्युपद्रवाश्चोक्ताः कुष्ठानां कौष्ठिके पृथक्॥

श्लोक १६ →

इस विषय में (सार का) श्लोक है- कौष्ठिक (कुष्ठ के इस अध्याय) में कुष्ठों की संख्या, (उनके) द्रव्य, दोष, हेतु (कारण), पूर्वलक्षण, रूप (लक्षण) और उपद्रव अलग-अलग कहे गए हैं।

मुख्य शब्द (१४) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

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च. नि. ५/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम कुष्ठनिदान (कुष्ठ के निदान सम्बन्धी अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. नि. ५/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. नि. ५/३

। , । , ॥ ३ ॥

विकृति को प्राप्त हुए सात द्रव्य कुष्ठों की प्रकृति (मूल कारण) होते हैं। जैसे - वात, पित्त और श्लेष्मा, ये तीन दोष, जो प्रकोप से विकृत हुए हों; और दूष्य (दोषों द्वारा दूषित होने वाले) शरीर के धातु, त्वचा, मांस, शोणित और लसीका, ये चार, जो दोषों के उपघात से विकृत हुए हों। ऐसी अवस्था को प्राप्त हुआ, सात धातुओं (घटकों) वाला यह (समूह) सातों कुष्ठों का आजनन (उत्पत्ति का मूल) है; इसी से उत्पन्न होकर प्रकट होते हुए (कुष्ठ) सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करते हैं।

च. नि. ५/४

, । । , । ॥ ४ ॥

और कोई भी कुष्ठ ऐसा नहीं है जो एक ही दोष के प्रकोप के कारण हो; परन्तु समान प्रकृति वाले कुष्ठों में भी, दोषों के अंशांश-विकल्प (अंशों के भेद), अनुबन्ध और स्थान के विभाग से, वेदना, वर्ण, संस्थान (आकार), प्रभाव, नाम और चिकित्सा का भेद निश्चय ही होता है। वह (भेद) सात प्रकार का, अठारह प्रकार का, या असंख्य प्रकार का होता है। क्योंकि दोष, विकल्पनों (विभिन्न संयोगों) से विकल्पित होते हुए, विकारों को अनेक प्रकार का बना देते हैं, असाध्य होने की स्थिति को छोड़कर। उनके विकल्पों और विकारों की गिनती में अतिप्रसङ्ग (अत्यधिक विस्तार) देखकर, हम कुष्ठ के सात प्रकार के भेद का ही उपदेश करेंगे।

च. नि. ५/५

, , , , , , ; । ॥ ५ ॥

यहाँ (कुष्ठ की उत्पत्ति में), वात आदि तीनों (दोषों) के प्रकुपित होकर त्वचा आदि चारों (दूष्यों) को दूषित करने पर, वात के अधिक होने पर कपालकुष्ठ उत्पन्न होता है, पित्त के (अधिक होने पर) तो औदुम्बर, श्लेष्मा के (अधिक होने पर) मण्डलकुष्ठ, वात और पित्त के (अधिक होने पर) ऋष्यजिह्व, पित्त और श्लेष्मा के (अधिक होने पर) पुण्डरीक, श्लेष्मा और मारुत के (अधिक होने पर) सिध्मकुष्ठ, और सभी दोषों के बढ़ जाने पर काकणक उत्पन्न होता है; इस प्रकार यह कुष्ठ का सात प्रकार का भेद होता है। और यही (भेद), प्रकृति के 'तर' और 'तम' (अधिक और सबसे अधिक) के क्रम से और भी विकल्पित होने पर, विकारों के भेदों की और अधिक संख्या को प्राप्त होता है।

च. नि. ५/६

, , , , , , , , , ; ; ॥ ६ ॥

इस विषय में हम सभी कुष्ठों का यह निदान (कारण) संक्षेप में बताएँगे - जो (व्यक्ति) शीत और उष्ण का अदल-बदल बिना (उचित) क्रम के करता है, तथा संतर्पण और अपतर्पण भोजन का (भी इसी तरह) अदल-बदल करता है; जो मधु, फाणित, मछली, लकुच (बड़हल), मूलक (मूली) और काकमाची (मकोय) को लगातार, अत्यधिक मात्रा में और अजीर्ण में भी खाता है; और चिलिचिम (मछली) को दूध के साथ, और हायनक, यवक, चीनक, उद्दालक और कोरदूष (कोदो) की अधिकता वाले अन्नों को दूध, दही, छाछ, कोल, कुलत्थ (कुलथी), माष (उड़द) तथा अतसी (अलसी) और कुसुम्भ के तेल के साथ (खाता है); और जो इन्हीं से अत्यधिक मात्रा में तृप्त होकर व्यवाय (मैथुन), व्यायाम और संताप (ताप) का अत्यधिक सेवन करता है; और जो भय, थकान और संताप से पीड़ित होकर अचानक ठंडे पानी में उतरता है; और विदग्ध आहार को (वमन से) बाहर निकाले बिना विदाही (जलन करने वाले) पदार्थ खाता है; और छर्दि (उल्टी) को रोकता है; और स्नेहों का अतिचार (मर्यादा से हटकर प्रयोग) करता है - (उसके) तीनों दोष एक साथ प्रकोप को प्राप्त होते हैं, (और) त्वचा आदि चारों शिथिलता को प्राप्त होते हैं। उनके शिथिल होने पर प्रकुपित दोष (वहाँ) स्थान पाकर, टिके रहकर, उन्हीं त्वचा आदि को दूषित करते हुए कुष्ठों को उत्पन्न करते हैं।

च. नि. ५/७

; ॥ ७ ॥

उन (कुष्ठों) के ये पूर्वरूप होते हैं, जैसे - पसीना न आना, अत्यधिक पसीना आना, खुरदुरापन, अत्यधिक चिकनापन, (त्वचा का) रंग बदलना, खुजली, सुई चुभने जैसी पीड़ा, सुन्नपन, चारों ओर जलन, झनझनाहट, रोंगटे खड़े होना, कर्कशता, गर्मी का अनुभव, भारीपन, सूजन, बार-बार वीसर्प होना, और शरीर पर तथा शरीर के छिद्रों में उपदेह (लेप-सी परत जमना), (शरीर के) पकने, जलने, (किसी जीव के) काटने, टूटने, घाव होने और फिसलकर चोट लगने पर अत्यधिक पीड़ा, और बहुत छोटे घावों का भी बिगड़ जाना और न भरना।

च. नि. ५/८

, ; ; ; ; ; ; ; ।, ॥ ८ ॥

उसके (पूर्वरूपों के) बाद कुष्ठ उत्पन्न होते हैं; उनकी वेदना, वर्ण, संस्थान (आकार), प्रभाव और नाम के भेद से पहचान इस प्रकार होती है, जैसे- जो रूखे, अरुण (लाल) और खुरदरे हों, विषम (असमान) रूप से फैले हों, कठोर किनारों वाले हों, पतले हों, जिनकी बाहरी पतली परत उभरी हुई हो, जो सोए (अंग) की तरह सुन्न हों, खड़े रोमों से भरे हों, बहुत चुभन वाले हों, थोड़ी खुजली, जलन, पूय (मवाद) और लसीका वाले हों, जल्दी फैलने और उत्पन्न होने वाले हों, जल्दी फूटने वाले हों, कृमियों वाले हों, और काले-लाल कपाल (मिट्टी के बर्तन के टूटे टुकड़े) के रंग के हों, उन्हें कपालकुष्ठ जानना चाहिए; जो ताँबे जैसे लाल हों, ताँबे जैसी लाल और कठोर रोमों की पंक्तियों से ढके हों, मोटे हों, बहुत और गाढ़े पूय, रक्त और लसीका वाले हों, खुजली, क्लेद (गीलापन), कोथ (सड़न), जलन और पाक (पकना) वाले हों, जल्दी फैलने, उत्पन्न होने और फूटने वाले हों, संताप (तीव्र गर्मी) और कृमियों सहित हों, और पके उदुम्बर (गूलर) के फल के रंग के हों, उन्हें औदुम्बरकुष्ठ जानना चाहिए; जो स्निग्ध (चिकने), गुरु (भारी) और उभार वाले हों, चिकने, स्थिर और पीले किनारों वाले हों, सफेद-लाल आभा वाले हों, सफेद रोमों की फैली हुई पंक्तियों वाले हों, बहुत, गाढ़ा, सफेद और पिच्छिल (चिपचिपा) स्राव बहाने वाले हों, बहुत क्लेद, खुजली और कृमियों वाले हों, धीमे फैलने, उत्पन्न होने और फूटने वाले हों, और गोल हों, उन्हें मण्डलकुष्ठ जानना चाहिए; जो खुरदरे हों, बाहर से अरुण (लाल) रंग के और भीतर से श्याव (काले-भूरे) हों, नीली, पीली और ताँबे जैसी आभा वाले हों, जल्दी फैलने और उत्पन्न होने वाले हों, थोड़ी खुजली, क्लेद और कृमियों वाले हों, जलन, भेद (फटने जैसी पीड़ा), चुभन [और पाक] की अधिकता वाले हों, शूक (नुकीले रोएँ) लगने जैसी पीड़ा वाले हों, बीच में उभरे हुए हों, पतले किनारों वाले हों, कठोर पिडकाओं (फुंसियों) से भरे हों, लम्बे-गोल हों, और ऋष्य (एक प्रकार के मृग) की जीभ के आकार के हों, उन्हें ऋष्यजिह्व जानना चाहिए; जो सफेद-लाल आभा वाले हों, लाल किनारों वाले हों, लाल रेखाओं और सिराओं से भरे हों, उभार वाले हों, बहुत और गाढ़े रक्त, पूय और लसीका वाले हों, खुजली, कृमि, जलन और पाक वाले हों, जल्दी फैलने, उत्पन्न होने और फूटने वाले हों, और पुण्डरीक (कमल) की पंखुड़ी जैसे दिखते हों, उन्हें पुण्डरीक जानना चाहिए; जो खुरदरे और अरुण (लाल) हों, जिनकी बाहरी पतली परत झड़ती हो, जो भीतर से स्निग्ध (चिकने) हों, सफेद-लाल आभा वाले हों, संख्या में अनेक हों, थोड़ी पीड़ा वाले हों, थोड़ी खुजली, जलन, पूय और लसीका वाले हों, लघु (शीघ्र) उत्पन्न होने वाले हों, थोड़े भेद और कृमियों वाले हों, और अलाबु (लौकी) के फूल जैसे दिखते हों, उन्हें सिध्मकुष्ठ जानना चाहिए; जो आरम्भ में काकणन्तिका (गुंजा) के रंग के हों, पर बाद में सब कुष्ठों के लक्षणों से युक्त हो जाएँ, और सब कुष्ठों के लक्षण अत्यन्त बुरे रूप में प्रकट होने से अनेक रंगों वाले हों, उन्हें काकण जानना चाहिए। वे (काकण) असाध्य हैं, और बाकी (कुष्ठ) साध्य हैं।

च. नि. ५/९

, । ॥ ९ ॥

इनमें जो असाध्य है, वह असाध्यता को नहीं लाँघता (असाध्य ही रहता है); परन्तु कोई साध्य (कुष्ठ) कभी-कभी अपचार (अनुचित आचरण) से साध्यता को लाँघ जाता है (असाध्य हो जाता है)। क्योंकि काकणक को छोड़कर (बाकी) छह साध्य (कुष्ठ), चिकित्सा न किए जाने पर, या अपचार से दोषों द्वारा भरते (बढ़ते) जाने पर, असाध्यता को प्राप्त हो जाते हैं।

च. नि. ५/१०

; , , , ॥ १० ॥

क्योंकि साध्य (कुष्ठों) की भी उपेक्षा किए जाने पर त्वचा, मांस, शोणित (रक्त), लसीका, कोथ (सड़न), क्लेद (गीलेपन) और संस्वेद (पसीने) से उत्पन्न कृमि पनप जाते हैं; वे (कृमि) त्वचा आदि को खाते हुए, और दोष (उन्हें) फिर से दूषित करते हुए, ये उपद्रव अलग-अलग उत्पन्न करते हैं- उनमें वात श्याव-अरुण (काला-भूरा और लाल) वर्ण, परुषता (खुरदरापन) भी, और रौक्ष्य (रूखापन), शूल, शोष (सूखना), तोद (चुभन), वेपथु (कम्पन), हर्ष (रोमांच), संकोच (सिकुड़न), आयास (थकान), स्तम्भ (जकड़न), सुप्ति (सुन्नता), भेद (फटने जैसी पीड़ा) और भङ्ग (टूटने जैसी पीड़ा) (उत्पन्न करता है); पित्त दाह (जलन), स्वेद (पसीना), क्लेद, कोथ, स्राव, पाक (पकना) और राग (लालिमा) (उत्पन्न करता है); श्लेष्मा तो इसके (कुष्ठ के) श्वैत्य (सफेदी), शैत्य (ठण्डक), कण्डू (खुजली), स्थैर्य (स्थिरता), गौरव (भारीपन), उत्सेध (उभार), उपस्नेह (गीलापन) और उपलेप (लिपी हुई-सी परत) (उत्पन्न करता है); और कृमि तो त्वचा आदि चारों को, सिराओं को, स्नायुओं को और कोमल अस्थियों को भी खा जाते हैं।

च. नि. ५/११

; , ॥ ११ ॥

और इसी अवस्था में कुष्ठ के रोगी को उपद्रव घेर लेते हैं; जैसे- प्रस्रवण (रिसाव), अङ्गों का फटना, अङ्गों के अवयवों (हिस्सों) का गिरना, और तृष्णा (प्यास), ज्वर, अतीसार (दस्त), दाह (जलन), दुर्बलता, अरोचक (अरुचि) और अविपाक (अपच); ऐसे (कुष्ठ) को असाध्य जानना चाहिए।

च. नि. ५/१२

- । ॥ १२ ॥

और इस विषय में (ये श्लोक) हैं- जो मनुष्य पहले 'यह (रोग) साध्य है' ऐसा (सोचकर) रोग की उपेक्षा करता है, वह कुछ समय बीतने पर मरा हुआ ही (अपनी भूल) समझता है।

च. नि. ५/१३

। ॥ १३ ॥

परन्तु जो रोगों (के होने) से पहले ही, या रोगों के तरुण (नए) रहते, ठीक प्रकार से भेषज (चिकित्सा) करता है, वह लम्बे समय तक सुख पाता है।

च. नि. ५/१४

। ॥ १४ ॥

क्योंकि जैसे तरुण (नया, छोटा) पेड़ थोड़े प्रयत्न से काटा जाता है, परन्तु वही बहुत बढ़ जाने पर बहुत अधिक प्रयत्न से काटा जाता है,

च. नि. ५/१५

। ॥ १५ ॥

ठीक इसी प्रकार विकार (रोग) भी तरुण (नया) होने पर सुख से (आसानी से) साध्य होता है (ठीक किया जाता है); बढ़ जाने पर वह कठिनाई से साध्य होता है, या असाध्य भी हो जाता है।

च. नि. ५/१६

- । ॥ १६ ॥

इस विषय में (सार का) श्लोक है- कौष्ठिक (कुष्ठ के इस अध्याय) में कुष्ठों की संख्या, (उनके) द्रव्य, दोष, हेतु (कारण), पूर्वलक्षण, रूप (लक्षण) और उपद्रव अलग-अलग कहे गए हैं।

च. नि. ५

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के निदानस्थान में कुष्ठनिदान नामक पाँचवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।