भूमिका
शोषनिदान चरक संहिता के निदानस्थान का छठा अध्याय है। निदानस्थान वह खण्ड है जिसमें रोगों के कारण और उन्हें पहचानने के लक्षण बताए गए हैं। अध्याय का नाम उसके पहले वाक्य से आया है, जिसमें कहा गया है कि अब शोषनिदान की व्याख्या की जाएगी; हिन्दी में इसका अर्थ है 'शोष का निदान'। शोष का शाब्दिक अर्थ है सूखना; यहाँ यह उस रोग का नाम है जिसमें शरीर धीरे-धीरे सूखता और क्षीण होता जाता है, और अध्याय के अनुसार वैद्य इसी रोग को राजयक्ष्मा कहते हैं। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है।
अध्याय आरम्भ में शोष के चार आयतन, यानी कारण, गिनाता है: साहस, संधारण, क्षय और विषमाशन। फिर वह एक-एक कारण को एक ही क्रम में समझाता है: उससे दोष कैसे बिगड़ते हैं, शरीर में कहाँ पहुँचकर कौन-से लक्षण उपजाते हैं, और रोगी कैसे धीरे-धीरे सूखता जाता है। हर कारण के अन्त में एक सीख आती है, और उसे दोहराने वाला एक श्लोक। साहस का अर्थ यहाँ अपनी शक्ति से बढ़कर किया गया काम है, जैसे दुर्बल होकर बलवान् से लड़ना, बहुत बड़ा धनुष खींचना, बहुत अधिक बोलना, बहुत भारी बोझ उठाना, बहुत दूर तक तैरना, बहुत लम्बा रास्ता तेज़ी से दौड़कर तय करना, या चोट खाना। इससे छाती क्षत हो जाती है, यानी उसमें घाव हो जाता है; वायु उसमें पहुँचकर श्लेष्मा (कफ) को साथ लेता है, पित्त को दूषित करता है और सब ओर फैलकर जम्हाई, अङ्गमर्द (बदन का टूटना), ज्वर, अरुचि, स्वर का बैठना, श्वास, प्रतिश्याय (जुकाम) और सिर की पीड़ा उपजाता है। फिर लगातार खाँसी होती है, रोगी रक्त थूकने लगता है, और दुर्बल होकर धीरे-धीरे सूखता जाता है। इसलिए आत्रेय सीख देते हैं कि बुद्धिमान् व्यक्ति अपना बल परखकर उसी के अनुरूप काम करे, क्योंकि शरीर बल पर टिका है और मनुष्य का मूल शरीर है; और श्लोक कहता है कि जीवित रहकर ही मनुष्य कर्म का इच्छित फल पाता है।
संधारण का अर्थ है अधोवायु, मूत्र और मल के आए हुए वेगों को रोकना, जैसे राजा, स्वामी या गुरु के पास, जुए की या सज्जनों की सभा में, स्त्रियों के बीच, या वाहन में यात्रा करते हुए, भय, लज्जा, घृणा या किसी काम में लगे रहने के कारण। इससे वायु कुपित होकर पित्त और श्लेष्मा को उभारता है, और शूल, मल का टूटना या सूख जाना, पसलियों और कन्धों की पीड़ा, खाँसी, ज्वर और स्वरभेद जैसे लक्षण उपजाता है। इसकी सीख है कि मनुष्य विशेष रूप से अपने शरीर के योगक्षेम, यानी उसकी भलाई की प्राप्ति और रक्षा, में प्रयत्न करे, क्योंकि शरीर न रहे तो शरीरधारी के लिए कुछ भी नहीं बचता। क्षय, यानी धातुओं का घटना, दो मार्गों से होता है। एक में बहुत शोक और चिन्ता, ईर्ष्या, उत्कण्ठा, भय और क्रोध से, दुबले शरीर में रूखा भोजन करने से, या दुर्बल होकर भूखा रहने या बहुत कम खाने से हृदय में स्थित रस घटता है, और उपचार न हो तो मनुष्य यक्ष्मा से जकड़ लिया जाता है। दूसरे में अति मैथुन से शुक्र (वीर्य) घटता है; फिर भी मन न हटे तो वायु धमनियों से रक्त निकाल लाता है, जो शुक्र के मार्ग से बाहर आता है; फिर जोड़ ढीले पड़ते हैं, रूखापन और दुर्बलता बढ़ती है, और वही खाँसी, रक्त थूकना और सूखते जाना आते हैं। इसकी सीख है शुक्र की रक्षा, क्योंकि अध्याय के अनुसार शुक्र आहार का परम धाम, यानी उसका सबसे उत्तम और अन्तिम परिणाम है, और उसका क्षय बहुत से रोग या मृत्यु तक ला सकता है।
विषमाशन का अर्थ है खाने-पीने की वस्तुओं का प्रकृति, करण, संयोग, राशि (मात्रा), देश, काल, उपयोगसंस्था और उपशय की दृष्टि से विषम, यानी अनुचित, ढंग से सेवन। इससे तीनों दोष असन्तुलित होकर स्रोतों के मुख रोक देते हैं, और जो कुछ खाया जाए वह अधिकतर मूत्र और मल ही बनता है, शरीर के धातु नहीं; इसीलिए अध्याय कहता है कि ऐसा रोगी मल के सहारे जीता है। फिर वात, पित्त और श्लेष्मा अपने-अपने उपद्रव उपजाते हैं, और इस प्रकार तीनों दोष राजयक्ष्मा को उत्पन्न करते हैं। इसकी सीख है उचित आहार, और श्लोक बुद्धिमान् को हितकर, परिमित और समय पर भोजन करने वाला और जितेन्द्रिय होने को कहता है। चारों कारणों को समेटते हुए अध्याय कहता है कि इनसे वात, पित्त और श्लेष्मा प्रकुपित होकर अनेक उपद्रवों से शरीर को सुखा देते हैं, और इस रोग के राजयक्ष्मा नाम के दो कारण देता है: यह सब रोगों में सबसे अधिक कष्टदायक है, या यह पहले नक्षत्रों के राजा भगवान् सोम (चन्द्रमा) को हुआ था।
इसके बाद अध्याय राजयक्ष्मा के पूर्वरूप गिनाता है, यानी वे लक्षण जो रोग के पूरी तरह प्रकट होने से पहले दिखते हैं: जुकाम, बार-बार छींक, कफ का बहना, मुँह का मीठा रहना, भोजन की इच्छा न होना, निर्दोष वस्तुओं और परोसने वालों में भी दोष देखना, खाने के बाद जी मिचलाना, चेहरे और पैरों पर सूजन, बार-बार अपने हाथ देखना, आँखों में बहुत सफ़ेदी, अपनी बाँहों का माप जानने की इच्छा, और स्वप्न में सूखे जलाशय, सूने गाँव और नगर, और सूखे, जले या टूटे वन देखना, या कुत्ते, ऊँट, गधे या सूअर की सवारी करना। फिर रोग के ग्यारह रूप आते हैं: सिर का भरा-भरा लगना, खाँसी, श्वास, स्वरभेद, कफ की उल्टी, रक्त थूकना, पसलियों और कन्धों की पीड़ा, ज्वर, अतीसार और अरुचि। अन्त में अध्याय बताता है कि रोगी साध्य है या नहीं, यह लक्षणों की गिनती से नहीं, उसकी शक्ति से जाना जाता है: जिसका बल, मांस और रक्त न घटा हो और जिसमें अरिष्ट (मृत्यु के सूचक लक्षण) न दिखे हों, वह सब लक्षणों के रहते भी साध्य है, क्योंकि वह व्याधि और औषध, दोनों का बल सह सकता है; पर दुर्बल और बहुत क्षीण रोगी को, उसके लक्षण थोड़े हों तब भी, बहुत लक्षणों और अरिष्टों वाला ही मानना चाहिए, और वैद्य उसे छोड़ दे, क्योंकि अरिष्ट क्षण भर में और बिना किसी प्रकट कारण के प्रकट हो जाते हैं। अन्तिम श्लोक कहता है कि जो वैद्य शोष के समुत्थान (कारणों), लिङ्ग (लक्षणों) और पूर्वरूप को ठीक-ठीक जानता है, वह राजा की चिकित्सा करने योग्य है। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि शोष के चारों कारण अलग-अलग रास्तों से एक ही परिणाम तक पहुँचते हैं: दोषों का प्रकोप, खाँसी जैसे उपद्रव, और शरीर का धीरे-धीरे सूखते जाना।