॥ १ ॥
अध्याय ६
शरीरविचयशारीरम्
शरीर का विचार
इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ३१-३४)
तत्र श्लोकाः-शरीरं यद्यथा तच्च वर्तते क्लिष्टमामयैः।यथा क्लेशं विनाशं च याति ये चास्य धातवः॥
श्लोक ३१ →वृद्धिह्रासौ यथा तेषां क्षीणानामौषधं च यत्।देहवृद्धिकरा भावा बलवृद्धिकराशचये ॥
श्लोक ३२ →लरिणामकरा भावा या च तेषां लृथक् क्रिया।मलाख्याः संप्रसादाख्या धातवः प्रश्न एव च॥
श्लोक ३३ →नवको निर्णयश्चास्य विधिवत् संप्रकाशितः।तथ्यः शरीरविचये शारीरे लरमर्षिणा॥
श्लोक ३४ →मुख्य शब्द (१४) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
- शरीर
- शरीर - देह
विस्तार
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
- विकार
- विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
- धातु
- धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार
शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।
अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।
चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।
व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।
- गुण
- गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
- आत्मन्
- आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार
अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।
चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।
- कर्मन्
- कर्म - क्रिया, गति
विस्तार
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
- स्वस्थ
- स्वस्थ - अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित; निरोगी
विस्तार
शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।
अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।
- सत्त्व
- सत्त्व - मन
विस्तार
शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।
चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।
- रस
- रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
- मारुत
- मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।
चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।
- वात
- वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
- लिङ्ग
- लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
- विशेष
- विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
- आयुस्
- आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार
अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।
चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।
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। शरीरे । ॥ ४ ॥
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तदेव तस्माद्भेषजं सम्यगवचार्यामाणं युगपन्न्यूनातिरिक्तानां धातूनां साम्यकरं भवति, अधिकमपकर्षति न्यूनमाप्याययति॥ ६ ॥
एतावदेव हि भैषज्यप्रयोगे फलमिष्टं स्वस्थवृत्तानुष्ठाने च यावद्धातूनां साम्यं स्यात्।स्वस्था ह्यपि धातूनां साम्यानुग्रहार्थमेव कुशला रसगुणानाहारिविकारांश्च पर्यायेणेच्छन्त्युपयोक्तुं सात्म्यसमाज्ञातान्; एकप्रकारभूयिष्ठांश्चोपयुञ्जानास्तद्विपरीतकरसमाज्ञातया चेष्टया सममिच्छन्ति कर्तुम्॥ ७ ॥
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तत्रेमे शरीरधातुगुणाः संख्यासामर्थ्यकराः; तद्यथा-गुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्षमन्दतीक्ष्णस्थिरसरमृदुकठिनविशदपिच्छिलश्लक्ष्णखरसूक्ष्मस्थूलसान्द्रुद्रवाः। तेषु ये गुरवस्ते गुरुभिराहारविकारगुणैरभ्यस्यमानैराप्याय्यन्ते, लघवश्च ग्रसन्ति; लघवस्तुलघुभिराप्याय्यन्ते, गुरवश्च ह्रसन्ति। एवमेव सर्वधातुगुणानां सामान्ययोगाद्वृद्धिः, विपर्ययाद्ध्रासः।तस्मान्मांसमाप्याय्यते मांसेन भूयस्तरमन्येभ्यः शरीरधातुभ्यः, तथा लिहितं लिहितेन, मेदो मेदसा, वसा वसया, अस्थि तरुणास्थ्ना, मज्जा मज्ज्ञा, शुक्तं शुक्रेण, गर्भस्त्वामगर्भेण॥ १० ॥
तत्र त्वेवंलक्षणेन सामान्यवतामाहारविकाराणामसान्निध्यं स्यात्, सन्निहितानां वाऽप्ययुक्तत्वान्नोपयोगो धृणित्वादन्यस्माद्वा कारणात्, स च धातुरभिवर्धयितव्यः स्यात्, तस्य ये समानगुणाः स्युराहारविकारा असेव्याश्च, तत्र समानगुणभूयिष्ठानामन्यप्रकृतीनामप्याहारविकाराणामुपयोगः स्यात्।तद्यथा-शुक्रक्षये क्षीरसर्पिषोरुपयोगो मधुरस्निग्धशीतसमाख्यातानां चापरेषां द्रव्याणां, मूत्रक्षये पुनरिक्षुरसवारुणीमण्डद्रवमधुराम्ललवणोपक्लेदिनां, पुरीषक्षये कुल्माषमाषकुष्कुण्डाजमध्ययवशाकधान्याम्लानां, वातक्षये कटुकतिक्तकषायरूक्षलघुशीतानां, पित्तक्षयेऽम्ललवणकटुकक्षारोष्णतीक्ष्णानां, श्लेष्मक्षये स्निग्धगुरुमधुरसान्द्रपिच्छिलानां द्रव्याणाम्।कर्मापि यद्यस्य धातोर्वृद्धिकरं तत्तदासेव्यम्।एवमन्येषामपि शरीरधातूनां सामान्यविपर्ययाभ्यां वृद्धिह्रासौ यथाकालं कार्यौ।इति सर्वधातूनामेकैकशोऽतिदेशतश्च वृद्धिह्रासकराणि व्याख्यातानि भवन्ति॥ ११ ॥
; , , , ॥ १२ ॥
। , , , , , , , , , , ॥ १३ ॥
आहारपरिणामकरास्त्विमे भावा भवन्ति।तद्यथा-ऊष्मा, वायुः, क्लेदः, स्नेहः, कालः, समयोगश्चेति ॥ १४ ॥
तत्र तु खल्वेषामूष्मादीनामाहारपरिणामकराणां भावानामिमे कर्मविशेषा भवन्ति।तद्यथा-ऊष्मा पचति, वायुरपकर्षति, क्लेदः शैथिल्यमापादयति, स्नेहो मार्दवं जनयति, कालः पर्याप्तिमभिनिर्वर्तयति, समयोगस्त्वेषां परिणामधातुसाम्यकरः संपद्यते॥ १५ ॥
; ॥ १६ ॥
शरीरगुणाः पुनर्द्विविधाः संग्रहेण-मलभूताः, प्रसादभूताश्च।तत्र मलभूतास्ते ये शरीरस्याबाधकराः स्युः।तद्यथा-शरीरच्छिद्रेषूपदेहाः पृथग्जन्मानो बहिर्मुखाः, परिपक्वाश्च धातवः, प्रकुपिताश्च वातपित्तश्लेष्माणः, ये चान्येऽपि केचिच्छरीरे तिष्ठन्तो भावाः शरीरस्योपघातायोपपद्यन्ते, सर्वांस्तान्मले संचक्ष्महे; इतरांस्तु प्रसादे, गुर्वादींश्च द्रवान्तान् गुणभेदेन, रसादींश्च शुक्रान्तान् द्रव्यभेदेन॥ १७ ॥
तेषां सर्वेषामेव वातपित्तश्लेष्माणो दुष्टा दूषयितारो भवन्ति, दोषस्वभावात्।वातादीनां पुनर्धात्वन्तरे कालान्तरे प्रदुष्टानां विविधाशितपीतीयेऽध्याये विज्ञाना युक्तानि।एतावत्येव दुष्टदोषगातर्यावत् संस्पर्शनाच्छरीरधातूनाम्।प्रकृतिभूतानां तु खलु वातादीनां फलमारोग्यम्।तस्मादेषां प्रकृतिभावे प्रयतितव्यं बुद्धिमद्भिरिति॥ १८ ॥
भवति चात्र-शरीरं सर्वथा सर्वं सर्वदा वेद यो भिषक्।आयुर्वेदं स कार्त्स्न्येन वेद लोकसुखप्रदम्॥ १९ ॥
एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच-श्रुतमेतद्यदुक्तं भगवता शरीराधिकारे वचः।किन्नु खलु गर्भस्याङ्गं पूर्वमभिनिर्वर्तते कुक्षौ, कुतो मुखः कथं चान्तर्गतस्तिष्ठति, किमाहारश्च वर्तयति, कथंभूतश्च निष्क्रामति, कैश्चायमाहारोपचारैर्जातः सद्यो हन्यते, कैरव्याधिरभिवर्धते, किं चास्य देवादप्रकोपनिमित्ता विकाराः संभवन्ति आहोस्विन्न, किंचास्य कालाकालमृत्य्वोर्भावाभावयोर्भगवानध्यवस्यति, किंचास्य परमायुः, कानि चास्य परमायुषो निमित्तानीति॥ २० ॥
तमेवमुक्तवन्तमग्निवेशं भगवान् पुनर्वसुरात्रेय उवाच-पूर्वमुक्तमेतद्गर्भावक्रान्तौ यथाऽयमभिनिर्वर्तते कुक्षौ, यच्चास्य यदा संतिष्ठतेऽङ्गजातम्।विप्रतिवादास्त्वत्र बहुविधाः सूत्रकृतामृषीणां सन्ति सर्वेषां; तानपि निबोधोच्यमानान्-शिरः पूर्वमभिनिर्वर्तते कुक्षाविति कुमारशिरा भरद्वाजः पश्यति, सर्वेन्द्रियाणां तदधिष्ठानमिति कृत्वा; हृदयमिति काङ्कायनो बाह्लीकभिषक्, चेतनाधिष्ठानत्वात्; नाभिरिति भद्रकाप्यः, आहारागम इति कृत्वा; पक्वाशयगुदमिति भद्रशौनकः, मारुताधिष्ठानत्वात्; हस्तपादमिति बडिशः, तत्करणत्वात् पुरुषस्य; इन्द्रियाणीति जनको वैदेहः, तान्यस्य बुद्द्यधिष्ठानानीति कृत्वा; परोक्षत्वादचिन्त्यमिति मारीचिः कश्यपः; सर्वाङ्गाभिनिर्वृत्तिर्युगपदिति धन्वन्तरिः; तदुपपन्नं, सर्वाङ्गानां तुल्यकालाभिनिर्वृत्तत्वाद्धृदयप्रभृतीनाम्।सर्वाङ्गानां ह्यस्य हृदयं मूलमधिष्ठानं च केषाञ्चिद्भावानाम्, नच तस्मात् पूर्वाभिनिर्वृत्तिरेषां; तस्माद्धृदयप्रभृतीनां सर्वाङ्गानां तुल्यकालाभिनिर्वृत्तिः, सर्वे भावा ह्यन्योन्यप्रतिबद्धाः; तस्माद्यथाभूतदर्शनं साधु॥ २१ ॥
॥ २२ ॥
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, , । ॥ २४ ॥
तस्याहारोपचारौ जातिसूत्रीयोपदिष्टावविकारकरौ चाभिवृद्धिकरौ भवतः॥ २५ ॥
॥ २६ ॥
॥ २७ ॥
कालाकालमृत्य्वोस्तु खलु भावाभावयोरिदमध्यवसितं नः-“यः कश्चिन् स काल एव म्रियते, न हि कालच्छिद्रमस्ति” इत्येके भाषन्ते।तच्चासम्यक्।न ह्यच्छिद्रता सच्छिद्रता वा कालस्योपपद्यते, कालस्वलक्षणस्वभावात्।तत्राहुरपरे-यो यदा म्रियते स तस्य नियतो मृत्युकालः; स सर्वभूतानां सत्यः, समक्रियत्वादिति।एतदपि चान्यथाऽर्थग्रहणम्।न हि कश्चिन्न म्रियत इति समक्रियः।कालो ह्यायुषः प्रमाणमधिकृत्योच्यते।यस्य चेष्टं यो यदा म्रियते स तस्य मृत्युकाल इति, तस्य सर्वे भावा यथास्वं नियतकाला भविष्यन्ति; तच्च नोपपद्यते, प्रत्यक्षं ह्यकालाहारवचनकर्मणां फलमनिष्टं, विपर्यये चेष्टं; प्रत्यक्षतश्चोपलभ्यते खलु कालाकालव्यक्तिस्तासु तास्ववस्थासु तं तमर्थमभिसमीक्ष्य, तद्यथा-कालोऽयमस्य व्यधेराहारस्यौषधस्य प्रतिकर्मणो विसर्गस्य, अकालो वेति।लोकेऽप्येतद्भवति-काले देवो वर्षत्यकाले देवो वर्षति, काले शीतमकाले शीतं, काले तपत्यकाले तपति, काले पुष्पफलमकाले च पुष्पफलमिति।तस्मादुभयमस्ति-काले मृत्युरकाले च; नैकान्तिकमत्र।यदि ह्यकाले मृत्युर्न स्यान्नियतकालप्रमाणमायुः सर्वं स्यात्; एवं गते हिताहितज्ञानमकारणं स्यात्, प्रत्यक्षानुमानोपदेशाश्चाप्रमाणानि स्युर्ये प्रमाणभूताः सर्वतन्त्रेषु, यैरायुष्याण्यनायुष्याणि चोपलभ्यन्ते।वाग्वस्तुमात्रमेतद्वादमृषयो मन्यन्ते-नाकाले मृत्युरस्तीति॥ २८ ॥
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वृद्धिह्रासौ यथा तेषां क्षीणानामौषधं च यत्।देहवृद्धिकरा भावा बलवृद्धिकराशचये ॥ ३२ ॥
लरिणामकरा भावा या च तेषां लृथक् क्रिया।मलाख्याः संप्रसादाख्या धातवः प्रश्न एव च॥ ३३ ॥
नवको निर्णयश्चास्य विधिवत् संप्रकाशितः।तथ्यः शरीरविचये शारीरे लरमर्षिणा॥ ३४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने शरीरविचयशारीरं नाम षष्ठोऽध्यायः॥६॥