भारत संहिता

अध्याय १०

बस्तिसिद्धिः

उत्तम बस्तियाँ

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भूमिका

बस्तिसिद्धि चरक संहिता के सिद्धिस्थान का दसवाँ अध्याय है। नाम का अर्थ है बस्ति की सिद्धि, यानी उत्तम बस्तियाँ। बस्ति वह चिकित्सा है जिसमें औषधि-युक्त द्रव शरीर के भीतर पहुँचाया जाता है। अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है, जो शिष्य अग्निवेश को सम्बोधित करके उन-उन रोगों में हितकर और सफल बस्तियों को बताते हैं।

आरम्भ में आत्रेय बताते हैं कि बस्ति कैसे अपना काम करती है: बल, दोष, काल, रोग और प्रकृति को अलग-अलग परखकर, हर रोग के अपने औषध-वर्ग से बनी बस्ति ठीक विधि से दी जाए। फिर वे बस्ति की तुलना विरेचन से करते हैं। उनके अनुसार बस्ति शीघ्र और सुख से शोधन करती है, उसमें कमी करना और पोषण देना दोनों मिलते हैं, और उसमें बड़ी हानि का भय नहीं है; विरेचन में कष्ट हो सकता है, और बालक तथा वृद्ध के लिए विरेचन उचित नहीं माना गया, इसलिए उनके लिए आस्थापन ही उत्तम है। इसके बाद बस्ति के तीन प्रकार गिनाए गए हैं, अनुवासन, निरूह और उत्तरबस्ति, तथा यह कि किन रोगियों में कैसी बस्ति हितकर है और किनमें शोधन करने वाली बस्ति नहीं दी जानी चाहिए।

आगे बस्ति में काम आने वाले द्रव और द्रव्य गिनाए जाते हैं: अम्ल, मूत्र, दूध, सुरा, काढ़े, उष्ण जल, मधु, स्नेह, शर्करा और लवण, तथा कुछ औषधियाँ। इसके बाद आधे-आधे श्लोकों में अलग-अलग अवस्थाओं की बस्तियाँ आती हैं। वात, पित्त और कफ के लिए द्रव्यों की सूचियाँ हैं; फिर पक्वाशय को शुद्ध करने वाली, शुक्र और मांस को बढ़ाने वाली और मल को बाँधने वाली बस्तियाँ हैं। उसके बाद परिस्राव, दाह, परिकर्त, प्रवाहण, अतियोग और जीवादान नामों की अवस्थाओं के लिए अलग-अलग योग बताए गए हैं, और रक्तपित्त तथा प्रमेह के लिए भी।

अध्याय के अन्त में एक सार-श्लोक इन सब बस्तियों की गिनती देता है और कहता है कि ये सुलभ हैं, इनमें औषध थोड़ी लगती है और क्लेश थोड़ा होता है, इसलिए ये अत्यन्त गुणवान हैं। पाठक के लिए ध्यान देने की बात यह है कि इस अध्याय में बस्ति कोई एक नुस्खा नहीं है: रोगी की अवस्था और रोग के अनुसार उसके द्रव्य, गुण और विधि चुने जाते हैं। यह ग्रन्थ का कथन है, चिकित्सा-सलाह नहीं।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ४६-४८)

तत्र श्लोकाः-त्रिकास्त्रयोऽनिलादीनां चतुष्काश्चापरे त्रयः।पक्वाशयविशुद्ध्यर्थं वृष्याः सांग्राहिकास्तथा॥

श्लोक ४६ →

इस विषय में श्लोक - वात आदि (दोषों) के तीन त्रिक (तीन-तीन बस्तियों के समूह) हैं, और तीन अन्य चतुष्क (चार-चार बस्तियों के समूह) हैं; ये पक्वाशय की शुद्धि के लिए, वृष्य तथा संग्राहक (मल को रोकने वाले) हैं।

परिस्रावे तथा दाहे परिकर्ते प्रवाहणे।सातियोगे मतौ द्वौ द्वौ जीवादाने तथा त्रयः॥

श्लोक ४७ →

परिस्राव में, तथा दाह में, परिकर्त में, प्रवाहण में और अतियोग में दो-दो (बस्तियाँ) मानी गई हैं; जीवादान में तीन

द्वौ रक्तपित्ते मेहे च एकत्रिंशच्च सप्त ते।सुलभाल्पौषधक्लेशा बस्तयो गुणवत्तमाः॥

श्लोक ४८ →

रक्तपित्त में दो और मेह में (भी दो); इकतीस और सात, वे (बस्तियाँ); जो सुलभ हैं, जिनमें औषध थोड़ी और क्लेश (कष्ट) थोड़ा है, वे बस्तियाँ अत्यन्त गुणवान हैं।

मुख्य शब्द (१४) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

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च. सि. १०/१

॥ १ ॥

अब इसके बाद हम बस्तिसिद्धि (बस्ति की सिद्धि, अर्थात् उत्तम बस्तियाँ) नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सि. १०/२

॥ २ ॥

भगवान् आत्रेय ने ऐसा कहा।

च. सि. १०/३

।! ॥ ३ ॥

हे अग्निवेश! उन-उन रोगों में प्रशस्त (हितकर) बताई गई सिद्ध (सफल) बस्तियों की, वैद्यों को सिद्धि देने वाली सिद्धि (सफलता) को, कहते हुए (मुझ से) सुनो।

च. सि. १०/४

। ॥ ४ ॥

बल, दोष, काल, रोग और प्रकृति का अलग-अलग विचार करके, ठीक रीति से प्रयोग की गई (बस्तियाँ), अपने-अपने औषध-वर्गों (औषध-समूहों) के साथ, अपने-अपने रोगों को शान्त करती हैं।

च. सि. १०/५

। ॥ ५ ॥

बस्ति के समान दूसरा कर्म (चिकित्सा-कर्म) नहीं है, क्योंकि वह शीघ्र और सुखपूर्वक शोधन करने वाली है, शीघ्र अपतर्पण (कमी करने) और तर्पण (तृप्त-पुष्ट करने) का योग करती है, और निरत्यय (हानि-रहित) है।

च. सि. १०/६

। ॥ ६ ॥

(विरेचन में) दोषों को हरने का गुण होने पर भी, कटु, तीक्ष्ण, उष्ण आदि (गुण वाली) औषधि लेने के कारण विरेचन में कष्ट, डकार, उत्क्लेश (जी मिचलाना), अप्रिय लगना और कोष्ठ (पेट) की पीड़ा हो सकती है।

च. सि. १०/७

। ॥ ७ ॥

बालक और वृद्ध विरेचन के अयोग्य हैं, क्योंकि वे दोनों क्रमशः अप्राप्त (अभी न आए) और प्रहीन (घटे हुए) धातु-बल वाले होते हैं। उन दोनों के लिए आस्थापन ही सब प्रयोजन सिद्ध करने वाला उत्तम कर्म है।

च. सि. १०/८

। ॥ ८ ॥

(बस्ति) मनुष्यों को शीघ्र बल, वर्ण, हर्ष, मृदुता और शरीर का स्नेह (चिकनापन) देती है। वह अनुवासन, निरूह और उत्तरबस्ति, इस प्रकार तीन प्रकार की है।

च. सि. १०/९

। ॥ ९ ॥

(वह बस्ति) शाखागत वात से पीड़ित, सिकुड़े हुए, जकड़े हुए, टूटे हुए और पीड़ित (अंगों वाले) मनुष्यों के लिए, तथा मल के रुकने, अफारा, अरुचि, परिकर्ति (कतरने जैसी पीड़ा) और पीड़ा आदि में प्रशस्त (हितकर) है।

च. सि. १०/१०

। ॥ १० ॥

उष्ण (गर्मी) से पीड़ित मनुष्यों के लिए शीत (ठण्डी), तथा शीत से पीड़ित मनुष्यों के लिए सुखोष्ण (सुहाती गर्म) बस्तियाँ, जो उस (रोग) के योग्य औषधों से युक्त हों, विचार करके प्रयोग में लानी चाहिए।

च. सि. १०/११

। ॥ ११ ॥

शोधन के योग्य व्याधियों में बृंहण (पोषण करने वाली) बस्तियाँ नहीं देनी चाहिए। मेदस्वी (मोटे) लोग, और जो मनुष्य कुष्ठ तथा मेह से पीड़ित हैं, वे भी शोधन के योग्य हैं।

च. सि. १०/१२

। ॥ १२ ॥

क्षीण, क्षत (घायल), दुर्बल, मूर्च्छित, कृश (दुबले) और शुष्क (सूखे) शरीर वाले मनुष्यों को, तथा जो दोषों में निबद्ध आयु वाले हैं, उन्हें भी, शोधन करने वाली (बस्तियाँ) नहीं देनी चाहिए।

च. सि. १०/१३

। ॥ १३ ॥

वाजीकरण में, और असृक् (रक्त) तथा पित्त में, मधु, घृत और दूध से युक्त (बस्तियाँ) प्रशस्त हैं; तथा कफ और वात में तैल, मूत्र, आरनाल और लवण सहित (बस्तियाँ प्रशस्त हैं)।

च. सि. १०/१४

। ॥ १४ ॥

बस्तियों में द्रव्य प्रयोग करने चाहिए: अम्ल (खट्टा द्रव), मूत्र, दूध, सुरा और क्वाथ (काढ़े); तथा धातुओं के साथ विरोध न होने के कारण और रस की योनि (उत्पत्ति-स्थान) होने के कारण उष्ण जल

च. सि. १०/१५

। ॥ १५ ॥

सुरदारु (देवदारु), शताह्वा, एला, कुष्ठ, मधुक, पिप्पली, मधु और स्नेह; ऊर्ध्वभाग और अनुलोमभाग वाले (द्रव्य), सरसों सहित, शर्करा और लवण (भी बस्तियों में प्रयोग करने चाहिए)।

च. सि. १०/१६

। ॥ १६ ॥

बस्तियों के आवाप (मिलाए जाने वाले द्रव्य) - जो द्रव्य जिन बस्तियों में प्रयोग करने योग्य हैं और जो जिन कषायों (काढ़ों) के साथ मिलाए जाते हैं - उन्हें अब आगे कहूँगा।

च. सि. १०/१७

। ॥ १७ ॥

चिरकाल से उत्पन्न, कठोर और बलवान व्याधियों में तीक्ष्ण (बस्तियाँ), और इसके विपरीत (अवस्था) में मृदु (बस्तियाँ), प्रतिवाप और कषाय सहित अनुवासन तथा निरूह बस्तियाँ प्रयोग करनी चाहिए।

च. सि. १०/१८

। ॥ १८ ॥

अब आधे-आधे श्लोकों में, अनेक रोगों में सब प्रकार से सिद्ध (सफल), वीर्य के अनुसार समान भागों वाली और यथोचित रीति से मिलाई गई बस्तियों को सुनो।

च. सि. १०/१९

। ॥ १९ ॥

बिल्व, अग्निमन्थ, श्योनाक, काश्मर्य, पाटलि, तथा शालपर्णी, पृश्निपर्णी, दोनों बृहती और वर्धमानक

च. सि. १०/२०

। ॥ २० ॥

यव, कुलत्थ, कोल (बेर के फल) और स्थिरा - ये तीन वात में प्रशंसित हैं; ये चार स्नेहों सहित और मांस के रस से युक्त (किए जाते हैं)।

च. सि. १०/२१

। ॥ २१ ॥

नल, वञ्जुल, वानीर, शतपत्र, शैवल, मञ्जिष्ठा, सारिवा, अनन्ता, पयस्या और मधुयष्टिका (मुलेठी)

च. सि. १०/२२

। ॥ २२ ॥

चन्दन, पद्मक, उशीर और तुङ्ग - ये तीन पित्त के रोग में; शर्करा, क्षौद्र (शहद) और घृत सहित तथा दूध सहित बस्तियाँ हितकर हैं।

च. सि. १०/२३

। ॥ २३ ॥

अर्क, उसी प्रकार अलर्क, एकाष्ठीला, पुनर्नवा, हरिद्रा (हल्दी), त्रिफला, मुस्त, पीतदारु और कुटन्नट

च. सि. १०/२४

। ॥ २४ ॥

पिप्पली और चित्रक - ये तीन कफ के रोगियों में; क्षार, क्षौद्र (शहद) और गोमूत्र सहित, अधिक स्नेह से रहित (बस्तियाँ) हितकर हैं।

च. सि. १०/२५

। ॥ २५ ॥

फल, जीमूतक, इक्ष्वाकु, धामार्गवक, वत्सक, श्यामा, त्रिफला, स्थिरा, दन्ती और द्रवन्ती भी

च. सि. १०/२६

। ॥ २६ ॥

प्रकीर्या और उदकीर्या, नीलिनी तथा क्षीरिणी, सप्तला, शङ्खिनी, लोध्र और कम्पिल्लक का फल

च. सि. १०/२७

।( ॥)

ये चार, मूत्र में सिद्ध (पकाए गए) और पक्वाशय को शुद्ध करने वाले (हैं)। [अलग-अलग भी और मिलाकर भी - ये चार योग कहे गए हैं।]

च. सि. १०/२८

। ॥ २८ ॥

काकोली, क्षीरकाकोली, मुद्गपर्णी, शतावरी, विदारी, मधुयष्टी नामक (मुलेठी), तथा शृङ्गाटक (सिंघाड़ा) और कशेरुक

च. सि. १०/२९

। ॥ २९ ॥

आत्मगुप्ता (कौंच) का फल, माष (उड़द), गेहूँ सहित जौ, और जल में तथा दलदली स्थान में उत्पन्न प्राणियों का मांस - ये (द्रव्य) शुक्र और मांस को बढ़ाने वाले हैं।

च. सि. १०/३०

। ॥ ३० ॥

जीवन्ती और अग्निमन्थ, धातकी के पुष्प और वत्सक, प्रग्रह, खदिर, कुष्ठ, शमी, पिण्डीतक और जौ

च. सि. १०/३१

। ॥ ३१ ॥

प्रियङ्गु, रक्तमूली, तरुणी, स्वर्णयूथिका (सुनहरी जूही), वट आदि (वट आदि वर्ग के वृक्ष), किंशुक (पलाश) और लोध्र - ये सांग्राहिक (मल को बाँधने वाले) माने गए हैं।

च. सि. १०/३२

। ॥ ३२ ॥

परिस्राव में वृश्चीर और पुनर्नवा सहित पकाया हुआ दूध, अथवा तण्डुलीयक से युक्त आखुपरिणिका (से पकाया हुआ दूध, बस्ति के लिए)।

च. सि. १०/३३

। ॥ ३३ ॥

कालङ्कतक, काण्डेक्षु, दर्भ, पोटगल और इक्षु (गन्ने) से (सिद्ध) घी और दूध सहित (बस्ति) दाह को दूर करने वाला है; और दूसरा (बस्ति) उत्पल आदि से (सिद्ध) है।

च. सि. १०/३४

। ॥ ३४ ॥

कर्बुदार, आढकी, नीप और विदुल से दूध में पकाए गए (द्रव्यों से) बस्ति वैद्य द्वारा ठण्डी करके, मधु और शर्करा सहित दी जानी चाहिए।

च. सि. १०/३५

।( ॥)

परिकर्त में, वैसे ही श्रीपर्णी और कोविदार से उत्पन्न डण्ठलों से (सिद्ध बस्ति) [कुशल वैद्यों द्वारा दी जानी चाहिए, जो क्रिया को यथावत् जानते हैं]।

च. सि. १०/३६

। ॥ ३६ ॥

शाल्मली के डण्ठलों का दूध में पकाया हुआ और घी से युक्त बस्ति प्रवाहण में हितकारी है; वैसे ही शाल्मलिक के वेष्टों से (सिद्ध बस्ति भी हितकारी है)।

च. सि. १०/३७

। ॥ ३७ ॥

अश्वावरोहिका, काकनासा और राजकशेरुक से दूध में पकाई हुई (बस्तियाँ) अतियोग में क्षौद्र (शहद), अञ्जन और घी से युक्त होनी चाहिए।

च. सि. १०/३८

। ॥ ३८ ॥

और न्यग्रोध आदि चार (द्रव्यों) से उसी विधि से दूसरा (बस्ति); बृहती, क्षीरकाकोली, पृश्निपर्णी, शतावरी

च. सि. १०/३९

। ॥ ३९ ॥

काश्मर्य, बदरी, दूर्वा तथा उशीर और प्रियङ्गु (से), जीवादान में दूध में पकाई हुई, घी और अञ्जन से युक्त दो (बस्तियाँ)

च. सि. १०/४०

।॥ ४० ॥

(वे दोनों) बस्तियाँ वैद्य द्वारा ठण्डी और मधु तथा शर्करा सहित दी जानी चाहिए, तथा गाय, भेड़, बकरी और भैंस के दूध से जो जीवनीय (द्रव्यों) से युक्त हों।

च. सि. १०/४१

। ॥ ४१ ॥

खरगोश, एण (मृग), दक्ष, बिल्ली, भैंस, भेड़ और बकरी के ताज़े, मसले हुए रक्त से (बनी) बस्ति जीवादान में प्रशंसनीय (उत्तम) मानी जाती है।

च. सि. १०/४२

। ॥ ४२ ॥

मधूक, मधुक, द्राक्षा, दूर्वा, काश्मर्य और चन्दन से, उसी विधि से, क्षौद्र (शहद) और शर्करा सहित बस्ति दी जानी चाहिए।

च. सि. १०/४३

।।, ॥ ४३ ॥

मञ्जिष्ठा, सारिवा, अनन्ता, पयस्या और मधुक से तथा शर्करा, चन्दन, द्राक्षा, मधु, धात्रीफल और उत्पल से (सिद्ध बस्ति) रक्तपित्त में (दी जाती है), और प्रमेह में सोमवल्क से बना कषाय (काढ़ा) (दिया जाता है)।

च. सि. १०/४४

। ॥ ४४ ॥

गुल्म, अतिसार, उदावर्त, स्तम्भ, सङ्कुचित आदि में, पूरे शरीर या एक अंग के रोगों में और इस प्रकार के (अन्य) रोगों में भी

च. सि. १०/४५

। ॥ ४५ ॥

कुशल वैद्य, पहले बताई गई विधि से अलग-अलग प्रकार के योग बनाता हुआ, अपने-अपने औषधों से सिद्ध बस्तियाँ दे।

च. सि. १०/४६

- । ॥ ४६ ॥

इस विषय में श्लोक - वात आदि (दोषों) के तीन त्रिक (तीन-तीन बस्तियों के समूह) हैं, और तीन अन्य चतुष्क (चार-चार बस्तियों के समूह) हैं; ये पक्वाशय की शुद्धि के लिए, वृष्य तथा संग्राहक (मल को रोकने वाले) हैं।

च. सि. १०/४७

। ॥ ४७ ॥

परिस्राव में, तथा दाह में, परिकर्त में, प्रवाहण में और अतियोग में दो-दो (बस्तियाँ) मानी गई हैं; जीवादान में तीन

च. सि. १०/४८

। ॥ ४८ ॥

रक्तपित्त में दो और मेह में (भी दो); इकतीस और सात, वे (बस्तियाँ); जो सुलभ हैं, जिनमें औषध थोड़ी और क्लेश (कष्ट) थोड़ा है, वे बस्तियाँ अत्यन्त गुणवान हैं।

च. सि. १०

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संस्कार किए गए (संशोधित) तन्त्र में, जिसका (यह भाग) अप्राप्त था और जो दृढबल द्वारा पूर्ण किया गया, सिद्धिस्थान में बस्तिसिद्धि नामक दसवाँ अध्याय (समाप्त हुआ)। १०।