॥ १ ॥
अब हम त्रिमर्मीय सिद्धि (तीन मर्मों से सम्बन्धित अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
अध्याय ९
तीन मर्म
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यह चरक संहिता के सिद्धिस्थान का नवाँ अध्याय है। इसका नाम त्रिमर्मीय सिद्धि है, यानी तीन मर्मों से जुड़ा अध्याय। शरीर में एक सौ सात मर्म बताए गए हैं, यानी ऐसे नाज़ुक स्थान जहाँ चोट या रोग का असर जीवन पर सबसे अधिक पड़ता है। इनमें हृदय, शिर और बस्ति (मूत्राशय का स्थान) सबसे प्रधान हैं, और अध्याय का नाम इन्हीं तीन पर है। भगवान् आत्रेय अपने शिष्य अग्निवेश को यह उपदेश देते हैं।
अध्याय के आरम्भ में आत्रेय बताते हैं कि ये तीन मर्म क्यों प्रधान हैं: हृदय में प्राण, अपान, बुद्धि और चेतना टिके हैं, शिर में इन्द्रियाँ और उनके स्रोत हैं, और बस्ति मूत्र को थामने वाला तथा जल ले जाने वाले स्रोतों का आधार है। इनमें से किसी एक के भी टूटने से शरीर शीघ्र नष्ट हो सकता है, इसलिए इनकी रक्षा बाहरी चोट से और वात आदि दोषों से करने की बात कही गई है। वात को प्राण का मूल और दूसरे दोषों को उभारने वाला कहा गया है, और उसे शान्त करने में बस्ति कर्म को सबसे बढ़कर माना गया है।
इसके बाद अध्याय हृदय, शिर और बस्ति से जुड़े रोगों के वर्णन की ओर बढ़ता है। पहले वात के कुपित होकर ऊपर चढ़ने से होने वाला रोग अपतन्त्रक आता है, और तन्द्रा का वर्णन है। फिर मूत्र के तेरह दोष एक-एक करके, उनके लक्षणों के साथ, गिनाए जाते हैं। उनके साथ उत्तरबस्ति की विधि बताई गई है: उसकी नली, स्नेह की मात्रा, रोगी की तैयारी और स्त्रियों के लिए अलग नियम। अन्त में सिर के रोग आते हैं, जैसे शङ्खक, अर्धावभेदक, सूर्यावर्त, अनन्तवात और सिर का कम्पन, और उन्हीं के साथ नस्तःकर्म के पाँच भेद, उसके तीन प्रयोजन और उसे करने की विधि बताई जाती है।
पाठक के लिए ध्यान देने की बात यह है कि इस अध्याय में चरक संहिता मर्मों की रक्षा तीन बातों में गिनती है: पीड़ा देने वाले कारणों से बचना, स्वस्थ व्यक्ति के आचरण का पालन करना, और हुई पीड़ा को दूर करना। उत्तरबस्ति और नस्तःकर्म दो ऐसी विधियाँ हैं जिन पर यह अध्याय विशेष रूप से ठहरता है। अध्याय के अन्त के श्लोक भी यही सार देते हैं कि तीन मर्म प्रधान हैं और उनके रोगों के साथ ये दोनों विधियाँ यहाँ कही गई हैं। यहाँ गिनाए गए योग और विधियाँ ग्रन्थ का कथन हैं, हमारी ओर से कोई चिकित्सा-सलाह नहीं।
तत्र श्लोकौ-त्रीणि यस्मात् प्रधानानि मर्माण्यभिहतेषु च।तेषु लिङ्गं चिकित्सां च रोगभेदाश्च सौषधाः॥
श्लोक ११८ →इस विषय में दो श्लोक हैं - क्योंकि तीन मर्म प्रधान हैं, और उन पर चोट लगने पर, उनके विषय में लक्षण, चिकित्सा और औषधों सहित रोगों के भेद
विधिरुत्तरबस्तेश्च नस्तःकर्मविधिस्तथा।सव्यापद्भेषजं सिद्धौ मर्माख्यायां प्रकीर्तितम्॥
श्लोक ११९ →उत्तरबस्ति की विधि तथा नस्य-कर्म की विधि, और व्यापदों (उपद्रवों) व उनकी औषधों सहित (वर्णन) सिद्धिस्थान में मर्म नामक (अध्याय) में कहा गया है।
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।
अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।
चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।
सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।
अर्थ: कारण।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।
अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।
शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।
अर्थ: रोग दूर करने का साधन।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।
शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।
चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।
चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।
अर्थ: औषध, उपचार।
चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।
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॥ १ ॥
अब हम त्रिमर्मीय सिद्धि (तीन मर्मों से सम्बन्धित अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।
!। , । , ; , ॥ ३ ॥
हे अग्निवेश! इस शरीर में सात अधिक सौ (एक सौ सात) मर्म हैं, जो स्कन्ध और शाखाओं (हाथ-पैर) में आश्रित हैं। उनमें से किसी एक के भी पीड़ित होने पर अधिक पीड़ा होती है, क्योंकि चेतना के सम्बन्ध में विशेषता होती है। उनमें शाखाओं में स्थित मर्मों से स्कन्ध में स्थित मर्म अधिक भारी (गम्भीर) हैं, क्योंकि शाखाएँ उन्हीं पर आश्रित हैं; और स्कन्ध में स्थित मर्मों में भी हृदय, बस्ति और शिर (अधिक गम्भीर) हैं, क्योंकि ये शरीर के मूल हैं।
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उनमें हृदय में दस धमनियाँ, प्राण, अपान, नभ (आकाश), बुद्धि, चेतना और महाभूत प्रतिष्ठित हैं, जैसे पहिये की नाभि में आरे; शिर में इन्द्रियाँ और इन्द्रियों तथा प्राण को वहन करने वाले स्रोत आश्रित हैं, जैसे सूर्य में किरणें; और बस्ति तो स्थूल गुद, मुष्क, सेवनी, शुक्र और मूत्र को वहन करने वाली नाडी(ली)यों के बीच मूत्र को धारण करने वाला है, और जल वहन करने वाले सब स्रोतों का आधार है, जैसे नदियों का समुद्र; तथा मर्म नामक, उन (तीनों) में जड़ रखने वाले बहुत-से स्रोतों से यह शरीर व्याप्त है, जैसे आकाश सूर्य की किरणों से।
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इन तीनों में से किसी एक के भी भेदन (टूटने) से शीघ्र ही शरीर का भेद (विनाश) हो सकता है; आश्रय के नाश से आश्रित का भी विनाश होता है; और उनके आघात से अत्यन्त भयंकर रोगों की उत्पत्ति होती है; इसलिए इनकी विशेष रूप से बाहरी चोट से और वात आदि (दोषों) से रक्षा करनी चाहिए।
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उन (तीन मर्मों) में हृदय पर चोट लगने पर खाँसी, श्वास, बल का क्षय, कण्ठ का सूखना, क्लोम का खिंचना, जीभ का बाहर निकलना, मुख और तालु का सूखना, अपस्मार, उन्माद, प्रलाप, चित्त का नाश आदि (लक्षण) हो सकते हैं; शिर पर चोट लगने पर गर्दन की अकड़न, अर्दित, आँखों का घूमना, मोह, अंगों का ऐंठना, चेष्टा का नाश, खाँसी, श्वास, जबड़े का जकड़ना, गूँगापन और हकलाना, आँखों का मुँद जाना, गाल का फड़कना, जम्हाई, लार बहना, स्वर की हानि, मुख का टेढ़ा होना आदि (लक्षण) हो सकते हैं; बस्ति पर चोट लगने पर अधोवायु, मूत्र और मल का रुकना, वङ्क्षण, मेहन और बस्ति में शूल, कुण्डल, उदावर्त, गुल्म, वातष्ठीला, उपस्तम्भ तथा नाभि, कुक्षि, गुद और श्रोणि का जकड़ना आदि (लक्षण) हो सकते हैं; वात आदि (दोषों) से ग्रस्त होने पर इन (मर्मों) के लक्षण, क्रिया और विधि सहित, चिकित्सा (स्थान) में कहे जा चुके हैं।
, , , । ॥ ७ ॥
किन्तु ये (तीन मर्म) विशेष रूप से अनिल (वात) से रक्षा करने योग्य हैं, क्योंकि अनिल पित्त और कफ को उभारने में कारण है और प्राण का मूल भी है; वह बस्ति कर्म से सबसे अधिक साध्य (शान्त होने योग्य) है, इसलिए मर्मों की रक्षा के लिए बस्ति के समान कोई कर्म नहीं है। इस विषय में विमान (स्थान) में बताए गए आस्थापन के छह स्कन्ध और यहाँ बताए गए अनुवासन के दो स्कन्ध, इन बस्तियों को बुद्धि से विचार करके महामर्मों की रक्षा के लिए प्रयोग करे, और वातव्याधि की चिकित्सा का भी (प्रयोग करे)।
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और भी, हृदय के (वात से) पीड़ित होने पर हींग का चूर्ण, किसी एक नमक के चूर्ण से मिलाकर, मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू) के रस से अथवा किसी अन्य हृदय को प्रिय खट्टे (द्रव) से पिलाए; पीने के लिए शर्करा सहित स्थिरा आदि पञ्चमूली का रस, बिल्व आदि पञ्चमूल के रस में सिद्ध की हुई यवागू, और हृद्रोग में बताया गया कर्म (करे)। सिर के वात से पीड़ित होने पर अभ्यङ्ग, स्वेदन, उपनाह, स्नेहपान, नस्तःकर्म, अवपीडन और धूम आदि (करे)। बस्ति के (वात से पीड़ित होने पर) कुम्भीस्वेद, वर्तियाँ, श्यामा आदि के साथ गोमूत्र में सिद्ध किया हुआ निरूह, बिल्व आदि के साथ सुरा में सिद्ध किया हुआ (निरूह), शर, काश, इक्षु, दर्भ और गोक्षुरक की जड़ों से पकाए दूधों से तथा त्रपुस, एर्वारु, खराश्वा के बीज, यव, ऋषभक और वृद्धि के कल्क से बनाया हुआ निरूह, पीतदारु से सिद्ध तेल से अनुवासन, और विरेचन के लिए तैल्वक घृत; तथा शतावरी, गोक्षुरक, बृहती, कण्टकारिका, गुडूची, पुनर्नवा, उशीर, मधुक, दोनों सारिवा, लोध्र, श्रेयसी, कुश और काश की जड़ों के कषाय तथा चार गुने दूध से युक्त, और बला, वृष, ऋषभक, खराश्वा, उपकुञ्चिका, वत्सक, त्रपुस, एर्वारु के बीज, शितिवारक, मधुक, वचा, शतपुष्पा, अश्मभेदक, वर्षाभू और मदनफल के कल्क से सिद्ध तेल, उत्तरबस्ति अथवा निरूह के रूप में, शुद्ध, स्निग्ध और स्विन्न (स्वेदित) व्यक्ति के बस्तिशूल और मूत्र के विकारों को हरने वाला है - ऐसा (कहा गया है)।
- । ॥ ९ ॥
इस विषय में श्लोक हैं - (प्राण) मनुष्यों के हृदय, सिर और बस्ति में स्थित हैं। इसलिए उनकी रक्षा में सदा प्रयत्न करना चाहिए।
। ॥ १० ॥
आबाध (पीड़ा देने वाले कारणों) से सदा बचना, स्वस्थ व्यक्ति की चर्या का पालन करना, और उत्पन्न हुई पीड़ा का निवारण करना - यह मर्मों की रक्षा है।
। ॥ ११ ॥
इसके आगे, त्रिमर्मीय चिकित्सा (चिकित्सास्थान के अध्याय) में मर्म से उत्पन्न जो विकार नहीं कहे गए, उनमें से कुछ को औषधों सहित कहूँगा।
। ॥ १२ ॥
वायु अपने कुपित करने वाले कारणों से क्रुद्ध होकर अपने स्थान से ऊपर की ओर जाता है; हृदय को पीड़ित करता हुआ (वहाँ) पहुँचकर, सिर और दोनों शङ्ख (कनपटियों) को भी पीड़ित करता हुआ
।( ॥) ॥ १३ ॥
(वह रोगी) धनुष की तरह अंगों को झुकाता है, उन्हें इधर-उधर फेंकता है और मूढ़ (बेहोश) हो जाता है। (अंगों को झुकाता और फेंकता है तथा श्वास को रोकता है।) वह कठिनाई से साँस लेता है, उसकी आँखें स्तब्ध (जड़) हो जाती हैं और फिर वह आँखें मूँद लेने वाला हो जाता है।
। ॥ १४ ॥
वह कबूतर की तरह कूजता है, संज्ञाहीन हो जाता है - वह अपतन्त्रक है। दृष्टि को स्तब्ध करके और संज्ञा (चेतना) को नष्ट करके वह कण्ठ से कूजता है।
। ॥ १५ ॥
जब हृदय (कफ-वात की रुकावट से) मुक्त हो जाता है तब मनुष्य स्वस्थ हो जाता है, और जब वह फिर घिर जाता है तब मोह को प्राप्त होता है। कुछ आचार्य वायु से होने वाले इस भयंकर रोग को अपतानक कहते हैं।
। ॥ १६ ॥
कफ और वात से रुके हुए उसके श्वसन (साँस के मार्ग) को तीक्ष्ण प्रधमन (नाक में फूँके जाने वाले चूर्ण) से खोलना चाहिए। उन (मार्गों) के खुल जाने पर वह संज्ञा (होश) पा लेता है।
। ॥ १७ ॥
मरिच (काली मिर्च), शिग्रु (सहजन) के बीज, विडङ्ग और फणिज्झक - इन्हें बारीक चूर्ण करके शिरोविरेचन (सिर का शोधन करने वाले नस्य) के रूप में देना चाहिए।
। ॥ १८ ॥
तुम्बुरु, अभया (हरीतकी), हींग, पौष्कर और तीन लवण - इन्हें जौ के काढ़े के जल के साथ हृद्ग्रह और अपतन्त्रक में पीना चाहिए।
। ॥ १९ ॥
हींग, अम्लवेतस, शुण्ठी (सोंठ), सौवर्चल (लवण) और दाडिम (अनार) के साथ वात-कफ को नष्ट करने वाला (योग) पीना चाहिए; और यह कर्म हृदय रोग को दूर करने वाला तथा हितकर है।
। ॥ २० ॥
उसके लिए शोधन करने वाली तीक्ष्ण बस्तियाँ बिलकुल हितकर नहीं हैं। सौवर्चल, अभया और व्योष से सिद्ध (पकाया हुआ) घृत उसके लिए हितकर है।
। ॥ २१ ॥
मधुर, स्निग्ध और भारी अन्न के सेवन से, चिन्ता से, श्रम से, शोक से और रोग के लगातार बने रहने से वायु द्वारा प्रेरित (उभारा हुआ) कफ
। ॥ २२ ॥
जब यह (कफ) हृदय पर आक्रमण करके हृदय के आश्रित ज्ञान आदि को ढक लेता है, तब तन्द्रा उत्पन्न होती है।
। ॥ २३ ॥
हृदय में व्याकुलता, वाणी, चेष्टा (शारीरिक क्रिया) और इन्द्रियों में भारीपन, तथा मन और बुद्धि की अप्रसन्नता - ये तन्द्रा के लक्षण माने गए हैं।
। ॥ २४ ॥
उसमें कफ को नष्ट करने वाला उपचार करना चाहिए: शोधन और शमन (के उपाय), व्यायाम, रक्तमोक्षण और कटु-तिक्त (रस वाला) भोजन।
। ॥ २५ ॥
मूत्रौकसाद, जठर, कृच्छ्र, उत्सङ्ग और संक्षय, मूत्रातीत, अनिल से होने वाली अष्ठीला, वातबस्ति और उष्णमारुत,
। ॥ २६ ॥
वातकुण्डलिका, ग्रन्थि, विड्घात और बस्तिकुण्डल - ये तेरह मूत्र के दोष हैं। उन्हें लक्षणों के अनुसार सुनो।
। ॥ २७ ॥
जब पित्त, कफ या दोनों ही बस्ति में वायु द्वारा संहत (अवरुद्ध) हो जाते हैं, तब (रोगी) लाल, पीला और गाढ़ा मूत्र त्यागता है
। ॥ २८ ॥
(वह मूत्र) जलन सहित हो, या सफेद और गाढ़ा हो, या सभी लक्षणों से युक्त हो, तो उसे मूत्रौकसाद जाने और पित्त तथा कफ को हरने वाले उपायों से उसे जीते (शान्त करे)।
। ॥ २९ ॥
रोकने से रुका हुआ और वात से उलटी दिशा में लौटाया हुआ मूत्र जब पेट को भर देता है, तब उसके कारण पीड़ा होती है।
। ॥ ३० ॥
अपचन तथा मूत्र और मल के रुकने से उसे मूत्रजठर कहे, और उसमें मूत्र को निकालने वाली चिकित्सा का प्रयोग करे।
। ॥ ३१ ॥
हिङ्गु से आरम्भ कर आगे दुगुनी-दुगुनी मात्रा वाला चूर्ण त्रिमर्मीय (अध्याय) में बताया गया है; वह मूत्रोदर, आनाह तथा गुदा और लिङ्ग के आध्मान को नष्ट करता है।
। ॥ ३२ ॥
मूत्र त्याग कर चुके व्यक्ति का, मैथुन के कारण वात से विचलित होकर अपने स्थान से च्युत हुआ शुक्र, मूत्र से पहले या बाद में कष्ट के साथ बहता है; उसे कृच्छ्र कहते हैं।
। ॥ ३३ ॥
स्रोत की विकृति और वात के आक्षेपों (झटकों) से थोड़ा मूत्र रुका रहता है, और बाद में मणिसन्धि (शिश्न के अग्रभाग की सन्धि) पर बहता है; वह पीड़ारहित होता है, या अत्यन्त पीड़ा वाला
। ॥ ३४ ॥
वह मूत्रोत्सङ्ग है: (मूत्र) रुक-रुक कर आता है और शेष मूत्र से लिङ्ग भारी रहता है। वात के कारण वात के लक्षणों वाला रूप होता है। मूत्र के सूख जाने पर संक्षय (होता है)।
। ॥ ३५ ॥
देर तक मूत्र रोकने वाले का मूत्र जल्दी नहीं निकलता, या मूत्र करते हुए धीरे-धीरे निकलता है; उसे मूत्रातीत कहा जाता है।
। ॥ ३६ ॥
वायु बस्ति और गुदा को फुलाता हुआ और (मार्ग) रोककर, चल (हिलने वाली) और उभरी हुई, तीव्र पीड़ा वाली, मूत्र तथा मल के मार्ग को रोकने वाली अष्ठीला उत्पन्न कर देता है।
। ॥ ३७ ॥
मूत्र रोकने वाले की बस्ति में रोकने के कारण वायु कुपित हो जाती है; मूत्र के रुकने, पीड़ा और खुजली से (युक्त) वह वातबस्ति कहलाता है।
। ॥ ३८ ॥
उष्णवात में, गर्मी से गर्म मूत्र को सुखाता हुआ वात, लाल-पीला (मूत्र) कष्ट से निकालता है; और (रोगी) बस्ति तथा उपस्थ में पीड़ा और जलन वाला होता है।
। ॥ ३९ ॥
गति के रुकने से वह वायु, मूत्र के स्थान और मार्ग में पलटी हुई, मूत्र-सम्बन्धी विकृत वायु, टूटी और मुड़ी हुई कुण्डली के रूप में
। ॥ ४० ॥
(वह) अकड़न, टूटने जैसी पीड़ा, भारीपन और ऐंठन के साथ मूत्र को रोक देता है; और तीव्र पीड़ा तथा मूत्र और मल के रुकने से वह वातकुण्डलिका कहलाती है।
। ॥ ४१ ॥
वात और कफ से दूषित हुआ रक्त बस्ति के द्वार पर अत्यन्त कठोर (दारुण) गाँठ बना देता है; (तब रोगी) उस (गाँठ) से ढके हुए मूत्र को कठिनाई से छोड़ता है।
। ॥ ४२ ॥
पथरी (अश्मरी) के समान शूल वाले उस (रोग) को रक्तग्रन्थि कहते हैं। रूक्ष और दुर्बल (व्यक्तियों) में जब वात के द्वारा ऊपर की ओर पलटा हुआ मल
। ॥ ४३ ॥
तब (वह मल) मूत्र के स्रोत (मार्ग) में जा पहुँचता है, और मल से मिला हुआ, मल जैसी गन्ध वाला (मूत्र) मनुष्य कठिनाई से करता है; इसे विड्विघात बताना चाहिए।
। ॥ ४४ ॥
तेज चलने, लम्बा रास्ता लाँघने, परिश्रम, चोट और दबाव से बस्ति अपने स्थान से उखड़कर फूली हुई, गर्भ (गर्भवती) के समान रहती है।
। ॥ ४५ ॥
शूल, फड़कन और जलन से पीड़ित (रोगी) बूँद-बूँद (मूत्र) टपकाता है; और दबाए जाने पर धार छोड़ता है, तथा अकड़न, ऐंठन और पीड़ा वाला होता है।
। ॥ ४६ ॥
इसे बस्तिकुण्डल कहते हैं; यह भयंकर है, शस्त्र और विष के समान है, वात की प्रबलता वाला है, और प्रायः अज्ञानियों (अबुद्धियों) से रोका नहीं जा सकता।
। ॥ ४७ ॥
उसमें पित्त से युक्त होने पर जलन, शूल और मूत्र का रंग बिगड़ना होता है; कफ से (युक्त होने पर) भारीपन और सूजन होती है, तथा मूत्र चिकना, गाढ़ा और सफेद (होता है)।
। ॥ ४८ ॥
जिस बस्ति का मुख कफ से रुँध गया हो और जो पित्त से बढ़ी हुई हो, वह सिद्ध (ठीक) नहीं होती; जिसका मुख भ्रान्त (टेढ़ा-मेढ़ा) नहीं हुआ है वह साध्य है, परन्तु वह नहीं जो कुण्डली के आकार में मुड़ गई हो।
। ॥ ४९ ॥
बस्ति के कुण्डली हो जाने पर हृदय में मोह (घबराहट, चक्कर) और श्वास (साँस की कठिनाई) भी हो सकती है; दोष की अधिकता देखकर इन (लक्षणों) को मूत्रकृच्छ्र को दूर करने वाले (उपायों) से जीतना चाहिए।
। ॥ ५० ॥
सभी (इन रोगियों) को बस्ति और उत्तरबस्ति दिलानी चाहिए; उत्तरबस्ति का पुष्पनेत्र सोने का और चिकना हो
। ॥ ५१ ॥
जात्य अश्वहन के डण्ठल के समान (मोटा), गाय की पूँछ के आकार वाला, अथवा चाँदी का, सरसों जितने छेद वाला, दो कर्ण वाला, बारह अंगुल (लम्बा)
। ॥ ५२ ॥
बकरे की बस्ति (मूत्राशय) से युक्त उस (नली) से आधा पल स्नेह पहुँचाना चाहिए; अथवा आयु के भेद के अनुसार स्नेह की मात्रा को घटा-बढ़ाकर (पहुँचाए)।
। ॥ ५३ ॥
नहाए हुए, भोजन कर चुके, रस अथवा दूध के साथ (भोजन किए), मल-मूत्र का वेग निकाल चुके (रोगी का), घुटने के बराबर ऊँचे मुलायम आसन (पीढ़े) पर
। ॥ ५४ ॥
सीधे और आराम से बैठे हुए (रोगी) के, शिश्न (मेढ्र) के उत्तेजित होने पर, घी से लिपटी हुई शलाका से मार्ग को टटोलकर, यदि (वह शलाका) बिना रुके चली जाए
। ॥ ५५ ॥
इसके बाद शेफ (लिंग) के माप के अनुसार पुष्पनेत्र (पुष्प के आकार के मुख वाली नली) को भीतर प्रविष्ट कराए; और गुदा (की बस्ति) के समान मूत्रमार्ग से सेवनी के साथ-साथ आगे ले जाए।
। ॥ ५६ ॥
बहुत भीतर गया हुआ (नेत्र) बस्ति को हानि पहुँचाता है; (नेत्र) कम गया हो तो स्नेह (भीतर) नहीं जाता। (स्नेह को) सुखपूर्वक दबाकर (पहुँचाकर) बिना हिलाए नेत्र को ही बाहर निकाल ले।
। ॥ ५७ ॥
(स्नेह के) लौट आने पर दूसरी और तीसरी (बस्ति) भी दिलवाए। और जो (स्नेह) नहीं लौटता, वह उपेक्षा करने योग्य है, तथा रात भर टिके हुए (के स्नेह) के लिए भी (यही है)।
। ॥ ५८ ॥
पिप्पली, लवण, अगारधूम, अपामार्ग और सर्षप के साथ; वार्ताकु के रस, निर्गुण्डी, शम्पाक और सहाचर के साथ
। ॥ ५९ ॥
गोमूत्र और अम्ल (खट्टे द्रव) में पीसे हुए, गुड़ सहित (इन द्रव्यों) से वर्ति बनाकर भीतर प्रविष्ट कराए: आगे के भाग में सर्षप (सरसों) के आकार की, और पीछे के आधे भाग में माष (उड़द) के माप की।
। ॥ ६० ॥
(वह वर्ति) नेत्र के बराबर लम्बी, घी से चुपड़ी, कोमल और न टूटने वाली हो; मूत्र की नाड़ी (मूत्रमार्ग) में नेत्र के समान, और गुदा में अंगूठे के माप की (हो)।
। ॥ ६१ ॥
स्नेह के लौट आने पर उन दोनों (वर्तियों) से आनुवासनिक विधि (अपनाई जाए); और परिहार (सावधानियाँ), व्यापत् (उपद्रव) सहित, तथा सम्यक् दिए जाने के लक्षणों सहित (जानने चाहिए)।
। ॥ ६२ ॥
स्त्रियों में आर्तव (रजस्राव) के समय वह कर्म (उपचार) करे; क्योंकि तब गर्भासना (गर्भ का स्थान) खुली होती है और स्नेह को सुखपूर्वक ग्रहण कर लेती है।
। ॥ ६३ ॥
तब मारुत (वात) के जीत लिए जाने पर योनि शीघ्र गर्भ को धारण कर लेती है; बस्ति से उत्पन्न विकारों में और योनि के विभ्रंश (खिसकने) से उत्पन्न (विकारों) में भी,
। ॥ ६४ ॥
तीव्र योनि-शूलों में, योनि के रोगों में, असृग्दर (रक्तप्रदर) में, मूत्र के न निकलने पर और बूँद-बूँद निकलने पर भी,
। ॥ ६५ ॥
(तब) अपने-अपने औषध से संस्कारित उत्तरबस्ति दे। स्त्रियों के लिए पुष्पनेत्र का माप दस अंगुल है।
। ॥ ६६ ॥
मूत्र के स्रोत (मार्ग) की परिधि जितना, मुद्ग (मूँग) के (दाने जितने) स्रोत का अनुसरण करने वाला (छिद्र वाला); नारियों के अपत्यमार्ग में चार अंगुल (भीतर) किया जाए।
। ॥ ६७ ॥
मूत्रमार्ग में दो अंगुल, और बालिका के लिए एक अंगुल (किया जाए)। उत्तान (पीठ के बल) सोई हुई (स्त्री) की दोनों जाँघों को ठीक से सिकोड़कर,
। ॥ ६८ ॥
तब इसके लिए अनुवंश (मेरुदण्ड की दिशा) में गया हुआ नेत्र सुखपूर्वक भीतर प्रविष्ट कराए; और स्नेह की मात्राएँ दिन-रात में दो, तीन या चार बार दे।
, । ॥ ६९ ॥
हर बार बस्ति दी जाने पर वर्ति अधिक मोटी होनी चाहिए। तीन रात कर्म करे, और स्नेह की मात्रा बढ़ाए।
। ॥ ७० ॥
इसी विधि से तीन दिन बाद फिर (वही) कर्म करे। इसके बाद सिर के रोगों का कोई एक भेद कहा जाएगा।
। ॥ ७१ ॥
शङ्ख प्रदेश (कनपटी) में कुपित हुए और परस्पर मिले हुए रक्त, पित्त और वात तीव्र पीड़ा, जलन और लालिमा वाली भयंकर सूजन उत्पन्न करते हैं।
। ॥ ७२ ॥
वह (रोग) विष के समान वेग वाला होकर सिर और गले को शीघ्र रोककर तीन रात में प्राण हर लेता है; नाम से वह शङ्खक कहलाता है।
। ॥ ७३ ॥
यदि (रोगी) तीन दिन से अधिक जीवित रहे, तो (रोग की कठिनाई) बताकर चिकित्सा करे: शिरोविरेचन, सेक आदि सब, और जो भी वीसर्प को नष्ट करने वाला (उपचार) है।
। ॥ ७४ ॥
रूखे भोजन और अध्यशन से, पुरवाई हवा, ओस और मैथुन से, तथा वेगों को रोकने, थकान और व्यायाम से कुपित हुआ वात
।॥ ७५ ॥
(वह वात) अकेला अथवा कफ सहित सिर का आधा भाग पकड़कर तब मन्या, भौंह, कनपटी, कान, आँख और ललाट के आधे भाग में अत्यन्त पीड़ा
। ॥ ७६ ॥
शस्त्र और अरणि के समान तीव्र (पीड़ा) करता है; वह अर्धावभेदक है। अत्यन्त बढ़ जाने पर वह नेत्र अथवा कान को नष्ट कर देता है।
। ॥ ७७ ॥
चतुःस्नेह की उत्तम मात्रा, सिर और शरीर का विरेचन, नाडीस्वेद, पुराना घी, बस्तिकर्म और अनुवासन
। ॥ ७८ ॥
उपनाह, शिरोबस्ति और दहन यहाँ प्रशस्त माने जाते हैं; तथा प्रतिश्याय और शिरोरोग में जो चिकित्सा बताई गई है (वह भी)।
। ॥ ७९ ॥
वेग रोकने, अजीर्ण आदि कारणों से बिगड़े हुए रक्त और वात मस्तिष्क को दूषित करते हैं; और उन दोनों से दूषित तथा मिला हुआ वह (मस्तिष्क)
। ॥ ८० ॥
सूर्योदय होने पर किरणों की गर्मी से द्रव धीरे-धीरे बहने लगता है; तब दिन में सिर का दर्द होता है और दिन के बढ़ने के साथ बढ़ता जाता है
। ॥ ८१ ॥
दिन के अन्त में, तब मस्तिष्क में (द्रव) जम जाने पर (दर्द) शान्त हो जाता है; वह यहाँ सूर्यावर्त होता है; (उसमें) भोजन के बाद का घी
। ॥ ८२ ॥
सिर और शरीर का विरेचन, सिर पर तीन स्नेहों का धारण, जाङ्गल (मांस) से उपनाह और घी तथा दूध से सेचन
। ॥ ८३ ॥
मोर, तित्तिर, लावा आदि (के मांस) के साथ पकाए दूध से निकला घी नस्य हो; (अथवा) जीवनीय द्रव्यों और आठ गुने दूध से सिद्ध (घी)।
(।) ॥ ८४ ॥
(उपवास, अत्यधिक शोक, अति रूखे, ठण्डे और थोड़े भोजन से) बिगड़े हुए तीनों दोष मन्या और गर्दन के पिछले भाग में पीड़ा
। ॥ ८५ ॥
(वे दोष) तीव्र (वेदना) करते हैं, और वह (वेदना) आँख, भौंह और कनपटियों में ठहरती है। (वे) गाल और बगल (पार्श्व) का फड़कना, नेत्र रोग और हनुग्रह (जबड़े का जकड़ जाना) भी (करते हैं)।
। ॥ ८६ ॥
वह अनन्तवात (कहलाता) है; उसे (वैद्य) सिरा और अर्कावर्त को नष्ट करने वाले (उपायों) से नष्ट करे। रूक्ष आदि (कारणों) से कुपित हुआ वात सिर का कम्पन उत्पन्न करता है।
। ॥ ८७ ॥
उस (शिरःकम्प) में अमृता, बला, रास्ना, महाश्वेता और अश्वगन्धा से (सिद्ध) वातनाशक स्नेह-स्वेद आदि (उपचार) उत्तम हैं, तथा नस्य और तर्पण भी।
। ॥ ८८ ॥
शास्त्र को जानने वाला (वैद्य) शिर के रोगों में नस्तःकर्म (नाक से किया जाने वाला कर्म) करे। क्योंकि नाक शिर का द्वार है; उसी के द्वारा वह (औषध) उसमें फैलकर उन (रोगों) को नष्ट करती है।
। ॥ ८९ ॥
नावन, अवपीड, ध्मापन, धूम और प्रतिमर्श - इस प्रकार नस्तःकर्म को पाँच प्रकार का जानना चाहिए।
। ॥ ९० ॥
नावन दो प्रकार का माना गया है - स्नेहन और शोधन। अवपीड भी दो प्रकार का माना गया है - शोधन और स्तम्भन।
। ॥ ९१ ॥
ध्मापन चूर्ण का (नाक में फूँकना) है; वह निश्चय ही देह के स्रोतों का शोधन करने वाला है। धूम तीन प्रकार का जानना चाहिए, जो पहले कहा जा चुका है: शमन आदि।
। ॥ ९२ ॥
प्रतिमर्श स्नेह (रूप) होता है, निर्दोष और दोनों प्रयोजनों को करने वाला। इस प्रकार वह कर्म तीन प्रकार का है: रेचन, तर्पण और शमन।
। ॥ ९३ ॥
स्तम्भ, सुप्ति, गुरुत्व आदि जो कफ से होने वाले शिर के रोग हैं, उनमें शिरोविरेचन नस्तःकर्म उत्तम माना जाता है।
। ॥ ९४ ॥
और जो वात-प्रधान रोग हैं, शिर का कम्पन, अर्दित आदि, उनमें शिर का तर्पण करने वाला नस्तःकर्म उत्तम माना जाता है।
। ॥ ९५ ॥
रक्तपित्त आदि रोगों में शमन (प्रकार का) नस्य इष्ट है। तथा योग्य (रोगों) में ध्मापन और धूमपान उत्तम माना जाता है।
( ।) ॥ ९६ ॥
(वैद्य दोष आदि को भली-भाँति देखकर ही ठीक से (नस्तःकर्म) कराए।) फल आदि जो औषध शिर का विरेचन करने वाले कहे गए हैं
। ॥ ९७ ॥
उनका चूर्ण बनाए; उससे विरेचन करने वाला स्नेह पकाए। और मधुर स्कन्ध (वर्ग) में जो औषध कही गई है, उससे तर्पण (स्नेह पकाए)।
। ॥ ९८ ॥
विधि को जानने वाला वैद्य स्नेह को सिद्ध करके नाक से (नस्य) करे: प्राक्सूर्य या मध्यसूर्य (के समय) में, और जिसने पहले आवश्यक (कर्म) कर लिए हों उसके
। ॥ ९९ ॥
उत्तान (सीधा) लेटे हुए, अच्छी तरह बिछी शय्या पर सुख से, थोड़ा-थोड़ा सिर को लटकाए हुए और थोड़ा-थोड़ा पैरों को ऊँचा किए हुए (के नासापुट में)
। ॥ १०० ॥
बुद्धिमान् वैद्य नाक के छिद्र में तर्पण करने वाला स्नेह डाले। जिसका सिर नीचे की ओर झुका हुआ न हो, उसका नस्य सिर तक नहीं पहुँचता।
। ॥ १०१ ॥
जिसका सिर बहुत नीचे झुका हो, उसका नस्य मस्तुलुङ्ग (मस्तिष्क) में ही अटक जाता है। इसलिए इस प्रकार लेटे हुए (रोगी) के (सिर की) शुद्धि के लिए सिर का स्वेदन करे।
। ॥ १०२ ॥
(सिर का) स्वेदन करके, बाएँ हाथ के अङ्गूठे के पर्व (जोड़) से नाक को ऊपर उठाकर, दाहिनी ओर, हे नाथ, दोनों ओर समान रूप से (स्नेह) करे।
। ॥ १०३ ॥
नलिका से अथवा रुई के फाहे से भी विधि के अनुसार नाक में स्नेह डाले। (स्नेह) डाल दिए जाने पर फिर स्वेदन करे और बार-बार (उसे) ऊपर खींचे।
। ॥ १०४ ॥
उस स्नेह को कफ के साथ (खींचे); इस प्रकार स्नेह (सिर में) नहीं ठहरता, (क्योंकि) स्वेदन से उभरा हुआ कफ नस्यकर्म में उपस्थित रहता है।
। ॥ १०५ ॥
फिर स्नेह की ठण्डक से (कफ) सिर में जम जाता है; उससे वह कान, मन्या (गर्दन की नसें), गले आदि में विकार उत्पन्न करने लगता है।
। ॥ १०६ ॥
फिर नस्य कर लेने पर कफ का नाश करने वाला धूम पिए। हितकर अन्न खाने वाला, वायुरहित और गर्म स्थान का सेवन करने वाला तथा संयमित इन्द्रियों वाला रहे।
। ॥ १०७ ॥
यह विधि अवपीड (नस्य) में करनी चाहिए; प्रध्मापन (नस्य) में तो उस चूर्ण को छह अङ्गुल की नली से मुख द्वारा फूँके।
। ॥ १०८ ॥
जिसका सिर विरिक्त (शुद्ध) हो गया है, उसे गर्म जल पिलाकर हलका और तीनों (दोषों) के विरुद्ध न पड़ने वाला भोजन कराए; (उसे) वायुरहित स्थान में रखते हुए, (वैद्य) आलस्यरहित होकर।
। ॥ १०९ ॥
विरेचन से शुद्ध हुआ (व्यक्ति) जिस दोष को कुपित करने वाली वस्तु का सेवन करता है, वह दोष (शरीर में) घूमता हुआ वहाँ अपने बहुत से रोग उत्पन्न करता है।
। ॥ ११० ॥
उन (रोगों) में, अकाल में (अनुचित समय पर) किए गए (नस्य) से उत्पन्न रोगों के अनुरूप, कुशल वैद्य अपने-अपने विधान के अनुसार बताई गई चिकित्सा करे।
। ॥ १११ ॥
अजीर्ण में, भोजन करने पर, जल पी लेने पर, फिर दुर्दिन (खराब मौसम के दिन) में, नए प्रतिश्याय (जुकाम) में, स्नान करने पर, स्नेहपान में, अनुवासन में,
। ॥ ११२ ॥
नावन (नाक से दिया गया) स्नेहन बहुत से कफ-जन्य रोग उत्पन्न करता है। उनमें कफ को हरने वाली तथा तीक्ष्ण, उष्ण आदि सब विधि हितकर है।
। ॥ ११३ ॥
क्षीण (दुर्बल) में, विरेचन कर चुकने पर, गर्भ में (गर्भवती में), व्यायाम से पीड़ित में, प्यास में, रूखे नस्य से कुपित वात अपने रोग उत्पन्न कर देता है।
।, ॥ ११४ ॥
उसमें वात को हरने वाली, स्नेहन और बृंहण करने वाली स्वेदन आदि सब विधि (हितकर) है; घी और दूध भी हों, गर्भवती के लिए तो विशेष रूप से।
। ॥ ११५ ॥
ज्वर, शोक और अत्यन्त ताप से पीड़ित लोगों के, तथा मद्य पीने वाले के तिमिर (दृष्टि के अँधेरे) की चिकित्सा रूखे और शीतल अञ्जनों, लेपों और पुटपाकों से करनी चाहिए।
। ॥ ११६ ॥
नावन (नस्य) दो प्रकार का माना गया है: स्नेहन और शोधन। प्रतिमर्श नस्य का ही कार्य करता है और दोषयुक्त भी नहीं है।
। ॥ ११७ ॥
नाक में स्नेह (तेल) लगी अङ्गुली को प्रातः और रात्रि में सदा डाले। और (उसे) ऊपर न खींचे। निरोगों के लिए वह प्रतिमर्श दृढ़ता करने वाला है।
- । ॥ ११८ ॥
इस विषय में दो श्लोक हैं - क्योंकि तीन मर्म प्रधान हैं, और उन पर चोट लगने पर, उनके विषय में लक्षण, चिकित्सा और औषधों सहित रोगों के भेद
। ॥ ११९ ॥
उत्तरबस्ति की विधि तथा नस्य-कर्म की विधि, और व्यापदों (उपद्रवों) व उनकी औषधों सहित (वर्णन) सिद्धिस्थान में मर्म नामक (अध्याय) में कहा गया है।
॥॥
इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संस्कारित, जो भाग प्राप्त नहीं था उसे दृढबल द्वारा पूर्ण किए गए तन्त्र के सिद्धिस्थान में त्रिमर्मीयसिद्धि नामक नौवाँ अध्याय (समाप्त हुआ)।