भारत संहिता

अध्याय २

पञ्चकर्मीयसिद्धिः

पञ्चकर्म (के योग्य और अयोग्य)

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भूमिका

पञ्चकर्मीयसिद्धि चरक संहिता के सिद्धिस्थान का दूसरा अध्याय है। इसका नाम इसके पहले वाक्य के शब्द 'पञ्चकर्मीय' से पड़ा है, यानी पञ्चकर्म से सम्बन्धित। इस अध्याय के पाँच कर्म हैं: वमन, विरेचन, आस्थापन और अनुवासन (ये दोनों बस्ति के रूप हैं) तथा शिरोविरेचन। इस अध्याय का प्रश्न यह है कि किसके लिए कौन-सा कर्म योग्य है और किसके लिए नहीं, और ऐसा क्यों।

भगवान् आत्रेय अग्निवेश को सम्बोधित करके आरम्भ में ही अध्याय की रूपरेखा रखते हैं: किनके लिए पञ्चकर्म नहीं करने चाहिए, किस कारण से नहीं, और किनके लिए करने चाहिए। पहले कुछ श्लोकों में उन लोगों की गिनती है जिनकी चिकित्सा में वैद्य को हाथ नहीं डालना चाहिए, जैसे क्रोधी, डरपोक, श्रद्धाहीन, वैद्य की बात न मानने वाले और मरणासन्न लोग। इनके अतिरिक्त शेष सब मनुष्य उपचार के योग्य बताए गए हैं।

इसके बाद अध्याय एक-एक कर्म लेकर चलता है, और हर कर्म के लिए एक ही क्रम रखता है: कौन उसके अयोग्य है, हर अयोग्य अवस्था में क्या हानि बताई गई है, फिर शेष लोग योग्य हैं और किन रोगों में वह कर्म सबसे प्रधान कहा गया है, और अन्त में एक उपमा। वमन, विरेचन और आस्थापन के बाद अनुवासन आता है, फिर शिरोविरेचन या नस्य, जिसके साथ उसके उचित समय की बात भी है।

अध्याय का अन्तिम भाग सबसे ध्यान देने योग्य है। यहाँ चरक संहिता कहती है कि शास्त्र में बता दी गई बात पर भी वैद्य को आँख मूँदकर नहीं टिकना चाहिए। देश, काल और रोगी के बल के अनुसार ऐसी अवस्था बन सकती है जिसमें करने योग्य कर्म न करने योग्य और वर्जित कर्म करने योग्य हो जाए। इसलिए निर्देश होने पर भी वैद्य अपनी बुद्धि से विचार करके कर्म करे, क्योंकि बिना तर्क के मिली सिद्धि केवल संयोग से मिली सिद्धि है।

यह अध्याय ग्रन्थ का कथन प्रस्तुत करता है; यह किसी के लिए चिकित्सा की सलाह नहीं है। अध्याय के अन्त में पाठ का अप्राप्त अंश दृढबल द्वारा पूर्ण किए जाने का उल्लेख भी है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २४-२८)

तत्र श्लोकाः-इति पञ्चविधं कर्म विस्तरेण निदर्शितम्।येभ्यो यन्न हितं यस्मात् कर्म येभ्यश्च यद्धितम्॥

श्लोक २४ →

इस विषय में श्लोक (ये हैं): इस प्रकार पाँच प्रकार का कर्म विस्तार से बताया गया, (अर्थात्) जिनके लिए जो कर्म हितकर नहीं है, जिस कारण से (नहीं है), और जिनके लिए जो कर्म हितकर है।

न वैकान्तेन निर्दिष्टेऽप्यर्थेऽभिनिविशेद्बुधः।स्वयमप्यत्र वैद्येन तर्क्यं बुद्धिमता भवेत्॥

श्लोक २५ →

बुद्धिमान् को बताई गई बात में भी पूरी तरह दृढ़ नहीं हो जाना चाहिए; यहाँ बुद्धिमान् वैद्य को स्वयं भी तर्क (विचार) करना चाहिए।

उत्पद्येत हि साऽवस्था देशकालबलं प्रति।यस्यां कार्यमकार्यं स्यात् कर्म कार्यं च वर्जितम्॥

श्लोक २६ →

देश, काल और बल के अनुसार वह अवस्था उत्पन्न हो जाती है, जिसमें करने योग्य (कर्म) न करने योग्य हो जाता है और वर्जित (मना किया हुआ) कर्म करने योग्य हो जाता है।

छर्दिर्हृद्रोगगुल्मानां वमनं स्वे चिकित्सिते।अवस्थां प्राप्य निर्दिष्टं कुष्ठिनां बस्तिकर्म च॥

श्लोक २७ →

छर्दि, हृद्रोग और गुल्म में वमन, तथा कुष्ठ के रोगियों में बस्तिकर्म, अपनी-अपनी चिकित्सा (के प्रकरण) में, (विशेष) अवस्था को प्राप्त होने पर बताया गया है।

तस्मात् सत्यपि निर्देशे कुर्यादूह्य स्वयं धिया।विना तर्केण या सिद्धिर्यदृच्छासिद्धिरेव सा॥

श्लोक २८ →

इसलिए निर्देश होने पर भी (वैद्य) स्वयं बुद्धि से ऊहा (विचार) करके कर्म करे; तर्क के बिना जो सिद्धि (सफलता) मिलती है, वह यदृच्छा-सिद्धि (संयोग से हुई सफलता) ही है।

मुख्य शब्द (१७) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. सि. २/१

॥ १ ॥

अब हम पञ्चकर्मीय सिद्धि (पञ्चकर्म से सम्बन्धित सिद्धि) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सि. २/२

॥ २ ॥

भगवान् आत्रेय ने ऐसा कहा।

च. सि. २/३

। ॥ ३ ॥

हे अग्निवेश, जिन (रोगियों) की और जिस कारण से पञ्चकर्म नहीं कराने चाहिए, और जिन (रोगियों) के वे कराने चाहिए, वह सब भलीभाँति कहा जाएगा।

च. सि. २/४

। ॥ ४ ॥

क्रोधी (उग्र), दुस्साहसी, डरपोक, कृतघ्न, व्याकुल चित्त वाला, सज्जन राजाओं और वैद्यों से द्वेष करने वाला, उनके द्वारा द्वेष किया गया, और शोक से पीड़ित

च. सि. २/५

। ॥ ५ ॥

मनमाना आचरण करने वाला, मरणासन्न, (चिकित्सा के) साधनों से रहित, जो (वैद्य का) शत्रु हो, अपने को वैद्य मानने वाला अधकचरा, श्रद्धा से रहित और अत्यन्त शंकालु

च. सि. २/६

। ॥ ६ ॥

वैद्यों की आज्ञा न मानने वाले (ये सब) वैद्य-विद्या जानने वाले (कुशल वैद्य) द्वारा चिकित्सा के योग्य नहीं हैं। इनकी चिकित्सा करता हुआ वैद्य बहुत-से दोषों को प्राप्त कर सकता है।

च. सि. २/७

। ॥ ७ ॥

इनसे भिन्न दूसरे मनुष्य सभी उपक्रमों (चिकित्सा-उपायों) से चिकित्सा के योग्य हैं। इनकी अवस्था को अलग-अलग करके (हर अवस्था में) क्या त्यागने योग्य है और क्या करने योग्य है, यह कहा जाएगा।

च. सि. २/८

॥ ८ ॥

वमन के लिए अयोग्य ये (लोग) हैं: क्षत (चोट या घाव) से पीड़ित, क्षीण, अत्यन्त स्थूल, अत्यन्त कृश, बालक, वृद्ध, दुर्बल, थके हुए, प्यासे, भूखे, कर्म (श्रम), भार और मार्ग (की यात्रा) से थके हुए, उपवास, मैथुन, अध्ययन, व्यायाम और चिन्ता में लगे हुए, क्षाम, गर्भवती, सुकुमार, संवृत कोष्ठ वाले, कठिनाई से वमन करने वाले, ऊर्ध्व रक्तपित्त वाले, लगातार छर्दि (वमन) से ग्रस्त, ऊर्ध्ववात वाले, जिन्हें आस्थापन और अनुवासन बस्ति दी गई है, हृद्रोग, उदावर्त, मूत्राघात, प्लीहा के रोग, गुल्म, उदर रोग, अष्ठीला, स्वर के उपघात और तिमिर से पीड़ित, तथा शिर, शंख (कनपटी), कान और आँख के शूल (तीव्र पीड़ा) से पीड़ित।

च. सि. २/९

, , , , , , , , , , , , , , , , ; । ॥ ९ ॥

उनमें घायल (घाव वाले) व्यक्ति के घाव को फिर से चोट पहुँचने से रक्त का अधिक बहना हो जाता है; क्षीण, अत्यन्त स्थूल, कृश, बालक, वृद्ध और दुर्बल लोगों में औषध के बल को सहन न कर पाने से प्राणों पर संकट आ जाता है; थके हुए, प्यासे और भूखे लोगों में भी वैसा ही होता है; (यहाँ मूल पाठ में कर्मभार आदि की सूची का टूटा हुआ अंश दो बार छपा है, जिसका अर्थ नहीं बनता;) कर्म (श्रम), भार और मार्ग से पीड़ित, उपवास, मैथुन, अध्ययन, व्यायाम और चिन्ता में अत्यधिक लगे हुए तथा क्षाम (दुर्बल) लोगों में रूखेपन के कारण वात, रक्त, कटने और घाव का भय होता है; गर्भवती स्त्री में गर्भ की हानि और कच्चे गर्भ के गिर जाने से भयानक रोग की प्राप्ति होती है; सुकुमार व्यक्ति में हृदय के खिंचने से ऊपर या नीचे की ओर रक्त का अधिक बहना होता है; संवृत कोष्ठ वाले और कठिनाई से वमन करने वाले लोगों में अत्यधिक जोर लगाने से दोष अत्यन्त क्षुब्ध होकर कोष्ठ के भीतर अन्तर्विसर्प, स्तम्भ, जाड्य, वैचित्त्य या मृत्यु उत्पन्न करते हैं; ऊर्ध्वग रक्तपित्त के रोगी में (वमन) उदान को ऊपर उठाकर प्राणों को हर ले और रक्त को अधिक बहा दे; लगातार वमन वाले में भी वैसा ही होता है; ऊर्ध्ववात वाले तथा आस्थापन और अनुवासन बस्ति लिए हुए लोगों में वात का ऊपर की ओर अधिक प्रवाह होता है; हृदय रोगी में हृदय का अवरोध होता है; उदावर्त के रोगी में अधिक भयंकर और शीघ्र मार डालने वाला उदावर्त हो जाता है; मूत्राघात आदि से पीड़ित लोगों में अधिक तीव्र शूल प्रकट होता है; तिमिर से पीड़ित लोगों में तिमिर की अत्यधिक वृद्धि होती है; सिर के दर्द आदि में पीड़ा की अत्यधिक वृद्धि होती है; इसलिए ये लोग वमन के योग्य नहीं हैं। इन सभी में भी, विष, गर, विरुद्ध (आहार), अजीर्ण में भोजन और आम से उत्पन्न (रोगों) में वमन निषिद्ध नहीं है, क्योंकि इनका प्रभाव अधिक शीघ्र होता है।

च. सि. २/१०

; ; ॥ १० ॥

शेष (मूल में 'शोषाः' छपा है) लोग वमन के योग्य हैं; विशेष रूप से पीनस, कुष्ठ, नवज्वर, राजयक्ष्मा, कास, श्वास, गलग्रह, गलगण्ड, श्लीपद, मेह, मन्दाग्नि, विरुद्ध या अजीर्ण अन्न (से हुई) विसूचिका और अलसक, विष और गर (पीने), काटे जाने, लिप्त होने और बींधे जाने (से हुए विकार), नीचे की ओर का रक्तपित्त, प्रसेक, अर्श (दुर्नाम), हृल्लास, अरोचक, अविपाक, अपची, अपस्मार, उन्माद, अतिसार, शोफ, पाण्डुरोग, मुखपाक, दूषित स्तन्य आदि कफ से होने वाले रोग, और विशेष रूप से वे रोग जो महारोगाध्याय में कहे गए हैं। इनमें वमन सबसे प्रधान (उपाय) कहा गया है, जैसे खेत की मेड़ टूटने पर शालि आदि के सूखने के दोष का नाश हो जाता है।

च. सि. २/११

॥ ११ ॥

अविरेच्य (विरेचन के अयोग्य) ये हैं: सुभग, क्षतगुद, मुक्तनाल, नीचे के भाग का रक्तपित्त वाला, विलङ्घित (उपवास से क्षीण), दुर्बल इन्द्रियों वाला, अल्पाग्नि वाला, निरूढ (जिसे आस्थापन बस्ति दी गई हो), काम आदि में व्यग्र, अजीर्ण वाला, नवज्वर वाला, मदात्यय वाला, आध्मात (अफरे वाला), शल्य से पीड़ित, अभिहत (चोट खाया हुआ), अतिस्निग्ध, रूक्ष और दारुण कोष्ठ वाले; और क्षत से लेकर गर्भिणी तक (जो वमन के अयोग्य गिनाए गए थे वे भी)।

च. सि. २/१२

, , , , , , , , , , , , , , ; ॥ १२ ॥

उनमें सुभग (अत्यन्त सुकुमार व्यक्ति) को वही दोष हो सकता है जो सुकुमार के लिए कहा गया है; क्षतगुद (जिसके गुदा में घाव हो) के घाव वाले गुदा में विरेचन प्राणों को संकट में डालने वाली पीड़ा उत्पन्न कर सकता है; मुक्तनाल को अत्यधिक प्रवृत्ति (अधिक दस्त) से मार सकता है; अधोभाग से रक्त बहने वाले रक्तपित्त के रोगी को भी वैसे ही; उपवास किए हुए, दुर्बल इन्द्रियों वाले, मन्द अग्नि वाले और निरूहण दिए हुए लोग औषध के वेग को न सह सकें; काम आदि से व्याकुल मन वाले का (विरेचन) प्रवृत्त नहीं होता, या कठिनाई से प्रवृत्त होता हुआ अयोग के दोष उत्पन्न करता है; अजीर्ण के रोगी को आम का दोष होता है; नए ज्वर वाले के अपक्व दोषों को बाहर नहीं निकालता और वात को ही कुपित कर देता है; मदात्यय के रोगी के मद्य से क्षीण शरीर में वायु प्राणों को संकट में डाल देता है; आध्मात (अफारे वाले) के, या फूलते हुए के, मल के कोष्ठ में जमा हुआ वायु फैलकर अचानक अधिक तीव्र आनाह या मृत्यु उत्पन्न कर देता है; शल्य से पीड़ित और चोट खाए हुए दोनों के घाव में आश्रय लिया हुआ वायु जीवन को नष्ट कर दे; अत्यन्त स्निग्ध को अतियोग का भय होता है; रूक्ष के अंगों की जकड़न को वायु उत्पन्न कर देता है; कठोर कोष्ठ वाले के विरेचन से उभरे दोष हृदय का शूल, पर्वों का टूटना, आनाह, अंगों की पीड़ा, वमन, मूर्च्छा और थकावट उत्पन्न करके प्राणों को हर लेते हैं; क्षत से लेकर गर्भिणी तक के लिए वमन के प्रसंग में कहा गया दोष होता है; इसलिए ये विरेचन के योग्य नहीं हैं।

च. सि. २/१३

; ; ॥ १३ ॥

शेष लोग विरेचन के योग्य हैं; विशेष रूप से कुष्ठ, ज्वर, मेह, ऊर्ध्वरक्तपित्त, भगन्दर, उदर, अर्श, ब्रध्न, प्लीहा, गुल्म, अर्बुद, गलगण्ड, ग्रन्थि, विसूचिका, अलसक, मूत्राघात, क्रिमि, कोष्ठ का विसर्प, पाण्डुरोग, सिर और पार्श्व का शूल, उदावर्त, आँख और मुख की जलन, हृद्रोग, व्यङ्ग, नीलिका, आँख, नाक और मुख से स्राव, हलीमक, श्वास, कास, कामला, अपची, अपस्मार, उन्माद, वातरक्त, योनि और रेतस् के दोष, तैमिर्य, अरोचक, अविपाक, छर्दि, श्वयथु, उदर, विस्फोटक आदि पित्त से होने वाले रोग, और विशेष रूप से वे जो महारोग अध्याय में कहे गए हैं; इनमें विरेचन सबसे प्रधान कहा गया है, जैसे आग शान्त करने में अग्निगृह (का उदाहरण)।

च. सि. २/१४

॥ १४ ॥

ये आस्थापन (निरूह बस्ति) के योग्य नहीं हैं (अनास्थाप्य): अजीर्ण वाले, अत्यन्त स्निग्ध (बहुत स्नेह सेवन किए हुए), स्नेह पिए हुए, जिनके दोष उभरे हुए हों, जिनकी अग्नि मन्द हो, सवारी से थके हुए, अत्यन्त दुर्बल, भूख, प्यास और श्रम से पीड़ित, अत्यन्त कृश, भोजन कर चुके, जल पी चुके, वमन करा चुके, विरेचन ले चुके, नस्यकर्म करा चुके, क्रुद्ध, भयभीत, मत्त, मूर्च्छित, जिन्हें लगातार वमन, थूक आना, श्वास, कास और हिक्का सताते हों, बद्धोदर, छिद्रोदर, उदकोदर और आध्मान से पीड़ित, अलसक, विसूचिका, आम से उत्पन्न विकार और आमातिसार वाले, तथा मधुमेह और कुष्ठ से पीड़ित लोग।

च. सि. २/१५

, , , , , , , , , , , , , ; ॥ १५ ॥

उनमें, अजीर्ण वाले, अत्यन्त स्निग्ध और स्नेह पिए हुए लोगों में दूष्योदर, मूर्च्छा या सूजन हो सकती है; जिनके दोष उभरे हुए हैं और अग्नि मन्द है, उनमें तीव्र अरुचि हो जाती है; सवारी से थके हुए व्यक्ति की क्षोभ से बिगड़ी हुई बस्ति शीघ्र शरीर को सुखा दे; अत्यन्त दुर्बल तथा भूख, प्यास और श्रम से पीड़ित लोगों में पहले कहा हुआ दोष हो; अत्यन्त कृश व्यक्ति में फिर से कृशता उत्पन्न कर दे; भोजन कर चुके और जल पी चुके दोनों में (दोष) उमड़कर ऊपर या नीचे की ओर, वायु बस्ति को उछालकर शीघ्र भयंकर विकार उत्पन्न कर दे; वमन और विरेचन करा चुके दोनों के रूखे शरीर को निरूह बस्ति वैसे जला दे, जैसे क्षार घाव को; जिसने नस्यकर्म करा लिया हो और जिसके स्रोत अत्यन्त रुके हों, उसमें विभ्रंश उत्पन्न कर दे; क्रुद्ध और भयभीत दोनों में बस्ति ऊपर की ओर उमड़ जाए; मत्त और मूर्च्छित दोनों में चेतना के अत्यन्त विचलित होने पर चित्त पर आघात से व्यापद् (बस्ति का बिगड़ना) हो; लगातार वमन, थूक आने, श्वास, कास और हिक्का से पीड़ितों में ऊपर चढ़ा हुआ वायु बस्ति को ऊपर ले जाए; बद्धोदर, छिद्रोदर, उदकोदर और आध्मान से पीड़ितों में बस्ति अत्यधिक फुलाकर प्राणों को नष्ट कर दे; अलसक, विसूचिका, आम से उत्पन्न विकार और आमातिसार वालों में आम से उत्पन्न दोष हो; मधुमेह और कुष्ठ के रोगियों में रोग की फिर से वृद्धि हो; इसलिए ये आस्थापन के योग्य नहीं हैं।

च. सि. २/१६

; ; ॥ १६ ॥

शेष (जो ऊपर नहीं गिनाए गए) लोग आस्थापन (निरूह बस्ति) के योग्य हैं; विशेष रूप से सर्वाङ्ग और एकाङ्ग के रोग, कुक्षि के रोग, वात, मल, मूत्र और शुक्र का रुकना, बल, वर्ण, मांस और रेतस् का क्षय, दोषों और आध्मान (अफारे) की स्थिति, अङ्गों की सुप्ति (सुन्नता), कृमि और कोष्ठ के रोग, उदावर्त, शुद्ध अतिसार, पर्वों का भेद (जोड़ों का टूटना-सा दर्द), अभिताप (सन्ताप), प्लीहा, गुल्म, शूल, हृद्रोग, भगन्दर, उन्माद, ज्वर, ब्रध्न, सिर और कान का शूल, हृदय, पार्श्व, पीठ और कटि का जकड़ना, वेपन (कम्पन), आक्षेपक (झटके), गौरव (भारीपन), अत्यन्त लघुता (हल्कापन), रजःक्षय से पीड़ा, विषम अग्नि, स्फिक् (नितम्ब), जानु, जङ्घा, ऊरु, गुल्फ, पार्ष्णि, प्रपद, योनि, बाहु, अङ्गुलि, स्तन के सिरे, दन्त, नख (अथवा स्नख), पर्व और अस्थि का शूल, शोष, स्तम्भ, अन्त्र की कूजन (आँतों की गड़गड़ाहट), परिकर्तिका (गुदा में कतरने जैसी पीड़ा), थोड़ा-थोड़ा, शब्द के साथ और उग्र गन्ध वाला (मल या वायु का) निकलना आदि वातव्याधियाँ, और जो महारोगाध्याय में कही गई हैं, उनमें आस्थापन को सबसे प्रधान कहा गया है, जैसे वनस्पति (वृक्ष) की जड़ काट देने से।

च. सि. २/१७

; ॥ १७ ॥

जो आस्थापन के अयोग्य हैं, वे ही अनुवासन के भी अयोग्य होते हैं; विशेष रूप से वे, जिन्होंने भोजन नहीं किया है, जिन्हें नया ज्वर है, जिन्हें पाण्डुरोग, कामला, प्रमेह, अर्श, प्रतिश्याय, अरोचक, मन्द अग्नि, दुर्बलता, प्लीहा का रोग, कफोदर, ऊरुस्तम्भ, वर्चस् (मल) का भेद है, जिन्होंने विष या गर पिया है, जिन्हें पित्त और कफ का अभिष्यन्द है, जिनका कोष्ठ भारी है, और जिन्हें श्लीपद, गलगण्ड, अपची तथा कृमि वाला कोष्ठ है।

च. सि. २/१८

, , , , , ; ॥ १८ ॥

उनमें, जिसने भोजन नहीं किया है उसका स्नेह, मार्ग के आवृत न होने से ऊपर की ओर चला जाता है; नए ज्वर, पाण्डुरोग, कामला और प्रमेह वालों के दोषों को उभारकर वह उदर रोग पैदा कर सकता है; अर्श वाले के अर्शों को स्रावित करके आध्मान कर सकता है; अरोचक से पीड़ित की अन्न की चाह को और भी नष्ट कर सकता है; मन्द अग्नि वाले और दुर्बल की अग्नि को और मन्द कर सकता है; प्रतिश्याय, प्लीहा आदि वाले, जिनके दोष अत्यन्त उभरे हुए हैं, उनके दोष को और भी बढ़ा सकता है; इसलिए ये अनुवासन के योग्य नहीं हैं।

च. सि. २/१९

; ; ॥ १९ ॥

जो आस्थापन के योग्य हैं, वे ही अनुवासन के योग्य हैं; विशेष रूप से रूक्ष और तीक्ष्ण अग्नि वाले और केवल वातरोग से पीड़ित लोग; इनमें अनुवासन सबसे प्रधान कहा गया है, जैसे जड़ में वृक्ष को सींचना।

च. सि. २/२०

, ॥ २० ॥

शिरोविरेचन के योग्य (वे) नहीं हैं: जिन्हें अजीर्ण है, जिन्होंने भोजन किया है, जिन्होंने स्नेह पिया है, जो मद्य या जल पीना चाहते हैं, जिन्होंने सिर से स्नान किया है, जो स्नान करना चाहते हैं, जो भूख, प्यास या थकान से पीड़ित हैं, मत्त हैं, मूर्च्छित हैं, शस्त्र या दण्ड से आहत हैं, मैथुन, व्यायाम या मद्यपान से थके हैं, नए ज्वर या शोक से तप्त हैं, जिन्हें विरेचन या अनुवासन दिया गया है, जो गर्भिणी हैं, जो नए प्रतिश्याय से पीड़ित हैं; और (शिरोविरेचन) बेमौसम में तथा दुर्दिन में (भी योग्य नहीं है)।

च. सि. २/२१

, , , , , , , , , , , , , , ; ॥ २१ ॥

उनमें से अजीर्ण वाले और भोजन किए हुए (दोनों) में दोष ऊपर की ओर जाने वाले स्रोतों को ढककर कास, श्वास, छर्दि और प्रतिश्याय उत्पन्न करता है; स्नेह पिए हुए तथा मद्य या जल पीने की इच्छा वाले (लोगों) के विषय में, पीने वालों में, मुख और नाक से स्राव, आँखों का उपदेह, तिमिर और शिरोरोग उत्पन्न करता है; जिसने सिर से स्नान किया है उसके विषय में, स्नान से सिर का प्रतिश्याय; भूख से पीड़ित में वात का प्रकोप; प्यास से पीड़ित में फिर प्यास की वृद्धि और मुँह का सूखना; थकान से पीड़ित, मत्त और मूर्च्छित लोगों में आस्थापन में कहा गया दोष उत्पन्न करता है; शस्त्र या दण्ड से आहत दोनों में अधिक तीव्र पीड़ा उत्पन्न करता है; मैथुन, व्यायाम या मद्यपान से थके लोगों में सिर, कन्धे, आँख और छाती में पीड़ा; नए ज्वर या शोक से तप्त दोनों में ऊष्मा आँख की नाड़ियों में फैलकर तिमिर और ज्वर की वृद्धि करती है; विरेचन लिए हुए में वायु इन्द्रियों की हानि करता है; विरेचन लिए हुए में वायु इन्द्रियों की हानि करता है; अनुवासन लिए हुए में कफ सिर का भारीपन, खुजली और कृमि से होने वाले दोष उत्पन्न करता है; गर्भिणी का गर्भ जड़ कर देता है, (तब) वह (सन्तान) काना, कुणि, पक्षाघात से पीड़ित या पीठ के बल घिसटकर चलने वाला होकर जन्म लेता है; नए प्रतिश्याय से पीड़ित के स्रोतों को बिगाड़ देता है; बेमौसम में और दुर्दिन में शीत से होने वाले दोष, पूतिनस्य और शिरोरोग उत्पन्न करता है; इसलिए ये शिरोविरेचन के योग्य नहीं हैं।

च. सि. २/२२

, ; , ॥ २२ ॥

शेष (लोग शिरोविरेचन के) योग्य हैं; विशेष रूप से सिर, दाँत, मन्या (गर्दन के पार्श्व की नसें), गर्दन की अकड़न, हनुग्रह (जबड़े का जकड़ना), पीनस, गलशुण्डिका, शालूक, शुक्र, तिमिर, वर्त्म (पलकों) के रोग, व्यङ्ग, उपजिह्विका, अर्धावभेदक, तथा ग्रीवा, स्कन्ध, अंस, मुख, नासिका, कान, आँख, मूर्धा, कपाल और सिर के रोग, अर्दित, अपतन्त्रक, अपतानक, गलगण्ड, दन्तशूल, दन्तहर्ष, दन्तचाल, अक्षिराजि, अर्बुद, स्वरभेद, वाग्ग्रह, गद्गद, क्रथन आदि, ऊर्ध्वजत्रु (हँसली से ऊपर के भाग) में स्थित वात आदि के विकार और परिपक्व (पके हुए रोग) में भी। इनमें शिरोविरेचन सबसे प्रधान कहा गया है, क्योंकि वह उत्तमाङ्ग (सिर) में प्रवेश करके, मुञ्ज की सींक की तरह चिपके हुए केवल रोग करने वाले दोष को बाहर खींच लेता है।

च. सि. २/२३

; , , ॥ २३ ॥

प्रावृट्, शरद् और वसन्त से भिन्न (ऋतुओं में होने वाले) आत्ययिक (तुरन्त उपचार माँगने वाले) रोगों में कृत्रिम गुण के उपधान (जोड़ने) से नावन (नस्य) करे; ग्रीष्म में पूर्वाह्ण में, शीत में मध्याह्न में, और वर्षा में, जब दुर्दिन (बादल-वर्षा का दिन) न हो।

च. सि. २/२४

- । ॥ २४ ॥

इस विषय में श्लोक (ये हैं): इस प्रकार पाँच प्रकार का कर्म विस्तार से बताया गया, (अर्थात्) जिनके लिए जो कर्म हितकर नहीं है, जिस कारण से (नहीं है), और जिनके लिए जो कर्म हितकर है।

च. सि. २/२५

। ॥ २५ ॥

बुद्धिमान् को बताई गई बात में भी पूरी तरह दृढ़ नहीं हो जाना चाहिए; यहाँ बुद्धिमान् वैद्य को स्वयं भी तर्क (विचार) करना चाहिए।

च. सि. २/२६

। ॥ २६ ॥

देश, काल और बल के अनुसार वह अवस्था उत्पन्न हो जाती है, जिसमें करने योग्य (कर्म) न करने योग्य हो जाता है और वर्जित (मना किया हुआ) कर्म करने योग्य हो जाता है।

च. सि. २/२७

। ॥ २७ ॥

छर्दि, हृद्रोग और गुल्म में वमन, तथा कुष्ठ के रोगियों में बस्तिकर्म, अपनी-अपनी चिकित्सा (के प्रकरण) में, (विशेष) अवस्था को प्राप्त होने पर बताया गया है।

च. सि. २/२८

। ॥ २८ ॥

इसलिए निर्देश होने पर भी (वैद्य) स्वयं बुद्धि से ऊहा (विचार) करके कर्म करे; तर्क के बिना जो सिद्धि (सफलता) मिलती है, वह यदृच्छा-सिद्धि (संयोग से हुई सफलता) ही है।

च. सि. २

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संशोधित, और जो भाग अप्राप्त (उपलब्ध नहीं) था उसमें दृढबल द्वारा पूर्ण किए गए तन्त्र के सिद्धिस्थान में पञ्चकर्मीयसिद्धि नामक दूसरा अध्याय (समाप्त हुआ)।