॥ १ ॥
अब हम बस्तिसूत्रीय (बस्ति के सूत्रों से सम्बन्धित) सिद्धि (अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
अध्याय ३
बस्ति के सूत्र
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बस्तिसूत्रीय सिद्धि चरक संहिता के सिद्धिस्थान का तीसरा अध्याय है। इसका नाम इसके विषय से पड़ा है: बस्ति, यानी औषधि को गुदा मार्ग से शरीर में पहुँचाने की चिकित्सा, के सूत्र, अर्थात् उसके मूल नियम और साधन। अध्याय का आरम्भ अध्याय-प्रतिज्ञा से होता है और उपदेश भगवान् आत्रेय का है। कथा-भूमिका में अग्निवेश हाथ जोड़कर अपने गुरु पुनर्वसु से प्रश्न करते हैं, जो एक श्रेष्ठ पर्वत के सुन्दर स्थान पर, कुबेर के निवास के समीप, महर्षियों के समूहों से घिरे बैठे हैं।
अग्निवेश के प्रश्न बस्ति के हर पक्ष को छूते हैं: उसे किस बात को देखकर दिया जाए, उसका नेत्र (नली) किस वस्तु का और कैसा हो, बस्ति किस प्राणी की और कैसी हो, निरूह का विधान क्या है, स्नेह की मात्रा क्या है, और बस्तियाँ कौन-कौन सी हैं और किनमें हितकर हैं। आत्रेय बताते हैं कि दोष, औषध, देश, काल, सात्म्य, अग्नि, सत्त्व, वय और बल को देखकर दी गई बस्ति ही निश्चित रूप से लाभ के लिए होती है।
उत्तर पहले साधनों से शुरू होता है: नेत्र किन धातुओं और पदार्थों का बने, उसकी लम्बाई, मोटाई और बनावट कैसी हो, उसकी कर्णिकाएँ कहाँ हों, और बस्ति की थैली किन पशुओं के मूत्राशय से ली जाए, या उसके न मिलने पर क्या लिया जाए। इसके बाद आस्थापन (निरूह) बस्ति की पूरी विधि क्रम से आती है: शुभ समय में ऐसे रोगी का चुनाव जिसका अन्न पच चुका हो, काढ़े और कल्कों की तैयारी, उन्हें मथकर बस्ति में भरना, रोगी का तेल लगाकर बायीं करवट लिटाना, नेत्र प्रवेश कराने और निकालने की रीति, और वे दोष जो बहुत धीरे या ज़ोर से देने, बहुत ठण्डा या गरम होने, या द्रव में चिकनाई, रूखेपन, नमक या मात्रा की गड़बड़ी से पैदा होते बताए गए हैं। फिर बस्ति के बाद का आहार, अनुवासन (स्नेह बस्ति), उसके बाद की देखभाल, आयु और दोष के अनुसार मात्राएँ, और शय्या तथा भोजन का वर्णन है।
अध्याय का बड़ा भाग निरूह के अनेक योगों का है: वात, पित्त और कफ के रोगों के लिए, और जिनमें दोषों का मेल हो उनके लिए, दशमूल, दूध, मांसरस, कल्क, मधु, घी, तैल और मूत्र आदि से बने योग गिनाए गए हैं, जिनके साथ हर योग का गुण भी पाठ में कहा गया है। अन्त में बताया गया है कि किस दोष में कितने निरूह दिए जाएँ, उनके बाद कौन-सा भोजन हो, और अनुवासन में कौन-से तैल हों, और श्लोक यह कहकर समाप्त होता है कि जो विद्वान् इस विधि को पढ़कर बस्ति कर्म करता है, वह सिद्धि पाता है। पाठक के लिए ध्यान रखने की बात यह है कि ये चरक संहिता में कही गई विधियों और योगों का वर्णन हैं, चिकित्सा की सलाह नहीं; और कई द्रव्यों की पहचान तथा कुछ वाक्यों का अर्थ पाठ से पूरी तरह तय नहीं होता, जैसा कि उन श्लोकों की व्याख्या में बताया गया है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।
अर्थ: रोग दूर करने का साधन।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।
शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।
चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।
अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।
चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।
अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।
चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।
सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।
चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।
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॥ १ ॥
अब हम बस्तिसूत्रीय (बस्ति के सूत्रों से सम्बन्धित) सिद्धि (अध्याय) की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।
। ॥ ३ ॥
अग्निवेश ने हाथ जोड़कर पुनर्वसु से पूछा, जो (प्रश्न सुनने का) अवसर देकर श्रेष्ठ पर्वत के रमणीय (प्रदेश में), कुबेर के निवास के समीप बैठे थे और महर्षियों के समूहों से घिरे हुए थे।
। ॥ ४ ॥
मनुष्यों को बस्ति किसका विचार करके दिया जाए? (बस्ति) सिद्धि वाला (सफल) कैसे हो? इसका नेत्र (नली) किस वस्तु से बना हो? बस्ति कैसे प्रमाण (माप) और आकृति वाला हो, कैसे गुण वाला हो, किनके लिए हो, और किस योनि (उत्पत्ति) तथा गुण वाला हो?
। ॥ ५ ॥
निरूह (बस्ति) का कल्प (विधान) क्या है, प्रणिधान (प्रयोग) की मात्रा क्या है, स्नेह (बस्ति) की (मात्रा) क्या है, और शयन (सोने) में क्या विधि है? बस्तियाँ कौन-कौन सी हैं और किनमें हितकर हैं? यह सुनकर महर्षि ने उत्तर के वचन कहे।
। ॥ ६ ॥
दोष, औषध, देश, काल, सात्म्य, अग्नि, सत्त्व आदि, वय और बल को भली-भाँति देखकर प्रयोग किया गया बस्ति निश्चित रूप से लाभ के लिए होता है, और (उसके) सभी कर्म सिद्धि वाले (सफल) होते हैं।
। ॥ ७ ॥
सोना, चाँदी, राँगा, ताँबा, रीति (पीतल), काँसा, हड्डी, शस्त्र, वृक्ष (की लकड़ी), बाँस, दाँत से, नल (नरकट), सींग और मणियों से तथा उन-उन (अन्य पदार्थों) से भी नेत्र (नलियाँ) बनानी चाहिए, जो सु(त्रि)कर्णिक (सुन्दर (या तीन) कर्णिकाओं वाली) हों।
। ॥ ८ ॥
(वे नेत्र) क्रमशः छह, बारह और आठ अंगुल के माप के हों, छह, बीस और बारह वर्ष की आयु वालों के लिए। उनके छिद्र मूँग, कर्कन्धु और सतीन (के दाने) के निकलने योग्य हों और वे वर्ति (बत्ती) से ढके हुए भी हों।
। ॥ ९ ॥
आयु के अनुसार मूल और अग्र (सिरे) पर क्रमशः अँगूठे और कनिष्ठिका (छोटी उँगली) के बराबर परिधि वाले हों; सीधे, गाय की पूँछ के समान आकृति वाले, चिकने और गुटिका (गोली) जैसे मुख वाले हों।
। ॥ १० ॥
अग्र से चौथाई भाग पर एक कर्णिका हो, और मूल के आश्रित बस्ति बाँधने की दो (कर्णिकाएँ) हों। बस्ति जारद्गव (बूढ़े बैल) का, या माहिष (भैंसे) और हारिण (हिरण) का, या सूअर का, अथवा बकरे का भी हो।
। ॥ ११ ॥
दृढ़, पतला, नसों से रहित, गन्धरहित, कषाय (रस) से रँगा हुआ, अत्यन्त कोमल, भली-भाँति शुद्ध और जिसका मूत्र (छिद्र) भली-भाँति बँधा हो, ऐसा (बस्ति) मनुष्यों की आयु देखकर, अनुरूप नेत्रों में जोड़ा जाना चाहिए।
। ॥ १२ ॥
बस्ति न मिलने पर प्लवज (जलचर पक्षी से सम्बन्धित) गला, अथवा अङ्कपाद, अथवा खूब घना कपड़ा हो। विधि जानने वाला (वैद्य) पुण्य (शुभ) दिन में, शुक्ल पक्ष में, आस्थापन (निरूह बस्ति) के योग्य पुरुष को देखकर
। ॥ १३ ॥
शुभ नक्षत्र और मुहूर्त के योग में, जिसका अन्न पच चुका है और जो एकाग्र है, उस (रोगी) का उपचार आरम्भ करे। बला (खरैटी), गुडूची (गिलोय), त्रिफला, रास्ना और दोनों पञ्चमूल, ये सब एक-एक पल के माप के (लें)
। ॥ १४ ॥
(और) आठ फल तथा बकरे के मांस की आधी तुला (इन सबको) जल में पकाए, चौथाई शेष रहने तक; (फिर उस काढ़े को) छानकर, यवानी, फल, बिल्व, कुष्ठ, वचा, शताह्वा, घन और पिप्पली के
। ॥ १५ ॥
कल्कों, गुड़, शहद और घी तथा तेल के साथ मिलाया हुआ, सुखोष्ण (सहने योग्य गरम) और पिचु के प्रमाण वाले (कल्कों) से; गुड़ से (गुड़ का) एक पल, स्नेह की दो प्रसृत की मात्रा, तथा मधु और सैन्धव (नमक) युक्ति के अनुसार
। ॥ १६ ॥
खज से मथे हुए (उस द्रव) को बस्ति में डालकर, अच्छी तरह बाँधकर, हवा निकालकर और सिलवट रहित करके, अँगूठे के बीच से मुख को बन्द करके, नेत्र के अग्र भाग में लगी वर्ति (बत्ती) को हटाकर
। ॥ १७ ॥
जिसके शरीर पर तेल लगाया गया है, जिसने मल-मूत्र त्याग कर लिया है, जो बहुत भूख से पीड़ित नहीं है, ऐसे मनुष्य को शय्या पर - जो सम हो, अथवा जिसका सिरहाना थोड़ा झुका हुआ हो, या बहुत ऊँची न हो, और अच्छे बिछौने से युक्त हो
। ॥ १८ ॥
बायीं करवट पर सुखपूर्वक लेटे हुए, सीधे शरीर वाले और अपनी भुजा को तकिया बनाए हुए (उस रोगी) को करके, इसके दाहिनी जाँघ को मोड़कर और बायीं को फैलाकर, उसके बाद उस (नेत्र) को (गुद में) प्रवेश कराए
। ॥ १९ ॥
चिकने किए हुए गुद में, चिकने (नेत्र) के चौथाई भाग को, धीरे-धीरे, सीधा, रीढ़ के साथ-साथ (प्रविष्ट कराए); तथा हाथों के अकम्पन, अवेपन, लाघव आदि गुणों को भी उसे दिखाते हुए
। ॥ २० ॥
और एक ही पकड़ से (बस्ति को) दबाकर, डाले हुए नेत्र को उसके बाद धीरे-धीरे ही बाहर निकाले। तिरछा डाले जाने पर धार नहीं जाती, और नेत्र के हिल जाने पर गुद में व्रण (घाव) हो सकता है।
। ॥ २१ ॥
धीरे-धीरे दिया गया बस्ति आशय तक पहुँचता है, और अधिक दबाया गया (बस्ति) कण्ठ की ओर दौड़ता है। ठण्डा (बस्ति) अत्यन्त स्तम्भ करने वाला होता है, और अत्यन्त गरम (बस्ति) दाह (जलन) और मूर्च्छा उत्पन्न करे।
। ॥ २२ ॥
चिकना (बस्ति) अत्यन्त जड़ता करता है, रूखा (बस्ति) वात (उत्पन्न) करता है, पतला, कम मात्रा का और नमक रहित (बस्ति) अयोग करता है, मात्रा में अधिक (बस्ति) अतियोग करता है, और गाढ़ा (बस्ति) क्षाम होकर बहुत देर से आता है।
। ॥ २३ ॥
अधिक नमक वाला (बस्ति) दाह और अतिसार करे; इसलिए सुयुक्त (ठीक से मिलाया हुआ बस्ति) सम (मात्रा में) ही दे। पहले मधु और सैन्धव (नमक) डाले, फिर स्नेह को अच्छी तरह मथकर, उसके बाद कल्क (डाले)।
। ॥ २४ ॥
(द्रव्यों को) भली-भाँति मथकर और मिलाकर, फिर द्रवों से मिलाकर, उसे खज (मथानी) से मथे हुए रूप में बस्ति (बस्तियन्त्र) में भर दे। क्योंकि ग्रहणी और गुदा बायीं ओर आश्रित हैं, इसलिए करवट से लेटे हुए (रोगी) को वह (बस्ति) सुखपूर्वक प्राप्त होती है।
। ॥ २५ ॥
इस प्रकार (बायीं ओर लेटने से) वलियाँ भी लीन हो जाती हैं (अपने स्थान पर सध जाती हैं); इसलिए बायीं ओर लेटा हुआ (रोगी) बस्ति दिए जाने के योग्य है। यदि आधी बस्ति दिए जाने पर मल और वात का वेग उठे, तो (नेत्र को) निकालकर, वेग के छूट जाने पर शेष (बस्ति) पूरी चढ़ा दे।
। ॥ २६ ॥
(रोगी) पीठ के बल लेटा हुआ, तकिया लगाए रहे; इस प्रकार (बस्ति का) वीर्य उसके शरीर को प्राप्त होता है। (इन बस्तियों में) एक वात को उसके अपने मार्ग से खींच लेता है, दूसरा पित्त को और तीसरा कफ को।
। ॥ २७ ॥
(बस्ति के) लौट आने पर, गुनगुने जल से नहलाया हुआ (रोगी) पतले रस के साथ शालि चावल का भात खाए। उसके पच जाने पर, सायंकाल हल्का और थोड़ी मात्रा का भोजन कर लेने के बाद, पुष्टि के लिए उसे अनुवासन (तैल बस्ति) देना चाहिए।
। ॥ २८ ॥
निरूह के चौथाई भाग के बराबर (मात्रा वाले), खट्टे और वात नष्ट करने वाले औषधों से सिद्ध किए हुए तैल से (अनुवासन) देकर, स्नेह को शीघ्र लौट आने (बाहर आ जाने) से बचाने के लिए दोनों नितम्बों पर हथेली से आघात करे।
। ॥ २९ ॥
पीठ के बल लेटे (रोगी) के दोनों पैरों की अँगुलियों को थोड़ा खींचे, और दोनों तलवों को स्नेह (तेल) से मले; तथा एड़ियों, अँगुलियों और पिण्डलियों को भी, और उसके शरीर के जो अंग पीड़ा से दुःखी हों (उन्हें)
। , ॥ ३० ॥
उन (अंगों) को सुखपूर्वक मले, और फिर तकिया लगाकर नींद ले। (मात्रा के भाग) कषाय (काढ़े) के पाँच भाग, पित्त में तथा (दोष के) प्रकृति में स्थित होने पर स्नेह का छठा भाग
, । ॥ ३१ ॥
वात के बढ़ने पर (स्नेह का) चौथा भाग; निरूहों में (यही) मात्रा; कफ (के बढ़ने) में आठवाँ भाग। निरूह की मात्रा पहले वर्ष में आधा प्रसृत है, उसके बाद आधे प्रसृत की वृद्धि
। ॥ ३२ ॥
बारह (वर्ष) तक प्रसृत की वृद्धि हो; बारह के बाद अठारह (वर्ष) तक (वृद्धियाँ) हों; सत्तर (वर्ष) तक वही निर्धारित प्रमाण है; इसके बाद (मात्रा) सोलह (वर्ष वाले) के समान करनी चाहिए।
। ॥ ३३ ॥
बालक और वृद्ध में निरूह की मात्रा प्रसृत के प्रमाण की (हो), (उनमें) विशेष रूप से मृदु (निरूह दिया जाए)। शयन (बिछौना) न बहुत ऊँचा, न बहुत नीचे पायों वाला, पादपीठ सहित प्रशस्त है।
। ॥ ३४ ॥
(शयन) उत्तम और कोमल बिछौने से युक्त, पूर्व की ओर सिर वाला और सफेद वस्त्र की चादर वाला (हो)। भोजन भी रोग को देखकर उसी प्रकार यूष (दाल आदि का पतला शोरबा), दूध, रस आदि से तैयार करे।
। ॥ ३५ ॥
सब (निरूह बस्तियों) में इस आदि (पहली) विधि को जानना चाहिए; इसके बाद मैं आगे की बस्तियाँ कहूँगा। दशमूल (द्विपञ्चमूल) का रस, खट्टे द्रव्य से युक्त, बकरे के मांस सहित और पहले कहे गए पेष्य (पीसकर डाले जाने वाले द्रव्यों) के साथ -
। ॥ ३६ ॥
तीन स्नेहों से युक्त, श्रेष्ठ निरूह (बस्ति) सब वात रोगों को हरने वाला कहा गया है। स्थिरादि वर्ग का (क्वाथ), जो बला, पटोल, त्रायन्तिक, एरण्ड और यव से युक्त हो -
। ॥ ३७ ॥
(उस क्वाथ के) रस से एक प्रस्थ, उसमें बकरे के रस का आधा भाग मिलाकर, फिर तब तक पकाना चाहिए जब तक वह एक प्रस्थ के बराबर न रह जाए; प्रियङ्गु, कृष्णा और घन के कल्क से युक्त, तैल के बिना (अतैल), घी, मधु और सैन्धव से युक्त
। ॥ ३८ ॥
यह बस्ति दीपन (अग्नि को प्रदीप्त करने वाली) होती है, मांस और बल देने वाली है और नेत्रों का बल भी देती है। एरण्ड की जड़ तीन पल, पलाश, और जो पाँच छोटी जड़ें हैं (वे),
। ॥ ३९ ॥
रास्ना, अश्वगन्धा, अतिबला, गुडूची, पुनर्नवा, आरग्वध (अमलतास) और देवदारु - ये सब एक-एक पल के भाग में, आठ मदन (फल) के साथ, दो कंस जल में उबालने पर आठवाँ भाग शेष रहने पर
। ॥ ४० ॥
पीसने योग्य (द्रव्य ये हैं): शताह्वा, हपुषा, प्रियङ्गु, पिप्पली सहित मधुक, बला और रसाञ्जन, वत्सक के बीज और मुस्त, एक भाग अक्ष मात्रा में, और नमक के अंश से युक्त
। ॥ ४१ ॥
मधु (माक्षिक), तैल और मूत्र सहित यह बस्ति मनुष्यों के लिए दीपन और लेखन करने वाली है; जङ्घा (टाँग का निचला भाग), ऊरु (जाँघ), पैर, त्रिक और पीठ के शूल को, कफ से (वात के) आवृत होने को और वात के निग्रह (रुकावट) को
। ॥ ४२ ॥
मल, मूत्र और वायु के रुकने को (शूल सहित), आध्मान, अश्मरी और शर्करा, आनाह, अर्श और ग्रहणी के विकारों को, प्रयोग की गई एरण्ड बस्ति शान्त करती है।
। ॥ ४३ ॥
चार पल तैल और घी में भुने हुए बकरे (के मांस) से पचास (मात्रा) का रस, दही और अनार से खट्टा किया हुआ, पेष्य सहित, बल, मांस, वर्ण, रेतस् और अग्नि देने वाला तथा अन्धेपन और सिरदर्द में प्रशस्त (उत्तम) है।
। ॥ ४४ ॥
दो कंस जल में पलाश से आठ पल लेकर पकाकर, आधा आढक मात्रा शेष रहा रस, वचा और मागधिका (पिप्पली) के एक-एक पल के कल्कों से तथा शताह्वा के दो पल से भी युक्त
। ॥ ४५ ॥
सैन्धव, क्षौद्र (मधु) और तैल के साथ दिया जाने वाला यह निरूह बल और वर्ण करने वाला है। यह आनाह, पार्श्व के रोगों, योनि के दोषों, गुल्म और उदावर्त की पीड़ा को नष्ट करे।
। ॥ ४६ ॥
यष्ट्याह्व (यष्टिमधु) के आठ पल के साथ सिद्ध किया हुआ दूध, शताह्वा के फल और पिप्पली से युक्त, घी और मधु सहित निरूह (बस्ति) वातरक्त, स्वर के बिगड़ने (वैस्वर्य) और वीसर्प में हितकर है।
। ॥ ४७ ॥
यष्टिमधु, लोध्र, अभय (हरीतकी) और चन्दन के साथ, तथा कमल और उत्पल के साथ पकाया हुआ उत्तम दूध, शर्करा सहित, शहद मिलाकर और खूब ठण्डा करके, जीवनीय गण की औषधियों सहित (निरूह बस्ति के रूप में दिया जाए तो) पित्त से उत्पन्न रोगों को नष्ट करता है।
।॥ ४८ ॥
चन्दन, पद्मक, ऋद्धि, यष्टिमधु, रास्ना, वृष और सारिवा, प्रत्येक दो-दो कर्ष, तथा लोध्र सहित मञ्जिष्ठा, और अनन्ता, बला, स्थिरा आदि तथा तृणपञ्चमूल
।॥ ४९ ॥
जल में (औषधियों को) भली-भाँति उबालकर, उस काढ़े से तथा जीवन्ती, मेदा, ऋद्धि, शतावरी, वीरा, दोनों काकोली और शेरुका (के कल्क) के साथ, अर्धाढक दूध पकाया जाए, जब तक जल न रह जाए
। ॥ ५० ॥
सितोपला (मिश्री), जीवक, पद्मरेणु (कमल का पराग), प्रपौण्डरीक, कमल और उत्पल, लोध्र, आत्मगुप्ता, मधुक, विदारी, मुञ्जातक, केशर और चन्दन (के कल्क से)
। ॥ ५१ ॥
इन्हें पीसकर, घी और शहद मिलाकर, सैन्धव नमक सहित, ठण्डा ही निरूह बस्ति देना चाहिए। (बस्ति के) लौट आने पर, जिसके शरीर पर (जल का) सिंचन किया गया हो वह धन्व (शुष्क प्रदेश) के मांसरस के साथ अथवा दूध के साथ शालि चावल खाए।
। ॥ ५२ ॥
(यह निरूह) दाह, अतिसार, प्रदर, रक्तपित्त, हृदय के रोग और पाण्डु रोग को, विषम ज्वर को, तथा गुल्म, मूत्र के रुकने और कामला आदि सहित सभी पित्त से उत्पन्न रोगों को नष्ट करता है।
। ॥ ५३ ॥
द्राक्षा आदि, काश्मर्य, मधूक और सेव्य से, तथा सारिवा सहित चन्दन और शीतपाक्य से, और श्रावणी, मुद्गपर्णी, तुगा, आत्मगुप्ता और मधुयष्टि के कल्कों से पकाया हुआ दूध
। ॥ ५४ ॥
गेहूँ के चूर्ण से, तथा अक्ष मात्रा वाले (द्रव्यों) से, शहद सहित घी, मधुयष्टि और तैल से, पथ्या (हरीतकी), विदारी और ईख के रस से और गुड़ से युक्त, पित्त को हरने वाला बस्ति (निरूह) दिया जाए।
। ॥ ५५ ॥
हृदय, नाभि, पार्श्व और उत्तम देह के दाह में, भीतर स्थित दाह में, कष्ट सहित मूत्र में, रेतस् (शुक्र) के क्षीण, क्षत अथवा नष्ट हो जाने पर, और पित्त से उत्पन्न अतिसार में, मनुष्यों के लिए (यह बस्ति) प्रशस्त है।
। ॥ ५६ ॥
कोषातक, आरग्वध (अमलतास), देवदारु, शार्ङ्गेष्ट, मूर्वा, कुटज, अर्क और पाठा, तथा कुलथी और बृहती को जल में पकाकर, उस काढ़े के दस प्रसृत होने चाहिए
। ॥ ५७ ॥
उन (दस प्रसृत काढ़े) को, सर्षप, एला और मदन तथा कुष्ठ सहित अक्ष की मात्रा में, और प्रसृत (मात्रा) के साथ युक्त करके, फलाह्व के तैल, शहद सहित, क्षार और सरसों के तैल के
। ॥ ५८ ॥
कफ रोग से पीड़ित, मन्द अग्नि वाले और भोजन से अरुचि रखने वाले रोगी को जानकार वैद्य निरूहण बस्ति दे; अथवा पटोल, पथ्या (हरीतकी), अमरदारु (देवदारु) और पिप्पली को जल में अग्नि पर उबालकर (बने क्वाथ से यह निरूह दे)
। ॥ ५९ ॥
द्विपञ्चमूल (दशमूल), बिल्व सहित त्रिफला और फल (फालानि) का, गोमूत्र से युक्त कषाय (क्वाथ); तथा कलिङ्ग, पाठा, फल और मुस्त का कल्क, सैन्धव नमक, क्षार और तेल सहित
। ॥ ६० ॥
निरूहों में प्रमुख यह (योग) कफ से उत्पन्न विकारों को, पाण्डुरोग, आलस और कामदोष सहित, नष्ट करता है; वैसे ही वायु और मूत्र के रुकने को तथा बस्ति के भयंकर आटोप (फूलने) को भी (नष्ट करता है)।
।॥ ६१ ॥
रास्ना, अमृता, एरण्ड, विडङ्ग, दार्वी, सप्तच्छद, उशीर, सुराह्व और निम्ब से, तथा शम्पाक, भूनिम्ब, पटोल, पाठा, तिक्ता, आखुपर्णी, दशमूल और मुस्त से (बना क्वाथ)
।॥ ६२ ॥
त्रायन्तिका, शिग्रु और त्रिफला से (बना) क्वाथ, पिण्डीतक, जल और मूत्र सहित; तथा यष्टिमधु (यष्ट्याह्व), कृष्णा, फलिनी, शताह्वा, रसाञ्जन, श्वेतवचा और विडङ्ग से
। ॥ ६३ ॥
कलिङ्ग, पाठा, अम्बुद और सैन्धव के कल्कों से तथा घी, मधु और तेल से मिला हुआ यह निरूह कृमि, कुष्ठ, मेह, ब्रध्न, उदर रोग, अजीर्ण और कफ से पीड़ितों के लिए (हितकर) है।
। ॥ ६४ ॥
रूक्ष औषधों से भी अपतर्पित (क्षीण किए गए) लोगों को, इन रोगों के होने पर भी, दिया गया (यह निरूह) वात को नष्ट करके, अग्नि को प्रदीप्त करके और रोगों को जीतकर बल उत्पन्न करता है।
। ॥ ६५ ॥
पुनर्नवा, एरण्ड, वृष, अश्मभेद, वृश्चीर, भूतीक, बला और पलाश, तथा द्विपञ्चमूल (दशमूल) - (प्रत्येक) एक-एक पल, कुचले हुए; और धुले हुए आठ फल
। ॥ ६६ ॥
बिल्व, यव, कोल, कुलत्थ, धान्य और फल - ये भी एक-एक प्रसृत नापे हुए; उन सबको दूध और जल के दो आढक में पकाकर, दूध मात्र शेष रहने पर, सफ़ेद कपड़े से छान लिया जाए
। ॥ ६७ ॥
वचा, शताह्वा, अमरदारु, कुष्ठ, यष्टिमधु, सिद्धार्थक और पिप्पली के कल्कों से तथा यवानी और मदनफलों से युक्त, न बहुत गरम न बहुत ठण्डा, और गुड़ तथा सैन्धव नमक से मिला हुआ (वह क्वाथ)
। ॥ ६८ ॥
शहद, तेल और घी (इन तीनों) के तीन प्रसृत से वैसे ही युक्त करके, कुशल वैद्य विधि से निरूह दे। वह सब (दोषों के) संसर्ग से उत्पन्न रोगों को नष्ट करने वाला है।
। ॥ ६९ ॥
वात में स्निग्ध और उष्ण (द्रव्यों से बना) एक निरूह, मांस सहित; पित्त में स्वादु (मधुर) और शीत (द्रव्यों से बने) दो निरूह, दूध के साथ; कफ में कटु, उष्ण और तीक्ष्ण (द्रव्यों से बने) तीन निरूह, मूत्र सहित - इससे अधिक निरूह नहीं देने चाहिए।
। ॥ ७० ॥
वात में (निरूह के बाद) भोजन रस (मांस रस) से हो, पित्त में दूध से, और कफ में यूषों से। उसी प्रकार अनुवासन में बिल्व तैल हो, और जीवनीय तथा फल से सिद्ध (तैल) भी हो।
। ॥ ७१ ॥
इस प्रकार बस्ति देने की यह सम्पूर्ण श्रेष्ठ विधि यथावत् कही गई। जो विद्वान् इसे पढ़कर इस लोक में बस्ति कर्म करता है, वह लोक में सिद्धि पाता है।
॥॥
इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संशोधित, और जो भाग प्राप्त नहीं था उसे दृढबल द्वारा पूर्ण किए गए तन्त्र के सिद्धिस्थान में 'बस्तिसूत्रीय सिद्धि' नामक तीसरा अध्याय (समाप्त हुआ)।