॥ १ ॥
अब हम नेत्रबस्तिव्यापत्सिद्धि (नेत्र और बस्ति की व्यापत्तियों की चिकित्सा) अध्याय की व्याख्या करेंगे।
अध्याय ५
नेत्र और बस्ति (यन्त्र) की व्यापत्तियाँ
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यह सिद्धिस्थान का पाँचवाँ अध्याय है। इसका नाम नेत्रबस्तिव्यापत्सिद्धि है, यानी नेत्र और बस्ति की व्यापत्तियों (बिगाड़ों, उलटे परिणामों) और उनके उपचार का अध्याय। बस्ति वह क्रिया है जिसमें औषधि गुदमार्ग से दी जाती है; नेत्र उसकी नली है और बस्ति औषधि भरने की थैली। अध्याय की शुरुआत में भगवान् आत्रेय कहते हैं कि अब इस अध्याय की व्याख्या की जाएगी।
आत्रेय पहले वे नेत्र और बस्तियाँ गिनाते हैं जिन्हें बस्ति कर्म में छोड़ देना चाहिए: आठ प्रकार के दोषपूर्ण नेत्र (छोटा, लम्बा, पतला, मोटा, पुराना, ढीले बन्धन वाला, बगल में छेद वाला और टेढ़ा) और आठ प्रकार की दोषपूर्ण बस्तियाँ। फिर बताया गया है कि इन दोषों से क्या हानियाँ होती हैं, और बस्ति देने वाले की अपनी त्रुटियों से, जैसे बहुत तेज़ी से देना, झटका देना, तिरछा देना या हाथ काँपना, कौन-से दोष पैदा होते हैं।
इसके बाद अध्याय एक-एक व्यापत्ति को लेता है। हर बार पहले बताया जाता है कि क्या चूक हुई, उससे शरीर में कौन-सा कष्ट होता है, और फिर चरक संहिता के अनुसार उसका उपचार क्या है: जैसे हवा के भीतर जाने से शूल और तोद, नेत्र का अटक जाना, गुदा की वली (भीतरी तह) का क्षत होना, स्नेह का प्रभाव न डालना या तुरन्त लौट आना, और बस्ति का कोष्ठ में रुक जाना या गले तक चढ़ आना।
अन्त के श्लोक में निष्कर्ष है: जो वैद्य नेत्र और बस्ति देने वालों के इन दोषों को उपचारों सहित जानता है, उसी से बुद्धिमान व्यक्ति को बस्तिकर्म करवाना चाहिए। अध्याय की पुष्पिका के अनुसार यह तन्त्र अग्निवेश का रचा हुआ है, चरक ने इसका संशोधन किया, और जो भाग प्राप्त नहीं था उसे दृढबल ने पूरा किया।
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।
अर्थ: औषध, उपचार।
चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।
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॥ १ ॥
अब हम नेत्रबस्तिव्यापत्सिद्धि (नेत्र और बस्ति की व्यापत्तियों की चिकित्सा) अध्याय की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
भगवान् आत्रेय ने ऐसा कहा।
। ॥ ३ ॥
अब (मैं) उन नेत्रों (बस्ति की नलियों) और बस्तियों (थैलियों) को बताता हूँ जो कर्मों में त्याज्य हैं; तुम सुनो; तथा अज्ञानी (अनाड़ी) द्वारा प्रयुक्त नेत्र की व्यापत्तियाँ चिकित्सा सहित (भी सुनो)।
। ॥ ४ ॥
छोटा, लम्बा, पतला, मोटा, पुराना, ढीले बन्धन वाला, बगल में छेद वाला तथा टेढ़ा - इन आठ (प्रकार के) नेत्रों को छोड़ देना चाहिए।
। ॥ ५ ॥
(इन नेत्रों के) दोष क्रम से ये हैं: अप्राप्ति (अन्त तक न पहुँचना), अतिगति (अधिक भीतर जाना), क्षोभ (हिल-डुल कर क्षुब्ध करना), कर्षण (खिंचाव), क्षणन (चोट), स्रव (रिसना), गुदा में पीड़ा और टेढ़ी गति।
। ॥ ६ ॥
विषम (ऊबड़-खाबड़), मांसल (मोटे मांस वाली), छिन्न (कटी हुई), स्थूल (मोटी), जालिक (जाल जैसी नसों वाली), वातल (वायु से भरी), स्निग्ध (चिकनी) और क्लिन्न (भीगी हुई) - इन आठ बस्तियों को कर्मों में छोड़ देना चाहिए।
। ॥ ७ ॥
बस्ति के दोष से ये होते हैं: गति की विषमता (टेढ़ी-मेढ़ी धार), विस्रता (कच्चे मांस जैसी गन्ध), स्राव (रिसना), दौर्ग्राह्य (पकड़ने में कठिनाई), निस्रव (नीचे-नीचे बह जाना), झागदार होना, च्युति (फिसल जाना) और अधार्यत्व (थामे न रखा जा सकना)।
। ॥ ८ ॥
सवात (वायु सहित), अतिद्रुत (बहुत तेज़), उत्क्षिप्त (ऊपर की ओर झटका देकर), तिर्यक् (तिरछा), उल्लुप्त (बीच में कटा हुआ), कम्पित (काँपता हुआ), तथा अति, बाह्य, मन्द और अतिवेग - ये दोष प्रणेता (बस्ति देने वाले) के कारण से होते हैं।
। ॥ ९ ॥
(बस्ति में से) वायु निकाले बिना देने पर, या (नेत्र का मुँह) बँधा होने पर, या (औषधि) पूरी तरह दे दिए जाने पर, भीतर घुसी हुई कुपित वायु शूल और तोद (चुभन) करने वाली हो जाती है।
। ॥ १० ॥
उस (दोष) में गुदा पर अभ्यंग (तेल आदि की मालिश), स्वेद (सेंक) और वातनाशक भोजन (उपयोगी हैं), जब (नेत्र) तेज़ी से भीतर डाला गया हो, खींचकर निकाला गया हो या अचानक ऊपर को झटका दिया गया हो।
। ॥ ११ ॥
कमर, गुदा और जंघाओं में पीड़ा, बस्ति (पेडू) में जकड़न और जाँघों में वेदना होती है। उसमें वातनाशक भोजन, स्नेह, स्वेद और बस्तियाँ (उपयोगी हैं)।
। ॥ १२ ॥
जब नेत्र का द्वार तिरछी वली (तह या सिलवट) से ढक गया हो या (नेत्र) अटक गया हो और आगे न जाए, तब उस नेत्र को सीधा करके खींचकर निकाले, शुद्ध करके फिर प्रविष्ट करे।
। ॥ १३ ॥
जब (बस्ति) गुदा में बीच में दबाकर छोड़ दी जाती है, तब रुकी हुई बलवान वायु छाती और सिर में पीड़ा तथा दोनों जाँघों में शिथिलता उत्पन्न करती है।
। ॥ १४ ॥
उसमें बस्ति बिल्व आदि, फल, श्यामा आदि और मूत्र से युक्त हो। काँपने (झटके) से चोट खाई गुदा में दाह, दवथु (संताप) और शोथ होता है।
। ॥ १५ ॥
उसमें कषाय और मधुर, शीतल सेक तथा बस्तियाँ (उपयोगी हैं)। अत्यधिक मात्रा में डाले गए नेत्र से वली (भीतरी तह) के क्षत हो जाने के कारण
। ॥ १६ ॥
(उक्त दशा में) पीड़ा सहित दाह, निस्तोद (चुभन) और गुदा से मल का निकलना होता है। उसमें घी, पिचु (रुई का फाहा), दूध और पिच्छा बस्ति का प्रयोग प्रशस्त है।
। ॥ १७ ॥
मन्द (धीमा) स्नेह प्रभाव नहीं डालता, और बाह्य (बाहर ही रहने वाला) शीघ्र लौट आता है; सिद्धि (सफलता) चाहने वाले को वहाँ फिर से स्नेह ठीक प्रकार से देना चाहिए।
। ॥ -
बहुत अधिक दबाई गई (बस्ति) कोष्ठ में ठहर जाती है अथवा गले तक आ जाती है। वहाँ बस्ति, विरेचन और गले की पीड़ा आदि का उपचार (करना चाहिए)। इस विषय में श्लोक-
। ॥ १९ ॥
जो नेत्र और बस्ति देने वालों के इन दोषों को उनके उपचारों सहित जानता है, उसी के द्वारा बुद्धिमान (व्यक्ति) बस्तिकर्म करवाए।
॥॥
इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संशोधित, जो भाग अप्राप्त था उसे दृढबल द्वारा पूर्ण किए गए तन्त्र के सिद्धिस्थान में नेत्रबस्तिव्यापत्सिद्धि नामक पाँचवाँ अध्याय (समाप्त हुआ)।