भारत संहिता

अध्याय ६

वमनविरेचनव्यापत्सिद्धिः

वमन और विरेचन की व्यापत्तियाँ

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भूमिका

यह चरक संहिता के सिद्धिस्थान का छठा अध्याय है। इसका नाम वमनविरेचनव्यापत्सिद्धि है, यानी वमन और विरेचन की व्यापत्तियाँ। व्यापत्ति का अर्थ है बिगाड़, यानी इन शोधन-क्रियाओं के ठीक से न होने पर पैदा होने वाली गड़बड़ियाँ; सिद्धि का अर्थ है उनका सफल उपचार। अध्याय के आरम्भ में भगवान् आत्रेय बताते हैं कि वे वमन और विरेचन की सही विधि कहेंगे, और फिर उनके ठीक से न किए जाने पर होने वाले दोष, उपचारों सहित।

पहले भाग में पाठ शोधन की तैयारी और सही विधि की बात करता है। वह ऋतुओं का विभाजन बताता है और कहता है कि स्वस्थ व्यक्ति के लिए ऋतु देखी जाती है, जबकि रोग में रोग की स्थिति के अनुसार निर्णय होता है। फिर स्नेहन और स्वेदन की भूमिका आती है, जिसे चिकने बर्तन, गीली लकड़ी और मैले कपड़े की उपमाओं से समझाया गया है। इसके बाद ठीक औषध के गुण, औषध के पच जाने और शेष रह जाने के लक्षण, और शोधन के बाद पेया आदि का क्रम बताया गया है।

अध्याय का केन्द्र योग, अतियोग और अयोग की परिभाषाएँ हैं। पाठ के अनुसार औषध की प्रवृत्ति का ठीक होना योग है, अधिक होना अतियोग है, और विपरीत दिशा से होना, न होना या थोड़ा होना अयोग है। दस व्यापत्तियाँ इन्हीं दो, अयोग और अतियोग, से मानी गई हैं, और उनके कारण सेवक, औषध, वैद्य और रोगी में से किसी का दोष हो सकता है। अयोग और अतियोग के कारण, लक्षण और उपचार अलग-अलग गिनाए गए हैं, और अतिरिक्त रक्त निकल जाने पर रक्त और पित्त को पहचानने की परीक्षाएँ भी बताई गई हैं।

इसके बाद परिकर्तिका, परिस्राव, हृद्ग्रह, अंगों का जकड़ना और विभ्रंश जैसी एक-एक व्यापत्ति का वर्णन आता है। इनमें आम तौर पर पहले यह बताया जाता है कि वह किन परिस्थितियों में होती है, फिर उसके लक्षण, और फिर पाठ में कहा गया उपचार। अध्याय के अन्त में दो श्लोक सार के रूप में आते हैं।

जो बात इस अध्याय से साथ ले जाने की है, वह यह कि पाठ के अनुसार वमन और विरेचन तभी ठीक काम करते हैं जब रोगी की तैयारी, औषध की मात्रा और गुण, और रोगी की अपनी अवस्था, तीनों ठीक हों। इसलिए अन्तिम उपदेश यह है कि लोगों का आरोग्य चाहने वाला बुद्धिमान वैद्य इन व्यापत्तियों और रोगी की अवस्थाओं को यथार्थ रूप से जानकर ही संशोधन करे।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ९४-९५)

तत्र श्लोकौ-इत्येता व्यापदः प्रोक्ताः सरूपाः सचिकित्सिताः।वमनस्य विरेकस्य कृतस्याकुशलैर्नृणाम्॥

श्लोक ९४ →

इस विषय में दो श्लोक हैं- मनुष्यों में अकुशल (वैद्यों) द्वारा किए गए वमन और विरेचन की ये व्यापत्तियाँ (बिगाड़) लक्षणों और चिकित्सा सहित इस प्रकार कही गईं।

एता विज्ञाय मतिमानवस्थाश्चैव तत्त्वतः।दद्यात् संशोधनं सम्यगारोग्यार्थी नृणां सदा॥

श्लोक ९५ →

मनुष्यों के आरोग्य की इच्छा रखने वाला बुद्धिमान (वैद्य) इन (व्यापत्तियों) को और (रोगी की) अवस्थाओं को भी यथार्थ रूप से जानकर सदा ठीक प्रकार से संशोधन (वमन-विरेचन) करे।

मुख्य शब्द (२२) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

स्वस्थ
स्वस्थ - अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित; निरोगी
विस्तार

शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।

अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

आरोग्य
आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार

शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।

अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।

चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. सि. ६/१

।

अब हम वमनविरेचनव्यापत्सिद्धि (वमन और विरेचन की व्यापत्तियों, अर्थात् उनके ठीक से न होने पर होने वाले बिगाड़ों, की सिद्धि यानी उपचार) नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सि. ६/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।

च. सि. ६/३

। ॥ ३ ॥

अब मैं ऊर्ध्व (ऊपर की ओर काम करने वाले, यानी वमन) और अनुलोम (नीचे की ओर काम करने वाले, यानी विरेचन) - इन दो शोधनों की सम्यक् विधि कहूँगा, और उनके ठीक से न किए जाने पर होने वाले दोषों (बिगाड़ों) को उनके उपचारों सहित भी कहूँगा।

च. सि. ६/४

।! ॥ ४ ॥

अत्यधिक गर्मी, वर्षा और ठण्ड ही ग्रीष्म, वर्षा और हिम (शीत) ऋतुओं का आगमन हैं। उनके बीच में प्रावृट् आदि तीन उनकी साधारण (मध्य की, सम) ऋतुएँ हैं।

च. सि. ६/५

। ॥ ५ ॥

प्रावृट् ऋतु शुचि और नभ (इन दो मासों वाली) जाननी चाहिए; फिर शरद् ऊर्ज और सह (इन दो मासों वाली); और तपस्य तथा मधु (इन दो मासों वाला) वसन्त है - शोधन के सम्बन्ध में।

च. सि. ६/६

! । ॥ ६ ॥

इन ऋतुओं को इस प्रकार विभाजित करके वैद्य को संशोधन (वमन-विरेचन) देना चाहिए - स्वस्थ व्यक्ति की चर्या को ध्यान में रखकर; परन्तु रोग होने पर रोग की प्रबलता के अनुसार।

च. सि. ६/७

! । ॥ ७ ॥

वमन आदि कर्मों के बीच-बीच में स्नेहन और स्वेदन का प्रयोग करना चाहिए, और अन्त में स्नेह का प्रयोग करना चाहिए।

च. सि. ६/८

!। ॥ ८ ॥

विसर्प, पिडका, शोफ, कामला और पाण्डु रोग वाले, तथा चोट और विष से पीड़ित रोगियों को अधिक स्निग्ध (चिकना) न किए हुए की अवस्था में विरेचन देना चाहिए।

च. सि. ६/९

। ! ॥ ९ ॥

जिसका शरीर बहुत स्निग्ध न हुआ हो, उसे स्नेह-विरेचन (चिकनाई के साथ विरेचन) देना चाहिए; और जिसका शरीर स्नेह से उत्क्लिष्ट (दोषों के उभार या क्षोभ से भरा) हो गया हो, उसे रूक्ष (रूखा) विरेचन देना चाहिए।

च. सि. ६/१०

। ॥ १० ॥

स्नेहन और स्वेदन से युक्त व्यक्ति द्वारा, (भोजन के) जीर्ण हो जाने पर, एकाग्र मन से पिया हुआ मात्रा वाला औषध सम्यक् योग (ठीक प्रकार की क्रिया) के लिए समर्थ होता है।

च. सि. ६/११

। ॥ ११ ॥

जैसे चिकने बर्तन से पानी बिना प्रयत्न के हट जाता है, वैसे ही स्निग्ध शरीर से कफ आदि (दोष) औषधों द्वारा हटा दिए जाते हैं।

च. सि. ६/१२

। ॥ १२ ॥

जैसे अग्नि गीली लकड़ी को सब ओर से बहाने वाली (रस टपकाने वाली) कर देती है, वैसे ही स्वेद स्निग्ध व्यक्ति के जमे हुए (स्थिर) दोषों को बहा देता है।

च. सि. ६/१३

। !॥ १३ ॥

जैसे मैला कपड़ा (मैल को) ढीला करके पानी से शुद्ध किया जाता है, वैसे ही स्नेहन और स्वेदन से (दोषों को) ढीला करके मल (दोष) शोधनों से शुद्ध किया जाता है।

च. सि. ६/१४

। ॥ १४ ॥

अजीर्ण में ग्लानि बढ़ती है और विबन्ध भी उत्पन्न होता है; और पिया हुआ संशोधन विपरीत रूप से प्रवृत्त होता है।

च. सि. ६/१५

। ॥ १५ ॥

(वह औषध) जो अल्प मात्रा वाला, बड़े वेग वाला, बहुत दोषों को हरने वाला, सुखकर, पाक में हल्का, स्वाद में सुखद, तृप्त करने वाला और रोग का नाश करने वाला हो

च. सि. ६/१६

। ॥ १६ ॥

और जो व्यापत्ति (बिगाड़) की स्थिति में भी विकार करने वाला न हो, जो अधिक ग्लानि करने वाला न हो, और जो गन्ध, वर्ण और रस से युक्त हो - ऐसे औषध को मात्रावत् (उचित मात्रा-गुण वाला) जानना चाहिए।

च. सि. ६/१७

। ॥ १७ ॥

मन के दोषों को, अर्थात् काम आदि को जो अशुभ फल उत्पन्न करते हैं, दूर करके एकाग्र मन से पिया हुआ औषध सम्यक् योग (ठीक प्रभाव) के लिए समर्थ होता है।

च. सि. ६/१८

। , ॥ १८ ॥

जो मनुष्य कल वमन का औषध पीने वाला हो, वह कफ बढ़ाने वाला भोजन करे; (जो विरेचन का औषध पीने वाला हो, वह) सरलता से पचने वाला, अधिकतर द्रव, हल्का और ठंडा न हो ऐसा (भोजन) करे।

च. सि. ६/१९

। ॥ १९ ॥

कफ के उत्क्लिष्ट (उभरे हुए) और अल्प होने से दोष शीघ्र बह निकलते हैं। औषध पी चुके (रोगी) के शुद्धि के लक्षणों को वैद्य देखे।

च. सि. ६/२०

। ॥ २० ॥

ऊपर से (वमन में) कफ के पीछे पित्त आने पर, और नीचे से (विरेचन में) मल और पित्त के बाद कफ आने पर, यदि कृशता और दुर्बलता हल्केपन के साथ हों, तो (वैद्य) कहे कि दोष निकल गए हैं।

च. सि. ६/२१

। ॥ २१ ॥

फिर शेष औषध से वमन कराए, पर अलाघव (हल्केपन के न होने) में नहीं। स्तैमित्य (जकड़न-भारीपन) होने पर, वायु के रुकने पर और डकार न आने पर भी वमन कराए।

च. सि. ६/२२

। ॥ २२ ॥

हल्केपन तक और (कफ के) पतले हो जाने तक (वमन कराए); उससे आगे कफ की आपत्ति (हानि) हो सकती है। वमन ठीक से हो जाने पर अग्नि बढ़ती है और दोष शान्त हो जाते हैं।

च. सि. ६/२३

। ॥ २३ ॥

वमन कराए हुए (रोगी) को, ठीक से पचने के लक्षण न देखता हुआ (वैद्य) लङ्घन कराए। उन लक्षणों को देखकर पेया आदि का क्रम करे, लङ्घन नहीं।

च. सि. ६/२४

। ॥ २४ ॥

दोनों संशोधनों से शुद्ध हुए, दोष निकल चुके देहधारी की अग्नि मन्द हो जाती है; इसलिए पेया आदि का क्रम अपनाए।

च. सि. ६/२५

। ॥ २५ ॥

कफ और पित्त के भलीभाँति शुद्ध हो जाने पर, (दोष) थोड़ा रहने पर, मद्य पीने वाले में और वात-पित्त प्रधान (व्यक्ति) में तर्पण आदि का क्रम करे; क्योंकि पेया उन्हें अभिष्यन्द करा देती है।

च. सि. ६/२६

।॥ २६ ॥

वायु का अनुकूल (ठीक दिशा में चलने वाला) होना, स्वस्थता, भूख, प्यास, बल, मन की दृढ़ता, हल्कापन, इन्द्रियों और डकार की शुद्धि: ये औषध के पच जाने के लक्षण हैं।

च. सि. ६/२७

। ॥ २७ ॥

क्लम (थकान), दाह (जलन), अंगों का शिथिल होना, चक्कर, मूर्च्छा, सिर की पीड़ा, अरति (बेचैनी), और बल की हानि: ये औषध के शेष रह जाने के लक्षण हैं।

च. सि. ६/२८

। ॥ २८ ॥

असमय में (दिया गया), बहुत थोड़ा या बहुत अधिक मात्रा का, पुराना, भावना न दिया हुआ और ठीक से संस्कार न किया हुआ औषध शीघ्र विकृत हो जाता है।

च. सि. ६/२९

। ॥ २९ ॥

आध्मान (पेट का फूलना), परिकर्ति (काटने जैसी पीड़ा), स्राव (बहना), हृदय और अंगों का जकड़ना, जीवादान, सविभ्रंश (विभ्रंश सहित), स्तम्भ (जकड़न), सोपद्रव (उपद्रव सहित) और क्लम (थकान)।

च. सि. ६/३०

। ॥ ३० ॥

अयोग और अतियोग से (होने वाली) ये दस व्यापत्तियाँ मानी गई हैं; (ये) सेवक, औषध और वैद्य के दोष से और रोगी के दोष से भी (होती हैं)।

च. सि. ६/३१

। ॥ ३१ ॥

योग वह है जिसमें (औषध की) प्रवृत्ति ठीक से हो; अतियोग अतिवर्तन (अधिक प्रवृत्ति) है; अयोग वह है जिसमें प्रवर्तन विपरीत दिशा से हो, या न हो, या थोड़ा हो।

च. सि. ६/३२

। ॥ ३२ ॥

कफ के उभार से, या (औषध के) दुर्गन्धयुक्त, अप्रिय अथवा बहुत अधिक होने पर, और अजीर्ण में पिया हुआ विरेचन ऊपर (मुख की ओर) निकल जाता है।

च. सि. ६/३३

। ॥ ३३ ॥

भूख से पीड़ित होने और मृदु कोष्ठ होने के कारण, अथवा थोड़े उभरे हुए कफ के कारण, तीक्ष्ण (औषध के रूप में) पिया हुआ विरेचन (कोष्ठ में) ठहरा हुआ और क्षुब्ध होकर वमन बन जाता है।

च. सि. ६/३४

।, ॥ ३४ ॥

दोषों को उलटी दिशा से और अधूरा निकालने के कारण वे दोनों (वमन और विरेचन) अयोग नाम वाले कहे जाते हैं। (अयोग में) दोष कठिनाई से निकलता है, या नहीं निकलता, या थोड़ा-थोड़ा निकलता है।

च. सि. ६/३५

। ॥ ३५ ॥

जिसने औषध पी ली है, वह यदि शुद्ध न हुआ हो, तो उस (औषध) के पच जाने पर फिर से औषध पिए। अपच होने पर नहीं (पिए); (तब) अतियोग से दूसरा भय हो सकता है।

च. सि. ६/३६

। ॥ ३६ ॥

कोष्ठ की गुरुता (भारीपन) या लघुता और बल को जानकर, अयोग होने पर मृदु अथवा तीक्ष्ण औषध ही दे।

च. सि. ६/३७

। ॥ ३७ ॥

दुश्छर्द (कठिनाई से वमन करने वाले) को वमन (औषध) और दुष्कोष्ठ (कठोर कोष्ठ वाले) को विरेचन (औषध) फिर से न पिलाए, क्योंकि दोबारा पी हुई औषध उन दोनों को मार सकती है।

च. सि. ६/३८

। ॥ ३८ ॥

जिसका शरीर स्निग्ध और स्विन्न नहीं किया गया है, उस रूक्ष व्यक्ति में दी गई पर्याप्त औषध दोषों को उभारकर उन्हें निकालने में असमर्थ होकर रोगों को उत्पन्न कर देती है

च. सि. ६/३९

। ॥ ३९ ॥

(वे रोग ये हैं:) विभ्रंश, सूजन, हिचकी, आँखों के आगे बहुत अँधेरा दिखना, पिंडलियों में ऐंठन, खुजली, दोनों जाँघों में शिथिलता और रंग बिगड़ना।

च. सि. ६/४०

। ॥ ४० ॥

स्निग्ध और स्विन्न व्यक्ति में (औषध) बहुत थोड़ी हो, या दीप्त अग्नि वाले में औषध पच जाए, या शीतल (द्रव्यों) से जकड़ी हुई हो, या आम की अवस्था में हो, तो वह दोषों को उभारकर उन्हें नहीं निकालती।

च. सि. ६/४१

। ॥ ४१ ॥

वह (औषध) उन्हीं रोगों को उत्पन्न करती है; वह सब अयोग ही है। बुद्धिमान् (वैद्य) उसे जानकर वहाँ शास्त्र में कही हुई चिकित्सा करवाए।

च. सि. ६/४२

। ॥ ४२ ॥

उसे तेल और नमक से अभ्यक्त (मालिश किया हुआ) करके, प्रस्तर और सङ्कर (स्वेदन-विधियों) से स्विन्न करके, फिर (औषध) पिलाए; (उसके) पच जाने पर मूत्र सहित (द्रव्यों) से निरूहण (बस्ति) दे।

च. सि. ६/४३

। ॥ ४३ ॥

निरूहण (बस्ति) दिए हुए (रोगी) को धान्व (मरुस्थल के प्राणियों के) रसों से भोजन कराकर, फल, मागधिका (पिप्पली) और दारु के साथ सिद्ध किए गए तेल से उचित मात्रा में अनुवासन (बस्ति) दे।

च. सि. ६/४४

। ॥ ४४ ॥

वातहर स्नेहों से उसे स्निग्ध करके फिर तीक्ष्ण (औषध) से शुद्ध करे; अतितीक्ष्ण से नहीं, क्योंकि उससे अतियोग उत्पन्न होता है।

च. सि. ६/४५

। ॥ ४५ ॥

भूख से पीड़ित और मृदु कोष्ठ वाले के (शरीर में) अतितीक्ष्ण औषध विट् (मल), पित्त और कफ को शीघ्र निकालकर द्रव धातुओं को बहा देती है

च. सि. ६/४६

। ॥ ४६ ॥

(वह अतितीक्ष्ण औषध) बल और स्वर का क्षय, दाह, कण्ठ का सूखना, चक्कर और प्यास उत्पन्न कर देता है। उस दशा में मधुर (द्रव्यों) से शेष औषध को बाहर निकाल दे (वमन करा दे)।

च. सि. ६/४७

। ॥ ४७ ॥

वमन (के अतियोग) में विरेचन होना चाहिए और विरेचन (के अतियोग) में फिर वमन; तथा परिषेक, अवगाह आदि अत्यन्त शीतल उपायों से उसे रोके।

च. सि. ६/४८

।॥ ४८ ॥

कषाय और मधुर रस वाले, शीतल अन्न, पान और औषधों से, तथा रक्तपित्त और अतिसार को नष्ट करने वाले और दाह और ज्वर को हरने वाले (अन्न, पान और औषधों) से भी (रोके)।

च. सि. ६/४९

। ॥ ४९ ॥

अञ्जन, चन्दन, उशीर, मज्जा, असृक्, शर्करा और जल को लाज (भुने अन्न) के चूर्णों के साथ मिलाकर बना मन्थ पिए; यह अतियोग को दूर करने में उत्तम है।

च. सि. ६/५०

। ॥ ५० ॥

अथवा वट आदि (वृक्षों) के शुङ्गों से सिद्ध की हुई, मधु मिली पेया दिलाए; और मल को बाँधने वाले (द्रव्यों) से सिद्ध दूध तथा भोजन दिलाए।

च. सि. ६/५१

। ॥ ५१ ॥

अथवा जाङ्गल (मांस) रसों के साथ भोजन (कराए); पिच्छाबस्ति भी प्रशस्त है; और मधुर (द्रव्यों) से सिद्ध क्षीर और घी से अनुवासन देना चाहिए।

च. सि. ६/५२

। ॥ ५२ ॥

वमन के अतियोग में, शीतल जल से सींचा हुआ (रोगी) कफ को हरने वाले (द्रव्यों) से बना, घी, मधु और शर्करा सहित मन्थ पिए।

च. सि. ६/५३

। ॥ ५३ ॥

डकारों सहित अत्यधिक वमन (वम्या) और मूर्च्छा होने पर, धान्य और मुस्त का मधूक और काञ्चन सहित चूर्ण मधु मिलाकर चटाए।

च. सि. ६/५४

।॥ ५४ ॥

वमन करते हुए (रोगी) की जीभ के भीतर घुस जाने पर, स्निग्ध, अम्ल, लवण और मनभावन यूष, क्षीर और (मांस) रसों के कवलग्रह हितकर हैं।

च. सि. ६/५५

। ॥ ५५ ॥

और उसके सामने दूसरे मनुष्य खट्टे फल खाएँ। बाहर निकली हुई (जीभ) को तिल और द्राक्षा के कल्क से लिप्त करके भीतर प्रविष्ट कराए।

च. सि. ६/५६

। ॥ ५६ ॥

वाणी के रुकने और वातरोगों में बुद्धिमान (वैद्य) घी और मांस से तैयार की हुई पतली यवागू दे, तथा स्नेह और स्वेद भी।

च. सि. ६/५७

। ॥ ५७ ॥

जिसे वमन कराया गया हो, जिसे विरेचन कराया गया हो, जो मन्दाग्नि वाला हो और जिसे लंघन कराया गया हो, (वह) अग्नि और प्राण की वृद्धि के लिए पेया आदि का क्रम अपनाए।

च. सि. ६/५८

। ॥ ५८ ॥

बहुत दोष वाले, रूक्ष, हीन अग्नि वाले और उदावर्त सहित (रोगी) में थोड़ा औषध, दोषों को उभारकर और मार्गों को रोककर

च. सि. ६/५९

। ॥ ५९ ॥

(वह) नाभि को अत्यन्त फुला दे, पीठ, पार्श्व और सिर में पीड़ा उत्पन्न करे, और श्वास, विष्ठा, मूत्र और वात का भयंकर अवरोध कर दे।

च. सि. ६/६०

। ॥ ६० ॥

अभ्यङ्ग, स्वेद, वर्ति आदि, निरूह और अनुवासन सहित, उदावर्त को हरने वाला सब कर्म आध्मात (अफारे से पीड़ित) रोगी के लिए प्रशस्त है।

च. सि. ६/६१

। ॥ ६१ ॥

स्नेहन किए हुए (चिकने) व्यक्ति को, भारी कोष्ठ वाले को, आम की अवस्था में तीव्र औषध देने पर, अथवा दुर्बल, मृदु कोष्ठ वाले, थके हुए या अल्प बल वाले को (तीव्र औषध देने पर)

च. सि. ६/६२

। ॥ ६२ ॥

पी हुई औषध गुदा तक पहुँचकर आम सहित दोष को शीघ्र बाहर निकालकर तीव्र शूल (पीड़ा) वाली तथा पिच्छ (लसदार स्राव) और रक्त से युक्त परिकर्तिका उत्पन्न करती है।

च. सि. ६/६३

। ॥ ६३ ॥

आम की अवस्था में लङ्घन, पाचन, रूक्ष और उष्ण तथा हल्का भोजन (देना चाहिए)। दुर्बल व्यक्ति के लिए सारी बृंहण (पुष्टिकारक) विधि और मधुर (उपाय) भी।

च. सि. ६/६४

। ॥ ६४ ॥

आम के पच जाने पर भी यदि रोग का सम्बन्ध (अनुबन्ध) बना रहे तो हल्का, क्षार और खट्टा (पदार्थ) अच्छा बताया गया है; अथवा पुष्पकासीस मिला हुआ, या क्षार से, या नमक से (युक्त)।

च. सि. ६/६५

। ॥ ६५ ॥

वात के अधिक होने पर अनार के रस सहित घी पीए। भोजन और पेय में अनार के छिलके से युक्त खट्टा दही (दे)।

च. सि. ६/६६

। ॥ ६६ ॥

अथवा देवदारु और तिल का कल्क गरम पानी के साथ पीए; या अश्वत्थ (पीपल), उदुम्बर (गूलर), प्लक्ष (पाकड़) और कदम्ब से पकाया हुआ दूध (पीए)।

च. सि. ६/६७

। ॥ ६७ ॥

कषाय और मधुर, ठण्डा (उपाय), या पिच्छाबस्ति भी, अथवा यष्टीमधु से सिद्ध किया हुआ स्नेहबस्ति (वैद्य) दिलाए।

च. सि. ६/६८

। ॥ ६८ ॥

जिसमें दोष बहुत हैं उसे थोड़ी औषध, दोष को उभारकर, थोड़ा-थोड़ा बहाती (निकालती) है, और खुजली, सूजन, कुष्ठ (त्वचा रोग) तथा भारीपन (उत्पन्न करती है)

च. सि. ६/६९

। , ॥ ६९ ॥

अग्नि और बल (की कमी), उत्क्लेश (मिचली), स्तैमित्य (जकड़न-भारीपन), अरुचि और पाण्डुता (पीलापन) भी वह परिस्राव उत्पन्न करता है; उस दोष को शान्त करे अथवा वमन भी कराए।

च. सि. ६/७०

। ॥ ७० ॥

अथवा स्नेहन कराए हुए (व्यक्ति) को फिर से तीक्ष्ण विरेचन पिलाए। शुद्धि हो जाने पर चूर्ण, आसव और अरिष्ट तथा संस्कारित (तैयार किए हुए, पेय) दिलाए।

च. सि. ६/७१

। ॥ ७१ ॥

औषध पी हुई (व्यक्ति) के वेगों को रोकने से कुपित हुए वात आदि (दोष) हृदय में जाकर भयंकर हृद्ग्रह उत्पन्न करते हैं।

च. सि. ६/७२

। ॥ ७२ ॥

वह (रोगी) हिचकी, खाँसी, पसलियों की पीड़ा, दीनता, लार बहना और आँखों के घूमने के साथ संज्ञा-रहित होकर दाँतों को किटकिट करता हुआ जीभ को काटता है।

च. सि. ६/७३

। ॥ ७३ ॥

वहाँ वैद्य घबराए नहीं; पित्त की मूर्च्छा से पीड़ित उसको मधुर (द्रव्यों) से और कफ से मूर्च्छित को कटु (द्रव्यों) से शीघ्र वमन कराए।

च. सि. ६/७४

। ॥ ७४ ॥

इसके बाद इसके शेष दोष को पाचक (औषधों) से पचाए; और फिर क्रम से इसकी कायाग्नि और बल को बढ़ाए (उठाए)।

च. सि. ६/७५

। ॥ ७५ ॥

वात के कारण अधिक वमन करने वाले का हृदय जिसे पीड़ा देता है, उसे स्निग्ध, खट्टा और नमकीन दे; पित्त और कफ (की स्थिति) में इससे भिन्न (दे)।

च. सि. ६/७६

। ॥ ७६ ॥

औषध पी चुके व्यक्ति में वेगों को रोकने से, या कफ से रुका हुआ, अथवा अधिक शुद्धि हो जाने पर, मारुत (वात) अंगों को जकड़ लेता है।

च. सि. ६/७७

। ॥ ७७ ॥

जकड़न, कम्पन, चुभन, अवसाद, ऐंठन और मथने जैसी पीड़ा से (युक्त होने पर) वहाँ वात को हरने वाला स्नेह, स्वेद आदि सब उपचार कराना चाहिए।

च. सि. ६/७८

। ॥ ७८ ॥

मृदु कोष्ठ वाले और अल्प दोष वाले (व्यक्ति) के लिए अतितीक्ष्ण औषध दोषों को निकालकर और मथकर जीव (प्राणरूप) रक्त को हर लेता है।

च. सि. ६/७९

। ॥ ७९ ॥

उस (निकले हुए पदार्थ) से मिला हुआ अन्न कौए को या कुत्ते को भी दे। यदि वह उसे खा ले तो (उसे) जीव (रक्त) कहे; यदि न खाए तो पित्त बताए।

च. सि. ६/८०

। ॥ ८० ॥

अथवा श्वेत वस्त्र को (उस पदार्थ में) भिगोकर, सुखाकर (आवान), गुनगुने पानी से धोने पर यदि वह बदरंग (दागदार) हो जाए तो पित्त में, और यदि शुद्ध (साफ़) हो जाए तो रक्त में (मानना चाहिए)।

च. सि. ६/८१

। ॥ ८१ ॥

प्यास, मूर्च्छा और मद से पीड़ित उस (रोगी) की मृत्यु तक (आवश्यकता हो तो) पित्त को हरने वाली वह सब चिकित्सा करे, जो अतियोग में हितकर है।

च. सि. ६/८२

। ॥ ८२ ॥

जीवित मृग, गाय, भैंस और बकरी का ताज़ा रक्त पिए, जो जीव (रक्त) को जोड़ने वाला है; क्योंकि वह शीघ्र जीव (रक्त) बन जाता है।

च. सि. ६/८३

। ॥ ८३ ॥

उसी रक्त को दर्भ से मसला हुआ बस्ति के रूप में दिलाए; और श्यामा, काश्मर्य, बदरी, दूर्वा तथा उशीर के साथ पकाया हुआ दूध (भी बस्ति के रूप में दे)।

च. सि. ६/८४

। ॥ ८४ ॥

घृतमण्ड और अञ्जन से युक्त ठण्डी बस्ति दे; या अत्यन्त ठण्डी पिच्छा बस्ति, अथवा घृतमण्ड का अनुवासन दे।

च. सि. ६/८५

। ॥ ८५ ॥

भ्रष्ट (बाहर निकली) गुदा को कषायों से रोककर भीतर प्रविष्ट कराए; और इसकी संज्ञा नष्ट होने पर साम (सामगान) और गान्धर्व (गायन-वादन) के शब्द कराए।

च. सि. ६/८६

। ॥ ८६ ॥

जब पिया हुआ विरेचन विट् (मल) तक ही ठहर जाए, या वमन औषध तक ही रहे, और दोषों को उभारकर उन्हें बाहर न लाए

च. सि. ६/८७

। ॥ ८७ ॥

तब कुपित हुए दोष खुजली आदि रोग उत्पन्न करते हैं। वह यहाँ विभ्रंश माना गया है; उसमें रोग के अनुसार औषध करनी चाहिए।

च. सि. ६/८८

। ॥ ८८ ॥

स्निग्ध व्यक्ति द्वारा स्नेह सहित पिया गया वह (विरेचन), मृदुता के कारण दोषों से ढका होकर, दोषों को बाहर नहीं निकालता, बल्कि अपने स्थान से हटे दोषों को रोक देता है।

च. सि. ६/८९

। ॥ ८९ ॥

वात के रुकने, गुदा की जकड़न और शूल के साथ (मल) थोड़ा-थोड़ा निकलता है; ऐसा व्यक्ति, लङ्घन और पाचन के बाद, तीक्ष्ण बस्ति या विरेचन के योग्य है।

च. सि. ६/९०

। ॥ ९० ॥

रूक्ष व्यक्ति या अल्प बल वाले (व्यक्ति) द्वारा पिया गया रूक्ष विरेचन वात को कुपित करके शीघ्र ही भयंकर उपद्रव करता है।

च. सि. ६/९१

। ॥ ९१ ॥

जब सभी अंगों में भयंकर स्तम्भ (जकड़न) और शूल (पीड़ा) हों और रोगी मूर्च्छित-सा होने लगे, तब वहाँ स्नेह (चिकनाई) और स्वेद (पसीना लाने की क्रिया) आदि से आरम्भ होने वाली, वात को शान्त करने वाली विधि करनी चाहिए।

च. सि. ६/९२

। ॥ ९२ ॥

स्निग्ध (चिकनाई दिए हुए) और मृदु कोष्ठ वाले (व्यक्ति) में मृदु औषध (दोषों को) उभारकर तथा कफ, पित्त और वात को रोककर तन्द्रा सहित भारीपन और क्लम (थकान)

च. सि. ६/९३

। ॥ ९३ ॥

दुर्बलता और अंगों की शिथिलता (अंगसाद) भी शीघ्र उत्पन्न करता है; उसे (दोषों को) बाहर निकाल देना चाहिए। यहाँ लङ्घन, पाचन तथा स्निग्ध और तीक्ष्ण शोधन (कराना चाहिए)।

च. सि. ६/९४

- । ॥ ९४ ॥

इस विषय में दो श्लोक हैं- मनुष्यों में अकुशल (वैद्यों) द्वारा किए गए वमन और विरेचन की ये व्यापत्तियाँ (बिगाड़) लक्षणों और चिकित्सा सहित इस प्रकार कही गईं।

च. सि. ६/९५

। ॥ ९५ ॥

मनुष्यों के आरोग्य की इच्छा रखने वाला बुद्धिमान (वैद्य) इन (व्यापत्तियों) को और (रोगी की) अवस्थाओं को भी यथार्थ रूप से जानकर सदा ठीक प्रकार से संशोधन (वमन-विरेचन) करे।

च. सि. ६

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संशोधित, (जिसके कुछ अंश) अप्राप्त थे और दृढबल द्वारा पूर्ण किए गए तन्त्र के सिद्धिस्थान में वमनविरेचनव्यापत्सिद्धि नामक छठा अध्याय (समाप्त हुआ)। ६