भारत संहिता

अध्याय ८

प्रासृतयोगीयसिद्धिः

प्रसृत मात्रा के योग

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भूमिका

इस अध्याय का नाम प्रासृतयोगीय है, जिसका अर्थ है प्रसृत की मात्रा से बनने वाले योग। प्रसृत हथेली भर का एक पुराना माप है। अध्याय के आरम्भ में भगवान् आत्रेय घोषणा करते हैं कि वे अब इसी नाम के सिद्धिस्थान के अध्याय की व्याख्या करेंगे।

आरम्भ में आत्रेय बताते हैं कि वे कोमल प्रकृति के लोगों के लिए, और शोधन-कर्म से कष्ट पाए हुए लोगों के लिए, मृदु निरूह तथा स्नेहन बस्तियों को प्रसृत मात्राओं के साथ अलग-अलग कहेंगे। इसके बाद एक-एक करके बस्ति के योग गिनाए जाते हैं: कुछ वात को दूर करने वाले, कुछ शुक्र या वृषत्व को बढ़ाने वाले, कुछ मेह, कुष्ठ, क्रिमि या मल के रुकने जैसी दशाओं के लिए। हर योग में द्रव्य और उनके प्रसृत गिने गए हैं। फिर बताया गया है कि मृदु बस्ति से असर न दिखे तो तीक्ष्ण बस्ति, और तीक्ष्ण बस्तियों से शरीर खिंच जाए तो स्वादु प्रत्यास्थापन उचित माना गया है।

अध्याय का दूसरा बड़ा भाग अतिसार का है। इसमें आम, मल, वात, रक्त, पित्त और कफ के अकेले तथा आपस में मिले हुए रूपों के अनुसार पान, पाचन और बस्ति के रस, यानी स्वाद, बताए गए हैं: जैसे आम की अवस्था में बस्ति नहीं, पाचन उचित है। ग्रन्थ कहता है कि दो से अधिक के मेल को भी इसी तरह सोचा जाए, और अतिसार के लिए कही गई यह युक्ति सभी रोगों में मानी गई है। अन्त में यवागू के कई प्रकार गिनाए गए हैं।

अध्याय के अन्त में श्लोकों में सार दिया गया है कि किस दशा में कैसे गुण और स्वाद वाला पान या बस्ति हो, और एक समापन-श्लोक पूरे अध्याय के विषय गिनाता है: प्रसृत मात्रा वाले निरूह, व्यापदों की चिकित्सा, तथा अतिसार के लिए हितकर रस, कल्प, घृत और यवागू।

पाठक के लिए ध्यान देने की बात यह है कि यह अध्याय ग्रन्थ का कथन है: इसमें कई द्रव्यों की पहचान श्लोक में नहीं दी गई है, और यहाँ भी जहाँ पहचान निश्चित नहीं थी वहाँ नहीं दी गई। यह चिकित्सा की सलाह नहीं है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ४६)

तत्र श्लोकः-प्रासृतिकाः सव्यापत्क्रिया निरूहास्तथाऽतिसारहिताः।रसकल्पघृतयवाग्वश्चोक्ता गुरुणा प्रसृतसिद्धौ॥

श्लोक ४६ →

इस विषय में श्लोक है- प्रासृतिक निरूह (प्रसृत मात्रा वाले), व्यापद् (जटिलताओं) की चिकित्सा सहित, तथा अतिसार के लिए हितकर रस, कल्प, घृत और यवागू, गुरु ने प्रसृतसिद्धि (अध्याय) में कहे हैं।

मुख्य शब्द (११) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

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च. सि. ८/१

॥ १ ॥

अब हम प्रासृतयोगीय (प्रसृत मात्रा वाले योगों सम्बन्धी) सिद्धि (अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. सि. ८/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा।

च. सि. ८/३

। ॥ ३ ॥

अब मैं सुकुमार (कोमल प्रकृति वाले) लोगों के लिए, और कर्म (शोधन चिकित्सा) से पीड़ित हुए लोगों के लिए, इन मृदु निरूह तथा स्नेहन (बस्तियों) को प्रसृत मात्राओं के साथ अलग-अलग कहूँगा।

च. सि. ८/४

। ॥ ४ ॥

दूध से दो प्रसृत और मधु, तैल तथा घृत से तीन प्रसृत लेने चाहिए। खज (मथनी) से मथा हुआ यह बस्ति वात को नष्ट करने वाली तथा बल और वर्ण (कान्ति) को बढ़ाने वाली है।

च. सि. ८/५

। ॥ ५ ॥

तैल, प्रसन्ना, क्षौद्र (मधु) और सर्पिस् (घृत) में से प्रत्येक का एक-एक प्रसृत, बिल्व आदि की जड़ों के क्वाथ से दो प्रसृत और कुलथी के क्वाथ से दो प्रसृत (लेना चाहिए); वह वात को नष्ट करने वाला है।

च. सि. ८/६

। ॥ ६ ॥

पञ्चमूल के रस से पाँच प्रसृत, तैल से दो, तथा क्षौद्र और सर्पिस् में से प्रत्येक का एक-एक प्रसृत; यह बस्ति स्नेहन करने वाली और वात को दूर करने वाली है।

च. सि. ८/७

। ॥ ७ ॥

क्षौद्र, तैल, पयस् (दूध) और घृत में से प्रत्येक का एक-एक प्रसृत, आधा अक्ष सैन्धव और एक कर्ष हपुषा; यह निरूह शुक्र (वीर्य) को अत्यन्त बढ़ाने वाला है।

च. सि. ८/८

। ॥ ८ ॥

पटोल, निम्ब, भूनिम्ब, रास्ना और सप्तच्छद के जल (क्वाथ) से चार प्रसृत, घृत से एक प्रसृत, और सरसों के कल्क से युक्त

च. सि. ८/९

।॥ ९ ॥

यह निरूह पञ्चतिक्त है, जो मेह, अभिष्यन्द और कुष्ठ को नष्ट करने वाला है। विडङ्ग, त्रिफला, शिग्रु, फल, मुस्ता और आखुपर्णी से बने (कषाय से)

च. सि. ८/१०

। ॥ १० ॥

कषाय से पाँच प्रसृत और तैल से एक प्रसृत लेकर उन्हें मथकर, विडङ्ग और पिप्पली के कल्क से युक्त यह निरूह क्रिमियों (कृमियों) का नाश करने वाला है।

च. सि. ८/११

। ॥ ११ ॥

पयस्या, इक्षु, स्थिरा, रास्ना, विदारी, क्षौद्र और सर्पिस् में से प्रत्येक का एक-एक प्रसृत, कृष्णा के कल्क से युक्त यह बस्ति वृषत्व (पुरुषत्व, कामशक्ति) बढ़ाने वाली है।

च. सि. ८/१२

। ॥ १२ ॥

तैल, गोमूत्र, दधिमण्ड और खट्टी काञ्जिक में से (एक-एक करके) चार प्रसृत, सरसों के कल्कों के साथ; यह विट् (मल) के रुकने और आनाह को तोड़ने (दूर करने) वाला है।

च. सि. ८/१३

। ॥ १३ ॥

श्वदंष्ट्रा, अश्मभिद् और एरण्ड के रस से, तैल से और सुरासव से (एक-एक करके) पाँच प्रसृत, तथा यष्ट्याह्व (मुलेठी), कौन्ती, मागधिका (पिप्पली) और सित

च. सि. ८/१४

। ॥ १४ ॥

(इनका) कल्क मूत्रकृच्छ्र में होना चाहिए, और आनाह-युक्त अवस्था में बस्ति सर्वोत्तम है। ये नौ निरूह प्रसृत मात्राओं से (बनने वाले) नमक सहित और गुनगुने (दिए जाते हैं)।

च. सि. ८/१५

। ॥ १५ ॥

मृदु बस्ति से जड़ (शिथिल, निष्क्रिय) हुए (व्यक्ति) में दूसरा, तीक्ष्ण बस्ति अभीष्ट है; और तीक्ष्ण (बस्तियों) से अत्यधिक खिंचे हुए (क्षीण) व्यक्ति में स्वादु (मधुर) प्रत्यास्थापन अभीष्ट है।

च. सि. ८/१६

। ॥ १६ ॥

यदि वात से ग्रस्त (व्यक्ति) को उष्ण (द्रव्यों) से गुदा में जलन आदि हो जाएँ, तो द्राक्षा के जल के साथ दोषों का अनुलोमन करने वाला त्रिवृत् का कल्क देना चाहिए।

च. सि. ८/१७

। ॥ १७ ॥

वह (दोषों को नीचे निकालने वाला योग) निश्चय ही पित्त, मल और वात को निकालकर दाह आदि को जीत लेता है (शान्त करता है)। और शुद्ध हुआ (रोगी) शर्करा मिली हुई ठण्डी यवागू पिए।

च. सि. ८/१८

। ॥ १८ ॥

अथवा यदि (रोगी) अधिक विरेचन से युक्त हो गया हो और उसका मल क्षीण हो गया हो, तो वह उड़द के यूष (सूप) के साथ कुल्माष खाए, अथवा मधु या सुरा पिए।

च. सि. ८/१९

। ॥ १९ ॥

यदि (रोगी) आम सहित, शव जैसी गन्ध वाला मल शूल (पीड़ा) के साथ त्यागता हो और उसे भोजन में अरुचि हो, तो वह घन, अतिविषा, कुष्ठ, नत, दारु और वचा पिए।

च. सि. ८/२०

।, ॥ २० ॥

जो (रोगी) मल, वात, रक्त, पित्त या कफ को पके हुए रूप में (आम से रहित अवस्था में) अतिसार से निकालता है, उसमें अपने वर्ग के द्रव्यों से दी गई बस्ति श्रेष्ठ चिकित्सा है।

च. सि. ८/२१

। ॥ २१ ॥

इन छहों के दो-दो के मेल से तीस भेद होते हैं; अकेले-अकेले (छह) भेदों के साथ (गिनने पर) छत्तीस (भेद) जानने चाहिए, और उन्हें उपद्रवों सहित भी जानना चाहिए।

च. सि. ८/२२

। ॥ २२ ॥

शूल, प्रवाहिका, आध्मान, परिकर्ती, अरुचि, ज्वर, तृष्णा, उष्णता, दाह, मूर्च्छा आदि को इनके उपद्रव जानना चाहिए।

च. सि. ८/२३

। ॥ २३ ॥

उनमें आम अवस्था में व्योष, अम्ल और लवण से युक्त अन्तरपान होना चाहिए। पाचन (उपचार) उचित बताया जाता है; क्योंकि आम में बस्ति निषिद्ध है।

च. सि. ८/२४

। ॥ २४ ॥

मल की अवस्था में वात नाशक और ग्राही वर्ग के द्रव्यों से बस्ति उचित बताई जाती है। वात में मीठे, खट्टे और नमकीन द्रव्यों से स्नेह बस्ति प्रशस्त है।

च. सि. ८/२५

, । ॥ २५ ॥

रक्त (की अवस्था) में रक्त से (बस्ति); पित्त में कसैले, मीठे और कड़वे द्रव्यों से; और कफ के निकलते समय कसैले, तीखे और कड़वे द्रव्यों से बस्ति (उचित है)।

च. सि. ८/२६

। ॥ २६ ॥

आम के मल या वायु से मिलने पर, तथा उस (आम) से मल और वात के मिलने पर, व्योष, अम्ल और लवण से युक्त अन्तरपान होना चाहिए।

च. सि. ८/२७

। ॥ २७ ॥

आम के पित्त या रक्त से मिलने पर, अथवा फिर उन दोनों (पित्त और रक्त) के आम से मिलने पर, व्योष सहित मीठे और कड़वे द्रव्यों वाला पान होना चाहिए।

च. सि. ८/२८

। ॥ २८ ॥

वैसे ही कफ से मिले हुए आम में कसैले, व्योष और कड़वे द्रव्यों वाला (पान); और आम से मिले हुए कफ में व्योष, कसैले और नमकीन द्रव्यों से युक्त (पान) होना चाहिए।

च. सि. ८/२९

। ॥ २९ ॥

वात से मल या पित्त के मिलने पर, तथा मल और पित्त से वात के मिलने पर, मीठे, खट्टे और कसैले द्रव्यों वाली बस्ति उत्तम होती है।

च. सि. ८/३०

। ॥ ३० ॥

मल और रक्त के, पित्त और मल के, तथा रक्त और पित्त के आपसी मेल में कसैले, मीठे और कड़वे द्रव्यों वाली बस्ति (उचित है)।

च. सि. ८/३१

। ॥ ३१ ॥

कफ से मल या पित्त के मिलने पर, तथा कफ में मल, पित्त और रक्त के मिलने पर, व्योष, तिक्त और कषाय द्रव्यों वाली बस्ति उत्तम होती है।

च. सि. ८/३२

। ॥ ३२ ॥

कफ में वात का संसर्ग होने पर बस्ति व्योष (त्रिकटु), तिक्त (कड़वे) और अम्ल (खट्टे) द्रव्यों वाली होनी चाहिए; और कफ से व्याप्त रक्त में मधुर, व्योष और तिक्त द्रव्यों वाली।

च. सि. ८/३३

। ॥ ३३ ॥

वात के कफ से मिलने पर बस्ति व्योष, अम्ल और लवण द्रव्यों वाली हो। पित्त में, वात के साथ मिलने पर, बस्ति स्वादु (मधुर), अम्ल और तिक्त द्रव्यों वाली करनी चाहिए।

च. सि. ८/३४

। ॥ ३४ ॥

तीन, चार और पाँच (दोषों) के संसर्गों की भी इसी प्रकार कल्पना करे। अतिसार में कही गई यह युक्ति सभी रोगों में भी मानी गई है।

च. सि. ८/३५

। ॥ ३५ ॥

जब छहों का एक साथ संसर्ग हो, तब छह रसों वाला पाचन देना चाहिए। आम से रहित पाँचों (के संसर्ग) में षाड्रसिक (छह रसों वाली) बस्ति मानी गई है।

च. सि. ८/३६

। ॥ ३६ ॥

उदुम्बर के शलाटु (कच्चे फल), जामुन, आम और उदुम्बर की छालें, शङ्ख, सर्जरस, लाक्षा और कर्दम, प्रत्येक एक पल (भाग)

च. सि. ८/३७

। ॥ ३७ ॥

उन (द्रव्यों) को पीसकर, उनके साथ एक प्रस्थ घी को दुगुने दूध में पकाए। यह सब अतिसारों में बल के अनुसार पीना चाहिए।

च. सि. ८/३८

। ॥ ३८ ॥

कच्छुरा, धातकी, बिल्व, समङ्गा और रक्तशालि (लाल चावल) से तथा मसूर और अश्वत्थ की कोंपलों से, जल में पकाए जाने पर यवागू बनानी चाहिए।

च. सि. ८/३९

। ॥ ३९ ॥

उसी प्रकार (यवागू) उदुम्बर, कट्वङ्ग, समङ्गा और प्लक्ष के कोमल पल्लवों से, तथा मसूर, धातकी के फूल और बला से भी बनानी चाहिए।

च. सि. ८/४०

। ॥ ४० ॥

स्थिरा आदि, बला आदि अथवा इक्षु आदि (वर्गों) के मसूर सहित क्वाथों में यवागू अलग-अलग बनानी चाहिए

च. सि. ८/४१

। ॥ ४१ ॥

(वे यवागू) कच्छुरा की जड़ और शालि आदि के चावलों से सिद्ध की हुई, दही, तक्र, आरनाल, अम्ल (खट्टे द्रव) और दूध में, अथवा ईख के रस में भी

च. सि. ८/४२

। ॥ ४२ ॥

ठण्डी की हुई, शर्करा और शहद सहित वे सभी अतिसारों का नाश करने वाली हैं; घी, मरिच और जीरे सहित, मधुर या लवण (स्वाद की), कल्याणकारी हैं।

च. सि. ८/४३

- । ॥ ४३ ॥

यहाँ (इस विषय में) श्लोक हैं- वात में स्निग्ध, अम्ल, लवण और मधुर पान तथा कुछ गरम बस्ति (दी जाती है); पित्त और रक्त में शीतल, तिक्त, कषाय और मधुर (पान तथा बस्ति)।

च. सि. ८/४४

॥ ४४ ॥

कफ में तिक्त, उष्ण, कषाय और कटु (द्रव्य); मल में संग्राही और वात को दूर करने वाला; आम में पाचन और पान; रक्त में पिच्छा, असृग् और बस्तियाँ।

च. सि. ८/४५

। ॥ ४५ ॥

अतिसार के प्रति कहा गया (उपचार) मिश्र (मिले हुए दोषों) में, दो-दो आदि के योग से उत्पन्न (अतिसारों) में भी (लागू होता है)। वहाँ दोषों में उद्रेक (प्रबलता) की विशेषता के अनुसार उपक्रम (चिकित्सा) करना चाहिए।

च. सि. ८/४६

- । ॥ ४६ ॥

इस विषय में श्लोक है- प्रासृतिक निरूह (प्रसृत मात्रा वाले), व्यापद् (जटिलताओं) की चिकित्सा सहित, तथा अतिसार के लिए हितकर रस, कल्प, घृत और यवागू, गुरु ने प्रसृतसिद्धि (अध्याय) में कहे हैं।

च. सि. ८

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित, चरक द्वारा संशोधित और (जो भाग) अप्राप्त था, उसे दृढबल द्वारा पूर्ण किए गए तन्त्र के सिद्धिस्थान में प्रासृतयोगीय सिद्धि नामक आठवाँ अध्याय (समाप्त) ८।