भारत संहिता

अध्याय १०

महाचतुष्पादोऽध्यायः

बड़ा चतुष्पाद (चिकित्सा के चार पाद और रोगों की साध्यता)

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भूमिका

महाचतुष्पाद चरक संहिता के सूत्रस्थान का दसवाँ अध्याय है। 'चतुष्पाद' का अर्थ है चार पादों (आधारों) वाला: चरक संहिता चिकित्सा को चार पादों पर टिकी मानती है, भिषक् (वैद्य), द्रव्य (औषध), उपस्थाता (रोगी की सेवा करने वाला) और रोगी। अध्याय इसी चतुष्पाद भेषज (चिकित्सा) की बात से आरम्भ होता है, और नाम का 'महा' (बड़ा) इसे पिछले अध्याय, खुड्डाकचतुष्पाद (छोटा चतुष्पाद), से अलग करता है, जिसका विषय भी यही चार पाद हैं। इस अध्याय का उपदेश भी भगवान् आत्रेय का है। इसके दो भाग हैं: पहले यह विवाद कि चिकित्सा सचमुच रोगी को स्वस्थ करती है या नहीं, और फिर रोगों की साध्यता, यानी कौन-सा रोग ठीक हो सकता है और कौन-सा नहीं।

भगवान् पुनर्वसु आत्रेय पहले अपना सिद्धान्त रखते हैं: वैद्य भेषज, यानी चिकित्सा, को चार पादों और सोलह कलाओं (अंशों) वाला कहते हैं, और ऐसा भेषज युक्ति से, यानी सोच-समझकर उचित ढंग से, प्रयोग किया जाए तो आरोग्य के लिए समर्थ है। मैत्रेय इससे असहमत हैं। वे कहते हैं कि साधनों और परिचारकों से सम्पन्न, संयमी, और कुशल वैद्यों से उपचार पाने वाले कुछ रोगी स्वस्थ होते हैं और वैसे ही दूसरे मर जाते हैं, और इन सबसे रहित रोगियों में भी कुछ स्वस्थ होते हैं और कुछ मर जाते हैं। इसलिए उनके मत में भेषज कुछ नहीं कर पाता, जैसे गहरे गड्ढे या सरोवर में डाला गया थोड़ा-सा जल, और भेषज अभेषज (चिकित्सा न करने) से भिन्न नहीं है।

आत्रेय इस सोच को मिथ्या (गलत) कहते हैं। जो व्याधियाँ भेषज से साध्य हैं, उनमें भेषज निष्फल नहीं होता। जो रोगी पूरी चिकित्सा के बिना भी स्वस्थ हो जाते हैं, वे पूरी चिकित्सा पाकर और जल्दी और बिना कष्ट के स्वस्थ होते, जैसे गिरा हुआ आदमी स्वयं उठ सकता हो, तब भी कोई सहारा दे तो वह जल्दी उठता है। और जो पूरी चिकित्सा पाकर भी मर जाते हैं, उनके रोग असाध्य हैं: सब व्याधियाँ उपाय से साध्य नहीं होतीं, और मरणासन्न रोगी को ज्ञानवान् वैद्य भी नहीं उठा सकता। जैसे अभ्यासी धनुर्धर पास के बड़े लक्ष्य से नहीं चूकता, वैसे ही गुणवान् और साधनों से युक्त वैद्य रोगी को देख-परखकर चिकित्सा आरम्भ करे तो साध्य रोग वाले रोगी को स्वस्थ कर देता है। आत्रेय अपने प्रत्यक्ष अनुभव की बात भी रखते हैं: विपरीत उपचार से, जैसे घटी हुई धातुओं को पूरा करके और बढ़ी हुई को घटाकर, वे रोगी को उसकी प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) में लौटाते हैं। श्लोक यह बात समेटते हैं कि साध्य और असाध्य का भेद जानने वाला चिकित्सक ज्ञानपूर्वक और उचित समय पर जो चिकित्सा आरम्भ करता है, उसे निश्चय ही सफल करता है, और जो वैद्य असाध्य रोग की चिकित्सा करता है, वह धन, विद्या और यश की हानि और निन्दा पाता है।

इसके बाद अध्याय रोगों को उनकी साध्यता के अनुसार बाँटता है। साध्य रोग दो प्रकार के हैं, सुखसाध्य (आसानी से ठीक होने वाले) और कृच्छ्रसाध्य (कठिनाई से ठीक होने वाले), और उनमें अल्प, मध्यम और उत्कृष्ट के तीन स्तर भी होते हैं। असाध्य भी दो प्रकार के हैं, याप्य (जिन्हें चिकित्सा से सँभाले रखा जा सके) और अनुपक्रम (जिनकी चिकित्सा न हो सके)। सुखसाध्य रोग के हेतु, पूर्वरूप और रूप थोड़े होते हैं, दूष्य, काल और रोगी की प्रकृति रोग करने वाले दोष के समान नहीं होते, रोग नया होता है, एक ही मार्ग में और एक ही दोष से होता है, उसके साथ उपद्रव नहीं होते, शरीर सब औषध सह सकता है और चिकित्सा के चारों पाद उपलब्ध होते हैं। कृच्छ्रसाध्य रोग में कारण और लक्षण मध्यम बल के होते हैं, काल, प्रकृति और दूष्य में से कोई एक दोष के समान होता है, और रोग दो दोषों से उत्पन्न होता है; गर्भिणी, वृद्ध और बालक के रोग, और शस्त्र, क्षार और अग्नि से उपचार योग्य रोग भी इसी में गिने गए हैं। याप्य रोग आयु शेष रहने के कारण पथ्य के सेवन से सँभला रहता है, पर उसमें थोड़ा ही आराम मिलता है और थोड़े-से कारण से वह फिर उभर आता है। और प्रत्याख्येय, यानी चिकित्सा के लिए अस्वीकार करने योग्य, वह रोग कहा गया है जो तीनों दोषों से उत्पन्न हो, चिकित्सा की पहुँच से बाहर जा चुका हो, सब मार्गों में फैला हो, इन्द्रियों का नाश करे, दुर्बल रोगी में बहुत बढ़ चुका हो, या जिसके साथ अरिष्ट (मृत्यु-सूचक लक्षण) दिखें।

अन्त में अध्याय निष्कर्ष देता है कि बुद्धिमान वैद्य पहले इस प्रकार हर विकार के अपने लक्षणों की परीक्षा करे, और फिर साध्य रोगों में चिकित्सा आरम्भ करे; और जो साध्य और असाध्य का भेद जानता है, वह मैत्रेय जैसों की गलत धारणा नहीं अपनाएगा। इस अध्याय से यही बात साथ ले जाने योग्य है: भेषज निष्फल नहीं है, पर उसकी सफलता रोग की साध्यता को पहचानने और परीक्षा करके, ज्ञानपूर्वक, उचित समय पर चिकित्सा आरम्भ करने पर टिकी है। अध्याय के सार-श्लोक भी यही कहते हैं कि रोगों के ये चार भेद, अपने-अपने लक्षणों सहित, वे विषय हैं जिन पर चिकित्सा निर्भर है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २३-२४)

तत्र श्लोकौइहौषधं पादगुणाः प्रभवो भेषजाश्रयः ।आत्रेयमैत्रेयमती मतिद्वैविध्यनिश्चयः ॥

श्लोक २३ →

इस विषय में (सार रूप) दो श्लोक (हैं): यहाँ (इस अध्याय में) औषध, (चिकित्सा के) पादों के गुण, प्रभव (सम्भवतः औषध का सामर्थ्य), भेषज का आश्रय, आत्रेय और मैत्रेय के मत, (और) दो प्रकार के मतों का निर्णय

चतुर्विधविकल्पाश्च व्याधयः स्वस्वलक्षणाः ।उक्ता महाचतुष्पादे येष्वायत्तं भिषग्जितम् ॥

श्लोक २४ →

और चार प्रकार के भेदों वाली, अपने-अपने लक्षणों सहित व्याधियाँ (रोग) - (ये विषय) महाचतुष्पाद (अध्याय) में कहे गए हैं, जिन पर भिषग्जित (चिकित्सा) निर्भर है।

मुख्य शब्द (१५) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

आरोग्य
आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार

शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।

अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।

चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

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च. सू. १०/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम महाचतुष्पाद (चिकित्सा के चार पादों सम्बन्धी बड़े) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. १०/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. १०/३

, , ॥ ३ ॥

वैद्य कहते हैं कि भेषज (चिकित्सा) चतुष्पाद (चार पादों वाला) और सोलह कलाओं (अंशों) वाला है, जिसे पिछले अध्याय में 'सोलह गुणों वाला' कहा गया है; वह भेषज युक्ति से युक्त (उचित ढंग से प्रयोग किया गया) हो तो आरोग्य के लिए समर्थ है, ऐसा भगवान् पुनर्वसु आत्रेय (ने कहा)।

च. सू. १०/४

, , ; , - , ; , । , ; , ; ॥ ४ ॥

'नहीं', ऐसा मैत्रेय (ने कहा)। क्या कारण है? क्योंकि कुछ रोगी, जो साधनों (उपकरणों) से युक्त, परिचारकों से सम्पन्न और आत्मवान् (संयमी) हैं, और जिनका उपचार कुशल वैद्यों ने किया है, (रोग से) उठते, यानी स्वस्थ होते देखे जाते हैं; और वैसे ही (इन सब से) युक्त दूसरे (रोगी) मरते हुए (देखे जाते हैं)। इसलिए भेषज (चिकित्सा) कुछ नहीं कर पाता; जैसे गहरे गड्ढे में और सरोवर में डाला गया थोड़ा-सा जल, या बहती हुई नदी में (डाला गया जल), या धूल के ढेर पर बिखेरी गई मुट्ठी भर धूल। इसी प्रकार दूसरे (रोगी), जो साधनों से रहित, परिचारकों से रहित और अनात्मवान् (असंयमी) हैं, और जिनका उपचार अकुशल वैद्यों ने किया है, स्वस्थ होते देखे जाते हैं; और वैसे ही (इन सब से) रहित दूसरे (रोगी) मरते हुए। और क्योंकि प्रतिकार (उपचार) करने वाला (रोगी) ठीक हो जाता है, प्रतिकार करने वाला मर जाता है; प्रतिकार न करने वाला ठीक हो जाता है, प्रतिकार न करने वाला मर जाता है; इसलिए ऐसा सोचा जाता है कि भेषज अभेषज (चिकित्सा न करने) से भिन्न नहीं है।

च. सू. १०/५

! ; , , ; , ; , , ; , , , , , ; , , , ; ॥ ५ ॥

मैत्रेय! (यह) मिथ्या (गलत) सोचा जा रहा है, ऐसा आत्रेय (ने कहा)। क्या कारण है? जो कहा गया कि सोलह गुणों से युक्त इस भेषज से उपचार पाते हुए भी जो आतुर (रोगी) मर जाते हैं, वह (बात) ठीक नहीं बैठती, क्योंकि जो व्याधियाँ भेषज से साध्य (ठीक हो सकने वाली) हैं, उनके लिए भेषज अकारण (निष्फल) नहीं होता। और जो आतुर सम्पूर्ण भेषज के बिना (भी) उठ खड़े होते (स्वस्थ हो जाते) हैं, ऐसा नहीं है कि सम्पूर्ण भेषज प्राप्त होने पर उनके स्वस्थ होने में कोई विशेषता न होती; क्योंकि जैसे गिरे हुए, (स्वयं) उठने में समर्थ पुरुष को उठाता हुआ (दूसरा) पुरुष उसे बल (सहारा) दे, तो वह और शीघ्र, बिना कष्ट पाए ही उठ जाए, वैसे ही सम्पूर्ण भेषज पाने से आतुर (भी शीघ्र और बिना कष्ट के स्वस्थ होते हैं)। और जो आतुर सम्पूर्ण भेषज से भी मर जाते हैं, (उनके विषय में यह है कि) भेषज पाए हुए वे सभी के सभी उठ खड़े नहीं हो सकते, क्योंकि सभी व्याधियाँ उपाय से साध्य नहीं होतीं; और उपाय से साध्य व्याधियों की सिद्धि (सफल चिकित्सा) बिना उपाय के नहीं होती; और असाध्य व्याधियों के लिए यह भेषज-समुदाय है ही नहीं; क्योंकि ज्ञानवान् भिषक् (वैद्य) (भी) मरणासन्न आतुर को उठाने (बचाने) में समर्थ नहीं है। परीक्षा करके कर्म करने वाले ही कुशल होते हैं; जैसे योग (विधि) को जानने वाला, नित्य अभ्यास करने वाला धनुर्धर धनुष लेकर बहुत दूर न स्थित बड़े काय (लक्ष्य) पर बाण चलाते हुए चूकता नहीं और अभीष्ट कार्य पूरा करता है, वैसे ही अपने गुणों से सम्पन्न, उपकरणों (साधनों) से युक्त भिषक् (रोगी को) देखकर (परीक्षा करके) कर्म (चिकित्सा) आरम्भ करता हुआ, बिना चूक के, साध्य रोग वाले आतुर को निश्चय ही आरोग्य से युक्त कर देता है। इसलिए भेषज अभेषज (चिकित्सा न करने) के समान नहीं होता।

च. सू. १०/६

, , , , , , , , ; ॥ ६ ॥

और यह हमारा प्रत्यक्ष (अनुभव) है कि हम आतुर (रोगी) की चिकित्सा अनातुर (उससे विपरीत गुण वाले) भेषज से करते हैं, क्षाम (क्षीण) की अक्षाम (पुष्ट करने वाले भेषज) से; कृश और दुर्बल को पुष्ट करते हैं, स्थूल और मेदस्वी (अधिक चर्बी वाले) का अपतर्पण करते (उसे घटाते) हैं, उष्णता से पीड़ित का उपचार शीत से करते हैं, शीत से पीड़ित का उष्ण से; न्यून (घटी हुई) धातुओं को पूरा करते हैं, बढ़ी हुई (धातुओं) को घटाते हैं; व्याधियों का उनके मूल (कारण) के विपरीत (उपाय) से उपचार करते हुए (रोगी को) भली भाँति प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) में स्थापित करते हैं। इस प्रकार करने वाले हम लोगों के लिए यह भेषज-समुदाय सबसे प्रिय (श्रेष्ठ) होता है।

च. सू. १०/७

। ॥ ७ ॥

और यहाँ (इस विषय में ये श्लोक) हैं: साध्य और असाध्य (रोगों) के विभाग को जानने वाला चिकित्सक ज्ञानपूर्वक और उचित काल (समय) पर जो कर्म (चिकित्सा) आरम्भ करता है, उसे वह निश्चय ही सिद्ध कर लेता है।

च. सू. १०/८

। ॥ ८ ॥

जो वैद्य असाध्य (रोग) की चिकित्सा करे, वह निश्चय ही धन, विद्या और यश की हानि, उपक्रोश (निन्दा) और असंग्रह (लोगों द्वारा न अपनाया जाना) पाता है।

च. सू. १०/९

। ॥ ९ ॥

साध्य (रोग) (दो प्रकार का) माना गया है: सुखसाध्य (आसानी से ठीक होने वाला) और कृच्छ्रसाध्य (कठिनाई से ठीक होने वाला) भी; और असाध्य भी दो प्रकार का होता है: याप्य (जिसे चिकित्सा से सँभाले रखा जाए) और जो अनुपक्रम (जिसकी चिकित्सा न हो सके) है।

च. सू. १०/१०

। ॥ १० ॥

साध्य (रोगों) का अल्प, मध्यम और उत्कृष्ट होने के अनुसार तीन प्रकार का विकल्प (भेद) होता है; परन्तु नियत (निश्चित) असाध्य (रोगों) की (ऐसी) विकल्पना (भेद) नहीं है।

च. सू. १०/११

। ॥ ११ ॥

जिस (रोग) के हेतु (कारण), पूर्वरूप (रोग से पहले दिखने वाले संकेत) और रूप (लक्षण) थोड़े हों, और दूष्य (दोष द्वारा दूषित होने वाले धातु आदि) (दोष के) समान गुण वाला न हो, और न (रोग करने वाला) दोष (रोगी की) प्रकृति (का दोष) हो

च. सू. १०/१२

। ॥ १२ ॥

और न काल (ऋतु) का गुण (दोष के) समान हो, न देश (स्थान) ऐसा हो जहाँ उपचार कठिन हो, (रोग की) गति (मार्ग) एक हो, और (रोग में) नयापन हो, और न रोग का (कोई) उपद्रव (जटिलता) हो

च. सू. १०/१३

। ॥ १३ ॥

(रोग की) उत्पत्ति में एक ही दोष हो, शरीर सब औषध सहने में समर्थ हो, और चतुष्पाद (चिकित्सा के चारों पाद) उपलब्ध हों - (यह) सुखसाध्य (रोग) का लक्षण है।

च. सू. १०/१४

। ॥ १४ ॥

(जिस रोग में) निमित्त (कारण), पूर्वरूप और रूप (लक्षण) मध्यम बल के हों, और काल, प्रकृति और दूष्य में से किसी एक की (दोष से) समानता हो

च. सू. १०/१५

। ॥ १५ ॥

(और जो रोग) गर्भिणी (स्त्रियों), वृद्धों और बालकों का हो, उपद्रवों (जटिलताओं) से बहुत पीड़ित न हो, शस्त्र, क्षार और अग्नि से उपचार योग्य (रोगों में से) हो, नया न हो, (और) कठिन स्थान में उत्पन्न हुआ हो

च. सू. १०/१६

। ॥ १६ ॥

(वैद्य) उस रोग को कृच्छ्रसाध्य (कठिनाई से ठीक होने वाला) जाने जो एक मार्ग वाला हो (और जिसमें) चतुष्पाद (चिकित्सा के चार पाद) पूरी तरह सम्पन्न न हों, अथवा जो दो मार्गों वाला हो, बहुत पुराना न हो (और) दो दोषों से उत्पन्न हो।

च. सू. १०/१७

। ॥ १७ ॥

आयु के शेष रहने के कारण असाध्य (रोग) पथ्य (हितकर आहार-विहार) के सेवन से याप्य (सँभाले रखा जा सकने वाला) होता है; उसमें थोड़ा सुख (आराम) मिलता है, और थोड़े-से हेतु (कारण) से वह शीघ्र (फिर) उभर आता है।

च. सू. १०/१८

। ॥ १८ ॥

जो रोग गम्भीर (गहराई में बैठा) हो, अनेक धातुओं में स्थित हो, मर्मों और सन्धियों (जोड़ों) में आश्रित हो, सदा बना रहने वाला हो और दीर्घ काल से टिका हुआ हो

च. सू. १०/१९

। ॥ १९ ॥

(और जो) दो दोषों से उत्पन्न हो, (उसे) वैसा ही (याप्य) जानना चाहिए, और (उस रोग को) प्रत्याख्येय (चिकित्सा के लिए अस्वीकार करने योग्य) (जानना चाहिए) जो तीनों दोषों से उत्पन्न हो, क्रिया-पथ (चिकित्सा की पहुँच) को लाँघ चुका हो, सब (रोग-)मार्गों में फैलने वाला हो

च. सू. १०/२०

। ॥ २० ॥

जो औत्सुक्य (बेचैनी), अरति (कहीं मन न लगना) और सम्मोह (मूढ़ता) उत्पन्न करे, इन्द्रियों का नाश करे, (और) दुर्बल (रोगी) की बहुत बढ़ी हुई व्याधि (रोग) हो, उसे, और अरिष्ट (मृत्यु-सूचक लक्षणों) सहित (व्याधि) को भी (प्रत्याख्येय जानना चाहिए)।

च. सू. १०/२१

। ॥ २१ ॥

बुद्धिमान भिषक् (वैद्य) को पहले इस प्रकार विकारों (रोगों) के अपने लक्षण की परीक्षा करके, बाद में साध्य (रोगों) में कर्म (चिकित्सा) का आरम्भ करना चाहिए।

च. सू. १०/२२

। ॥ २२ ॥

जो साध्य और असाध्य (रोगों) के विभाग को जानता है (और) सम्यक् प्रतिपत्ति (ठीक समझ) वाला है, वह मैत्रेय जैसे (लोगों) की मिथ्या बुद्धि (गलत धारणा) नहीं अपनाएगा।

च. सू. १०/२३

। ॥ २३ ॥

इस विषय में (सार रूप) दो श्लोक (हैं): यहाँ (इस अध्याय में) औषध, (चिकित्सा के) पादों के गुण, प्रभव (सम्भवतः औषध का सामर्थ्य), भेषज का आश्रय, आत्रेय और मैत्रेय के मत, (और) दो प्रकार के मतों का निर्णय

च. सू. १०/२४

। ॥ २४ ॥

और चार प्रकार के भेदों वाली, अपने-अपने लक्षणों सहित व्याधियाँ (रोग) - (ये विषय) महाचतुष्पाद (अध्याय) में कहे गए हैं, जिन पर भिषग्जित (चिकित्सा) निर्भर है।

च. सू. १०

॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में महाचतुष्पाद नामक दसवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।