भूमिका
महाचतुष्पाद चरक संहिता के सूत्रस्थान का दसवाँ अध्याय है। 'चतुष्पाद' का अर्थ है चार पादों (आधारों) वाला: चरक संहिता चिकित्सा को चार पादों पर टिकी मानती है, भिषक् (वैद्य), द्रव्य (औषध), उपस्थाता (रोगी की सेवा करने वाला) और रोगी। अध्याय इसी चतुष्पाद भेषज (चिकित्सा) की बात से आरम्भ होता है, और नाम का 'महा' (बड़ा) इसे पिछले अध्याय, खुड्डाकचतुष्पाद (छोटा चतुष्पाद), से अलग करता है, जिसका विषय भी यही चार पाद हैं। इस अध्याय का उपदेश भी भगवान् आत्रेय का है। इसके दो भाग हैं: पहले यह विवाद कि चिकित्सा सचमुच रोगी को स्वस्थ करती है या नहीं, और फिर रोगों की साध्यता, यानी कौन-सा रोग ठीक हो सकता है और कौन-सा नहीं।
भगवान् पुनर्वसु आत्रेय पहले अपना सिद्धान्त रखते हैं: वैद्य भेषज, यानी चिकित्सा, को चार पादों और सोलह कलाओं (अंशों) वाला कहते हैं, और ऐसा भेषज युक्ति से, यानी सोच-समझकर उचित ढंग से, प्रयोग किया जाए तो आरोग्य के लिए समर्थ है। मैत्रेय इससे असहमत हैं। वे कहते हैं कि साधनों और परिचारकों से सम्पन्न, संयमी, और कुशल वैद्यों से उपचार पाने वाले कुछ रोगी स्वस्थ होते हैं और वैसे ही दूसरे मर जाते हैं, और इन सबसे रहित रोगियों में भी कुछ स्वस्थ होते हैं और कुछ मर जाते हैं। इसलिए उनके मत में भेषज कुछ नहीं कर पाता, जैसे गहरे गड्ढे या सरोवर में डाला गया थोड़ा-सा जल, और भेषज अभेषज (चिकित्सा न करने) से भिन्न नहीं है।
आत्रेय इस सोच को मिथ्या (गलत) कहते हैं। जो व्याधियाँ भेषज से साध्य हैं, उनमें भेषज निष्फल नहीं होता। जो रोगी पूरी चिकित्सा के बिना भी स्वस्थ हो जाते हैं, वे पूरी चिकित्सा पाकर और जल्दी और बिना कष्ट के स्वस्थ होते, जैसे गिरा हुआ आदमी स्वयं उठ सकता हो, तब भी कोई सहारा दे तो वह जल्दी उठता है। और जो पूरी चिकित्सा पाकर भी मर जाते हैं, उनके रोग असाध्य हैं: सब व्याधियाँ उपाय से साध्य नहीं होतीं, और मरणासन्न रोगी को ज्ञानवान् वैद्य भी नहीं उठा सकता। जैसे अभ्यासी धनुर्धर पास के बड़े लक्ष्य से नहीं चूकता, वैसे ही गुणवान् और साधनों से युक्त वैद्य रोगी को देख-परखकर चिकित्सा आरम्भ करे तो साध्य रोग वाले रोगी को स्वस्थ कर देता है। आत्रेय अपने प्रत्यक्ष अनुभव की बात भी रखते हैं: विपरीत उपचार से, जैसे घटी हुई धातुओं को पूरा करके और बढ़ी हुई को घटाकर, वे रोगी को उसकी प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) में लौटाते हैं। श्लोक यह बात समेटते हैं कि साध्य और असाध्य का भेद जानने वाला चिकित्सक ज्ञानपूर्वक और उचित समय पर जो चिकित्सा आरम्भ करता है, उसे निश्चय ही सफल करता है, और जो वैद्य असाध्य रोग की चिकित्सा करता है, वह धन, विद्या और यश की हानि और निन्दा पाता है।
इसके बाद अध्याय रोगों को उनकी साध्यता के अनुसार बाँटता है। साध्य रोग दो प्रकार के हैं, सुखसाध्य (आसानी से ठीक होने वाले) और कृच्छ्रसाध्य (कठिनाई से ठीक होने वाले), और उनमें अल्प, मध्यम और उत्कृष्ट के तीन स्तर भी होते हैं। असाध्य भी दो प्रकार के हैं, याप्य (जिन्हें चिकित्सा से सँभाले रखा जा सके) और अनुपक्रम (जिनकी चिकित्सा न हो सके)। सुखसाध्य रोग के हेतु, पूर्वरूप और रूप थोड़े होते हैं, दूष्य, काल और रोगी की प्रकृति रोग करने वाले दोष के समान नहीं होते, रोग नया होता है, एक ही मार्ग में और एक ही दोष से होता है, उसके साथ उपद्रव नहीं होते, शरीर सब औषध सह सकता है और चिकित्सा के चारों पाद उपलब्ध होते हैं। कृच्छ्रसाध्य रोग में कारण और लक्षण मध्यम बल के होते हैं, काल, प्रकृति और दूष्य में से कोई एक दोष के समान होता है, और रोग दो दोषों से उत्पन्न होता है; गर्भिणी, वृद्ध और बालक के रोग, और शस्त्र, क्षार और अग्नि से उपचार योग्य रोग भी इसी में गिने गए हैं। याप्य रोग आयु शेष रहने के कारण पथ्य के सेवन से सँभला रहता है, पर उसमें थोड़ा ही आराम मिलता है और थोड़े-से कारण से वह फिर उभर आता है। और प्रत्याख्येय, यानी चिकित्सा के लिए अस्वीकार करने योग्य, वह रोग कहा गया है जो तीनों दोषों से उत्पन्न हो, चिकित्सा की पहुँच से बाहर जा चुका हो, सब मार्गों में फैला हो, इन्द्रियों का नाश करे, दुर्बल रोगी में बहुत बढ़ चुका हो, या जिसके साथ अरिष्ट (मृत्यु-सूचक लक्षण) दिखें।
अन्त में अध्याय निष्कर्ष देता है कि बुद्धिमान वैद्य पहले इस प्रकार हर विकार के अपने लक्षणों की परीक्षा करे, और फिर साध्य रोगों में चिकित्सा आरम्भ करे; और जो साध्य और असाध्य का भेद जानता है, वह मैत्रेय जैसों की गलत धारणा नहीं अपनाएगा। इस अध्याय से यही बात साथ ले जाने योग्य है: भेषज निष्फल नहीं है, पर उसकी सफलता रोग की साध्यता को पहचानने और परीक्षा करके, ज्ञानपूर्वक, उचित समय पर चिकित्सा आरम्भ करने पर टिकी है। अध्याय के सार-श्लोक भी यही कहते हैं कि रोगों के ये चार भेद, अपने-अपने लक्षणों सहित, वे विषय हैं जिन पर चिकित्सा निर्भर है।