भारत संहिता

अध्याय ९

खुड्डाकचतुष्पादोऽध्यायः

छोटा चतुष्पाद (चिकित्सा के चार पाद)

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भूमिका

खुड्डाकचतुष्पाद चरक संहिता के सूत्रस्थान का नौवाँ अध्याय है। 'खुड्डाक' का अर्थ है छोटा, और 'चतुष्पाद' का अर्थ है चार पादों वाला; इसलिए हिन्दी में इसका नाम 'छोटा चतुष्पाद' है। पाद का शाब्दिक अर्थ पैर या चौथाई भाग है, और यहाँ इसका अर्थ है वे चार आधार जिन पर चिकित्सा टिकी है: भिषक् (वैद्य), द्रव्य (औषध), उपस्थाता (रोगी की सेवा करने वाला परिचारक) और स्वयं रोगी। इस अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है। वे बताते हैं कि गुणों से युक्त ये चारों पाद विकार (रोग) की शान्ति का कारण हैं।

अध्याय पहले रोग, स्वास्थ्य और चिकित्सा की परिभाषा देता है। शरीर को धारण करने वाली धातुओं का वैषम्य (असन्तुलन) विकार है और उनका साम्य (सन्तुलन) प्रकृति; आरोग्य ही सुख है और विकार दुःख। धातुओं में विकृति होने पर उन्हें फिर सम करने के लिए गुणवान् चारों पादों का जो प्रयत्न होता है, वही चिकित्सा कहलाती है। फिर हर पाद के चार-चार गुण गिनाए जाते हैं। वैद्य के गुण हैं शास्त्र का निर्मल ज्ञान, बार-बार चिकित्सा-कर्म देखा होना, दक्षता और शौच (पवित्रता)। द्रव्य के गुण हैं पर्याप्त मात्रा में मिलना, रोग के लिए उपयुक्त होना, अनेक प्रकार से तैयार किया जा सकना और सम्पत् (उत्तमता)। परिचारक के गुण हैं सेवा की विधि जानना, दक्षता, भर्ता (स्वामी) के प्रति अनुराग और शौच। रोगी के गुण हैं स्मृति, निर्देश के अनुसार चलना, निडरता और अपने रोग को ठीक-ठीक बता सकना। ये मिलकर सोलह गुण होते हैं।

इसके बाद भगवान् आत्रेय बताते हैं कि सोलह गुणों वाले ये चार पाद मिलकर चिकित्सा की सफलता का कारण हैं, पर इनमें वैद्य प्रधान है, क्योंकि वही जानने वाला, निर्देश देने वाला और प्रयोग करने वाला है। इसे वे दृष्टान्तों से समझाते हैं: जैसे बर्तन, ईंधन और अग्नि पकाने वाले के साधन हैं, और भूमि, सेना और हथियार विजेता के, और जैसे मिट्टी, डण्डा, चाक और धागा कुम्हार के बिना कुछ नहीं बनाते, वैसे ही बाकी तीन पाद वैद्य के बिना कोई लाभ नहीं देते। भयंकर रोगों का शीघ्र मिट जाना, या दूसरे रोगों का बढ़ जाना, इन दोनों का कारण ज्ञानी या अज्ञानी वैद्य है। अध्याय अज्ञानी वैद्य के बारे में कड़े शब्द कहता है: उसके लिए अपने आप को अग्नि में होम कर देना अच्छा है, पर चिकित्सा आरम्भ करना नहीं। वह अन्धे की तरह टटोलता हुआ और हवा के वश में पड़ी नाव की तरह चलता है, और संयोग से नियत (निश्चित) आयु वाले किसी एक को बचाकर, अनियत आयु वाले सैकड़ों को मार डालता है।

फिर अध्याय सच्चे वैद्य का चित्र देता है। जो शास्त्र, उसके अर्थ की समझ, स्वयं चिकित्सा करने और चिकित्सा-कर्म देखने, इन चारों से युक्त है, वह प्राणाभिसर (प्राणों का रक्षक) कहलाता है; और जिसे रोगों के हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण), प्रशमन (शान्त करने) और अपुनर्भव (फिर न होने देने) का ज्ञान है, वह राजा के योग्य श्रेष्ठ वैद्य है। शस्त्र, शास्त्र और जल लाभ करेंगे या हानि, यह उन्हें धारण करने वाले पर निर्भर है, इसलिए अध्याय कहता है कि वैद्य अपनी प्रज्ञा (बुद्धि) को शुद्ध करे। विद्या, मति, कर्मदृष्टि, अभ्यास, सिद्धि और आश्रय में से एक भी किसी को वैद्य कहलाने के लिए पर्याप्त है, पर जिसमें ये सभी हों, वही सच्चे अर्थ में वैद्य है और प्राणियों को सुख देता है। शास्त्र प्रकाश देने वाली ज्योति है और अपनी बुद्धि दर्शन (देखने का साधन); इन दोनों का भली-भाँति प्रयोग करने वाला वैद्य भूल नहीं करता। बाकी तीन पाद वैद्य पर आश्रित हैं, इसलिए उसे अपने गुणों को पूर्ण करने का प्रयत्न करना चाहिए। अन्त में वैद्य का चार प्रकार का आचरण बताया गया है: मैत्री, पीड़ितों पर करुणा, जो रोगी ठीक हो सकता है उसमें प्रीति, और प्रकृतिस्थ प्राणियों के प्रति उपेक्षा (तटस्थता); इस अन्तिम बात का अर्थ पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

अध्याय के अन्त के दो सार-श्लोक इसके विषय गिनाते हैं: चिकित्सा के चार पाद और हर पाद के चार गुण, पादों में वैद्य क्यों प्रधान है और उसमें कौन-से गुण हों, ज्ञान, ब्राह्मी बुद्धि (जिसका अर्थ अध्याय स्पष्ट नहीं करता) और वैद्यों का चार प्रकार का आचरण। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि चिकित्सा चारों पादों के मिलकर काम करने से सफल होती है, पर उनकी धुरी वैद्य है: उसका शास्त्र-ज्ञान, अनुभव, शुद्ध बुद्धि और आचरण ही बाकी तीनों को सार्थक बनाते हैं, और अज्ञानी के हाथों वही चिकित्सा हानि का कारण बन जाती है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २७-२८)

तत्र श्लोकौभिषग्जितं चतुष्पादं पादः पादश्चतुर्गुणाः ।भिषक् प्रधानं पादेभ्यो यस्माद्वैद्यस्तु यद्गुणः ॥

श्लोक २७ →

इस विषय में (सार के) दो श्लोक (हैं): भिषग्जित (चिकित्सा) चार पादों वाला है, और प्रत्येक पाद चार गुणों वाला है; पादों में भिषक् (वैद्य) जिस कारण प्रधान है, और वैद्य जिन गुणों वाला (होता है),

ज्ञानानि बुद्धिर्ब्राह्मी च भिषजां या चतुर्विधा ।सर्वमेतच्चतुष्पादे खुड्डाके संप्रकाशितमिति ॥

श्लोक २८ →

ज्ञान, ब्राह्मी बुद्धि, और भिषकों (वैद्यों) की जो चार प्रकार की (वृत्ति) है, यह सब खुड्डाक (छोटे) चतुष्पाद (अध्याय) में भली-भाँति बताया गया है।

मुख्य शब्द (१४) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

आरोग्य
आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार

शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।

अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।

चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. सू. ९/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम खुड्डाकचतुष्पाद (चिकित्सा के चार पादों सम्बन्धी छोटे) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. ९/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. ९/३

। ॥ ३ ॥

भिषक् (वैद्य), द्रव्य (औषध), उपस्थाता (परिचारक) और रोगी, इन चार पादों को, गुणों से युक्त होने पर, विकार (रोग) की शान्ति का कारण जानना चाहिए।

च. सू. ९/४

। ॥ ४ ॥

धातुओं का वैषम्य (असन्तुलन) विकार (रोग) है, और (उनका) साम्य (सन्तुलन) प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) कहलाता है। आरोग्य (स्वास्थ्य) सुख कहलाता है, और विकार दुःख ही है।

च. सू. ९/५

। ॥ ५ ॥

धातुओं में विकृति होने पर, प्रशस्त (गुणों से युक्त) वैद्य आदि चारों (पादों) की धातुओं की समता (लाने) के लिए की गई प्रवृत्ति (प्रयत्न) चिकित्सा कहलाती है।

च. सू. ९/६

। ॥ ६ ॥

श्रुत (शास्त्र) में पर्यवदातता (ज्ञान की पूर्ण निर्मलता), बार-बार (चिकित्सा का) कर्म देखा होना, दक्षता (कुशलता) और शौच (पवित्रता), ये वैद्य में चार गुण जानने चाहिए।

च. सू. ९/७

। ॥ ७ ॥

बहुता (पर्याप्त मात्रा में मिलना), उस (रोग) में योग्यता (उपयुक्त होना), अनेक प्रकार की कल्पना (कई रूपों में तैयार हो सकना) और सम्पत् (उत्तमता), यह चार का समूह द्रव्यों का गुण कहलाता है।

च. सू. ९/८

। ॥ ८ ॥

उपचार (सेवा की विधि) का ज्ञान, दक्षता, भर्ता (स्वामी) के प्रति अनुराग और शौच (पवित्रता), यह चार का समूह परिचारक व्यक्ति का गुण है।

च. सू. ९/९

। ॥ ९ ॥

स्मृति (स्मरण-शक्ति), निर्देश के अनुसार करना, और अभीरुता (निडरता) भी, तथा (अपने) रोगों को बता सकना, ये आतुर (रोगी) के गुण माने गए हैं।

च. सू. ९/१०

। ॥ १० ॥

सोलह गुणों वाले चार पाद सिद्धि (चिकित्सा की सफलता) में कारण हैं; परन्तु इनमें भिषक् (वैद्य) प्रधान है, (क्योंकि वही) विज्ञाता (जानने वाला), शासिता (निर्देश देने वाला) और योक्ता (प्रयोग करने वाला) है।

च. सू. ९/११

। ॥ ११ ॥

क्योंकि जैसे पकाने में पात्र (बर्तन), ईंधन और अग्नि पकाने वाले के कारण (साधन) हैं, और विजय में भूमि, सेना और हथियार विजेता के (कारण हैं),

च. सू. ९/१२

। ॥ १२ ॥

वैसे ही (चिकित्सा की) सिद्धि में आतुर (रोगी) आदि पाद वैद्य के कारण (साधन) कहे गए हैं; इसलिए चिकित्सा में प्रधान कारण भिषक् (वैद्य) है।

च. सू. ९/१३

। ॥ १३ ॥

जैसे मिट्टी, दण्ड (डण्डा), चक्र (चाक), सूत्र (धागा) आदि कुम्हार के बिना (कोई) गुण (फल) नहीं लाते, वैसे ही वैद्य के बिना (बाकी) तीन पाद (कोई गुण नहीं लाते)।

च. सू. ९/१४

। ॥ १४ ॥

यह जो अत्यन्त दारुण (भयंकर) विकार (रोग) गन्धर्वनगर की तरह नष्ट हो जाते हैं, और यह जो उपाय (उपचार) की प्रतीक्षा करने वाले दूसरे (रोग) शीघ्र बढ़ जाते हैं,

च. सू. ९/१५

। ॥ १५ ॥

(बाकी) तीन पादों के होते हुए, इसमें ज्ञानी और अज्ञानी (ये दो) भिषक् (वैद्य) कारण हैं। अज्ञानी के द्वारा अपने आप को (अग्नि में) होम कर देना श्रेष्ठ है, (उसके द्वारा) चिकित्सा आरम्भ करना नहीं।

च. सू. ९/१६

। ॥ १६ ॥

जैसे अन्धा (व्यक्ति) हाथ से टटोल-टटोलकर (चलता है), (वैसे ही) अज्ञानी भिषक् (वैद्य) अज्ञान के कारण बहुत डरे हुए की तरह, और वायु के वश में पड़ी नाव की तरह, (चिकित्सा के) कर्मों में चलता है।

च. सू. ९/१७

। ॥ १७ ॥

संयोग से (पास) आए किसी नियत आयु वाले (रोगी) को (रोग से) पार उतारकर, स्वयं को वैद्य मानने वाला (व्यक्ति) अनियत आयु वाले (रोगियों) में से सैकड़ों को शीघ्र मार डालता है।

च. सू. ९/१८

। ॥ १८ ॥

इसलिए शास्त्र में, (उसके) अर्थ के विज्ञान (ठीक समझ) में, प्रवृत्ति (चिकित्सा करने) में और कर्मदर्शन (चिकित्सा-कर्म देखने) में, इन चारों से युक्त भिषक् (वैद्य) प्राणाभिसर (प्राणों का रक्षक) कहलाता है।

च. सू. ९/१९

। ॥ १९ ॥

रोगों के हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण), प्रशमन (शान्त करने) और अपुनर्भव (फिर न होने देने) के विषय में जिसका ज्ञान चार प्रकार का है, वह राजा के योग्य सर्वश्रेष्ठ वैद्य है।

च. सू. ९/२०

। ॥ २० ॥

शस्त्र, शास्त्र और जल, गुण या दोष (लाभ या हानि) उत्पन्न करने में पात्र (धारक) पर निर्भर हैं; इसलिए चिकित्सा के लिए (वैद्य) प्रज्ञा (बुद्धि) को शुद्ध करे।

च. सू. ९/२१

। ॥ २१ ॥

विद्या, वितर्क, विज्ञान, स्मृति, तत्परता और क्रिया, ये छह गुण जिसके पास हैं, उससे (कोई) साध्य (ठीक हो सकने वाला रोग) बच नहीं निकलता।

च. सू. ९/२२

। ॥ २२ ॥

विद्या, मति (बुद्धि), कर्मदृष्टि (चिकित्सा-कर्म देखा होना), अभ्यास, सिद्धि (सफलता) और आश्रय, इनमें से एक-एक भी 'वैद्य' शब्द की प्राप्ति (वैद्य कहलाने) के लिए पर्याप्त है।

च. सू. ९/२३

। ॥ २३ ॥

परन्तु जिसमें विद्या आदि ये सभी शुभ गुण हैं, वह सच्चे (यथार्थ) 'वैद्य' नाम के योग्य होता हुआ प्राणियों को सुख देने वाला (होता है)।

च. सू. ९/२४

। ॥ २४ ॥

शास्त्र प्रकाश के लिए ज्योति है, और अपनी बुद्धि दर्शन (देखने का साधन) है। भली-भाँति प्रयोग में लाए गए इन दोनों के द्वारा चिकित्सा करता हुआ भिषक् (वैद्य) भूल नहीं करता।

च. सू. ९/२५

। ॥ २५ ॥

क्योंकि चिकित्सा में (शेष) तीन पाद वैद्य पर आश्रित हैं, इसलिए भिषक् (वैद्य) को अपने गुणों की सम्पदा (पूर्णता) के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

च. सू. ९/२६

। ॥ २६ ॥

मैत्री (मित्रभाव), पीड़ितों पर करुणा, शक्य (साध्य रोगी) में प्रीति, और प्रकृतिस्थ (प्रकृति में स्थित) प्राणियों के प्रति उपेक्षा; इस प्रकार वैद्य की वृत्ति (आचरण) चार प्रकार की है।

च. सू. ९/२७

। ॥ २७ ॥

इस विषय में (सार के) दो श्लोक (हैं): भिषग्जित (चिकित्सा) चार पादों वाला है, और प्रत्येक पाद चार गुणों वाला है; पादों में भिषक् (वैद्य) जिस कारण प्रधान है, और वैद्य जिन गुणों वाला (होता है),

च. सू. ९/२८

। ॥ २८ ॥

ज्ञान, ब्राह्मी बुद्धि, और भिषकों (वैद्यों) की जो चार प्रकार की (वृत्ति) है, यह सब खुड्डाक (छोटे) चतुष्पाद (अध्याय) में भली-भाँति बताया गया है।

च. सू. ९

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में खुड्डाकचतुष्पाद (छोटा चतुष्पाद) नामक नौवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।