भारत संहिता

अध्याय ११

तिस्रैषणीयोऽध्यायः

तीन एषणाएँ (जीवन की तीन इच्छाएँ)

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भूमिका

तिस्रैषणीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का ग्यारहवाँ अध्याय है, और इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। नाम का अर्थ है 'तीन एषणाओं वाला': एषणा वह लक्ष्य है जिसे पाने के लिए मनुष्य प्रयत्न करता है, और अध्याय इन्हीं तीन एषणाओं, यानी जीवन की तीन इच्छाओं, से आरम्भ होता है। इसके बाद अध्याय और विषय भी तीन-तीन के समूहों में रखता है: शरीर के तीन उपस्तम्भ (सहारे), तीन प्रकार का बल, रोगों के तीन आयतन (आधार), तीन प्रकार के रोग, रोगों के तीन मार्ग, तीन प्रकार के वैद्य और तीन प्रकार का औषध। अन्त के सार-श्लोक कहते हैं कि ये आठ विषय बुद्धिमान कृष्णात्रेय ने तीन-तीन के रूप में बताए हैं।

आत्रेय बताते हैं कि जिस पुरुष के मन, बुद्धि, पौरुष और पराक्रम ठीक हैं और जो इस लोक और परलोक दोनों में अपना हित चाहता है, उसे तीन एषणाओं के लिए प्रयत्न करना चाहिए। पहली प्राणैषणा है, यानी जीवन बनाए रखने की इच्छा, क्योंकि प्राण गए तो सब गया; स्वस्थ व्यक्ति स्वस्थवृत्त का पालन करे और रोगी अपने रोग को शान्त करने में लापरवाही न करे, तो वह दीर्घ आयु पाता है। दूसरी धनैषणा है, क्योंकि साधनहीन व्यक्ति की लम्बी आयु से बुरा कुछ नहीं; इसलिए खेती, पशुपालन, व्यापार, राजा की सेवा या कोई भी ऐसा काम बताया गया है जिसे सज्जन बुरा न कहें। तीसरी परलोकैषणा है, और उस पर संशय है कि मरने के बाद हम फिर होंगे या नहीं: कुछ लोग केवल प्रत्यक्ष को मानकर पुनर्भव (पुनर्जन्म) को नकारते हैं, कुछ उसे केवल आगम (शास्त्र) पर विश्वास से मानते हैं, और कुछ जन्म का कारण माता-पिता, स्वभाव, किसी दूसरे की रचना या यदृच्छा (संयोग) को मानते हैं।

अध्याय का सबसे लम्बा भाग इसी संशय का उत्तर है। आत्रेय कहते हैं कि प्रत्यक्ष थोड़ा है और अप्रत्यक्ष बहुत: जिन इन्द्रियों से हम जानते हैं, वे स्वयं नहीं दिखतीं, और कोई वस्तु बहुत पास, बहुत दूर, ओट में या अत्यन्त सूक्ष्म होने जैसे कारणों से मौजूद होते हुए भी नहीं दिखती। वे एक-एक मत को भी परखते हैं: माता-पिता की आत्मा सन्तान में नहीं जाती; छह धातुओं के लक्षण स्वाभाविक हैं, पर उनके मिलने और बिछुड़ने का कारण कर्म है; अनादि आत्मा को किसी दूसरे ने नहीं रचा; और सब कुछ संयोग से मानें तो न परीक्षा बचेगी, न कर्म, न कर्म का फल। फिर अध्याय ज्ञान की चार परीक्षाएँ बताता है: आप्तोपदेश (रज और तम से मुक्त आप्त पुरुषों का वचन), प्रत्यक्ष, अनुमान (जैसे धुएँ से छिपी आग का) और युक्ति (यह समझ कि फसल, आग या आरोग्य जैसा हर परिणाम अनेक कारणों के मेल से होता है)। इन चारों से पुनर्भव सिद्ध किया गया है: दिव्य दृष्टि वाले महर्षियों ने उसका उपदेश किया; सन्तानों का माता-पिता से भिन्न होना और शिशु का बिना सिखाए रोना और दूध पीना प्रत्यक्ष दिखता है; इनसे अनुमान होता है कि ये पिछले जन्म के 'दैव' कहलाने वाले कर्म का फल हैं; और युक्ति कहती है कि फल किए हुए कर्म का ही होता है, जैसे बीज के बिना अङ्कुर नहीं निकलता। इसलिए अध्याय कहता है कि मनुष्य गुरु की सेवा, अध्ययन, दान, तप और मन की एकाग्रता जैसे धर्म के द्वारों में मन लगाए, जिससे वह यहाँ यश और मरने के बाद स्वर्ग पाता है।

इसके बाद अध्याय बाकी त्रिकों को एक-एक करके समझाता है। शरीर के तीन उपस्तम्भ आहार, स्वप्न (नींद) और ब्रह्मचर्य हैं। बल सहज, कालज और युक्तिकृत होता है। रोगों के तीन आयतन हैं: इन्द्रियों का अपने विषयों से असात्म्य (अनुकूल न पड़ने वाला) संयोग, प्रज्ञापराध, यानी बुद्धि की चूक से वाणी, मन और शरीर का गलत कर्म, और परिणाम, यानी काल; इनमें हर एक का अतियोग (बहुत अधिक), अयोग (बिल्कुल नहीं) और मिथ्यायोग (गलत प्रयोग) रोग का हेतु है, और समयोग स्वस्थ प्रकृति का। रोग निज (शरीर के दोषों से), आगन्तु (विष, आग, चोट जैसे बाहरी कारणों से) और मानस (इष्ट के न मिलने और अनिष्ट के मिलने से) होते हैं। रोगों के मार्ग शाखा, मर्म और अस्थिसन्धियाँ, और कोष्ठ हैं। वैद्य तीन तरह के हैं: वैद्य का वेश भर धारण करने वाले, प्रसिद्ध लोगों के नाम के सहारे वैद्य कहलाने वाले, और वैद्य के गुणों से युक्त सच्चे वैद्य। औषध दैवव्यपाश्रय (मन्त्र, होम, उपवास जैसे उपाय), युक्तिव्यपाश्रय (आहार और औषध द्रव्यों की योजना) और सत्त्वावजय (मन को अहित विषयों से रोकना) है; शरीर के दोषों के प्रकोप में यह भीतर से शोधन, बाहर से शोधन और शस्त्रकर्म के रूप में भी गिनाया गया है।

अन्तिम श्लोक समझदार और नासमझ व्यक्ति की तुलना करते हैं। नासमझ व्यक्ति मोह या लापरवाही से रोग को उसके आरम्भ में नहीं पहचानता; रोग छोटे से बढ़कर जड़ जमा लेता है, और तब वह सब कुछ देकर भी वैद्य बुलवाता है, पर देर हो चुकी होती है। इसलिए श्लोक कहते हैं कि जो अपना सुख चाहे, वह रोग से पहले ही, या रोग के नए रहते ही, उसका प्रतिकार करे। इस अध्याय से ये बातें साथ ले जाने योग्य हैं: जीवन, जीविका और परलोक, तीनों की चिन्ता उचित है; सत्य केवल आँखों से नहीं, चारों परीक्षाओं से जाना जाता है; ग्रन्थ के अनुसार इन्द्रियों के विषय, कर्म और काल का सन्तुलित प्रयोग स्वास्थ्य देता है और असन्तुलित प्रयोग रोग; और रोग को उसके आरम्भ में ही पहचान लेना आवश्यक है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ६४-६५)

तत्र श्लोकौएषणाः समुपस्तम्भा बलं कारणमामयाः ।तिस्रैषणीये मार्गाश्च भिषजो भेषजानि च ॥

श्लोक ६४ →

इस विषय में (सार के) दो श्लोक (हैं): तिस्रैषणीय (अध्याय) में एषणाएँ, (जीवन के) उपस्तम्भ (सहारे), बल, (रोगों के) कारण, आमय (रोग), (रोगों के) मार्ग, भिषक् (वैद्य) और भेषज (औषध)

त्रित्वेनाष्तौ समुद्दिष्टाः कृष्णात्रेयेण धीमता ।भावा भावेष्वसक्तेन येषु सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

श्लोक ६५ →

(ये) आठ भाव (विषय), जिनमें सब कुछ प्रतिष्ठित है, भावों (सांसारिक विषयों) में आसक्ति न रखने वाले बुद्धिमान कृष्णात्रेय ने तीन-तीन के रूप में बताए हैं।

मुख्य शब्द (२२) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

स्वस्थ
स्वस्थ - अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित; निरोगी
विस्तार

शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।

अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

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च. सू. ११/१

।

अब इसलिए हम तिस्रैषणीय (तीन एषणाओं सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. ११/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. ११/३

।, , ॥ ३ ॥

यहाँ (इस संसार में) निश्चय ही, जिस पुरुष के सत्त्व (मन), बुद्धि, पौरुष और पराक्रम अनुपहत (नष्ट न हुए) हैं, और जो इस लोक में और उस (दूसरे) लोक में भी (अपना) हित देखता है, उसे तीन एषणाओं (इच्छाओं) के लिए प्रयत्न करना चाहिए। वे इस प्रकार हैं: प्राणैषणा (प्राणों की एषणा), धनैषणा (धन की एषणा) और परलोकैषणा (परलोक की एषणा)।

च. सू. ११/४

। । , , ; ॥ ४ ॥

इन एषणाओं में से तो सबसे पहले प्राणैषणा (प्राणों की एषणा) को अपनाए। क्यों? क्योंकि प्राणों के त्याग में सबका त्याग है। उस (प्राण) का अनुपालन (रक्षा) यह है: स्वस्थ (व्यक्ति) के लिए स्वस्थवृत्त का पालन, और आतुर (रोगी) के लिए विकार को शान्त करने में अप्रमाद (असावधानी न करना); ये दोनों (बातें) कही जा चुकी हैं और (आगे) कही भी जाएँगी। जैसा कहा गया है, वैसे उसका पालन करता हुआ (व्यक्ति) प्राणों के अनुपालन से दीर्घ आयु पाता है। इस प्रकार पहली एषणा की व्याख्या हुई।

च. सू. ११/५

, ; , ।; , ; । ॥ ५ ॥

इसके बाद दूसरी, धनैषणा (धन की एषणा) को अपनाए, क्योंकि प्राणों के ठीक बाद धन की ही खोज करनी होती है; क्योंकि इस पाप (दुर्भाग्य) से बढ़कर बुरा (कुछ) नहीं है कि साधनहीन (व्यक्ति) की आयु लम्बी हो; इसलिए उपकरणों (जीविका के साधनों) को पाने का यत्न करे। उसमें हम उपकरण पाने के उपायों की व्याख्या करेंगे; जैसे खेती, पशुपालन, व्यापार, राजा की सेवा आदि; और दूसरे भी जो कर्म (वह) जाने, जो सज्जनों द्वारा निन्दित न हों और जीविका और पुष्टि देने वाले हों, उन्हें करना आरम्भ करे; ऐसा करता हुआ (व्यक्ति) लम्बा जीवन जीता है और ऐसा पुरुष होता है जिसका अपमान नहीं होता। इस प्रकार दूसरी एषणा, धनैषणा की व्याख्या हुई।

च. सू. ११/६

। ; , , ; - ‘ । ॥ ।ऽ नु ॥ ६ ॥

इसके बाद तीसरी, परलोकैषणा (परलोक की एषणा) को अपनाए। और इस विषय में संशय है कि यहाँ से च्युत होकर (मरकर) क्या हम (फिर) होंगे या नहीं। फिर यह संशय कहाँ से (उठता) है? कहा जाता है: क्योंकि कुछ (लोग) केवल प्रत्यक्ष को मानने वाले हैं, जिन्होंने पुनर्भव (पुनर्जन्म) के परोक्ष होने के कारण नास्तिक्य को अपना लिया है; और कुछ ऐसे हैं जो आगम पर विश्वास से ही पुनर्भव को मानते हैं; और श्रुतियों के भेद से भी: 'कुछ (लोग) माता और पिता को जन्म का कारण मानते हैं; और दूसरे लोग स्वभाव को, पर-निर्माण को और यदृच्छा को।' इसलिए संशय है कि पुनर्भव सचमुच है या नहीं।

च. सू. ११/७

। ; , ; , ॥ ७ ॥

उस (विषय) में बुद्धिमान (व्यक्ति) नास्तिक्य-बुद्धि (परलोक को न मानने के विचार) को और विचिकित्सा (संशय) को त्याग दे। क्यों? क्योंकि प्रत्यक्ष (जो इन्द्रियों से सीधे जाना जाता है) थोड़ा है; अप्रत्यक्ष बहुत है, जो आगम, अनुमान और युक्ति से जाना जाता है; जिन इन्द्रियों के द्वारा ही प्रत्यक्ष जाना जाता है, वे (इन्द्रियाँ) ही स्वयं अप्रत्यक्ष भी हैं।

च. सू. ११/८

; , ॥ ८ ॥

विद्यमान रूपों (वस्तुओं) का भी प्रत्यक्ष नहीं होता: अत्यधिक निकटता से, अत्यधिक दूरी से, आवरण (बीच की ओट) से, करण (इन्द्रिय) की दुर्बलता से, मन के स्थिर न रहने से, समान वस्तुओं में मिल जाने से, (किसी प्रबल वस्तु से) दब जाने से और अत्यधिक सूक्ष्मता से। इसलिए 'प्रत्यक्ष ही है, और कुछ नहीं है', यह बात बिना परीक्षा किए कही जाती है।

च. सू. ११/९

। । ॥ ९ ॥

और ये (परस्पर भिन्न) श्रुतियाँ (सुने हुए मत) कारण (प्रमाण) नहीं हैं, क्योंकि ये युक्ति के विरुद्ध हैं। माता या पिता की जो आत्मा है, वह यदि सन्तान में जाए, तो आत्मा दो ही प्रकार से जा सकती है: या तो पूरी की पूरी, या (अपने किसी) अवयव (अंश) से।

च. सू. ११/१०

। ॥ १० ॥

यदि (माता या पिता की) पूरी आत्मा (सन्तान में) चली जाए, तो माता या पिता की मृत्यु हो जाएगी। और सूक्ष्म आत्मा का कोई भी अवयव (अंश) सर्वथा होता ही नहीं।

च. सू. ११/११

। ॥ ११ ॥

बुद्धि और मन (के विषय में भी) यही निर्णय है: जैसे आत्मा (माता-पिता से सन्तान में नहीं जाती), वैसे ही वे (दोनों भी)। और जिनका यह मत है (कि माता-पिता ही जन्म का कारण हैं), उनके (मत में) चार प्रकार की योनि (जन्म के चार प्रकार) नहीं बनती।

च. सू. ११/१२

। ॥ १२ ॥

छह धातुओं का जो अपना (विशेष) लक्षण है, उसे स्वाभाविक (स्वभाव से होने वाला) जानना चाहिए; (किन्तु) उनके संयोग (मिलने) में और वियोग (अलग होने) में भी कर्म ही कारण है।

च. सू. ११/१३

। ॥ १३ ॥

अनादि (जिसका कोई आरम्भ नहीं) चेतना-धातु (आत्मा) की परनिर्मिति (किसी दूसरे के द्वारा रचना) नहीं मानी जाती। यदि 'पर' (दूसरा) आत्मा ही है और वही कारण माना गया है, तो परनिर्मिति (का मत) रहे।

च. सू. ११/१४

। ॥ १४ ॥

(तब) न परीक्षा (रहेगी), न परीक्ष्य (परखने योग्य विषय), न कर्ता और न कारण; न देवता, न ऋषि, न सिद्ध, न कर्म और न कर्म का फल।

च. सू. ११/१५

। ॥ १५ ॥

यदृच्छा (संयोगवाद) से जिसकी बुद्धि मारी गई है, उस नास्तिक के लिए आत्मा है ही नहीं। और यह नास्तिकता का आग्रह पापों से भी बढ़कर पाप है।

च. सू. ११/१६

। ॥ १६ ॥

इसलिए बुद्धिमान पुरुष गलत मार्ग पर फैली हुई इस मति (विचार) को छोड़कर, सज्जनों की बुद्धि के दीपक से सब कुछ जैसा है वैसा देखे।

च. सू. ११/१७

॥ १७ ॥

सब कुछ निश्चय ही दो प्रकार का है: सत् (जो है) और असत् (जो नहीं है)। उसकी परीक्षा चार प्रकार की है: आप्तोपदेश (आप्त पुरुषों का उपदेश), प्रत्यक्ष, अनुमान और युक्ति।

च. सू. ११/१८

। ॥ १८ ॥

पहले आप्त (कौन हैं): जो तप और ज्ञान के बल से रज और तम से पूरी तरह मुक्त हो गए हैं, जिनका तीनों कालों का ज्ञान निर्मल है और सदा अबाधित रहता है

च. सू. ११/१९

। ॥ १९ ॥

वे आप्त, शिष्ट और विबुद्ध (जागे हुए ज्ञानी) हैं; उनका वचन संशय-रहित होता है। वे सत्य कहेंगे; रज और तम से रहित वे असत्य क्यों कहेंगे?

च. सू. ११/२०

। ॥ २० ॥

आत्मा, इन्द्रियों, मन और (इन्द्रियों के) विषयों के सन्निकर्ष (संयोग) से उसी क्षण जो स्पष्ट बुद्धि (ज्ञान) उत्पन्न होती है, वह प्रत्यक्ष कहलाती है।

च. सू. ११/२१

। ॥ २१ ॥

प्रत्यक्ष के आधार पर, तीन प्रकार से और तीनों कालों में अनुमान किया जाता है: धुएँ से छिपी हुई अग्नि का, और गर्भ देखने से मैथुन का।

च. सू. ११/२२

। ॥ २२ ॥

इसी प्रकार बुद्धिमान लोग अतीत (बीती बात) का निश्चय करते हैं; और यहीं (इस संसार में) बीज से उसके समान फल उत्पन्न हुआ देखकर, बीज से भविष्य के फल का (निश्चय करते हैं)।

च. सू. ११/२३

। ॥ २३ ॥

जल, कर्षण (जुताई), बीज और ऋतु के संयोग से सस्य (फसल) की उत्पत्ति होती है, (यह जानना) युक्ति है; इसी प्रकार छह धातुओं के संयोग से गर्भों की उत्पत्ति होती है।

च. सू. ११/२४

। ॥ २४ ॥

मथ्य (जिसे मथा जाता है), मन्थन (मथने की क्रिया) और मन्थान (मथने का डण्डा) के संयोग से अग्नि की उत्पत्ति होती है। युक्ति से युक्त (उचित ढंग से काम में लाई गई) चतुष्पाद-सम्पत्ति (चिकित्सा के चारों पादों का गुणों से पूर्ण होना) रोग का नाश करने वाली है।

च. सू. ११/२५

। ॥ २५ ॥

जो बुद्धि अनेक कारणों के योग से उत्पन्न होने वाले भावों को देखती है, उसे त्रिकाल (तीनों कालों में काम आने वाली) युक्ति जानना चाहिए, जिससे त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ और काम) सिद्ध किया जाता है।

च. सू. ११/२६

। ॥ २६ ॥

यह (चार प्रकार की) परीक्षा है; (इसके अतिरिक्त) कोई अन्य (परीक्षा) नहीं है जिससे सब कुछ परखा जाए। परखने योग्य (विषय) सत् और असत् है; और इस प्रकार उस (परीक्षा) से (यह सिद्ध होता है कि) पुनर्भव है।

च. सू. ११/२७

, , ; ॥ २७ ॥

उन (चार परीक्षाओं) में, आप्तागम (आप्त पुरुषों का वचन) पहले तो वेद है; और जो कोई अन्य शास्त्र-वचन भी वेद के अर्थ के विपरीत न हो, परीक्षकों (जाँच-परख करने वाले विद्वानों) द्वारा रचा गया हो, शिष्ट (सदाचारी विद्वानों) द्वारा मान्य हो और लोगों पर अनुग्रह (उनके कल्याण) के लिए प्रवृत्त हो, वह भी आप्तागम है। आप्तागम से यह जाना जाता है कि दान, तप, यज्ञ, सत्य, अहिंसा और ब्रह्मचर्य अभ्युदय (उन्नति) और निःश्रेयस (परम कल्याण) देने वाले हैं।

च. सू. ११/२८

॥ २८ ॥

और जिनके सत्त्व (मन) के दोष दूर नहीं हुए हैं, उनके लिए दोषरहित (आप्त पुरुषों) द्वारा धर्मद्वारों (धर्म के द्वारों) में अपुनर्भव (फिर जन्म न होने) का उपदेश नहीं किया जाता।

च. सू. ११/२९

॥ २९ ॥

और (मनुष्य को) इस प्रकार निश्चय करना चाहिए कि धर्मद्वारों (धर्म के द्वारों) में सावधान रहने वाले, भय, राग (आसक्ति), द्वेष, लोभ, मोह और मान (अहंकार) से रहित, ब्रह्मपर (ब्रह्म में तत्पर), आप्त, कर्म को जानने वाले, जिनके सत्त्व (मन) और बुद्धि की गति बाधित नहीं हुई, ऐसे पूर्व के और उनसे भी पूर्व के, दिव्य दृष्टि वाले महर्षियों ने पुनर्भव को देखकर उसका उपदेश किया है।

च. सू. ११/३०

- , , , , , , , , , , , - , ॥ ३० ॥

और प्रत्यक्ष (प्रमाण) भी (पुनर्भव के पक्ष में) मिलता है: सन्तानें माता-पिता से भिन्न होती हैं; समान उत्पत्ति वालों (एक ही माता-पिता की सन्तानों) में वर्ण (रंग), स्वर, आकृति, सत्त्व (मन), बुद्धि और भाग्य के भेद होते हैं; ऊँचे या नीचे कुल में जन्म; दासता और ऐश्वर्य; सुखी और दुःखी आयु (जीवन); आयु की विषमता; इस (जन्म) में न किए हुए (कर्म के फल) की प्राप्ति; बिना सिखाए (शिशुओं) में रोने, स्तनपान, हँसने, डरने आदि की प्रवृत्ति; लक्षणों (चिह्नों) का उत्पन्न होना; कर्म समान होने पर भी फल में अन्तर; किसी कर्म में मेधा (कुशल बुद्धि) और किसी कर्म में मेधा का अभाव; जातिस्मरण (पिछले जन्म की स्मृति), (जिससे यह जाना जाता है कि) यहाँ से च्युत हुए (मरे हुए) प्राणियों का यहाँ (फिर) आना (होता है); और समान रूप से देखने पर भी (किसी का) प्रिय और (किसी का) अप्रिय लगना।

च. सू. ११/३१

- - , ; ; , ॥ ३१ ॥

इसी (प्रत्यक्ष) से यह अनुमान किया जाता है कि जो अपना किया हुआ, न टाला जा सकने वाला, नष्ट न होने वाला, पूर्व देह (पिछले जन्म) का, 'दैव' नाम वाला और (साथ) लगा रहने वाला कर्म है, उसी का यह फल है; और इस (वर्तमान कर्म) से अन्य (फल) होगा। फल से बीज का अनुमान किया जाता है, और बीज से फल का।

च. सू. ११/३२

- , ; , ; , ; ॥ ३२ ॥

और युक्ति यह है: छह धातुओं के समुदाय (मेल) से गर्भ का जन्म होता है; कर्ता और करण (साधन) के संयोग से क्रिया होती है; फल किए हुए कर्म का होता है, न किए हुए का नहीं; बिना बीज के अङ्कुर की उत्पत्ति नहीं होती; फल कर्म के समान होता है; एक (प्रकार के) बीज से किसी दूसरे की उत्पत्ति नहीं होती; यह युक्ति है।

च. सू. ११/३३

; - ; ; । ॥ ३३ ॥

इस प्रकार चार प्रमाणों से पुनर्भव (पुनर्जन्म) के सिद्ध कर दिए जाने पर (मनुष्य को) धर्म के द्वारों पर मन लगाना चाहिए; जैसे कि - गुरु की सेवा में, अध्ययन में, व्रतों के पालन में, विवाह करने में, सन्तान उत्पन्न करने में, आश्रितों के भरण-पोषण में, अतिथियों के सत्कार में, दान में, अनभिध्या (दूसरों की वस्तु का लोभ न करने) में, तप में, अनसूया (दोष-दृष्टि न रखने) में, शरीर, वाणी और मन के अक्लिष्ट (क्लेश-रहित) कर्म में, शरीर, इन्द्रिय, मन, अर्थ (इन्द्रियों के विषय), बुद्धि और आत्मा की परीक्षा में, और मन की समाधि (एकाग्रता) में; और इस प्रकार के जो अन्य कर्म भी वह जाने, जो सज्जनों द्वारा निन्दित नहीं हैं, स्वर्ग दिलाने वाले हैं और जीविका तथा पुष्टि बढ़ाने वाले हैं, उन्हें करना आरम्भ करे; ऐसा करता हुआ (मनुष्य) यहाँ (इस लोक में) ही यश पाता है और मरने के बाद स्वर्ग। इस प्रकार तीसरी परलोकैषणा (परलोक की इच्छा) की व्याख्या हो गई।

च. सू. ११/३४

, , , , , , ॥ ३४ ॥

अब, निश्चय ही, उपस्तम्भ (सहारे) तीन हैं, बल तीन प्रकार का है, आयतन (रोगों के आधार) तीन हैं, रोग तीन हैं, रोगमार्ग (रोगों के मार्ग) तीन हैं, भिषक् (वैद्य) तीन प्रकार के हैं और औषध तीन प्रकार का है।

च. सू. ११/३५

- , , ; , ॥ ३५ ॥

'तीन उपस्तम्भ' (जो कहे गए), वे हैं - आहार, स्वप्न (निद्रा) और ब्रह्मचर्य; युक्ति से (उचित ढंग से) अपनाए गए इन तीन उपस्तम्भों से थामा हुआ शरीर बल, वर्ण और उपचय (पुष्टि) से भरपूर होकर तब तक बना रहता है जब तक आयु का संस्कार रहता है, उस (व्यक्ति) का जो अहितकर संस्कार का सेवन नहीं करता, जिस (संस्कार) का उपदेश यहीं किया जाएगा।

च. सू. ११/३६

- , , । , , ॥ ३६ ॥

'तीन प्रकार का बल' (जो कहा गया), वह है - सहज, कालज और युक्तिकृत। सहज (बल) वह है जो शरीर और सत्त्व (मन) का प्राकृत (स्वाभाविक) है; कालकृत (बल) ऋतुओं के विभाग से उत्पन्न और वय (अवस्था) से बना होता है; और युक्तिकृत (बल) तो वह है जो आहार और चेष्टा के योग (उचित प्रयोग) से उत्पन्न होता है।

च. सू. ११/३७

- । , , ।।।।।।।।। ; , , ; , , ; , , ; , , ॥ ३७ ॥

तीन आयतन (रोगों के आधार) ये हैं - अर्थों (इन्द्रियों के विषयों), कर्म और काल के अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग। उनमें, अत्यन्त चमकीले दृश्यों को अत्यधिक देखना अतियोग है, बिल्कुल न देखना अयोग है, और अत्यन्त पास के, अत्यन्त दूर के, रौद्र, भयानक, अद्भुत, अप्रिय, घिनौने, विकृत, डराने वाले आदि रूपों को देखना मिथ्यायोग है; इसी प्रकार अत्यन्त तेज़ मेघ-गर्जन, नगाड़े, चीख आदि शब्दों को अत्यधिक सुनना अतियोग है, बिल्कुल न सुनना अयोग है, और कठोर वचन, प्रियजन के नाश, चोट, अपमान, डराने वाले आदि शब्दों को सुनना मिथ्यायोग है; इसी प्रकार अत्यन्त तीखी, उग्र और अभिष्यन्दी गन्धों को अत्यधिक सूँघना अतियोग है, बिल्कुल न सूँघना अयोग है, और सड़ी, अप्रिय, अपवित्र और सड़ी-गली (वस्तुओं की), विषैली हवा की और शव की गन्ध आदि को सूँघना मिथ्यायोग है; इसी प्रकार रसों को अत्यधिक ग्रहण करना अतियोग है, बिल्कुल ग्रहण न करना अयोग है, (और रसों का) मिथ्यायोग राशि को छोड़कर (शेष) आहारविधिविशेषायतनों (भोजन-विधि के विशेष आधारों के प्रसंग) में बताया जाएगा; इसी प्रकार अत्यन्त ठण्डी और गरम स्पर्श योग्य वस्तुओं का तथा स्नान, अभ्यङ्ग, उत्सादन आदि का अत्यधिक सेवन अतियोग है, बिल्कुल सेवन न करना अयोग है, और स्नान आदि का तथा ठण्डी, गरम आदि स्पर्श योग्य वस्तुओं का क्रम के बिना सेवन, और विषम स्थान, चोट, अशुचि (अपवित्र वस्तुओं) और भूतों का स्पर्श आदि - यह मिथ्यायोग है।

च. सू. ११/३८

, , ; , ; ॥ ३८ ॥

उनमें (इन्द्रियों में) एक स्पर्शन (स्पर्श की इन्द्रिय) इन्द्रिय-व्यापक (सब इन्द्रियों में व्याप्त) है और चेतस् (मन) से समवाय-सम्बन्ध से जुड़ा है; और स्पर्शन के व्याप्त होने से चेतस् भी व्यापक है; इसलिए सब इन्द्रियों का, व्यापक स्पर्श से उत्पन्न जो विशेष भाव है, वही यह, अनुपशय (अहितकर) होने के कारण, पाँच प्रकार का और तीन-तीन भेदों वाला असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग होता है; क्योंकि सात्म्य का अर्थ ही उपशय का अर्थ है।

च. सू. ११/३९

। ; ; , , ॥ ३९ ॥

कर्म वाणी, मन और शरीर की प्रवृत्ति (क्रिया) है। उनमें वाणी, मन और शरीर की अति प्रवृत्ति अतियोग है; (उनकी) सर्वथा अप्रवृत्ति (बिल्कुल क्रिया न होना) अयोग है; वेगों को रोकना और (बलपूर्वक) निकालना, विषम ढंग से फिसलना और गिरना, अंगों को (अनुचित ढंग से) रखना, अंगों को दूषित करना, प्रहार, मर्दन, प्राण (श्वास) को रोकना, (शरीर को) क्लेश देना आदि शारीरिक मिथ्यायोग है; चुगली वाले, असत्य, असमय के, कलह वाले, अप्रिय, असम्बद्ध, अशिष्ट और कठोर वचन आदि वाणी का मिथ्यायोग है; भय, शोक, क्रोध, लोभ, मोह, मान (घमण्ड), ईर्ष्या, मिथ्यादर्शन (गलत धारणा) आदि मानसिक मिथ्यायोग है।

च. सू. ११/४०

॥ ४० ॥

और संक्षेप में, अतियोग और अयोग को छोड़कर, वाणी, मन और शरीर से होने वाला जो भी कर्म अहितकर है और जिसका उपदेश नहीं किया गया है, उसे भी मिथ्यायोग जानना चाहिए।

च. सू. ११/४१

॥ ४१ ॥

इस प्रकार तीन-तीन भेदों (अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग) वाले इसी तीन प्रकार के (वाणी, मन और शरीर के) कर्म को प्रज्ञापराध समझना चाहिए।

च. सू. ११/४२

, । , , । ॥ ४२ ॥

शीत, उष्ण (गर्मी) और वर्षा के लक्षणों वाली हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा (ऋतुएँ) तो (मिलकर) संवत्सर (वर्ष) हैं; वह काल है। उनमें, जिस काल के अपने लक्षण अति मात्रा में हों, वह कालातियोग है; जिसके अपने लक्षण हीन (कम) हों, वह कालायोग है; और जिसके लक्षण अपने-अपने लक्षणों से विपरीत हों, वह कालमिथ्यायोग है। और काल को परिणाम कहा जाता है।

च. सू. ११/४३

, , ; ॥ ४३ ॥

इस प्रकार असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग (इन्द्रियों का अपने विषयों से ऐसा संयोग जो अनुकूल न हो), प्रज्ञापराध और परिणाम, ये तीन, (प्रत्येक) तीन प्रकार के भेदों वाले, विकारों के हेतु हैं; परन्तु समयोग से युक्त होने पर (यही) प्रकृति (स्वाभाविक स्वस्थ अवस्था) के हेतु होते हैं।

च. सू. ११/४४

; ॥ ४४ ॥

सभी भावों (वस्तुओं) का भाव और अभाव (होना और न होना) योग, अयोग, अतियोग और मिथ्यायोग के बिना नहीं पाए जाते; क्योंकि भाव और अभाव अपनी-अपनी युक्ति (प्रयोग के ढंग) पर निर्भर होते हैं।

च. सू. ११/४५

। , , ॥ ४५ ॥

रोग तीन हैं, अर्थात् निज, आगन्तु और मानस। उनमें निज (रोग) शरीर के दोषों से उत्पन्न होता है; आगन्तु (रोग) भूत, विष, वायु, अग्नि, प्रहार (चोट) आदि से उत्पन्न होता है; और मानस (रोग) इष्ट (चाही हुई वस्तु) के न मिलने से और अनिष्ट (अनचाही वस्तु) के मिलने से उत्पन्न होता है।

च. सू. ११/४६

, ; - , ॥ ४६ ॥

इस विषय में, बुद्धिमान् (व्यक्ति) को, मानस व्याधि से घिरा होने पर भी, बुद्धि से हित और अहित को बार-बार परखकर, धर्म, अर्थ और काम में से जो अहितकर हैं उनका सेवन न करने में और जो हितकर हैं उनका सेवन करने में प्रयत्न करना चाहिए; क्योंकि संसार में इन तीनों के बिना कुछ भी मानसिक, सुख या दुःख, उत्पन्न नहीं होता। इसलिए यह भी करना चाहिए: उसके जानकारों की सेवा में प्रयत्न करना चाहिए, और आत्म (स्वयं अपने), देश, कुल, काल, बल और शक्ति के ठीक-ठीक ज्ञान में (भी)।

च. सू. ११/४७

। ॥ ४७ ॥

और इस विषय में (यह श्लोक) है: मानस (रोग) के प्रति भैषज्य (चिकित्सा) है त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का ध्यानपूर्वक अवलोकन, उसके जानकारों की सेवा, और आत्म (स्वयं अपने) आदि का सब प्रकार से ज्ञान।

च. सू. ११/४८

- , , । , ; , , ; , ॥ ४८ ॥

'तीन रोगमार्ग' (जो कहे गए, वे ये हैं): शाखाएँ, मर्म और अस्थिसन्धियाँ, तथा कोष्ठ। उनमें शाखाएँ हैं रक्त आदि धातुएँ और त्वचा; वह बाहरी रोगमार्ग है। मर्म तो बस्ति (मूत्राशय), हृदय, सिर आदि हैं; अस्थिसन्धियाँ हैं हड्डियों के जोड़, और वहाँ बँधे हुए स्नायु और कण्डराएँ; वह मध्यम रोगमार्ग है। कोष्ठ को तो तन्त्र (शास्त्र) में महास्रोत, शरीरमध्य, महानिम्न और आमपक्वाशय, इन पर्याय शब्दों से कहा जाता है; वह भीतरी रोगमार्ग है।

च. सू. ११/४९

, ; ; ॥ ४९ ॥

उनमें गण्ड, पिडका, अलजी, अपची, चर्मकील, अधिमांस, मषक, कुष्ठ, व्यङ्ग आदि विकार, और बाहरी मार्ग में उत्पन्न होने वाले विसर्प, श्वयथु (सूजन), गुल्म, अर्श (बवासीर), विद्रधि आदि, (ये) शाखानुसारी (शाखा-मार्ग में चलने वाले) रोग होते हैं; पक्षवध, ग्रह, अपतानक, अर्दित, शोष, राजयक्ष्मा, अस्थिसन्धिशूल (हड्डियों के जोड़ों का दर्द), गुदभ्रंश आदि, और सिर, हृदय और बस्ति के रोग आदि, (ये) मध्यम मार्ग में चलने वाले रोग होते हैं; ज्वर, अतीसार, छर्दि (उल्टी), अलसक, विसूचिका, कास (खाँसी), श्वास, हिक्का (हिचकी), आनाह, उदर, प्लीहा (के रोग) आदि, और भीतरी मार्ग में उत्पन्न होने वाले विसर्प, श्वयथु, गुल्म, अर्श, विद्रधि आदि, (ये) कोष्ठानुसारी (कोष्ठ-मार्ग में चलने वाले) रोग होते हैं।

च. सू. ११/५०

। ॥ ५० ॥

'तीन प्रकार के भिषक् (वैद्य)' (जो कहे गए, वे ये हैं): (कुछ) भिषक् का छद्म (वेश) धारण करके घूमने वाले हैं, कुछ सिद्धसाधित हैं, और (कुछ) वैद्य के गुणों से युक्त हैं; (इस प्रकार) पृथ्वी पर तीन प्रकार के भिषक् हैं।

च. सू. ११/५१

। ॥ ५१ ॥

जो वैद्य के पात्रों (उपकरणों) और औषधों से, पुस्तकों से, पल्लवों (कोमल पत्तों) से और अवलोकनों (देखने के ढंग) से 'भिषक्' नाम पा लेते हैं, वे अज्ञानी प्रतिरूपक (केवल वैद्य जैसे दिखने वाले) हैं।

च. सू. ११/५२

। ॥ ५२ ॥

जो वैसे (योग्य) न होते हुए भी श्री (धन-वैभव), यश और ज्ञान में सिद्ध (प्रसिद्ध) लोगों का व्यपदेश करके (उनसे अपना सम्बन्ध बताकर) 'वैद्य' नाम पाते हैं, उन्हें सिद्धसाधित जानना चाहिए।

च. सू. ११/५३

। ॥ ५३ ॥

जो प्रयोग, ज्ञान, विज्ञान और सिद्धि (सफलता) में सिद्ध (कुशल) हैं और सुख देने वाले हैं, वे जीवन के रक्षक होते हैं; वैद्यत्व (सच्चा वैद्य होना) उन्हीं में स्थित है।

च. सू. ११/५४

- , , । - , - , - ॥ ५४ ॥

'त्रिविध (तीन प्रकार का) औषध' (जो कहा गया, वह यह है): दैवव्यपाश्रय, युक्तिव्यपाश्रय और सत्त्वावजय। उनमें दैवव्यपाश्रय है मन्त्र, औषधि, मणि, मङ्गल, बलि, उपहार, होम, नियम, प्रायश्चित्त, उपवास, स्वस्त्ययन, प्रणिपात, गमन आदि; युक्तिव्यपाश्रय तो आहार और औषध द्रव्यों की योजना (उचित प्रयोग) है; सत्त्वावजय तो अहित (हानिकारक) विषयों से मन का निग्रह (मन को रोकना) है।

च. सू. ११/५५

- , , । , , ॥ ५५ ॥

शरीर के दोषों के प्रकुपित होने पर (आचार्य) प्रायः शरीर का ही आश्रय लेकर तीन प्रकार की औषध मानते हैं - अन्तःपरिमार्जन, बहिःपरिमार्जन और शस्त्रप्रणिधान। उनमें, जो औषध शरीर के भीतर प्रवेश करके आहार से उत्पन्न व्याधियों को दूर करती है, वह अन्तःपरिमार्जन है; और जो बाहरी स्पर्श का आश्रय लेकर अभ्यङ्ग, स्वेद, प्रदेह, परिषेक, उन्मर्दन आदि से रोगों को दूर करती है, वह बहिःपरिमार्जन है; और शस्त्रप्रणिधान है छेदन, भेदन, व्यधन, दारण, लेखन, उत्पाटन, प्रच्छन, सीवन, एषण, क्षार और जलौका (जोंक)।

च. सू. ११/५६

। ॥ ५६ ॥

और इस विषय में (ये श्लोक) हैं: रोग उत्पन्न होने पर बुद्धिमान (व्यक्ति) बाहरी या भीतरी कर्म (उपचार) से, अथवा शस्त्र द्वारा चिकित्सा से, शर्म (सुख) पाता है।

च. सू. ११/५७

। ॥ ५७ ॥

परन्तु नासमझ (व्यक्ति) तो मोह से या प्रमाद (लापरवाही) से, आरम्भ में उत्पन्न होते हुए रोग को नहीं पहचानता, जैसे मूर्ख (व्यक्ति) शत्रु को (नहीं पहचानता)।

च. सू. ११/५८

। ॥ ५८ ॥

क्योंकि रोग पहले अणु (बहुत छोटा) होकर बाद में बढ़ता है; जड़ जमा लेने पर वह दुर्बुद्धि (व्यक्ति) के बल और आयु को हर लेता है।

च. सू. ११/५९

। ॥ ५९ ॥

मूढ़ (व्यक्ति) तब तक संज्ञा (होश) नहीं पाता, जब तक (रोग से) पीड़ित नहीं होता; और पीड़ित होने पर तो वह बाद में व्याधि को रोकने में मन लगाता है।

च. सू. ११/६०

। ॥ ६० ॥

तब वह पुत्रों, पत्नी और ज्ञातियों (सम्बन्धियों) को बुलाकर कहता है कि मेरा सर्वस्व (सब कुछ) लगाकर भी कोई भिषक् (वैद्य) लाया जाए।

च. सू. ११/६१

। ॥ ६१ ॥

और ऐसी दशा वाले, दुर्बल, रोग से पीड़ित, कृश (दुबले), क्षीण इन्द्रियों वाले, दीन और गतायु (जिसकी आयु बीत चुकी है, ऐसे व्यक्ति) को बचाने में कौन समर्थ है?

च. सू. ११/६२

। ॥ ६२ ॥

वह नासमझ (रोगी) त्राता (बचाने वाले) को न पाकर जीवन छोड़ देता है, जैसे पूँछ से बँधी और (अपने से) अधिक बलवान द्वारा खींची जाती हुई गोधा (गोह) (प्राण छोड़ देती है)।

च. सू. ११/६३

। ॥ ६३ ॥

इसलिए जो अपना सुख चाहे, वह रोगों (के उत्पन्न होने) से पहले ही, अथवा रोगों के तरुण (नए) रहते ही, भेषजों (औषधों) से (उनका) प्रतिकार करे।

च. सू. ११/६४

। ॥ ६४ ॥

इस विषय में (सार के) दो श्लोक (हैं): तिस्रैषणीय (अध्याय) में एषणाएँ, (जीवन के) उपस्तम्भ (सहारे), बल, (रोगों के) कारण, आमय (रोग), (रोगों के) मार्ग, भिषक् (वैद्य) और भेषज (औषध)

च. सू. ११/६५

। ॥ ६५ ॥

(ये) आठ भाव (विषय), जिनमें सब कुछ प्रतिष्ठित है, भावों (सांसारिक विषयों) में आसक्ति न रखने वाले बुद्धिमान कृष्णात्रेय ने तीन-तीन के रूप में बताए हैं।

च. सू. ११

॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में तिस्रैषणीय नामक ग्यारहवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।