भूमिका
तिस्रैषणीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का ग्यारहवाँ अध्याय है, और इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। नाम का अर्थ है 'तीन एषणाओं वाला': एषणा वह लक्ष्य है जिसे पाने के लिए मनुष्य प्रयत्न करता है, और अध्याय इन्हीं तीन एषणाओं, यानी जीवन की तीन इच्छाओं, से आरम्भ होता है। इसके बाद अध्याय और विषय भी तीन-तीन के समूहों में रखता है: शरीर के तीन उपस्तम्भ (सहारे), तीन प्रकार का बल, रोगों के तीन आयतन (आधार), तीन प्रकार के रोग, रोगों के तीन मार्ग, तीन प्रकार के वैद्य और तीन प्रकार का औषध। अन्त के सार-श्लोक कहते हैं कि ये आठ विषय बुद्धिमान कृष्णात्रेय ने तीन-तीन के रूप में बताए हैं।
आत्रेय बताते हैं कि जिस पुरुष के मन, बुद्धि, पौरुष और पराक्रम ठीक हैं और जो इस लोक और परलोक दोनों में अपना हित चाहता है, उसे तीन एषणाओं के लिए प्रयत्न करना चाहिए। पहली प्राणैषणा है, यानी जीवन बनाए रखने की इच्छा, क्योंकि प्राण गए तो सब गया; स्वस्थ व्यक्ति स्वस्थवृत्त का पालन करे और रोगी अपने रोग को शान्त करने में लापरवाही न करे, तो वह दीर्घ आयु पाता है। दूसरी धनैषणा है, क्योंकि साधनहीन व्यक्ति की लम्बी आयु से बुरा कुछ नहीं; इसलिए खेती, पशुपालन, व्यापार, राजा की सेवा या कोई भी ऐसा काम बताया गया है जिसे सज्जन बुरा न कहें। तीसरी परलोकैषणा है, और उस पर संशय है कि मरने के बाद हम फिर होंगे या नहीं: कुछ लोग केवल प्रत्यक्ष को मानकर पुनर्भव (पुनर्जन्म) को नकारते हैं, कुछ उसे केवल आगम (शास्त्र) पर विश्वास से मानते हैं, और कुछ जन्म का कारण माता-पिता, स्वभाव, किसी दूसरे की रचना या यदृच्छा (संयोग) को मानते हैं।
अध्याय का सबसे लम्बा भाग इसी संशय का उत्तर है। आत्रेय कहते हैं कि प्रत्यक्ष थोड़ा है और अप्रत्यक्ष बहुत: जिन इन्द्रियों से हम जानते हैं, वे स्वयं नहीं दिखतीं, और कोई वस्तु बहुत पास, बहुत दूर, ओट में या अत्यन्त सूक्ष्म होने जैसे कारणों से मौजूद होते हुए भी नहीं दिखती। वे एक-एक मत को भी परखते हैं: माता-पिता की आत्मा सन्तान में नहीं जाती; छह धातुओं के लक्षण स्वाभाविक हैं, पर उनके मिलने और बिछुड़ने का कारण कर्म है; अनादि आत्मा को किसी दूसरे ने नहीं रचा; और सब कुछ संयोग से मानें तो न परीक्षा बचेगी, न कर्म, न कर्म का फल। फिर अध्याय ज्ञान की चार परीक्षाएँ बताता है: आप्तोपदेश (रज और तम से मुक्त आप्त पुरुषों का वचन), प्रत्यक्ष, अनुमान (जैसे धुएँ से छिपी आग का) और युक्ति (यह समझ कि फसल, आग या आरोग्य जैसा हर परिणाम अनेक कारणों के मेल से होता है)। इन चारों से पुनर्भव सिद्ध किया गया है: दिव्य दृष्टि वाले महर्षियों ने उसका उपदेश किया; सन्तानों का माता-पिता से भिन्न होना और शिशु का बिना सिखाए रोना और दूध पीना प्रत्यक्ष दिखता है; इनसे अनुमान होता है कि ये पिछले जन्म के 'दैव' कहलाने वाले कर्म का फल हैं; और युक्ति कहती है कि फल किए हुए कर्म का ही होता है, जैसे बीज के बिना अङ्कुर नहीं निकलता। इसलिए अध्याय कहता है कि मनुष्य गुरु की सेवा, अध्ययन, दान, तप और मन की एकाग्रता जैसे धर्म के द्वारों में मन लगाए, जिससे वह यहाँ यश और मरने के बाद स्वर्ग पाता है।
इसके बाद अध्याय बाकी त्रिकों को एक-एक करके समझाता है। शरीर के तीन उपस्तम्भ आहार, स्वप्न (नींद) और ब्रह्मचर्य हैं। बल सहज, कालज और युक्तिकृत होता है। रोगों के तीन आयतन हैं: इन्द्रियों का अपने विषयों से असात्म्य (अनुकूल न पड़ने वाला) संयोग, प्रज्ञापराध, यानी बुद्धि की चूक से वाणी, मन और शरीर का गलत कर्म, और परिणाम, यानी काल; इनमें हर एक का अतियोग (बहुत अधिक), अयोग (बिल्कुल नहीं) और मिथ्यायोग (गलत प्रयोग) रोग का हेतु है, और समयोग स्वस्थ प्रकृति का। रोग निज (शरीर के दोषों से), आगन्तु (विष, आग, चोट जैसे बाहरी कारणों से) और मानस (इष्ट के न मिलने और अनिष्ट के मिलने से) होते हैं। रोगों के मार्ग शाखा, मर्म और अस्थिसन्धियाँ, और कोष्ठ हैं। वैद्य तीन तरह के हैं: वैद्य का वेश भर धारण करने वाले, प्रसिद्ध लोगों के नाम के सहारे वैद्य कहलाने वाले, और वैद्य के गुणों से युक्त सच्चे वैद्य। औषध दैवव्यपाश्रय (मन्त्र, होम, उपवास जैसे उपाय), युक्तिव्यपाश्रय (आहार और औषध द्रव्यों की योजना) और सत्त्वावजय (मन को अहित विषयों से रोकना) है; शरीर के दोषों के प्रकोप में यह भीतर से शोधन, बाहर से शोधन और शस्त्रकर्म के रूप में भी गिनाया गया है।
अन्तिम श्लोक समझदार और नासमझ व्यक्ति की तुलना करते हैं। नासमझ व्यक्ति मोह या लापरवाही से रोग को उसके आरम्भ में नहीं पहचानता; रोग छोटे से बढ़कर जड़ जमा लेता है, और तब वह सब कुछ देकर भी वैद्य बुलवाता है, पर देर हो चुकी होती है। इसलिए श्लोक कहते हैं कि जो अपना सुख चाहे, वह रोग से पहले ही, या रोग के नए रहते ही, उसका प्रतिकार करे। इस अध्याय से ये बातें साथ ले जाने योग्य हैं: जीवन, जीविका और परलोक, तीनों की चिन्ता उचित है; सत्य केवल आँखों से नहीं, चारों परीक्षाओं से जाना जाता है; ग्रन्थ के अनुसार इन्द्रियों के विषय, कर्म और काल का सन्तुलित प्रयोग स्वास्थ्य देता है और असन्तुलित प्रयोग रोग; और रोग को उसके आरम्भ में ही पहचान लेना आवश्यक है।