भूमिका
वातकलाकलीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का बारहवाँ अध्याय है, और इसके साथ सूत्रस्थान का निर्देशचतुष्क (चार अध्यायों का समूह) पूरा होता है। इसका विषय वात है, जिसे यह अध्याय वायु भी कहता है: शरीर के तीन दोषों में से वह, जो शरीर की हर छोटी-बड़ी चेष्टा को चलाता है। नाम के 'कलाकला' को 'कला' और 'अकला' मानकर इसका अर्थ वात के गुण और दोष (उसके अच्छे और बुरे पहलू) लिया गया है; पर इसे 'कला की भी कला' (सूक्ष्म से सूक्ष्म अंश) भी पढ़ा जा सकता है, इसलिए नाम का अर्थ पूरी तरह निश्चित नहीं है। यह अध्याय भी भगवान् आत्रेय का कहा हुआ है, और इसका रूप एक चर्चा का है: अनेक महर्षि बारी-बारी से वात पर अपना मत रखते हैं, और अन्त में भगवान् पुनर्वसु आत्रेय अपना निर्णय देते हैं।
चर्चा महर्षियों के पाँच प्रश्नों से आरम्भ होती है: वायु के गुण क्या हैं, उसे कुपित (बढ़कर बिगड़ा हुआ) क्या करता है, उसे शान्त क्या करता है, वायु असङ्घात (ठोस पिण्ड की तरह न जुड़ा हुआ) और अनवस्थित (एक जगह न टिकने वाला) है तो कोई कारण उस तक पहुँचे बिना उसे कुपित या शान्त कैसे करता है, और शरीर के भीतर और बाहर, कुपित और अकुपित दशा में, उसके कर्म क्या हैं। कुश साङ्कृत्यायन वात के छह गुण गिनाते हैं: रूक्ष (रूखा), लघु (हल्का), शीत (ठण्डा), दारुण (कठोर), खर (खुरदरा) और विशद (चिपचिपाहट से रहित)। कुमारशिरा भरद्वाज बताते हैं कि ऐसे गुणों वाली चीज़ों और कर्मों के बार-बार सेवन से वायु कुपित होता है, क्योंकि समान गुणों का बार-बार सेवन धातुओं को बढ़ाता है। बाह्लीक देश के वैद्य काङ्कायन कहते हैं कि इनके विपरीत कारण वात को शान्त करते हैं। और बडिश धामार्गव कठिन प्रश्न का उत्तर देते हैं: कुपित करने वाले कारण शरीर को रूखा, हल्का, ठण्डा, कठोर, खुरदरा, विशद और छिद्रों वाला बना देते हैं, और ऐसे शरीर में वायु आश्रय पाकर, पुष्ट होकर कुपित होता है; शान्त करने वाले कारण शरीर को स्निग्ध (चिकनाई-युक्त), भारी, गरम, चिकना, कोमल, पिच्छिल (चिपचिपा) और ठोस बना देते हैं, और ऐसे शरीर में वायु कहीं अटके बिना विचरता हुआ शान्त हो जाता है।
राजर्षि वार्योविद यह सब स्वीकार करते हैं, और वायुदेव को नमस्कार करके वायु के कर्म चार भागों में गिनाते हैं। अकुपित रहकर वायु शरीर को धारण करता है; प्राण, उदान, समान, व्यान और अपान उसी के रूप हैं; वह हर छोटी-बड़ी चेष्टा को चलाता है, मन को रोकता और चलाता है, इन्द्रियों को काम में लगाता है, शरीर की धातुओं को संगठित करता है, वाणी को प्रवृत्त करता है, अग्नि को प्रदीप्त करता है, मलों को बाहर निकालता है, गर्भ की आकृतियाँ बनाता है और आयु के बने रहने का कारण है। कुपित होकर वही शरीर को अनेक विकारों से पीड़ित करता है, जिससे बल, वर्ण (रंग-रूप), सुख और आयु की हानि होती है; वह मन को विचलित करता है, इन्द्रियों को क्षीण करता है, गर्भ को नष्ट या विकृत करता है, भय, शोक, मोह, दीनता और प्रलाप उत्पन्न करता है, और प्राणों को रोक देता है। संसार में अपनी स्वाभाविक दशा में वह पृथ्वी को थामता है, अग्नि जलाता है, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्रों और ग्रहों की गति चलाता है, मेघ बनाता और जल बरसाता है, फूल और फल उत्पन्न करता है, ऋतुओं को बाँटता है और फसलें बढ़ाता है; और प्रकुपित होकर वह पर्वतों की चोटियाँ तोड़ता है, वृक्ष उखाड़ता है, समुद्रों को क्षुब्ध करता है, भूमि को कँपाता है, ऋतुओं को बिगाड़ता है, और चारों युगों का अन्त करने वाले मेघ, सूर्य, अग्नि और वायु छोड़ता है। अन्त में वार्योविद वायु को ही भगवान् कहकर उनकी स्तुति करते हैं: वे सबकी उत्पत्ति के कारण और अविनाशी हैं, सुख और दुःख के विधाता हैं, और पाठ मृत्यु, यमराज, प्रजापति जी, अदिति जी, विश्वकर्मा जी और विष्णु जी, इन सबको वायु के ही नाम बताता है।
मरीचि पूछते हैं कि यह चर्चा तो भिषग्विद्या (चिकित्सा-शास्त्र) को लेकर आरम्भ हुई थी, तो वायु के इस वर्णन का उसमें क्या उपयोग है। वार्योविद उत्तर देते हैं कि जो वैद्य अत्यन्त बलवान्, कठोर, बहुत शीघ्र काम करने वाले और तुरन्त प्राण-संकट लाने वाले वायु को भली-भाँति नहीं समझता, वह सहसा कुपित हुए वायु से पहले ही रक्षा का उपाय कैसे बताएगा; और वायु की यथार्थ स्तुति भी आरोग्य, बल और वर्ण की वृद्धि, तेज, शरीर की पुष्टि, ज्ञान और लम्बी आयु के लिए होती है। फिर मरीचि अपना मत रखते हैं: शरीर में पित्त के भीतर स्थित अग्नि ही, कुपित और अकुपित दशा में, शुभ और अशुभ परिणाम देती है, जैसे पाचन और अपाचन, देख पाना और न देख पाना, शरीर की गरमी का ठीक मात्रा में होना और न होना, स्वाभाविक और बिगड़ा हुआ वर्ण, साहस और भय, क्रोध और हर्ष, मोह और प्रसाद (मन की निर्मलता)। उनके बाद काप्य कहते हैं कि श्लेष्मा (कफ) के भीतर स्थित सोम ही ऐसा करता है: दृढ़ता और ढीलापन, पुष्टि और दुबलापन, उत्साह और आलस्य, पुरुषत्व और नपुंसकता, ज्ञान और अज्ञान, बुद्धि और मोह।
अन्त में भगवान् पुनर्वसु आत्रेय कहते हैं कि सबने ठीक कहा, केवल ऐकान्तिक (एकपक्षीय) कथन को छोड़कर। वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ), तीनों ही, अपनी स्वाभाविक दशा में रहकर मनुष्य को बिना विकार वाली इन्द्रियों, बल, वर्ण, सुख और लम्बी आयु से युक्त करते हैं, जैसे भली-भाँति आचरण किए गए धर्म, अर्थ और काम इस लोक और परलोक में परम कल्याण देते हैं; और बिगड़कर वे उलटा परिणाम देते हैं, जैसे बिगड़ी हुई तीन ऋतुएँ विनाश के समय संसार का अनिष्ट करती हैं। सभी ऋषि आत्रेय का वचन स्वीकार करके उसका अभिनन्दन करते हैं, जैसे देवता इन्द्र जी के वचन का करते हैं। इस अध्याय से ये बातें साथ ले जाने योग्य हैं: वात के गुण रूखापन, हल्कापन, ठण्डक आदि हैं; समान गुणों वाली चीज़ें और कर्म उसे बढ़ाते हैं और विपरीत गुणों वाले उसे शान्त करते हैं, और बडिश के उत्तर के अनुसार वे शरीर को बदलकर ही वायु पर असर करते हैं; और कोई एक दोष अकेला सब कुछ नहीं करता, तीनों दोष अपनी स्वाभाविक दशा में शरीर का भला करते हैं और बिगड़कर हानि करते हैं। अध्याय के अन्तिम श्लोक यही विषय गिनाते हैं: वात के छह गुण, दो प्रकार के हेतु, वायु के चार प्रकार के कर्म, कफ और पित्त के कर्म, और महर्षियों तथा पुनर्वसु के मत।