भूमिका
स्नेहाध्याय, यानी स्नेहन (स्नेह-चिकित्सा) का अध्याय, चरक संहिता के सूत्रस्थान का तेरहवाँ अध्याय है। 'स्नेह' का अर्थ है चिकनाई वाला द्रव्य, जैसे घी, तेल, वसा (मांस की चर्बी) और मज्जा (हड्डियों के भीतर का गूदा), और 'स्नेहन' वह चिकित्सा है जिसमें ये द्रव्य पिलाकर या दूसरे ढंगों से देकर शरीर को स्निग्ध (चिकना और कोमल) किया जाता है। अध्याय का उपदेश भगवान् पुनर्वसु आत्रेय का है। वे ज्ञानियों के बीच बैठे हैं, और उनके शिष्य अग्निवेश, जिन्हें यहाँ वह्निवेश कहा गया है, जगत् के हित के लिए स्नेह के विषय में अपने संशय पूछते हैं: स्नेहों के स्रोत, उनकी संख्या और गुण, उन्हें पीने का काल और अनुपान, विचारणाएँ, मात्राएँ, कौन-सा स्नेह किसके लिए हितकर है, किसका स्नेहन हो और किसका नहीं, स्नेहन के लक्षण, कोष्ठ, और स्नेह के उपद्रव तथा उनकी चिकित्सा। पुनर्वसु इन प्रश्नों के उत्तर एक-एक करके देते हैं, और अध्याय का अन्तिम श्लोक कहता है कि यह सब भगवान् चान्द्रभागि, यानी इस अध्याय के वक्ता पुनर्वसु, ने प्रश्नों के क्रम से कहा।
पहले स्नेहों के स्रोत बताए गए हैं। वे दो प्रकार के हैं: स्थावर, यानी तिल, सरसों, अलसी और अरंड जैसे पौधे, और जङ्गम, यानी मछलियाँ, पशु और पक्षी, जिनके दही, दूध, घी, मांस, वसा और मज्जा स्नेहों में गिने जाते हैं। तैलों में तिल का तैल श्रेष्ठ है और बल तथा स्नेहन के लिए सबसे उत्तम, पर विरेचन के लिए ऐरण्ड (अरंडी) का तैल। सब स्नेहों में सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा उत्तम माने गए हैं, और इनमें भी सर्पि सबसे उत्तम है, क्योंकि जिन द्रव्यों के साथ वह पकाया जाए, उनके गुण ग्रहण कर लेता है। फिर चारों के गुण अलग-अलग बताए गए हैं: घी वात और पित्त को हरता है और ठण्डक देता है; तैल वात को नष्ट करता है, कफ को नहीं बढ़ाता और उष्ण है; वसा बिंधने, टूटने और चोट लगने में और कान तथा सिर के दर्द में इष्ट है; और मज्जा बल, शुक्र और मेद को बढ़ाती है और विशेषकर हड्डियों को बल देती है। इसके बाद काल आता है: घी शरद् ऋतु में, वसा और मज्जा वसन्त में, और तैल वर्षा ऋतु में, और स्नेह न बहुत गर्मी में पिया जाए, न बहुत ठण्ड में; वात और पित्त की अधिकता वाला रात में और कफ की अधिकता वाला दिन में पिए, और उलटा करने पर होने वाले रोग भी गिनाए गए हैं। अनुपान भी हर स्नेह का अलग है: घी के बाद गरम जल, तैल के बाद यूष, वसा और मज्जा के बाद मण्ड, या सबके बाद गरम जल।
फिर पुनर्वसु स्नेह देने के ढंग बताते हैं। स्नेह को अकेला, बिना कुछ मिलाए पीना 'अच्छपेय' है, जिसे वैद्य स्नेह का पहला और मुख्य कल्प मानते हैं। उसे भात, मांसरस, दूध, दही या यवागू जैसे भोजन में मिलाकर, या मालिश, बस्ति, गण्डूष और नस्य जैसे उपायों से देना 'विचारणा' है, और ऐसी चौबीस विचारणाएँ गिनाई गई हैं। छह रसों के मेल से स्नेह के तिरसठ भेद बनते हैं, और अकेले स्नेह को जोड़कर चौंसठ; इनका प्रयोग ओक (आदत), ऋतु, रोग और व्यक्ति को देखकर करने को कहा गया है। मात्राएँ तीन हैं: जो एक दिन-रात में पचे वह प्रधान, जो एक दिन में पचे वह मध्यम, और जो आधे दिन में पचे वह ह्रस्व। अध्याय बताता है कि बलवान और तेज़ अग्नि वालों से लेकर वृद्धों, बालकों और दुर्बलों तक किसे कौन-सी मात्रा दी जाए और हर मात्रा के गुण क्या हैं, और इसी प्रकार घी, तैल, वसा और मज्जा के अलग-अलग पात्र भी बताता है। मृदु कोष्ठ वाला तीन रात में और क्रूर कोष्ठ वाला सात रात में स्निग्ध होता है। फिर बताया गया है कि किनका स्नेहन हो और किनका नहीं, और स्नेहन कम, ठीक और अधिक होने के लक्षण क्या हैं। स्नेह पीने से पहले के दिन का भोजन, उसे पीने का समय, और स्नेहन के दिनों की चर्या भी दी गई है: गरम जल, ब्रह्मचर्य, रात में सोना, मल-मूत्र आदि के वेगों को न रोकना, और व्यायाम, क्रोध, शोक, ठण्ड और धूप से बचना; क्योंकि स्नेह के मिथ्या उपचार से भयंकर रोग होते हैं।
कोष्ठ का विचार भी यहाँ आता है। मृदु (कोमल) कोष्ठ वाले का पेट गुड़, दूध, द्राक्षा के रस या गरम जल जैसी साधारण चीज़ों से भी साफ़ हो जाता है, क्योंकि उसकी ग्रहणी में पित्त बढ़ा हुआ और वात मन्द रहता है; क्रूर (कठोर) कोष्ठ वाले की ग्रहणी में वात प्रबल रहता है, और उस पर इनका ऐसा असर नहीं होता। फिर स्नेह की व्यापत्तियाँ (उपद्रव) आती हैं: प्रबल अग्नि पिए हुए स्नेह को जलाकर तीव्र प्यास पैदा कर सकती है; पित्त में, विशेषकर साम पित्त में, केवल घी न पिलाने को कहा गया है; और अकाल में, अनुचित, गलत मात्रा में या अधिक लिया गया स्नेह, और गलत चर्या, तन्द्रा, आनाह, ज्वर, कुष्ठ, पाण्डुता और अर्श जैसे अनेक रोग पैदा करते हैं। इनकी चिकित्सा में उल्लेखन (वमन), स्वेद, समय की प्रतीक्षा, स्रंसन, तक्र, अरिष्ट, रूखा अन्न-पान, मूत्र और त्रिफला गिनाए गए हैं। स्नेहन के बाद विरेचन कराना हो तो तीन दिन का, और वमन कराना हो तो एक दिन का विराम बताया गया है। जो स्नेह से अरुचि रखते हैं, जिनका कोष्ठ मृदु है, जो कष्ट नहीं सह पाते या नित्य मद्य पीते हैं, उनके लिए विचारणा उचित कही गई है। इसके बाद स्नेहन के अनेक योग दिए गए हैं: मांसरस, तिल, कृशरा, पाञ्चप्रसृतिकी पेया, पायस, और औषधों के साथ पकाए गए स्नेह; कुष्ठ, शोथ और प्रमेह के रोगियों के लिए कुछ द्रव्य वर्जित हैं।
अध्याय दो उपमाओं से समझाता है कि शरीर स्नेह को कैसे लेता है: जैसे कपड़ा उतना जल सोखता है जितना सोख सके और बाकी बहा देता है, वैसे ही स्नेह अग्नि के अनुसार पचता है और अधिक स्नेह बह जाता है; और जैसे मिट्टी के ढेले पर जल्दी में डाला गया जल उसे केवल गीला करके बह जाता है, वैसे ही जल्दी-जल्दी लिया गया स्नेह निकल जाता है। अन्त में चिकित्सा का क्रम दिया गया है: पहले स्नेह, फिर स्वेद, और उसके बाद संशोधन। इस अध्याय से मुख्य बात यह निकलती है कि चरक संहिता स्नेहन को एक सोची-समझी चिकित्सा मानती है: कौन-सा स्नेह, किस मात्रा में, किस ऋतु और समय में, किस ढंग से और किसे दिया जाए, यह व्यक्ति के बल, अग्नि, कोष्ठ और रोग को देखकर तय होता है, और स्नेह का गलत प्रयोग स्वयं रोग का कारण बन सकता है।