भारत संहिता

अध्याय १४

स्वेदाध्यायः

स्वेदन (स्वेद-चिकित्सा)

इस पृष्ठ का हिन्दी पाठ AI (Claude) द्वारा तैयार किया गया ड्राफ्ट है। चिह्न वाले अंशों की सम्पादक द्वारा जाँच अभी बाकी है।

भूमिका

स्वेदाध्याय चरक संहिता के सूत्रस्थान का चौदहवाँ अध्याय है। 'स्वेद' का अर्थ है पसीना, और स्वेदन वह चिकित्सा है जिसमें शरीर को गरमी देकर पसीना लाया जाता है; अध्याय का नाम इसी विषय से है। पिछला अध्याय, स्नेहाध्याय, स्नेहन का था, यानी घी, तेल आदि से शरीर को चिकना करने की चिकित्सा का, और यह अध्याय उसके बाद आने वाली चिकित्सा, स्वेदन, का है। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है, और अन्तिम श्लोक भी पुनर्वसु को ही इसका उपदेष्टा बताता है। आरम्भ में आत्रेय कहते हैं कि वे स्वेदों का वर्णन करेंगे, जिनका यथोचित प्रयोग करने पर स्वेद से ठीक होने योग्य, वात और कफ से बने रोग शान्त हो जाते हैं।

पहले अध्याय स्वेद का लाभ और उसके नियम बताता है। स्नेहन के बाद दिए गए स्वेद से वात वश में आता है और मल, मूत्र और वीर्य नहीं अटकते; जब स्नेह और स्वेद से सूखी लकड़ी भी झुकाई जा सकती है, तो जीवित मनुष्य की तो बात ही क्या। अध्याय के अनुसार स्वेद तभी अपना काम करता है जब वह रोग, ऋतु और रोगी का ध्यान रखकर, न बहुत तेज़ और न बहुत हल्का, उचित द्रव्यों से और उचित स्थान पर दिया जाए। रोग, ठंड और शरीर प्रबल हों तो तीव्र स्वेद, दुर्बल हों तो हल्का, और मध्यम हों तो मध्यम स्वेद हितकर कहा गया है; वात और कफ दोनों में स्निग्ध-रूक्ष, केवल वात में स्निग्ध और केवल कफ में रूक्ष स्वेद। वृषणों, हृदय और आँखों को हल्का स्वेद दिया जाए या दिया ही न जाए, और स्वेदन के समय आँखें ढकी रहें और हृदय को ठंडी वस्तुओं से छुआ जाए। फिर ठीक स्वेद के लक्षण आते हैं: ठंड और शूल का रुकना, जकड़न और भारीपन का दूर होना, और कोमलता और पसीना आना। अधिक स्वेद के लक्षण हैं पित्त का बढ़ना, मूर्च्छा, प्यास, जलन और दुर्बलता, और उनके लिए तस्याशितीय अध्याय की ग्रीष्म ऋतु वाली मधुर, स्निग्ध और शीतल विधि बताई गई है। इसके बाद दो लम्बी सूचियाँ हैं: एक उन लोगों की, जिन्हें ग्रन्थ स्वेद न देने को कहता है, जैसे गर्भिणी, रक्तपित्त, पित्त, अतिसार और मधुमेह के रोगी, थके, भूखे-प्यासे, दुर्बल और क्षीण ओज वाले; और दूसरी उन रोगों की, जिनमें स्वेदन हितकर कहा गया है, जैसे जुकाम, खाँसी, हिचकी, श्वास, अर्दित, पक्षाघात, गृध्रसी, जकड़न, सुन्नपन और पूरे शरीर के विकार।

फिर स्वेद देने की विधियाँ आती हैं। पिण्डस्वेद में तिल, उड़द, कुलथी, घी, तेल, मांस, भात, खीर और खिचड़ी से, या गोबर, भूसी सहित जौ, बालू, धूल और पत्थर से सेंक दिया जाता है, और श्लोक कफ और वात के रोगियों के लिए इनमें से अलग-अलग द्रव्य बताता है। धुएँ-रहित अंगारों से तपे तहखानों और भीतरी कमरों में भी स्वेद होता है। नाडीस्वेद में मांस, दूध, अनेक वनस्पतियों के पत्ते, सुरा, मूत्र आदि उबालकर उनकी भाप नली से शरीर तक पहुँचाई जाती है; इन्हीं काढ़ों से भरे टबों में, और घी, दूध और तेल से भरे टबों में भी स्वेद होता है। उपनाह में गेहूँ, जौ, खमीर, नमक, स्नेह आदि का लेप शरीर पर रखकर रोएँदार चमड़े से, या वह न मिले तो रेशमी या ऊनी कपड़े से, बाँधा जाता है, और जलन से बचने के लिए रात का बँधा दिन में और दिन का बँधा रात में खोला जाता है। इसके बाद आत्रेय स्वेद के तेरह प्रकार गिनाते हैं और एक-एक का वर्णन करते हैं: सङ्कर में पिण्डों से सेंक, प्रस्तर में अनाज या पकवानों के बिछौने पर लिटाना, नाडी में टेढ़ी नली से भाप, परिषेक में गरम काढ़े की धार, अवगाह में उसमें डुबकी, अश्मघन और भू में तपी शिला या भूमि पर लेटना, कर्षू में अंगारों से भरी खाई के ऊपर सोना, कुटी में आग से घिरी बन्द कुटिया, कुम्भी में गरम काढ़े के घड़े की भाप, और कूप और होलाक में जलते करीष (सूखे गोबर) के ऊपर लेटना। सबसे विस्तार से जेन्ताक का वर्णन है: जलाशय के किनारे बना एक गोल कक्ष, जिसके बीच में अंगारों वाला मिट्टी का खोखला स्तम्भ और भीतर दीवार के साथ एक चबूतरा होता है। रोगी को समझाया जाता है कि पसीने और मूर्च्छा से घिरने पर भी वह चबूतरा न छोड़े, ठीक स्वेद के लक्षण दिखने पर उसी के सहारे द्वार तक आए, और बाहर आकर एकाएक ठण्डा जल न छुए। ये तेरह स्वेद अग्नि के गुण, यानी आग की गरमी, पर आश्रित हैं।

पसीना आग के बिना भी आता है: व्यायाम, गरम घर, भारी ओढ़ना, भूख, बहुत पीना, भय, क्रोध, उपनाह, युद्ध और धूप, ये दस उपाय अग्नि के बिना मनुष्य को पसीना लाते हैं। इस प्रकार स्वेद दो प्रकार का है, अग्नि वाला और अग्नि के बिना; इनके साथ एक अङ्ग का और पूरे शरीर का, और स्निग्ध और रूक्ष, ये तीन जोड़े बनते हैं। अध्याय यह नियम भी देता है कि स्निग्ध किए गए व्यक्ति का स्वेद से उपचार हो, और स्वेद के बाद वह पथ्य भोजन करे और उस दिन व्यायाम न करे। अन्त के सार-श्लोक अध्याय के विषय फिर गिनाते हैं और कहते हैं कि स्वेद के विषय में जो कहने योग्य था वह महर्षि ने कह दिया है, शिष्यों को इसे ग्रहण करना है, और इसके उपदेष्टा पुनर्वसु हैं।

इस अध्याय से यह बात साथ ले जाने योग्य है कि चरक संहिता स्वेद को नपी-तुली चिकित्सा मानती है: वह सामान्यतः स्नेहन के बाद, रोग, ऋतु और रोगी के बल के अनुसार, कोमल अङ्गों को बचाकर दिया जाता है, ठीक लक्षण दिखते ही रोका जाता है, और हर किसी को नहीं दिया जाता। उसके साधन अनेक हैं, पर सबका प्रयोजन एक है: वात और कफ से बने, स्वेद से ठीक होने योग्य रोगों को शान्त करना।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ६८-७१)

तत्र श्लोकाः - स्वेदो यथा कार्यकरो हितो येभ्यश्च यद्विधः।यत्र देशे यथा योग्यो देशो रक्ष्यश्च यो यथा॥

श्लोक ६८ →

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक (ये हैं): स्वेद किस प्रकार कार्यकर (प्रभावी) होता है, किनके लिए और किस प्रकार का (स्वेद) हितकर है; (शरीर के) किस देश (भाग) में किस प्रकार (का स्वेद) योग्य है, और कौन-सा देश (भाग) किस प्रकार रक्षा करने योग्य है;

स्विन्नातिस्विन्नरूपाणि तथाऽतिस्विन्नभेषजम्।अस्वेद्याः स्वेदयोग्याश्च स्वेदद्रव्याणि कल्पना॥

श्लोक ६९ →

स्विन्न (ठीक से स्वेदित) और अतिस्विन्न (अधिक स्वेदित) के लक्षण, तथा अतिस्विन्न की भेषज (चिकित्सा); अस्वेद्य (जिन्हें स्वेद नहीं देना चाहिए) और स्वेद के योग्य (लोग), स्वेद के द्रव्य (और उनकी) कल्पना (तैयार करने की विधि);

त्रयोदशविधः स्वेदो विना दशविधोऽग्निना।संग्रहेण च षट् स्वेदाः स्वेदाध्याये निदर्शिताः।

श्लोक ७० →

तेरह प्रकार का (अग्नि वाला) स्वेद, अग्नि के बिना दस प्रकार का (स्वेद), और संक्षेप में छह स्वेद: (ये सब) स्वेदाध्याय में बताए गए हैं।

स्वेदाधिकारे यद्वाच्यमुक्तमेतन्महर्षिणा।शिष्यैस्तु प्रतिपत्तव्यमुपदेष्टा पुनर्वसुः॥

श्लोक ७१ →

स्वेद के प्रकरण में जो कहने योग्य था, वह यह महर्षि ने कह दिया है; शिष्यों को तो इसे ग्रहण करना (समझकर अपनाना) चाहिए। (इसके) उपदेष्टा (उपदेश देने वाले) पुनर्वसु हैं।

मुख्य शब्द (१७) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

आरोग्य
आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार

शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।

अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।

चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. सू. १४/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम स्वेदाध्याय (स्वेदन-चिकित्सा सम्बन्धी अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. सू. १४/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. १४/३

। ॥ ३ ॥

अब (वे) स्वेद बताए जाएँगे, जिनका यथोचित प्रयोग करने पर स्वेद से ठीक होने योग्य, वात और कफ स्वरूप वाले रोग शान्त हो जाते हैं।

च. सू. १४/४

। ॥ ४ ॥

स्नेहन के बाद प्रयोग किए गए स्वेद से जब अनिल (वात) वश में हो जाता है, तो पुरीष (मल), मूत्र और रेतस् (वीर्य) किसी भी प्रकार रुकते नहीं।

च. सू. १४/५

। ॥ ५ ॥

क्योंकि स्नेह और स्वेद के प्रयोग से (लोग) सूखी लकड़ियों को भी विधि के अनुसार झुका लेते हैं; फिर जीवित मनुष्यों की तो बात ही क्या।

च. सू. १४/६

। ॥ ६ ॥

रोग, ऋतु और रोगी (की दशा) का ध्यान रखकर, न बहुत उष्ण (गरम) और न बहुत मृदु (हल्का), (उचित) द्रव्यों से युक्त और (उचित) देश (स्थान) पर किया गया स्वेद कार्यकर (अपना काम करने वाला) माना गया है।

च. सू. १४/७

। ॥ ७ ॥

रोग, शीत (ठंड) और शरीर, (इनके) महाबल (बहुत प्रबल) होने पर महान् (तीव्र) स्वेद, दुर्बल होने पर दुर्बल (हल्का) स्वेद, और मध्यम होने पर मध्यम (स्वेद) हितकर है।

च. सू. १४/८

। ॥ ८ ॥

वात-श्लेष्मा (वात और कफ दोनों) में, या (केवल) वात में, या (केवल) कफ में स्वेद (देना) इष्ट है; (क्रम से वह) स्निग्ध-रूक्ष, स्निग्ध और रूक्ष भी तैयार किया जाता है।

च. सू. १४/९

। ॥ ९ ॥

वात के आमाशय में पहुँच जाने पर, और कफ के पक्वाशय में आश्रित होने पर, (क्रम से) रूक्षपूर्व (पहले रूक्ष) स्वेद, और वैसे ही स्नेहपूर्व (पहले स्निग्ध) स्वेद हितकर है।

च. सू. १४/१०

। ॥ १० ॥

वृषणों (अण्डकोषों), हृदय और दोनों आँखों का स्वेदन मृदु (हल्का) करे, या बिल्कुल न करे; वङ्क्षणों (जाँघ और पेट के जोड़ों) का मध्यम, और शेष अङ्गों-अवयवों का इच्छानुसार (आवश्यकता के अनुसार)।

च. सू. १४/११

। ॥ ११ ॥

भली-भाँति शुद्ध (साफ़) कपड़ों से, या गेहूँ की पिण्डी (लोई) से, या पद्म और उत्पल के पत्तों से दोनों आँखों को ढककर (रोगी का) स्वेदन करना चाहिए।

च. सू. १४/१२

। ॥ १२ ॥

पसीना आते हुए (रोगी) के हृदय को ठंडी मोतियों की मालाओं से, ठंडे पात्रों से भी, और जल से भीगे जलजों (कमलों) तथा हाथों से छूना चाहिए।

च. सू. १४/१३

। ॥ १३ ॥

शीत (ठंड लगना) और शूल (दर्द) के रुक जाने पर, स्तम्भ (जकड़न) और गौरव (भारीपन) के दूर हो जाने पर, तथा मार्दव (कोमलता) और स्वेद (पसीना) आ जाने पर स्वेदन से विरति (उसे रोक देना) मानी गई है।

च. सू. १४/१४

। ।

पित्त का प्रकोप, मूर्च्छा, शरीर का सदन (शिथिल हो जाना), तृषा (प्यास), दाह (जलन), और स्वर तथा अङ्गों की दुर्बलता, (ये) अतिस्विन्न (जिसे अधिक स्वेद हो गया हो उस) व्यक्ति के लक्षण हैं।

च. सू. १४/१५

। ॥ १५ ॥

तस्याशितीय (अध्याय) में ग्रीष्म (ऋतु) की जो विधि पूरी तरह कही गई है, वही मधुर, स्निग्ध और शीतल (विधि) अतिस्विन्न (अधिक स्वेदित) व्यक्ति के लिए करनी चाहिए।

च. सू. १४/१६

। ।

कषाय और मद्य का नित्य सेवन करने वालों, गर्भिणी स्त्री, रक्तपित्त के रोगियों, पित्त (के रोग) वालों, अतिसार (दस्त) से पीड़ितों, रूक्ष (सूखे शरीर वाले) लोगों, मधुमेह के रोगियों,

च. सू. १४/१७

। ॥ १७ ॥

विदग्ध (पके या जलनयुक्त) और भ्रष्ट (अपने स्थान से खिसके) ब्रध्न वालों, विष और मद्य के विकार से पीड़ितों, थके हुओं, संज्ञा (होश) खो चुके लोगों, स्थूल (मोटे) लोगों, पित्तमेह के रोगियों,

च. सू. १४/१८

। ॥ १८ ॥

प्यासे, भूखे, क्रोधित और शोक करते हुए लोगों, कामला (पीलिया) और उदर रोग के रोगियों, क्षत (घाव या चोट) वालों, आढ्यरोग के रोगियों,

च. सू. १४/१९

। ॥ १९ ॥

दुर्बल, अति विशुष्क (बहुत सूखे, कृश) और क्षीण ओज वाले लोगों, तथा तैमिरिकों (तिमिर नामक नेत्र-रोग के रोगियों) को, (इन सबको) भिषक् (वैद्य) स्वेद न दे।

च. सू. १४/२०

। ॥ २० ॥

प्रतिश्याय (जुकाम) में, कास (खाँसी) में, हिक्का (हिचकी) और श्वास (रोग) में, अलाघव (शरीर के भारीपन) में, कान, मन्या (गर्दन के पीछे के भाग) और सिर के शूल (दर्द) में, स्वरभेद (आवाज़ बैठने) में, गलग्रह (गले की जकड़न) में,

च. सू. १४/२१

। ॥ २१ ॥

अर्दित, एकाङ्ग (रोग), सर्वाङ्ग (रोग) और पक्षाघात में, विनामक (शरीर के झुक जाने) में, कोष्ठ (पेट) के आनाह (अफारे) और विबन्ध (मल आदि के रुकने) में, मूत्राघात (मूत्र रुकने) में, विजृम्भक में,

च. सू. १४/२२

। ॥ २२ ॥

पार्श्व (पसलियों वाले बगल), पीठ, कटि (कमर) और कुक्षि (पेट) के संग्रह (जकड़न) में, गृध्रसी में, मूत्रकृच्छ्र (कष्ट से मूत्र आने) में, मुष्कों (अण्डकोषों) के बढ़ जाने में, अङ्गमर्द (बदन टूटने) में,

च. सू. १४/२३

। ॥ २३ ॥

पैर, घुटने, जाँघ और पिंडली की पीड़ा और जकड़न में, सूजन में भी, खल्ली (हाथ-पैरों की ऐंठन) में, आम की अवस्थाओं में, शीत (ठण्ड लगने) में, वेपथु (कम्पन) में और वातकण्टक (टखने की एक पीड़ा) में

च. सू. १४/२४

। ॥ २४ ॥

(अङ्गों के) संकोच (सिकुड़ने), आयाम (तनकर खिंचने) और शूल में, स्तम्भ (जकड़न), गौरव (भारीपन) और सुप्ति (सुन्नपन) में, और पूरे शरीर में फैले विकारों में स्वेदन हितकारी कहा जाता है।

च. सू. १४/२५

। ॥ २५ ॥

तिल, माष (उड़द), कुलत्थ (कुलथी), अम्ल (खट्टे द्रव्य), घी, तेल, आमिष (मांस) और ओदन (पके चावल) से, पायस (खीर) से, कृशरा (खिचड़ी) से और मांस से पिण्डस्वेद का प्रयोग करे।

च. सू. १४/२६

।॥ २६ ॥

(इसी प्रकार) गाय, गधे, ऊँट, सूअर और घोड़े के गोबर (मल) से, भूसी सहित जौ से, (और) बालू, धूल, पत्थर, करीष (सूखे गोबर) और लोहे की पूटकों (सम्भवतः पोटलियों) से (पिण्डस्वेद दे)।

च. सू. १४/२७

। ॥ २७ ॥

कफ के रोगियों को पूर्वोक्त (द्रव्यों) से स्वेदन कराए, (और) वात के रोगियों की (दूसरे द्रव्यों से) चिकित्सा करे। ये द्रव्य प्रस्तर (स्वेद) में भी अपने-अपने (दोष के) अनुसार प्रशस्त माने जाते हैं।

च. सू. १४/२८

। ॥ २८ ॥

धुएँ-रहित अंगारों से तपाए गए भूगृहों (तहखानों) में, जेन्ताकों में और गरम गर्भगृहों (भीतरी कमरों) में, भली-भाँति अभ्यङ्ग किया हुआ (स्नेह मला हुआ) व्यक्ति सुखपूर्वक स्वेदित होता है (पसीने से भीगता है)।

च. सू. १४/२९

। ॥ २९ ॥

ग्राम्य (पालतू पशुओं का), आनूप (जल-बहुल प्रदेश के पशुओं का) और औदक (जल के जीवों का) मांस, दूध, बकरे का सिर, तथा सूअर का मध्य भाग, पित्त और रक्त, (और) स्नेह-युक्त तिल और चावल

च. सू. १४/३०

। ॥ ३० ॥

इस प्रकार इन (द्रव्यों) को भली-भाँति उबालकर, देश और काल के भेद को जानने वाला और युक्ति का ध्यान रखने वाला श्रेष्ठ वैद्य नाडीस्वेद का प्रयोग करे।

च. सू. १४/३१

। ॥ ३१ ॥

वारुण, अमृतक, एरण्ड (अरण्ड), शिग्रु (सहजन), मूलक (मूली) और सर्षप (सरसों) से, वासा (अडूसा), वंश (बाँस), करञ्ज और अर्क (आक) के पत्तों से, और अश्मन्तक के (पत्तों से)

च. सू. १४/३२

। ॥ ३२ ॥

(तथा) शोभाञ्जनक, सैरेय, मालती, सुरसा (तुलसी) और अर्जक के पत्तों के साथ पानी को उबालकर नाडीस्वेद का प्रयोग करे।

च. सू. १४/३३

। ॥ ३३ ॥

भूतीक और पञ्चमूल से, सुरा से, दही के मस्तु से, और स्नेह-सहित मूत्रों तथा अम्ल (खट्टे) द्रव्यों से नाडीस्वेद का प्रयोग करे।

च. सू. १४/३४

। ॥ ३४ ॥

और ये ही निर्यूह (काढ़े) जलकोष्ठक (पानी के टब) में प्रयोग किए जाने चाहिए। स्वेदन के लिए घी, दूध और तेल के कोष्ठ (टब) भी बनवाए।

च. सू. १४/३५

। ॥ ३५ ॥

अम्ल (खट्टे द्रव्य) मिलाए हुए और स्नेह, किण्व (खमीर) तथा लवण (नमक) सहित, गेहूँ के टुकड़ों (दलिए) और जौ के चूर्ण से उपनाह प्रशस्त माना जाता है।

च. सू. १४/३६

। ॥ ३६ ॥

गन्ध (सुगन्धित) द्रव्यों से, सुरा के किण्व से, जीवन्ती से, शतपुष्पा (सोआ) से, और कुष्ठ (कूठ) तथा तेल से युक्त उमा (अलसी) से भी उपनाह बाँधे।

च. सू. १४/३७

। ॥ ३७ ॥

और (उपनाह को) उष्णवीर्य, दुर्गन्ध-रहित, रोओं सहित चमड़ों से बाँधना चाहिए; परन्तु (उनके) न मिलने पर रेशमी या ऊनी कपड़ों से (बाँधे)।

च. सू. १४/३८

।, ॥ ३८ ॥

रात में बाँधे गए (उपनाह) को दिन में खोल दे, (और) दिन में बाँधे गए को रात में खोल दे, विदाह (जलन) से बचने के लिए; परन्तु ठण्डे (समय) में (इस अवधि को) बढ़ाया भी जा सकता है।

च. सू. १४/३९

। ॥ ३९ ॥

सङ्कर, प्रस्तर, नाडी, परिषेक, अवगाहन, जेन्ताक, अश्मघन, कर्षू, कुटी, भू और कुम्भिका भी

च. सू. १४/४०

। ॥ ४० ॥

कूप और होलाक, ये तेरह (प्रकार के स्वेद) पसीना लाते हैं। उन सबका मैं ठीक-ठीक और क्रम से वर्णन करूँगा।

च. सू. १४/४१

॥ ४१ ॥

उनमें (तेरह स्वेदों में), कपड़े में लपेटे हुए या बिना लपेटे, पहले कहे गए पिण्डों से (शरीर को) स्वेदित करना सङ्कर स्वेद है, ऐसा जानना चाहिए।

च. सू. १४/४२

॥ ४२ ॥

शूकधान्य, शमीधान्य और पुलाक (थोथे अनाज) के, अथवा वेशवार, पायस (खीर), कृशरा (खिचड़ी), उत्कारिका आदि के प्रस्तर (बिछौने) पर, जिस पर रेशमी या ऊनी ऊपरी चादर बिछी हो अथवा पञ्चाङ्गुल, उरुबूक और अर्क (आक) के पत्तों का आवरण हो, लेटे हुए और पूरे शरीर पर भली-भाँति अभ्यङ्ग किए हुए व्यक्ति को स्वेदित करना प्रस्तर स्वेद है, ऐसा जानना चाहिए।

च. सू. १४/४३

; ॥ ४३ ॥

फिर, स्वेदन द्रव्य, (जैसे) मूल, फल, पत्र, शुङ्ग (कोंपल) आदि, या मृगों और पक्षियों के मांस, सिर, पैर आदि उष्ण स्वभाव वाले (द्रव्य), या आवश्यकता के अनुसार अम्ल, लवण और स्नेह से युक्त मूत्र, दूध आदि, भाप बाहर न निकलने देने वाली कुम्भी (घड़े) में उबाले गए हों; उनकी भाप को, वातहर (द्रव्यों) से सिद्ध स्नेह से अभ्यक्त शरीर वाला (व्यक्ति) एक नाडी (नली) द्वारा (अपने शरीर पर) ले। (वह नाडी) शर, इषीका, वंशदल, करञ्ज या अर्क (आक) के पत्र, इनमें से किसी एक से बनी हो, हाथी की सूँड़ के अगले भाग जैसे आकार की हो, एक व्याम या आधा व्याम लम्बी हो, उसके छिद्र की परिधि मूल में व्याम का चौथाई और अग्र में आठवाँ भाग हो, उसके छिद्र सब ओर से वातहर पत्रों से बंद हों, और वह दो या तीन बार मोड़ी गई हो। क्योंकि टेढ़े मार्ग से चलने वाली भाप, जिसका तीव्र वेग टूट चुका हो, त्वचा को न जलाते हुए सुखपूर्वक स्वेद लाती है। यह नाडीस्वेद है।

च. सू. १४/४४

॥ ४४ ॥

फिर, वातिक और उत्तरवातिक (रोगियों) के लिए, मूल आदि के सुखोष्ण (सहने योग्य गरम) क्वाथों से फुहार देने वाली कुम्भियाँ (घड़े) या प्रनाडियाँ (नलियाँ) भरकर, जिसके शरीर पर यथोचित सिद्ध स्नेह का अभ्यङ्ग किया गया हो और जो वस्त्र से ढका हो, (उस व्यक्ति) पर धार डालकर सिंचन करे। यह परिषेक है।

च. सू. १४/४५

॥ ४५ ॥

वातहर क्वाथ, दूध, तेल, घी, मांसरस या गरम जल (से भरे) कोष्ठक (बड़े पात्र) में अवगाहन (शरीर को डुबोना) तो, जैसा कहा गया है, वैसा ही अवगाह है।

च. सू. १४/४६

- , , ; , ; ; , - ! , , , , ; - , , , ; ॥ ४६ ॥

अब जेन्ताक (स्वेद) करना चाहने वाला भूमि की परीक्षा करे। वहाँ पूर्व या उत्तर दिशा में, गुणों से युक्त प्रशस्त (उत्तम) भूभाग पर, जिसकी मिट्टी काली और मधुर हो या सुनहरी हो, परीवाप, पुष्करिणी आदि जलाशयों में से किसी एक के दक्षिणी या पश्चिमी तट पर, जहाँ अच्छा घाट हो, समतल और भली प्रकार बँटे भूभाग पर, जल से सात या आठ अरत्नि हटकर, पूर्व की ओर या उत्तर की ओर मुख वाला, घाट के सामने (द्वार वाला) कूटागार (शिखर वाला कक्ष) बनवाए, जो ऊँचाई और चौड़ाई में अधिक से अधिक सोलह अरत्नि का हो, चारों ओर से भली प्रकार गोल हो, मिट्टी के काम (लिपाई) से युक्त हो और अनेक वातायनों (खिड़कियों) वाला हो। इस कूटागार के भीतर चारों ओर दीवार से लगी, एक अरत्नि चौड़ी और ऊँची पिण्डिका (चबूतरा) किवाड़ तक बनवाए; और इस कूटागार के बीच में चार किष्कु माप का, पुरुष जितना ऊँचा, मिट्टी का बना, कन्दु (भट्टी) के आकार का, बहुत से सूक्ष्म छिद्रों वाला, ढक्कन सहित अङ्गारकोष्ठक-स्तम्भ (अंगार रखने का खोखला स्तम्भ) बनवाए; और उसे खदिर (खैर) की या आश्वकर्ण आदि की लकड़ियों से भरकर जलाए। वह जब जान ले कि लकड़ियाँ भली-भाँति जल गई हैं, धुएँ से रहित हो गई हैं, और वह अग्निगृह अग्नि से पूरी तरह तप गया है और स्वेद के योग्य ऊष्मा से युक्त है, तब वातहर (द्रव्यों) से अभ्यक्त शरीर वाले, वस्त्र से ढके इस पुरुष को वहाँ प्रवेश कराते हुए इसे निर्देश दे: 'सौम्य! कल्याण के लिए और आरोग्य के लिए प्रवेश करो। प्रवेश करके और इस पिण्डिका पर चढ़कर, एक करवट और दूसरी करवट से, जैसे सुख हो, लेटना। स्वेद और मूर्च्छा से घिर जाने पर भी तुम्हें यह पिण्डिका प्राण की श्वास रहते नहीं छोड़नी है, क्योंकि इस पिण्डिका के स्थान से गिरकर, द्वार तक न पहुँच पाने पर, स्वेद और मूर्च्छा से घिरे होने के कारण तुम तुरन्त प्राण छोड़ दोगे; इसलिए इस पिण्डिका को किसी भी प्रकार न छोड़ना। तुम जब अपने को ऐसा जानो कि अभिष्यन्द मिट गया है, स्वेद और पिच्छ भली-भाँति बह निकले हैं, सभी स्रोतस् खुल गए हैं, (शरीर) हल्का हो गया है और विबन्ध, स्तम्भ, सुप्ति, वेदना और गौरव दूर हो गए हैं, तब उस पिण्डिका के सहारे-सहारे चलते हुए द्वार पर पहुँचना; और बाहर निकलकर आँखों की रक्षा के लिए एकाएक ठण्डे जल को न छूना; परन्तु सन्ताप और क्लम दूर हो जाने पर, एक मुहूर्त के बाद, सुहाते गरम जल से विधि के अनुसार स्नान करके भोजन करना।' यह जेन्ताक स्वेद है।

च. सू. १४/४७

। ॥ ४७ ॥

लेटे हुए (मनुष्य) के नाप की, पत्थर की बनी ठोस शिला को, मारुत (वात) को नष्ट करने वाली और भली-भाँति जलाई गई लकड़ियों से तपाकर

च. सू. १४/४८

। ॥ ४८ ॥

सब अङ्गारों (दहकते कोयलों) को हटाकर और गरम पानी छिड़ककर, फिर उस शिला पर रेशमी और ऊनी (वस्त्रों) का बिछौना करे।

च. सू. १४/४९

। ॥ ४९ ॥

जिसके सारे अङ्गों पर भली-भाँति (स्नेह का) अभ्यङ्ग किया गया हो और जो कौरव, अजिन (मृगचर्म), कौषेय (रेशमी वस्त्र), प्रावार (ओढ़ने की चादर) आदि से भली-भाँति ढका हो, ऐसा मनुष्य उस (शिला) पर सोता हुआ सुखपूर्वक स्वेदित होता है (उसे सुख से पसीना आता है)।

च. सू. १४/५०

, । ॥ ५० ॥

इस प्रकार अश्मघन स्वेद कहा गया; (अब) कर्षू स्वेद कहा जाएगा। स्थान के विभाग को जानने वाला (वैद्य) शयन (पलंग) के नीचे कर्षू (खाई) खुदवाए।

च. सू. १४/५१

। ॥ ५१ ॥

फिर उस कर्षू (खाई) को दहकते हुए, धुएँ से रहित अङ्गारों से भर दे। उसके ऊपर (रखी) शय्या पर सोता हुआ मनुष्य सुखपूर्वक स्वेदित होता है।

च. सू. १४/५२

। ॥ ५२ ॥

न बहुत ऊँची और न बहुत चौड़ी, गोल आकार की, बिना खिड़कियों की, मोटी (ठोस) दीवारों वाली कुटी (कुटिया) बनाकर (उसे) कुष्ठ (कूठ) आदि (द्रव्यों) से भली-भाँति लीपे।

च. सू. १४/५३

।॥ ५३ ॥

वैद्य कुटी के बीच में प्रावार (ओढ़ने की चादर), अजिन (मृगचर्म), कौशेय (रेशमी वस्त्र), कुथ (रंग-बिरंगा मोटा वस्त्र), कम्बल और गोलकों से भली-भाँति बिछाई हुई शय्या तैयार करे।

च. सू. १४/५४

। ॥ ५४ ॥

और अङ्गारों से भरी हसन्तिकाओं (अँगीठियों) से उस (शय्या) को सब ओर से घेरकर, अभ्यङ्ग किया हुआ (मनुष्य) भीतर (उस शय्या पर) चढ़े; (वह) सुखपूर्वक स्वेदित होता है।

च. सू. १४/५५

। ॥ ५५ ॥

जो अश्मघन स्वेद की विधि है, वही (विधि) प्रशस्त (उत्तम), निवात (जहाँ हवा न लगे) और समतल भूमि पर (किए जाने वाले भू स्वेद के लिए) बताई जाती है।

च. सू. १४/५६

। ॥ ५६ ॥

वातहर (वात को दूर करने वाले द्रव्यों के) क्वाथ (काढ़े) से भरी कुम्भी (घड़े) को आधे भाग या तिहाई भाग (तक) भूमि में गड़वाए, और वहाँ (उसके) ऊपर शयन (पलंग)

च. सू. १४/५७

। ॥ ५७ ॥

रखे, या ऐसा आसन (रखे) जिसका परिच्छद (आवरण) बहुत घना न हो। फिर कुम्भी (घड़े) में भली-भाँति तपाए हुए लोहे के गोले डाले

च. सू. १४/५८

। ॥ ५८ ॥

या (तपाए हुए) पत्थर (डाले)। उस ऊष्मा (गरमी) से, उस (पलंग या आसन) पर स्थित मनुष्य सुखपूर्वक स्वेदित होता है, (जिसके) अङ्ग भली-भाँति ढके हों और (जिसे) अनिल (वात) को नष्ट करने वाले स्नेहों से भली-भाँति अभ्यङ्ग किया गया हो।

च. सू. १४/५९

। ॥ ५९ ॥

निवात (जहाँ हवा न लगे) और प्रशस्त (उत्तम) स्थान में ऐसा कूप (गड्ढा) बनाए जो शयन (पलंग) के विस्तार जितना हो और गहराई में (उसका) दुगुना भी हो, और भीतर से भली-भाँति साफ़ किया गया हो।

च. सू. १४/६०

। ॥ ६० ॥

हाथी, घोड़े, गाय, गधे और ऊँटों के करीषों (सूखे गोबर) से भरकर जलाए गए (उस कूप के ऊपर) भली-भाँति बिछाए गए (पलंग) पर, भली-भाँति ढका हुआ और अभ्यङ्ग किया हुआ मनुष्य सुखपूर्वक स्वेदित होता है।

च. सू. १४/६१

। ॥ ६१ ॥

पहले कहे गए करीषों (सूखे गोबर) की धीतीका (परत) को शयन (पलंग) के भीतरी नाप के बराबर (रखकर) जलाए, और वहाँ (उसके) ऊपर शय्या को

च. सू. १४/६२

। ॥ ६२ ॥

(उस धीतीका के) भली-भाँति जल जाने और धुएँ से रहित हो जाने पर, जैसी कही गई है वैसी (शय्या) तैयार करे। भली-भाँति ढका हुआ, अभ्यङ्ग किया हुआ मनुष्य वहाँ सोता हुआ सुखपूर्वक स्वेदित होता है।

च. सू. १४/६३

। ॥ ६३ ॥

यह होलाक स्वेद नामक सुखद (स्वेद) महर्षि ने कहा है। इस प्रकार अग्नि के गुण (उष्णता) पर आश्रित स्वेद तेरह प्रकार का है।

च. सू. १४/६४

। ॥ ६४ ॥

व्यायाम, उष्ण (गरम) घर (में रहना), भारी ओढ़ना, क्षुधा (भूख), बहुत पीना, भय और क्रोध, उपनाह (लेप बाँधना), आहव (युद्ध) और आतप (धूप)

च. सू. १४/६५

। ॥ ६५ ॥

ये दस (उपाय) अग्नि के गुण के बिना मनुष्य को स्वेदित करते हैं (पसीना लाते हैं)। इस प्रकार स्वेद दो प्रकार का कहा गया: अग्नि के गुणों से युक्त और (उनसे युक्त) नहीं।

च. सू. १४/६६

। ॥ ६६ ॥

एक अङ्ग और सारे अङ्गों (के भेद) से, (तथा) स्निग्ध और वैसे ही रूक्ष भी: इस प्रकार स्वेद के विषय में यह तीन प्रकार का द्वन्द्व (जोड़ा) कहा गया है।

च. सू. १४/६७

। ॥ ६७ ॥

स्निग्ध (स्नेहन किए हुए मनुष्य) का स्वेदों से उपचार किया जाना चाहिए; स्वेदित (मनुष्य) पथ्य भोजन करने वाला हो। और जिसका शरीर स्वेदित हुआ हो, वह मनुष्य उस दिन व्यायाम न करे।

च. सू. १४/६८

- । ॥ ६८ ॥

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक (ये हैं): स्वेद किस प्रकार कार्यकर (प्रभावी) होता है, किनके लिए और किस प्रकार का (स्वेद) हितकर है; (शरीर के) किस देश (भाग) में किस प्रकार (का स्वेद) योग्य है, और कौन-सा देश (भाग) किस प्रकार रक्षा करने योग्य है;

च. सू. १४/६९

। ॥ ६९ ॥

स्विन्न (ठीक से स्वेदित) और अतिस्विन्न (अधिक स्वेदित) के लक्षण, तथा अतिस्विन्न की भेषज (चिकित्सा); अस्वेद्य (जिन्हें स्वेद नहीं देना चाहिए) और स्वेद के योग्य (लोग), स्वेद के द्रव्य (और उनकी) कल्पना (तैयार करने की विधि);

च. सू. १४/७०

। ।

तेरह प्रकार का (अग्नि वाला) स्वेद, अग्नि के बिना दस प्रकार का (स्वेद), और संक्षेप में छह स्वेद: (ये सब) स्वेदाध्याय में बताए गए हैं।

च. सू. १४/७१

। ॥ ७१ ॥

स्वेद के प्रकरण में जो कहने योग्य था, वह यह महर्षि ने कह दिया है; शिष्यों को तो इसे ग्रहण करना (समझकर अपनाना) चाहिए। (इसके) उपदेष्टा (उपदेश देने वाले) पुनर्वसु हैं।

च. सू. १४

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में स्वेदाध्याय नामक चौदहवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।