भारत संहिता

अध्याय १५

उपकल्पनीयोऽध्यायः

शोधन की सामग्री और तैयारी

इस पृष्ठ का हिन्दी पाठ AI (Claude) द्वारा तैयार किया गया ड्राफ्ट है। चिह्न वाले अंशों की सम्पादक द्वारा जाँच अभी बाकी है।

भूमिका

उपकल्पनीय अध्याय चरक संहिता के सूत्रस्थान का पन्द्रहवाँ अध्याय है, और इसका विषय है शोधन की सामग्री और तैयारी। शोधन, जिसे यह अध्याय संशोधन भी कहता है, वह चिकित्सा है जो बढ़े हुए दोषों को शरीर से बाहर निकालती है; यहाँ उसके दो रूपों की बात है: वमन, जिसमें औषध पिलाकर उल्टी कराई जाती है, और विरेचन, जिसमें दस्त कराए जाते हैं। अध्याय का नाम उसके पहले उपदेश से आया है: जो वैद्य किसी राजा को, राजा के समान साधनों वाले व्यक्ति को, या किसी बहुत धनी व्यक्ति को वमन या विरेचन पिलाना चाहे, उसे औषध पिलाने से पहले ही संभार, यानी आवश्यक सामग्री, 'उपकल्पनीय' रखनी चाहिए, अर्थात् जुटाकर तैयार रखनी चाहिए। यह उपदेश भगवान् आत्रेय का है, और अध्याय के अन्तिम श्लोक कहते हैं कि यह सब पुनर्वसु ने कहा।

आत्रेय तैयारी का कारण बताते हैं: औषध ठीक काम करे तब भी यह सामग्री रोगी के उपयोग में आती है, और यदि बीच में अचानक कोई संकट आ पड़े, तो खरीदने की सुविधा होने पर भी औषधें शीघ्र और ठीक-ठीक नहीं जुटतीं। इस पर उनके शिष्य अग्निवेश आपत्ति करते हैं: क्या ज्ञानी वैद्य को आरम्भ से ही ऐसी व्यवस्था नहीं करनी चाहिए कि औषध निश्चित रूप से सफल हो? उनका तर्क है कि सफलता सम्यक् प्रयोग से होती है और बिगाड़ असम्यक् प्रयोग से, और यदि ठीक या गलत ढंग से किया गया कर्म बिना किसी नियम के सफल हो जाए या बिगड़ जाए, तो ज्ञान अज्ञान के बराबर हो जाता है। आत्रेय उत्तर देते हैं कि वे और उनके जैसे आचार्य ऐसी व्यवस्था कर भी सकते हैं और औषध देने की यह उत्तम कुशलता सिखा भी सकते हैं, पर ऐसा कोई नहीं जो उस उपदेश को पूरा धारण करके वैसा ही प्रयोग कर सके; क्योंकि दोष, भेषज, देश, काल, बल, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति और वय की अवस्थाओं के भेद इतने सूक्ष्म हैं कि बहुत निर्मल और विशाल बुद्धि वाले को भी उलझा दें। इसलिए औषधों का सम्यक् प्रयोग और उनके बिगड़ जाने पर होने वाले व्यापदों के उपचार, ये दोनों वे आगे सिद्धिस्थान में बताने को कहते हैं।

फिर आत्रेय सामग्री की सूची संक्षेप में देते हैं। सबसे पहले एक उत्तम घर, जो दृढ़ हो, हवा के झोंकों से बचा हो पर जिसका एक भाग खुली हवा वाला हो, जिसमें सुख से घूमा-फिरा जा सके, जहाँ धुआँ, धूप, पानी और धूल न पहुँचें और न अप्रिय शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गन्ध, और जिसमें पानी का स्थान, ओखली-मूसल, मल-त्याग और स्नान के स्थान और रसोईघर हों। फिर लोग: अच्छे स्वभाव वाले, पवित्र, दक्ष और सेवा में कुशल परिचारक, जो भोजन पकाएँ, नहलाएँ, शरीर दबाएँ, रोगी को उठाएँ-लिटाएँ और औषध पीसें; और गीत, वाद्य, कथा, इतिहास और पुराण में कुशल साथी, जो रोगी का अभिप्राय समझें और देश-काल पहचानें। फिर लाव, कपिञ्जल, शश, हरिण जैसे पशु-पक्षी, और दूध देने वाली, नीरोग, जीवित बछड़े वाली गाय। फिर अनेक बर्तन, कपड़ा, सूत, कपास और ऊन; वमन के पात्रों वाली और सब क्रियाओं के लिए सुविधाजनक शय्याएँ और आसन; पीसने की सिलें, धारदार औज़ार, धूमनेत्र, बस्तिनेत्र, तराजू और नापने का पात्र; घी, तेल, वसा, मज्जा, शहद, नमक, ईंधन, जल, अनेक मद्य और खट्टे पेय, दही, छाछ और मूत्र; अनाज और फल; स्नेहन और स्वेदन के द्रव्य; और वमन कराने वाले, विरेचन कराने वाले और दूसरे औषध। अन्त में कहा गया है कि सम्भावित व्यापदों को सोचकर उनके प्रतीकार के लिए, और रोगी के उपयोग के लिए, जो कुछ भी और आवश्यक लगे, वह भी जुटा लिया जाए।

इसके बाद अध्याय वमन की विधि क्रम से बताता है। पहले रोगी का, जैसा पहले बताया गया है, स्नेहन और स्वेदन होता है; यदि इस बीच कोई तीव्र रोग आ घेरे, तो पहले उसे दूर करके तैयारी उतने ही समय तक फिर की जाती है। फिर शुभ नक्षत्र, तिथि, करण और मुहूर्त में, जब रोगी रात सुख से बिता चुका हो, उसका भोजन पच चुका हो, वह नहाकर, माला और साफ़ वस्त्र पहनकर देवता, अग्नि, द्विज, गुरु, वृद्ध और वैद्यों का सत्कार कर चुका हो, और ब्राह्मणों ने स्वस्तिवाचन कर दिया हो, उसे मधु, मधुक, सैन्धव और फाणित मिला मदनफल का कषाय पिलाया जाता है। अध्याय कहता है कि इसकी मात्रा हर व्यक्ति के लिए अलग है: उतनी, जितनी से विकार करने वाले दोष निकल जाएँ पर न अतियोग हो न अयोग। पसीना, रोंगटे खड़े होना, पेट फूलना, जी मिचलाना और मुँह में पानी आना क्रम से बताते हैं कि दोष पिघल रहा है, अपने स्थानों से चल पड़ा है, पेट में आ गया है और ऊपर की ओर मुड़ गया है। तब रोगी को घुटने जितने ऊँचे आसन पर बिठाया जाता है, पास में वमन के पात्र रखे जाते हैं, और मित्र उसका माथा और पसलियाँ थामते हैं; वैद्य सावधान होकर वेगों को देखता है, क्योंकि उन्हीं से योग, अयोग और अतियोग पहचाने जाते हैं। अध्याय तीनों के लक्षण गिनाता है, और अयोग तथा अतियोग से होने वाले उपद्रव भी, जैसे आध्मान, परिकर्तिका, अङ्गग्रह और क्लम। ठीक वमन के बाद रोगी को धूमपान और जल का उपस्पर्श कराया जाता है, और पूरा दिन ऊँचे बोलने, अधिक खाने, क्रोध, शोक, सवारी, मैथुन, दिन में सोने, अनुचित भोजन और वेगों को रोकने या उभारने जैसी बातों से मन से भी बचकर बिताने को कहा जाता है। फिर संसर्जन-क्रम आता है: तीन अन्नकालों में यवागू, तीन में विलेपी, तीन में मूँग के यूष के साथ भात, और तीन में मांसरस के साथ भोजन, और इस प्रकार सात रातों में सामान्य भोजन तक लौटना।

वमन का क्रम पूरा होने पर विरेचन की बारी आती है। रोगी का फिर से स्नेहन और स्वेदन होता है, और होम, बलि, मङ्गल, जप, प्रायश्चित्त और ब्राह्मणों के स्वस्ति-वचन के बाद, दोष, भेषज, देश, काल और दूसरी अवस्थाओं को परखकर, उसे त्रिवृत् (निशोथ) का कल्क पिलाया जाता है। ठीक विरेचन के बाद धूम को छोड़कर वमन वाली ही देखभाल तब तक चलती है जब तक बल, वर्ण और स्वाभाविक दशा न लौट आएँ; फिर रोगी को सजाकर मित्रों और सम्बन्धियों को दिखाया जाता है और उसकी इच्छा पर छोड़ दिया जाता है। अध्याय के श्लोक बताते हैं कि यह पूरी विधि राजा, राजा के समान व्यक्ति या बहुत धनी व्यक्ति के लिए है; पर निर्धन व्यक्ति संकट में, समय आने पर, दुर्लभ सामग्री जुटाए बिना भी शोधन की औषध पी ले, क्योंकि सबके पास सारे साधन नहीं होते और भयंकर रोग निर्धनों को भी सताते हैं; संकट में जो औषध, वस्त्र और भोजन जुट सकें, उन्हीं का सेवन अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया जाए। श्लोकों के अनुसार ठीक प्रकार से लिया गया संशोधन मल और रोग को दूर करता है, बल और वर्ण को निखारता है और लम्बी आयु देता है। इस अध्याय से मुख्य बात यह निकलती है कि पूरी सावधानी के बाद भी शोधन बिगड़ सकता है, इसलिए सामग्री पहले से तैयार रखी जाती है; मात्रा हर व्यक्ति के अनुसार तय होती है, और वैद्य वेगों को देखकर ही आगे का कर्तव्य जानता है; और साधन कम हों तो भी शोधन छोड़ा नहीं जाता, जितना जुट सके उतने से किया जाता है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २३-२५)

तत्र श्लोकाःईश्वराणां वसुमतां वमनं सविरेचनम् ।संभारा ये यदर्थं च समानीय प्रयोजयेत् ॥

श्लोक २३ →

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक (ये हैं): ईश्वरों (और) धनवानों का विरेचन सहित वमन, जो संभार (सामग्रियाँ) हैं, और (वैद्य) उन्हें जुटाकर जिस प्रयोजन के लिए प्रयोग करे

यथा प्रयोज्या मात्रा या यदयोगस्य लक्षणम् ।योगातियोगयोर्यच्च दोषा ये चाप्युपद्रवाः ॥

श्लोक २४ →

जो मात्रा (हो) और जिस प्रकार (उसका) प्रयोग करना चाहिए, अयोग का जो लक्षण है, और योग तथा अतियोग का जो (लक्षण) है, और जो दोष तथा उपद्रव भी (होते हैं)

यदसेव्यं विशुद्धेन यश्च संसर्जनक्रमः ।तत् सर्वं कल्पनाध्याये व्याजहार पुनर्वसुः ॥

श्लोक २५ →

(शोधन से) शुद्ध हुए (व्यक्ति) को जिसका सेवन नहीं करना चाहिए, और जो संसर्जन-क्रम (आहार को क्रम से बढ़ाने की विधि) है, वह सब पुनर्वसु ने कल्पना-अध्याय (इस उपकल्पनीय अध्याय) में कहा।

मुख्य शब्द (१८) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. सू. १५/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम उपकल्पनीय (पहले से तैयार रखने योग्य सामग्री सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. १५/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. १५/३

, ॥ ३ ॥

इस विषय में, जो वैद्य राजा को, राजा के समान (साधन-सम्पन्न व्यक्ति) को, या किसी अन्य विपुल धन वाले (व्यक्ति) को वमन या विरेचन (की औषध) पिलाना चाहता है, उसे औषध पिलाने से पहले ही संभार (आवश्यक सामग्रियाँ) तैयार करके रख लेने चाहिए; क्योंकि औषध के सम्यक् रूप से काम करने पर भी (ये सामग्रियाँ रोगी के) प्रतिभोग (उपयोग) के लिए होती ही हैं। क्योंकि जब निकट समय में (अचानक) कोई आपत्ति (संकट) आ पड़े, तब खरीद-बिक्री की सुविधा होने पर भी औषधों को शीघ्र और ठीक-ठीक जुटाना सरल नहीं होता।

च. सू. १५/४

॥ ४ ॥

ऐसा कहने वाले भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा: भगवन्, क्या ज्ञानवान् (वैद्य) को आरम्भ में ही ऐसी व्यवस्था नहीं करनी चाहिए कि उस व्यवस्था के कर लेने पर औषध निश्चित रूप से सफल ही हो? क्योंकि सब कर्मों (चिकित्सा-कर्मों) की सिद्धि (सफलता) सम्यक् प्रयोग के कारण मानी गई है, और व्यापद् (बिगाड़) असम्यक् प्रयोग के कारण। यदि सम्यक् रूप से और असम्यक् रूप से आरम्भ किया गया कर्म बिना किसी नियम के सफल हो जाए या बिगड़ जाए, तो ज्ञान अज्ञान के समान हो जाता है।

च. सू. १५/५

; ॥ ५ ॥

भगवान् आत्रेय ने उनसे कहा: अग्निवेश, हमारे द्वारा या हमारे जैसों के द्वारा भी ऐसी व्यवस्था करना सम्भव है कि उस व्यवस्था के कर लेने पर औषध निश्चित रूप से सफल ही हो, और उस प्रयोग-सौष्ठव (औषध के प्रयोग की उत्तम कुशलता) का यथावत् उपदेश देना भी (सम्भव है); परन्तु ऐसा कोई नहीं है जो इस प्रकार उपदेश किए गए इस (ज्ञान) को धारण करने का सामर्थ्य रखे, या धारण करके उसे वैसा ही समझ सके या प्रयोग कर सके; क्योंकि दोष, भेषज, देश, काल, बल, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति और वय (आयु) की अवस्थाओं के भेद सूक्ष्म हैं, जिन पर विचार किया जाए तो वे निर्मल और विशाल बुद्धि वाले की बुद्धि को भी व्याकुल कर दें, फिर अल्प बुद्धि वाले का तो कहना ही क्या। इसलिए हम इन दोनों का यथावत् उपदेश आगे चलकर सिद्धियों में (सिद्धिस्थान में) करेंगे: औषधों का सम्यक् प्रयोग, और बिगड़े हुए (औषधों) के व्यापद्-साधन (बिगाड़ के उपचार)।

च. सू. १५/६

॥ ६ ॥

तो अब हम सामग्रियों को, अनेक प्रकार की होने पर भी, संक्षेप में बताएँगे। वह इस प्रकार है - वास्तुविद्या (भवन बनाने की विद्या) में कुशल (व्यक्ति) सबसे पहले तो एक प्रशस्त (उत्तम) घर ही तैयार करे, जो दृढ़ हो, हवा के झोंकों से बचा हो, जिसका एक भाग खुली हवा वाला हो, जिसमें सुख से घूमा-फिरा जा सके, जो तलहटी (नीची भूमि) में न हो, जहाँ धुआँ, धूप, पानी और धूल न पहुँच सकें और अप्रिय शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गन्ध भी न पहुँच सकें, और जिसमें पानी का स्थान (कुआँ), ओखली, मूसल, मल-त्याग का स्थान, स्नान का स्थान और रसोईघर हों।

च. सू. १५/७

, , ; ॥ ७ ॥

उसके बाद (वैद्य ये सब जुटाए): अच्छे स्वभाव, पवित्रता, सदाचार, अनुराग, दक्षता और आदरपूर्ण अनुकूल व्यवहार से युक्त, सेवा-टहल में कुशल, सब कामों में पारंगत, और किसी भी काम से विमुख न होने वाले परिचारक (सेवक), जो दाल-भात पकाने वाले, नहलाने वाले, (शरीर) दबाने वाले, उठाने वाले, लिटाने वाले और औषध पीसने वाले हों; तथा गीत, वाद्य, उल्लापक, श्लोक, गाथा, आख्यायिका, इतिहास और पुराण में कुशल, (रोगी का) अभिप्राय समझने वाले, (रोगी को) मान्य, और देश तथा काल को जानने वाले पारिषद्य (सभा में बैठने योग्य साथी); तथा लाव (बटेर), कपिञ्जल, शश (खरगोश), हरिण, एण, कालपुच्छक, मृगमातृका और उरभ्र (भेड़); दूध देने वाली, सीधे स्वभाव वाली, नीरोग, जीवित बछड़े वाली गाय, जिसके चारे, रहने के स्थान और पानी का भली-भाँति प्रबन्ध किया गया हो; पात्री, आचमन के जल का पात्र, मणिक, घट, पिठर, पर्योग (कड़ाह), कुम्भी, कुम्भ, कुण्ड, शराव, दर्वी (करछी), कट (चटाई), उदञ्चन, परिपचन, मन्थान (मथानी), चमड़ा, कपड़ा, सूत, कपास, ऊन आदि; और शय्या, आसन आदि, जिनके पास भृङ्गार (टोंटीदार जलपात्र) और प्रतिग्रह (वमन के पात्र) रखे हों, जिन पर बिछौना, ओढ़ने की चादर और तकिए भली-भाँति लगे हों, जो टेक (सहारे) सहित हों, और जो लिटाने, बिठाने, स्नेहन, स्वेदन, अभ्यङ्ग, प्रदेह, परिषेक, अनुलेपन, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, शिरोविरेचन और मल-मूत्र त्यागने के कार्यों की सेवा में सुविधाजनक हों; और बहुत चिकनी, खुरदरी और मध्यम सिलें (पीसने के पत्थर), जिनके लोढ़े अच्छी तरह धुले हों; और उपकरण के काम आने वाले शस्त्र; और धूमनेत्र, बस्तिनेत्र, उत्तरबस्ति का (उपकरण), कुशहस्तक, तराजू और नापने का पात्र; और घी, तेल, वसा, मज्जा, क्षौद्र (शहद), फाणित, नमक, ईंधन, जल, मधु, सीधु, सुरा, सौवीरक, तुषोदक, मैरेय, मेदक, दही, दधिमण्ड, उदश्वित्, धान्याम्ल और मूत्र; तथा शालि (धान), षष्टिक (साठी धान), मुद्ग (मूँग), माष (उड़द), यव (जौ), तिल, कुलत्थ (कुलथी), बदर (बेर), मृद्वीका (दाख), काश्मर्य (गम्भारी), परूषक (फालसा), अभया (हरड़), आमलक (आँवला) और बिभीतक (बहेड़ा); और स्नेहन तथा स्वेदन के साधन (बनने वाले) अनेक प्रकार के द्रव्य; उसी प्रकार ऊपर से (दोष) निकालने वाले, नीचे की ओर प्रवृत्त करने वाले और दोनों (काम करने) वाले, तथा संग्रहणीय, दीपनीय, पाचनीय, उपशमनीय, वातहर आदि नामों से कहे गए औषध; और व्यापदों (उपद्रवों) को गिनकर उनके प्रतीकार के लिए जो कुछ भी अन्य उपकरण वह (आवश्यक) समझे, और जो (रोगी के) प्रतिभोग (उपयोग) के लिए हो, वह सब (भी) जुटाकर तैयार रखे।

च. सू. १५/८

॥ ८ ॥

इसके बाद उस पुरुष को, जैसे (पहले) बताए गए हैं उन स्नेह और स्वेद से, यथोचित रूप से सम्पन्न करे (स्नेहन और स्वेदन कराए)। यदि इस बीच उसे कोई अधिक तीव्र मानसिक या शारीरिक व्याधि अचानक आ घेरे, तो पहले उसकी उसी (व्याधि) को दूर करने का यत्न करे। फिर उसे दूर करके, इस (पुरुष) की उतने ही समय तक उसी प्रकार के कर्म से चिकित्सा करे।

च. सू. १५/९

॥ ९ ॥

इसके बाद उस पुरुष को स्नेह और स्वेद से सम्पन्न (जिसका स्नेहन और स्वेदन हो चुका हो) और अनुपहत मन वाला (जिसका मन विचलित न हो) देखकर, जिसने (रात) सुख से बिताई हो, जिसका भोजन भली-भाँति पच गया हो, जिसने सिर समेत स्नान किया हो, जिसके अंगों पर अनुलेपन (लेप) लगा हो, जो माला पहने हो, जो अनुपहत (साफ़) वस्त्र पहने हो और जिसने देवता, अग्नि, द्विज, गुरु, वृद्ध और वैद्यों की पूजा (सत्कार) कर ली हो, (ऐसे उस पुरुष को) इष्ट (शुभ) नक्षत्र, तिथि, करण और मुहूर्त में, ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवाकर, (उनके) कहे हुए आशीर्वादों से अभिमन्त्रित और मधु, मधुक (मुलेठी), सैन्धव (सेंधा नमक) और फाणित मिलाई हुई मदनफल (मैनफल) के कषाय की मात्रा पिलाए।

च. सू. १५/१०

॥ १० ॥

मदनफल के कषाय की मात्रा का प्रमाण तो, और सभी संशोधनों की मात्रा के प्रमाण भी, निश्चय ही हर व्यक्ति के अनुसार विचारने योग्य होते हैं। क्योंकि जिस (व्यक्ति) के लिए जितना संशोधन पिया जाने पर विकार पैदा करने वाले दोषों को निकालने में समर्थ होता है, और अतियोग या अयोग नहीं करता, उतना ही उसकी मात्रा का प्रमाण जानना चाहिए।

च. सू. १५/११

॥ ११ ॥

(औषध) पी चुके इस (रोगी) की मुहूर्त भर प्रतीक्षा करे। जब (वैद्य) जान ले कि पसीना आने से उसका दोष प्रविलयन (पिघलने) की अवस्था को प्राप्त हो रहा है, रोंगटे खड़े होने से (वह अपने) स्थानों से चल पड़ा है, कुक्षि (पेट) के फूलने से कुक्षि में आ गया है, और हृल्लास (जी मिचलाने) और मुँह से (पानी) बहने से ऊपर की ओर मुख वाला हो गया है, तब इसे बैठने के लिए घुटने जितना ऊँचा, खुला (तंग नहीं), भली-भाँति लगे बिछावन, ऊपरी चादर और तकिये वाला तथा सहारे (टेक) वाला आसन दे, और प्रतिग्रह (वमन लेने के पात्र) पास रखवाए। माथा थामने, पसलियों को सहारा देने, नाभि दबाने और पीठ मलने में ऐसे मित्र यत्न करें, जिनसे (रोगी को) लज्जा न हो और जो अनुमत (स्वीकार्य) हों।

च. सू. १५/१२

॥ १२ ॥

फिर इसे समझाए: 'होंठ, तालु और कण्ठ खोलकर, बहुत अधिक ज़ोर लगाए बिना, उठे हुए वेगों को निकालते हुए, गर्दन और शरीर के ऊपरी भाग को थोड़ा झुकाकर, वेग के समय जो (वेग) प्रवृत्त नहीं हुए उन्हें, भली-भाँति कटे नाखूनों वाली दो अंगुलियों से अथवा उत्पल, कुमुद और सौगन्धिक की नालों से कण्ठ को छूते हुए प्रवृत्त करते हुए, आराम से (वमन) प्रवृत्त करो।' वह वैसा ही करे। फिर (वैद्य) सावधान होकर प्रतिग्रह (पात्र) में गए इसके वेगों को देखे। क्योंकि वेगों की विशेषताएँ देखने से कुशल (वैद्य) योग, अयोग और अतियोग के भेद पहचान सकता है, वेगों की विशेषताएँ पहचान सकता है, और वेगों की विशेषताएँ देखने वाला (वैद्य) फिर लक्षण से यथोचित कर्तव्य जान सकता है। इसलिए सावधान होकर वेगों को देखे।

च. सू. १५/१३

। ॥ १३ ॥

इस (वमन के) विषय में अयोग, योग और अतियोग का भेद पहचानने के ये साधन हैं, जैसे: कहीं से भी (कुछ) न निकलना, या केवल औषध का ही निकल आना, (और) वेगों का रुक जाना, ये अयोग के लक्षण हैं; उचित समय पर (वेगों का) आरम्भ होना, बहुत अधिक पीड़ा न होना, क्रम से दोषों का निकलना और अपने आप रुक जाना, ये योग के लक्षण हैं; योग में तो दोषों की मात्रा के भेद से तीक्ष्ण, मृदु और मध्य का विभाग जानना चाहिए; परन्तु योग की अधिकता से झागदार रक्त और चन्द्रिकाओं का आना, ये अतियोग के लक्षण हैं। इस विषय में अतियोग और अयोग से होने वाले इन उपद्रवों को जाने: आध्मान, परिकर्तिका, परिस्राव, हृदयोगसरण, अङ्गग्रह, जीवादान, विभ्रंश, स्तम्भ और क्लम, ये उपद्रव हैं।

च. सू. १५/१४

॥ १४ ॥

(वैद्य) इसे योग से (ठीक प्रकार से) वमन कर चुका देखकर, भली-भाँति धुले हाथ, पैर और मुँह वाले (इस रोगी) को एक मुहूर्त (थोड़ी देर) आराम देकर, स्नैहिक, वैरेचनिक और उपशमनीय धूमों में से किसी एक का, सामर्थ्य के अनुसार, पान कराकर, फिर से जल का उपस्पर्श कराए।

च. सू. १५/१५

। ॥ १५ ॥

जल का उपस्पर्श कर चुके इस (रोगी) को हवा से बचे घर में ले जाकर और लिटाकर (वैद्य) निर्देश दे: 'ऊँचे स्वर में बोलना, बहुत अधिक खाना, बहुत देर खड़े रहना, बहुत घूमना-फिरना; क्रोध, शोक, ठण्ड, धूप, ओस और तेज़ हवा; सवारी से यात्रा, ग्राम्यधर्म (मैथुन), रात में न सोना, दिन में सोना; विरुद्ध, अजीर्ण, असात्म्य, अकाल, प्रमित, अति, हीन, गुरु और विषम भोजन, और वेगों को रोकना तथा उभारना, इन बातों का मन से भी सेवन न करते हुए पूरा दिन बिताओ।' वह वैसा ही करे।

च. सू. १५/१६

, ॥ १६ ॥

फिर (उसी दिन) सायंकाल में या अगले दिन, सुखद जल से नहलाए गए इस (रोगी) को, (इसकी) अग्नि (पाचन-शक्ति) के बल को देखकर, पुराने लोहितशालि (लाल शालि धान) के चावलों की भली-भाँति पकी (गली) हुई, मण्डपूर्वा (जिसमें मण्ड, अर्थात् ऊपर का पतला भाग, पहले हो) और सुहाती गरम यवागू (पतली लपसी) पिलाए। इसी प्रकार दूसरे और तीसरे अन्नकाल (भोजन के समय) में (भी)। परन्तु चौथे अन्नकाल में वैसे ही शालि चावलों की अच्छी तरह उबाली हुई विलेपी (गाढ़ी लपसी), गरम जल के साथ, बिना स्नेह और लवण के या थोड़े स्नेह और लवण वाली, खिलाए। इसी प्रकार पाँचवें और छठे अन्नकाल में (भी)। परन्तु सातवें अन्नकाल में वैसे ही शालि (धान) का दो प्रसृत भर, भली-भाँति पका हुआ ओदन (भात), थोड़े स्नेह और लवण से युक्त पतले मुद्ग (मूँग) के यूष के साथ, गरम जल के अनुपान सहित खिलाए। इसी प्रकार आठवें और नौवें अन्नकाल में (भी)। परन्तु दसवें अन्नकाल में लावक, कपिञ्जल आदि (पक्षियों) में से किसी एक के, जल और लवण डालकर बनाए गए, बहुत गाढ़े न (किए गए) मांसरस के साथ, गरम जल के अनुपान सहित (ओदन) खिलाए। इसी प्रकार ग्यारहवें और बारहवें अन्नकाल में (भी)। इसके आगे अन्न के गुणों को (अर्थात् अधिक गुणों वाले भोजन को) क्रम से ग्रहण करता हुआ (वह) सात रातों में प्रकृति-भोजन (अपने सामान्य भोजन) पर आ जाए।

च. सू. १५/१७

, ॥ १७ ॥

फिर इस (रोगी) को फिर से स्नेह और स्वेद से संपन्न (तैयार) करके, (यह) देखकर कि इसका मन अनुपहत (अविचलित) है, (जब यह) सुख से (रात) बिता चुका हो, (इसका) भोजन भली-भाँति पच चुका हो और (इसने) होम, बलि, मङ्गल (कर्म), जप और प्रायश्चित्त कर लिए हों, (तब) शुभ तिथि, नक्षत्र, करण और मुहूर्त में ब्राह्मणों से स्वस्ति (कल्याण-वचन) कहलवाकर, दोष, भेषज, देश, काल, बल, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति और वय की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं को और विकारों को भली-भाँति परखकर, (वैद्य इसे) त्रिवृत् (निशोथ) का एक अक्ष भर कल्क, यथोचित आलोडन (घोलने के द्रव) में घोलकर, पिलाए। और भली-भाँति विरेचन हो चुकने पर इस (रोगी) को वमन (के प्रसंग) में कही गई विधि से, धूम को छोड़कर, तब तक सँभाले जब तक (इसे) बल, वर्ण और प्रकृति (स्वाभाविक दशा) फिर प्राप्त न हो जाएँ। और बल और वर्ण से युक्त इस (रोगी) को, (यह) देखकर कि इसका मन अनुपहत है, (जब यह) सुख से (रात) बिता चुका हो, (इसका) भोजन भली-भाँति पच चुका हो, (यह) सिर सहित नहा चुका हो, (इसके) शरीर पर अनुलेपन लगा हो, (यह) माला पहने हो, अनुपहत (साफ़, बिना फटे) वस्त्र पहने हो और उचित अलंकारों (आभूषणों) से सजा हो, (तब वैद्य इसे) मित्रों को दिखाकर सम्बन्धियों को दिखाए। फिर इसे (इसकी) इच्छाओं में छोड़ दे (अर्थात् मनचाहा आचरण करने दे)।

च. सू. १५/१८

। ॥ १८ ॥

और यहाँ (इस विषय में ये श्लोक) हैं: राजा, राजमात्र (राजा जैसी प्रभुता वाला व्यक्ति) अथवा फिर जिसके पास प्रचुर द्रव्य (धन) हो, वह इस विधि से संशोधन के योग्य है।

च. सू. १५/१९

। ॥ १९ ॥

परन्तु दरिद्र (निर्धन) व्यक्ति आपत्ति (रोग) आ पड़ने पर, जिसका समय आ गया हो ऐसा विशोधन (शोधन की औषध), दुर्लभ सामग्री जुटाए बिना भी, निःसंकोच पी ले।

च. सू. १५/२०

। ॥ २० ॥

क्योंकि सभी मनुष्यों के पास सारे परिच्छद (साधन-सामग्री) नहीं होते, और ऐसा भी नहीं है कि दारुण (भयंकर) रोग दरिद्रों को पीड़ित न करते हों।

च. सू. १५/२१

। ॥ २१ ॥

आपत्ति में मनुष्य के लिए जो-जो औषध करना (तैयार करना) सम्भव हो, उस-उस का यथाशक्ति (सामर्थ्य के अनुसार) सेवन करना चाहिए, और वस्त्रों तथा भोजन का भी।

च. सू. १५/२२

। ॥ २२ ॥

मल को दूर करने वाला, रोग को हरने वाला और बल तथा वर्ण (रंग-रूप) को निखारने वाला संशोधन (शोधन की औषध) ठीक प्रकार से पीकर (मनुष्य) चिरकाल तक आयु से युक्त रहता है।

च. सू. १५/२३

। ॥ २३ ॥

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक (ये हैं): ईश्वरों (और) धनवानों का विरेचन सहित वमन, जो संभार (सामग्रियाँ) हैं, और (वैद्य) उन्हें जुटाकर जिस प्रयोजन के लिए प्रयोग करे

च. सू. १५/२४

। ॥ २४ ॥

जो मात्रा (हो) और जिस प्रकार (उसका) प्रयोग करना चाहिए, अयोग का जो लक्षण है, और योग तथा अतियोग का जो (लक्षण) है, और जो दोष तथा उपद्रव भी (होते हैं)

च. सू. १५/२५

। ॥ २५ ॥

(शोधन से) शुद्ध हुए (व्यक्ति) को जिसका सेवन नहीं करना चाहिए, और जो संसर्जन-क्रम (आहार को क्रम से बढ़ाने की विधि) है, वह सब पुनर्वसु ने कल्पना-अध्याय (इस उपकल्पनीय अध्याय) में कहा।

च. सू. १५

॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में उपकल्पनीय नामक पन्द्रहवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।