भूमिका
उपकल्पनीय अध्याय चरक संहिता के सूत्रस्थान का पन्द्रहवाँ अध्याय है, और इसका विषय है शोधन की सामग्री और तैयारी। शोधन, जिसे यह अध्याय संशोधन भी कहता है, वह चिकित्सा है जो बढ़े हुए दोषों को शरीर से बाहर निकालती है; यहाँ उसके दो रूपों की बात है: वमन, जिसमें औषध पिलाकर उल्टी कराई जाती है, और विरेचन, जिसमें दस्त कराए जाते हैं। अध्याय का नाम उसके पहले उपदेश से आया है: जो वैद्य किसी राजा को, राजा के समान साधनों वाले व्यक्ति को, या किसी बहुत धनी व्यक्ति को वमन या विरेचन पिलाना चाहे, उसे औषध पिलाने से पहले ही संभार, यानी आवश्यक सामग्री, 'उपकल्पनीय' रखनी चाहिए, अर्थात् जुटाकर तैयार रखनी चाहिए। यह उपदेश भगवान् आत्रेय का है, और अध्याय के अन्तिम श्लोक कहते हैं कि यह सब पुनर्वसु ने कहा।
आत्रेय तैयारी का कारण बताते हैं: औषध ठीक काम करे तब भी यह सामग्री रोगी के उपयोग में आती है, और यदि बीच में अचानक कोई संकट आ पड़े, तो खरीदने की सुविधा होने पर भी औषधें शीघ्र और ठीक-ठीक नहीं जुटतीं। इस पर उनके शिष्य अग्निवेश आपत्ति करते हैं: क्या ज्ञानी वैद्य को आरम्भ से ही ऐसी व्यवस्था नहीं करनी चाहिए कि औषध निश्चित रूप से सफल हो? उनका तर्क है कि सफलता सम्यक् प्रयोग से होती है और बिगाड़ असम्यक् प्रयोग से, और यदि ठीक या गलत ढंग से किया गया कर्म बिना किसी नियम के सफल हो जाए या बिगड़ जाए, तो ज्ञान अज्ञान के बराबर हो जाता है। आत्रेय उत्तर देते हैं कि वे और उनके जैसे आचार्य ऐसी व्यवस्था कर भी सकते हैं और औषध देने की यह उत्तम कुशलता सिखा भी सकते हैं, पर ऐसा कोई नहीं जो उस उपदेश को पूरा धारण करके वैसा ही प्रयोग कर सके; क्योंकि दोष, भेषज, देश, काल, बल, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति और वय की अवस्थाओं के भेद इतने सूक्ष्म हैं कि बहुत निर्मल और विशाल बुद्धि वाले को भी उलझा दें। इसलिए औषधों का सम्यक् प्रयोग और उनके बिगड़ जाने पर होने वाले व्यापदों के उपचार, ये दोनों वे आगे सिद्धिस्थान में बताने को कहते हैं।
फिर आत्रेय सामग्री की सूची संक्षेप में देते हैं। सबसे पहले एक उत्तम घर, जो दृढ़ हो, हवा के झोंकों से बचा हो पर जिसका एक भाग खुली हवा वाला हो, जिसमें सुख से घूमा-फिरा जा सके, जहाँ धुआँ, धूप, पानी और धूल न पहुँचें और न अप्रिय शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गन्ध, और जिसमें पानी का स्थान, ओखली-मूसल, मल-त्याग और स्नान के स्थान और रसोईघर हों। फिर लोग: अच्छे स्वभाव वाले, पवित्र, दक्ष और सेवा में कुशल परिचारक, जो भोजन पकाएँ, नहलाएँ, शरीर दबाएँ, रोगी को उठाएँ-लिटाएँ और औषध पीसें; और गीत, वाद्य, कथा, इतिहास और पुराण में कुशल साथी, जो रोगी का अभिप्राय समझें और देश-काल पहचानें। फिर लाव, कपिञ्जल, शश, हरिण जैसे पशु-पक्षी, और दूध देने वाली, नीरोग, जीवित बछड़े वाली गाय। फिर अनेक बर्तन, कपड़ा, सूत, कपास और ऊन; वमन के पात्रों वाली और सब क्रियाओं के लिए सुविधाजनक शय्याएँ और आसन; पीसने की सिलें, धारदार औज़ार, धूमनेत्र, बस्तिनेत्र, तराजू और नापने का पात्र; घी, तेल, वसा, मज्जा, शहद, नमक, ईंधन, जल, अनेक मद्य और खट्टे पेय, दही, छाछ और मूत्र; अनाज और फल; स्नेहन और स्वेदन के द्रव्य; और वमन कराने वाले, विरेचन कराने वाले और दूसरे औषध। अन्त में कहा गया है कि सम्भावित व्यापदों को सोचकर उनके प्रतीकार के लिए, और रोगी के उपयोग के लिए, जो कुछ भी और आवश्यक लगे, वह भी जुटा लिया जाए।
इसके बाद अध्याय वमन की विधि क्रम से बताता है। पहले रोगी का, जैसा पहले बताया गया है, स्नेहन और स्वेदन होता है; यदि इस बीच कोई तीव्र रोग आ घेरे, तो पहले उसे दूर करके तैयारी उतने ही समय तक फिर की जाती है। फिर शुभ नक्षत्र, तिथि, करण और मुहूर्त में, जब रोगी रात सुख से बिता चुका हो, उसका भोजन पच चुका हो, वह नहाकर, माला और साफ़ वस्त्र पहनकर देवता, अग्नि, द्विज, गुरु, वृद्ध और वैद्यों का सत्कार कर चुका हो, और ब्राह्मणों ने स्वस्तिवाचन कर दिया हो, उसे मधु, मधुक, सैन्धव और फाणित मिला मदनफल का कषाय पिलाया जाता है। अध्याय कहता है कि इसकी मात्रा हर व्यक्ति के लिए अलग है: उतनी, जितनी से विकार करने वाले दोष निकल जाएँ पर न अतियोग हो न अयोग। पसीना, रोंगटे खड़े होना, पेट फूलना, जी मिचलाना और मुँह में पानी आना क्रम से बताते हैं कि दोष पिघल रहा है, अपने स्थानों से चल पड़ा है, पेट में आ गया है और ऊपर की ओर मुड़ गया है। तब रोगी को घुटने जितने ऊँचे आसन पर बिठाया जाता है, पास में वमन के पात्र रखे जाते हैं, और मित्र उसका माथा और पसलियाँ थामते हैं; वैद्य सावधान होकर वेगों को देखता है, क्योंकि उन्हीं से योग, अयोग और अतियोग पहचाने जाते हैं। अध्याय तीनों के लक्षण गिनाता है, और अयोग तथा अतियोग से होने वाले उपद्रव भी, जैसे आध्मान, परिकर्तिका, अङ्गग्रह और क्लम। ठीक वमन के बाद रोगी को धूमपान और जल का उपस्पर्श कराया जाता है, और पूरा दिन ऊँचे बोलने, अधिक खाने, क्रोध, शोक, सवारी, मैथुन, दिन में सोने, अनुचित भोजन और वेगों को रोकने या उभारने जैसी बातों से मन से भी बचकर बिताने को कहा जाता है। फिर संसर्जन-क्रम आता है: तीन अन्नकालों में यवागू, तीन में विलेपी, तीन में मूँग के यूष के साथ भात, और तीन में मांसरस के साथ भोजन, और इस प्रकार सात रातों में सामान्य भोजन तक लौटना।
वमन का क्रम पूरा होने पर विरेचन की बारी आती है। रोगी का फिर से स्नेहन और स्वेदन होता है, और होम, बलि, मङ्गल, जप, प्रायश्चित्त और ब्राह्मणों के स्वस्ति-वचन के बाद, दोष, भेषज, देश, काल और दूसरी अवस्थाओं को परखकर, उसे त्रिवृत् (निशोथ) का कल्क पिलाया जाता है। ठीक विरेचन के बाद धूम को छोड़कर वमन वाली ही देखभाल तब तक चलती है जब तक बल, वर्ण और स्वाभाविक दशा न लौट आएँ; फिर रोगी को सजाकर मित्रों और सम्बन्धियों को दिखाया जाता है और उसकी इच्छा पर छोड़ दिया जाता है। अध्याय के श्लोक बताते हैं कि यह पूरी विधि राजा, राजा के समान व्यक्ति या बहुत धनी व्यक्ति के लिए है; पर निर्धन व्यक्ति संकट में, समय आने पर, दुर्लभ सामग्री जुटाए बिना भी शोधन की औषध पी ले, क्योंकि सबके पास सारे साधन नहीं होते और भयंकर रोग निर्धनों को भी सताते हैं; संकट में जो औषध, वस्त्र और भोजन जुट सकें, उन्हीं का सेवन अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया जाए। श्लोकों के अनुसार ठीक प्रकार से लिया गया संशोधन मल और रोग को दूर करता है, बल और वर्ण को निखारता है और लम्बी आयु देता है। इस अध्याय से मुख्य बात यह निकलती है कि पूरी सावधानी के बाद भी शोधन बिगड़ सकता है, इसलिए सामग्री पहले से तैयार रखी जाती है; मात्रा हर व्यक्ति के अनुसार तय होती है, और वैद्य वेगों को देखकर ही आगे का कर्तव्य जानता है; और साधन कम हों तो भी शोधन छोड़ा नहीं जाता, जितना जुट सके उतने से किया जाता है।