भारत संहिता

अध्याय १६

चिकित्साप्राभृतीयोऽध्यायः

चिकित्सा में निपुण वैद्य (शोधन का सम्यक् और मिथ्या योग)

इस पृष्ठ का हिन्दी पाठ AI (Claude) द्वारा तैयार किया गया ड्राफ्ट है। चिह्न वाले अंशों की सम्पादक द्वारा जाँच अभी बाकी है।

भूमिका

चिकित्साप्राभृतीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का सोलहवाँ अध्याय है। इसका नाम इसके पहले श्लोक के पहले शब्द 'चिकित्साप्राभृत' से है, जिसका अर्थ यहाँ चिकित्सा में निपुण वैद्य लिया गया है; 'प्राभृत' का सामान्य अर्थ भेंट होता है, इसलिए इस शब्द का ठीक शाब्दिक भाव स्पष्ट नहीं है। पिछले अध्यायों की तरह इसका उपदेश भी भगवान् आत्रेय का है। अध्याय का विषय संशोधन है, यानी वमन (औषधि देकर उल्टी कराना) और विरेचन (औषधि देकर दस्त कराना) से बढ़े हुए दोषों को शरीर से बाहर निकालना: वह ठीक हो, कम हो या बहुत अधिक हो जाए तो क्या होता है, और अन्त में यह प्रश्न कि चिकित्सा वास्तव में करती क्या है। इस अध्याय के साथ सूत्रस्थान के तेरहवें से सोलहवें अध्याय तक का कल्पनाचतुष्क, यानी चार अध्यायों का समूह, पूरा होता है।

अध्याय दो वैद्यों की तुलना से आरम्भ होता है। बुद्धिमान्, शास्त्र को जानने वाला और चिकित्सा के कर्म में तत्पर, निपुण वैद्य जिसे विरेचन कराता है, वह विरेचन के योग, यानी ठीक असर, से सुख पाता है; पर अपने को वैद्य मानने वाला अज्ञानी जिसे विरेचन कराता है, वह अतियोग (बहुत अधिक असर) या अयोग (ठीक से असर न होना) से दुःख पाता है। फिर तीनों के लक्षण आते हैं। ठीक विरेचन के लक्षणों में दुर्बलता और हल्कापन, रोगों का घटना, भोजन में रुचि, भूख और प्यास, समय पर मल-मूत्र आदि के वेग, बुद्धि, इन्द्रियों और मन की निर्मलता, वात का अपनी स्वाभाविक दिशा में चलना और पाचन की अग्नि का ठीक चलते रहना गिने गए हैं। अयोग के लक्षणों में थूकना, कफ और पित्त का उभरना, पेट फूलना, अरुचि, उल्टी, जाँघों और पिंडलियों में शिथिलता, ऊँघ, जुकाम और वात का रुकना हैं। अतियोग में मल, पित्त, कफ और वात के क्रम से निकल जाने के बाद मेद और मांस के धोवन जैसा रक्त, कफ और पित्त से रहित जल या काला रक्त निकलता है, और व्यक्ति प्यासा, वात से पीड़ित और मूर्छित-सा हो जाता है। वमन के अतियोग में भी यही लक्षण होते हैं, और साथ में ऊपर की ओर जाने वाले वात रोग और वाणी का रुकना। इसलिए अध्याय का निष्कर्ष है कि मनुष्य ऐसे निपुण वैद्य की शरण ले, जो उसे आयु और सुख से जोड़ दे।

इसके बाद अध्याय बताता है कि जिसके शरीर में दोष बहुत बढ़ गए हों (बहुदोष), उसके लक्षण क्या हैं: अपच, अरुचि, मोटापा, पीलापन, भारीपन, थकान, फुंसियाँ, चकत्ते और खुजली, बेचैनी, आलस्य, दुर्गन्ध, नींद का न आना या बहुत आना, नपुंसकता, बुरे सपने, और पुष्टि देने वाले आहार से तृप्त रहने पर भी बल और कान्ति का नष्ट होना। ऐसे व्यक्ति के लिए दोष और बल के अनुसार ऊपर और नीचे के मार्ग से, यानी वमन और विरेचन से, संशोधन हितकर कहा गया है। अध्याय के अनुसार शुद्ध हुए व्यक्ति की पाचन की अग्नि बढ़ती है, रोग शान्त होते हैं, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और वर्ण निर्मल होते हैं, बल, पुष्टि, सन्तान और पौरुष मिलते हैं, और वह बुढ़ापे को कठिनाई से पाता है और निरोग रहकर लम्बा जीता है। लङ्घन (उपवास आदि से शरीर को हल्का करना) और पाचन से जीते गए दोष कभी-कभी फिर कुपित हो जाते हैं, पर संशोधन से जीते गए दोष फिर उत्पन्न नहीं होते; इसके साथ एक उपमा है: जैसे जड़ नष्ट न हो तो वृक्ष के फूल-फल फिर आ जाते हैं, वैसे ही दोषों की जड़ नष्ट न हो तो गए हुए रोग लौट आते हैं। फिर शोधन के बाद की देखभाल आती है: शोधन से क्षीण हुए व्यक्ति का बृंहण (पोषण) घी, मांसरस, दूध और रुचिकर यूष वाले आहार से, और अभ्यङ्ग, उबटन, स्नान और बस्तियों से बताया गया है; अतियोग में घी पीना, मधुर द्रव्यों से पकाया तैल या अनुवासन बस्ति; और अयोग में व्यक्ति को फिर स्निग्ध करके, मात्रा, काल और बल का ध्यान रखते हुए, दोबारा शोधन। स्नेहन, स्वेदन, शोधन और संसर्जन (शोधन के बाद का आहार-क्रम) गलत विधि से होने पर जो रोग होते हैं, उनका उपचार अध्याय 'सिद्धियों' में बताता है, जिनसे सम्भवतः सिद्धिस्थान के अध्यायों का अभिप्राय है।

अन्तिम भाग में अध्याय एक गहरे प्रश्न पर आता है। आत्रेय बताते हैं कि कारण विषम हों तो देह की धातुएँ विषम उत्पन्न होती हैं और सम हों तो सम, पर उनका नाश सदा स्वभाव से ही होता है: वस्तुओं के उत्पन्न होने का कारण होता है, नष्ट होने का नहीं, यद्यपि कुछ लोग कारण के रुक जाने को ही नाश का कारण मानते हैं। इस पर अग्निवेश पूछते हैं कि यदि नाश स्वभाव से ही होता है, तो वैद्य का कर्म क्या है, वह औषधों से किन विषम धातुओं को सम करता है, और चिकित्सा क्या है और किस प्रयोजन से की जाती है। पुनर्वसु आत्रेय उत्तर देते हैं कि जैसे सदा चलते काल के बीतने का कोई कारण नहीं जाना जाता, वैसे ही वस्तुओं के नाश का कोई कारण नहीं है; वस्तु जैसी उत्पन्न होती है, वैसी ही नष्ट होती है, और बीच में बदली नहीं जाती। चिकित्सा वे क्रियाएँ हैं जिनसे शरीर में धातुएँ सम उत्पन्न हों: विषम कारणों को छोड़ने और सम कारणों के सेवन से विषम धातुओं का क्रम आगे नहीं चलता और धातुएँ सम उत्पन्न होती हैं, और चिकित्सा इसी प्रयोजन से की जाती है कि विषमता न हो और सम धातुओं का क्रम बना रहे। इसीलिए निपुण वैद्य देह, सुख और आयु का दाता है, और इनके दान से धर्म, अर्थ, काम और दोनों लोकों का भी दाता बन जाता है। अन्त के संग्रह-श्लोक अध्याय के विषय फिर गिनाते हैं और कहते हैं कि यह सब मुनि ने इस अध्याय में कहा।

इस अध्याय से ये बातें साथ ले जाने योग्य हैं। चरक संहिता संशोधन को ऐसी चिकित्सा मानती है जिसका फल वैद्य की निपुणता पर टिका है: उसके ठीक, कम और बहुत अधिक होने के लक्षण अलग-अलग पहचाने जाते हैं, और उसकी भूलों का उपचार भी बताया गया है। अध्याय के अनुसार संशोधन से जीते गए दोष फिर उत्पन्न नहीं होते। और चिकित्सा का काम बनी हुई धातुओं को बदलना नहीं, बल्कि ऐसे कारण जुटाना है जिनसे शरीर में धातुएँ सम उत्पन्न होती रहें।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ३९-४१)

तत्र श्लोकाःचिकित्साप्राभृतगुणो दोषो यश्चेतराश्रयः ।योगायोगातियोगानां लक्षणं शुद्धिसंश्रयम् ॥

श्लोक ३९ →

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक (ये हैं): चिकित्साप्राभृत (चिकित्सा में निपुण वैद्य) के गुण, और जो दोष (त्रुटि) दूसरे (अज्ञानी) पर आश्रित है; शुद्धि (शोधन) से सम्बन्धित योग, अयोग और अतियोग के लक्षण,

बहुदोषस्य लिङ्गानि संशोधनगुणाश्च ये ।चिकित्सासूत्रमात्रं च सिद्धिव्यापतिसंश्रयम् ॥

श्लोक ४० →

बहुदोष (बढ़े हुए दोषों वाले व्यक्ति) के लक्षण, और संशोधन के जो गुण (लाभ) हैं, और सिद्धि तथा व्यापत्ति (उपद्रव) से सम्बन्धित, चिकित्सा का सूत्र मात्र (संक्षिप्त नियम),

या च युक्तिश्चिकित्सायां यं चार्थं कुरुते भिषक् ।चिकित्साप्राभृतेऽध्याये तत् सर्वमवदन्मुनिः ॥

श्लोक ४१ →

और चिकित्सा में जो युक्ति है, और वैद्य जिस प्रयोजन को सिद्ध करता है, वह सब मुनि ने चिकित्साप्राभृत (नामक) अध्याय में कहा।

मुख्य शब्द (२०) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. सू. १६/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम चिकित्साप्राभृतीय (चिकित्सा में निपुण वैद्य सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. १६/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. १६/३

। ॥ ३ ॥

चिकित्सा में निपुण, बुद्धिमान्, शास्त्र को जानने वाला और (चिकित्सा के) कर्म में तत्पर (वैद्य) जिस मनुष्य को विरेचन कराता है, वह (विरेचन के) योग (ठीक मात्रा में असर होने) से सुख पाता है।

च. सू. १६/४

। ॥ ४ ॥

परन्तु अपने को वैद्य मानने वाला अज्ञानी (व्यक्ति) जिस मनुष्य को विरेचन कराता है, वह मनुष्य (विरेचन के) अतियोग (बहुत अधिक असर) और अयोग (ठीक से असर न होने) से दुःख पाता है।

च. सू. १६/५

। ॥ ५ ॥

दुर्बलता, हल्कापन, ग्लानि (थकावट), रोगों का घट जाना, (भोजन में) रुचि, हृदय और वर्ण (रंग-रूप) की शुद्धि, भूख और प्यास, समय पर (मल-मूत्र आदि के) वेगों का प्रवृत्त होना,

च. सू. १६/६

। ॥ ६ ॥

बुद्धि, इन्द्रियों और मन की शुद्धि (निर्मलता), वात की अनुलोमता (उसका अपनी स्वाभाविक दिशा में, नीचे की ओर चलना) और कायाग्नि (पाचन की अग्नि) का अनुवर्तन (ठीक से चलते रहना); (ये) सम्यक् विरिक्त (ठीक प्रकार से विरेचन हुए व्यक्ति) के लक्षण हैं।

च. सू. १६/७

। ॥ ७ ॥

ष्ठीवन (थूकना), हृदय की अशुद्धि, श्लेष्मा (कफ) और पित्त का उत्क्लेश (उभरकर बाहर आने को होना), आध्मान (पेट फूलना), अरुचि, छर्दि (उल्टी), दुर्बलता न होना और हल्कापन न होना,

च. सू. १६/८

। ॥ ८ ॥

जङ्घा (पिंडली) और ऊरु (जाँघ) में शिथिलता, तन्द्रा (ऊँघ), स्तैमित्य (शरीर का जकड़ा और भारी-सा रहना), पीनस (जुकाम) का हो जाना और वात का निग्रह (रुक जाना); ये अविरिक्त (जिनका विरेचन ठीक से नहीं हुआ, उन) लोगों के लक्षण हैं।

च. सू. १६/९

। ॥ ९ ॥

मल, पित्त, कफ और वात के क्रम से निकल आने के बाद, जो रक्त मेद और मांस के जल (धोवन) जैसा बहता है,

च. सू. १६/१०

। ॥ १० ॥

कफ और पित्त से रहित जल, अथवा काला ही रक्त, जो प्यासे, वात से पीड़ित और मूर्छित होते हुए (व्यक्ति) का (निकलता है), वह (विरेचन का) अतियोग है।

च. सू. १६/११

। ॥ ११ ॥

वमन के अधिक कर दिए जाने पर निश्चय ही यही लक्षण होते हैं; और (इनके साथ) ऊपर की ओर जाने वाले वात रोग और अतिरिक्त रूप से वाग्ग्रह (वाणी का रुक जाना) भी होता है।

च. सू. १६/१२

। ॥ १२ ॥

इसलिए मनुष्य को चिकित्साप्राभृत (चिकित्सा में निपुण वैद्य) की शरण में जाना चाहिए, जो उसे आयु और सुख से पूरी तरह जोड़ दे।

च. सू. १६/१३

। ॥ १३ ॥

अविपाक (भोजन का न पचना), अरुचि, स्थूलता (मोटापा), पाण्डुता (फीका-पीलापन), गौरव (भारीपन), क्लम (थकान), पिडका (फुंसियाँ), कोठ (चकत्ते) और कण्डू (खुजली) का उत्पन्न होना, और अरति (बेचैनी) भी,

च. सू. १६/१४

। ॥ १४ ॥

आलस्य, श्रम (थकावट) और दुर्बलता, दुर्गन्ध, अवसाद (शिथिलता), श्लेष्मा (कफ) और पित्त का समुत्क्लेश (उभरकर बाहर आने को होना), नींद का नाश (अनिद्रा), अत्यधिक नींद,

च. सू. १६/१५

। ॥ १५ ॥

तन्द्रा (ऊँघ), क्लैब्य (नपुंसकता), बुद्धि की मन्दता, अशुभ स्वप्न देखना, और बृंहणों (पुष्टि देने वाले पदार्थों) से तृप्त होते हुए भी (व्यक्ति) के बल और वर्ण (कान्ति) का नाश,

च. सू. १६/१६

। ॥ १६ ॥

(ये) बहुदोष (जिसके शरीर में दोष बहुत बढ़ गए हों, उस व्यक्ति) के लक्षण हैं। उसके लिए दोष के अनुसार और बल के अनुसार ऊर्ध्व (ऊपर की ओर) और अनुलोम (नीचे की ओर), दोनों प्रकार का संशोधन हितकर है।

च. सू. १६/१७

। ॥ १७ ॥

इस प्रकार (संशोधन से) जिसका कोष्ठ भली-भाँति शुद्ध हो गया है, उसकी कायाग्नि (पाचन की अग्नि) बढ़ती है, रोग शान्त हो जाते हैं और प्रकृति (शरीर की स्वाभाविक स्वस्थ अवस्था) बनी रहती है।

च. सू. १६/१८

। ॥ १८ ॥

इसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि तथा वर्ण (शरीर की कान्ति) प्रसन्न (निर्मल) हो जाते हैं, और इसे बल, पुष्टि, सन्तान और वृषता (पौरुष शक्ति) प्राप्त होते हैं।

च. सू. १६/१९

। ॥ १९ ॥

(वह) कठिनाई से (अर्थात् देर से) बुढ़ापे को प्राप्त होता है और निरोग रहकर लम्बे समय तक जीता है। इसलिए मनुष्य को उचित समय पर युक्तियुक्त (उचित विधि से दिया गया) संशोधन पीना चाहिए।

च. सू. १६/२०

। ॥ २० ॥

लङ्घन (उपवास आदि से शरीर को हल्का करना) और पाचन (दोषों को पचाने वाले उपायों) से जीते गए दोष कभी-कभी (फिर) कुपित हो जाते हैं; परन्तु जो (दोष) संशोधनों से जीते गए हैं, उनका फिर से उद्भव नहीं होता।

च. सू. १६/२१

। ॥ २१ ॥

दोषों की और वृक्षों की जड़ नष्ट न होने पर, चले गए रोगों का और (वृक्षों के) प्रसवों (फूल-फल) का फिर से आना निश्चित है।

च. सू. १६/२२

। ॥ २२ ॥

जो (व्यक्ति) भेषज (संशोधन की औषधि) से क्षीण हो गया हो, उसके लिए घी, मांसरस, दूध और हृद्य (मन को भाने वाले) यूषों से युक्त आहारों द्वारा ही बृंहण (पोषण) पथ्य (हितकर) है,

च. सू. १६/२३

। ॥ २३ ॥

(तथा) अभ्यङ्ग (तेल आदि की मालिश), उत्सादन (उबटन), स्नान और अनुवासन सहित निरूह (बस्तियों) से (भी बृंहण हितकर है)। इस प्रकार वह (व्यक्ति) सुख पाता है और दीर्घ काल तक आयु से युक्त रहता है।

च. सू. १६/२४

। ॥ २४ ॥

अतियोग (शोधन की अधिकता) से ग्रस्त (लोगों) के लिए घी पीना प्रशस्त माना जाता है, (या) मधुरक (मधुर) द्रव्यों से सिद्ध किया (पकाया) हुआ तैल, अथवा अनुवासन भी।

च. सू. १६/२५

। ॥ २५ ॥

परन्तु जिसका अयोग (शोधन का ठीक से न होना) हुआ हो, उस मनुष्य का, स्निग्ध (स्नेहन किया हुआ) होने पर, (वैद्य) मात्रा, काल और बल का ध्यान रखते हुए तथा पहले का क्रम याद रखते हुए फिर से संशोधन करे।

च. सू. १६/२६

। ॥ २६ ॥

स्नेहन, स्वेदन, शुद्धि (शोधन) और संसर्जन (शोधन के बाद का आहार-क्रम) के गलत विधि से किए जाने पर जो रोग उत्पन्न होते हैं, उनका साधन (उपचार) सिद्धियों (सिद्धिस्थान के अध्यायों) में (बताया गया है)।

च. सू. १६/२७

। ॥ २७ ॥

हेतुओं की विषमता से देह की धातुएँ विषम उत्पन्न होती हैं, और हेतुओं की समता से सम; (परन्तु) उनका उपरम (नाश) सदा स्वभाव से (ही) होता है।

च. सू. १६/२८

। ॥ २८ ॥

भावों (वस्तुओं) की प्रवृत्ति (उत्पत्ति) का हेतु (होता है), (परन्तु उनके) निरोध (नाश) में कोई कारण नहीं है। कुछ लोग वहाँ (नाश में) भी हेतु के अवर्तन (आगे न चलने) को हेतु मानते हैं।

च. सू. १६/२९

। ॥ २९ ॥

इस प्रकार (विषय) कह चुके आचार्य से अग्निवेश ने कहा: स्वभाव से ही उपरम (नाश) होने पर चिकित्साप्राभृत (चिकित्सा में निपुण वैद्य) का कर्म क्या है?

च. सू. १६/३०

। ॥ ३० ॥

वैद्य भेषजों (औषधों) से किन विषम धातुओं को सम करता है? अथवा, भगवन्, चिकित्सा क्या है? अथवा (वह) किस प्रयोजन से प्रयोग की जाती है?

च. सू. १६/३१

। ॥ ३१ ॥

उस शिष्य के वचन सुनकर पुनर्वसु बोले: हे सौम्य (प्रिय), इस विषय में महर्षियों ने जो युक्ति देखी (जानी) है, वह सुनो।

च. सू. १६/३२

। ॥ ३२ ॥

नाश के कारण का अभाव होने से भावों के नाश का कारण नहीं जाना जाता, जैसे सदा चलते रहने वाले काल के बीतने का कारण (नहीं जाना जाता)।

च. सू. १६/३३

। ॥ ३३ ॥

शीघ्र गति (क्षणिकता) के कारण भाव जैसा उत्पन्न हुआ होता है, वैसा ही नष्ट हो जाता है। उसके निरोध (नाश) में कोई कारण नहीं है, और न ही (उसकी) अन्यथा-क्रिया (उसे बदलकर दूसरा कर देना) होती है।

च. सू. १६/३४

। ॥ ३४ ॥

जिन क्रियाओं से शरीर में धातुएँ सम उत्पन्न होती हैं, वह विकारों (रोगों) की चिकित्सा है; वही वैद्यों का कर्म माना गया है।

च. सू. १६/३५

। ॥ ३५ ॥

शरीर में धातुओं की विषमता कैसे न हो, और सम (धातुओं) का अनुबन्ध (निरन्तर बने रहना) कैसे हो, इस प्रयोजन से क्रिया (चिकित्सा) की जाती है।

च. सू. १६/३६

। ॥ ३६ ॥

विषम हेतुओं के त्याग से और सम (हेतुओं) के उपसेवन (सेवन) से विषम (धातुएँ) आगे नहीं बनी रहतीं, (और) धातुएँ सम उत्पन्न होती हैं।

च. सू. १६/३७

। ॥ ३७ ॥

परन्तु क्योंकि (वैद्य) सम हेतुओं से धातुओं को सम उत्पन्न करता है, इसलिए चिकित्साप्राभृत (चिकित्सा में निपुण वैद्य) देह, सुख और आयु का दाता है।

च. सू. १६/३८

। ॥ ३८ ॥

देह, सुख और आयु के दान से वैद्य धर्म, अर्थ और काम का, और दोनों मनुष्य-लोकों (इस लोक और परलोक) का दाता बन जाता है।

च. सू. १६/३९

। ॥ ३९ ॥

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक (ये हैं): चिकित्साप्राभृत (चिकित्सा में निपुण वैद्य) के गुण, और जो दोष (त्रुटि) दूसरे (अज्ञानी) पर आश्रित है; शुद्धि (शोधन) से सम्बन्धित योग, अयोग और अतियोग के लक्षण,

च. सू. १६/४०

। ॥ ४० ॥

बहुदोष (बढ़े हुए दोषों वाले व्यक्ति) के लक्षण, और संशोधन के जो गुण (लाभ) हैं, और सिद्धि तथा व्यापत्ति (उपद्रव) से सम्बन्धित, चिकित्सा का सूत्र मात्र (संक्षिप्त नियम),

च. सू. १६/४१

। ॥ ४१ ॥

और चिकित्सा में जो युक्ति है, और वैद्य जिस प्रयोजन को सिद्ध करता है, वह सब मुनि ने चिकित्साप्राभृत (नामक) अध्याय में कहा।

च. सू. १६

॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में चिकित्साप्राभृतीय नामक सोलहवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।

च. सू. १६

॥॥

कल्पनाचतुष्क (चार अध्यायों का समूह) समाप्त हुआ।