भूमिका
चिकित्साप्राभृतीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का सोलहवाँ अध्याय है। इसका नाम इसके पहले श्लोक के पहले शब्द 'चिकित्साप्राभृत' से है, जिसका अर्थ यहाँ चिकित्सा में निपुण वैद्य लिया गया है; 'प्राभृत' का सामान्य अर्थ भेंट होता है, इसलिए इस शब्द का ठीक शाब्दिक भाव स्पष्ट नहीं है। पिछले अध्यायों की तरह इसका उपदेश भी भगवान् आत्रेय का है। अध्याय का विषय संशोधन है, यानी वमन (औषधि देकर उल्टी कराना) और विरेचन (औषधि देकर दस्त कराना) से बढ़े हुए दोषों को शरीर से बाहर निकालना: वह ठीक हो, कम हो या बहुत अधिक हो जाए तो क्या होता है, और अन्त में यह प्रश्न कि चिकित्सा वास्तव में करती क्या है। इस अध्याय के साथ सूत्रस्थान के तेरहवें से सोलहवें अध्याय तक का कल्पनाचतुष्क, यानी चार अध्यायों का समूह, पूरा होता है।
अध्याय दो वैद्यों की तुलना से आरम्भ होता है। बुद्धिमान्, शास्त्र को जानने वाला और चिकित्सा के कर्म में तत्पर, निपुण वैद्य जिसे विरेचन कराता है, वह विरेचन के योग, यानी ठीक असर, से सुख पाता है; पर अपने को वैद्य मानने वाला अज्ञानी जिसे विरेचन कराता है, वह अतियोग (बहुत अधिक असर) या अयोग (ठीक से असर न होना) से दुःख पाता है। फिर तीनों के लक्षण आते हैं। ठीक विरेचन के लक्षणों में दुर्बलता और हल्कापन, रोगों का घटना, भोजन में रुचि, भूख और प्यास, समय पर मल-मूत्र आदि के वेग, बुद्धि, इन्द्रियों और मन की निर्मलता, वात का अपनी स्वाभाविक दिशा में चलना और पाचन की अग्नि का ठीक चलते रहना गिने गए हैं। अयोग के लक्षणों में थूकना, कफ और पित्त का उभरना, पेट फूलना, अरुचि, उल्टी, जाँघों और पिंडलियों में शिथिलता, ऊँघ, जुकाम और वात का रुकना हैं। अतियोग में मल, पित्त, कफ और वात के क्रम से निकल जाने के बाद मेद और मांस के धोवन जैसा रक्त, कफ और पित्त से रहित जल या काला रक्त निकलता है, और व्यक्ति प्यासा, वात से पीड़ित और मूर्छित-सा हो जाता है। वमन के अतियोग में भी यही लक्षण होते हैं, और साथ में ऊपर की ओर जाने वाले वात रोग और वाणी का रुकना। इसलिए अध्याय का निष्कर्ष है कि मनुष्य ऐसे निपुण वैद्य की शरण ले, जो उसे आयु और सुख से जोड़ दे।
इसके बाद अध्याय बताता है कि जिसके शरीर में दोष बहुत बढ़ गए हों (बहुदोष), उसके लक्षण क्या हैं: अपच, अरुचि, मोटापा, पीलापन, भारीपन, थकान, फुंसियाँ, चकत्ते और खुजली, बेचैनी, आलस्य, दुर्गन्ध, नींद का न आना या बहुत आना, नपुंसकता, बुरे सपने, और पुष्टि देने वाले आहार से तृप्त रहने पर भी बल और कान्ति का नष्ट होना। ऐसे व्यक्ति के लिए दोष और बल के अनुसार ऊपर और नीचे के मार्ग से, यानी वमन और विरेचन से, संशोधन हितकर कहा गया है। अध्याय के अनुसार शुद्ध हुए व्यक्ति की पाचन की अग्नि बढ़ती है, रोग शान्त होते हैं, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और वर्ण निर्मल होते हैं, बल, पुष्टि, सन्तान और पौरुष मिलते हैं, और वह बुढ़ापे को कठिनाई से पाता है और निरोग रहकर लम्बा जीता है। लङ्घन (उपवास आदि से शरीर को हल्का करना) और पाचन से जीते गए दोष कभी-कभी फिर कुपित हो जाते हैं, पर संशोधन से जीते गए दोष फिर उत्पन्न नहीं होते; इसके साथ एक उपमा है: जैसे जड़ नष्ट न हो तो वृक्ष के फूल-फल फिर आ जाते हैं, वैसे ही दोषों की जड़ नष्ट न हो तो गए हुए रोग लौट आते हैं। फिर शोधन के बाद की देखभाल आती है: शोधन से क्षीण हुए व्यक्ति का बृंहण (पोषण) घी, मांसरस, दूध और रुचिकर यूष वाले आहार से, और अभ्यङ्ग, उबटन, स्नान और बस्तियों से बताया गया है; अतियोग में घी पीना, मधुर द्रव्यों से पकाया तैल या अनुवासन बस्ति; और अयोग में व्यक्ति को फिर स्निग्ध करके, मात्रा, काल और बल का ध्यान रखते हुए, दोबारा शोधन। स्नेहन, स्वेदन, शोधन और संसर्जन (शोधन के बाद का आहार-क्रम) गलत विधि से होने पर जो रोग होते हैं, उनका उपचार अध्याय 'सिद्धियों' में बताता है, जिनसे सम्भवतः सिद्धिस्थान के अध्यायों का अभिप्राय है।
अन्तिम भाग में अध्याय एक गहरे प्रश्न पर आता है। आत्रेय बताते हैं कि कारण विषम हों तो देह की धातुएँ विषम उत्पन्न होती हैं और सम हों तो सम, पर उनका नाश सदा स्वभाव से ही होता है: वस्तुओं के उत्पन्न होने का कारण होता है, नष्ट होने का नहीं, यद्यपि कुछ लोग कारण के रुक जाने को ही नाश का कारण मानते हैं। इस पर अग्निवेश पूछते हैं कि यदि नाश स्वभाव से ही होता है, तो वैद्य का कर्म क्या है, वह औषधों से किन विषम धातुओं को सम करता है, और चिकित्सा क्या है और किस प्रयोजन से की जाती है। पुनर्वसु आत्रेय उत्तर देते हैं कि जैसे सदा चलते काल के बीतने का कोई कारण नहीं जाना जाता, वैसे ही वस्तुओं के नाश का कोई कारण नहीं है; वस्तु जैसी उत्पन्न होती है, वैसी ही नष्ट होती है, और बीच में बदली नहीं जाती। चिकित्सा वे क्रियाएँ हैं जिनसे शरीर में धातुएँ सम उत्पन्न हों: विषम कारणों को छोड़ने और सम कारणों के सेवन से विषम धातुओं का क्रम आगे नहीं चलता और धातुएँ सम उत्पन्न होती हैं, और चिकित्सा इसी प्रयोजन से की जाती है कि विषमता न हो और सम धातुओं का क्रम बना रहे। इसीलिए निपुण वैद्य देह, सुख और आयु का दाता है, और इनके दान से धर्म, अर्थ, काम और दोनों लोकों का भी दाता बन जाता है। अन्त के संग्रह-श्लोक अध्याय के विषय फिर गिनाते हैं और कहते हैं कि यह सब मुनि ने इस अध्याय में कहा।
इस अध्याय से ये बातें साथ ले जाने योग्य हैं। चरक संहिता संशोधन को ऐसी चिकित्सा मानती है जिसका फल वैद्य की निपुणता पर टिका है: उसके ठीक, कम और बहुत अधिक होने के लक्षण अलग-अलग पहचाने जाते हैं, और उसकी भूलों का उपचार भी बताया गया है। अध्याय के अनुसार संशोधन से जीते गए दोष फिर उत्पन्न नहीं होते। और चिकित्सा का काम बनी हुई धातुओं को बदलना नहीं, बल्कि ऐसे कारण जुटाना है जिनसे शरीर में धातुएँ सम उत्पन्न होती रहें।