॥ १ ॥
अब इसलिए हम कियन्तःशिरसीय (सिर में कितने रोग, इस प्रश्न से आरम्भ होने वाले) अध्याय की व्याख्या करेंगे।
अध्याय १७
सिर के रोग कितने? (रोगों और दोषों की गणना)
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कियन्तःशिरसीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का सत्रहवाँ अध्याय है। इसका नाम अग्निवेश के पहले प्रश्न के आरम्भिक शब्दों 'कियन्तः शिरसि' (सिर में कितने) से बना है, और पूरा अध्याय गिनती और वर्गीकरण का है: कौन-से रोग, दशाएँ और भेद कितने हैं। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। अग्निवेश पूछते हैं कि सिर और हृदय में कितने रोग कहे गए हैं, दोषों के मान (मात्रा) के भेद से कितने रोग होते हैं, क्षय कितने हैं, पिडकाएँ कितनी हैं और दोषों की गति कितने प्रकार की है। आत्रेय पहले संक्षेप में उत्तर देते हैं: पाँच शिरोरोग, पाँच हृद्रोग, दोषों के मान के भेद से बासठ व्याधियाँ, अठारह क्षय, मधुमेह से जुड़ी सात पिडकाएँ और दोषों की तीन प्रकार की गति; फिर वे एक-एक का विस्तार करते हैं।
पहले सिर के रोग आते हैं। अध्याय के अनुसार दिन में सोने, रात में जागने, नशे, ऊँचे स्वर में बोलने, ओस, पुरवाई, धूल, धुएँ, ठंड, धूप, भारी और खट्टे भोजन, सिर की चोट, रोने, आँसू रोकने, मन के सन्ताप और देश-काल की विपरीतता जैसे कारणों से वात आदि दोष प्रकुपित होते हैं और सिर में रक्त दूषित होता है। सिर को उत्तमाङ्ग, यानी सबसे श्रेष्ठ अंग, कहा गया है, क्योंकि प्राण और सारी इन्द्रियाँ उसी में आश्रित हैं। उसके अनेक रोगों में से पाँच शिरोरोग कारणों और लक्षणों के साथ अलग से बताए गए हैं: वात, पित्त और कफ से होने वाले, तीनों दोषों से होने वाला, और कीड़ों से होने वाला। हृदय के पाँच रोग भी इसी क्रम में आते हैं: वात, पित्त और कफ के, तीनों दोषों के मेल से बना सान्निपातिक, और कीड़ों से होने वाला, जिसे अध्याय अत्यन्त दारुण और शीघ्रकारी कहता है।
इसके बाद आत्रेय दोषों की घट-बढ़ से बनने वाले भेद गिनाते हैं: दोषों के बढ़ने से पच्चीस (तीनों के एक साथ बिगड़ने, यानी सन्निपात, के तेरह, दो-दो के मेल, यानी संसर्ग, के नौ और अकेले दोषों के तीन), घटने से भी पच्चीस, और बारह ऐसे, जिनमें कोई दोष बढ़ा हो और कोई घटा हुआ; ये मिलकर संक्षिप्त उत्तर की बासठ व्याधियाँ बनती हैं। उन बारह के लक्षण उदाहरणों से दिए गए हैं, और फिर एक सामान्य नियम आता है: बढ़े हुए दोष अपने बल के अनुसार अपने लक्षण दिखाते हैं, घटे हुए अपने लक्षण छोड़ देते हैं, और सम दोष अपना स्वाभाविक कर्म करते हैं। फिर अठारह क्षय आते हैं: दोषों के, रस आदि धातुओं के, मलों के और ओज के। हर धातु के घटने के अपने लक्षण हैं, जैसे रस घटने पर हृदय का बेचैन होना और ऊँचा शब्द न सह पाना, और अस्थि घटने पर बालों, नाखूनों और दाँतों का गिरना। ओज के बारे में अध्याय कहता है कि वह हृदय में रहता है, शुद्ध है, शरीर में सबसे पहले उत्पन्न होता है, और उसके नाश से मनुष्य नष्ट हो जाता है; उसके घटने पर व्यक्ति डरता है, चिन्ता में डूबा रहता है और दुबला और कान्तिहीन हो जाता है। क्षय के कारणों में व्यायाम, उपवास, चिन्ता, रूखा और थोड़ा भोजन, भय, शोक और जागरण गिनाए गए हैं।
फिर अध्याय उन लोगों का वर्णन करता है जिनमें कफ, पित्त, मेद और मांस बहुत बढ़ जाते हैं: जो भारी, स्निग्ध, खट्टे और नमकीन पदार्थ बहुत खाते हैं, नींद और बैठे रहने के सुख में रहते हैं, व्यायाम और चिन्तन छोड़ देते हैं और संशोधन नहीं करते। इनसे जिसकी गति रुक गई है, ऐसा वात ओज को लेकर बस्ति में जाता है, और तब कष्टसाध्य मधुमेह होता है। अध्याय के अनुसार उसकी उपेक्षा से सात दारुण पिडकाएँ होती हैं: शराविका, कच्छपिका, जालिनी, सर्षपी, अलजी, विनता और विद्रधि, और हर एक का रूप बताया गया है। विद्रधि का वर्णन सबसे विस्तृत है: वह बाहरी भी होती है और भीतरी भी; भीतरी विद्रधि हृदय, क्लोम, यकृत्, प्लीहा, वृक्क, नाभि, बस्ति आदि में होती है, और उसके स्थान के लक्षणों से जाना जाता है कि वह साध्य है या असाध्य। ग्रन्थ हृदय, नाभि और बस्ति की पकी हुई विद्रधि को और सान्निपातिक विद्रधि को प्राणघातक कहता है, और बाकी को कुशल और शीघ्र उपचार करने वाले चिकित्सक के हाथ में शान्त होने वाली। अध्याय यह भी कहता है कि पिडकाएँ प्रमेह के बिना भी दूषित मेद से हो सकती हैं, और वैद्य उनका दोष पहचानकर उपद्रव प्रकट होने से पहले उपचार करे।
अन्त में आत्रेय दोषों की गति तीन-तीन के तीन वर्गों में बताते हैं: क्षय, स्थान और वृद्धि; ऊपर, नीचे और तिरछी; और कोष्ठ, शाखा तथा मर्म, अस्थि और सन्धि में। दोषों का चय, प्रकोप और प्रशम वर्षा से आरम्भ होने वाली छह ऋतुओं में क्रम से होता है, और यह काल से होने वाली गति है। गति प्राकृत भी होती है और वैकृत भी: पित्त की ऊष्मा से भोजन पचता है, पर प्रकुपित पित्त अनेक विकार करता है; सामान्य कफ बल और ओज है, पर बिगड़ा हुआ कफ मल और पाप्मा कहा जाता है; और सारी चेष्टा वात से होती है, इसलिए वह प्राणियों का प्राण है, पर उसी से रोग भी होते हैं। इस अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि जो दोष सम रहकर शरीर को चलाते हैं, वही बढ़कर या घटकर रोग बनाते हैं, और अध्याय उनके बढ़ने की तरह घटने को भी गिनता है। अध्याय का अन्तिम उपदेश है कि लम्बी आयु चाहने वाला संयमी व्यक्ति अपने को ऐसा समझे मानो शत्रु सदा पास हों, और सदा सावधान रहे।
तत्र श्लोकौशिरोरोगाः सहृद्रोगा रोगा मानविकल्पजाः ।क्षयाः सपिडकाश्चोक्ता दोषाणां गतिरेव च ॥
श्लोक १२० →यहाँ (अध्याय के सार के) दो श्लोक हैं: सिर के रोग हृदय के रोगों सहित, (दोषों के) मान (मात्रा) के विकल्पों से उत्पन्न होने वाले रोग, और क्षय पिडकाओं सहित कहे गए हैं, और दोषों की गति भी
कियन्तःशिरसीयेऽस्मिन्नध्याये तत्त्वदर्शिना ।ज्ञानार्थं भिषजा प्रजानां च हितैषिणा ॥
श्लोक १२१ →(ये विषय) इस कियन्तःशिरसीय अध्याय में तत्त्वदर्शी और प्रजा (लोगों) का हित चाहने वाले भिषक् (वैद्य) द्वारा ज्ञान के लिए (कहे गए हैं)।
शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।
चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।
सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।
शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।
अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।
चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।
शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।
अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।
चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।
अर्थ: कारण।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।
चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।
शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।
अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।
चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।
सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।
शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।
चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।
शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।
अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।
चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।
सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।
शब्द-रचना: √कृ (करना) से।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।
आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।
चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।
चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।
अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।
चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।
चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।
व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।
शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।
अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।
चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।
शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।
चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।
अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।
चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।
सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।
शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।
अर्थ: छह पदार्थों में से एक।
चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।
शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।
अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।
चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।
सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।
शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।
अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।
चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।
अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।
चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।
अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।
चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।
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॥ १ ॥
अब इसलिए हम कियन्तःशिरसीय (सिर में कितने रोग, इस प्रश्न से आरम्भ होने वाले) अध्याय की व्याख्या करेंगे।
॥ २ ॥
ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।
। ॥ ३ ॥
देहधारियों (प्राणियों) के सिर में और हृदय में कितने रोग कहे गए हैं? और अनिल (वात) आदि (दोषों) के मान-विकल्प (मात्रा के भेद) से उत्पन्न होने वाले रोग भी कितने हैं?
। ॥ ४ ॥
हे अनघ (निष्पाप)! क्षय कितने बताए गए हैं, और पिडकाएँ (फोड़े-फुंसियाँ) कितनी? और हे दोषसूदन (दोषों का नाश करने वाले)! दोषों की गति कितने प्रकार की कही गई है?
। ॥ ५ ॥
हुताशवेश (अग्निवेश) के वे वचन सुनकर गुरु ने कहा, 'हे सौम्य! तुमने जो पूछा है, वह मुझसे विस्तार सहित सुनो।'
। ॥ ६ ॥
पाँच शिरोरोग (सिर के रोग) देखे गए हैं और पाँच ही हृदय के रोग; दोषों के मान (मात्रा) के विकल्प (भेद) से उत्पन्न होने वाली व्याधियाँ साठ से दो अधिक (बासठ) हैं।
। ॥ ७ ॥
दस और आठ (अठारह) क्षय हैं, मधुमेह से सम्बन्धित सात पिडकाएँ (फोड़े-फुंसियाँ) हैं, और दोषों की गति तीन प्रकार की कही गई है। (अब यह सब) विस्तार से सुनो।
। ॥ ८ ॥
संधारण (वेगों को रोकने) से, दिन में सोने से, रात में जागने से, मद (नशे) से, ऊँचे स्वर में बोलने से, अवश्याय (ओस, पाले) से, प्राग्वात (पूर्व की हवा, पुरवाई) से, अत्यधिक मैथुन से,
। ॥ ९ ॥
असात्म्य (अनुकूल न पड़ने वाली) गन्ध सूँघने से, धूल, धुएँ, हिम (ठंड) और धूप से, गुरु (भारी), अम्ल (खट्टे) और हरित (कच्ची हरी वनस्पतियों) को खाने से, अत्यधिक ठंडे जल के सेवन से,
। ॥ १० ॥
सिर पर चोट लगने से, दूषित आम से, रोने से, वाष्प (आँसुओं) को रोकने से, मेघागम (बादलों के आने) से, मन के सन्ताप से, और देश (स्थान) तथा काल (समय, ऋतु) की विपरीतता से,
। ॥ ११ ॥
वात आदि (दोष) प्रकुपित होते हैं और सिर में रक्त दूषित होता है; उससे सिर में अनेक प्रकार के लक्षणों वाले रोग उत्पन्न होते हैं।
। ॥ १२ ॥
जहाँ प्राणधारियों के प्राण और सारी इन्द्रियाँ आश्रित हैं, और जो अंगों में उत्तमाङ्ग (सबसे श्रेष्ठ अंग) है, वह शिर (सिर) कहलाता है।
। ॥ १३ ॥
या तो अर्धावभेदक (आधे सिर का रोग) हो सकता है, या पूरा सिर दुखता है; प्रतिश्याय (जुकाम), मुख, नासिका, आँख और कान के रोग, शिरोभ्रम (सिर का चकराना),
। ॥ १४ ॥
अर्दित (आधे मुख का टेढ़ा होना), सिर का काँपना, गले, मन्या (गर्दन के पिछले भाग) और हनु (जबड़े) की जकड़न, और वात आदि (दोषों) तथा क्रिमि (कीड़ों) से उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के दूसरे रोग (भी सिर में होते हैं)।
। ॥ १५ ॥
परन्तु परम ऋषियों ने संग्रह में जिन पाँच शिरोरोगों (सिर के रोगों) को अलग-अलग बताया है, उन्हें उनके अपने-अपने हेतुओं (कारणों) और लक्षणों के साथ मुझसे सुनो।
। ॥ १६ ॥
ऊँचे स्वर में बोलने और अत्यधिक बोलने से, तीक्ष्ण (तेज़) पेय पीने से, प्रजागर (जागते रहने) से, ठंडी हवा के स्पर्श से, व्यवाय (सम्भोग) से, वेगों को रोकने से,
। ॥ १७ ॥
उपवास से, अभिघात (चोट) से, अत्यधिक विरेक (दस्त कराने) और वमन (उल्टी कराने) से, बाष्प (आँसू बहाने), शोक, भय और त्रास (अचानक डर) से, भार (ढोने), मार्ग (चलने) और अत्यधिक कर्शन (दुबलेपन) से,
। ॥ १८ ॥
(इन कारणों से) बढ़ा हुआ वायु (वात) सिर में स्थित सिराओं (नसों) में प्रवेश करके प्रकुपित होता है; तब उस (रोगी) को वात से बड़ा (तीव्र) शूल (चुभने जैसी पीड़ा) उत्पन्न होता है।
। ॥ १९ ॥
दोनों शङ्खों (कनपटियों) में बहुत अधिक चुभन होती है, वैसे ही घाटा (गर्दन के पिछले भाग) में भेदन (फटने की पीड़ा) होता है, और भौंहों के बीच के भाग सहित ललाट (माथा) अत्यधिक पीड़ा के साथ मानो तपता है।
। ॥ २० ॥
दोनों कान स्वन (गूँज) से आहत होते हैं, दोनों आँखें मानो बाहर खींची जाती हैं, पूरा सिर मानो घूमता है और मानो जोड़ों से छूट जाता है।
। ॥ २१ ॥
सिराओं (नसों) का जाल बहुत अधिक फड़कता है और शिरोधरा (गर्दन) जकड़ जाती है; और अनिलात्मक (वात स्वरूप वाले) शिरोरोग में स्निग्ध (चिकनाई वाला) और उष्ण (गरम) अनुकूल पड़ता है।
। ॥ २२ ॥
कटु (चरपरे), अम्ल (खट्टे), लवण (नमकीन), क्षार (खार), मद्य, क्रोध, आतप (धूप) और अनल (आग) से सिर में दूषित हुआ पित्त शिरोरोग का कारण बनता है।
। ॥ २३ ॥
उस (पित्त) से सिर जलता है, दुखता है, और शीत (ठण्डक) से (सम्भवतः) सुख पाता है; दोनों आँखें जलती हैं, और तृष्णा (प्यास), भ्रम (चक्कर) और स्वेद (पसीना) उत्पन्न होते हैं।
। ॥ २४ ॥
बैठे रहने के सुख, सोने के सुख, और गुरु (भारी), स्निग्ध (चिकनाई वाले) और अत्यधिक भोजन से, सिर में दूषित हुआ श्लेष्मा (कफ) शिरोरोग का कारण बनता है।
। ॥ २५ ॥
उस (श्लेष्मा) से सिर मन्द (हल्की) पीड़ा वाला, सुप्त (सुन्न), स्तिमित (जड़ और भीगा-सा) और भारी हो जाता है; तन्द्रा (ऊँघ), तथा आलस्य और अरोचक (भोजन में अरुचि) उत्पन्न होते हैं।
। ॥ २६ ॥
त्रिदोषज (तीनों दोषों से उत्पन्न) शिरोरोग में वात से शूल (तीखी पीड़ा), भ्रम (चक्कर) और कम्प (कँपकँपी) होते हैं; पित्त से दाह (जलन), मद (नशे जैसी बेसुधी) और तृषा (प्यास); और कफ से गुरुता (भारीपन) और तन्द्रा (ऊँघ)।
। ॥ २७ ॥
तिल, दूध, गुड़, अजीर्ण, पूति (सड़े हुए) और संकीर्ण (मिले-जुले) भोजन से, दोषों से भरे (व्यक्ति) के रक्त, कफ और मांस का क्लेद (अस्वाभाविक गीलापन) उत्पन्न होता है।
। ॥ २८ ॥
तब उस पापकर्मा (पाप कर्म करने वाले व्यक्ति) के सिर में संक्लेद (अत्यधिक गीलेपन) से क्रिमि (कीड़े) उत्पन्न होकर बीभत्स (घिनौने) लक्षणों वाला शिरोरोग उत्पन्न करते हैं।
। ॥ २९ ॥
व्यध (चुभन), छेद (कटने जैसी पीड़ा), रुजा (पीड़ा), कण्डू (खुजली), शोफ (सूजन) और दौर्गत्य (दुर्दशा) से दुःखी (व्यक्ति) को, और क्रिमियों (कीड़ों) के दिखाई देने से (भी), क्रिमि-रोग से पीड़ित जानना चाहिए।
। ॥ ३० ॥
शोक, उपवास, व्यायाम, और रूखे, सूखे और थोड़े भोजन से वायु हृदय में प्रवेश करके तीव्र पीड़ा उत्पन्न करता है।
। ॥ ३१ ॥
हृदय के वात से पीड़ित होने पर (ये) रूप (लक्षण होते हैं): वेपथु (कँपकँपी), वेष्टन (कसे होने जैसा अनुभव), स्तम्भ (जकड़न), प्रमोह (बेसुधी), शून्यता (खालीपन) और दर (भय); और (भोजन के) पच जाने पर अत्यधिक वेदना (होती है)।
। ॥ ३२ ॥
उष्ण (गरम), अम्ल (खट्टे), लवण (नमकीन), क्षार, कटु (तीखे) और अजीर्ण भोजन से, और मद्य (शराब), क्रोध और आतप (धूप) से, पित्त हृदय में शीघ्र प्रकुपित हो जाता है।
। ॥ ३३ ॥
हृदय में दाह (जलन), मुँह में तिक्तता (कड़वापन), तिक्त और अम्ल (कड़वे और खट्टे पदार्थ) का उद्गार (मुँह में आना), क्लम (थकान), तृष्णा (प्यास), मूर्च्छा (बेहोशी), भ्रम (चक्कर) और स्वेद (पसीना): यह पित्तज हृद्रोग का कारण (यहाँ: लक्षण) है।
। ॥ ३४ ॥
गुरु (भारी) और स्निग्ध (चिकनाई वाले पदार्थों) का अत्यधिक सेवन, चिन्तन न करना, चेष्टा (शारीरिक गतिविधि) न करना, और नींद का अत्यधिक सुख: (यह) कफज हृद्रोग का कारण है।
। ॥ ३५ ॥
कफज हृद्रोग में तन्द्रा (ऊँघ) और अरुचि से घिरे (रोगी) का हृदय सुप्त (सुन्न), स्तिमित (जड़ और भीगा-सा) और भारी हो जाता है, जैसे पत्थर से ढका हो।
।( ॥) ॥ ३६ ॥
(तीनों के) हेतुओं (कारणों) और लक्षणों के संसर्ग (मेल) से सान्निपातिक (हृद्रोग) कहा जाता है। [महर्षियों ने हृद्रोग को कष्टदायक और कष्टसाध्य कहा है।] परन्तु त्रिदोषज हृद्रोग में जो दुरात्मा (दुष्ट बुद्धि वाला व्यक्ति) सेवन करता है
। ॥ ३७ ॥
तिल, दूध, गुड़ आदि का, उसे ग्रन्थि (गाँठ) हो जाती है; और मर्म (हृदय) के एक भाग में उसका रस संक्लेद (अत्यधिक गीलेपन) को प्राप्त होता है।
। ॥ ३८ ॥
और (उस) संक्लेद (अत्यधिक गीलेपन) से इस उपहतात्मा (आहत आत्मा वाले व्यक्ति) के क्रिमि (कीड़े) उत्पन्न हो जाते हैं; मर्म (हृदय) के एक भाग में उत्पन्न हुए वे रेंगते हुए (उस भाग को) खाते भी हैं।
। ॥ ३९ ॥
वह (रोगी) अपने हृदय को ऐसा अनुभव करता है मानो सुइयों से चुभोया जा रहा हो, जैसे शस्त्रों से काटा जा रहा हो, (और उसमें) खुजली उत्पन्न हो गई हो और बड़ी पीड़ा हो।
। ॥ ४० ॥
इन लिङ्गों (लक्षणों) से क्रिमिज (कीड़ों से उत्पन्न) हृद्रोग को तो अत्यन्त दारुण (भयंकर) जानकर, विद्वान् (चिकित्सक) उस शीघ्रकारी (तेज़ी से बढ़ने वाले) विकार को जीतने के लिए शीघ्रता करे।
। ॥ ४१ ॥
दो (दोषों के) उल्बण (प्रबल) होने और एक (दोष के) उल्बण होने से छह (भेद) होते हैं, और हीन, मध्य और अधिक (दोषों) से छह, और सम (दोषों) से एक: वे सन्निपात विकार तेरह हैं।
। ॥ ४२ ॥
संसर्ग में नौ (भेद) हैं: उनमें से छह एक (दोष) की वृद्धि से, (और) सम (दोषों) से तीन; और अलग-अलग बढ़े हुए उन (दोषों) से तीन: (इस प्रकार) व्याधियाँ पच्चीस (हैं)।
। ॥ ४३ ॥
जैसे बढ़े हुए (दोषों) से, वैसे ही क्षीण (घटे हुए) दोषों से (भी) पच्चीस (व्याधियाँ) होती हैं; और वृद्धि और क्षय (दोनों) से बना एक अन्य विकल्प (भेद) बताया जाएगा।
। ॥ ४४ ॥
एक (दोष) की वृद्धि, एक की समता और एक का संक्षय; दो की वृद्धि और एक का क्षय; एक की वृद्धि (और) दो का क्षय।
। ॥ ४५ ॥
जब श्लेष्मा (कफ) के क्षय (घट जाने) पर मारुत (वात) प्रकृतिस्थ (अपनी सामान्य अवस्था में स्थित) पित्त को (उसके) स्थान से लेकर शरीर के अंगों में जहाँ-जहाँ फैलता है
। ॥ ४६ ॥
तब इस (व्यक्ति) के शरीर के उस-उस भाग में अनवस्थित (एक स्थान पर न टिकने वाले) भेद (फटने जैसी पीड़ा) और दाह (जलन) होते हैं, और श्रम (थकावट) तथा दौर्बल्य (कमज़ोरी) भी।
। ॥ ४७ ॥
जब पित्त के क्षीण होने पर बली (बलवान्, बढ़ा हुआ) वायु (वात) प्रकृतिस्थ (सामान्य अवस्था वाले) कफ को खींचता है, तब वह शैत्य (ठण्डक), स्तम्भ (जकड़न) और गौरव (भारीपन) के साथ शूल (पीड़ा) उत्पन्न करता है।
। ॥ ४८ ॥
जब कफ के परिक्षय (घट जाने) पर पित्त प्रकृतिग (सामान्य अवस्था में स्थित) अनिल (वात) को रोक देता है, तब इस (व्यक्ति) को दाह (जलन) और शूल (पीड़ा) होते हैं।
। ॥ ४९ ॥
जब वात के परिक्षय (घट जाने) पर पित्त सम (सामान्य अवस्था वाले) श्लेष्मा (कफ) को रोक देता है, तब वह तन्द्रा (ऊँघ) और गौरव (भारीपन) के साथ ज्वर उत्पन्न करता है।
। ॥ ५० ॥
जब पित्त के क्षीण होने पर प्रवृद्ध (बढ़ा हुआ) श्लेष्मा (कफ) समीरण (वात) को रोक देता है, तब वह शीतक (ठण्ड लगना), गौरव (भारीपन) और रुजा (पीड़ा) उत्पन्न करता है।
। ॥ ५१ ॥
समीरण (वात) के परिक्षीण (बहुत घट) जाने पर कफ, समत्वग (सामान्य अवस्था में स्थित) पित्त को रोकता हुआ, मृद्वग्नित्व (पाचन-अग्नि का मन्द होना), शिरोग्रह (सिर का जकड़ना) उत्पन्न करता है
। ॥ ५२ ॥
(साथ ही) निद्रा (नींद), तन्द्रा (ऊँघ), प्रलाप (बड़बड़ाना), हृद्रोग (हृदय का रोग), गात्रगौरव (शरीर का भारीपन), नख आदि का पीलापन और कफ तथा पित्त का ष्ठीवन (थूकना) (भी उत्पन्न करता है)।
। ॥ ५३ ॥
जिसका वात हीन (घटा हुआ) हो, उस (व्यक्ति) में तो श्लेष्मा (कफ) पित्त के साथ मिलकर चलता (फैलता) हुआ अरोचक (अरुचि), अपाक (अपच), सदन (अंगों की शिथिलता) तथा गौरव (भारीपन) उत्पन्न करता है
। ॥ ५४ ॥
(साथ ही) हृल्लास (जी मिचलाना), आस्यस्रवण (मुँह से पानी आना), पाण्डुता (पीलापन लिए सफेदी), दूयन (ताप या जलन-भरी पीड़ा), मद (नशे-सी अवस्था), विरेक (मल-त्याग) की विषमता और अनल (पाचन-अग्नि) की विषमता (भी उत्पन्न करता है)।
। ॥ ५५ ॥
जिसका पित्त हीन (घटा हुआ) हो, उस (व्यक्ति) में तो श्लेष्मा (कफ) मारुत (वात) से मिलकर स्तम्भ (जकड़न), शैत्य (ठण्डक) और अनवस्थित (जगह बदलता) तोद (सुई चुभने जैसी पीड़ा) उत्पन्न करता है
। ॥ ५६ ॥
(साथ ही) गौरव (भारीपन), अग्नि की मृदुता (पाचन-शक्ति का मन्द होना), भक्त (भोजन) में अश्रद्धा (अरुचि), प्रवेपन (काँपना), नख आदि की शुक्लता (सफेदी) और गात्र (शरीर) की परुषता (रूखापन) भी (उत्पन्न करता है)।
। ॥ ५७ ॥
कफ के हीन (घट) जाने पर मारुत (वात) और पित्त, यह कुपित जोड़ा, जो लिङ्ग (लक्षण) उत्पन्न करता है, उन्हें संक्षेप में सुनो
। ॥ ५८ ॥
भ्रम (चक्कर आना), उद्वेष्टन (ऐंठन), तोद (सुई चुभने जैसी पीड़ा), दाह (जलन), स्फुटन (फटने जैसी पीड़ा) और वेपन (काँपना), अङ्गमर्द (अंगों का टूटना), परिशोष (सूखापन), दूयन (ताप या जलन-भरी पीड़ा) तथा धूपन (धुआँ-सा उठने की अनुभूति)।
। ॥ ५९ ॥
वात और पित्त के क्षय में श्लेष्मा (कफ) स्रोतों (शरीर के भीतरी मार्गों) को भृश (बहुत अधिक) ढकता हुआ चेष्टाप्रणाश (हिलने-डुलने की शक्ति का नाश), मूर्च्छा (बेहोशी) और वाक्सङ्ग (वाणी का रुकना) उत्पन्न करता है।
। ॥ ६० ॥
वात और श्लेष्मा (कफ) के क्षय में पित्त देह के ओज को स्रंसित (ढीला, अपने स्थान से च्युत) करता हुआ फैलता है, (और) ग्लानि (थकान), इन्द्रियों की दुर्बलता, तृष्णा (प्यास), मूर्च्छा (बेहोशी) और क्रियाक्षय (काम करने की शक्ति का घटना) (उत्पन्न करता है)।
। ॥ ६१ ॥
पित्त और श्लेष्मा (कफ) के क्षय में वायु (वात) मर्मों को अत्यधिक दबाता (पीड़ित करता) हुआ संज्ञा (होश) को नष्ट कर देता है, अथवा मनुष्य को कँपा देता है।
। ॥ ६२ ॥
प्रवृद्ध (बढ़े हुए) दोष अपने बल के अनुसार अपना लिङ्ग (लक्षण) दिखाते हैं, क्षीण (दोष) अपना लिङ्ग छोड़ देते हैं, (और) सम (दोष) अपना कर्म करते हैं।
। ॥ ६३ ॥
वात आदि (दोषों) के, रस आदि (धातुओं) के, मलों के तथा ओज के क्षय (होते हैं); उनमें से अनिल (वात) आदि के संक्षीण होने (घटने) के लक्षण कहे जा चुके हैं।
। ॥ ६४ ॥
रस के क्षय में (हृदय) घट्टित होता (बेचैनी से धड़कता) है, ऊँचा शब्द सहन नहीं करता, द्रवित होता (तेज़ धड़कता) है, उसमें शूल (पीड़ा) होता है, और थोड़ी-सी चेष्टा (श्रम) करने वाले का भी हृदय थक जाता है।
। ॥ ६५ ॥
रक्त के संक्षय (घटने) में त्वचा परुष (खुरदरी), स्फुटित (फटी हुई), म्लान (मुरझाई हुई) और रूक्ष (रूखी) (हो जाती है)। मांस के क्षय में विशेष रूप से स्फिक् (नितम्ब), ग्रीवा (गर्दन) और उदर (पेट) की शुष्कता (सूखकर दुबला होना) (होती है)।
। ॥ ६६ ॥
मेद (चर्बी) के क्षीण होने पर सन्धियों (जोड़ों) का स्फुटन (चटकना), आँखों की ग्लानि (थकान) और आयास (थकावट), तथा उदर (पेट) का तनुत्व (पतलापन), ये लक्षण (होते हैं)।
। ॥ ६७ ॥
अस्थि के क्षय में केश (सिर के बाल), लोम (शरीर के रोएँ), नख, श्मश्रु (दाढ़ी-मूँछ) और द्विज (दाँत) का गिरना, श्रम (थकान) और सन्धियों (जोड़ों) का ढीलापन भी लक्षण जानना चाहिए।
। ॥ ६८ ॥
मज्जा के क्षीण होने पर देहधारियों की अस्थियाँ मानो टूटती-बिखरती हैं, और (वे) दुर्बल और हल्की (हो जाती हैं), और निरन्तर वात-रोगों से ग्रस्त (रहती हैं)।
। ॥ ६९ ॥
दुर्बलता, मुँह का सूखना, पाण्डुता (शरीर का फीका-पीला पड़ना), सदन (अंगों का शिथिल होना), श्रम (थकान), क्लैब्य (नपुंसकता) और शुक्र का न निकलना - (यह) क्षीण शुक्र वाले (व्यक्ति) का लक्षण है।
। ॥ ७० ॥
और शकृत् (पुरीष) के क्षीण होने पर मारुत (वात) आँतों को मानो पीड़ित करता हुआ और (उस) रूक्ष (व्यक्ति) की कुक्षि (पेट) को ऊपर उठाता हुआ, तिरछा और ऊपर की ओर चलता है।
। ॥ ७१ ॥
मूत्र के क्षय में मूत्रकृच्छ्र (मूत्र का कष्ट से आना) और मूत्र का रंग बदलना भी (होता है), और इसे प्यास सताती है और (इसका) मुँह सूख जाता है।
। ॥ ७२ ॥
और (शेष) मलों के क्षय में अन्य मलायन (मलों के मार्ग) अपने-अपने (मल के) अनुसार खाली, हल्के और सूखे हुए दिखाई देते हैं।
। ॥ ७३ ॥
ओज के क्षय में (व्यक्ति) दुर्बल (होकर) डरता है, बार-बार चिन्ता में डूबा रहता है, (उसकी) इन्द्रियाँ व्यथित (रहती हैं), और (वह) कान्तिहीन, उदास मन वाला, रूखा और कृश (दुबला) भी (हो जाता है)।
। ॥ ७४ ॥
जो शुद्ध, लाल (और) थोड़ा पीलापन लिए हुए (पदार्थ) हृदय में रहता है, वह शरीर में ओज कहा गया है; उसके नाश से मनुष्य नष्ट हो जाता है।
। ॥( ।)( ॥)
शरीरधारियों के इस शरीर में सबसे पहले ओज ही उत्पन्न होता है; (वह) घी के रंग का, मधु के रस (स्वाद) वाला और लाज (भुने धान की खील) की गन्ध वाला उत्पन्न होता है। [जैसे भौंरों द्वारा फलों और फूलों से मधु संचित किया जाता है, वैसे ही मनुष्यों का ओज (उनके) अपने कर्मों से, गुणों द्वारा संचित किया जाता है।]
। ॥ ७६ ॥
व्यायाम, अनशन (भोजन न करना), चिन्ता, रूखा, थोड़ा और नपा-तुला भोजन, हवा और धूप, भय, शोक, रूखे पेय और जागरण (नींद न लेना),
। ॥ ७७ ॥
कफ, शोणित (रक्त), शुक्र और मलों का अतिवर्तन (अत्यधिक बाहर निकलना), काल और भूतोपघात (भूतों द्वारा पहुँचाई गई क्षति) - (ये) क्षय के हेतु जानने चाहिए।
। ॥ ७८ ॥
जो लोग भारी, स्निग्ध (चिकनाई वाले), खट्टे और नमकीन (पदार्थ) अत्यधिक मात्रा में खाते हैं, और नया अन्न और पेय, और निद्रा और बैठे रहने के सुखों का सेवन करते हैं,
। ॥ ७९ ॥
(और) जिन्होंने व्यायाम और चिन्ता (सोच-विचार) छोड़ दिए हैं और जो संशोधन नहीं करते, उनके श्लेष्मा (कफ), पित्त, मेद और मांस अत्यधिक बढ़ जाते हैं।
। ॥ ८० ॥
उन (बढ़े हुए कफ, पित्त, मेद और मांस) से जिसकी गति ढक गई (रुक गई) है, ऐसा वायु (वात) जब ओज को लेकर बस्ति (मूत्राशय) में जाता है, तब कष्टसाध्य (कठिन) मधुमेह उत्पन्न होता है।
। ।
वह (मधुमेह) बार-बार मारुत (वात), पित्त और कफ का रूप (लक्षण) दिखाता है, और क्षय को प्राप्त होकर (घटकर) फिर बढ़ जाता है।
। ॥ ८२ ॥
इस (मधुमेह) की उपेक्षा करने से मांसल स्थानों में, मर्मों में और सन्धियों में भी सात दारुण (भयंकर) पिडकाएँ उत्पन्न होती हैं।
। ॥ ८३ ॥
शराविका, कच्छपिका, जालिनी, सर्षपी तथा अलजी, विनता नाम वाली, और सातवीं विद्रधि - (ये सात पिडकाएँ हैं)।
। ॥ ८४ ॥
जो पिडका किनारों पर उठी हुई, बीच में दबी हुई (गहरी), श्याव (कालापन लिए भूरी), क्लेद (गीलेपन) और पीड़ा से युक्त, और शराव (मिट्टी के सकोरे) के आकार की हो, वह शराविका होती है।
। ॥ ८५ ॥
जिसमें गहरी पीड़ा और चुभन हो, जो बड़े स्थान को घेरे हुए हो, चिकनी हो और कछुए की पीठ जैसी दिखे, वह पिडका कच्छपी मानी गई है।
। ॥ ८६ ॥
जालिनी (पिडका) स्तब्ध (कड़ी), सिराओं के जाल वाली, चिकने स्राव वाली, बड़े आशय (आधार) वाली, बहुत पीड़ा और चुभन वाली और सूक्ष्म छिद्रों वाली (होती है)।
। ॥ ८७ ॥
जो पिडका बहुत बड़ी न हो, जल्दी पकने वाली और बहुत पीड़ा वाली हो, और सरसों जैसी फुंसियों से भरी हो, वह सर्षपी होती है।
। ॥ ८८ ॥
अलजी (पिडका) उठते समय (ही) त्वचा को जलाती है, तृष्णा (प्यास), मोह (बेसुधी) और ज्वर देती है, निरन्तर फैलती है, और आग की तरह पीड़ा के साथ जलाती है।
। ॥ ८९ ॥
पीठ पर या पेट पर होने वाली, गहरी पीड़ा और क्लेद (गीलेपन) वाली, बड़ी, विनत (नीचे की ओर दबी हुई) और नीली पिडका 'विनता' मानी गई है।
। ॥ ९० ॥
विद्रधि को दो प्रकार की कहते हैं: बाह्य (बाहरी) और आभ्यन्तर (भीतरी)। बाह्य (विद्रधि) त्वचा, स्नायु और मांस से उठती है, कण्डरा जैसी दिखती है और बहुत पीड़ा वाली होती है।
।॥ ९१ ॥
ठण्डा अन्न तथा विदाही (जलन करने वाले), उष्ण, रूक्ष (रूखे) और शुष्क (पदार्थ) खाने से, और अतिभोजन (बहुत अधिक खाने) से; विरुद्ध (आपस में मेल न खाने वाला), अजीर्ण (पिछला भोजन पचे बिना किया गया), संक्लिष्ट (दूषित), विषम (अनियमित) और असात्म्य (शरीर के अनुकूल न पड़ने वाला) भोजन करने से
।॥ ९२ ॥
व्यापन्न (बिगड़े हुए) और बहुत अधिक मद्य (के सेवन) से, वेगों को रोकने से, श्रम (थकान) से, टेढ़े ढंग से व्यायाम करने और सोने से, और अधिक भार (उठाने), अधिक मार्ग (चलने) और अधिक मैथुन से
। ॥ ९३ ॥
जब मल (दूषित दोष) शरीर के भीतर मांस और रक्त में प्रवेश करते हैं, तब गहराई में स्थित, अत्यन्त दारुण (भयंकर) ग्रन्थि (गाँठ) उत्पन्न होती है
। ॥ ९४ ॥
(वह ग्रन्थि) हृदय में, क्लोम में, यकृत् में, प्लीहा में, कुक्षि में और दोनों वृक्कों में, नाभि में, दोनों वंक्षणों में, या बस्ति में (होती है), और तीव्र वेदना (पीड़ा) वाली होती है।
। ॥ ९५ ॥
दूषित रक्त की अत्यधिक मात्रा के कारण वह (ग्रन्थि) निश्चय ही शीघ्र विदग्ध हो जाती है (जलन के साथ पकने लगती है); इसलिए, शीघ्र विदाह होने के कारण, उसे 'विद्रधि' कहा जाता है।
।, ॥ ९६ ॥
व्यध (बेधने जैसी पीड़ा), छेद (काटने जैसी पीड़ा), भ्रम (चक्कर), आनाह (पेट फूलकर मल और वायु का रुकना), शब्द (आवाज़ होना), स्फुरण (फड़कना) और सर्पण (रेंगने जैसी अनुभूति) से वातिक (वातज विद्रधि) को, और तृष्णा (प्यास), दाह (जलन), मोह, मद और ज्वर से पैत्तिक (पित्तज विद्रधि) को
। ॥ ९७ ॥
जृम्भा (जम्हाई), उत्क्लेश (जी मिचलाना), अरुचि (भोजन में रुचि न रहना), स्तम्भ (जकड़न) और शीतक (ठण्ड लगना) से श्लैष्मिक (कफज विद्रधि) को (वैद्य) जानते हैं। और सभी विद्रधियों में महान् शूल (तीव्र पीड़ा) उत्पन्न होता है।
। ॥ ९८ ॥
व्यम्लता (पकने की जलन वाली अवस्था) को प्राप्त विद्रधि मानो शस्त्रों और अस्त्रों से भेदी जाती है, और मानो जलती लकड़ियों से जलाई जाती है, मानो बिच्छुओं से डसी जाती है।
। ॥ ९९ ॥
वातज विद्रधि पतला, रूखा, अरुण (लाल-भूरा), श्याव (धूसर-काला) और झागदार (स्राव बहाती है); पित्तज विद्रधि तिल, माष (उड़द) और कुलत्थ (कुलथी) के पानी के समान (स्राव बहाती है)।
। ॥ १०० ॥
श्लैष्मिक (कफज विद्रधि) सफेद, पिच्छिल (लसलसा), गाढ़ा और बहुत (स्राव) बहाती है। सान्निपातिक (तीनों दोषों से बनी विद्रधि) ये सभी लक्षण धारण करती है।
- , , , , , , , , ॥ १०१ ॥
अब इन विद्रधियों के साध्य (ठीक हो सकने वाली) और असाध्य होने का भेद जानने के लिए, हम स्थान के कारण होने वाले विशेष लिङ्ग (लक्षण) बताएँगे। उनमें, प्रधान मर्म (हृदय) में उत्पन्न विद्रधि में हृद्घट्टन (हृदय में धक्का-सा लगना), तमक (श्वास रोग का एक प्रकार), प्रमोह (मूर्च्छा), कास (खाँसी) और श्वास (साँस फूलना) होते हैं; क्लोम में उत्पन्न (विद्रधि) में प्यास, मुख का सूखना और गलग्रह (गले का जकड़ना); यकृत् में उत्पन्न (विद्रधि) में श्वास; प्लीहा में उत्पन्न (विद्रधि) में साँस की रुकावट; कुक्षि में उत्पन्न (विद्रधि) में कुक्षि, पार्श्व (बगल) और दोनों कन्धों के बीच के भाग में शूल; वृक्क में उत्पन्न (विद्रधि) में पीठ और कमर का जकड़ना; नाभि में उत्पन्न (विद्रधि) में हिक्का (हिचकी); वंक्षण में उत्पन्न (विद्रधि) में जाँघों की शिथिलता; और बस्ति में उत्पन्न (विद्रधि) में मूत्र और मल का कष्ट से निकलना और दुर्गन्धयुक्त होना।
, , ॥ १०२ ॥
पककर फूट जाने पर, ऊपर (के अंगों) में उत्पन्न (विद्रधियों) में स्राव मुख से बहता है, नीचे (के अंगों) में उत्पन्न (विद्रधियों) में गुदा से, और नाभि में उत्पन्न (विद्रधियों) में दोनों ओर से।
; । ॥ १०३ ॥
इनमें से हृदय, नाभि और बस्ति में उत्पन्न (विद्रधियाँ) पूरी तरह पक जाने पर, और सान्निपातिक (विद्रधि), मृत्यु के लिए होती हैं; परन्तु शेष (विद्रधियाँ) कुशल और शीघ्र उपचार करने वाले चिकित्सक को पाकर शान्त हो जाती हैं। इसलिए शस्त्र, सर्प, विद्युत् (बिजली) और अग्नि के समान (घातक), थोड़े समय पहले उठी विद्रधि का स्नेह और विरेचन से शीघ्र ही उपचार करे, और सब प्रकार से गुल्म की तरह (उपचार करे)।
। ॥ १०४ ॥
और इस विषय में (ये श्लोक) हैं: प्रमेह के बिना भी, दूषित मेद से, ये (पिडकाएँ) उत्पन्न होती हैं; और जब तक (इनका) वास्तु-परिग्रह (किसी स्थान को पकड़ लेना) न हो, तब तक ये दिखाई नहीं देतीं।
। ॥ १०५ ॥
शराविका, कच्छपिका और जालिनी, ये (तीनों) दुःसह (कठिनाई से सही जाने वाली) हैं, क्योंकि ये अधिक श्लेष्मा और मेद वाले (व्यक्ति) में अत्यन्त बलवान् होकर उत्पन्न होती हैं।
। ॥ १०६ ॥
सर्षपी, अलजी, विनता और विद्रधि, जो साध्य (ठीक हो सकने वाली) हैं, वे तो पित्त की प्रधानता वाली होती हैं और कम मेद वाले (व्यक्ति) में उत्पन्न होती हैं।
। ॥ १०७ ॥
जिसके मर्मों में, कन्धे पर, गुदा में, दोनों हाथों में, स्तन पर, सन्धियों (जोड़ों) में और दोनों पैरों में पिडकाएँ उत्पन्न होती हैं, वह प्रमेही (प्रमेह का रोगी) जीवित नहीं रहता।
। ॥ १०८ ॥
इसी प्रकार अन्य पिडकाएँ भी हैं: लाल, पीली, काली और अरुण (लाल-भूरी); पाण्डुर (सफेद-सी) और पाण्डु (पीलापन लिए फीके) रंग वाली, भस्म (राख) जैसी दिखने वाली, और मेचक (गहरी नीली-काली) आभा वाली।
। ॥ १०९ ॥
(कुछ) मृदु (कोमल) होती हैं और अन्य कठोर; (कुछ) स्थूल (बड़ी) और दूसरी सूक्ष्म (छोटी); (कुछ) मन्द वेग वाली (धीरे बढ़ने वाली), (कुछ) तीव्र वेग वाली; (कुछ) बहुत थोड़े शूल (पीड़ा) वाली और (कुछ) बहुत पीड़ा वाली।
। ॥ ११० ॥
उन (पिडकाओं) को उनके अपने-अपने हेतुओं (कारणों) और लक्षणों से मारुत (वात) आदि (दोषों) की जानकर, (वैद्य) उपद्रव दिखाई देने से पहले ही (उनका स्वरूप) बताए और शीघ्र उपचार करे।
। ॥ १११ ॥
तृष्णा (प्यास), श्वास (साँस फूलना), मांस का सड़ना-गलना, मोह (बेहोशी), हिक्का (हिचकी), मद, ज्वर, वीसर्प और मर्मों का अवरोध, ये पिडकाओं के उपद्रव हैं।
। ॥ ११२ ॥
क्षय (घटना), स्थान (अपनी सामान्य मात्रा में टिके रहना) और वृद्धि (बढ़ना), यह दोषों की तीन प्रकार की गति है। ऊपर की ओर, नीचे की ओर और तिरछी (दिशा में), यह दूसरी तीन प्रकार की (गति) जाननी चाहिए।
। ॥ ११३ ॥
और एक दूसरी तीन प्रकार की (गति) कोष्ठ, शाखा तथा मर्म, अस्थि और सन्धियों में (होती है)। इस प्रकार (देखने के) ढंग के भेद से दोषों की तीन प्रकार की गति कही गई।
। ॥ ११४ ॥
पित्त आदि (दोषों) के चय, प्रकोप और प्रशम क्रम से, एक-एक करके, अभ्रागम (बादलों के आगमन, वर्षा ऋतु) से आरम्भ होने वाले छह कालों (ऋतुओं) में होते हैं।
। ॥ ११५ ॥
और चय से आरम्भ होने वाली यह गति फिर कालकृत (काल, यानी ऋतु, से होने वाली) कही जाती है। और गति दो प्रकार की देखी गई है: जो प्राकृत (स्वाभाविक) है और जो वैकृत (विकार वाली) है।
। ॥ ११६ ॥
मनुष्यों में (भोजन का) पाक (पाचन) पित्त से, अर्थात् (उसकी) ऊष्मा से ही होता है। और वही पित्त प्रकुपित (बिगड़कर बढ़ा हुआ) होकर बहुत-से विकार उत्पन्न करता है।
। ॥ ११७ ॥
प्राकृत (सामान्य अवस्था वाला) श्लेष्मा (कफ) तो बल है; विकृत (बिगड़ा हुआ) (श्लेष्मा) मल कहा जाता है। (प्राकृत रूप में) वही शरीर में ओज माना गया है, और (विकृत रूप में) वही पाप्मा (अनिष्टकारी) कहा जाता है।
। ॥ ११८ ॥
क्योंकि सारी चेष्टा (हलचल, क्रिया) वात से होती है, (इसलिए) वह प्राणियों का प्राण माना गया है। उसी से रोग उत्पन्न होते हैं, और उसी से (जीवन) रुक भी जाता है।
। ॥ ११९ ॥
आत्मवान् (संयमी, विवेकी) मनुष्य अपने को ऐसा देखकर कि शत्रु सदा उसके पास ही हैं, अनित्वर (टिकाऊ, लम्बी) आयु चाहते हुए, सदा सावधान रहकर (अपनी) देखभाल करे।
। ॥ १२० ॥
यहाँ (अध्याय के सार के) दो श्लोक हैं: सिर के रोग हृदय के रोगों सहित, (दोषों के) मान (मात्रा) के विकल्पों से उत्पन्न होने वाले रोग, और क्षय पिडकाओं सहित कहे गए हैं, और दोषों की गति भी
। ॥ १२१ ॥
(ये विषय) इस कियन्तःशिरसीय अध्याय में तत्त्वदर्शी और प्रजा (लोगों) का हित चाहने वाले भिषक् (वैद्य) द्वारा ज्ञान के लिए (कहे गए हैं)।
इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान (सूत्रस्थान) में कियन्तःशिरसीय नामक सत्रहवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।