भारत संहिता

अध्याय १८

त्रिशोथीयोऽध्यायः

तीन प्रकार के शोथ

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भूमिका

त्रिशोथीय अध्याय चरक संहिता के सूत्रस्थान का अठारहवाँ अध्याय है, और इसका विषय है शोथ, यानी शरीर के किसी भाग में या पूरे शरीर में सूजन; अध्याय इसे शोफ और श्वयथु भी कहता है। अध्याय का नाम उसके पहले उपदेश से आया है: शोथ तीन होते हैं, वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ) के कारण होने वाले। वात, पित्त और कफ शरीर के तीन दोष हैं, जो प्राणियों के शरीर में सदा रहते हैं: अपनी सामान्य अवस्था में वे शरीर के काम चलाते हैं, और बिगड़ने पर रोग पैदा करते हैं। यह उपदेश भगवान् आत्रेय का है, और अध्याय का अन्तिम श्लोक कहता है कि मोह, लोभ, मान और स्पृहा से रहित पुनर्वसु ने इन सब विषयों की व्याख्या की।

आत्रेय पहले बताते हैं कि हर शोथ या तो निज होता है, जो शरीर के भीतर दोषों के बिगड़ने से उठता है, या आगन्तु, जो किसी बाहरी कारण से आरम्भ होता है। आगन्तु शोथ के कारण हैं काटने, चीरने, तोड़ने, कुचलने, कसकर बाँधने, बेधने और दबाने जैसी चोटें; भल्लातक, आत्मगुप्ता के शूकों, कीड़ों और अहितकर पत्तों और लताओं का स्पर्श; विषैले जीवों का पसीना, रेंगना और मूत्र, और विषैले प्राणियों के दाँतों, सींगों और नखों का आघात; और सागर की वायु, विषैली वायु, पाले और अग्नि का स्पर्श। ऐसे शोथ आरम्भ में अपने कारणों और लक्षणों से पहचाने जाते हैं, जो निज शोथ के लक्षणों से कुछ अंश में उलटे होते हैं, और अध्याय के अनुसार पट्टी, मन्त्र, विषनाशक अगद, लेप, सेंक और ठंडक पहुँचाने जैसे उपक्रमों से शान्त होते हैं। निज शोथ के कारणों की सूची लम्बी है: स्नेह, स्वेद, वमन, विरेचन और बस्ति जैसे कर्मों का ठीक ढंग से न होना और उनके बाद के आहार-क्रम (संसर्जन) का गलत होना; छर्दि, अतिसार, ज्वर, अर्श जैसे रोगों से आया अत्यधिक दुबलापन; मल, मूत्र, छींक आदि के वेगों को रोकना; परिश्रम, रोग या उपवास से दुर्बल हुए व्यक्ति का अचानक भारी, खट्टा और नमकीन आहार, दही, मद्य, नया अन्न और दलदली प्रदेश और जल के प्राणियों का मांस लेना; मिट्टी और अधिक नमक खाना; गर्भ का दबाव, कच्चे गर्भ का गिरना और प्रसूता स्त्रियों की गलत देखभाल।

फिर आत्रेय हर दोष के शोथ की पहचान बताते हैं। वात का शोथ शीत, रूखे और हल्के द्रव्यों, श्रम और उपवास से होता है; वह जल्दी उठता और जल्दी बैठता है, एक जगह नहीं टिकता, दबाने पर शीघ्र ऊपर उठ आता है, और उसमें ऐसी पीड़ा होती है मानो सुइयाँ चुभ रही हों या चींटियाँ रेंग रही हों। पित्त का शोथ उष्ण, तीखे, खट्टे और नमकीन भोजन और आग और धूप की तपन से होता है; वह गरम और कोमल होता है, उसमें जलन होती है, पसीना आता है, और वह न छूना सहता है न गरमी। कफ का शोथ भारी, मीठे, ठंडे और चिकने आहार, बहुत सोने और व्यायाम न करने से होता है; वह धीरे-धीरे उठता और धीरे-धीरे बैठता है, पीलापन लिए सफ़ेद, भारी और स्थिर होता है, दबाने पर ऊपर नहीं उठता, और छूना और गरमी सह लेता है। दो दोषों के मेल से तीन और तीनों के मेल से एक शोथ और बनता है, और इस तरह सात भेद होते हैं। अध्याय कहता है कि बाँटने का आधार बदलने पर शोथ दो, तीन, चार, सात या आठ प्रकार का गिना जाता है, फिर भी उत्सेध, यानी उभार, सब में समान होने से वह एक ही है। पैरों से उठकर पूरे शरीर में फैलने वाला और स्त्री के मुख से फैलने वाला शोथ बहुत कष्टकर बताया गया है, और गुह्य प्रदेश से उठने वाला या उपद्रवों वाला शोथ सबसे अधिक; छर्दि, श्वास, अरुचि, तृष्णा, ज्वर, अतिसार और दुर्बलता, ये सात शोथ के उपद्रव हैं।

इसके बाद अध्याय उन रोगों को गिनाता है जो बिगड़े दोष के किसी एक स्थान पर ठहरने से सूजन के रूप में प्रकट होते हैं। जीभ की जड़ में ठहरा कफ उपजिह्विका, काकल में गलशुण्डिका, गले के बाहरी भाग में गलगण्ड और गले के भीतर गलग्रह पैदा करता है। रक्त के साथ त्वचा में फैलता पित्त विसर्प, त्वचा और रक्त में ठहरा पित्त पिडका, और रक्त में पहुँचकर सूखता पित्त तिलका, पिप्लु, व्यङ्ग और नीलिका नाम के दाग पैदा करता है; कनपटियों में ठहरा पित्त शङ्खक, और कान की जड़ में ठहरा पित्त ज्वर के अन्त में कठिनाई से जीता जाने वाला शोथ। वात से प्लीहा (तिल्ली) का बढ़ना, गुल्म (पेट में गाँठ जैसा उभार), वृद्धि (अण्डकोषों का बढ़ना), उदर (पेट बढ़ने का रोग) और आनाह (अफारा) होते हैं। अधिमांस और अर्बुद जैसे रोग, अपने नाम और रूप से अलग होते हुए भी, उभार की समानता के कारण शोथों में ही गिने जाते हैं। तीनों दोष एक साथ जीभ की जड़ में टिकें तो रोहिणी होती है, जिसमें रोगी का जीवन अधिक से अधिक तीन रात का बताया गया है; पर अध्याय के अनुसार कुशल वैद्य के उपचार से वह शीघ्र स्वस्थ हो जाता है।

अन्तिम भाग में अध्याय रोगों को साध्यता के अनुसार बाँटता है: कुछ साध्य रोग दारुण हैं, जो उपचार न होने पर या गलत आचरण से मार सकते हैं; कुछ साध्य रोग मृदु हैं, जिनमें उपचार निःसन्देह सफल होता है; कुछ असाध्य रोग याप्य हैं, जिनमें अच्छा उपचार भी केवल जीवन की यात्रा चलाता है; और कुछ ऐसे हैं जिनमें उपचार सफल नहीं होता, और अध्याय कहता है कि विद्वान् वैद्य उनका उपचार हाथ में न ले। पीड़ा, रंग, कारण, स्थान, आकृति और नाम के भेद से रोग असंख्य हो जाते हैं, इसलिए जो वैद्य हर रोग का नाम नहीं जानता, वह लज्जित न हो: एक ही कुपित दोष अलग-अलग कारणों से और अलग-अलग स्थानों में जाकर अनेक रोग बनाता है, और अध्याय के अनुसार रोग की प्रकृति (मूल दोष), उसका अधिष्ठान (स्थान) और उसका समुत्थान (कारण) जानकर उपचार करने वाला वैद्य भ्रम में नहीं पड़ता। अन्त में अध्याय दोषों के स्वाभाविक काम गिनाता है: वात उत्साह, साँस लेना और छोड़ना, शरीर की हलचल और धातुओं की ठीक गति; पित्त देखना, पाचन, शरीर की गर्मी, भूख-प्यास, कान्ति और मेधा; और कफ चिकनाई, स्थिरता, बल, क्षमा, धैर्य और अलोभ। किसी दोष के इन कामों का घटना उसके क्षीण होने का लक्षण है, और उसके स्वभाव का बढ़कर दिखना उसकी वृद्धि का। इस अध्याय से ये बातें साथ ले जाने योग्य हैं: शोथ के अनेक भेद होते हुए भी उसकी पहचान उभार है; और किसी रोग को समझने के लिए उसका नाम उतना आवश्यक नहीं, जितना यह जानना कि कौन-सा दोष, किस कारण से, शरीर के किस स्थान में बिगड़ा है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ५४-५६)

तत्र श्लोकाःसंख्यां निमित्तं रूपाणि शोथानां साध्यतां न च ।तेषां तेषां विकाराणां शोथांस्तांस्तांश्च पूर्वजान् ॥

श्लोक ५४ →

इस विषय में (सार के) श्लोक (ये हैं): शोथों की संख्या, निमित्त (कारण), रूप (लक्षण), साध्यता और (साध्यता का) न होना, और उन-उन विकारों (रोगों) से पहले उत्पन्न होने वाले उन-उन शोथ;

विधिभेदं विकाराणां त्रिविधा बोध्यसंग्रहम् ।प्राकृतं कर्म दोषाणां लक्षणं हानिवृद्धिषु ॥

श्लोक ५५ →

विकारों (रोगों) का विधि-भेद (प्रकारों में बाँटना), जानने योग्य (बातों) का तीन प्रकार का संग्रह, दोषों का प्राकृत (स्वाभाविक) कर्म, और (उनकी) हानि और वृद्धि में (दिखने वाला) लक्षण;

वीतमोहरजोदोषलोभमानमदस्पृहः ।व्याख्यातवांस्त्रिशोथीये रोगाध्याये पुनर्वसुः ॥

श्लोक ५६ →

मोह, रज, दोष, लोभ, मान (अभिमान), मद और स्पृहा (लालसा) से रहित पुनर्वसु ने त्रिशोथीय (नामक) रोग-अध्याय में (इन सब की) व्याख्या की।

मुख्य शब्द (१७) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

सामान्य
सामान्य - समानता; जो वृद्धि का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: समान + य (भाव) - समान होने का भाव।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: सामान्य सदा सब भावों की वृद्धि का कारण है, और एकत्व (एक जैसा बनाना) करता है (सू. १/४४-४५)। उदाहरण के लिए, जिस गुण वाला द्रव्य लिया जाए, वह शरीर में उसी गुण को बढ़ाता है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. सू. १८/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम त्रिशोथीय (तीन शोथों सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. १८/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. १८/३

॥ ३ ॥

शोथ तीन होते हैं, वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ) के कारण होने वाले। वे फिर निज और आगन्तु के भेद से दो प्रकार के होते हैं।

च. सू. १८/४

॥ ४ ॥

उनमें आगन्तु (बाहरी कारणों से होने वाले) शोथ छेदन (काटने), भेदन (चीरने), क्षणन (घाव करने), भञ्जन (तोड़ने), पिच्छन (कुचलने), उत्पेषण (पीसने), प्रहार (चोट), वध (मार-पीट), बन्धन (बाँधने), वेष्टन (कसकर लपेटने), व्यधन (बेधने) और पीडन (दबाने) आदि से; या भल्लातक (भिलावा) के फूल, फल और रस के, आत्मगुप्ता (कौंच) के शूकों (रोमों) के, कीड़ों के शूकों के, और अहितकर पत्तों, लताओं और झाड़ियों के स्पर्श से; या विषैले जीवों के पसीने, (शरीर पर) रेंगने और मूत्र कर देने से; या विषैले प्राणियों की दंष्ट्राओं (बड़े नुकीले दाँतों), दाँतों, सींगों और नखों के आघात से; या सागर की वायु, विषैली वायु, हिम (पाले) और अग्नि के स्पर्श से उत्पन्न होते हैं।

च. सू. १८/५

॥ ५ ॥

वे (आगन्तु शोथ) फिर आरम्भ में अपने-अपने हेतु (कारण) और व्यञ्जन (लक्षणों) से पहचाने जाते हैं, जो निज (शोथ) के लक्षणों से एक अंश में विपरीत (होते हैं); और बन्ध (पट्टी बाँधना), मन्त्र, अगद (विषनाशक औषध), प्रलेप (लेप), प्रताप (सेंक) और निर्वापण (ठंडक पहुँचाना) आदि उपक्रमों (उपचारों) से उपचार किए जाने पर वे प्रशान्ति (शमन) को प्राप्त होते हैं।

च. सू. १८/६

॥ ६ ॥

निज (शोथ) तो स्नेह, स्वेद, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन और शिरोविरेचन के अयथावत् (ठीक ढंग से न किए गए) प्रयोग से, या मिथ्या (गलत) संसर्जन से; या छर्दि (उल्टी), अलसक, विसूचिका, श्वास, कास (खाँसी), अतिसार, शोष, पाण्डुरोग, उदर (रोग), ज्वर, प्रदर, भगन्दर और अर्श (बवासीर), इन विकारों से हुए अतिकर्शन (अत्यधिक दुबलेपन) से; या कुष्ठ, कण्डू (खुजली), पिडका (फुंसियों) आदि से; या छर्दि (उल्टी), क्षवथु (छींक), उद्गार (डकार), शुक्र, वात (अधोवायु), मूत्र और पुरीष (मल) के वेगों को रोकने से; या कर्म (परिश्रम), रोग, उपवास और अध्व (मार्ग चलने) से कृश हुए (व्यक्ति) के सहसा अत्यधिक गुरु (भारी), अम्ल (खट्टे) और लवण (नमकीन) (आहार), पिष्टान्न (पिसे अन्न से बने पदार्थ), फल, शाक, राग, दधि (दही), हरितक (हरी वनस्पतियों), मद्य, मन्दक, विरूढ (अंकुरित) और नव (नये) शूकधान्य और शमीधान्य, और आनूप तथा औदक (प्राणियों के) पिशित (मांस) के उपयोग से; मिट्टी, कीचड़ और ढेले खाने से; लवण (नमक) अधिक खाने से; गर्भ के दबाव से; आमगर्भ (कच्चे गर्भ) के गिरने से; और प्रसूता स्त्रियों के मिथ्या उपचार (गलत देखभाल) से; और दोषों के उदीर्ण (बढ़कर उभरे हुए) होने से शोफ उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार (निज शोथ का) सामान्य हेतु कहा गया।

च. सू. १८/७

; ; ; ; ॥ ७ ॥

परन्तु इस (विषय) में विशेष (भेद) यह है: शीत, रूक्ष, लघु और विशद (द्रव्यों) से, श्रम, उपवास, अति-कर्शन (शरीर को बहुत दुबला करने) और क्षपण (शरीर को क्षीण करने वाले उपायों) आदि से प्रकुपित हुआ वायु त्वचा, मांस, शोणित (रक्त) आदि को अभिभूत करके (दबाकर) शोफ (सूजन) उत्पन्न करता है; वह जल्दी उठने और जल्दी शान्त होने वाला होता है, तथा श्याम-अरुण (साँवले-लाल) रंग का या प्रकृत (त्वचा के स्वाभाविक) रंग का, चल (खिसकने वाला), स्पन्दन वाला (फड़कने वाला), और खर, परुष (खुरदरी, कठोर) और फटी-सी त्वचा और रोमों वाला होता है; (उसमें ऐसा लगता है) मानो काटा जा रहा हो, मानो फाड़ा जा रहा हो, मानो दबाया जा रहा हो, मानो सुइयों से चुभोया जा रहा हो, मानो चींटियाँ (उस पर) रेंग रही हों; सरसों के कल्क (पिसे लेप) से लिपे हुए की तरह (वह) चिमचिमाता है, मानो सिकुड़ रहा हो, खिंच रहा हो; ऐसा वातशोथ है। उष्ण, तीक्ष्ण, कटुक, क्षार, लवण, अम्ल और अजीर्ण भोजन से, तथा अग्नि और आतप (धूप) के ताप से प्रकुपित हुआ पित्त त्वचा, मांस और शोणित को अभिभूत करके शोथ उत्पन्न करता है; वह जल्दी उठने और जल्दी शान्त होने वाला होता है, कृष्ण, पीत, नील या ताम्र (ताँबे जैसी) आभा वाला, उष्ण, मृदु (कोमल), और कपिल (भूरे-पीले) और ताम्र रंग के रोमों वाला होता है; (उसमें) जलन होती है, तपन-भरी पीड़ा होती है, धुआँ-सा उठता है, ऊष्मा (भाप-सी गरमी) निकलती है, पसीना आता है, गीलापन होता है, और वह न स्पर्श सहता है, न उष्णता; ऐसा पित्तशोथ है। गुरु, मधुर, शीत और स्निग्ध (द्रव्यों) से, तथा अति-स्वप्न (बहुत सोने), अव्यायाम (व्यायाम न करने) आदि से प्रकुपित हुआ श्लेष्मा (कफ) त्वचा, मांस, शोणित आदि को अभिभूत करके शोथ उत्पन्न करता है; वह कठिनाई से उठने और कठिनाई से शान्त होने वाला होता है, पाण्डु (पीलापन लिए सफ़ेद) या श्वेत आभा वाला, गुरु (भारी), स्निग्ध (चिकनाई वाला), श्लक्ष्ण (चिकना, सपाट), स्थिर, स्त्यान (जमा हुआ, गाढ़ा), सफ़ेद सिरों वाले रोमों वाला, और स्पर्श तथा उष्णता को सह लेने वाला होता है; ऐसा श्लेष्मशोथ है। अपने-अपने कारणों और आकृतियों (लक्षणों) के संसर्ग (मेल) से दो दोषों से उत्पन्न होने वाले तीन शोथ होते हैं, (और) अपने-अपने कारणों और आकृतियों के सन्निपात (तीनों के एक साथ मिलने) से एक सान्निपातिक (शोथ होता है); इस प्रकार (शोथ के) सात भेद हैं।

च. सू. १८/८

॥ ८ ॥

उन-उन प्रकृतियों (आधारों) से भेद किए जाने पर शोथ दो प्रकार का, तीन प्रकार का, चार प्रकार का, सात प्रकार का और आठ प्रकार का पाया जाता है; और फिर उत्सेध (उभार) की समानता के कारण (वह) एक ही है।

च. सू. १८/९

। ॥ ९ ॥

और इस (विषय) में (ये श्लोक) हैं: जिसके अंग सूज जाते हैं, मानो सो जाते (सुन्न पड़ जाते) हैं और दुखते हैं, (और) दबाए जाने पर शीघ्र ऊपर उठ आते हैं, उसे वातशोथ बताना चाहिए।

च. सू. १८/१०

। ॥ १० ॥

और जो शोथ अरुण (लालिमा लिए) वर्ण की आभा वाला हो, रात में मिट जाता हो, और स्नेह और उष्ण मर्दन (गरम मालिश) से मिट जाए, वह भी वातिक (वात से होने वाला) है।

च. सू. १८/११

। ॥ ११ ॥

प्यास और ज्वर से पीड़ित (व्यक्ति) का जो (शोथ) तपता है और जलन करता है, पसीजता है, गीला होता है और गन्ध वाला होता है, वह पैत्त (पित्त से उत्पन्न) श्वयथु (शोथ) कहा गया है।

च. सू. १८/१२

। ॥ १२ ॥

जो (रोगी) पीले नेत्र, मुख और त्वचा वाला हो, पहले मध्य (शरीर के बीच के भाग) से सूजता हो, पतली त्वचा वाला और अतिसार वाला भी हो, (उसका) वह (शोथ) पित्तशोथ कहा जाता है।

च. सू. १८/१३

। ॥ १३ ॥

जो (शोथ) तो ठंडा हो, रुकी हुई गति वाला हो, खुजली वाला और पाण्डु (पीलापन लिए सफ़ेद) भी हो, (और) दबाने पर ऊपर न उठे, वह श्वयथु (शोथ) कफात्मक (कफ से होने वाला) है।

च. सू. १८/१४

। ॥ १४ ॥

जिस (शोथ) के शस्त्र या कुश से कटे (स्थान) से रक्त नहीं निकलता, (बल्कि) कठिनाई से पिच्छा (लसदार चिपचिपा द्रव) बहता है, वह भी कफ से उत्पन्न (शोथ) है।

च. सू. १८/१५

। ॥ १५ ॥

निदान (कारणों) और आकृति (लक्षणों) के संसर्ग (दो दोषों के मेल) से श्वयथु द्विदोषज (दो दोषों से उत्पन्न) होता है; सन्निपात (तीनों दोषों के मेल) से, मिले-जुले हेतुओं से उत्पन्न शोथ सभी (दोषों के) लक्षणों वाला होता है।

च. सू. १८/१६

। ॥ १६ ॥

प्राणी का जो शोथ पैरों से उत्पन्न होकर सारे अंगों में फैल जाए, वह बहुत कष्टकर होता है; और (वह भी) जो स्त्री के मुख से (आरम्भ होकर) फैला हो।

च. सू. १८/१७

। ॥ १७ ॥

और जो (शोथ) स्त्री या पुरुष के गुह्य प्रदेश (जननेन्द्रिय) से उत्पन्न हो, उसे भी, और जिस (शोथ) के (साथ) उपद्रव हों (उसे भी), सबसे अधिक कष्टकर जानना चाहिए।

च. सू. १८/१८

। ॥ १८ ॥

छर्दि (उल्टी), श्वास (साँस फूलना), अरुचि (भोजन में रुचि न होना), तृष्णा (बहुत प्यास), ज्वर और अतीसार (पतले दस्त) भी, दौर्बल्य (दुर्बलता) सहित यह सात का समूह शोफ (सूजन) के उपद्रवों का संग्रह है।

च. सू. १८/१९

। ॥ १९ ॥

जिस (व्यक्ति) का प्रकुपित श्लेष्मा (कफ) जीभ की जड़ में ठहरकर शीघ्र शोथ (सूजन) उत्पन्न कर दे, उसे उपजिह्विका (रोग) हो जाती है।

च. सू. १८/२०

। ॥ २० ॥

जिस (व्यक्ति) का प्रकुपित श्लेष्मा (कफ) काकल (गले के एक भाग) में ठहरकर शीघ्र शोफ (सूजन) उत्पन्न कर दे, वह गलशुण्डिका (रोग) कर देता है।

च. सू. १८/२१

। ॥ २१ ॥

जिस (व्यक्ति) का प्रकुपित श्लेष्मा (कफ) गले के बाहरी भाग में ठहरकर धीरे-धीरे शोफ (सूजन) उत्पन्न कर दे, उसे गलगण्ड हो जाता है।

च. सू. १८/२२

। ॥ २२ ॥

जिस (व्यक्ति) का प्रकुपित श्लेष्मा (कफ) गले के भीतर स्थिर होकर ठहर जाए (और) शीघ्र शोफ (सूजन) उत्पन्न कर दे, उसे गलग्रह हो जाता है।

च. सू. १८/२३

। ॥ २३ ॥

जिस (व्यक्ति) का प्रकुपित पित्त रक्त के साथ त्वचा में फैले (और) लालिमा वाला शोफ (सूजन) उत्पन्न कर दे, उसे विसर्प हो जाता है।

च. सू. १८/२४

। ॥ २४ ॥

जिस (व्यक्ति) का प्रकुपित पित्त त्वचा में (और) रक्त में ठहरकर लालिमा वाला शोथ (सूजन) उत्पन्न कर दे, उसे पिडका (फुंसी) हो जाती है।

च. सू. १८/२५

। ॥ २५ ॥

जिस (व्यक्ति) का प्रकुपित पित्त शोणित (रक्त) में पहुँचकर सूख जाता है, उसे तिलका, पिप्लु, व्यङ्ग और नीलिका (त्वचा के दाग-धब्बे) हो जाते हैं।

च. सू. १८/२६

। ॥ २६ ॥

जिस (व्यक्ति) का प्रकुपित पित्त दोनों शङ्खों (कनपटियों) में ठहर जाता है, उसे शङ्खक नाम का दारुण (भयंकर) श्वयथु (शोथ) हो जाता है।

च. सू. १८/२७

। ॥ २७ ॥

जिस (व्यक्ति) का प्रकुपित पित्त कान की जड़ में ठहर जाता है, उसे ज्वर के अन्त में (ऐसा) शोथ उत्पन्न हो जाता है (जो) दुर्जय (कठिनाई से जीता जाने वाला) (और) अन्त (मृत्यु) के लिए (होता है)।

च. सू. १८/२८

। ॥ २८ ॥

जिस (व्यक्ति) का कुपित वात प्लीहा (तिल्ली) को उभारकर (वहीं) ठहरता है (और) पार्श्व (बगल) को धीरे-धीरे पीड़ा देता है, उसकी प्लीहा बढ़ जाती है।

च. सू. १८/२९

। ॥ २९ ॥

जिस (व्यक्ति) का प्रकुपित वायु (वात) गुल्म के स्थान में ठहर जाता है (और) शूल (तीव्र पीड़ा) सहित शोफ (सूजन) उत्पन्न करता है, उसे गुल्म हो जाता है।

च. सू. १८/३०

। ॥ ३० ॥

जिस (व्यक्ति) का वायु प्रकुपित होकर, शोफ (सूजन) और शूल (दर्द) पैदा करता हुआ, चलता हुआ वङ्क्षण (जाँघ और पेट के जोड़) से दोनों वृषणों (अण्डकोषों) में जाता है, उसे वृद्धि (अण्डकोषों का बढ़ जाना) हो जाती है।

च. सू. १८/३१

। ॥ ३१ ॥

जिस (व्यक्ति) का वात प्रकुपित होकर, त्वचा और मांस के बीच (के स्थान) का आश्रय लेकर, कुक्षि (पेट) में शोथ उत्पन्न कर दे, उसे उदर (रोग) हो जाता है।

च. सू. १८/३२

। ॥ ३२ ॥

जिस (व्यक्ति) का वात प्रकुपित होकर कुक्षि (पेट) का आश्रय लेकर ठहर जाता है, और न नीचे जाता है, न ही ऊपर, उसे आनाह (अफारा) हो जाता है।

च. सू. १८/३३

। ॥ ३३ ॥

और अधिमांस, अर्बुद आदि रोग, जो नाम और रूप से (अलग) पहचाने जाते हैं, उत्सेध (उभार) की समानता के कारण शोथ के संग्रह (समूह) में गिनाए जाने चाहिए।

च. सू. १८/३४

। ॥ ३४ ॥

जिस (व्यक्ति) के वात, पित्त और कफ, तीनों एक साथ कुपित होकर, बहुत बढ़े हुए और जलन पैदा करते हुए, जीभ की जड़ में टिक जाते हैं

च. सू. १८/३५

। ॥ ३५ ॥

(वे) तीव्र शोथ और अलग-अलग प्रकार की वेदनाएँ (पीड़ाएँ) उत्पन्न करते हैं। उस शीघ्रकारी (तेज़ी से असर करने वाले) रोग को रोहिणी कहना चाहिए।

च. सू. १८/३६

। ॥ ३६ ॥

उस प्राणी (रोगी) का जीवन अधिक से अधिक तीन रात का होता है। परन्तु कुशल (वैद्य) द्वारा उपचार किया जाए, तो वह शीघ्र सुखी (स्वस्थ) हो जाता है।

च. सू. १८/३७

। ॥ ३७ ॥

क्योंकि ऐसे रोग (भी) हैं जो साध्य (ठीक हो सकने वाले) हैं पर दारुण (गम्भीर) माने जाते हैं, और जो उपचार न होने पर, या फिर मिथ्याचार (गलत आचरण) से, (रोगी को) मार सकते हैं।

च. सू. १८/३८

। ॥ ३८ ॥

और दूसरे रोग भी हैं जो साध्य हैं और मृदु (हल्के) माने जाते हैं, जिनमें यत्न से या बिना (विशेष) यत्न के किया गया कर्म (उपचार) निःसन्देह सफल होता है।

च. सू. १८/३९

। ॥ ३९ ॥

और दूसरे रोग असाध्य हैं, जिन्हें याप्य कहा जाता है, जिनमें बहुत अच्छी तरह किया गया कर्म (उपचार) भी (केवल जीवन की) यात्रा चलाने वाला होता है।

च. सू. १८/४०

। ॥ ४० ॥

और दूसरे रोग भी हैं, जिनमें अज्ञानियों द्वारा यत्न से किया गया कर्म (उपचार) भी सफल नहीं होता; विद्वान् (वैद्य) उनका उपचार न करे।

च. सू. १८/४१

। ॥ ४१ ॥

रोग दो प्रकार के कहे गए हैं: साध्य और असाध्य। मृदु (हल्के) और दारुण (गम्भीर) के भेद से वे चार प्रकार के हो जाते हैं।

च. सू. १८/४२

। ॥ ४२ ॥

वे ही (रोग) रुजा (पीड़ा), वर्ण (रंग), समुत्थान (कारण), स्थान, संस्थान (आकृति) और नाम के (भेद) से बाँटे जाने पर निश्चय ही असंख्य हो जाते हैं।

च. सू. १८/४३

। ॥ ४३ ॥

उन (असंख्य रोगों) की व्यवस्था करने के लिए जैसे मोटे-मोटे (मुख्य) रोगों में संग्रह (गिनती में समेटना) होता है, वैसे ही विकारों में प्रकृति (मूल कारण) की समानता बताई जाती है।

च. सू. १८/४४

। ॥ ४४ ॥

जो विकारों के नाम (जानने) में कुशल नहीं है, वह (वैद्य) कभी लज्जित न हो; क्योंकि सब विकारों की नाम के अनुसार कोई निश्चित स्थिति नहीं है।

च. सू. १८/४५

। ॥ ४५ ॥

वही कुपित दोष, समुत्थान (कारणों) की भिन्नता से और दूसरे-दूसरे स्थानों में जाकर भी, अनेक रोग उत्पन्न करता है।

च. सू. १८/४६

। ॥ ४६ ॥

इसलिए विकारों की प्रकृति (मूल दोष), (उनके) भिन्न-भिन्न अधिष्ठान (स्थान) और समुत्थान (कारणों) की विशेषताएँ जानकर कर्म (उपचार) करना चाहिए।

च. सू. १८/४७

। ॥ ४७ ॥

क्योंकि जो वैद्य इन तीनों (बातों) को जानकर, ज्ञानपूर्वक (सोच-समझकर) और उचित विधि के अनुसार कर्मों (उपचारों) को आरम्भ करता है, वह कर्मों में भ्रमित नहीं होता।

च. सू. १८/४८

। ॥ ४८ ॥

प्राणियों के शरीर में वात, पित्त और कफ, ये तीनों सदा रहते हैं, चाहे विकृत (बिगड़े हुए) हों या प्रकृति (सामान्य अवस्था) में स्थित। विद्वान् (वैद्य) को उन्हें जानने की इच्छा करनी चाहिए।

च. सू. १८/४९

। ॥ ४९ ॥

उत्साह, उच्छ्वास और निःश्वास (साँस लेना और छोड़ना), चेष्टा (शरीर की हलचल), धातुओं की सम (ठीक) गति, और गतिशील (बाहर निकलने वाले पदार्थों) का सम (ठीक) मोक्ष (निकलना), यह वायु का अविकार (सामान्य अवस्था) से उत्पन्न होने वाला कर्म है।

च. सू. १८/५०

। ॥ ५० ॥

दर्शन (देखना), पक्ति (पाचन), ऊष्मा (शरीर की गर्मी), भूख-प्यास, शरीर की कोमलता, प्रभा (कान्ति), प्रसाद (प्रसन्नता) और मेधा (बुद्धि), यह पित्त का अविकार (सामान्य अवस्था) से उत्पन्न होने वाला कर्म है।

च. सू. १८/५१

। ॥ ५१ ॥

स्नेह (चिकनाई), बन्ध (बाँधे रखना), स्थिरता, गौरव (भारीपन), वृषता (पौरुष), बल, क्षमा (सहनशीलता), धृति (धैर्य) और अलोभ (लालच न होना), यह कफ का अविकार (सामान्य अवस्था) से उत्पन्न होने वाला कर्म है।

च. सू. १८/५२

। ॥ ५२ ॥

वात, पित्त और कफ (में से किसी) के क्षीण होने पर (उसका) लक्षण (यह) कहा जाता है: (उसके) कर्म की प्राकृत (स्वाभाविक स्तर) से हानि (कमी), या विरोधी (दोषों) की वृद्धि भी।

च. सू. १८/५३

। ॥ ५३ ॥

दोष के स्वभाव (प्रकृति) का बढ़कर विशेष हो जाना (उसकी) वृद्धि का नियत (निश्चित) लक्षण है। इस प्रकार दोषों की प्रकृति (सम अवस्था), हानि और वृद्धि की परीक्षा की जाती है।

च. सू. १८/५४

। ॥ ५४ ॥

इस विषय में (सार के) श्लोक (ये हैं): शोथों की संख्या, निमित्त (कारण), रूप (लक्षण), साध्यता और (साध्यता का) न होना, और उन-उन विकारों (रोगों) से पहले उत्पन्न होने वाले उन-उन शोथ;

च. सू. १८/५५

। ॥ ५५ ॥

विकारों (रोगों) का विधि-भेद (प्रकारों में बाँटना), जानने योग्य (बातों) का तीन प्रकार का संग्रह, दोषों का प्राकृत (स्वाभाविक) कर्म, और (उनकी) हानि और वृद्धि में (दिखने वाला) लक्षण;

च. सू. १८/५६

। ॥ ५६ ॥

मोह, रज, दोष, लोभ, मान (अभिमान), मद और स्पृहा (लालसा) से रहित पुनर्वसु ने त्रिशोथीय (नामक) रोग-अध्याय में (इन सब की) व्याख्या की।

च. सू. १८

॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में त्रिशोथीय नामक अठारहवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।