इन्हें (अब हम) उद्देश के क्रम से नाम लेकर बताएँगे: आठ उदर हैं - वात, पित्त, कफ, सन्निपात, प्लीहा, बद्ध और छिद्र के उदर, और दकोदर; आठ मूत्राघात हैं - वात, पित्त, कफ, सन्निपात, अश्मरी, शर्करा, शुक्र और शोणित से उत्पन्न; आठ क्षीरदोष हैं - वैवर्ण्य (रंग का बिगड़ना), वैगन्ध्य (गन्ध का बिगड़ना), वैरस्य (स्वाद का बिगड़ना), पैच्छिल्य (चिपचिपापन), फेनसंघात (झाग का जमाव), रौक्ष्य (रूखापन), गौरव (भारीपन) और अतिस्नेह (अत्यधिक चिकनाई); आठ रेतोदोष हैं - तनु (पतला), शुष्क (सूखा), फेनिल (झागदार), अश्वेत (जो सफ़ेद न हो), पूति (दुर्गन्ध वाला), अतिपिच्छल (बहुत चिपचिपा), अन्यधातूपहित (दूसरी धातु से मिला हुआ) और अवसादि; सात कुष्ठ हैं - कपाल, उदुम्बर, मण्डल, ऋष्यजिह्व, पुण्डरीक, सिध्म और काकण; सात पिडकाएँ हैं - शराविका, कच्छपिका, जालिनी, सर्षपी, अलजी, विनता और विद्रधी; सात विसर्प हैं - वात, पित्त, कफ, अग्नि, कर्दमक, ग्रन्थि और सन्निपात नाम वाले; छह अतीसार हैं - वात, पित्त, कफ, सन्निपात, भय और शोक से उत्पन्न; छह उदावर्त हैं - वात, मूत्र, पुरीष (मल), शुक्र, छर्दि (वमन) और क्षवथु (छींक) से उत्पन्न; पाँच गुल्म हैं - वात, पित्त, कफ, सन्निपात और शोणित से उत्पन्न; पाँच प्लीहदोष गुल्मों (के वर्णन) से ही बताए गए (समझें); पाँच कास हैं - वात, पित्त, कफ, क्षत और क्षय से उत्पन्न; पाँच श्वास हैं - महा, ऊर्ध्व, छिन्न, तमक और क्षुद्र; पाँच हिक्काएँ हैं - महती, गम्भीरा, व्यपेता, क्षुद्रा और अन्नजा; पाँच तृष्णाएँ हैं - वात, पित्त, आम, क्षय और उपसर्ग स्वरूप वाली; पाँच छर्दियाँ हैं - (एक) द्विष्ट (अप्रिय) अर्थों के संयोग से उत्पन्न, और (शेष) वात, पित्त, कफ और सन्निपात के उद्रेक (बढ़ने) से उठने वाली; भक्त के अनशन (भोजन न कर पाने) के पाँच स्थान हैं - वात, पित्त, कफ, सन्निपात और द्वेष; पाँच शिरोरोग हैं - पहले के उद्देश को समेटकर (कहें तो) वात, पित्त, कफ, सन्निपात और क्रिमि से उत्पन्न; पाँच हृद्रोग शिरोरोगों (के वर्णन) से ही बताए गए (समझें); पाँच पाण्डुरोग हैं - वात, पित्त, कफ, सन्निपात और मृद्भक्षण (मिट्टी खाने) से उत्पन्न; पाँच उन्माद हैं - वात, पित्त, कफ, सन्निपात और आगन्तु निमित्त वाले; चार अपस्मार हैं - वात, पित्त, कफ और सन्निपात निमित्त वाले; चार अक्षिरोग, चार कर्णरोग, चार प्रतिश्याय, चार मुखरोग, चार ग्रहणीदोष, चार मद और चार मूर्च्छाय अपस्मारों (के वर्णन) से ही बताए गए (समझें); चार शोष हैं - साहस, सन्धारण, क्षय और विषमाशन से उत्पन्न; चार क्लैब्य हैं - बीज के उपघात से, ध्वज के भङ्ग से, जरा से और शुक्र के क्षय से; तीन शोथ हैं - वात, पित्त और श्लेष्मा निमित्त वाले; तीन किलास हैं - रक्त (लाल), ताम्र (ताँबे के रंग के) और शुक्ल (सफ़ेद); तीन प्रकार का लोहितपित्त है - ऊर्ध्वभाग (ऊपर की ओर वाला), अधोभाग (नीचे की ओर वाला) और उभयभाग (दोनों ओर वाला); दो ज्वर हैं - उष्ण की इच्छा वाला और शीत से उत्पन्न, तथा शीत की इच्छा वाला और उष्ण से उत्पन्न; दो व्रण हैं - निज और आगन्तुज; दो आयाम हैं - बाह्य और अभ्यन्तर; दो गृध्रसी हैं - वात से और वात-कफ से; दो कामला हैं - कोष्ठ में आश्रित और शाखा में आश्रित; दो प्रकार का आम है - अलसक और विसूचिका; दो प्रकार का वातरक्त है - गम्भीर और उत्तान; दो प्रकार के अर्श हैं - शुष्क और आर्द्र; एक ऊरुस्तम्भ है - आम और त्रिदोष से उत्पन्न; एक संन्यास है - त्रिदोषात्मक, और मन तथा शरीर में अधिष्ठित; एक महागद है - अतत्त्वाभिनिवेश; बीस क्रिमिजातियाँ हैं - यूका और पिपीलिका, ये दो प्रकार के बाहरी मल से उत्पन्न; केशाद, लोमाद, लोमद्वीप, सौरस, औदुम्बर और जन्तुमातर, ये छह शोणित से उत्पन्न; अन्त्राद, उदरावेष्ट, हृदयाद, चुरु, दर्भपुष्प, सौगन्धिक और महागुद, ये सात कफ से उत्पन्न; ककेरुक, मकेरुक, लेलिह, सशूलक और सौसुराद, ये पाँच पुरीष से उत्पन्न; बीस प्रमेह हैं - उदकमेह, इक्षुबालिकारसमेह, सान्द्रमेह, सान्द्रप्रसादमेह, शुक्लमेह, शुक्रमेह, शीतमेह, शनैर्मेह, सिकतामेह और लालामेह, ये दस श्लेष्मा निमित्त वाले; क्षारमेह, कालमेह, नीलमेह, लोहितमेह, मञ्जिष्ठामेह, हरिद्रामेह, हस्तिमेह और मधुमेह, ये चार वात निमित्त वाले; इस प्रकार बीस प्रमेह (हुए); बीस योनिव्यापद् हैं - वातिकी, पैत्तिकी, श्लेष्मिकी और सान्निपातिकी, ये चार दोषों से उत्पन्न; शेष सोलह दोष, दूष्य, संसर्ग और प्रकृति के निर्देशों से बताई जाती हैं, जैसे - रक्तयोनि, अरजस्का, अचरणा, अतिचरणा, प्राक्चरणा, उपप्लुता, परिप्लुता, उदावर्तिनी, कर्णिनी, पुत्रघ्नी, अन्तर्मुखी, सूचीमुखी, शुष्का, वामिनी, षण्ढयोनि और महायोनि; इस प्रकार बीस योनिव्यापद् होती हैं। और यह सम्पूर्ण उद्देश उद्देश के क्रम से नाम लेकर बता दिया गया है।