भारत संहिता

अध्याय १९

अष्टोदरीयोऽध्यायः

आठ उदर रोग (संख्या के अनुसार रोग)

इस पृष्ठ का हिन्दी पाठ AI (Claude) द्वारा तैयार किया गया ड्राफ्ट है। चिह्न वाले अंशों की सम्पादक द्वारा जाँच अभी बाकी है।

भूमिका

अष्टोदरीय अध्याय चरक संहिता के सूत्रस्थान का उन्नीसवाँ अध्याय है। यह रोगों की एक सूची है, जिसमें रोगों को उनके भेदों की संख्या के अनुसार गिनाया गया है, और यह उपदेश भगवान् आत्रेय का है। अध्याय का नाम इसी सूची के पहले शब्दों 'अष्टौ उदराणि', यानी 'आठ उदर रोग', से आया है: अष्टोदरीय का अर्थ है आठ उदरों वाला।

पहले भगवान् आत्रेय अड़तालीस रोगाधिकरण, यानी रोगों के समूह, केवल नाम और संख्या के साथ गिनाते हैं। आठ-आठ भेदों वाले चार समूह हैं: उदर (पेट के रोग), मूत्राघात (मूत्र रुकने के रोग), क्षीरदोष (दूध के दोष) और रेतोदोष (वीर्य के दोष)। फिर सात, छह, पाँच, चार, तीन और दो भेदों वाले समूह आते हैं, जैसे कुष्ठ, अतीसार, कास, अपस्मार, किलास और ज्वर; तीन रोग ऐसे हैं जिनका एक ही भेद है: ऊरुस्तम्भ, संन्यास और महागद; और अन्त में बीस-बीस भेदों वाले तीन समूह हैं: क्रिमि, प्रमेह और योनिव्यापद्। इसके बाद वे उसी क्रम से हर समूह के भेदों के नाम बताते हैं। बहुत-से भेद अपने कारण से पहचाने गए हैं: वात, पित्त, कफ, या सन्निपात, यानी तीनों दोषों का एक साथ बिगड़ना; कहीं इनके साथ कोई और कारण भी गिना गया है, जैसे अश्मरी (पथरी), भय, शोक, मिट्टी खाना या कोई आगन्तु (बाहरी) कारण। कुछ समूहों के बारे में इतना ही कहा गया है कि वे किसी दूसरे समूह की तरह समझे जाएँ, जैसे प्लीहा के दोष गुल्म की तरह।

फिर अध्याय वह नियम बताता है जो इन सब सूचियों के पीछे है। सारे निज रोग, यानी जो शरीर के भीतर से, अपनी धातुओं की विषमता से होते हैं, वात, पित्त और कफ के सिवा कहीं और से नहीं होते: जैसे पक्षी दिन भर उड़कर भी अपनी छाया को नहीं लाँघता, वैसे ही ये रोग तीन दोषों को नहीं लाँघते। बुद्धिमान लोग दोषों के स्थान, संस्थान और प्रकृति की विशेषताओं को परखकर ऐसे सभी रोगों को उन्हीं दोषों के नाम से बताते हैं। आगन्तु रोग, जो बाहरी कारण से होते हैं, इनसे भिन्न हैं। पर दोनों एक-दूसरे के पीछे आ सकते हैं: आगन्तु रोग निज रोग के पीछे आता है, और बढ़ा हुआ निज रोग आगन्तु के पीछे। ऐसी स्थिति में, अध्याय कहता है, अनुबन्ध, यानी पीछे जुड़े रोग, और प्रकृति, जो यहाँ सम्भवतः मूल रोग है, दोनों को ठीक-ठीक जानकर ही चिकित्सा आरम्भ की जाए।

अध्याय दो संग्रह-श्लोकों से समाप्त होता है, जो पूरी गिनती को भेदों की संख्या के अनुसार दोहराते हैं: बीस, एक और तीन भेदों वाले तीन-तीन समूह, दो भेदों वाले आठ, चार वाले दस, पाँच वाले बारह, आठ वाले चार, छह वाले दो और सात वाले तीन; ये श्लोक इस अध्याय को रोगों का अध्याय कहते हैं। इससे मुख्य बात यह निकलती है कि अध्याय के अनुसार शरीर के भीतर से होने वाला हर रोग वात, पित्त और कफ पर ही टिका है, और बाहरी कारण से होने वाले रोग इनसे अलग गिने जाते हैं।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ८-९)

तत्र श्लोकौविंशकाश्चैककाश्चैव त्रिकाश्चोक्तास्त्रयस्त्रयः ।द्विकाश्चाष्टौ चतुष्काश्च दश द्वादश पञ्चकाः ॥

श्लोक ८ →

इस विषय में (सार के) दो श्लोक (हैं): बीस भेदों वाले, एक भेद वाले और तीन भेदों वाले (रोग-वर्ग) तीन-तीन कहे गए हैं; दो भेदों वाले (वर्ग) आठ, चार भेदों वाले दस और पाँच भेदों वाले बारह (हैं)।

चत्वारश्चाष्टका वर्गाः षट्कौ द्वौ सप्तकास्त्रयः ।अष्टोदरीये रोगाणां रोगाध्याये प्रकाशिताः ॥

श्लोक ९ →

और आठ भेदों वाले चार वर्ग, छह भेदों वाले दो और सात भेदों वाले तीन (वर्ग): रोगों के (ये सब वर्ग) अष्टोदरीय नामक रोग-अध्याय में प्रकाशित किए गए हैं।

मुख्य शब्द (१२) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. सू. १९/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम अष्टोदरीय (आठ उदर रोगों सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. १९/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. १९/३

, , , ; , , ; , , , , , , , , , , , , , ; , , , , , , , , , ; , , ; , , , , , , , ; , , ; , , ; ॥ ३ ॥

यहाँ (इस शास्त्र में) आठ उदर (रोग), आठ मूत्राघात, आठ क्षीरदोष, आठ रेतोदोष; सात कुष्ठ, सात पिडकाएँ, सात विसर्प; छह अतीसार, छह उदावर्त; पाँच गुल्म, पाँच प्लीहदोष, पाँच कास, पाँच श्वास, पाँच हिक्का, पाँच तृष्णा, पाँच छर्दि, भोजन न करने (अरुचि) के पाँच स्थान, पाँच शिरोरोग, पाँच हृद्रोग, पाँच पाण्डुरोग, पाँच उन्माद; चार अपस्मार, चार अक्षिरोग, चार कर्णरोग, चार प्रतिश्याय, चार मुखरोग, चार ग्रहणीदोष, चार मद, चार मूर्च्छाय, चार शोष, चार क्लैब्य; तीन शोफ, तीन किलास, तीन प्रकार का लोहितपित्त; दो ज्वर, दो व्रण, दो आयाम, दो गृध्रसी, दो कामला, दो प्रकार का आम, दो प्रकार का वातरक्त, दो प्रकार के अर्श; एक ऊरुस्तम्भ, एक संन्यास, एक महागद; बीस क्रिमिजातियाँ (कृमियों के प्रकार), बीस प्रमेह, बीस योनिव्यापद्; इस प्रकार इस संग्रह में अड़तालीस रोगाधिकरण (रोगों के समूह) गिनाए गए हैं।

च. सू. १९/४

- , , , (); , , (); , (); , , , , , , , , , , , (); , , , (); , , (); , , , , , , , (); , , (); , , , ; , , ; , , - (); ॥ ४ ॥

इन्हें (अब हम) उद्देश के क्रम से नाम लेकर बताएँगे: आठ उदर हैं - वात, पित्त, कफ, सन्निपात, प्लीहा, बद्ध और छिद्र के उदर, और दकोदर; आठ मूत्राघात हैं - वात, पित्त, कफ, सन्निपात, अश्मरी, शर्करा, शुक्र और शोणित से उत्पन्न; आठ क्षीरदोष हैं - वैवर्ण्य (रंग का बिगड़ना), वैगन्ध्य (गन्ध का बिगड़ना), वैरस्य (स्वाद का बिगड़ना), पैच्छिल्य (चिपचिपापन), फेनसंघात (झाग का जमाव), रौक्ष्य (रूखापन), गौरव (भारीपन) और अतिस्नेह (अत्यधिक चिकनाई); आठ रेतोदोष हैं - तनु (पतला), शुष्क (सूखा), फेनिल (झागदार), अश्वेत (जो सफ़ेद न हो), पूति (दुर्गन्ध वाला), अतिपिच्छल (बहुत चिपचिपा), अन्यधातूपहित (दूसरी धातु से मिला हुआ) और अवसादि; सात कुष्ठ हैं - कपाल, उदुम्बर, मण्डल, ऋष्यजिह्व, पुण्डरीक, सिध्म और काकण; सात पिडकाएँ हैं - शराविका, कच्छपिका, जालिनी, सर्षपी, अलजी, विनता और विद्रधी; सात विसर्प हैं - वात, पित्त, कफ, अग्नि, कर्दमक, ग्रन्थि और सन्निपात नाम वाले; छह अतीसार हैं - वात, पित्त, कफ, सन्निपात, भय और शोक से उत्पन्न; छह उदावर्त हैं - वात, मूत्र, पुरीष (मल), शुक्र, छर्दि (वमन) और क्षवथु (छींक) से उत्पन्न; पाँच गुल्म हैं - वात, पित्त, कफ, सन्निपात और शोणित से उत्पन्न; पाँच प्लीहदोष गुल्मों (के वर्णन) से ही बताए गए (समझें); पाँच कास हैं - वात, पित्त, कफ, क्षत और क्षय से उत्पन्न; पाँच श्वास हैं - महा, ऊर्ध्व, छिन्न, तमक और क्षुद्र; पाँच हिक्काएँ हैं - महती, गम्भीरा, व्यपेता, क्षुद्रा और अन्नजा; पाँच तृष्णाएँ हैं - वात, पित्त, आम, क्षय और उपसर्ग स्वरूप वाली; पाँच छर्दियाँ हैं - (एक) द्विष्ट (अप्रिय) अर्थों के संयोग से उत्पन्न, और (शेष) वात, पित्त, कफ और सन्निपात के उद्रेक (बढ़ने) से उठने वाली; भक्त के अनशन (भोजन न कर पाने) के पाँच स्थान हैं - वात, पित्त, कफ, सन्निपात और द्वेष; पाँच शिरोरोग हैं - पहले के उद्देश को समेटकर (कहें तो) वात, पित्त, कफ, सन्निपात और क्रिमि से उत्पन्न; पाँच हृद्रोग शिरोरोगों (के वर्णन) से ही बताए गए (समझें); पाँच पाण्डुरोग हैं - वात, पित्त, कफ, सन्निपात और मृद्भक्षण (मिट्टी खाने) से उत्पन्न; पाँच उन्माद हैं - वात, पित्त, कफ, सन्निपात और आगन्तु निमित्त वाले; चार अपस्मार हैं - वात, पित्त, कफ और सन्निपात निमित्त वाले; चार अक्षिरोग, चार कर्णरोग, चार प्रतिश्याय, चार मुखरोग, चार ग्रहणीदोष, चार मद और चार मूर्च्छाय अपस्मारों (के वर्णन) से ही बताए गए (समझें); चार शोष हैं - साहस, सन्धारण, क्षय और विषमाशन से उत्पन्न; चार क्लैब्य हैं - बीज के उपघात से, ध्वज के भङ्ग से, जरा से और शुक्र के क्षय से; तीन शोथ हैं - वात, पित्त और श्लेष्मा निमित्त वाले; तीन किलास हैं - रक्त (लाल), ताम्र (ताँबे के रंग के) और शुक्ल (सफ़ेद); तीन प्रकार का लोहितपित्त है - ऊर्ध्वभाग (ऊपर की ओर वाला), अधोभाग (नीचे की ओर वाला) और उभयभाग (दोनों ओर वाला); दो ज्वर हैं - उष्ण की इच्छा वाला और शीत से उत्पन्न, तथा शीत की इच्छा वाला और उष्ण से उत्पन्न; दो व्रण हैं - निज और आगन्तुज; दो आयाम हैं - बाह्य और अभ्यन्तर; दो गृध्रसी हैं - वात से और वात-कफ से; दो कामला हैं - कोष्ठ में आश्रित और शाखा में आश्रित; दो प्रकार का आम है - अलसक और विसूचिका; दो प्रकार का वातरक्त है - गम्भीर और उत्तान; दो प्रकार के अर्श हैं - शुष्क और आर्द्र; एक ऊरुस्तम्भ है - आम और त्रिदोष से उत्पन्न; एक संन्यास है - त्रिदोषात्मक, और मन तथा शरीर में अधिष्ठित; एक महागद है - अतत्त्वाभिनिवेश; बीस क्रिमिजातियाँ हैं - यूका और पिपीलिका, ये दो प्रकार के बाहरी मल से उत्पन्न; केशाद, लोमाद, लोमद्वीप, सौरस, औदुम्बर और जन्तुमातर, ये छह शोणित से उत्पन्न; अन्त्राद, उदरावेष्ट, हृदयाद, चुरु, दर्भपुष्प, सौगन्धिक और महागुद, ये सात कफ से उत्पन्न; ककेरुक, मकेरुक, लेलिह, सशूलक और सौसुराद, ये पाँच पुरीष से उत्पन्न; बीस प्रमेह हैं - उदकमेह, इक्षुबालिकारसमेह, सान्द्रमेह, सान्द्रप्रसादमेह, शुक्लमेह, शुक्रमेह, शीतमेह, शनैर्मेह, सिकतामेह और लालामेह, ये दस श्लेष्मा निमित्त वाले; क्षारमेह, कालमेह, नीलमेह, लोहितमेह, मञ्जिष्ठामेह, हरिद्रामेह, हस्तिमेह और मधुमेह, ये चार वात निमित्त वाले; इस प्रकार बीस प्रमेह (हुए); बीस योनिव्यापद् हैं - वातिकी, पैत्तिकी, श्लेष्मिकी और सान्निपातिकी, ये चार दोषों से उत्पन्न; शेष सोलह दोष, दूष्य, संसर्ग और प्रकृति के निर्देशों से बताई जाती हैं, जैसे - रक्तयोनि, अरजस्का, अचरणा, अतिचरणा, प्राक्चरणा, उपप्लुता, परिप्लुता, उदावर्तिनी, कर्णिनी, पुत्रघ्नी, अन्तर्मुखी, सूचीमुखी, शुष्का, वामिनी, षण्ढयोनि और महायोनि; इस प्रकार बीस योनिव्यापद् होती हैं। और यह सम्पूर्ण उद्देश उद्देश के क्रम से नाम लेकर बता दिया गया है।

च. सू. १९/५

। ॥ ५ ॥

सारे ही निज (शरीर के भीतर से उत्पन्न) विकार वात, पित्त और कफ के सिवा और कहीं से उत्पन्न नहीं होते। जैसे पक्षी सारे दिन भी (इधर-उधर) उड़ता हुआ अपनी छाया को नहीं लाँघता, वैसे ही अपनी धातुओं की विषमता के कारण होने वाले सभी विकार वात, पित्त और कफ को नहीं लाँघते। और बुद्धिमान (जन) वात, पित्त और श्लेष्मा के स्थान, संस्थान (रूप) और प्रकृति (स्वभाव) की विशेषताओं को भली-भाँति देखकर, उनके स्वरूप वाले सभी विकारों को भी उन्हीं (वात, पित्त, श्लेष्मा) के रूप में बताते हैं।

च. सू. १९/६

। ॥ ६ ॥

और इस विषय में (ये दो श्लोक) हैं: अपनी धातुओं की विषमता के कारण उत्पन्न होने वाले जो अनेक विकार-समूह शरीर में (होते) हैं, वे पित्त, कफ और अनिल (वात) से अलग नहीं हैं; परन्तु आगन्तु (विकार) तो उनसे भिन्न ही हैं।

च. सू. १९/७

। ॥ ७ ॥

आगन्तु (विकार) निज विकार के पीछे आता है, और उसी प्रकार बढ़ा हुआ निज (विकार) भी आगन्तु के पीछे आता है। वहाँ (ऐसी स्थिति में) अनुबन्ध (पीछे से जुड़े विकार) और प्रकृति (मूल विकार) को भली-भाँति जानकर, तब (वैद्य) कर्म (चिकित्सा) आरम्भ करे।

च. सू. १९/८

। ॥ ८ ॥

इस विषय में (सार के) दो श्लोक (हैं): बीस भेदों वाले, एक भेद वाले और तीन भेदों वाले (रोग-वर्ग) तीन-तीन कहे गए हैं; दो भेदों वाले (वर्ग) आठ, चार भेदों वाले दस और पाँच भेदों वाले बारह (हैं)।

च. सू. १९/९

। ॥ ९ ॥

और आठ भेदों वाले चार वर्ग, छह भेदों वाले दो और सात भेदों वाले तीन (वर्ग): रोगों के (ये सब वर्ग) अष्टोदरीय नामक रोग-अध्याय में प्रकाशित किए गए हैं।

च. सू. १९

॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान (सूत्रस्थान) में अष्टोदरीय नामक उन्नीसवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।