भारत संहिता

अध्याय ३

आरग्वधीयोऽध्यायः

आरग्वध (अमलतास) आदि के लेप

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भूमिका

आरग्वधीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का तीसरा अध्याय है। इसका नाम इसकी पहली सूची के पहले शब्द 'आरग्वधः' से पड़ा है; आरग्वध वही वृक्ष है जिसे हिन्दी में अमलतास कहते हैं। पिछले अध्यायों की तरह इस अध्याय का उपदेश भी भगवान् आत्रेय का है। पूरा अध्याय प्रदेहों का वर्णन करता है। प्रदेह औषधियों का गाढ़ा लेप है, जो शरीर पर बाहर से लगाया जाता है; अध्याय में लेप और आलेपन शब्द भी इसी अर्थ में आते हैं। पहले त्वचा के रोगों के लेप आते हैं, और फिर वात की पीड़ा, सिर और पसलियों की पीड़ा, ठंड, विष और शरीर की दुर्गन्ध जैसे कष्टों के।

अध्याय औषधियों की सूचियों से आरम्भ होता है, जिनमें हर आधा श्लोक एक समूह है; ऐसे छह समूह हैं। इनके चूर्ण को गाय के पित्त में भिगोकर, फिर से पीसकर और सरसों के तेल में मिलाकर लेप बनाया जाता है; यहाँ पित्त शरीर का दोष नहीं, बल्कि गाय के पित्ताशय का द्रव है। अध्याय कहता है कि ये लेप कठिन कुष्ठ, नए किलास, सुरेशलुप्त, किटिभ, दद्रु (दाद), भगन्दर, अर्श (बवासीर), अपची और पामा को शीघ्र नष्ट करते हैं। आयुर्वेद में कुष्ठ त्वचा के रोगों का एक बड़ा वर्ग है, केवल आज का कोढ़ नहीं। इसके बाद और योग आते हैं, जिनमें लेप बनाने और लगाने के ढंग अलग-अलग हैं: छाछ में पीसे गए चूर्णों से तेल लगे शरीर को मलना (उद्वर्तन), तेल लगे शरीर पर चूर्ण बुरकना (अवचूर्णन), गोमूत्र में या कैथ के रस में बने लेप, और तुषोदक (खट्टी कांजी) और पलाश को जलाकर मिले रस के साथ पकाया गया दर्वीप्रलेप। इन योगों में पौधों के साथ मनःशिला, हरताल, कसीस और तुत्थ जैसे खनिज भी हैं।

फिर अध्याय वात के रोगों की ओर मुड़ता है। वात आयुर्वेद के तीन दोषों में से एक है, जो शरीर में गति और संचार से जुड़ा है। वात के रोगियों के लिए कोल (बेर), कुलत्थ (कुलथी), माष (उड़द), अतसी (अलसी) और जौ के चूर्ण जैसे द्रव्यों का गर्म प्रदेह बताया गया है; आनूप (जल-बहुल प्रदेश के) पशुओं और मछलियों के मांस से बने गर्म वेसवार का प्रदेह; और दशमूल और सुगन्धित औषधियों से मिले चार स्नेहों (चिकनाई वाले पदार्थों) का प्रदेह। पेट की पीड़ा के लिए छाछ और क्षार के साथ गर्म जौ का चूर्ण कहा गया है। जिस अवस्था में वात के साथ रक्त भी जुड़ा हो, जो सम्भवतः वातरक्त नाम का रोग है, उसके लिए घी, दूध, मधुक (मुलेठी), सितोपला (मिश्री) और गेहूँ के आटे जैसे द्रव्यों के कई प्रदेह हैं।

इसके बाद दूसरे कष्टों के लेप आते हैं: सिर की पीड़ा के लिए घी के साथ चन्दन, कूठ नाम की औषधि, नत और उत्पल जैसे द्रव्यों के प्रदेह; पार्श्व (पसलियों के क्षेत्र) की पीड़ा के लिए घी और तेल के साथ गुनगुना लेप; पद्म (कमल), उत्पल, चन्दन और दूर्वा (दूब) जैसे द्रव्यों के निर्वापण, यानी ठंडक देने वाले, प्रदेह; ठंड को शीघ्र दूर करने वाला प्रदेह; और सिन्धुवार के साथ शिरीष का, विष को नष्ट करने वाला प्रदेह। अन्त में त्वचा के दोषों और पसीने को दूर करने वाला प्रघर्ष (शरीर पर रगड़ना) और शरीर की दुर्गन्ध दूर करने वाला एक प्रदेह बताया गया है।

अध्याय का सार-श्लोक कहता है कि सिद्धों और महर्षियों द्वारा पूजनीय, अत्रि से उत्पन्न भगवान् आत्रेय ने संसार के हित के लिए इस अध्याय में अनेक प्रकार के रोगों को नष्ट करने वाले बत्तीस चूर्णप्रदेह कहे। पूरे अध्याय में हर लेप के साथ उसकी औषधियाँ ही नहीं, यह भी बताया गया है कि वह किस द्रव के साथ बनता है, जैसे गाय का पित्त, छाछ, गोमूत्र, कांजी, तेल, घी या दूध, और कैसे लगाया जाता है: लेप के रूप में, मलकर या बुरककर। वात के रोगों के कई लेप गर्म कहे गए हैं, और कुछ लेप ठंडक देने के लिए हैं।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ३०)

तत्र श्लोकः -इहात्रिजः सिद्धतमानुवाच द्वात्रिंशतं सिद्धमहर्षिपूज्यः।चूर्णप्रदेहान् विविधामयघ्नानारग्वधीये जगतो हितार्थम्॥

श्लोक ३० →

इस विषय में (सार रूप) श्लोक (है): यहाँ आरग्वधीय (अध्याय) में सिद्धों और महर्षियों द्वारा पूजनीय अत्रिज (अत्रि के पुत्र आत्रेय) ने जगत् (संसार) के हित के लिए अनेक प्रकार के रोगों को नष्ट करने वाले, अत्यन्त सिद्ध (प्रभावी) बत्तीस चूर्णप्रदेह (चूर्ण से बने लेप) कहे।

मुख्य शब्द (८) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
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शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
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अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

शरीर
शरीर - देह
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शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
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अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
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शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
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शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
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शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

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च. सू. ३/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम आरग्वधीय (आरग्वध सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. ३/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. ३/३

। ॥ ३ ॥

एडगज सहित आरग्वध (अमलतास), करञ्ज, वासा (अडूसा), गुडूची (गिलोय), मदन (मैनफल) और दोनों हरिद्रा; श्र्याह्व, सुराह्व (देवदारु), खदिर (खैर) और धव, निम्ब (नीम), विडङ्ग (वायविडंग) और करवीरक (कनेर) की छाल,

च. सू. ३/४

। ॥ ४ ॥

और भूर्ज (भोजपत्र के वृक्ष) की ग्रन्थि (गाँठ), लशुन (लहसुन), लोमश सहित शिरीष (सिरस), गुग्गुलु (गूगल) और कृष्णगन्धा; फणिज्झक, वत्सक और सप्तपर्ण, पीलु (के फल), कुष्ठ (कूठ) और सुमनस् की कोंपलें,

च. सू. ३/५

। ॥ ५ ॥

वचा (वच), हरेणु, त्रिवृता (निशोथ), निकुम्भ, भल्लातक (भिलावा), गैरिक (गेरू) और अञ्जन; मनःशिला (मैनसिल) और आल (हरताल), गृहधूम (घर की कालिख), एला (इलायची), काशीस (कसीस), लोध्र (लोध), अर्जुन, मुस्त (नागरमोथा) और सर्ज,

च. सू. ३/६

। ॥ ६ ॥

इस प्रकार आधे-आधे (श्लोक) के रूप में बताए गए ये छह (योग), गाय के पित्त में भिगोए हुए (उसे सोखे हुए) और फिर से पीसे गए, अत्यन्त सिद्ध (प्रभावी) हैं; सर्षप (सरसों) के तेल से युक्त (इन) चूर्णप्रदेहों का प्रयोग वैद्य को करना चाहिए।

च. सू. ३/७

। ॥ ७ ॥

प्रयोग किए जाने पर (ये प्रदेह) मनुष्यों के कठिन कुष्ठों (त्वचा रोगों), नए किलास, सुरेशलुप्त (गंज), किटिभ, दद्रु (दाद), भगन्दर, अर्श (बवासीर), अपची और पामा को शीघ्र ही नष्ट कर देते हैं।

च. सू. ३/८

। ॥ ८ ॥

कुष्ठ (कूठ), दोनों हरिद्रा, सुरस, पटोल (परवल), निम्ब (नीम) और अश्वगन्धा, सुरदारु (देवदारु) और शिग्रु (सहजन), सर्षप (सरसों) सहित तुम्बुरु, धान्य और वन्य, और चण्डा: (इन सबके) समान मात्रा में चूर्ण बनाए।

च. सू. ३/९

। ॥ ९ ॥

तक्र (छाछ) में पीसे हुए उन (चूर्णों) से पहले तेल लगे शरीर का उद्वर्तन (मलना) करने का प्रयत्न करे। उससे इसकी खुजली, पिडकाएँ (फुंसियाँ), कोठ (चकत्ते), कुष्ठ और शोफ (सूजन) शान्त हो जाते हैं।

च. सू. ३/१०

। ॥ १० ॥

कुष्ठ (कूठ), अमृतासङ्ग, कटङ्कटेरी, काशीस (कसीस), कम्पिल्लक (कमीला), मुस्त (नागरमोथा), लोध्र (लोध), सौगन्धिक, सर्जरस (राल), विडङ्ग (वायविडंग), मनःशिला (मैनसिल) और आल (हरताल), करवीरक (कनेर) की छाल,

च. सू. ३/११

। ॥ ११ ॥

तेल लगे अङ्गों वाले (मनुष्य) पर अवचूर्णन (बुरकने) के लिए इन (औषधियों) के बनाए हुए चूर्ण दे। इस प्रकार कण्डू (खुजली) सहित दद्रु (दाद), किटिभ, पामा और विचर्चिका भी शान्त हो जाते हैं।

च. सू. ३/१२

। ॥ १२ ॥

मनःशिला (मैनसिल) और आल (हरताल), मरिच (काली मिर्च), तेल और अर्क (आक) का दूध: (यह) प्रदेह कुष्ठ को दूर करने वाला है। तुत्थ (नीला थोथा), विडङ्ग (वायविडंग), मरिच, कुष्ठ (कूठ) और लोध्र (लोध), मनःशिला सहित, (यह प्रदेह) भी उसी प्रकार (कुष्ठ को दूर करने वाला) होता है।

च. सू. ३/१३

। ॥ १३ ॥

प्रपुनाड के बीजों सहित रसाञ्जन (रसौत), कपित्थ (कैथ) के रस से मिलाया हुआ, (एक) लेप है। और कुष्ठ (कूठ) सहित करञ्ज के बीज और एडगज, गाय के मूत्र में पीसे हुए, (एक) श्रेष्ठ प्रदेह है।

च. सू. ३/१४

। ॥ १४ ॥

दोनों हरिद्रा, कुटज के बीज, करञ्ज के बीज, सुमनस् की कोंपलें और हयमारक (कनेर) की मध्य भाग सहित छाल: (इनका) तिल के क्षार से युक्त लेप बनाए।

च. सू. ३/१५

। ॥ १५ ॥

मनःशिला (मैनसिल), कुष्ठ (कूठ) सहित कुटज की छाल, लोमश और एडगज सहित करञ्ज, और भूर्ज (भोजपत्र के वृक्ष) की ग्रन्थि (गाँठ), करवीर (कनेर) की जड़: (इनके) चूर्ण तुषोदक से सिद्ध किए (पकाए) जाने चाहिए,

च. सू. ३/१६

। ॥ १६ ॥

और पलाश (ढाक) को जलाकर (प्राप्त) रस से भी, (हर औषधि के) एक-एक कर्ष (मात्रा में) लिए गए (चूर्ण), एक आढक (मात्रा वाले उस रस) से (सिद्ध किए जाएँ)। कुष्ठ को नष्ट करने के लिए इस श्रेष्ठ लेप को (विद्वान्) दर्वीप्रलेप कहते हैं।

च. सू. ३/१७

। ॥ १७ ॥

चतुरङ्गुल (अमलतास) के पत्तों को, और काकमाची (मकोय) के पत्तों को, तक्र (छाछ) के साथ पीसकर, तेल लगे शरीर वाले मनुष्य के कुष्ठों पर उद्वर्तन करे (मले); और अश्वहन (कनेर) के पत्तों से भी।

च. सू. ३/१८

। ॥ १८ ॥

कोल (बेर), कुलत्थ (कुलथी), सुरदारु (देवदारु), रास्ना, माष (उड़द), अतसी (अलसी), तैलफल (तेल वाले बीज), कुष्ठ (कूठ), वचा (वच), शताह्वा, जौ का चूर्ण और अम्ल (खट्टा द्रव्य): ये गर्म (करके) वात रोग वालों के लिए प्रदेह हैं।

च. सू. ३/१९

। ॥ १९ ॥

आनूप (जल-बहुल प्रदेश के) पशुओं और मछलियों के मांस से बने गर्म वेसवारों से (बना) प्रदेह वात को दूर करने वाला होता है। दशमूल मिले हुए चार स्नेहों से और सुगन्धित औषधियों से (बना) प्रदेह वात को नष्ट करने वाला है।

च. सू. ३/२०

। ॥ २० ॥

तक्र (छाछ) से मिलाया हुआ, क्षार सहित, गर्म जौ का चूर्ण पेट की पीड़ा को नष्ट कर देता है। कुष्ठ (कूठ), शताह्वा और वचा (वच) सहित जौ के चूर्ण को, तेल और अम्ल (खट्टे द्रव्य) के साथ, (विद्वान्) वात में हितकर मानते हैं।

च. सू. ३/२१

। ॥ २१ ॥

दोनों शताह्वा, मधुक (मुलेठी), मधूक (महुआ), बला, प्रियाल (चिरौंजी) और कशेरुक (कसेरू), घृत (घी), विदारी और सितोपला (मिश्री): (इनका) प्रदेह रक्त सहित वात में बनाए।

च. सू. ३/२२

। ॥ २२ ॥

रास्ना, गुडूची (गिलोय), मधुक (मुलेठी), दो (प्रकार की) बला, जीवक और ऋषभक, और दूध; और (इनके साथ) सिद्ध किया (पकाया) गया घी, मधुशेष (मोम) मिलाकर: (यह) प्रदेह रक्त और वात की पीड़ा को दूर करता है।

च. सू. ३/२३

। ॥ २३ ॥

रक्त सहित वात में गोधूम (गेहूँ) का चूर्ण (आटा) और छगली (बकरी) का दूध, घी सहित, प्रदेह (लेप) है। सिर की पीड़ा में चन्दन और कुष्ठ (कूठ) से युक्त नत और उत्पल, घी सहित, प्रदेह है।

च. सू. ३/२४

। ॥ २४ ॥

प्रपौण्डरीक, सुरदारु (देवदारु), कुष्ठ (कूठ), यष्ट्याह्व (मुलेठी), एला (इलायची), और कमल और उत्पल: सिर की पीड़ा में (इनका) घी सहित प्रदेह (लेप) है, और लोह, एरका, पद्मक और चोरक से (भी)।

च. सू. ३/२५

। ॥ २५ ॥

रास्ना, दोनों हरिद्रा, नलद, दोनों शताह्वा, देवदारु, सितोपला (मिश्री) और जीवन्ती की जड़, घी और तेल सहित, पार्श्व (पसलियों के क्षेत्र) की पीड़ाओं में गुनगुना आलेपन (लेप) है।

च. सू. ३/२६

। ॥ २६ ॥

शैवाल, पद्म (कमल), उत्पल, वेत्र (बेंत), तुङ्ग, प्रपौण्डरीक, अमृणाल और लोध्र (लोध), प्रियङ्गु, कालेयक और चन्दन, (इनका) घी सहित प्रदेह (लेप) निर्वापण (ठंडक देने वाला) होता है।

च. सू. ३/२७

। ॥ २७ ॥

सिता (सफेद शक्कर), लता, वेतस, पद्मक, यष्ट्याह्व (मुलेठी), ऐन्द्री, नलिन (कमल), दूर्वा (दूब), यवास (जवासा) की जड़, और कुश और काश (काँस) की (जड़), जल और एरका, (इनका प्रदेह) निर्वापण (ठंडक देने वाला) होता है।

च. सू. ३/२८

। ॥ २८ ॥

शैलेय, एला (इलायची) और अगुरु (अगर) कुष्ठ (कूठ) सहित, चण्डा, नत, त्वक् (दालचीनी), सुरदारु (देवदारु) और रास्ना, (इनका) प्रदेह (लेप) शीत (ठंड) को शीघ्र नष्ट कर देता है। और सिन्धुवार (निर्गुण्डी) सहित शिरीष (सिरस) (का प्रदेह) विष को (नष्ट करता है)।

च. सू. ३/२९

। ॥ २९ ॥

शिरीष (सिरस), लामज्जक, हेम और लोध्र (लोध) से (किया गया) प्रघर्ष (शरीर पर रगड़ना) त्वचा के दोषों और (अधिक) पसीने को दूर करता है। पत्र, अम्बु, लोध्र, अभय और चन्दन, (इनका) प्रदेह (लेप) शरीर की दुर्गन्ध को दूर करता है।

च. सू. ३/३०

- । ॥ ३० ॥

इस विषय में (सार रूप) श्लोक (है): यहाँ आरग्वधीय (अध्याय) में सिद्धों और महर्षियों द्वारा पूजनीय अत्रिज (अत्रि के पुत्र आत्रेय) ने जगत् (संसार) के हित के लिए अनेक प्रकार के रोगों को नष्ट करने वाले, अत्यन्त सिद्ध (प्रभावी) बत्तीस चूर्णप्रदेह (चूर्ण से बने लेप) कहे।

च. सू. ३

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में आरग्वधीय नामक तीसरा अध्याय (पूरा हुआ)।