भारत संहिता

अध्याय २१

अष्टौनिन्दितीयोऽध्यायः

आठ निन्दित शरीर

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भूमिका

अष्टौनिन्दितीय अध्याय चरक संहिता के सूत्रस्थान का इक्कीसवाँ अध्याय है, और इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। इसका नाम इसके पहले कथन से आया है कि शरीर की दृष्टि से आठ प्रकार के पुरुष निन्दित होते हैं: 'अष्टौ' यानी आठ, और 'निन्दित' यानी निन्दा के योग्य; इसीलिए इसका हिन्दी शीर्षक 'आठ निन्दित शरीर' है। ये आठ चार उलटे जोड़ों में गिनाए गए हैं: बहुत लम्बा और बहुत नाटा, बहुत रोमों वाला और बिना रोमों का, बहुत काला और बहुत गोरा, तथा अतिस्थूल (बहुत मोटा) और अतिकृश (बहुत दुबला)। अध्याय का पहला भाग इनमें से अन्तिम दो का है, और दूसरा भाग निद्रा (नींद) का; अध्याय स्वयं कहता है कि मोटापा और दुबलापन विशेष रूप से नींद और आहार से ही उत्पन्न होते हैं।

भगवान् आत्रेय बताते हैं कि आठों में अतिस्थूल और अतिकृश और भी अधिक निन्दित हैं, और पहले अतिस्थूल का वर्णन करते हैं। उसके आठ दोष, यानी हानियाँ, हैं: आयु का घटना, गति में रुकावट, मैथुन में कठिनाई, दुर्बलता, दुर्गन्ध, पसीने का कष्ट, और बहुत अधिक भूख और प्यास। इस मोटापे के कारण बताए गए हैं: बहुत भरपेट खाना, भारी, मीठे, ठंडे और चिकने पदार्थों का सेवन, व्यायाम और मैथुन न करना, दिन में सोना, सदा प्रसन्न रहना, चिन्तन न करना, और बीज का स्वभाव। मूल बात यह कही गई है कि ऐसे व्यक्ति में केवल मेद (चर्बी) बढ़ता है, दूसरी धातुएँ उस तरह नहीं बढ़तीं, और हर दोष इसी से समझाया गया है। मेद से मार्ग ढक जाने के कारण वायु कोष्ठ (पेट के भीतरी भाग) में घूमकर अग्नि (पाचन की शक्ति) को भड़काता है, इसलिए वह भोजन जल्दी पचा लेता है और बहुत खाना चाहता है; ग्रन्थ के अनुसार ये अग्नि और वायु उसे वैसे ही जला डालते हैं जैसे वन की आग वन को, और मेद के बहुत बढ़ने पर वात आदि भयंकर रोग उत्पन्न करके जीवन को शीघ्र नष्ट कर देते हैं। उसकी पहचान है हिलते हुए नितम्ब, पेट और स्तन, और ऐसा उपचय (शरीर की बढ़त) और उत्साह जो उचित नहीं।

फिर अतिकार्श्य, यानी बहुत अधिक दुबलेपन, का वर्णन आता है। उसके कारण गिनाए गए हैं: रूखा अन्न-पान, लङ्घन (उपवास), बहुत थोड़ा भोजन, चिकित्सा-कर्मों का अतियोग, शोक, वेगों और नींद को रोकना, रूखा उबटन, बार-बार स्नान, प्रकृति, बुढ़ापा, रोग का पीछे लगे रहना और क्रोध। दुबला व्यक्ति व्यायाम, बहुत अधिक भोजन, भूख, प्यास, रोग, औषध, अधिक सर्दी, गर्मी और मैथुन नहीं सह पाता, और तिल्ली, खाँसी, क्षय, श्वास, गुल्म, बवासीर, उदर और ग्रहणी के रोग प्रायः उसे घेर लेते हैं; उसके नितम्ब, पेट और गर्दन सूखे होते हैं, नसों का जाल दिखता है, जोड़ उभरे होते हैं और मानो त्वचा और हड्डियाँ ही शेष रहती हैं। आत्रेय कहते हैं कि ये दोनों सदा रोगी रहते हैं, और मोटापे और दुबलेपन में दुबलापन अच्छा है, क्योंकि समान साधन होने पर भी रोग मोटे को ही अधिक पीड़ा देता है। इसके विपरीत, जिसका मांस, शरीर का माप और गठन सम हो और इन्द्रियाँ दृढ़ हों, वह रोगों से नहीं दबता और भूख, प्यास, धूप, सर्दी और व्यायाम सह लेता है। चिकित्सा का सिद्धान्त यह दिया गया है कि स्थूल का कर्शन (शरीर घटाना) भारी पर पोषण न देने वाले आहार से हो, और कृश का बृंहण (शरीर बढ़ाना) हल्के पर पोषण देने वाले आहार से। स्थूल के लिए ग्रन्थ वात को नष्ट करने वाले और कफ और मेद को घटाने वाले अन्न-पान, रूखी बस्तियाँ और उबटन, अनेक औषध-द्रव्य, कई धान्य और दालें, अरिष्ट, और क्रम से बढ़ाए गए जागरण, मैथुन, व्यायाम और चिन्तन गिनाता है; कृश के लिए नींद, प्रसन्नता, सुखद शय्या, मन की शान्ति, चिन्ता, मैथुन और व्यायाम से विराम, नए अन्न, मांस-रस, दही, घी, दूध, गुड़ से बनी वस्तुएँ, स्निग्ध बस्तियाँ, तेल की मालिश, और रसायन और वृष्य योग। इस भाग का अन्त इस कथन से होता है कि चिन्ता न करने, सन्तर्पण और बहुत सोने से मनुष्य वराह (सूअर) की तरह पुष्ट हो जाता है।

यहीं से अध्याय निद्रा की ओर मुड़ता है। ग्रन्थ के अनुसार जब मन थक जाता है और इन्द्रियाँ भी थककर अपने विषयों से हट जाती हैं, तब मनुष्य सोता है; और सुख और दुःख, पुष्टि और दुबलापन, बल और दुर्बलता, पुंसत्व और नपुंसकता, ज्ञान और अज्ञान, और जीवन और मृत्यु भी नींद के अधीन हैं। असमय, बहुत अधिक या बिल्कुल न ली गई नींद सुख और आयु को दूसरी कालरात्रि की तरह हर लेती है, और उचित नींद शरीर को सुख और आयु से वैसे ही जोड़ती है जैसे सच्ची बुद्धि योगी को सिद्धि से। फिर दिन में सोने के नियम आते हैं। गाने, पढ़ने, मद्य, स्त्री-सङ्ग, श्रम, बोझ और यात्रा से थककर दुबले हुए लोग, अनेक रोगी, घायल, क्षीण, वृद्ध, बालक और दुर्बल, क्रोध, शोक या भय से थके लोग, और दिन में सोने के अभ्यस्त लोग ग्रन्थ के अनुसार हर ऋतु में दिन में सो सकते हैं, क्योंकि इससे उनकी धातुएँ सम होती हैं, बल आता है और आयु स्थिर होती है। ग्रीष्म में, जब शरीर रूखे होते हैं, वात बढ़ रहा होता है और रातें बहुत छोटी होती हैं, दिन की नींद प्रशस्त मानी गई है; बाकी ऋतुओं में वह कफ और पित्त को प्रकुपित करती है। मोटे, नित्य स्नेह लेने वाले, कफ की अधिकता वाले, कफ के रोगी और दूषीविष से पीड़ित लोगों के लिए ग्रन्थ दिन में सोना कभी ठीक नहीं मानता, और अनुचित दिन की नींद से होने वाले बहुत-से कष्ट गिनाता है, जैसे हलीमक, सिर का दर्द, शरीर का भारीपन, अग्नि का नाश, सूजन, खुजली, ज्वर, और स्मृति और बुद्धि का कुण्ठित होना।

अध्याय कहता है कि शरीर को बनाए रखने के लिए जैसे आहार है, वैसे ही नींद है। फिर वह चली गई नींद को लौटाने वाले उपाय बताता है, जैसे मालिश, उबटन, स्नान, मांस-रस, दही के साथ भात, दूध, मन को भाने वाली गन्ध और शब्द, शरीर दबाना, अच्छा बिछौना और सोने का अभ्यस्त समय; और बहुत अधिक नींद को रोकने वाले उपाय, जैसे शरीर और सिर का शोधन, वमन, भय, चिन्ता, क्रोध, व्यायाम, उपवास और असुखकर शय्या, जिन्हें वह नींद न आने के कारण भी मानता है। अन्त में निद्रा के भेद गिनाए गए हैं: तम से, कफ से, मन और शरीर की थकान से, बाहरी कारण से, रोग के साथ, और रात के स्वभाव से होने वाली। रात के स्वभाव से आने वाली नींद को भूतधात्री, यानी सब प्राणियों का पोषण करने वाली, कहा गया है, तम से होने वाली को पाप का मूल, और बाकी को रोगों में गिना गया है। संग्रह के श्लोक इन सब विषयों को दोहराते हैं और बताते हैं कि यह सब अत्रि के पुत्र पुनर्वसु ने कहा। इस अध्याय से यह बात साथ ले जाने योग्य है कि इसके आठों निन्दित शरीर किसी न किसी सीमा से बाहर की अवस्था के हैं, कि यह सन्तुलित शरीर को रोगों के सामने दृढ़ मानता है, और कि यह आहार के साथ नींद को भी शरीर के बढ़ने और घटने का मुख्य कारण मानता है: उचित नींद जीवन को सहारा देती है, और अनुचित नींद रोग लाती है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ६०-६२)

तत्र श्लोकाःनिन्दिताः पुरुषास्तेषां यौ विशेषेण निन्दितौ ।निन्दिते कारणं दोषास्तयोर्निन्दितभेषजम् ॥

श्लोक ६० →

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक (ये हैं): निन्दित पुरुष, उनमें से जो दो विशेष रूप से निन्दित हैं, (उनकी) निन्दित दशा का कारण, (उनके) दोष, और उन दोनों निन्दितों की चिकित्सा,

येभ्यो यदा हिता निद्रा येभ्यश्चाप्यहिता यदा ।अतिनिद्रायानिद्राय भेषजं यद्भवा च सा ॥

श्लोक ६१ →

जिनके लिए और जब निद्रा हितकर है, और जिनके लिए और जब अहितकर भी है, अधिक निद्रा वाले और निद्रा न आने वाले (व्यक्ति) के लिए भेषज (चिकित्सा), और वह (निद्रा) जिससे उत्पन्न होती है,

या या यथाप्रभावा च निद्र तत् सर्वमत्रिजः ।अष्तुनिन्दितसंख्याते व्याजहर पुनर्वसुः ॥

श्लोक ६२ →

(और) जो-जो निद्रा है और (वह) जैसे प्रभाव वाली है, वह सब अत्रि के पुत्र पुनर्वसु ने अष्टौनिन्दित (आठ निन्दित) नाम से गिने जाने वाले (इस अध्याय) में कहा।

मुख्य शब्द (२२) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

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च. सू. २१/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम अष्टौनिन्दितीय (आठ निन्दित पुरुषों सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. २१/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. २१/३

; - , , , , , , , ॥ ३ ॥

यहाँ (इस शास्त्र में) शरीर की दृष्टि से आठ (प्रकार के) पुरुष निश्चय ही निन्दित (निन्दा के योग्य) होते हैं, जैसे कि: अत्यधिक लम्बा, अत्यधिक नाटा, अत्यधिक रोमों वाला, रोमों से रहित, अत्यधिक काला, अत्यधिक गोरा, अत्यधिक स्थूल (मोटा) और अत्यधिक कृश (दुबला)।

च. सू. २१/४

। । । , ; , , , , , ॥ ४ ॥

उनमें से अत्यधिक स्थूल और अत्यधिक कृश (पुरुषों) की और भी अन्य निन्दित विशेषताएँ (दोष) होती हैं। अत्यधिक स्थूल के तो ये आठ दोष होते हैं: आयु का ह्रास (घटना), जव (गति) में रुकावट, मैथुन में कठिनाई, दुर्बलता, दुर्गन्ध, स्वेद (पसीने) से कष्ट, भूख का अत्यधिक होना और प्यास का अतियोग (अत्यधिक लगना)। वह अतिस्थौल्य (अत्यधिक मोटापा) अत्यधिक पेट भरकर खाने से, गुरु, मधुर, शीत और स्निग्ध (पदार्थों) के सेवन से, व्यायाम न करने से, मैथुन न करने से, दिन में सोने से, सदा हर्षित रहने से, चिन्तन न करने से और बीज के स्वभाव से उत्पन्न होता है। क्योंकि उस अत्यधिक मेद वाले (पुरुष) का मेद ही बढ़ता है, दूसरी धातुएँ वैसे नहीं (बढ़तीं), इसलिए उसकी आयु का ह्रास होता है; मेद की शिथिलता, सुकुमारता और भारीपन से जव (गति) में रुकावट होती है; शुक्र के अधिक न होने से और मेद से मार्ग ढके होने से मैथुन में कठिनाई होती है; धातुओं के सम न होने से दुर्बलता होती है; मेद के दोष से, मेद के स्वभाव से और (उसके) स्वेद लाने वाला होने से दुर्गन्ध होती है; मेद का श्लेष्मा से संसर्ग होने, (उसके) विष्यन्दी (बहने वाला) होने, अधिक होने, भारी होने और व्यायाम न सह सकने से स्वेद का कष्ट होता है; (और) अग्नि के तीक्ष्ण होने और कोष्ठ में वायु के अधिक होने से भूख का अत्यधिक होना और प्यास का अतियोग होता है।

च. सू. २१/५

। ॥ ५ ॥

और इस विषय में (ये श्लोक) हैं: मेद से मार्ग ढके होने के कारण वायु विशेष रूप से कोष्ठ में विचरता हुआ अग्नि को प्रदीप्त करता है और आहार को सुखा भी देता है।

च. सू. २१/६

। ॥ ६ ॥

इसलिए वह (अत्यधिक स्थूल पुरुष) आहार को शीघ्र पचा लेता है और (भोजन की) अत्यधिक इच्छा करता है; और (भोजन का) समय टल जाने से कुछ घोर विकारों (रोगों) को प्राप्त होता है।

च. सू. २१/७

। ॥ ७ ॥

ये दोनों, अग्नि और मारुत (वायु), विशेष रूप से उपद्रव करने वाले हैं; क्योंकि ये दोनों स्थूल (पुरुष) को वैसे ही जला डालते हैं जैसे वन की आग (दावानल) वन को।

च. सू. २१/८

। ॥ ८ ॥

मेद के अत्यधिक बढ़ जाने पर अनिल (वात) आदि सहसा ही दारुण (भयंकर) विकार उत्पन्न करके शीघ्र जीवन को नष्ट कर देते हैं।

च. सू. २१/९

। ॥ ९ ॥

मेद और मांस के अत्यधिक बढ़ जाने से जिसके नितम्ब, पेट और स्तन हिलते हैं, और जिसका उपचय (शरीर का बढ़ना) और उत्साह वैसा नहीं जैसा होना चाहिए, वह मनुष्य अतिस्थूल (अत्यधिक स्थूल) कहलाता है।

च. सू. २१/१०

। ॥ १० ॥

इस प्रकार मेदस्वी (अत्यधिक मेद वाले पुरुष) के दोष, हेतु (कारण) और रूप (लक्षण) भी बता दिए गए; अब इसके बाद अतिकार्श्य (अत्यधिक कृशता) के विषय में जो कहना है, वह कहा जाएगा।

च. सू. २१/११

। ॥ ११ ॥

रूक्ष (रूखे) अन्न-पान का सेवन, लङ्घन (उपवास), नपी-तुली (थोड़ी) मात्रा में भोजन, क्रिया (उपचार-कर्मों) का अतियोग (अत्यधिक प्रयोग), शोक, और वेगों तथा निद्रा को रोकना

च. सू. २१/१२

। ॥ १२ ॥

रूक्ष (सूखे द्रव्यों) से उद्वर्तन (उबटन), स्नान का अभ्यास (बार-बार स्नान करना), प्रकृति (स्वभाव), जरा (बुढ़ापा), विकार का अनुशय (रोग का पीछे लगे रहना) और क्रोध, (ये सब) मनुष्य को अतिकृश (बहुत दुबला) कर देते हैं।

च. सू. २१/१३

। ॥ १३ ॥

कृश (दुबला) व्यक्ति व्यायाम, अतिसौहित्य (बहुत अधिक खाकर तृप्त होना), भूख, प्यास, रोग और औषध को नहीं सह पाता; उसी प्रकार अति शीत, उष्ण और मैथुन को (भी नहीं सह पाता)।

च. सू. २१/१४

। ॥ १४ ॥

प्लीहा (तिल्ली का रोग), कास (खाँसी), क्षय, श्वास (साँस का रोग), गुल्म, अर्श (बवासीर), उदर रोग और ग्रहणी में होने वाले रोग प्रायः कृश (दुबले) व्यक्ति पर आक्रमण करते हैं।

च. सू. २१/१५

। ॥ १५ ॥

जिसके नितम्ब, पेट और गर्दन सूख (धँस) गए हों, जो धमनियों (नसों) के जाल से ढका (दिखता) हो, जिसमें त्वचा और हड्डियाँ ही शेष रह गई हों और जिसके पर्व (जोड़) मोटे (उभरे हुए) हों, वह मनुष्य अतिकृश (बहुत दुबला) माना जाता है।

च. सू. २१/१६

। ॥ १६ ॥

अतिस्थूल और अतिकृश, ये दोनों मनुष्य सदा व्याधित (रोग से पीड़ित) रहते हैं, और इनका सदा ही (क्रमशः) कर्शन (शरीर घटाने वाले) और बृंहण (शरीर बढ़ाने वाले) उपायों से उपचार करना चाहिए।

च. सू. २१/१७

। ॥ १७ ॥

स्थौल्य (मोटापे) और कार्श्य (दुबलेपन) में कार्श्य अच्छा (बेहतर) है, क्योंकि यदि (चिकित्सा के) समान साधनों वाले उन दोनों को व्याधि आ घेरे, तो वह स्थूल को ही अधिक पीड़ित करेगी।

च. सू. २१/१८

। ॥ १८ ॥

परन्तु जिस मनुष्य के मांस और प्रमाण (शरीर का माप) सम (सन्तुलित) हों, जिसका संहनन (शरीर का गठन) सम हो और जिसकी इन्द्रियाँ दृढ़ हों, वह विकारों (रोगों) के बल से अभिभूत नहीं होता (दबता नहीं)।

च. सू. २१/१९

। ॥ १९ ॥

(ऐसा मनुष्य) भूख, प्यास और आतप (धूप) को सहने वाला, शीत और व्यायाम को भली भाँति सहने वाला, सम (सन्तुलित) पाचन वाला, सम जरण (भोजन के जीर्ण होने) वाला और सम मांस-संचय वाला माना जाता है।

च. सू. २१/२०

। ॥ २० ॥

स्थूल (मोटे) लोगों के कर्शन (शरीर घटाने) के लिए गुरु (भारी) और अतर्पण (पोषण न देने वाला) (आहार) इष्ट है, और कृश (दुबले) लोगों के बृंहण (शरीर बढ़ाने) के लिए जो लघु (हल्का) और संतर्पण (पोषण देने वाला) हो, (वह इष्ट है)।

च. सू. २१/२१

। ॥ २१ ॥

वात को नष्ट करने वाले तथा श्लेष्मा (कफ) और मेद को हरने वाले अन्न-पान, रूक्ष, उष्ण और तीक्ष्ण बस्तियाँ, और रूक्ष उद्वर्तन (उबटन)

च. सू. २१/२२

। ॥ २२ ॥

गुडूची (गिलोय) और भद्रमुस्ता का प्रयोग, उसी प्रकार त्रिफला का प्रयोग, तक्र (छाछ) और अरिष्टों के प्रयोग, और माक्षिक (मधु) का प्रयोग

च. सू. २१/२३

। ।

विडङ्ग (वायविडंग), नागर (सोंठ), क्षार, काललोह (काले लोहे) का रज (चूर्ण), मधु, और यव (जौ) तथा आमलक (आँवले) का चूर्ण, (इनका) क्षौद्र (मधु) के साथ प्रयोग

च. सू. २१/२४

। ॥ २४ ॥

बिल्व आदि पञ्चमूल का क्षौद्र (मधु) के साथ प्रयोग, और अग्निमन्थ के रस के साथ शिलाजतु (शिलाजीत) का प्रयोग श्रेष्ठ है।

च. सू. २१/२५

। ॥ २५ ॥

प्रशातिका और प्रियङ्गु (कँगनी), श्यामाक (साँवाँ), यवक, यव (जौ), जूर्णाह्व, कोद्रव (कोदों), मुद्ग (मूँग), कुलत्थ (कुलथी) और चक्रमुद्गक

च. सू. २१/२६

। ॥ २६ ॥

और आढकी (अरहर) के बीज, पटोल (परवल) और आमलक (आँवले) के साथ, भोजन के लिए प्रयोग करने चाहिए; और (भोजन के) बाद पीने के लिए मधूदक (मधु मिला जल)।

च. सू. २१/२७

। ॥ २७ ॥

और अतिस्थौल्य (बहुत अधिक मोटापे) के नाश के लिए मेद, मांस और कफ को दूर करने वाले अरिष्टों को (उचित रूप से) बाँटकर अनुपान के रूप में प्रयोग करे।

च. सू. २१/२८

। ॥ २८ ॥

स्थौल्य (मोटापे) को छोड़ना (दूर करना) चाहने वाला व्यक्ति प्रजागर (जागना), व्यवाय (मैथुन), व्यायाम और चिन्तन (सोच-विचार) को क्रम से (धीरे-धीरे) बढ़ाए।

च. सू. २१/२९

। ॥ २९ ॥

स्वप्न (नींद), हर्ष (प्रसन्नता), सुखद शय्या, मन की निर्वृति (सन्तोष), शम (शान्ति), चिन्ता, व्यवाय (मैथुन) और व्यायाम से विराम, प्रिय (मनभावन) का दर्शन

च. सू. २१/३०

। ॥ ३० ॥

नए अन्न, नया मद्य, ग्राम्य (गाँव में रहने वाले), आनूप (जल-प्रधान प्रदेश के) और औदक (जल में रहने वाले) (प्राणियों के मांस) के रस, संस्कृत (भली भाँति तैयार किए हुए) मांस, दधि (दही), सर्पि (घी) और पय (दूध)

च. सू. २१/३१

। ॥ ३१ ॥

इक्षु (गन्ना), शालि (धान), माष (उड़द), गोधूम (गेहूँ), गुड़ से बने पदार्थ, स्निग्ध (चिकनाई युक्त) और मधुर बस्तियाँ, और सदा तैल से अभ्यङ्ग (मालिश)

च. सू. २१/३२

। ॥ ३२ ॥

स्निग्ध (चिकनाई युक्त) उद्वर्तन (उबटन), स्नान, गन्ध (सुगन्धित द्रव्यों) और मालाओं का सेवन, श्वेत वस्त्र, और उचित समय पर दोषों का अवसेचन (शरीर से बाहर निकालना)

च. सू. २१/३३

। ॥ ३३ ॥

रसायन और वृष्य योगों का सेवन अतिकार्श्य (बहुत अधिक दुबलेपन) को नष्ट करके मनुष्यों में उत्तम उपचय (शरीर की पुष्टि) उत्पन्न करता है।

च. सू. २१/३४

। ॥ ३४ ॥

कामों की चिन्ता न करने से, सन्तर्पण (तृप्त और पुष्ट करने वाले आहार और उपचार) से और नींद में अधिक लगे रहने से मनुष्य निश्चय ही वराह (सूअर) की तरह पुष्ट (मोटा) हो जाता है।

च. सू. २१/३५

। ॥ ३५ ॥

जब मन थक जाता है और थकान से भरी कर्मात्मा (इन्द्रियाँ) अपने विषयों से हट जाती हैं, तब मनुष्य सोता है।

च. सू. २१/३६

। ॥ ३६ ॥

सुख और दुःख, पुष्टि और कृशता, बल और अबल (दुर्बलता), वृषता (पुंसत्व) और क्लीबता (नपुंसकता), ज्ञान और अज्ञान, जीवन और (जीवन का) न रहना (मृत्यु), (ये सब) निद्रा के अधीन हैं।

च. सू. २१/३७

। ॥ ३७ ॥

असमय में ली गई, बहुत अधिक ली गई, और बिल्कुल न ली गई निद्रा दूसरी कालरात्रि (विनाश की रात्रि) की तरह सुख और आयु को हर लेती है।

च. सू. २१/३८

। ॥ ३८ ॥

वही निद्रा उचित रूप से ली जाए तो फिर शरीर को सुख और आयु से जोड़ देती है, जैसे (प्राप्त) हुई सच्ची बुद्धि योगी पुरुष को सिद्धि से (जोड़ देती है)।

च. सू. २१/३९

। ॥ ३९ ॥

गाने, पढ़ने, मद्य, स्त्री (-सङ्ग), कर्म (श्रम), भार (ढोने) और मार्ग (चलने) से कृश हुए (थककर दुबले हुए) लोग, अजीर्ण के रोगी, क्षत (चोट) से पीड़ित, क्षीण, वृद्ध, बालक तथा दुर्बल,

च. सू. २१/४०

। ॥ ४० ॥

तृष्णा (प्यास), अतीसार (दस्त) और शूल (तीव्र पीड़ा) से पीड़ित, श्वास (साँस फूलने) के रोगी, हिक्का (हिचकी) के रोगी, कृश (दुबले), गिरे हुए, चोट खाए हुए, उन्मत्त, और यान (सवारी से यात्रा) तथा जागरण से थके हुए,

च. सू. २१/४१

। ॥ ४१ ॥

क्रोध, शोक और भय से थके हुए, और जो दिन में सोने के अभ्यस्त हैं, ये सब सभी कालों (ऋतुओं) में दिवास्वप्न (दिन में सोने) का सेवन कर सकते हैं।

च. सू. २१/४२

। ॥ ४२ ॥

क्योंकि इस प्रकार इनमें धातुओं की समता (सन्तुलन) और बल भी उत्पन्न होता है, श्लेष्मा (कफ) अङ्गों को पुष्ट करता है और आयु में स्थिरता आती है।

च. सू. २१/४३

। ॥ ४३ ॥

ग्रीष्म ऋतु में तो, आदान (काल) से रूखे हुए (प्राणियों) के लिए, वायु (वात) के बढ़ते रहने पर, और रातों के बहुत छोटी होने के कारण, दिवास्वप्न (दिन में सोना) प्रशस्त (उचित) माना जाता है।

च. सू. २१/४४

। ॥ ४४ ॥

ग्रीष्म को छोड़कर अन्य ऋतुओं में दिन में सोने से श्लेष्मा (कफ) और पित्त प्रकुपित होते हैं; इसलिए उन (ऋतुओं) में दिन में सोना प्रशस्त नहीं माना जाता।

च. सू. २१/४५

। अदिवा ॥ ४५ ॥

मेदस्वी (मोटे), नित्य स्नेह (घी, तेल आदि) का सेवन करने वाले, श्लेष्मल (कफ की अधिकता वाले), श्लेष्मा (कफ) के रोगों से पीड़ित और दूषीविष से पीड़ित लोग दिन में कभी भी न सोएँ।

च. सू. २१/४६

। ॥ ४६ ॥

हलीमक, सिर का दर्द, स्तैमित्य (अङ्गों की जड़ता), शरीर का भारीपन, अङ्गमर्द (अङ्गों का टूटना), अग्नि (पाचन शक्ति) का नाश, और हृदय का लिप्त-सा होना,

च. सू. २१/४७

। ॥ ४७ ॥

शोफ (सूजन), अरोचक (अरुचि), हृल्लास (जी मिचलाना), पीनस (जुकाम), अर्धावभेदक (आधे सिर का दर्द), कोठ (चकत्ते), अरुः (घाव), पिडका (फुंसियाँ), कण्डू (खुजली), तन्द्रा (ऊँघ), कास (खाँसी), गले के रोग,

च. सू. २१/४८

। ॥ ४८ ॥

स्मृति और बुद्धि का प्रमोह (कुण्ठित होना), स्रोतों का संरोध (अवरोध), ज्वर, इन्द्रियों की असमर्थता, और विष के वेगों का प्रवर्तन (चल पड़ना),

च. सू. २१/४९

। ॥ ४९ ॥

(ये रोग) अहितकर दिवास्वप्न (दिन में सोने) के सेवन से मनुष्यों को होते हैं। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति (कौन-सी) नींद हितकर है और (कौन-सी) अहितकर, यह जानकर सुखपूर्वक सोए।

च. सू. २१/५०

। ॥ ५० ॥

रात में जागना रूक्ष (रूखापन लाने वाला) है, दिन में सोना स्निग्ध (चिकनाई लाने वाला) है, परन्तु बैठे-बैठे ऊँघना न रूक्ष है, न अभिष्यन्दी।

च. सू. २१/५१

। ॥ ५१ ॥

शरीर को बनाए रखने के लिए जैसे आहार (हितकर है), वैसे ही नींद भी सुखकर मानी गई है। (और) स्थौल्य (मोटापा) और कार्श्य (दुबलापन) विशेष रूप से नींद और आहार से उत्पन्न होते हैं।

च. सू. २१/५२

। ॥ ५२ ॥

अभ्यङ्ग (तेल की मालिश) और उत्सादन (उबटन), स्नान, ग्राम्य (पालतू), आनूप (जलप्राय प्रदेश के) और औदक (जलचर) (प्राणियों के मांस के) रस, दही के साथ शालि चावल का भात, दूध, स्नेह (घी, तेल आदि), मद्य, मन की प्रसन्नता,

च. सू. २१/५३

। ॥ ५३ ॥

मन के अनुकूल गन्ध और शब्द, संवाहन (शरीर दबाना), आँखों का तर्पण, सिर और मुख पर लेप,

च. सू. २१/५४

। ॥ ५४ ॥

अच्छी तरह बिछा हुआ बिछौना, सुखद घर, और वैसे ही उचित (अभ्यस्त) समय, (ये सब) किसी कारण से नष्ट हुई निद्रा को शीघ्र ले आते हैं।

च. सू. २१/५५

। ॥ ५५ ॥

शरीर का और सिर का विरेक (शोधन), छर्दन (वमन), भय, चिन्ता, क्रोध, तथा धूम (औषधीय धूमपान), व्यायाम, रक्तमोक्षण,

च. सू. २१/५६

। ॥ ५६ ॥

उपवास, असुखकर (कष्ट देने वाली) शय्या, सत्त्व (मन) की उदारता और तम पर विजय (ये, पिछले श्लोक में गिनाए उपायों के साथ,) उत्पन्न हो चुके अहितकर निद्राप्रसङ्ग (बहुत अधिक सोने की प्रवृत्ति) को रोकते हैं।

च. सू. २१/५७

। ॥ ५७ ॥

और इन्हीं (उपायों) को निद्रानाश (नींद के नष्ट होने) के हेतु (कारण) जानना चाहिए, और कार्य, काल, विकार (रोग), प्रकृति और वायु (वात) को भी।

च. सू. २१/५८

। ॥ ५८ ॥

निद्रा तम से उत्पन्न होने वाली, श्लेष्मा (कफ) से उत्पन्न होने वाली, मन और शरीर के श्रम (थकान) से उत्पन्न होने वाली, आगन्तुक (बाहरी कारण से आने वाली), व्याधि के पीछे चलने वाली (रोग के साथ होने वाली) और रात्रि के स्वभाव से उत्पन्न होने वाली (होती है)।

च. सू. २१/५९

। ॥ ५९ ॥

जो (निद्रा) रात्रि के स्वभाव से उत्पन्न मानी गई है, उसे उसके जानकार भूतधात्री (प्राणियों का पालन करने वाली) कहते हैं। तम से उत्पन्न (निद्रा) को पाप का मूल कहते हैं, और शेष (निद्राओं) को तो (वे) व्याधियों (रोगों) में गिनाते हैं।

च. सू. २१/६०

। ॥ ६० ॥

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक (ये हैं): निन्दित पुरुष, उनमें से जो दो विशेष रूप से निन्दित हैं, (उनकी) निन्दित दशा का कारण, (उनके) दोष, और उन दोनों निन्दितों की चिकित्सा,

च. सू. २१/६१

। ॥ ६१ ॥

जिनके लिए और जब निद्रा हितकर है, और जिनके लिए और जब अहितकर भी है, अधिक निद्रा वाले और निद्रा न आने वाले (व्यक्ति) के लिए भेषज (चिकित्सा), और वह (निद्रा) जिससे उत्पन्न होती है,

च. सू. २१/६२

। ॥ ६२ ॥

(और) जो-जो निद्रा है और (वह) जैसे प्रभाव वाली है, वह सब अत्रि के पुत्र पुनर्वसु ने अष्टौनिन्दित (आठ निन्दित) नाम से गिने जाने वाले (इस अध्याय) में कहा।

च. सू. २१

॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान (सूत्रस्थान) में अष्टौनिन्दितीय नामक इक्कीसवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।