भूमिका
अष्टौनिन्दितीय अध्याय चरक संहिता के सूत्रस्थान का इक्कीसवाँ अध्याय है, और इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। इसका नाम इसके पहले कथन से आया है कि शरीर की दृष्टि से आठ प्रकार के पुरुष निन्दित होते हैं: 'अष्टौ' यानी आठ, और 'निन्दित' यानी निन्दा के योग्य; इसीलिए इसका हिन्दी शीर्षक 'आठ निन्दित शरीर' है। ये आठ चार उलटे जोड़ों में गिनाए गए हैं: बहुत लम्बा और बहुत नाटा, बहुत रोमों वाला और बिना रोमों का, बहुत काला और बहुत गोरा, तथा अतिस्थूल (बहुत मोटा) और अतिकृश (बहुत दुबला)। अध्याय का पहला भाग इनमें से अन्तिम दो का है, और दूसरा भाग निद्रा (नींद) का; अध्याय स्वयं कहता है कि मोटापा और दुबलापन विशेष रूप से नींद और आहार से ही उत्पन्न होते हैं।
भगवान् आत्रेय बताते हैं कि आठों में अतिस्थूल और अतिकृश और भी अधिक निन्दित हैं, और पहले अतिस्थूल का वर्णन करते हैं। उसके आठ दोष, यानी हानियाँ, हैं: आयु का घटना, गति में रुकावट, मैथुन में कठिनाई, दुर्बलता, दुर्गन्ध, पसीने का कष्ट, और बहुत अधिक भूख और प्यास। इस मोटापे के कारण बताए गए हैं: बहुत भरपेट खाना, भारी, मीठे, ठंडे और चिकने पदार्थों का सेवन, व्यायाम और मैथुन न करना, दिन में सोना, सदा प्रसन्न रहना, चिन्तन न करना, और बीज का स्वभाव। मूल बात यह कही गई है कि ऐसे व्यक्ति में केवल मेद (चर्बी) बढ़ता है, दूसरी धातुएँ उस तरह नहीं बढ़तीं, और हर दोष इसी से समझाया गया है। मेद से मार्ग ढक जाने के कारण वायु कोष्ठ (पेट के भीतरी भाग) में घूमकर अग्नि (पाचन की शक्ति) को भड़काता है, इसलिए वह भोजन जल्दी पचा लेता है और बहुत खाना चाहता है; ग्रन्थ के अनुसार ये अग्नि और वायु उसे वैसे ही जला डालते हैं जैसे वन की आग वन को, और मेद के बहुत बढ़ने पर वात आदि भयंकर रोग उत्पन्न करके जीवन को शीघ्र नष्ट कर देते हैं। उसकी पहचान है हिलते हुए नितम्ब, पेट और स्तन, और ऐसा उपचय (शरीर की बढ़त) और उत्साह जो उचित नहीं।
फिर अतिकार्श्य, यानी बहुत अधिक दुबलेपन, का वर्णन आता है। उसके कारण गिनाए गए हैं: रूखा अन्न-पान, लङ्घन (उपवास), बहुत थोड़ा भोजन, चिकित्सा-कर्मों का अतियोग, शोक, वेगों और नींद को रोकना, रूखा उबटन, बार-बार स्नान, प्रकृति, बुढ़ापा, रोग का पीछे लगे रहना और क्रोध। दुबला व्यक्ति व्यायाम, बहुत अधिक भोजन, भूख, प्यास, रोग, औषध, अधिक सर्दी, गर्मी और मैथुन नहीं सह पाता, और तिल्ली, खाँसी, क्षय, श्वास, गुल्म, बवासीर, उदर और ग्रहणी के रोग प्रायः उसे घेर लेते हैं; उसके नितम्ब, पेट और गर्दन सूखे होते हैं, नसों का जाल दिखता है, जोड़ उभरे होते हैं और मानो त्वचा और हड्डियाँ ही शेष रहती हैं। आत्रेय कहते हैं कि ये दोनों सदा रोगी रहते हैं, और मोटापे और दुबलेपन में दुबलापन अच्छा है, क्योंकि समान साधन होने पर भी रोग मोटे को ही अधिक पीड़ा देता है। इसके विपरीत, जिसका मांस, शरीर का माप और गठन सम हो और इन्द्रियाँ दृढ़ हों, वह रोगों से नहीं दबता और भूख, प्यास, धूप, सर्दी और व्यायाम सह लेता है। चिकित्सा का सिद्धान्त यह दिया गया है कि स्थूल का कर्शन (शरीर घटाना) भारी पर पोषण न देने वाले आहार से हो, और कृश का बृंहण (शरीर बढ़ाना) हल्के पर पोषण देने वाले आहार से। स्थूल के लिए ग्रन्थ वात को नष्ट करने वाले और कफ और मेद को घटाने वाले अन्न-पान, रूखी बस्तियाँ और उबटन, अनेक औषध-द्रव्य, कई धान्य और दालें, अरिष्ट, और क्रम से बढ़ाए गए जागरण, मैथुन, व्यायाम और चिन्तन गिनाता है; कृश के लिए नींद, प्रसन्नता, सुखद शय्या, मन की शान्ति, चिन्ता, मैथुन और व्यायाम से विराम, नए अन्न, मांस-रस, दही, घी, दूध, गुड़ से बनी वस्तुएँ, स्निग्ध बस्तियाँ, तेल की मालिश, और रसायन और वृष्य योग। इस भाग का अन्त इस कथन से होता है कि चिन्ता न करने, सन्तर्पण और बहुत सोने से मनुष्य वराह (सूअर) की तरह पुष्ट हो जाता है।
यहीं से अध्याय निद्रा की ओर मुड़ता है। ग्रन्थ के अनुसार जब मन थक जाता है और इन्द्रियाँ भी थककर अपने विषयों से हट जाती हैं, तब मनुष्य सोता है; और सुख और दुःख, पुष्टि और दुबलापन, बल और दुर्बलता, पुंसत्व और नपुंसकता, ज्ञान और अज्ञान, और जीवन और मृत्यु भी नींद के अधीन हैं। असमय, बहुत अधिक या बिल्कुल न ली गई नींद सुख और आयु को दूसरी कालरात्रि की तरह हर लेती है, और उचित नींद शरीर को सुख और आयु से वैसे ही जोड़ती है जैसे सच्ची बुद्धि योगी को सिद्धि से। फिर दिन में सोने के नियम आते हैं। गाने, पढ़ने, मद्य, स्त्री-सङ्ग, श्रम, बोझ और यात्रा से थककर दुबले हुए लोग, अनेक रोगी, घायल, क्षीण, वृद्ध, बालक और दुर्बल, क्रोध, शोक या भय से थके लोग, और दिन में सोने के अभ्यस्त लोग ग्रन्थ के अनुसार हर ऋतु में दिन में सो सकते हैं, क्योंकि इससे उनकी धातुएँ सम होती हैं, बल आता है और आयु स्थिर होती है। ग्रीष्म में, जब शरीर रूखे होते हैं, वात बढ़ रहा होता है और रातें बहुत छोटी होती हैं, दिन की नींद प्रशस्त मानी गई है; बाकी ऋतुओं में वह कफ और पित्त को प्रकुपित करती है। मोटे, नित्य स्नेह लेने वाले, कफ की अधिकता वाले, कफ के रोगी और दूषीविष से पीड़ित लोगों के लिए ग्रन्थ दिन में सोना कभी ठीक नहीं मानता, और अनुचित दिन की नींद से होने वाले बहुत-से कष्ट गिनाता है, जैसे हलीमक, सिर का दर्द, शरीर का भारीपन, अग्नि का नाश, सूजन, खुजली, ज्वर, और स्मृति और बुद्धि का कुण्ठित होना।
अध्याय कहता है कि शरीर को बनाए रखने के लिए जैसे आहार है, वैसे ही नींद है। फिर वह चली गई नींद को लौटाने वाले उपाय बताता है, जैसे मालिश, उबटन, स्नान, मांस-रस, दही के साथ भात, दूध, मन को भाने वाली गन्ध और शब्द, शरीर दबाना, अच्छा बिछौना और सोने का अभ्यस्त समय; और बहुत अधिक नींद को रोकने वाले उपाय, जैसे शरीर और सिर का शोधन, वमन, भय, चिन्ता, क्रोध, व्यायाम, उपवास और असुखकर शय्या, जिन्हें वह नींद न आने के कारण भी मानता है। अन्त में निद्रा के भेद गिनाए गए हैं: तम से, कफ से, मन और शरीर की थकान से, बाहरी कारण से, रोग के साथ, और रात के स्वभाव से होने वाली। रात के स्वभाव से आने वाली नींद को भूतधात्री, यानी सब प्राणियों का पोषण करने वाली, कहा गया है, तम से होने वाली को पाप का मूल, और बाकी को रोगों में गिना गया है। संग्रह के श्लोक इन सब विषयों को दोहराते हैं और बताते हैं कि यह सब अत्रि के पुत्र पुनर्वसु ने कहा। इस अध्याय से यह बात साथ ले जाने योग्य है कि इसके आठों निन्दित शरीर किसी न किसी सीमा से बाहर की अवस्था के हैं, कि यह सन्तुलित शरीर को रोगों के सामने दृढ़ मानता है, और कि यह आहार के साथ नींद को भी शरीर के बढ़ने और घटने का मुख्य कारण मानता है: उचित नींद जीवन को सहारा देती है, और अनुचित नींद रोग लाती है।