भारत संहिता

अध्याय २३

संतर्पणीयोऽध्यायः

संतर्पण (अधिक पोषण और उसके रोग)

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भूमिका

संतर्पणीय अध्याय चरक संहिता के सूत्रस्थान का तेईसवाँ अध्याय है, और इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। इसका नाम 'संतर्पण' से बना है, जिसका अर्थ है शरीर को तृप्त करना, पोषण देना; पर इस अध्याय में संतर्पण का मुख्य अर्थ है आवश्यकता से अधिक पोषण, इसीलिए इसका हिन्दी शीर्षक 'संतर्पण (अधिक पोषण और उसके रोग)' है। अध्याय दो उलटी अवस्थाओं की बात करता है: संतर्पण, यानी अधिक पोषण, और अपतर्पण, यानी पोषण की कमी। जैसा इसका अन्तिम संग्रह-श्लोक स्वयं कहता है, इसमें दोनों से होने वाले रोग उनके औषधों (उपचारों) सहित बताए गए हैं।

अध्याय पहले बताता है कि संतर्पण कौन करता है: वह व्यक्ति जो चिकनाई वाले, मीठे, भारी और चिपचिपे आहार, नया अन्न, नया मद्य, दलदली प्रदेश और जल के प्राणियों का मांस, गोरस (दूध और उससे बने पदार्थ), और गुड़ और आटे से बने भोजन बहुत अधिक मात्रा में लेता है, शारीरिक श्रम से द्वेष करता है, और दिन में सोने, बिस्तर और बैठे रहने के सुख में रमा रहता है। यदि वह शीघ्र प्रतिकार न करे, तो उसे अनेक रोग होते हैं, जैसे प्रमेह, फुंसियाँ, चकत्ते, खुजली, पाण्डु रोग, ज्वर, कुष्ठ (त्वचा के रोग), आम से होने वाले विकार, मूत्रकृच्छ्र, अरुचि, तन्द्रा, नपुंसकता, अत्यधिक मोटापा, आलस्य, शरीर का भारीपन, इन्द्रियों और स्रोतों (शरीर के मार्गों) का लिप जाना, बुद्धि का मोह और सूजन।

फिर आत्रेय इन रोगों की चिकित्सा बताते हैं। वमन, विरेचन, रक्तमोक्षण, व्यायाम, उपवास, धूम और स्वेदन, मधु के साथ हरीतकी, प्रायः रूखा अन्न, और खुजली और चकत्तों को मिटाने वाले चूर्ण और लेप उनमें हितकर कहे गए हैं। इसके बाद कई योग आते हैं: जल में उबालकर पिया जाने वाला काढ़ा, प्रातःकाल पिया जाने वाला रस, त्वचा के रोगों के लिए उबटन, रगड़ना और स्नान, मूत्रकृच्छ्र और प्रमेह के लिए छाछ, दही के पानी या बेर के खट्टे रस के साथ लिया जाने वाला योग, छाछ और हरीतकी, त्रिफला और अरिष्टों के प्रयोग, और सत्तू के पेय। इनमें से एक चूर्ण, जिसे तैल, घी, मधु और सत्तू के साथ पेय बनाकर पिया जाता है, ग्रन्थ के अनुसार प्रमेह, कुष्ठ, अर्श, कामला, तिल्ली के रोग, खाँसी, श्वास, कृमि और अत्यधिक मोटापे जैसे अनेक रोगों को शान्त करता है, अग्नि को दीप्त करता है और स्मृति और बुद्धि बढ़ाता है। ग्रन्थ यह भी कहता है कि जो नित्य व्यायाम करता है, पहला भोजन पच जाने पर ही खाता है, और जौ और गेहूँ का भोजन करता है, वह मोटापा छोड़कर अधिक पोषण के दोषों से छूट जाता है। इस भाग का सार अध्याय स्वयं देता है: संतर्पण से उत्पन्न रोगों का औषध अपतर्पण है।

अध्याय का दूसरा भाग अपतर्पण का है। पोषण की कमी से देह, अग्नि, बल, वर्ण (रंग और कान्ति), ओज, शुक्र और मांस घटते हैं, और ज्वर, पीछा न छोड़ने वाली खाँसी, पसलियों में पीड़ा, अरुचि, सुनने की शक्ति की दुर्बलता, उन्माद, प्रलाप, हृदय में पीड़ा, मल और मूत्र का रुकना, पिंडलियों, जाँघों और कमर में शूल, जोड़ों और हड्डियों में पीड़ा, और ऊर्ध्ववात आदि वात के रोग होते हैं। इस विषय के जानकारों ने इनका औषध संतर्पण बताया है, ऐसा संतर्पण जो तुरन्त या लगातार सेवन से कारगर हो: जो थोड़े समय में क्षीण हुआ है, वह तर्पण से तुरन्त पुष्ट हो जाता है, पर जो लम्बे समय से क्षीण है, वह संतर्पण के लगातार सेवन के बिना पुष्ट नहीं होता। इसीलिए लम्बे समय से दुर्बल रोगी का उपचार बिना जल्दबाज़ी के, देह, अग्नि, दोष, औषध, मात्रा और काल का ध्यान रखकर करने को कहा गया है, और उसके लिए मांसरस, दूध, घी, स्नान, बस्ति, अभ्यङ्ग (तेल की मालिश) और पोषण देने वाले पदार्थ हितकर बताए गए हैं। अन्त में ज्वर और खाँसी से पीड़ित, दुबले, मूत्रकृच्छ्र वाले, प्यासे और ऊर्ध्ववात वाले रोगियों के लिए कुछ तर्पण (पोषक पेय) गिनाए गए हैं, जिनमें से अधिकतर में सत्तू है, और मदिरा से होने वाले विकारों के लिए फलों वाला एक मन्थ (सत्तू का घोल)। अध्याय यह भी कहता है कि मन्थ, मीठा हो या खट्टा, चिकनाई वाला हो या रूखा, तुरन्त पोषण देता है और स्थिरता, वर्ण और बल देता है।

इस अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि पोषण का अधिक होना और कम होना, दोनों रोग लाते हैं, और हर एक का औषध उसका उलटा है: अधिक पोषण के रोगों का अपतर्पण, और पोषण की कमी के रोगों का संतर्पण। दूसरी बात यह कि पोषण लौटाने की गति इस पर निर्भर है कि दुर्बलता कितनी पुरानी है: हाल की क्षीणता जल्दी भरती है, पुरानी धीरे-धीरे और धीरज से। अध्याय एक संग्रह-श्लोक से समाप्त होता है, जो कहता है कि संतर्पण और अपतर्पण से होने वाले रोग इस संतर्पणीय अध्याय में औषधों सहित बताए गए हैं।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ४०)

तत्र श्लोकः-संतर्पणोत्था ये रोगा रोगा ये चापतर्पणात्।संतर्पणीये तेऽध्याये सौषधाः परिकीर्तिताः॥

श्लोक ४० →

इस विषय में (यह) श्लोक है: संतर्पण से उत्पन्न होने वाले जो रोग हैं, और अपतर्पण से होने वाले जो रोग हैं, वे (सब) संतर्पणीय अध्याय में औषधों सहित बताए गए हैं।

मुख्य शब्द (११) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

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च. सू. २३/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम संतर्पणीय (संतर्पण सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. २३/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. २३/३

। ॥ ३ ॥

जो (व्यक्ति) स्निग्ध (चिकनाई वाले), मधुर, गुरु (भारी) और पिच्छिल (चिपचिपे) (आहारों) से, नए अन्न और नए मद्य से, और अनूप (जल-भरे प्रदेश) तथा जल में उत्पन्न (प्राणियों) के मांसों से (अपना) संतर्पण करता है

च. सू. २३/४

। ॥ ४ ॥

(तथा) गोरस (दूध और उससे बने पदार्थों) से, गुड़ से बने और आटे से बने अन्नों से अत्यधिक मात्रा में (संतर्पण करता है), (जो) चेष्टा (शारीरिक श्रम) से द्वेष करता है और दिन में सोने, शय्या और आसन के सुख में रमा रहता है

च. सू. २३/५

।॥ ५ ॥

उसे संतर्पण के कारण से उत्पन्न (ये) रोग होते हैं: प्रमेह, पिडका (फुंसियाँ), कोठ (चकत्ते), कण्डू (खुजली), पाण्डु रोग, ज्वर,

च. सू. २३/६

। ॥ ६ ॥

कुष्ठ (त्वचा के रोग), आम से होने वाले विकार, मूत्रकृच्छ्र, अरोचक (अरुचि), तन्द्रा, क्लैब्य (नपुंसकता), अत्यधिक स्थौल्य (मोटापा), आलस्य, शरीर का भारीपन,

च. सू. २३/७

। ॥ ७ ॥

इन्द्रियों और स्रोतों का लिप जाना, बुद्धि का मोह, प्रमीलक, शोफ (सूजन) और इसी प्रकार के अन्य (रोग भी), (उस व्यक्ति को होते हैं) जो शीघ्र प्रतिकार (उपाय) नहीं करता।

च. सू. २३/८

। ॥ ८ ॥

उन (रोगों) में उल्लेखन (वमन), विरेक (विरेचन), रक्तमोक्षण, व्यायाम, उपवास, धूम और स्वेदन प्रशस्त (हितकर) हैं

च. सू. २३/९

। ॥ ९ ॥

(तथा) मधु सहित अभया (हरीतकी) का सेवन, प्रायः रूक्ष (रूखे) अन्न का सेवन, और कण्डू (खुजली) तथा कोठ (चकत्तों) को नष्ट करने वाले जो चूर्ण और प्रदेह (लेप) कहे गए हैं (वे भी हितकर हैं)।

च. सू. २३/१०

। ॥ १० ॥

त्रिफला, आरग्वध (अमलतास), पाठा, वत्सक सहित सप्तपर्ण, मदन (मैनफल) सहित मुस्त (नागरमोथा) और निम्ब (नीम), इन्हें जल में उबालकर पिए।

च. सू. २३/११

। ॥ ११ ॥

(उचित) मात्रा और काल में प्रयोग किए गए उस (काढ़े) का जो नियमित सेवन करता है, उसके संतर्पण से उत्पन्न मेह आदि रोग निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं।

च. सू. २३/१२

। ॥ १२ ॥

मुस्त (नागरमोथा), आरग्वध (अमलतास), पाठा, त्रिफला और देवदारु, श्वदंष्ट्रा (गोखरू), खदिर (खैर), निम्ब (नीम), दोनों हरिद्रा (हल्दी और दारुहल्दी) और वत्सक की छाल,

च. सू. २३/१३

। ॥ १३ ॥

इनका रस दोष के अनुसार प्रतिदिन प्रातःकाल पीने वाला मनुष्य संतर्पण से उत्पन्न सभी व्याधियों से पूरी तरह मुक्त हो जाता है।

च. सू. २३/१४

। ॥ १४ ॥

और इन (द्रव्यों) को उद्वर्तन (उबटन), उद्घर्ष (रगड़ना) और स्नान के रूप में प्रयोग करने से, तथा स्नेह के साथ मिलाकर (प्रयोग करने से), त्वचा के दोष (रोग) शान्त हो जाते हैं।

च. सू. २३/१५

। ॥ १५ ॥

कुष्ठ (कूठ), गोमेदक, हिङ्गु (हींग), क्रौञ्च (पक्षी) की अस्थि, त्र्यूषण (सोंठ, काली मिर्च और पिप्पली), वचा (वच), वृषक और एला (इलायची), श्वदंष्ट्रा (गोखरू), और खराह्वा तथा अश्मभेदक,

च. सू. २३/१६

। ॥ १६ ॥

(इनका) यह (योग) तक्र (छाछ), दधिमण्ड (दही का पानी) या बदर (बेर) के खट्टे रस के साथ पिया जाए तो मूत्रकृच्छ्र और प्रमेह को दूर करता है।

च. सू. २३/१७

। ॥ १७ ॥

तक्र (छाछ) और अभया (हरीतकी) के प्रयोगों से, उसी प्रकार त्रिफला के (प्रयोगों से) भी, और अरिष्टों के प्रयोगों से मेह आदि रोग शान्त हो जाते हैं।

च. सू. २३/१८

। ॥ १८ ॥

त्र्यूषण (सोंठ, काली मिर्च और पिप्पली), त्रिफला, क्षौद्र (मधु), क्रिमिघ्न, अजमोदक, सक्तु (सत्तू) और तैल, (इनसे बना) यह मन्थ लोहोदक (लोहे के जल) में घोलकर (लेने पर) हितकर है।

च. सू. २३/१९

। ॥ १९ ॥

व्योष (सोंठ, काली मिर्च और पिप्पली), विडङ्ग (वायविडंग), शिग्रु (सहजन), त्रिफला, कटुरोहिणी (कुटकी), दोनों बृहती, दोनों हरिद्रा (हल्दी और दारुहल्दी), पाठा, अतिविषा (अतीस), स्थिरा (शालपर्णी),

च. सू. २३/२०

। ॥ २० ॥

हिङ्गु (हींग), केबुक की जड़ें, यवानी (अजवायन), धान्य, चित्रक, सौवर्चल (काला नमक), अजाजी (जीरा) और हपुषा, इन सबका चूर्ण बनाए।

च. सू. २३/२१

। ॥ २१ ॥

चूर्ण, तैल, घृत और क्षौद्र (मधु) के भाग माप में बराबर हों, (और) सक्तु (सत्तू) का भाग सोलह गुना हो; (इस प्रकार बना) संतर्पण पिए।

च. सू. २३/२२

। ॥ २२ ॥

इसके प्रयोग से संतर्पण से उत्पन्न रोग शान्त हो जाते हैं: प्रमेह, मूढवात, कुष्ठ (त्वचा के रोग), अर्श (बवासीर), कामला (पीलिया),

च. सू. २३/२३

। ॥ २३ ॥

प्लीहा (तिल्ली का रोग), पाण्डु रोग, शोफ (सूजन), मूत्रकृच्छ्र, अरोचक, हृद्रोग, राजयक्ष्मा, कास (खाँसी), श्वास और गलग्रह,

च. सू. २३/२४

। ॥ २४ ॥

क्रिमि, ग्रहणीदोष, श्वैत्र्य (सफेद दाग) और अत्यधिक स्थौल्य (मोटापा) (भी शान्त हो जाते हैं)। (इसके प्रयोग से) मनुष्यों की अग्नि दीप्त होती है, और स्मृति तथा बुद्धि बढ़ती हैं।

च. सू. २३/२५

। ॥ २५ ॥

जो (मनुष्य) नित्य व्यायाम करता है, (पहला भोजन) पच जाने पर ही खाता है, और जौ तथा गेहूँ का भोजन करता है, वह स्थौल्य (मोटापा) छोड़कर संतर्पण से उत्पन्न दोषों से मुक्त हो जाता है।

च. सू. २३/२६

। ॥ २६ ॥

संतर्पण से उत्पन्न (रोगों) का औषध अपतर्पण बताया गया। इसके आगे अपतर्पण से उत्पन्न रोग (उनके) औषधों सहित बताए जाएँगे।

च. सू. २३/२७

। ॥ २७ ॥

देह, अग्नि, बल, वर्ण, ओज, शुक्र और मांस का क्षय, ज्वर, कास का अनुबन्ध (खाँसी का लगातार बने रहना), पार्श्वशूल और अरोचक,

च. सू. २३/२८

। ॥ २८ ॥

श्रोत्र (सुनने की शक्ति) की दुर्बलता, उन्माद, प्रलाप, हृदय में पीड़ा, मल और मूत्र का रुक जाना, जङ्घाओं (पिंडलियों), ऊरुओं (जाँघों) और त्रिक में होने वाला शूल,

च. सू. २३/२९

। ॥ २९ ॥

पर्वों, अस्थियों और सन्धियों में भेद (तोड़ने जैसी पीड़ा), और ऊर्ध्ववात आदि जो अन्य वातज (वात से उत्पन्न) रोग हैं, वे सब अपतर्पण से उत्पन्न होते हैं।

च. सू. २३/३०

। ॥ ३० ॥

उन (अपतर्पण से उत्पन्न रोगों) का औषध, दूसरी ओर, (इस विषय के) जानकारों ने संतर्पण बताया है। जो (संतर्पण) तत्काल या अभ्यास (लगातार सेवन) से समर्थ (कारगर) हो, वही चाहा जाता है।

च. सू. २३/३१

। ॥ ३१ ॥

क्योंकि जो थोड़े ही समय में क्षीण हुआ है, वह तर्पण से तुरन्त ही पुष्ट हो जाता है; परन्तु जो लम्बे समय से क्षीण है, वह संतर्पण के अभ्यास (लगातार सेवन) के बिना पुष्ट नहीं होता।

च. सू. २३/३२

। ॥ ३२ ॥

लम्बे समय से दुर्बल (रोगी) में, देह, अग्नि, दोष, भैषज्य (औषध), मात्रा और काल का ध्यान रखकर चलने वाले (वैद्य) को, बिना जल्दबाज़ी किए, भेषज (उपचार) करना चाहिए।

च. सू. २३/३३

। ॥ ३३ ॥

उसके लिए मांसरस, दूध और घृत, स्नान, बस्तियाँ, अभ्यङ्ग और जो तर्पण (पोषण देने वाले पदार्थ) हैं, (वे) हितकर हैं।

च. सू. २३/३४

। ॥ ३४ ॥

जो ज्वर और कास से लगातार पीड़ित हैं, जो कृश (दुबले) हैं, जिन्हें मूत्रकृच्छ्र है, जो प्यास से पीड़ित हैं और जिन्हें ऊर्ध्ववात है, उनके लिए हितकर तर्पण (आगे) बताए जाएँगे।

च. सू. २३/३५

। ॥ ३५ ॥

शर्करा, पिप्पली, तैल, घृत और क्षौद्र (मधु) बराबर भागों में, और सक्तु (सत्तू) दुगुना, (इनसे बना) वृष्य मन्थ उनके लिए प्रशस्त (उत्तम) माना जाता है।

च. सू. २३/३६

।॥ ३६ ॥

सक्तु, मदिरा, क्षौद्र (मधु) और शर्करा, इनसे (बना) तर्पण पीना चाहिए, जो मारुत (वात), मल, मूत्र, कफ और पित्त का अनुलोमन करता है।

च. सू. २३/३७

। ॥ ३७ ॥

फाणित (गाढ़ा किया हुआ ईख का रस), सक्तु, सर्पि (घी), दधिमण्ड और अम्ल काञ्जिक (खट्टी काँजी), (इनसे बना) तर्पण पीना चाहिए, जो मूत्रकृच्छ्र को नष्ट करता है और उदावर्त को दूर करता है।

च. सू. २३/३८

। ॥ ३८ ॥

खर्जूर (खजूर), मृद्वीका (अंगूर), वृक्षाम्ल, अम्लीका, दाडिम (अनार), परूषक (फालसा) और आमलक (आँवला) से युक्त मन्थ मद्य-विकारों को दूर करता है।

च. सू. २३/३९

। ॥ ३९ ॥

मीठा या खट्टा, जल से बना, स्नेह सहित या रूखा ही, मन्थ तुरन्त संतर्पण करने वाला और स्थिरता, वर्ण तथा बल देने वाला है।

च. सू. २३/४०

- । ॥ ४० ॥

इस विषय में (यह) श्लोक है: संतर्पण से उत्पन्न होने वाले जो रोग हैं, और अपतर्पण से होने वाले जो रोग हैं, वे (सब) संतर्पणीय अध्याय में औषधों सहित बताए गए हैं।

च. सू. २३

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान (सूत्रस्थान) में संतर्पणीय नामक तेईसवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।