भारत संहिता

अध्याय २४

विधिशोणितीयोऽध्यायः

शुद्ध रक्त (रक्त-विकार, मद और मूर्छा)

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भूमिका

विधिशोणितीय अध्याय चरक संहिता के सूत्रस्थान का चौबीसवाँ अध्याय है, और इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। इसका नाम इसके पहले श्लोक के आरम्भिक शब्दों 'विधिना शोणितम्' से बना है, जिनका अर्थ है 'विधि (के पालन) से (शुद्ध) रक्त'; इसका हिन्दी शीर्षक 'शुद्ध रक्त (रक्त-विकार, मद और मूर्छा)' है। अध्याय के दो भाग हैं। पहला रक्त का है: शुद्ध और दूषित रक्त, रक्त के दूषित होने के कारण, दूषित रक्त से होने वाले रोग और उनकी चिकित्सा। दूसरा मद, मूर्च्छा और संन्यास का है, यानी चेतना के धुँधला पड़ने और खो जाने की तीन अवस्थाओं का, उनके कारणों, लक्षणों और उपचार सहित। अध्याय की पुष्पिका बताती है कि इसके साथ योजनाचतुष्क, यानी चार अध्यायों का एक समूह, पूरा होता है।

आत्रेय पहले बताते हैं कि देश, काल और ओकसात्म्य (अभ्यास से बनी अनुकूलता) की बताई गई विधि के पालन से देहधारियों का रक्त शुद्ध होता है, और शुद्ध रक्त प्राणी को बल, वर्ण (रंग-रूप), सुख और आयु देता है। फिर एक लम्बी सूची में रक्त के दूषित होने के कारण गिनाए गए हैं: बिगड़े, तीक्ष्ण और उष्ण मद्य, अधिक नमकीन, क्षारीय, खट्टे और तीखे पदार्थ, कुलथी, उड़द और तिल का तेल, जल और दलदली प्रदेश के प्राणियों (का मांस), दही, सुरा और सौवीरक जैसे खट्टे और किण्वित पदार्थ, विरुद्ध और सड़ा-गला आहार, भारी भोजन के बाद दिन में सोना, अधिक खाना, क्रोध, धूप और आग का सेवन, उल्टी के वेग को रोकना, थकान, चोट, अजीर्ण और अध्यशन, और शरद् ऋतु का स्वभाव। दूषित रक्त से होने वाले रोगों और लक्षणों की सूची भी उतनी ही लम्बी है, मुँह के पकने और आँखों की लाली से लेकर गुल्म, वीसर्प, रक्तपित्त, विद्रधि, प्रदर और वातशोणित, पाचक अग्नि के मन्द होने, क्रोध की अधिकता और बुद्धि के भ्रम, और खुजली, फुंसियों और कुष्ठ (त्वचा के रोगों) तक। अध्याय इन सबको शोणिताश्रय, यानी रक्त पर आश्रित, कहता है, और यह भी कहता है कि जो साध्य रोग शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष आदि उपचारों से भी ठीक न हों, उन्हें रक्त से उत्पन्न समझा जाए।

इन रोगों की चिकित्सा में ग्रन्थ रक्तपित्त को दूर करने वाली चिकित्सा, विरेचन, उपवास और रक्त निकालना बताता है; रक्त कितना निकाला जाए, यह रोगी के बल और दोष के प्रमाण से, रक्त के शुद्ध होने से, या आशय (स्थान) को देखकर तय होता है। फिर रंग-रूप से पहचान आती है: वात से दूषित रक्त ललाई लिए भूरा, झागदार और पतला होता है; पित्त से दूषित पीला और काला, और देर से जमने वाला; कफ से दूषित थोड़ा पीलापन लिए सफ़ेद, चिपचिपा और गाढ़ा; और शुद्ध रक्त तपाए सोने, बीरबहूटी, कमल, महावर और घुँघची जैसे लाल रंग का। रक्त निकालने के बाद ग्रन्थ ऐसा अन्न-पान हितकर कहता है जो न बहुत गरम हो न बहुत ठंडा, हल्का हो और अग्नि को जगाए, क्योंकि उस समय रक्त अस्थिर होता है। विशुद्ध रक्त वाले व्यक्ति की पहचान भी दी गई है: निर्मल वर्ण और इन्द्रियाँ, विषयों में रुचि, बिना रुकावट का पाचन और वेग, सुख, संतोष और बल।

दूसरा भाग बताता है कि जब कुपित दोष, मलिन आहार के अभ्यस्त और रज तथा मोह से ढके मन वाले व्यक्ति के रक्त, रस और संज्ञा (चेतना) को ले जाने वाले स्रोतों को रोककर उनमें ठहर जाते हैं, तब मद, मूर्च्छा और संन्यास होते हैं, और ये तीनों कारण, लक्षण और शान्त होने में क्रम से एक-दूसरे से अधिक बलवान् हैं। अध्याय वात, पित्त, कफ और सन्निपात से होने वाले मद को बोली, चेष्टा और रंग-रूप से पहचानना सिखाता है, और कहता है कि मद्य, विष और रक्त से होने वाले मद भी वात, पित्त और कफ के बिना नहीं होते। मूर्च्छा के प्रकार इससे पहचाने जाते हैं कि अचेत होने से पहले रोगी को आकाश किस रंग का दिखता है, वह कितनी जल्दी होश में आता है, और साथ में कौन-से लक्षण होते हैं। मद और मूर्च्छा दोषों का वेग पूरा होने पर अपने-आप शान्त हो जाते हैं; पर संन्यास, जिसमें रोगी लकड़ी की तरह जड़ और मृतक-सा हो जाता है, औषध के बिना शान्त नहीं होता। इसीलिए डूबते बर्तन की उपमा देकर ग्रन्थ उसका उपचार तुरन्त आरम्भ करने को कहता है, और उसे होश में लाने के तीव्र उपाय, होश लौटने पर हल्का अन्न और मन को जगाने वाले साधन, और फिर मद और मूर्च्छा में पञ्चकर्म, कई घृत, त्रिफला, शिलाजतु, दूध, रसायन, रक्त निकालना और शास्त्रों, सज्जनों और दृढ़ मन वाले लोगों का संग गिनाता है।

इस अध्याय से साथ ले जाने योग्य बातें ये हैं। ग्रन्थ के अनुसार रक्त की शुद्धता आहार-विहार की विधि पर टिकी है, और रक्त के दूषित होने से शरीर, त्वचा और मन तक के अनेक रोग होते हैं। अध्याय दूषित रक्त और चेतना के विकारों, दोनों को दोषों से जोड़कर पहचानता है: हर दोष का अपना रंग और अपने लक्षण हैं। और मद, मूर्च्छा और संन्यास एक ही क्रम की बढ़ती अवस्थाएँ हैं, जिनमें संन्यास सबसे गम्भीर है। अध्याय दो संग्रह-श्लोकों से समाप्त होता है, जो कहते हैं कि शुद्ध और दूषित रक्त, उसके दूषित होने के कारण, उससे होने वाले रोग और उनका औषध, और मद, मूर्च्छा और संन्यास के कारण, लक्षण और उपचार, यह सब इस विधिशोणितीय अध्याय में बताया गया है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ५९-६०)

तत्र श्लोकौ-विशुद्धं चाविशुद्धं च शोणितं तस्य हेतवः।रक्तप्रदोषजा रोगास्तेषु रोगेषु चौषधम्॥

श्लोक ५९ →

इस विषय में (संग्रह के) दो श्लोक (ये हैं): विशुद्ध और अविशुद्ध शोणित (रक्त), उसके (दूषित होने के) हेतु (कारण), रक्त के दूषित होने से उत्पन्न रोग, और उन रोगों में औषध (उपचार),

मदमूर्च्छायसंन्यासहेतुलक्षणभेषजम्।विधिशोणितकेऽध्याये सर्वमेतत् प्रकाशितम्॥

श्लोक ६० →

(तथा) मद, मूर्च्छा और संन्यास के हेतु (कारण), लक्षण और भेषज (उपचार), यह सब विधिशोणितक (विधिशोणितीय) अध्याय में बताया गया है।

मुख्य शब्द (१९) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

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च. सू. २४/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम विधिशोणितीय (विधि-पालन से शुद्ध रक्त सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. २४/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. २४/३

। ॥ ३ ॥

देश, काल और ओकसात्म्य (अभ्यास से बनी अनुकूलता) की जो विधि बताई गई है, उस विधि (के पालन) से उत्पन्न हुआ देहधारियों का रक्त शुद्ध होता है।

च. सू. २४/४

। ॥ ४ ॥

क्योंकि वह शुद्ध रक्त प्राणियों को बल, वर्ण (रंग-रूप), सुख और आयु से युक्त करता है; (प्राणियों का जीवन) रक्त का ही अनुसरण करता है।

च. सू. २४/५

। ॥ ५ ॥

दूषित (बिगड़े हुए), बहुत (अधिक मात्रा में लिए गए), तीक्ष्ण और उष्ण मद्यों से और उसी प्रकार के अन्य (पेयों) से, तथा अत्यधिक लवण (नमकीन) और क्षार (क्षारीय) पदार्थों से, अम्ल (खट्टे) और कटु (तीखे) पदार्थों से भी

च. सू. २४/६

। ॥ ६ ॥

कुलत्थ (कुलथी), माष (उड़द), निष्पाव और तिल-तैल (तिल के तेल) के सेवन से, और पिण्डालु, मूलक (मूली) आदि सब प्रकार के हरित (हरी वनस्पतियों) के (सेवन से)

च. सू. २४/७

। ॥ ७ ॥

जल में उत्पन्न, आनूप (जल-भरे प्रदेश के) और बिल में रहने वाले तथा प्रसह (झपटकर खाने वाले) (प्राणियों के मांस) के सेवन से, दही, अम्ल (खट्टे पदार्थ), मस्तु (दही का पानी) और सुक्त (खमीर उठाकर खट्टा किया गया द्रव) के, और सुरा (एक प्रकार की मदिरा) तथा सौवीरक (एक खट्टा, किण्वित पेय) के (सेवन से)

च. सू. २४/८

। ॥ ८ ॥

और विरुद्ध (परस्पर-विरोधी) आहारों तथा उपक्लिन्न (गीले होकर गले हुए) और पूति (सड़े, दुर्गन्ध वाले) पदार्थों के खाने से; और द्रव (पतले), स्निग्ध (चिकनाई वाले) और गुरु (भारी) पदार्थ खाकर दिन में सोने वालों का

च. सू. २४/९

। ॥ ९ ॥

अत्यधिक आहार तथा क्रोध का, और धूप तथा आग का सेवन करने वालों का; छर्दि (उल्टी) के वेग को रोकने से, और उचित समय पर अवसेचन (रक्त निकालना) न करने से

च. सू. २४/१०

। ॥ १० ॥

श्रम (थकान), अभिघात (चोट) और संताप (अधिक गर्मी) से, अजीर्ण और अध्यशन से, तथा शरद् ऋतु के स्वभाव से भी रक्त दूषित हो जाता है।

च. सू. २४/११

। ॥ ११ ॥

तब (दूषित) रक्त से उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के रोग होते हैं: मुखपाक (मुँह का पकना), अक्षिराग (आँखों की लाली) और नाक तथा मुँह से दुर्गन्ध आना

च. सू. २४/१२

। ॥ १२ ॥

गुल्म (पेट की गाँठ), उपकुश (मसूड़ों का रोग), वीसर्प, रक्तपित्त, प्रमीलक, विद्रधि (गहरा फोड़ा), रक्तमेह, प्रदर और वातशोणित

च. सू. २४/१३

। ॥ १३ ॥

वैवर्ण्य (रंग का बिगड़ना), अग्निसाद (पाचक अग्नि का मन्द होना), प्यास, शरीर का भारीपन, संताप (तपन), अत्यधिक दुर्बलता, अरुचि (भोजन में रुचि न होना) और सिर का दर्द

च. सू. २४/१४

। ॥ १४ ॥

अन्न-पान (खाने-पीने) का विदाह (जलन पैदा करना), कड़वे और खट्टे (पदार्थ) का मुँह में आना, क्लम (थकावट), क्रोध की अधिकता, बुद्धि का संमोह (भ्रम) और मुँह का नमकीन रहना

च. सू. २४/१५

। ॥ १५ ॥

स्वेद (पसीना), शरीर की दुर्गन्ध, मद (नशे जैसी अवस्था), कम्प (काँपना), स्वर का क्षय (आवाज़ बैठना), तन्द्रा (ऊँघ) और निद्रा की अधिकता, और बार-बार अँधेरा दिखना

च. सू. २४/१६

। ॥ १६ ॥

कण्डू (खुजली), अरुः (घाव), कोठ (चकत्ते), पिडका (फुंसियाँ), कुष्ठ (त्वचा के रोग), चर्मदल आदि; ये सभी विकार शोणिताश्रय (रक्त पर आश्रित) ही जानने चाहिए।

च. सू. २४/१७

। ॥ १७ ॥

और जो रोग साध्य (ठीक होने योग्य) होते हुए भी शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष आदि (उपचारों) से भली-भाँति चिकित्सा किए जाने पर ठीक नहीं होते, उन्हें रक्त से उत्पन्न (रोग) समझना चाहिए।

च. सू. २४/१८

। ॥ १८ ॥

रक्त के रोगों में रक्तपित्त को दूर करने वाली चिकित्सा करनी चाहिए, और विरेक (विरेचन), उपवास और रक्त का स्रावण (रक्त निकालना) भी।

च. सू. २४/१९

। ॥ १९ ॥

(चिकित्सक) प्राणी (रोगी) का रक्त (उसके) बल और दोष के प्रमाण के अनुसार, या रक्त की विशुद्धि (होने तक), या आशय (स्थान) को भली-भाँति देखकर निकाले।

च. सू. २४/२०

। ॥ २० ॥

वात से (दूषित) रक्त अरुण (लाल-भूरी) आभा वाला, विशद (चिपचिपाहट से रहित), झागदार और पतला होता है; पित्त से (दूषित) रक्त पीला और काला होता है, और उष्णता के कारण देर से जमता है।

च. सू. २४/२१

। ॥ २१ ॥

कफ से दूषित (रक्त) थोड़ा पाण्डु (पीलापन लिए सफ़ेद), पिच्छिल (चिपचिपा), तन्तुओं (तारों) वाला और गाढ़ा होता है; संसर्ग (दो दोषों के मेल) से (दूषित रक्त) मिले-जुले लक्षणों वाला, और सान्निपातिक (तीनों दोषों से दूषित रक्त) तीनों (दोषों) के लक्षणों वाला होता है।

च. सू. २४/२२

। ॥ २२ ॥

जो रक्त तपनीय (तपाए हुए सोने) और इन्द्रगोप (बीरबहूटी) जैसी आभा वाला, पद्म (कमल) और अलक्तक (महावर) के समान, और गुञ्जा (घुँघची) के फल के समान रंग वाला हो, उसे विशुद्ध रक्त जानो।

च. सू. २४/२३

। ॥ २३ ॥

रक्त निकाल दिए जाने पर ऐसा अन्न-पान (भोजन और पेय) हितकर है जो न बहुत गरम हो न बहुत ठंडा, जो लघु (हल्का) हो और दीपनीय (अग्नि को जगाने वाला) हो; क्योंकि उस समय शरीर का रक्त अनवस्थित (अस्थिर) होता है, और अग्नि की विशेष रूप से रक्षा की जानी चाहिए।

च. सू. २४/२४

। ॥ २४ ॥

जिसका वर्ण और इन्द्रियाँ प्रसन्न (निर्मल) हों, जो इन्द्रियों के विषयों की इच्छा रखता हो, जिसका पाचन और (मल-मूत्र आदि के) वेग बिना रुकावट के हों, जो सुख से युक्त हो और तुष्टि (संतोष) तथा बल से सम्पन्न हो, ऐसे पुरुष को (विद्वान्) विशुद्ध रक्त वाला कहते हैं।

च. सू. २४/२५

। ॥ २५ ॥

परन्तु जब कुपित मल (दोष), अलग-अलग अथवा सब मिलकर, रक्त को ले जाने वाले तथा रस और संज्ञा (चेतना) को ले जाने वाले स्रोतों को

च. सू. २४/२६

। ॥ २६ ॥

मलिन (अशुद्ध) आहार के अभ्यस्त और रज तथा मोह से ढकी आत्मा वाले (व्यक्ति के उन स्रोतों को) रोककर (उनमें) ठहर जाते हैं, तब रोग उत्पन्न होते हैं।

च. सू. २४/२७

। ॥ २७ ॥

वे (रोग) मद, मूर्च्छा (मूर्च्छाय) और संन्यास हैं; बुद्धिमान (वैद्य) जाने कि हेतु, लिङ्ग और उपशान्ति में उनका बल क्रमशः (एक से अगले में) अधिक होता है।

च. सू. २४/२८

। ॥ २८ ॥

जब वायु (वात) चित्त (मन) के दुर्बल स्थान में पहुँचता है, तब वह प्राणी के मन को क्षुब्ध करते हुए उसकी संज्ञा (चेतना) को मोहित कर देता है।

च. सू. २४/२९

। ॥ २९ ॥

इसी प्रकार पित्त, और इसी प्रकार कफ भी, मनुष्यों के मन को क्षुब्ध करते हुए संज्ञा (चेतना) को व्याकुलता में पहुँचा देता है; और इस विषय में (इनका) भेद आगे कहा जाएगा।

च. सू. २४/३०

। ।

जिसकी बोली अटकती हुई, बहुत अधिक और तेज़ हो, जिसकी चेष्टाएँ चंचल और लड़खड़ाती हों, और जिसकी आकृति (रंग-रूप) रूखी, श्याव (साँवली-भूरी) और अरुण (ललाई लिए) हो, उसे वात के मद से ग्रस्त जाने।

च. सू. २४/३१

। ॥ ३१ ॥

जिसकी बोली क्रोध भरी और कठोर हो, जिसे मार-पीट और कलह प्रिय हों, और जिसकी आकृति (रंग-रूप) लाल, पीली और काली हो, उसे पित्त के मद से ग्रस्त जाने।

च. सू. २४/३२

। ॥ ३२ ॥

जिसकी बोली बहुत थोड़ी और असंगत हो, जो तन्द्रा (ऊँघ) और आलस्य से युक्त हो, (जिसका रंग) पाण्डु (फीका सफ़ेद-पीला) हो और जो गहरे सोच-विचार में डूबा रहे, उसे कफ के मद से ग्रस्त जाने।

च. सू. २४/३३

। ॥ ३३ ॥

सन्निपात (तीनों दोषों के एक साथ कुपित होने) से हुए मद में ये सभी रूप (लक्षण) होते हैं। मद्य के मद जैसे रूप वाला मद उत्पन्न होता है और जल्दी शान्त हो जाता है।

च. सू. २४/३४

। ॥ ३४ ॥

जो मद्य से उत्पन्न (मद) कहा गया है, और जो विष से उत्पन्न और जो रक्त से उत्पन्न (मद) है, ये सभी मद वात, पित्त और कफ, इन तीनों के बिना नहीं होते।

च. सू. २४/३५

। ॥ ३५ ॥

(रोगी) आकाश को नीला, या काला, अथवा अरुण (लाल) देखते हुए अन्धकार में प्रवेश करता है और शीघ्र ही होश में आ जाता है।

च. सू. २४/३६

। ॥ ३६ ॥

वात से उत्पन्न मूर्च्छा में कँपकँपी, अंगों में टूटन, हृदय में तीव्र पीड़ा, कृशता (दुबलापन) और श्याव-अरुण (साँवली-भूरी, ललाई लिए) छाया (शरीर की कान्ति) होती है।

च. सू. २४/३७

। ॥ ३७ ॥

(रोगी) आकाश को लाल, या हरे रंग का, अथवा पीला भी देखते हुए अन्धकार में प्रवेश करता है और पसीने के साथ होश में आता है।

च. सू. २४/३८

। ॥ ३८ ॥

पित्त से उत्पन्न मूर्च्छा में (रोगी) प्यास और संताप (जलन भरे ताप) से युक्त होता है, उसकी आँखें लाल, पीली और व्याकुल होती हैं, मल पतला (बिखरा हुआ) होता है और (शरीर की) आभा पीली होती है।

च. सू. २४/३९

। ॥ ३९ ॥

(रोगी) आकाश को बादलों जैसा, या घने अन्धकार (के बादलों) से ढका हुआ देखते हुए अन्धकार में प्रवेश करता है और देर से होश में आता है।

च. सू. २४/४०

। ॥ ४० ॥

कफ से उत्पन्न मूर्च्छा में (रोगी के) अंग भारी होते हैं, मानो ठीक गीले चमड़े से ढके हों; और (उसे) प्रसेक (मुँह में पानी भर आना) और हृल्लास (जी मिचलाना) होता है।

च. सू. २४/४१

। ॥ ४१ ॥

सन्निपात से (होने वाली मूर्च्छा) सभी (दोषों के) रूपों वाली होती है और अपस्मार की तरह आती है; वह प्राणी को शीघ्र गिरा देती है, पर बीभत्स चेष्टाओं के बिना।

च. सू. २४/४२

। ॥ ४२ ॥

दोषों के अपना वेग कर चुकने पर देहधारियों के मद और मूर्च्छा अपने-आप ही शान्त हो जाते हैं; (परन्तु) संन्यास औषधों के बिना (शान्त) नहीं होता।

च. सू. २४/४३

। ॥ ४३ ॥

प्राणायतनों (प्राण के ठिकानों) में आश्रय लिए हुए अत्यन्त बलवान् मल (दोष) वाणी, देह और मन की चेष्टा को छीनकर बलहीन प्राणी को (निश्चेष्ट करके) गिरा देते हैं।

च. सू. २४/४४

। ॥ ४४ ॥

संन्यास से गिराया हुआ वह मनुष्य लकड़ी जैसा (जड़) और मृतक के समान हो जाता है; तत्काल फल देने वाली क्रियाओं (उपचारों) के बिना वह शीघ्र प्राणों से अलग हो जाता है।

च. सू. २४/४५

। ॥ ४५ ॥

जैसे बुद्धिमान् (व्यक्ति) दुर्गम (गहरे) जल में डूबते हुए पात्र को, तल तक पहुँचने से पहले ही, शीघ्रता से पकड़ ले, वैसे ही संन्यास से पीड़ित (रोगी) को (भी तुरन्त सँभाल ले)।

च. सू. २४/४६

। ॥ ४६ ॥

अञ्जन, अवपीड (नस्य) और धूम, तथा प्रधमन (नाक में औषध-चूर्ण फूँकना); सुइयों से चुभोना प्रशस्त है; दाह (दागना), और नाखूनों के भीतर पीड़ा पहुँचाना,

च. सू. २४/४७

। ॥ ४७ ॥

सिर के बालों और शरीर के रोमों को उखाड़ना, दाँतों से काटना, और आत्मगुप्ता (कौंच) से रगड़ना, (ये सब) उसे जगाने (होश में लाने) में हितकर हैं।

च. सू. २४/४८

। ॥ ४८ ॥

आपस में मिलाए हुए, तीक्ष्ण और विविध मद्य, बहुत से कटु (तीखे) द्रव्यों से युक्त करके, (वैद्य) उसके मुँह में बार-बार डाले।

च. सू. २४/४९

। ॥ ४९ ॥

उसी प्रकार महौषध (सोंठ) मिला हुआ मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू) का रस, और उसी प्रकार सौवर्चल (काला नमक) को मद्य, अम्ल (खट्टे द्रव्यों) और काञ्जिक (काँजी) के साथ मिलाकर दे,

च. सू. २४/५०

। ॥ ५० ॥

हिङ्गु (हींग) और ऊषण (काली मिर्च) मिलाकर, तब तक (दे) जब तक संज्ञा (चेतना) न जाग जाए। संज्ञा जाग जाने पर उस (रोगी) का उपचार लघु (हल्के) अन्नों से करे, और

च. सू. २४/५१

। ॥ ५१ ॥

विस्मय में डालने वाले और याद दिलाने वाले उपायों से, प्रिय बातें सुनाने से भी, गीत और वाद्यों के तीव्र शब्दों से, और विचित्र दृश्यों से,

च. सू. २४/५२

। ॥ ५२ ॥

स्रंसन (हल्के विरेचन), उल्लेखन (वमन), धूम, अञ्जन, कवलग्रह, शोणित के अवसेक (रक्त निकालने) से, और उसी प्रकार व्यायाम और उद्घर्षण (शरीर को रगड़ने) से (भी उसका उपचार करे)।

च. सू. २४/५३

। ॥ ५३ ॥

संज्ञा (चेतना) लौट आए (रोगी) के अनुबन्ध (रोग के बचे हुए प्रभाव) का उपचार बुद्धिमान् (वैद्य) करे, क्योंकि उसके मन की प्रलय (चेतना के लोप) के कारणों से रक्षा करनी चाहिए।

च. सू. २४/५४

। ॥ ५४ ॥

मूर्च्छा और मद (के रोगों) में, जिन (रोगियों) को स्नेह और स्वेद दिया जा चुका हो, उनके दोष के अनुसार और बल के अनुसार पञ्च कर्म (पाँच शोधन कर्म) करे।

च. सू. २४/५५

। ॥ ५५ ॥

अट्ठाईस औषधों वाले (घृत) का, तथा तिक्त सर्पि (घृत) का प्रयोग प्रशस्त है; उसी प्रकार महान् (तिक्त घृत) का, या षट्पल (घृत) का (प्रयोग भी प्रशस्त है)।

च. सू. २४/५६

। ॥ ५६ ॥

या घृत, क्षौद्र (मधु) और शर्करा सहित त्रिफला का प्रयोग, या शिलाजतु (शिलाजीत) का प्रयोग, या पयस् (दूध) का प्रयोग भी,

च. सू. २४/५७

। ॥ ५७ ॥

या दूध के साथ पिप्पलियों का, या चित्रक (चीता) का प्रयोग, (या) रसायनों का, या कौम्भ सर्पि (घड़े में रखे घी) का (प्रयोग) प्रशस्त है।

च. सू. २४/५८

। ॥ ५८ ॥

रक्त के अवसेक (रक्त निकालने) से, और शास्त्रों का, सज्जनों का तथा सत्त्ववान् (दृढ़ मन वाले) लोगों का भी सेवन (अध्ययन और संग) करने से, शरीरधारियों के मद और मूर्च्छा (के रोग) शान्त हो जाते हैं।

च. सू. २४/५९

- । ॥ ५९ ॥

इस विषय में (संग्रह के) दो श्लोक (ये हैं): विशुद्ध और अविशुद्ध शोणित (रक्त), उसके (दूषित होने के) हेतु (कारण), रक्त के दूषित होने से उत्पन्न रोग, और उन रोगों में औषध (उपचार),

च. सू. २४/६०

। ॥ ६० ॥

(तथा) मद, मूर्च्छा और संन्यास के हेतु (कारण), लक्षण और भेषज (उपचार), यह सब विधिशोणितक (विधिशोणितीय) अध्याय में बताया गया है।

च. सू. २४

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान (सूत्रस्थान) में विधिशोणितीय नामक चौबीसवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।

च. सू. २४

॥॥

योजनाचतुष्क (चार अध्यायों का समूह) समाप्त हुआ।