भूमिका
विधिशोणितीय अध्याय चरक संहिता के सूत्रस्थान का चौबीसवाँ अध्याय है, और इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। इसका नाम इसके पहले श्लोक के आरम्भिक शब्दों 'विधिना शोणितम्' से बना है, जिनका अर्थ है 'विधि (के पालन) से (शुद्ध) रक्त'; इसका हिन्दी शीर्षक 'शुद्ध रक्त (रक्त-विकार, मद और मूर्छा)' है। अध्याय के दो भाग हैं। पहला रक्त का है: शुद्ध और दूषित रक्त, रक्त के दूषित होने के कारण, दूषित रक्त से होने वाले रोग और उनकी चिकित्सा। दूसरा मद, मूर्च्छा और संन्यास का है, यानी चेतना के धुँधला पड़ने और खो जाने की तीन अवस्थाओं का, उनके कारणों, लक्षणों और उपचार सहित। अध्याय की पुष्पिका बताती है कि इसके साथ योजनाचतुष्क, यानी चार अध्यायों का एक समूह, पूरा होता है।
आत्रेय पहले बताते हैं कि देश, काल और ओकसात्म्य (अभ्यास से बनी अनुकूलता) की बताई गई विधि के पालन से देहधारियों का रक्त शुद्ध होता है, और शुद्ध रक्त प्राणी को बल, वर्ण (रंग-रूप), सुख और आयु देता है। फिर एक लम्बी सूची में रक्त के दूषित होने के कारण गिनाए गए हैं: बिगड़े, तीक्ष्ण और उष्ण मद्य, अधिक नमकीन, क्षारीय, खट्टे और तीखे पदार्थ, कुलथी, उड़द और तिल का तेल, जल और दलदली प्रदेश के प्राणियों (का मांस), दही, सुरा और सौवीरक जैसे खट्टे और किण्वित पदार्थ, विरुद्ध और सड़ा-गला आहार, भारी भोजन के बाद दिन में सोना, अधिक खाना, क्रोध, धूप और आग का सेवन, उल्टी के वेग को रोकना, थकान, चोट, अजीर्ण और अध्यशन, और शरद् ऋतु का स्वभाव। दूषित रक्त से होने वाले रोगों और लक्षणों की सूची भी उतनी ही लम्बी है, मुँह के पकने और आँखों की लाली से लेकर गुल्म, वीसर्प, रक्तपित्त, विद्रधि, प्रदर और वातशोणित, पाचक अग्नि के मन्द होने, क्रोध की अधिकता और बुद्धि के भ्रम, और खुजली, फुंसियों और कुष्ठ (त्वचा के रोगों) तक। अध्याय इन सबको शोणिताश्रय, यानी रक्त पर आश्रित, कहता है, और यह भी कहता है कि जो साध्य रोग शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष आदि उपचारों से भी ठीक न हों, उन्हें रक्त से उत्पन्न समझा जाए।
इन रोगों की चिकित्सा में ग्रन्थ रक्तपित्त को दूर करने वाली चिकित्सा, विरेचन, उपवास और रक्त निकालना बताता है; रक्त कितना निकाला जाए, यह रोगी के बल और दोष के प्रमाण से, रक्त के शुद्ध होने से, या आशय (स्थान) को देखकर तय होता है। फिर रंग-रूप से पहचान आती है: वात से दूषित रक्त ललाई लिए भूरा, झागदार और पतला होता है; पित्त से दूषित पीला और काला, और देर से जमने वाला; कफ से दूषित थोड़ा पीलापन लिए सफ़ेद, चिपचिपा और गाढ़ा; और शुद्ध रक्त तपाए सोने, बीरबहूटी, कमल, महावर और घुँघची जैसे लाल रंग का। रक्त निकालने के बाद ग्रन्थ ऐसा अन्न-पान हितकर कहता है जो न बहुत गरम हो न बहुत ठंडा, हल्का हो और अग्नि को जगाए, क्योंकि उस समय रक्त अस्थिर होता है। विशुद्ध रक्त वाले व्यक्ति की पहचान भी दी गई है: निर्मल वर्ण और इन्द्रियाँ, विषयों में रुचि, बिना रुकावट का पाचन और वेग, सुख, संतोष और बल।
दूसरा भाग बताता है कि जब कुपित दोष, मलिन आहार के अभ्यस्त और रज तथा मोह से ढके मन वाले व्यक्ति के रक्त, रस और संज्ञा (चेतना) को ले जाने वाले स्रोतों को रोककर उनमें ठहर जाते हैं, तब मद, मूर्च्छा और संन्यास होते हैं, और ये तीनों कारण, लक्षण और शान्त होने में क्रम से एक-दूसरे से अधिक बलवान् हैं। अध्याय वात, पित्त, कफ और सन्निपात से होने वाले मद को बोली, चेष्टा और रंग-रूप से पहचानना सिखाता है, और कहता है कि मद्य, विष और रक्त से होने वाले मद भी वात, पित्त और कफ के बिना नहीं होते। मूर्च्छा के प्रकार इससे पहचाने जाते हैं कि अचेत होने से पहले रोगी को आकाश किस रंग का दिखता है, वह कितनी जल्दी होश में आता है, और साथ में कौन-से लक्षण होते हैं। मद और मूर्च्छा दोषों का वेग पूरा होने पर अपने-आप शान्त हो जाते हैं; पर संन्यास, जिसमें रोगी लकड़ी की तरह जड़ और मृतक-सा हो जाता है, औषध के बिना शान्त नहीं होता। इसीलिए डूबते बर्तन की उपमा देकर ग्रन्थ उसका उपचार तुरन्त आरम्भ करने को कहता है, और उसे होश में लाने के तीव्र उपाय, होश लौटने पर हल्का अन्न और मन को जगाने वाले साधन, और फिर मद और मूर्च्छा में पञ्चकर्म, कई घृत, त्रिफला, शिलाजतु, दूध, रसायन, रक्त निकालना और शास्त्रों, सज्जनों और दृढ़ मन वाले लोगों का संग गिनाता है।
इस अध्याय से साथ ले जाने योग्य बातें ये हैं। ग्रन्थ के अनुसार रक्त की शुद्धता आहार-विहार की विधि पर टिकी है, और रक्त के दूषित होने से शरीर, त्वचा और मन तक के अनेक रोग होते हैं। अध्याय दूषित रक्त और चेतना के विकारों, दोनों को दोषों से जोड़कर पहचानता है: हर दोष का अपना रंग और अपने लक्षण हैं। और मद, मूर्च्छा और संन्यास एक ही क्रम की बढ़ती अवस्थाएँ हैं, जिनमें संन्यास सबसे गम्भीर है। अध्याय दो संग्रह-श्लोकों से समाप्त होता है, जो कहते हैं कि शुद्ध और दूषित रक्त, उसके दूषित होने के कारण, उससे होने वाले रोग और उनका औषध, और मद, मूर्च्छा और संन्यास के कारण, लक्षण और उपचार, यह सब इस विधिशोणितीय अध्याय में बताया गया है।