भारत संहिता

अध्याय २५

यज्जःपुरुषीयोऽध्यायः

पुरुष और रोगों की उत्पत्ति

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भूमिका

यज्जःपुरुषीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का पच्चीसवाँ अध्याय है, और इसका विषय है पुरुष और रोगों की उत्पत्ति। अध्याय का नाम काशी के राजा वामक के प्रश्न से आया है, जो उन्होंने महर्षियों की सभा में रखा: पुरुष जिससे उत्पन्न होता है ('यज्जः'), क्या उसके रोग भी उसी से उत्पन्न होते हैं, या नहीं? यहाँ 'पुरुष' का अर्थ केवल शरीर नहीं है; अध्याय उसे आत्मा, इन्द्रियों, मन और इन्द्रियों के विषयों (अर्थों) का समूह कहता है, यानी जीवित मनुष्य। यह उपदेश भगवान् आत्रेय का है, जिन्हें अध्याय पुनर्वसु नाम से भी कहता है। अध्याय के दो बड़े भाग हैं: पहले महर्षियों का वाद-विवाद, कि पुरुष और रोग किससे उत्पन्न होते हैं; फिर आहार की बात: हित और अहित आहार की पहचान, हर वर्ग में सबसे हितकर और सबसे अहितकर द्रव्य, अपने-अपने वर्ग में सबसे आगे रहने वाले 'अग्र्य' द्रव्यों की लम्बी सूची, और आसवों की गिनती।

कथा के अनुसार बहुत पहले कई महर्षि भगवान् पुनर्वसु के पास एकत्र हुए थे, और उनके बीच यही चर्चा उठी। राजा वामक का प्रश्न सुनकर पुनर्वसु ऋषियों से कहते हैं कि आप सब, जिनके संशय अपार ज्ञान और विज्ञान से कट चुके हैं, राजा का संशय दूर कर सकते हैं। फिर ऋषि बारी-बारी से बोलते हैं, और हर ऋषि पहले पिछले मत का खण्डन करते हैं, फिर अपना मत रखते हैं। पारीक्षि मौद्गल्य कहते हैं कि पुरुष और रोग आत्मा से उत्पन्न होते हैं, क्योंकि आत्मा ही कर्म का संचय करता है और उसका फल भोगता है। शरलोमा कहते हैं कि दुःख से द्वेष करने वाला आत्मा अपने-आप को रोगों से नहीं जोड़ेगा; उनके अनुसार कारण रज और तम से घिरा हुआ मन है, जिसे सत्त्व कहते हैं। वार्योविद कहते हैं कि अकेला मन कारण नहीं हो सकता, और कारण रस को बताते हैं, क्योंकि रस से युक्त जल को उत्पत्ति का कारण माना गया है। हिरण्याक्ष कहते हैं कि आत्मा और मन रस से उत्पन्न नहीं होते, और कुछ रोग शब्द आदि विषयों से भी होते हैं; उनके अनुसार पुरुष और रोग छह धातुओं से उत्पन्न होते हैं, जैसा प्राचीन सांख्य आचार्यों ने बताया है। कौशिक पूछते हैं कि माता-पिता के बिना कोई कैसे उत्पन्न होगा, और माता-पिता को कारण बताते हैं। भद्रकाप्य कहते हैं कि अन्धे से अन्धा उत्पन्न नहीं होता, और माता-पिता स्वयं पहले-पहल किससे उत्पन्न हुए, यह भी इस मत से सिद्ध नहीं होता; उनके अनुसार कारण कर्म है। भरद्वाज कहते हैं कि कर्ता कर्म से पहले होता है, इसलिए पुरुष कर्म का फल नहीं हो सकता; उनके अनुसार कारण स्वभाव है, जैसे पृथ्वी का कठोर, जल का द्रव, वायु का चल और तेज का उष्ण होना। काङ्कायन कहते हैं कि तब तो किसी प्रयत्न का कोई फल ही न होता; उनके अनुसार सुख और दुःख को रचने वाले अपरिमित सङ्कल्प वाले प्रजापति जी हैं, जिन्हें वे ब्रह्मा जी की सन्तान कहते हैं। भिक्षु आत्रेय, जो इस सभा में पुनर्वसु से अलग वक्ता हैं, कहते हैं कि प्रजा का हित चाहने वाले प्रजापति जी किसी दुष्ट की तरह अपनी सन्तान को दुःखों से नहीं जोड़ेंगे। अन्तिम मत, जिसके कहने वाले का नाम श्लोक में नहीं है पर जो वाद-विवाद के क्रम से भिक्षु आत्रेय का लगता है, यह है कि सारा जगत् काल के वश में है और काल ही सब जगह कारण है।

तब भगवान् पुनर्वसु ऋषियों को रोकते हैं। वे कहते हैं कि किसी एक पक्ष का आश्रय लेने से तत्त्व (सत्य) कठिनाई से मिलता है; जो लोग तर्क और प्रति-तर्क ऐसे बोलते हैं मानो वे पहले से निश्चित हों, वे तिल पेरने वाले की चाल की तरह किसी अन्तिम निर्णय तक नहीं पहुँचते। इसलिए वे वाद-विवाद का टकराव छोड़कर अध्यात्म के चिन्तन की बात कहते हैं, क्योंकि तम, यानी अज्ञान, का ढेर हटे बिना ज्ञान अपने विषय तक नहीं पहुँचता। उनका अपना उत्तर यह है कि पुरुष और रोगों के कारण अलग-अलग नहीं हैं: जिन भावों की सम्पत्, यानी ठीक और पूर्ण अवस्था, मनुष्य को उत्पन्न करती है, उन्हीं भावों की विपत्, यानी बिगड़ी हुई अवस्था, अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न करती है। राजा वामक फिर पूछते हैं कि इस प्रकार उत्पन्न पुरुष और रोग बढ़ते किससे हैं, और आत्रेय उत्तर देते हैं कि हित आहार का सेवन ही पुरुष की वृद्धि करता है, और अहित आहार का सेवन रोगों का निमित्त है।

इस पर आत्रेय के शिष्य अग्निवेश एक कठिनाई रखते हैं: हित कहे जाने वाले आहार भी मात्रा, काल, क्रिया, भूमि, देह, दोष और व्यक्ति की अवस्था बदलने पर उलटा काम करते दिखते हैं, तो हित और अहित का ऐसा लक्षण क्या है जिसमें कोई अपवाद न हो? आत्रेय बताते हैं कि जो आहार सम (सन्तुलित) शरीर-धातुओं को उनकी स्वाभाविक अवस्था में बनाए रखे और विषम (असन्तुलित) धातुओं को सम कर दे, वह हित है, और जो इसके विपरीत हो, वह अहित। अग्निवेश कहते हैं कि इस रूप में इसे अधिकतर वैद्य नहीं समझ पाएँगे, तो आत्रेय आहार को दो तरह से समझाते हैं। लक्षण से: आहार होने के नाते आहार एक है; उसके उद्गम दो हैं, स्थावर (पेड़-पौधे) और जङ्गम (प्राणी); उसका प्रभाव दो तरह का है, हितकर और अहितकर; वह चार तरह से लिया जाता है, पान, अशन, भक्ष्य और लेह्य के रूप में; उसके स्वाद छह हैं और गुण बीस; और द्रव्यों, उनके संयोगों और तैयार करने की विधियों की बहुलता से उसके भेद अनगिनत हैं। अवयव से: आहार के हर वर्ग में स्वभाव से सबसे हितकर और सबसे अहितकर द्रव्य, जैसे शूकधान्यों में लोहितशालि सबसे हितकर और यवक सबसे अहितकर, शमीधान्यों में मूँग और उड़द, जलों में आकाश से बरसा जल और वर्षा ऋतु का नदी-जल, लवणों में सेंधा नमक और खारी भूमि का नमक, घी और दूध में गाय के और भेड़ के, और ईख से बने पदार्थों में शर्करा और फाणित।

फिर आत्रेय कर्मों और औषधों के अग्र्य गिनाते हैं, यानी हर वर्ग में जो सबसे आगे है: जीवन चलाने वालों में अन्न, राहत देने वालों में जल, कफ को हरने वालों में वमन, पित्त को हरने वालों में विरेचन, वात को हरने वालों में बस्ति, आयु बढ़ाने वालों में ब्रह्मचर्य, रोग बढ़ाने वालों में विषाद, रोगों में ज्वर, चिकित्सा के अङ्गों में वैद्य, अमृतों में आयुर्वेद, और सुखों में सबका त्याग। यह सूची केवल अच्छी चीज़ों की नहीं है: रोग करने वालों या आयु घटाने वालों में जो सबसे आगे है, वह उस हानि का सबसे बड़ा कारण है। इसके बाद के श्लोक कहते हैं कि ये एक सौ बावन अग्र्य रोगों को दूर करने के लिए पर्याप्त हैं; कि एक जैसा काम करने वालों में श्रेष्ठ वही है जो उस काम में बढ़कर हो; और कि पथ्य और अपथ्य की पहचान नियत नहीं है, क्योंकि मात्रा, काल, क्रिया, भूमि, देह, दोष और गुण के भेद से वही वस्तु अलग रूप में दिखती है, इसलिए चिकित्सा में वस्तु का स्वभाव और मात्रा आदि, दोनों देखे जाएँ। अन्त में अग्निवेश आसवों के बारे में पूछते हैं, और आत्रेय बताते हैं कि आसवों की योनियाँ धान्य, फल, मूल, सार, पुष्प, काण्ड, पत्र और छाल, ये आठ, और नौवीं शर्करा हैं; वे इनसे बनने वाले चौरासी श्रेष्ठ आसव गिनाते हैं, और बताते हैं कि आसुत होने के कारण इनका नाम आसव है। अध्याय के अनुसार साथ ले जाने योग्य बातें ये हैं: पुरुष और उसके रोग एक ही भावों से बनते हैं, अन्तर केवल उनकी ठीक या बिगड़ी अवस्था का है; किसी एक पक्ष का आग्रह सत्य तक पहुँचने नहीं देता; और कोई आहार हित है या अहित, यह उसके नाम से नहीं, शरीर की धातुओं पर उसके प्रभाव से पहचाना जाता है, जो मात्रा, काल और व्यक्ति की अवस्था के साथ बदल सकता है। ये सूचियाँ चरक संहिता का वर्गीकरण हैं, किसी द्रव्य को अपनाने की सलाह नहीं।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ५१)

तत्र श्लोकःशरीररोगप्रकृतौ मतानि तत्त्वेन चाहारविनिश्चयं च ।उवाच यज्जःपुरुषादिकेऽस्मिन् मुनिस्तथाऽग्र्याणि वरासवांश्च ॥

श्लोक ५१ →

इस विषय में (यह) श्लोक है: इस यज्जःपुरुषादिक (यज्जःपुरुषीय) अध्याय में मुनि (आत्रेय) ने शरीर और रोगों की प्रकृति (उत्पत्ति के कारण) के विषय में (ऋषियों के) मत, और तत्त्व से (यथार्थ रूप में) आहार का विनिश्चय (निर्णय), तथा अग्र्य (सबसे श्रेष्ठ द्रव्य) और श्रेष्ठ आसव कहे।

मुख्य शब्द (२८) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

आरोग्य
आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार

शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।

अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।

चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

आयुर्वेद
आयु का ज्ञान - जीवन और स्वास्थ्य का शास्त्र
विस्तार

शब्द-रचना: आयुस् (आयु, जीवन) + वेद (ज्ञान; √विद् 'जानना' से)।

अर्थ: आयु का वेद, अर्थात् जीवन का ज्ञान।

चरक संहिता में: आयुर्वेद वह शास्त्र है जिसमें हित और अहित, सुख और दुःख वाली आयु, आयु के लिए क्या हितकर और क्या अहितकर है, आयु का मान, और स्वयं आयु बताई गई हो (सू. १/४१)। इसलिए आयुर्वेद केवल रोगों की दवा नहीं, पूरे जीवन को स्वस्थ और सार्थक रखने की विद्या है।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. सू. २५/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम यज्जःपुरुषीय (पुरुष जिससे उत्पन्न होता है, उस प्रश्न सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. २५/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. २५/३

। ॥ ३ ॥

पूर्वकाल में भगवान् पुनर्वसु के पास एकत्र हुए, धर्म को प्रत्यक्ष जानने वाले महर्षियों के बीच यह चर्चा उठी,

च. सू. २५/४

। ॥ ४ ॥

आत्मा, इन्द्रियों, मन और अर्थों (इन्द्रियों के विषयों) का यह जो समूह पुरुष कहलाता है, उसकी और इसके रोगों की प्रथम उत्पत्ति के निर्णय के विषय में।

च. सू. २५/५

। ॥ ५ ॥

उस अवसर पर, अर्थ (बातों का सार) जानने वाले काशी के स्वामी वामक ने ऋषियों की सभा के पास जाकर और (उन्हें) अभिवादन करके (यह) वचन कहा।

च. सू. २५/६

। ॥ ६ ॥

'हे महानुभावो, क्या पुरुष जिससे उत्पन्न होता है, उसके रोग भी उसी से उत्पन्न माने गए हैं, या नहीं?' राजा के ऐसा कहने पर पुनर्वसु ने ऋषियों से कहा।

च. सू. २५/७

। ॥ ७ ॥

आप सभी, जिनके संशय अपार ज्ञान और विज्ञान से कट चुके हैं, काशी के राजा के संशय को काटने (दूर करने) के योग्य हैं।

च. सू. २५/८

। ॥ ८ ॥

उस (प्रश्न) को परखकर सबसे पहले पारीक्षि मौद्गल्य ने (यह) वचन कहा: पुरुष आत्मा से उत्पन्न होता है, और रोग भी आत्मा से उत्पन्न होते हैं, क्योंकि वह (आत्मा) कारण है।

च. सू. २५/९

। ॥ ९ ॥

वह (आत्मा) कर्म का संचय करता है और कर्मों के फलों को भोगता है; क्योंकि चेतना-धातु (चेतन तत्त्व) के बिना सुख और दुःख की प्रवृत्ति (उत्पत्ति) नहीं होती।

च. सू. २५/१०

। ॥ १० ॥

परन्तु शरलोमा ने कहा कि नहीं, क्योंकि दुःख से द्वेष करने वाला आत्मा स्वयं अपने-आप को दुःख देने वाली व्याधियों से कभी नहीं जोड़ेगा।

च. सू. २५/११

। ॥ ११ ॥

बल्कि रज और तम से घिरा हुआ मन, जिसे सत्त्व कहते हैं, शरीर की और विकारों (रोगों) की उत्पत्ति में कारण है।

च. सू. २५/१२

। ॥ १२ ॥

परन्तु वार्योविद ने कहा कि नहीं, क्योंकि अकेला मन कारण नहीं है। शरीर के बिना न शारीरिक रोग (होते हैं), न मन की स्थिति (होती है)।

च. सू. २५/१३

। ॥ १३ ॥

बल्कि प्राणी रस से उत्पन्न होते हैं, और अलग-अलग प्रकार की व्याधियाँ (रोग) भी; क्योंकि रस से युक्त वह जल (उनकी) उत्पत्ति का कारण माना गया है।

च. सू. २५/१४

। ॥ १४ ॥

परन्तु हिरण्याक्ष ने कहा कि नहीं, क्योंकि आत्मा रस से उत्पन्न नहीं माना गया है, न ही इन्द्रियों से परे रहने वाला मन; और शब्द आदि (विषयों) से उत्पन्न रोग भी होते हैं।

च. सू. २५/१५

। ॥ १५ ॥

बल्कि पुरुष छह धातुओं से उत्पन्न है, और रोग भी वैसे ही छह धातुओं से उत्पन्न हैं; क्योंकि प्राचीन सांख्य (आचार्यों) ने इस राशि (पुरुष) को छह धातुओं से उत्पन्न बताया है।

च. सू. २५/१६

। ॥ १६ ॥

ऐसा कहते हुए कुशिक से कौशिक ने कहा कि वह (ठीक) नहीं है; क्योंकि माता-पिता के बिना छह धातुओं से उत्पन्न (पुरुष) कैसे हो सकता है?

च. सू. २५/१७

। ॥ १७ ॥

पुरुष (मनुष्य) पुरुष से, गौ गौ से, और घोड़ा घोड़े से उत्पन्न होता है। और मेह आदि रोग पैतृक (कुल से आने वाले) कहे गए हैं। यहाँ वे दोनों (माता और पिता) कारण हैं।

च. सू. २५/१८

। ।

परन्तु भद्रकाप्य ने कहा कि नहीं, क्योंकि अन्धे से अन्धा उत्पन्न नहीं होता। और तुम्हारे (मत में) माता-पिता की भी प्रथम उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती।

च. सू. २५/१९

। ॥ १९ ॥

बल्कि जन्तु (प्राणी) कर्म से उत्पन्न माना गया है, और उसके रोग भी कर्म से उत्पन्न (माने गए हैं); क्योंकि कर्म के बिना रोगों का या पुरुष का जन्म नहीं होता।

च. सू. २५/२०

। ॥ २० ॥

परन्तु भरद्वाज ने कहा कि नहीं, क्योंकि कर्ता कर्म से पहले होता है; और ऐसा कोई बिना किया हुआ कर्म नहीं देखा गया, जिसका फल पुरुष हो।

च. सू. २५/२१

। ॥ २१ ॥

बल्कि व्याधियों के और पुरुष के होने का कारण स्वभाव है, ठीक वैसे ही जैसे तेज तक के (भूतों) की खरता (कठोरता), द्रवता, चलता और उष्णता।

च. सू. २५/२२

। ॥ २२ ॥

परन्तु काङ्कायन ने कहा कि नहीं, क्योंकि (तब) आरम्भ (किए गए प्रयत्न) का (कोई) फल नहीं होगा; भावों (वस्तुओं और कार्यों) की असिद्धि (असफलता) हो या सिद्धि (सफलता), वह स्वभाव से ही होगी।

च. सू. २५/२३

। ॥ २३ ॥

इस चेतन और अचेतन जगत् के सुख और दुःख के स्रष्टा (रचने वाले) तो अपरिमित सङ्कल्प वाले, ब्रह्मा की सन्तान प्रजापति हैं।

च. सू. २५/२४

। ॥ २४ ॥

भिक्षु आत्रेय ने (कहा): वह (मत ठीक) नहीं है, क्योंकि सदा प्रजा का हित चाहने वाले प्रजापति (किसी) दुष्ट (व्यक्ति) की तरह (अपनी) सन्तान को दुःखों से नहीं जोड़ेंगे।

च. सू. २५/२५

। ॥ २५ ॥

पुरुष तो काल से ही उत्पन्न है, और उसके आमय (रोग) भी काल से उत्पन्न हैं। सारा जगत् काल के वश में है; काल सब जगह कारण है।

च. सू. २५/२६

। ॥ २६ ॥

इस प्रकार विवाद करते हुए ऋषियों से पुनर्वसु ने यह कहा: ऐसा मत कहो, क्योंकि (किसी एक) पक्ष का आश्रय लेने से तत्त्व (सत्य) कठिनाई से प्राप्त होता है।

च. सू. २५/२७

। ॥ २७ ॥

क्योंकि वादों (अपने तर्कों) को प्रतिवादों (उनके खण्डनों) सहित ऐसे कहते हुए, मानो वे निश्चित (सिद्ध) हों, (लोग) पक्ष के अन्त (अन्तिम निर्णय) तक कभी नहीं पहुँचते, जैसे तिल पेरने वाला (तेली) अपनी चाल में (कहीं नहीं पहुँचता)।

च. सू. २५/२८

। ॥ २८ ॥

इस प्रकार वाद-विवाद के टकराव को छोड़कर अध्यात्म (पुरुष से सम्बन्धित विषय) का चिन्तन किया जाए। जब तक तम (अज्ञान) का ढेर हटा नहीं दिया जाता, तब तक जानने योग्य विषय में ज्ञान प्रवृत्त नहीं होता।

च. सू. २५/२९

। ॥ २९ ॥

क्योंकि जिन भावों की सम्पत् (ठीक और पूर्ण अवस्था) ही मनुष्य को उत्पन्न करती है, उन्हीं (भावों) की विपत् (बिगड़ी हुई अवस्था) अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न करती है।

च. सू. २५/३०

॥ ३० ॥

तब भगवान् आत्रेय के वचन सुनकर काशी के राजा वामक ने फिर भगवान् आत्रेय से कहा: भगवन्, सम्पत् (भावों की ठीक अवस्था) के निमित्त से उत्पन्न पुरुष की, और विपत् (उनकी बिगड़ी अवस्था) के निमित्त से उत्पन्न रोगों की अभिवृद्धि (बढ़ने) का कारण क्या है?

च. सू. २५/३१

॥ ३१ ॥

भगवान् आत्रेय ने उनसे कहा: एकमात्र हित आहार का उपयोग ही पुरुष की वृद्धि करने वाला होता है, और दूसरी ओर अहित आहार का उपयोग रोगों का निमित्त (कारण) है।

च. सू. २५/३२

॥ ३२ ॥

ऐसा कहने वाले भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा: भगवन्, हम यहाँ हित और अहित आहार-द्रव्यों का अनपवाद (जिसमें कोई अपवाद न हो, ऐसा) लक्षण कैसे जानें? (क्योंकि) हम देखते हैं कि हित कहे जाने वाले आहार-द्रव्य और अहित कहे जाने वाले (आहार-द्रव्य) मात्रा, काल, क्रिया, भूमि, देह, दोष और पुरुष की अवस्था के भेद होने पर विपरीत काम करते हैं।

च. सू. २५/३३

॥ ३३ ॥

भगवान् आत्रेय ने उनसे कहा: अग्निवेश, जो आहार-द्रव्य सम (सन्तुलित) शरीर-धातुओं को प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) में ही बनाए रखता है और विषम (असन्तुलित) धातुओं को सम कर देता है, उसे हित जानो, और इसके विपरीत (आहार-द्रव्य) को अहित। इस प्रकार यह हित और अहित का अनपवाद (जिसमें कोई अपवाद न हो, ऐसा) लक्षण है।

च. सू. २५/३४

॥ ३४ ॥

और ऐसा कहने वाले भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा: भगवन्, इस प्रकार उपदेश किए गए इस (लक्षण) को तो अधिकतर वैद्य नहीं समझ पाएँगे।

च. सू. २५/३५

। । ॥ ३५ ॥

भगवान् आत्रेय ने उनसे कहा: अग्निवेश, जिन्हें गुण, द्रव्य, कर्म और सब अवयवों की दृष्टि से आहार का तत्त्व और मात्रा आदि भाव विदित हैं, वे ही इस प्रकार बताए गए इस (लक्षण) को समझ पाते हैं। परन्तु जिस प्रकार अधिकतर वैद्य इस उपदेश को समझ लेंगे, उसी प्रकार हम इसे बताएँगे, मात्रा आदि भावों का उदाहरण दिए बिना, क्योंकि उनके बहुत प्रकार के विकल्प (भेद) होते हैं। आहार-विधि के विशेषों की तो हम लक्षण से और अवयव से आगे व्याख्या करेंगे।

च. सू. २५/३६

॥ ३६ ॥

जैसे: आहार का आहार होना एक ही प्रकार का है, क्योंकि उसके अर्थ (प्रयोजन) में भेद नहीं है। फिर वह दो योनियों (उद्गमों) वाला है, क्योंकि वह स्थावर और जङ्गम स्वरूप वाला है; दो प्रकार के प्रभाव वाला है, क्योंकि उसके उदर्क (परिणाम) हितकर और अहितकर भेद वाले होते हैं; चार प्रकार के उपयोग वाला है, क्योंकि उसका उपयोग पान, अशन, भक्ष्य और लेह्य के रूप में होता है; छह आस्वादों वाला है, क्योंकि रस के भेद से वह छह प्रकार का है; बीस गुणों वाला है, क्योंकि उसमें गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मन्द, तीक्ष्ण, स्थिर, सर, मृदु, कठिन, विशद, पिच्छिल, श्लक्ष्ण, खर, सूक्ष्म, स्थूल, सान्द्र और द्रव (गुण) पाए जाते हैं; और उसके विकल्प (भेद) अगणित हैं, क्योंकि द्रव्यों, उनके संयोगों और करण (तैयार करने की विधियों) की बहुलता है।

च. सू. २५/३७

॥ ३७ ॥

उस (आहार) के जो-जो विकार रूप अवयव (खाद्य पदार्थ) सबसे अधिक उपयोग में लाए जाते हैं, और जो अधिकतर मनुष्यों के लिए स्वभाव से ही सबसे अधिक हितकर और सबसे अधिक अहितकर हैं, उन-उन को हम यथावत् (ठीक-ठीक) बताएँगे।

च. सू. २५/३८

, ॥ ३८ ॥

जैसे: सबसे अधिक पथ्य होने में शूकधान्यों (टूँड वाले अनाजों) में लोहितशालि (लाल शालि धान) सबसे श्रेष्ठ होते हैं; शमीधान्यों (फली वाले अनाजों) में मुद्ग (मूँग); जलों में आन्तरिक्ष (आकाश से बरसा) जल; लवणों में सैन्धव (सेंधा नमक); शाकों में जीवन्ती का शाक; मृगों के मांसों में ऐणेय (एण हिरन का मांस); पक्षियों में लाव; बिलेशयों (बिल में रहने वाले प्राणियों) में गोधा (गोह); मछलियों में रोहित (रोहू); घृतों में गाय का घी; दूधों में गाय का दूध; स्थावरों (वनस्पतियों) से उत्पन्न स्नेहों में तिल का तेल; आनूप (जलप्राय प्रदेश के) पशुओं की वसाओं में वराह (सूअर) की वसा; मछलियों की वसाओं में चुलुकी की वसा; जलचर पक्षियों की वसाओं में पाकहंस की वसा; विष्किर पक्षियों की वसाओं में कुक्कुट (मुर्गे) की वसा; शाखाद पशुओं के मेदों में बकरे का मेद; कन्दों में शृङ्गवेर (अदरक); फलों में मृद्वीका (अंगूर); और ईख से बने पदार्थों में शर्करा (शक्कर)। इस प्रकार स्वभाव से ही सबसे हितकर आहार-विकारों (खाद्य पदार्थों) के प्रधान द्रव्य बता दिए गए हैं।

च. सू. २५/३९

; () ॥ ३९ ॥

हम सबसे अधिक अहितकर (आहारविकारों) को भी बताएँगे: शूकधान्यों में सबसे अधिक अपथ्य होने में यवक सबसे आगे हैं; शमीधान्यों में माष (उड़द); जलों में वर्षा ऋतु का नदी-जल; लवणों में ऊषर (खारी भूमि का नमक); शाकों में सर्षप (सरसों) का शाक; मृगमांसों (पशुओं के मांसों) में गोमांस; पक्षियों में काणकपोत; बिलेशयों (बिल में रहने वाले जीवों) में भेक (मेंढक); मछलियों में चिलिचिम; सर्पियों (घृतों) में भेड़ का सर्पि; दूधों में भेड़ का दूध; स्थावर स्नेहों में कुसुम्भ का स्नेह; आनूप मृगों की वसाओं में महिष (भैंसे) की वसा; मछलियों की वसाओं में कुम्भीर (मगर) की वसा; जलचर पक्षियों की वसाओं में काकमद्गु की वसा; विष्किर पक्षियों की वसाओं में चटक (गौरैया) की वसा; शाखाद (पशुओं) के मेदों में हाथी का मेद; फलों में निकुच; कन्दों में आलुक; इक्षुविकारों (ईख से बने पदार्थों) में फाणित। इस प्रकार स्वभाव से ही सबसे अधिक अहितकर आहारविकारों के सबसे प्रमुख द्रव्यों की व्याख्या हो गई; [इस प्रकार] आहारविकारों के हित और अहित अवयव (अंश) की व्याख्या हो गई।

च. सू. २५/४०

। ( ) () , , , , , , , , , ॥ ४० ॥

इसके आगे अब हम कर्मों (प्रभावों) और औषधों के भी प्रधानता के अनुसार (सबसे प्रधान) द्रव्यों की, उनसे जुड़ी बातों (अनुबन्धों) सहित, व्याख्या करेंगे। वह इस प्रकार है: वृत्ति (जीवन-निर्वाह) करने वालों में अन्न श्रेष्ठ (सबसे प्रधान) है; आश्वास (राहत और ताज़गी) देने वालों में जल; [थकान हरने वालों में सुरा;] जीवनीयों (जीवन-शक्ति देने वालों) में दूध; बृंहणीयों (शरीर को पुष्ट करके बढ़ाने वालों) में मांस; तर्पणीयों (तृप्त करने वालों) में रस; अन्न-द्रव्यों में रुचि उत्पन्न करने वालों में लवण (नमक); हृद्यों (हृदय को प्रिय लगने वालों) में अम्ल (खट्टा); बल्यों (बल देने वालों) में कुक्कुट (मुर्गा); वृष्यों (पुरुष-शक्ति बढ़ाने वालों) में नक्र (मगर) का रेतस् (वीर्य); कफ और पित्त को शान्त करने वालों में मधु; वात और पित्त को शान्त करने वालों में सर्पि (घी); वात और कफ को शान्त करने वालों में तैल; कफ को हरने वालों में वमन; पित्त को हरने वालों में विरेचन; वात को हरने वालों में बस्ति; मृदुता लाने वालों में स्वेद; स्थिरता लाने वालों में व्यायाम; पुंस्त्व (पुरुष-शक्ति) का नाश करने वालों में क्षार; [अन्न से भिन्न द्रव्यों में रुचि उत्पन्न करने वालों में तिन्दुक;] कण्ठ के लिए अहितकरों में कच्चा कपित्थ (कैथ); हृदय के लिए अहितकरों में भेड़ का घी; शोष को नष्ट करने वाले, स्तन्य (माँ का दूध) बढ़ाने वाले, सात्म्य (अनुकूल), रक्त को रोकने वाले और रक्तपित्त को शान्त करने वालों में बकरी का दूध; कफ और पित्त को उत्पन्न करने वालों में भेड़ का दूध; नींद लाने वालों में भैंस का दूध; अभिष्यन्द करने वालों में मन्दक (पूरा न जमा) दही; कर्शन (दुबला) करने वालों में गवेधुक का अन्न; विरूक्षण (रूखा) करने वालों में उद्दालक का अन्न; मूत्र उत्पन्न करने वालों में इक्षु (ईख); पुरीष (मल) उत्पन्न करने वालों में यव (जौ); वात उत्पन्न करने वालों में जाम्बव (जामुन); कफ और पित्त उत्पन्न करने वालों में शष्कुली; अम्लपित्त उत्पन्न करने वालों में कुलत्थ (कुलथी); कफ और पित्त उत्पन्न करने वालों में माष (उड़द); वमन, आस्थापन और अनुवासन में उपयोगी (द्रव्यों) में मदनफल (मैनफल); सुख से विरेचन कराने वालों में त्रिवृत् (निशोथ); मृदु विरेचन कराने वालों में चतुरङ्गुल (अमलतास); तीक्ष्ण विरेचन कराने वालों में स्नुही (थूहर) का दूध; शिरोविरेचन कराने वालों में प्रत्यक्पुष्पा; कृमि को नष्ट करने वालों में विडङ्ग (वायविडंग); विष को नष्ट करने वालों में शिरीष (सिरस); कुष्ठ को नष्ट करने वालों में खदिर (खैर); वात को हरने वालों में रास्ना; वयःस्थापनों (आयु को स्थिर रखने वालों) में आमलक (आँवला); पथ्यों (हितकर द्रव्यों) में हरीतकी (हरड़); वृष्य और वात को हरने वालों में एरण्ड (अरण्ड) की जड़; दीपनीय, पाचनीय और गुदा के शोथ, अर्श तथा शूल को हरने वालों में पिप्पलीमूल; हिक्का, श्वास, कास और पार्श्वशूल को हरने वालों में पुष्करमूल; सांग्राहिक, दीपनीय और पाचनीय (द्रव्यों) में मुस्त (नागरमोथा); निर्वापण, दीपनीय, पाचनीय और छर्दि तथा अतीसार को हरने वालों में उदीच्य; सांग्राहिक और रक्तपित्त को शान्त करने वालों में कट्वङ्ग; सांग्राहिक, वातहर, दीपनीय और कफ, शोणित (रक्त) तथा विबन्ध को शान्त करने वालों में अमृता; दीपनीय, पाचनीय, सांग्राहिक और सब दोषों को हरने वालों में अतिविषा (अतीस); सांग्राहिक और रक्तपित्त को शान्त करने वालों में उत्पल, कुमुद और पद्म का किञ्जल्क (केसर); पित्त और कफ को शान्त करने वालों में दुरालभा; शोणितपित्त (रक्तपित्त) के अतियोग को शान्त करने वालों में गन्धप्रियङ्गु; कफ, पित्त और रक्त को रोकने और सुखाने वालों में कुटज की छाल; रक्त को रोकने वाले और रक्तपित्त को शान्त करने वालों में काश्मर्य (गम्भारी) का फल; सांग्राहिक, वातहर, दीपनीय और वृष्य (द्रव्यों) में पृश्निपर्णी; वृष्य और सब दोषों को हरने वालों में विदारिगन्धा; सांग्राहिक, बल्य और वातहर (द्रव्यों) में बला; मूत्रकृच्छ्र और अनिल (वात) को हरने वालों में गोक्षुरक (गोखरू); छेदनीय, दीपनीय, अनुलोमन करने वाले और वात-कफ को शान्त करने वालों में हिङ्गु (हींग) का निर्यास; भेदनीय, दीपनीय, अनुलोमन करने वाले और वात-कफ को हरने वालों में अम्लवेतस; स्रंसनीय, पाचनीय और अर्श को नष्ट करने वालों में यावशूक; ग्रहणीदोष, शोफ, अर्श और घृतव्यापत् को शान्त करने वालों में तक्र (छाछ) का नियमित सेवन; ग्रहणीदोष, शोष और अर्श को नष्ट करने वालों में क्रव्याद (मांसाहारी) प्राणियों के मांसरस का नियमित सेवन; रसायनों में दूध और घी का नियमित सेवन; वृष्य और उदावर्त को हरने वालों में बराबर घी मिले सत्तू को खाने का नियमित सेवन; दाँतों का बल और रुचि बढ़ाने वालों में तेल के गण्डूष का अभ्यास; दुर्गन्ध हरने वाले और दाह बुझाने वाले लेपों में चन्दन; शीत दूर करने वाले प्रलेपों में रास्ना और अगुरु (अगर); दाह, त्वचा के दोष और स्वेद (पसीना) दूर करने वाले प्रलेपों में लामज्जक और उशीर (खस); वातहर अभ्यङ्ग और उपनाह में उपयोगी (द्रव्यों) में कुष्ठ (कूठ); चक्षुष्य, वृष्य, केश्य, कण्ठ्य, वर्ण्य, विरजनीय और रोपणीय (द्रव्यों) में मधुक; प्राण और संज्ञा (चेतना) देने के कारणों में वायु; आम, स्तम्भ, शीत, शूल और उद्वेपन (कँपकँपी) को शान्त करने वालों में अग्नि; स्तम्भनीयों (रोकने वालों) में जल; तृष्णा और छर्दि के अतियोग को शान्त करने वालों में मिट्टी के तपाए हुए ढेले से बुझाया गया जल; आमप्रदोष के कारणों में मात्रा से अधिक भोजन; अग्नि को प्रदीप्त करने वालों में अग्नि के अनुसार भोजन; सेवन करने योग्य (बातों) में सात्म्य के अनुसार चेष्टा और आहार; आरोग्य देने वालों में समय पर भोजन; आहार के गुणों में तृप्ति; अनारोग्य (रोग) करने वालों में वेगों को रोकना; सौमनस्य (मन की प्रसन्नता) उत्पन्न करने वालों में मद्य; बुद्धि, धृति और स्मृति को हरने वालों में मद्य का आक्षेप (अति सेवन); दुर्विपाक करने वालों में गुरु (भारी) भोजन; सुख से परिणाम (पाचन) कराने वालों में एकाशन भोजन (एक बार का भोजन); शोष करने वालों में स्त्रियों में अति आसक्ति; षाण्ड्य (नपुंसकता) करने वालों में शुक्र के वेग को रोकना; अन्न में अरुचि उत्पन्न करने वालों में पराघातन; आयु का ह्रास करने वालों में अनशन; कर्शन करने वालों में प्रमित (बहुत नपा-तुला) भोजन; ग्रहणी को दूषित करने वालों में अजीर्ण में किया गया अध्यशन (पहला भोजन पचे बिना फिर भोजन); अग्नि को विषम करने वालों में विषम भोजन; निन्दित रोग करने वालों में विरुद्ध वीर्य वाला भोजन; पथ्यों में प्रशम (मन की शान्ति); सब अपथ्यों में आयास (अति परिश्रम); रोग करने वालों में मिथ्यायोग; अलक्ष्मी (दुर्भाग्य) के द्वारों में रजस्वला स्त्री से समागम; आयु बढ़ाने वालों में ब्रह्मचर्य; आयु घटाने वालों में पराई स्त्री से समागम; वृष्यों में सङ्कल्प; अवृष्यों में दौमनस्य (मन की खिन्नता); प्राणों को बाधा देने वालों में बल से अधिक कार्य आरम्भ करना; रोग बढ़ाने वालों में विषाद; थकान हरने वालों में स्नान; प्रीणन करने वालों में हर्ष; शोषण करने वालों में शोक; पुष्टि करने वालों में निवृत्ति; नींद लाने वालों में पुष्टि; तन्द्रा लाने वालों में अति निद्रा; बल देने वालों में सब रसों का नियमित सेवन; दुर्बलता लाने वालों में एक ही रस का नियमित सेवन; (शरीर से) निकाले जाने योग्य (वस्तुओं) में गर्भशल्य; निकाल देने योग्य (वस्तुओं) में अजीर्ण; मृदु औषध देने योग्य (लोगों) में बालक; याप्यों में वृद्ध; जिनके लिए तीक्ष्ण औषध, व्यवाय (मैथुन) और व्यायाम वर्जित हैं उनमें गर्भिणी; गर्भ को धारण कराने वालों में सौमनस्य; कठिनाई से चिकित्सा होने वालों में सन्निपात; विषम चिकित्सा वालों में आम; रोगों में ज्वर; दीर्घ (लम्बे चलने वाले) रोगों में कुष्ठ; रोगों के समूहों में राजयक्ष्मा; अनुषङ्गी (पीछा न छोड़ने वाले) रोगों में प्रमेह; अनुशस्त्रों में जलौका (जोंक); तन्त्रों (चिकित्सा-विधियों) में बस्ति; औषधियों की भूमियों में हिमवान् (हिमालय); ओषधियों में सोम; आरोग्यकर देशों में मरुभूमि; अहितकर देशों में अनूप; रोगी के गुणों में (वैद्य के) निर्देश के अनुसार चलना; चिकित्सा के अङ्गों में भिषक् (वैद्य); त्याग देने योग्य (लोगों) में नास्तिक; क्लेश देने वालों में लौल्य (लालच); अरिष्टों में निर्देश के अनुसार न चलना; वार्त (कुशलता) के लक्षणों में अनिर्वेद (निराश न होना); सन्देह दूर करने वालों में वैद्यों का समूह; वैद्य के गुणों में योग; (फिर) वैद्यों का समूह; औषधियों में विज्ञान; साधनों में शास्त्र के साथ तर्क; काल-ज्ञान के प्रयोजनों में संप्रतिपत्ति; समय चूकने के कारणों में अव्यवसाय; सन्देह दूर करने वालों में दृष्टकर्मता (कर्म का प्रत्यक्ष अनुभव); भय देने वालों में असमर्थता; बुद्धि बढ़ाने वालों में उस विद्या के जानकारों से संभाषा (चर्चा); शास्त्र की प्राप्ति के कारणों में आचार्य; अमृतों में आयुर्वेद; पालन करने योग्य (बातों) में सज्जनों का वचन; सब अहितकरों में असत् को ग्रहण करना; और सुखों में सबका संन्यास (त्याग) (सबसे प्रधान है)।

च. सू. २५/४१

। ॥ ४१ ॥

और इस विषय में (ये श्लोक) हैं: अग्र्यों (अपने-अपने वर्ग में सबसे आगे रहने वालों) का जो बावन अधिक सौ (अर्थात् एक सौ बावन का समूह) बताया गया है, यह विकारों (रोगों) के नाश के लिए पर्याप्त बताया जाता है।

च. सू. २५/४२

। ॥ ४२ ॥

जो पदार्थ समान कार्य करते हैं, उनमें से श्रेष्ठ का लक्षण कार्य करने में बढ़कर होना (ज्यायस्त्व) और उत्तमता (वरत्व) भी कहा गया है।

च. सू. २५/४३

। ॥ ४३ ॥

और वात, पित्त और कफ के प्रशमन (शान्त करने) में जो-जो हितकर है, और रोग दूर करने वाला जो उत्तम (द्रव्य) प्रधानता के आधार पर बताया गया है

च. सू. २५/४४

। ॥ ४४ ॥

इसे सुनकर (वैद्य) कुशलता से चिकित्सा का प्रयोग करे। ऐसा करता हुआ वैद्य सदा धर्म और काम (दोनों) को प्राप्त करता है।

च. सू. २५/४५

। ॥ ४५ ॥

जो पथ (मार्ग) से हटा हुआ नहीं है और जो मन को प्रिय कहा गया है, वह पथ्य है; और जो अप्रिय है, वह अपथ्य है। (परन्तु) इसे नियत (हर स्थिति में एक-सा) न समझे।

च. सू. २५/४६

। ॥ ४६ ॥

क्योंकि वे-वे भाव (पदार्थ) मात्रा, काल, क्रिया, भूमि, देह, दोष और गुण के उस-उस भेद को पाकर वैसे-वैसे (भिन्न-भिन्न रूप में) दिखाई देते हैं।

च. सू. २५/४७

। ॥ ४७ ॥

इसलिए (द्रव्यों का) स्वभाव बताया गया है, और वैसे ही मात्रा आदि (को उसका) आश्रय (बताया गया है)। सिद्धि (सफलता) चाहने वाले को उन दोनों को ध्यान में रखकर कर्म (चिकित्सा) का प्रयोग करना चाहिए।

च. सू. २५/४८

। ॥ ४८ ॥

भगवान् आत्रेय के उस वचन को सुनकर अग्निवेश ने फिर से भगवान् आत्रेय से कहा: भगवान् (आप) ने यह सम्पूर्ण विषय उद्देश (पहले गिनाए गए विषयों) के अनुसार बता दिया है, और हमने (इसे) सुन लिया है। अब हम आसव-द्रव्यों (आसव बनाने के द्रव्यों) का निर्दोष लक्षण, जो बहुत संक्षेप में न हो, (आपके द्वारा) बताया जाता हुआ सुनना चाहते हैं।

च. सू. २५/४९

। । , , , , , , , , । । । । । ॥ ४९ ॥

भगवान् आत्रेय ने उनसे (अग्निवेश से) कहा: हे अग्निवेश, संक्षेप में धान्य, फल, मूल, सार, पुष्प, काण्ड, पत्र और त्वचा (छाल), ये आठ आसवों की योनियाँ (स्रोत) हैं, और नौवीं शर्करा है। द्रव्यों के संयोग और करण (तैयार करने की विधि) से अनगिनत (हो जाने वाली) उन्हीं (योनियों) में से, यथोचित रूप से सबसे पथ्य (हितकर) आसवों की चौरासी (की गिनती) जानो। वह इस प्रकार है: सुरा, सौवीर, तुषोदक, मैरेय, मेदक और धान्याम्ल, ये छह धान्य-आसव (अनाज के आसव) हैं; मृद्वीका (अंगूर), खर्जूर (खजूर), काश्मर्य, धन्वन, राजादन, तृणशून्य, परूषक, अभया (हरड़), आमलक (आँवला), मृगलिण्डिका, जाम्बवक, कपित्थ (कैथ), कुवल, बदर (बेर), कर्कन्धू, पीलु, प्रियाल, पनस (कटहल), न्यग्रोध (बरगद), अश्वत्थ (पीपल), प्लक्ष, कपीतन, उदुम्बर (गूलर), अजमोद, शृङ्गाटक (सिंघाड़ा) और शङ्खिनी के फल-आसव छब्बीस हैं; विदारिगन्धा, अश्वगन्धा, कृष्णगन्धा, शतावरी, श्यामा, त्रिवृत् (निशोथ), दन्ती, द्रवन्ती, बिल्व (बेल), उरुबूक और चित्रक के मूलों (जड़ों) से ग्यारह मूल-आसव होते हैं; शाल, प्रियक, अश्वकर्ण, चन्दन, स्यन्दन, खदिर (खैर), कदर, सप्तपर्ण, अर्जुन, असन, अरिमेद, तिन्दुक, किणिही, शमी, शुक्ति, शिंशपा (शीशम), शिरीष (सिरस), वञ्जल, धन्वन और मधूक (महुआ) से बीस सार-आसव होते हैं; पद्म (कमल), उत्पल, नलिन, कुमुद, सौगन्धिक, पुण्डरीक, शतपत्र, मधूक, प्रियङ्गु और धातकी के फूलों से दस पुष्प-आसव होते हैं; इक्षु (गन्ना), काण्डेक्षु, इक्षुवालिका और चौथा पुण्ड्रक, ये काण्ड-आसव हैं; पटोल और ताडक के पत्र-आसव दो हैं; तिल्वक, लोध्र, एलवालुक और चौथा क्रमुक, ये त्वचा (छाल) के आसव हैं; और शर्करा का आसव एक ही है। इस प्रकार एक-दूसरे से न मिलाए गए आसव-द्रव्यों के इन आसवों की चौरासी (की गिनती) बताई गई है। आसुत होने (खमीर उठाकर तैयार किए जाने) के कारण इनका नाम आसव है। इनके द्रव्यों के संयोग और विभाग का विस्तार तो अनेक प्रकार के कल्पों (योगों) वाला है, और संस्कार (तैयार करने की विधि) भी। क्योंकि अपने-अपने संयोग और संस्कार से तैयार किए गए आसव ही अपना कर्म (प्रभाव) करते हैं। और उन-उन आसवों के संयोग, संस्कार, देश, काल, मात्रा आदि वे-वे भाव, उस-उस कार्य को भली-भाँति देखकर बताए जाते हैं।

च. सू. २५/५०

। ॥ ५० ॥

और यहाँ (इस विषय में यह श्लोक) है: मन, शरीर और अग्नि (पाचन-शक्ति) को बल देने वाले, अस्वप्न (नींद न आना), शोक और अरुचि को नष्ट करने वाले, (और) हर्ष देने वाले श्रेष्ठ आसवों की यह चार अधिक अस्सी (चौरासी की गिनती) कही गई है।

च. सू. २५/५१

। ॥ ५१ ॥

इस विषय में (यह) श्लोक है: इस यज्जःपुरुषादिक (यज्जःपुरुषीय) अध्याय में मुनि (आत्रेय) ने शरीर और रोगों की प्रकृति (उत्पत्ति के कारण) के विषय में (ऋषियों के) मत, और तत्त्व से (यथार्थ रूप में) आहार का विनिश्चय (निर्णय), तथा अग्र्य (सबसे श्रेष्ठ द्रव्य) और श्रेष्ठ आसव कहे।

च. सू. २५

॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में यज्जःपुरुषीय नामक पच्चीसवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।