व्याख्या
यह चरक संहिता की प्रसिद्ध 'अग्र्य' सूची है: हर वर्ग में जो चीज़ सबसे आगे (अग्र्य, सबसे प्रधान) है, उसकी सूची। भगवान् आत्रेय अग्निवेश के प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं। पिछले दो सूत्रों (सू. २५/३८-३९) में वे आहार के सबसे हितकर और सबसे अहितकर द्रव्य गिना चुके हैं; अब वे कहते हैं कि इसके आगे कर्मों और औषधों के भी सबसे प्रधान द्रव्य बताएँगे, 'सानुबन्ध', यानी उनसे जुड़ी बातों सहित। 'कर्मौषधानाम्' संक्षिप्त शब्द है; कर्म का अर्थ यहाँ सम्भवतः किसी द्रव्य या क्रिया का प्रभाव है, यानी वह शरीर पर क्या करता है। सूची में केवल द्रव्य नहीं हैं: व्यायाम, ब्रह्मचर्य, मन के भाव, देश, रोग, रोगी और वैद्य के गुण भी हैं, इसलिए 'अनुबन्ध' से सम्भवतः यही जुड़े हुए विषय अभिप्रेत हैं; सूत्र इसे खोलकर नहीं कहता। सूची का ढाँचा हर जगह एक है: एक वर्ग का नाम, जैसे 'वात को हरने वालों में', और उसके साथ वह एक चीज़ जो उस वर्ग में सबसे आगे है। 'श्रेष्ठ' शब्द केवल पहली जोड़ी में आया है; बाकी हर जोड़ी में वही समझना है। पर 'सबसे आगे' का अर्थ हर बार 'सबसे अच्छा' नहीं है: रोग करने वालों, आयु घटाने वालों या भय देने वालों में जो सबसे आगे है, वह उस हानि का सबसे बड़ा कारण है। अगला श्लोक (सू. २५/४१) बताता है कि यहाँ एक सौ बावन अग्र्य गिनाए गए हैं। यह सूची चरक संहिता के अनुसार वर्गों की तुलना है, किसी औषध या प्रयोग को अपनाने की सलाह नहीं। पहले भोजन से जुड़े वर्ग आते हैं। वृत्ति का अर्थ है जीवन का निर्वाह, यानी शरीर को चलाए रखना; आश्वास का अर्थ है थके या व्याकुल को राहत और ताज़गी; जीवनीय यानी जीवन-शक्ति देने वाला; बृंहणीय यानी शरीर को पुष्ट करके बढ़ाने वाला; तर्पणीय यानी तृप्त करने वाला; हृद्य यानी हृदय के लिए हितकर और मन को भाने वाला; बल्य यानी बल देने वाला; और वृष्य यानी पुरुष की यौन-शक्ति और शुक्र (वीर्य) बढ़ाने वाला। 'रस तर्पणीयों में' में कौन-सा रस अभिप्रेत है, सूत्र नहीं बताता; ठीक पहले मांस का नाम है, इसलिए सम्भवतः मांसरस (मांस का शोरबा), पर यह निश्चित नहीं है। कुक्कुट (मुर्गा) भी यहाँ आहार के रूप में, सम्भवतः उसके मांस के रूप में, गिना गया है। फिर दोषों और शोधन की बातें हैं। वात, पित्त और कफ शरीर के तीन दोष हैं, जिनके बिगड़ने से रोग होते हैं; श्लेष्मा कफ का और अनिल वात का ही दूसरा नाम है। मधु कफ और पित्त को, घी वात और पित्त को, और तेल वात और कफ को शान्त करने में सबसे आगे बताए गए हैं। वमन (उल्टी कराकर दोष को बाहर निकालना) कफ के लिए, विरेचन (दस्त कराकर दोष निकालना) पित्त के लिए, और बस्ति (गुदा के मार्ग से औषध-द्रव्य देना) वात के लिए सबसे आगे है। स्वेद, यानी पसीना लाने की चिकित्सा, शरीर में मृदुता (कोमलता, जकड़न का खुलना) लाने में, और व्यायाम स्थिरता (शरीर की दृढ़ता) लाने में सबसे आगे है। क्षार (एक दाहक, खारा औषध-द्रव्य) पुंस्त्व, यानी पुरुष-शक्ति, को सबसे अधिक हानि पहुँचाता है। सम्पादित पाठ ने दो अंश गोल कोष्ठक में रखे हैं: 'सुरा श्रमहराणाम्' (थकान हरने वालों में सुरा, यानी मदिरा) और 'तिन्दुकमनन्नद्रव्यरुचिकराणाम्' (अन्न से भिन्न द्रव्यों में रुचि उत्पन्न करने वालों में तिन्दुक); अनुवाद में ये [ ] में दिए गए हैं। दूसरे अंश का अर्थ पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इसके बाद कुछ अहितकर द्रव्य और दूध-दही आते हैं: कच्चा कपित्थ कण्ठ (गले) के लिए और भेड़ का घी हृदय के लिए सबसे अहितकर बताया गया है। बकरी का दूध कई गुणों में एक साथ सबसे आगे है: शोष (शरीर का सूखना और क्षीण होना) को नष्ट करने में, स्तन्य (माँ का दूध) बढ़ाने में, सात्म्य (शरीर के अनुकूल) होने में, रक्त को रोकने में, और रक्तपित्त को शान्त करने में (रक्तपित्त वह रोग है जिसमें पित्त से दूषित रक्त नाक, मुँह आदि मार्गों से बाहर निकलता है)। 'स्तन्यसात्म्य' को एक शब्द मानकर 'माँ के दूध की तरह अनुकूल' भी पढ़ा जा सकता है। भेड़ का दूध कफ और पित्त बढ़ाने में और भैंस का दूध नींद लाने में सबसे आगे है। मन्दक दही, यानी वह दही जो अभी पूरा जमा नहीं, अभिष्यन्द करने में सबसे आगे है; अभिष्यन्द का अर्थ है शरीर के स्रोतों (भीतर की नलिकाओं) में गीलापन और रुकावट पैदा करना। अन्न और दालें: गवेधुक और उद्दालक दो प्रकार के अनाज हैं, जिनकी पहचान यहाँ नहीं की गई। गवेधुक का अन्न कर्शन (शरीर को दुबला करने) में और उद्दालक का अन्न विरूक्षण (शरीर में रूखापन लाने) में सबसे आगे है। इक्षु (ईख) मूत्र, यव (जौ) पुरीष (मल), जामुन वात, शष्कुली (सम्भवतः घी या तेल में तला एक पकवान) कफ और पित्त, कुलथी अम्लपित्त (पेट में खट्टापन और जलन का रोग), और उड़द कफ और पित्त उत्पन्न करने में सबसे आगे हैं। अब औषधियाँ। मदनफल (मैनफल) वमन में और दोनों प्रकार की बस्तियों में सबसे उपयोगी है: आस्थापन (जिसे निरूह भी कहते हैं; काढ़े आदि की बस्ति) और अनुवासन (घी-तेल जैसे स्नेह की बस्ति)। त्रिवृत् (निशोथ) सुख से, चतुरङ्गुल (अमलतास) मृदु (हल्का) और स्नुही (थूहर) का दूध तीक्ष्ण (तेज़) विरेचन कराने में सबसे आगे है। प्रत्यक्पुष्पा (कोश के अनुसार अपामार्ग) शिरोविरेचन में सबसे आगे है, यानी सिर और नाक के मार्ग से दोष निकालने में। विडङ्ग कृमि (पेट के कीड़े) नष्ट करने में, शिरीष विष नष्ट करने में, खदिर कुष्ठ (त्वचा के रोगों का एक बड़ा समूह) नष्ट करने में, और रास्ना वात हरने में सबसे आगे है। आँवला वयःस्थापन में, यानी आयु और यौवन को स्थिर रखने (बुढ़ापे को रोकने) में, और हरीतकी पथ्य, यानी शरीर के लिए हितकर द्रव्यों में, सबसे आगे है। इसके बाद के वर्गों में कुछ शब्द बार-बार आते हैं। दीपनीय वह है जो अग्नि, यानी पाचन की शक्ति, को जगाए; पाचनीय वह जो आम को पचाए (आम यानी ठीक से न पचा आहार-रस); सांग्राहिक वह जो मल को बाँधे, यानी पतले दस्त को रोके, और 'रक्त' के साथ आने पर रक्त के बहाव को रोके; निर्वापण वह जो दाह (जलन) को बुझाकर ठण्डक दे; छेदनीय वह जो जमे हुए दोष को काटकर अलग करे; भेदनीय वह जो जमे हुए या गाँठ बने मल आदि को तोड़े; अनुलोमिक वह जो वात और मल को उनके स्वाभाविक, नीचे के मार्ग पर ले जाए; और स्रंसनीय वह जो मल को ढीला करके नीचे खिसकाए। इन वर्गों में सबसे आगे ये हैं: पिप्पलीमूल (गुदा के शोथ यानी सूजन, अर्श यानी बवासीर, और शूल यानी तेज़ दर्द में भी), पुष्करमूल (हिक्का यानी हिचकी, श्वास यानी साँस फूलना, कास यानी खाँसी, और पार्श्वशूल यानी पसलियों के दर्द में), मुस्त (नागरमोथा), उदीच्य (छर्दि यानी उल्टी और अतीसार यानी दस्त में भी), कट्वङ्ग, अमृता (सम्भवतः गुडूची, जिसे गिलोय भी कहते हैं), अतिविषा (अतीस), कमल जाति के तीन फूलों, उत्पल, कुमुद और पद्म, का किञ्जल्क यानी केसर, दुरालभा, गन्धप्रियङ्गु, कुटज की छाल, काश्मर्य (गम्भारी) का फल, पृश्निपर्णी, विदारिगन्धा, बला, गोक्षुरक (गोखरू; मूत्रकृच्छ्र यानी कष्ट से मूत्र आने में), हिङ्गु का निर्यास यानी हींग, अम्लवेतस, और यावशूक (जौ के पौधे से बनाया गया क्षार)। उदीच्य, कट्वङ्ग, दुरालभा, गन्धप्रियङ्गु, पृश्निपर्णी, विदारिगन्धा, बला, रास्ना और अम्लवेतस की पहचान यहाँ नहीं की गई। अमृता के साथ विबन्ध आया है, यानी मल की रुकावट; गन्धप्रियङ्गु के साथ रक्तपित्त का अतियोग, यानी रक्त का बहुत अधिक बहना। फिर नियमित सेवन (अभ्यास) की बातें हैं। तक्र (छाछ) का नियमित सेवन ग्रहणीदोष, शोफ (सूजन), अर्श और घृतव्यापत् को शान्त करने में सबसे आगे है; ग्रहणी पेट और आँतों के बीच का वह अङ्ग है जिसे अग्नि का स्थान माना गया है, और घृतव्यापत् का शब्दार्थ है घी (के सेवन) से हुई गड़बड़ी। क्रव्याद, यानी मांस खाने वाले प्राणियों, के मांसरस का नियमित सेवन ग्रहणीदोष, शोष और अर्श में सबसे आगे है। दूध और घी का नियमित सेवन रसायनों में सबसे आगे है; रसायन वे प्रयोग हैं जिन्हें आयुर्वेद शरीर में नई शक्ति भरने वाला और बुढ़ापे तथा रोगों को दूर रखने वाला मानता है। बराबर घी मिले सत्तू का नियमित सेवन वृष्य है और उदावर्त को हरता है (उदावर्त वह रोग है जिसमें वात के उलटी दिशा में चलने से मल, मूत्र और वायु रुक जाते हैं)। तेल का गण्डूष, यानी मुँह में तेल भरकर कुछ देर रोके रखना, दाँतों की मज़बूती और रुचि (स्वाद) के लिए सबसे आगे है। बाहर से लगाए जाने वाले द्रव्य: चन्दन दुर्गन्ध हरने और दाह बुझाने वाले लेपों में, रास्ना और अगुरु (अगर) शीत दूर करने वाले प्रलेपों में, और लामज्जक (पहचान यहाँ नहीं की गई) तथा उशीर (खस) दाह, त्वचा के दोष और पसीना दूर करने वाले प्रलेपों में सबसे आगे हैं। कुष्ठ यहाँ त्वचा का रोग नहीं, कूठ नाम की सुगन्धित औषधि है; यह वात हरने वाले अभ्यङ्ग (तेल की मालिश) और उपनाह (गरम लेप या पुल्टिस बाँधना) में सबसे उपयोगी है। मधुक (सम्भवतः मुलेठी) एक साथ कई वर्गों में सबसे आगे है: चक्षुष्य (आँखों के लिए हितकर), वृष्य, केश्य (बालों के लिए हितकर), कण्ठ्य (गले और स्वर के लिए हितकर), वर्ण्य (त्वचा का रंग-रूप निखारने वाला), विरजनीय (शब्दशः 'रज' यानी मैल या बिगड़े रंग को दूर करने वाला) और रोपणीय (घाव भरने वाला)। प्रकृति के तत्त्व: वायु प्राण (जीवन) और संज्ञा (होश, चेतना) देने का सबसे बड़ा कारण है। अग्नि (आग) आम, स्तम्भ (अंगों की जकड़न), शीत, शूल और उद्वेपन (ठण्ड से कँपकँपी) को शान्त करने में, और जल स्तम्भन, यानी किसी बहाव या गति को रोकने, में सबसे आगे है। मिट्टी के ढेले को आग में तपाकर पानी में बुझाने से जो जल बनता है, वह तृष्णा (बहुत प्यास) और छर्दि के अतियोग (बहुत अधिक उल्टी) को शान्त करने में सबसे आगे है। भोजन के ढंग: मात्रा से अधिक खाना आमप्रदोष, यानी आम से होने वाले विकारों, का सबसे बड़ा कारण है, और अपनी अग्नि (पाचन-शक्ति) के अनुसार खाना अग्नि को सबसे अधिक जगाता है। सात्म्य के अनुसार, यानी जिसकी शरीर को आदत है और जो उसे अनुकूल है उसके अनुसार, चेष्टा (शारीरिक क्रिया) और आहार सबसे अधिक सेवन करने योग्य हैं। समय पर भोजन आरोग्य देने में, और तृप्ति आहार के गुणों में सबसे आगे है। वेगों को रोकना, यानी मल, मूत्र, छींक, भूख, प्यास जैसी स्वाभाविक इच्छाओं को दबाना, रोग देने में सबसे आगे है। मद्य सौमनस्य (मन की प्रसन्नता) देने में सबसे आगे है, पर मद्य का आक्षेप (सम्भवतः उसका अति सेवन) बुद्धि, धृति (धैर्य, मन को थामे रखने की शक्ति) और स्मृति को सबसे अधिक हरता है। गुरु (भारी) भोजन सबसे अधिक दुर्विपाक, यानी कठिनाई से और बुरी तरह पचने वाला, है, और एकाशन भोजन (सम्भवतः एक समय का भोजन) सबसे सहजता से पचता है। स्त्रियों से अति संभोग शोष में, और शुक्र (वीर्य) के वेग को रोकना षाण्ड्य (नपुंसकता) में सबसे आगे है। पराघातन अन्न में अरुचि उत्पन्न करने में सबसे आगे है; इस शब्द का अर्थ स्पष्ट नहीं है, सम्भवतः प्राणियों का वध या उसे देखना। अनशन (कुछ न खाना) आयु घटाने में, प्रमित (बहुत नपा-तुला, थोड़ा) भोजन कर्शन में, अजीर्ण रहते हुए अध्यशन (पहला भोजन पचे बिना फिर खाना) ग्रहणी को दूषित करने में, विषम (कभी कम, कभी अधिक, कभी बेसमय) भोजन अग्नि को विषम करने में, और विरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों का भोजन निन्दित (घृणित माने जाने वाले) रोग उत्पन्न करने में सबसे आगे है; वीर्य द्रव्य की वह शक्ति है जिससे वह काम करता है, जैसे गरम या ठण्डा प्रभाव। मन और आचरण: प्रशम (मन की शान्ति) सबसे पथ्य है, और आयास (शरीर या मन को थकाने वाला अति परिश्रम) सबसे अपथ्य। मिथ्यायोग, यानी किसी चीज़ का गलत ढंग से प्रयोग, रोग करने में सबसे आगे है; सूत्र यह नहीं बताता कि किसका प्रयोग। रजस्वला (मासिक धर्म के दिनों की स्त्री) से समागम अलक्ष्मी (दुर्भाग्य, अशुभ) का सबसे बड़ा द्वार है। ब्रह्मचर्य आयु बढ़ाने में और पराई स्त्री से समागम आयु घटाने में सबसे आगे है। सङ्कल्प (सम्भवतः मन में उठी कामना) वृष्यों में और दौमनस्य (मन की खिन्नता) अवृष्यों, यानी पुरुष-शक्ति घटाने वालों, में सबसे आगे है। अपने बल से अधिक कार्य आरम्भ करना प्राणों को सबसे अधिक बाधा देता है, और विषाद (हताशा) रोग को सबसे अधिक बढ़ाता है। स्नान थकान हरने में, हर्ष प्रीणन (तन और मन को तृप्त और प्रसन्न करने) में, शोक शोषण (शरीर को सुखाने) में, निवृत्ति (सम्भवतः श्रम और चिन्ता से छुटकारा) पुष्टि में, पुष्टि (शरीर का भरा-पूरा होना) नींद लाने में, और अति निद्रा तन्द्रा (सुस्ती और ऊँघ) लाने में सबसे आगे है। सब छह रसों (मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय) का नियमित सेवन बल देने में, और एक ही रस का नियमित सेवन दुर्बल करने में सबसे आगे है। रोगी और रोग: गर्भशल्य, यानी वह गर्भ जो भीतर अटककर शल्य (भीतर फँसे काँटे) की तरह हो गया हो, शरीर से निकाली जाने योग्य वस्तुओं में सबसे आगे है, और अजीर्ण (न पचा आहार) निकाल देने योग्य वस्तुओं में। बालक उन लोगों में सबसे आगे है जिनके लिए सूत्र मृदु (हल्की) औषध बताता है, और वृद्ध याप्य रोगियों में; याप्य वह रोग है जो पूरी तरह नहीं मिटता, केवल लगातार उपचार से दबाकर रखा जा सकता है। गर्भिणी उन लोगों में सबसे आगे है जिनके लिए तीक्ष्ण औषध, व्यवाय (मैथुन) और व्यायाम वर्जित हैं, और सौमनस्य गर्भ को धारण करने, यानी बनाए रखने, में। सन्निपात (तीनों दोषों का एक साथ बिगड़ना) सबसे कठिन चिकित्सा वाला है, और आम सबसे विषम (उलझी हुई) चिकित्सा वाला। ज्वर (बुखार) सब रोगों में प्रधान है, कुष्ठ लम्बे चलने वाले रोगों में, राजयक्ष्मा (शरीर को धीरे-धीरे क्षीण करने वाला एक गम्भीर रोग) रोग-समूहों में, और प्रमेह (मूत्र के रोगों का एक समूह) अनुषङ्गी, यानी पीछा न छोड़ने वाले, रोगों में। जलौका (जोंक) अनुशस्त्रों में सबसे आगे है; अनुशस्त्र वे साधन हैं जो शस्त्र, यानी चीर-फाड़ के औज़ार, के स्थान पर काम आते हैं। बस्ति चिकित्सा की विधियों (तन्त्रों) में सबसे आगे है। देश: हिमवान् (हिमालय) औषधियों की भूमियों में, सोम ओषधियों (वनस्पतियों) में, मरुभूमि (सूखा, कम पानी वाला प्रदेश) आरोग्यकर देशों में, और अनूप (अधिक पानी वाला, दलदली प्रदेश) अहितकर देशों में सबसे आगे है। सोम की पहचान यहाँ नहीं की गई। वैद्य, रोगी और ज्ञान: (वैद्य के) निर्देश के अनुसार चलना रोगी का सबसे बड़ा गुण है, और भिषक् (वैद्य) चिकित्सा के अङ्गों में सबसे प्रधान है (चरक संहिता सू. ९ में चिकित्सा के चार पाद बताए गए हैं: वैद्य, द्रव्य, परिचारक और रोगी)। नास्तिक (जो परलोक आदि को नहीं मानता) त्याग देने योग्य लोगों में सबसे आगे है, और लौल्य (लालच) क्लेश देने वालों में। निर्देश के अनुसार न चलना अरिष्टों में, यानी मृत्यु निकट होने के सूचक लक्षणों में, सबसे आगे है, और अनिर्वेद, यानी निराश न होना, वार्त (कुशलता, स्वस्थता) के लक्षणों में। वैद्यों का समूह, यानी कई वैद्यों का साथ मिलकर विचार करना, सन्देह दूर करने में सबसे आगे है, और योग (सम्भवतः औषधों की उचित योजना और प्रयोग का ज्ञान) वैद्य के गुणों में। इसके बाद मूल पाठ में 'वैद्यसमूहः' फिर से आया है, पर उसके साथ कोई वर्ग नहीं है; यह सम्भवतः टंकण में हुआ दोहराव है, और आगे की जोड़ी 'विज्ञानम् औषधीनाम्' पढ़ी गई है: विज्ञान (सम्यक् ज्ञान) औषधियों में सबसे आगे है। शास्त्र के साथ जुड़ा तर्क (युक्ति) साधनों में, संप्रतिपत्ति (सम्भवतः ठीक समय पर ठीक कर्म में लग जाना) काल-ज्ञान के प्रयोजनों में, और अव्यवसाय (उद्यम न करना, टालना) समय चूक जाने के कारणों में सबसे आगे है। दृष्टकर्मता, यानी कर्म को स्वयं होते देखा होना (व्यावहारिक अनुभव), सन्देह दूर करने में, असमर्थता भय देने में, और उस विद्या के जानकारों से संभाषा (चर्चा) बुद्धि बढ़ाने में सबसे आगे है। आचार्य (गुरु) शास्त्र को पाने का सबसे बड़ा साधन है, और आयुर्वेद अमृतों में, यानी जीवन देने वाली वस्तुओं में, सबसे आगे है। सज्जनों का वचन पालन करने योग्य बातों में, असत् (बुरी या असत्य बात) को ग्रहण करना सब अहितों में, और सब कुछ का संन्यास (त्याग) सुखों में सबसे आगे है। अन्त का 'इति' सूची की समाप्ति बताता है। मूल पाठ में कुछ शब्द टंकण की भूल से अशुद्ध लगते हैं, और अनुवाद उनके स्पष्ट शुद्ध रूप के अनुसार है: 'शृषो' को शिरीषः, 'पुरूषजनन' को पुरीषजनन, 'कपित्थमुकण्ठ्यानाम्' को कपित्थम् अकण्ठ्यानाम्, 'प्रथ्यानाम्' को पथ्यानाम्, 'वृस्य' को वृष्य, और 'शीतशोद्वेपन' को सम्भवतः शीतशूलोद्वेपन पढ़ा गया है।