भारत संहिता

अध्याय २६

आत्रेयभद्रकाप्यीयोऽध्यायः

आत्रेय और भद्रकाप्य (रस और द्रव्य-गुणों पर संवाद)

इस पृष्ठ का हिन्दी पाठ AI (Claude) द्वारा तैयार किया गया ड्राफ्ट है। चिह्न वाले अंशों की सम्पादक द्वारा जाँच अभी बाकी है।

भूमिका

आत्रेयभद्रकाप्यीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का छब्बीसवाँ अध्याय है। इसका नाम उन दो ऋषियों के नामों से बना है जो इसकी सभा में सबसे पहले गिनाए गए हैं: आत्रेय और भद्रकाप्य। अध्याय एक प्रसंग से आरम्भ होता है: शास्त्र-ज्ञान और आयु में बढ़े हुए, अपने मन को जीत चुके महर्षि रमणीय चैत्ररथ वन में एकत्र होते हैं, और वहाँ बैठे हुए उनके बीच रस और आहार के सही निर्णय पर चर्चा होती है। सभा में भगवान् आत्रेय पुनर्वसु के साथ भद्रकाप्य, शाकुन्तेय, पूर्णाक्ष मौद्गल्य, हिरण्याक्ष कौशिक, कुमारशिरा भरद्वाज, राजा वार्योविद, विदेह के राजा निमि, बडिश और बाह्लीक देश के वैद्य काङ्कायन हैं। रस का अर्थ यहाँ स्वाद है, जिसे जीभ पहचानती है।

पहले हर विद्वान् अपना मत रखते हैं: किसी के अनुसार रस एक है, किसी के अनुसार दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात या आठ, और काङ्कायन के अनुसार रस अनगिनत हैं। फिर भगवान् आत्रेय निर्णय देते हैं कि रस छह ही हैं: मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (तीखा), तिक्त (कड़वा) और कषाय (कसैला)। वे एक-एक करके बताते हैं कि दूसरे मतों में जिन्हें रस कहा गया, वे रस नहीं हैं: जल रसों की योनि, यानी उत्पत्ति का आधार, है; छेदन और उपशमन कर्म हैं; गुरु, लघु, शीत, उष्ण आदि द्रव्यों के गुण हैं; क्षार बनाकर तैयार किया गया एक द्रव्य है; और रस का अव्यक्त (अस्पष्ट) रहना कोई अलग रस नहीं। इसके बाद अध्याय द्रव्य, यानी पदार्थ, की मूल बातें कहता है। हर द्रव्य पाँच महाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) से बना है; जिस महाभूत के गुण किसी द्रव्य में अधिक हों, वह उसी का कहलाता है और उसी के अनुसार काम करता है; और संसार में ऐसा कोई द्रव्य नहीं जो सही युक्ति और प्रयोजन से औषध न हो। द्रव्य जो करते हैं वह कर्म है, जिस शक्ति से करते हैं वह वीर्य है, और जहाँ, जब, जिस ढंग से और जिस परिणाम के लिए करते हैं, वे अधिकरण, काल, उपाय और फल हैं।

फिर अध्याय रसों के मेल गिनाता है: एक, दो, तीन, चार, पाँच या छहों रसों के मेल से द्रव्यों के तिरसठ भेद, जो अनुरस (मुख्य रस के साथ हल्के रूप में रहने वाला रस) और रसों की कम-अधिक मात्रा को गिनने पर अनगिनत हो जाते हैं। इसी बीच पर, अपर, युक्ति, संख्या, संयोग, विभाग, पृथक्त्व, परिमाण, संस्कार और अभ्यास, इन परादि गुणों की परिभाषाएँ आती हैं, जिन्हें जाने बिना चिकित्सा ठीक से नहीं चलती। भगवान् आत्रेय बताते हैं कि आकाश से गिरा जल, जिसका रस अव्यक्त है, पाँच महाभूतों के गुणों से युक्त होकर प्राणियों और वनस्पतियों के शरीरों में छह रसों के रूप में प्रकट होता है, और कौन-सा रस किन महाभूतों की अधिकता से बनता है। फिर हर रस के गुण और कर्म, और अकेले उसी रस के बहुत अधिक सेवन से होने वाले रोग विस्तार से गिनाए गए हैं, इस निष्कर्ष के साथ कि रस उचित मात्रा में और ठीक ढंग से लिए जाएँ तो उपकार करते हैं, अन्यथा हानि। अध्याय यह भी दिखाता है कि केवल रस से हर द्रव्य का काम नहीं जाना जा सकता: सैन्धव लवण होते हुए भी और आमलक अम्ल होते हुए भी उष्ण नहीं हैं। इसलिए वह विपाक (पचने के बाद का परिणाम, जो कटु, अम्ल या मधुर होता है), वीर्य (वह शक्ति जिसके बिना द्रव्य कुछ नहीं करता, जिसे कुछ आचार्य आठ प्रकार का और कुछ दो प्रकार का, शीत और उष्ण, मानते हैं) और प्रभाव समझाता है। प्रभाव वह विशेष शक्ति है जिससे रस, वीर्य और विपाक समान होने पर भी कर्म अलग होता है, जैसे दन्ती चित्रक के समान होकर भी प्रभाव से विरेचन कराती है; बल समान हो तो विपाक रस पर, वीर्य दोनों पर और प्रभाव तीनों पर भारी पड़ता है। इस भाग के अन्त में बताया गया है कि मुँह में चखने पर हर रस किन लक्षणों से पहचाना जाता है।

इसके बाद अग्निवेश भगवान् आत्रेय से वैरोधिक, यानी विरुद्ध, आहार के लक्षण पूछते हैं: वे खाद्य जो शरीर की धातुओं के विरोधी हो जाते हैं। आत्रेय कहते हैं कि मछली दूध के साथ न खाई जाए; भद्रकाप्य केवल चिलिचिम मछली को ऐसा मानते हैं, पर आत्रेय कहते हैं कि कोई भी मछली दूध के साथ न खाई जाए, और चिलिचिम तो विशेष रूप से नहीं। फिर वे विरुद्ध मेलों की लम्बी सूची देते हैं, जैसे कुछ प्राणियों के मांस के साथ मधु, दूध या उड़द, दूध के साथ खट्टे फल, बराबर मात्रा में मधु और घी, और गरम किया हुआ मधु। श्लोकों में वे अठारह आधार गिनाए गए हैं जिनसे कोई आहार विरुद्ध हो जाता है: देश, काल, अग्नि, मात्रा, सात्म्य, दोष, संस्कार, वीर्य, कोष्ठ, अवस्था, क्रम, परिहार, उपचार, पाक, संयोग, हृदय (मन की रुचि), सम्पद् और विधि। अध्याय के अनुसार विरुद्ध आहार नपुंसकता, अन्धापन, कुष्ठ और ज्वर जैसे अनेक रोगों का, और मृत्यु तक का, कारण होता है। इसके प्रतिकार के रूप में वमन, विरेचन, संशमन और पहले से शरीर को तैयार करना बताया गया है, और यह भी कि सात्म्य होने पर, थोड़ी मात्रा में, या प्रदीप्त अग्नि वाले, युवा, स्निग्ध, व्यायाम करने वाले और बलवान व्यक्ति के लिए विरुद्ध आहार निष्फल हो जाता है।

अध्याय के अन्त में कुछ श्लोक इन सब विषयों को फिर गिनाते हैं और कहते हैं कि यह सब मुनि आत्रेय ने इस अध्याय में कहा। अध्याय से ये बातें साथ ले जाने योग्य हैं: रस छह ही हैं; किसी द्रव्य का असर केवल उसके रस से तय नहीं होता, उसके विपाक, वीर्य और प्रभाव को भी देखना होता है; सही युक्ति से हर द्रव्य औषध बन सकता है; और आहार हितकर है या अहितकर, यह इस पर भी निर्भर है कि वह किसके साथ, कैसे, कब और किसके लिए लिया गया।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १०७-११३)

तत्र श्लोकाःमतिरासीन्महर्षीणां या या रसविनिश्चये ।द्रव्याणि गुणक्रमभ्यां द्रव्यसंख्या रसाश्रया ॥

श्लोक १०७ →

इस विषय में (सार रूप) श्लोक (हैं): रसों के निर्णय में महर्षियों का जो-जो मत था, गुणों और कर्मों के अनुसार द्रव्य, रसों पर आधारित द्रव्यों की संख्या

कारणं रससंख्याया रसानुरसलक्षणम् ।परादीनां गुणानां च लक्षणानि पृथक्पृथक् ॥

श्लोक १०८ →

रसों की संख्या का कारण, रस और अनुरस का लक्षण, और पर आदि गुणों के अलग-अलग लक्षण

पञ्चात्मकानां षट्त्वं च रसानां येन हेतुना ।ऊर्ध्वानुलोमभाजश्च यद्गुणातिशयाद्रसाः ॥

श्लोक १०९ →

पाँच (महाभूतों) से बने रसों का छह होना जिस कारण से (है), और जिस गुण की अधिकता से रस ऊर्ध्व (ऊपर की ओर) और अनुलोम (नीचे की ओर) जाने वाले (होते हैं)

षण्णां रसानां षट्त्वे च सविभक्ता विभक्तयः ।उद्देशश्चापवादश्च द्रव्याणां गुणकर्मणि ॥

श्लोक ११० →

और छह रसों के छह होने के विषय में विभागों सहित (उनकी) विभक्तियाँ (विभाजन); द्रव्यों के गुण और कर्म के विषय में उद्देश (सामान्य नियम) और अपवाद

प्रवरावरमध्यत्वं रसानाम् गौर्वादिषु ।पाकप्रभावयोर्लिङ्गं वीर्यसंख्याविनिश्चयः ॥

श्लोक १११ →

गौरव (भारीपन) आदि (गुणों) में रसों का प्रवर (उत्तम), अवर (निम्न) और मध्य होना; पाक (विपाक) और प्रभाव का लिङ्ग (लक्षण); वीर्य की संख्या का निर्णय

षण्णामास्वाद्यमानानां रसानां यत् स्वलक्षणम् ।यद्यद्विरुध्यते यस्माद्येन यत्कारि चैव यत् ॥

श्लोक ११२ →

चखे जाने वाले छह रसों का जो अपना लक्षण है; जो-जो (द्रव्य) जिस कारण से (और) जिसके साथ विरुद्ध होता है, और जो (विरुद्ध आहार) जो (हानि) करने वाला है

वैरोधिकनिमित्तानां व्याहीनामौषधं च यत् ।आत्रेयभद्रकाप्यीये तत् सर्वमवदन्मुनिः ॥

श्लोक ११३ →

और वैरोधिक (विरुद्ध आहार से होने वाले) रोगों की जो औषध (उपचार) है, वह सब मुनि (आत्रेय) ने आत्रेयभद्रकाप्यीय (अध्याय) में कहा।

मुख्य शब्द (२६) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

सामान्य
सामान्य - समानता; जो वृद्धि का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: समान + य (भाव) - समान होने का भाव।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: सामान्य सदा सब भावों की वृद्धि का कारण है, और एकत्व (एक जैसा बनाना) करता है (सू. १/४४-४५)। उदाहरण के लिए, जिस गुण वाला द्रव्य लिया जाए, वह शरीर में उसी गुण को बढ़ाता है।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. सू. २६/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम आत्रेयभद्रकाप्यीय (आत्रेय और भद्रकाप्य सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. २६/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. २६/३

। ॥ ३ ॥

आत्रेय और भद्रकाप्य, वैसे ही शाकुन्तेय भी, और पूर्णाक्ष मौद्गल्य भी, और हिरण्याक्ष कौशिक

च. सू. २६/४

। ॥ ४ ॥

और वे निष्पाप भरद्वाज, जो कुमारशिरा नाम वाले हैं, और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ श्रीमान् राजा वार्योविद भी

च. सू. २६/५

। ॥ ५ ॥

और विदेह के राजा निमि, और महामति (महान् बुद्धि वाले) बडिश, और बाह्लीक (देश के) काङ्कायन, जो बाह्लीक के वैद्यों में श्रेष्ठ हैं

च. सू. २६/६

। ॥ ६ ॥

ज्ञान और आयु में बढ़े हुए, अपने मन को जीत चुके ये महर्षि, विहार (घूमने-फिरने) की इच्छा से, रमणीय चैत्ररथ वन में एकत्र हुए।

च. सू. २६/७

। ॥ ७ ॥

वहाँ बैठे हुए, अर्थ (विषय के तत्त्व) को जानने वाले उन (महर्षियों) के बीच रस और आहार के सम्यक् (सही) निर्णय के विषय में यह सार्थक चर्चा हुई।

च. सू. २६/८

। । । । । । । । ॥ ८ ॥

भद्रकाप्य ने कहा: 'रस एक ही है; कुशल (विद्वान्) लोग जिसे पाँच इन्द्रियार्थों (इन्द्रियों के विषयों) में से एक, जिह्वा (जीभ) का विषय होने वाला भाव कहते हैं, और वह फिर जल से अलग नहीं है।' ब्राह्मण शाकुन्तेय ने (कहा): 'रस दो हैं: छेदनीय (काटकर घटाने वाला) और उपशमनीय (शान्त करने वाला)।' पूर्णाक्ष मौद्गल्य ने (कहा): 'रस तीन हैं: छेदनीय, उपशमनीय और साधारण (दोनों के मेल वाला)।' हिरण्याक्ष कौशिक ने (कहा): 'रस चार हैं: स्वादु (स्वादिष्ट) और हितकर, स्वादु और अहितकर, अस्वादु और हितकर, तथा अस्वादु और अहितकर।' कुमारशिरा भरद्वाज ने (कहा): 'रस पाँच हैं: भौम (पृथ्वी के), औदक (जल के), आग्नेय (अग्नि के), वायव्य (वायु के) और आन्तरिक्ष (आकाश के)।' राजर्षि वार्योविद ने (कहा): 'रस छह हैं: गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष।' निमि वैदेह ने (कहा): 'रस सात हैं: मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय और क्षार।' बडिश धामार्गव ने (कहा): 'रस आठ हैं: मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय, क्षार और अव्यक्त।' बाह्लीक के वैद्य काङ्कायन ने (कहा): 'रस अपरिसंख्येय (अगणित) हैं, क्योंकि (उनके) आश्रयों, गुणों, कर्मों और संस्वाद (स्वाद के अनुभव) के भेद अगणित हैं।'

च. सू. २६/९

। ; । ॥ ९ ॥

भगवान् आत्रेय पुनर्वसु ने कहा कि रस छह ही हैं: मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय। उन छह रसों की योनि (उत्पत्ति का आधार) उदक (जल) है; छेदन और उपशमन (ये) दो कर्म हैं; उन दोनों के मिश्रण से साधारणत्व (होता है); स्वादु और अस्वादु होना भक्ति (रुचि) है; हित और अहित (उनके) प्रभाव हैं; पाँच महाभूतों के विकार तो आश्रय हैं, (जो) प्रकृति, विकृति, विचार, देश और काल के अधीन हैं; द्रव्य नाम वाले उन आश्रयों में गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष आदि गुण हैं; क्षरण (बहने) के कारण क्षार (कहलाता है), वह रस नहीं है; वह द्रव्य है, जो अनेक रसों से उत्पन्न, अनेक रसों वाला, कटु और लवण की अधिकता वाला, अनेक इन्द्रियार्थों से युक्त और करण (बनाने की विधि) से तैयार किया गया है; अव्यक्तीभाव (रस का स्पष्ट न होना) तो रसों की प्रकृति में, अनुरस में, या अनुरस से युक्त द्रव्य में होता है; और उन आश्रय आदि भावों के विशेषों के अनगिनत होने के कारण (रसों का) अपरिसंख्येयत्व (अनगिनत होना मानना) उचित नहीं है, क्योंकि इन आश्रय आदि भावों के विशेषों को, विशेष अनगिनत होने से, एक-एक (रस) भी धारण करता है, और उससे (उस रस का) अन्यत्व (दूसरा रस हो जाना) सिद्ध नहीं होता; और इन (रसों) के अधिकतर परस्पर मिले हुए रूप में उत्पन्न होने से (उनके) गुणों और प्रकृतियों का अपरिसंख्येयत्व नहीं होता; इसलिए बुद्धिमान लोग मिले हुए रसों का कर्म नहीं बताते। उसी कारण को ध्यान में रखते हुए (हम) एक-दूसरे से न मिले हुए छह रसों के लक्षणों को अलग-अलग बताएँगे।

च. सू. २६/१०

। ॥ १० ॥

परन्तु पहले (हम) द्रव्य के भेदों को ध्यान में रखकर कुछ कहेंगे। इस विषय में सारा द्रव्य पाञ्चभौतिक (पाँच महाभूतों से बना) है; वह चेतनावान् और अचेतन (दो प्रकार का) है; उसके गुण शब्द आदि, और गुरु से लेकर द्रव तक (के गुण) हैं; कर्म वमन आदि पाँच प्रकार का कहा गया है।

च. सू. २६/११

॥ ११ ॥

उनमें, जो द्रव्य गुरु, खर, कठिन, मन्द, स्थिर, विशद, सान्द्र, स्थूल और गन्ध, इन गुणों की अधिकता वाले होते हैं, वे पार्थिव (पृथ्वी-प्रधान) हैं; वे उपचय, सङ्घात, गौरव और स्थैर्य करते हैं। जो द्रव, स्निग्ध, शीत, मन्द, मृदु, पिच्छिल और रस, इन गुणों की अधिकता वाले होते हैं, वे आप्य (जल-प्रधान) हैं; वे उपक्लेद, स्नेह, बन्ध, विष्यन्द, मार्दव और प्रह्लाद करते हैं। जो उष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, लघु, रूक्ष, विशद और रूप, इन गुणों की अधिकता वाले होते हैं, वे आग्नेय (अग्नि-प्रधान) हैं; वे दाह, पाक, प्रभा, प्रकाश और वर्ण करते हैं। जो लघु, शीत, रूक्ष, खर, विशद, सूक्ष्म और स्पर्श, इन गुणों की अधिकता वाले होते हैं, वे वायव्य (वायु-प्रधान) हैं; वे रौक्ष्य, ग्लानि, विचार, वैशद्य और लाघव करते हैं। जो मृदु, लघु, सूक्ष्म, श्लक्ष्ण और शब्द, इन गुणों की अधिकता वाले होते हैं, वे आकाशात्मक (आकाश-प्रधान) हैं; वे मार्दव, सौषिर्य और लाघव करते हैं।

च. सू. २६/१२

॥ १२ ॥

इस उपदेश के अनुसार, उस-उस (विशेष) युक्ति और उस-उस प्रयोजन को ध्यान में रखकर (देखें तो), संसार में ऐसा कोई भी द्रव्य नहीं मिलता जो औषध न हो।

च. सू. २६/१३

॥ १३ ॥

परन्तु द्रव्य केवल गुणों के प्रभाव से ही कार्मुक (कर्म करने वाले) नहीं होते। क्योंकि द्रव्य, द्रव्य-प्रभाव से, गुण-प्रभाव से और द्रव्य तथा गुण दोनों के प्रभाव से, उस-उस काल में, उस-उस अधिकरण को पाकर, उस-उस युक्ति और उस-उस प्रयोजन को ध्यान में रखकर जो करते हैं, वह कर्म है; जिसके द्वारा करते हैं, वह वीर्य है; जहाँ करते हैं, वह अधिकरण है; जब करते हैं, वह काल है; जिस प्रकार करते हैं, वह उपाय है; और जो सिद्ध करते हैं, वह फल है।

च. सू. २६/१४

॥ १४ ॥

और इन (रसों) का भेद, जो तिरसठ प्रकार के विकल्पों वाला है, द्रव्य, देश और काल के प्रभाव से होता है; उसे (हम) बताएँगे।

च. सू. २६/१५

। ॥ १५ ॥

स्वादु (मधुर) अम्ल आदि (शेष रसों) के साथ, और अम्ल आदि (रस) शेष (रसों) के साथ, अलग-अलग योग (मेल) को प्राप्त होते हैं; ये पन्द्रह द्रव्य तो दो रसों वाले हैं।

च. सू. २६/१६

। ॥ १६ ॥

मधुर का, अम्ल आदि (में से किसी एक) से अलग-अलग युक्त होकर, शेष (रसों) के साथ अलग-अलग योग होता है; वैसे ही अम्ल का, लवण का और उसी प्रकार कटु का (भी)।

च. सू. २६/१७

। ॥ १७ ॥

(इस प्रकार) गिनती के क्रम से तीन रसों वाले द्रव्य बीस कहे गए। अब चार-चार (रसों) के मेल से द्रव्य दस और पाँच (अर्थात् पन्द्रह) कहे जाएँगे।

च. सू. २६/१८

। ॥ १८ ॥

स्वादु (मधुर) और अम्ल, साथ मिलकर, लवण आदि के साथ अलग-अलग योग को प्राप्त होकर, (फिर) शेष (रसों) के साथ अलग-अलग योग को प्राप्त होते हैं; (यह) चार रसों की गिनती से (है)।

च. सू. २६/१९

। ॥ १९ ॥

उसी तरह स्वादु (मधुर) और लवण, साथ मिलकर, कटु आदि से अलग-अलग युक्त होकर, शेष (रसों) के साथ अलग-अलग योग को प्राप्त होते हैं; वैसे ही स्वादु (मधुर) और ऊषण (कटु) (भी)।

च. सू. २६/२०

। ॥ २० ॥

अम्ल और लवण, साथ मिलकर, कटु आदि से अलग-अलग संयुक्त होकर, शेष (रसों) के साथ अलग-अलग योग को प्राप्त होते हैं; वैसे ही अम्ल और कटु (भी) शेष (रसों) के साथ (योग को प्राप्त होते हैं)।

च. सू. २६/२१

। ॥ २१ ॥

और तिक्त सहित लवण और ऊषण (कटु) कषाय से युक्त होते हैं। (जानकार) एक-एक (रस) को छोड़ देने से पाँच रसों वाले (द्रव्य) तो छह कहते हैं।

च. सू. २६/२२

। ॥ २२ ॥

और एक रस वाले (द्रव्य) छह होते हैं, तथा छहों रसों वाला तो एक ही (होता है)। इस प्रकार रसों की गणना से द्रव्यों की तिरसठ (संख्या) बताई गई है।

च. सू. २६/२३

। ॥ २३ ॥

परन्तु रस और अनुरस की कल्पना (विचार) से यह तिरसठ (की संख्या) असंख्य हो जाती है, क्योंकि रस तर और तम (कम-अधिक मात्रा के भेदों) से उस संख्या को लाँघ जाते हैं।

च. सू. २६/२४

। ॥ २४ ॥

(रसों के) संयोग सत्तावन हैं, परन्तु रस-चिन्तकों (रसों पर विचार करने वाले विद्वानों) ने, वहाँ (प्रयोग में) रसों के योग्य होने के कारण, (उनकी) कल्पना तिरसठ प्रकार की बनाई है।

च. सू. २६/२५

। ॥ २५ ॥

सिद्धि (सफलता) चाहने वाले वैद्य को दोष, औषध आदि का भली-भाँति विचार करके कहीं एक रस की योजना करनी चाहिए और कहीं संयुक्त (मिले हुए) रसों की।

च. सू. २६/२६

। ॥ २६ ॥

विद्वान् (वैद्य) रोगों के प्रति (उनकी चिकित्सा में) दो रस आदि वाले द्रव्यों का, संयुक्त (मिले हुए) रसों का, या एक-एक करके रसों का भी प्रयोग करते हैं।

च. सू. २६/२७

। ॥ २७ ॥

जो रसों के विकल्पों (भेदों और मेलों) को जानने वाला हो और दोषों के विकल्पों को जानने वाला हो, वह विकारों (रोगों) के हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और उपशान्ति (शमन) में भ्रम में नहीं पड़ेगा।

च. सू. २६/२८

। ॥ २८ ॥

द्रव्य का रस, (द्रव्य के) सूखे होने पर भी और आरम्भ में भी, स्पष्ट रूप से जाना जाता है; इसके विपरीत (ढंग से जाना जाने वाला) अनुरस है, क्योंकि सातवाँ (कोई) रस नहीं है।

च. सू. २६/२९

। ॥ २९ ॥

परत्व और अपरत्व, युक्ति, संख्या, संयोग, विभाग, पृथक्त्व, और परिमाण भी

च. सू. २६/३०

। ॥ ३० ॥

संस्कार और अभ्यास: ये पर आदि (परादि) गुण जानने चाहिए, (जो) चिकित्सा की सिद्धि (सफलता) के उपाय (हैं); उन्हें हम (उनके) लक्षणों (परिभाषाओं) के साथ बताते हैं।

च. सू. २६/३१

। ॥ ३१ ॥

देश, काल, वय (आयु), मान (माप), पाक, वीर्य, रस आदि के विषय में परत्व और अपरत्व (होते हैं); और युक्ति तो वह योजना है जो उचित बैठती है।

च. सू. २६/३२

। ॥ ३२ ॥

संख्या गणित (गिनती) है। द्रव्यों का साथ जुड़ना (योग) संयोग कहा जाता है; वह दो (द्रव्यों) के, सब (द्रव्यों) के या एक (द्रव्य) के कर्म से उत्पन्न होता है, और अनित्य ही है।

च. सू. २६/३३

। ॥ ३३ ॥

विभाग तो विभक्ति (बँटना), वियोग (अलग होना), भाग-भाग करके ग्रहण (करना) है। पृथक्त्व असंयोग (न जुड़ा होना), वैलक्षण्य (भिन्न लक्षणों वाला होना), अनेकता (अनेक होना) है।

च. सू. २६/३४

। ॥ ३४ ॥

परिमाण फिर मान (माप) है; संस्कार करण (द्रव्य को तैयार करने की क्रिया) माना गया है; अभ्यास किसी भाव का बार-बार अभ्यसन (सेवन), शीलन और सतत क्रिया (निरन्तर करना) है।

च. सू. २६/३५

। ॥ ३५ ॥

इस प्रकार पर आदि सभी गुण अपने-अपने लक्षणों के साथ कहे गए, जिन्हें जाने बिना चिकित्सा ठीक प्रकार से नहीं चलती।

च. सू. २६/३६

। ॥ ३६ ॥

गुण गुणों में आश्रित (रहने वाले) नहीं कहे गए हैं; इसलिए वैद्य रसों के गुणों को द्रव्यों के गुण जाने। (शास्त्र के) कर्ता के अभिप्राय अनेक प्रकार के होते हैं।

च. सू. २६/३७

। ॥ ३७ ॥

और इसलिए प्रकृत (प्रसंग) को, देश और काल के अन्तरों (भेदों) को, तथा तन्त्र (शास्त्र) के कर्ता के अभिप्रायों और उपायों को जानकर (वैद्य) अर्थ का निर्देश करे।

च. सू. २६/३८

। ॥ ३८ ॥

इसके बाद मैं रसों के छह विभाग बताऊँगा, और यह भी कि पञ्चभूतों से उत्पन्न होने वाले रस किस प्रकार छह गिने गए हैं।

च. सू. २६/३९

॥ ३९ ॥

जल निश्चय ही सौम्य, अन्तरिक्ष से उत्पन्न, स्वभाव से शीत, लघु (हल्के) और अव्यक्त (अप्रकट) रस वाले होते हैं। वे (जल) अन्तरिक्ष से गिरते हुए और गिर चुकने पर पाँच महाभूतों के गुणों से युक्त (होकर) जङ्गम (चलने-फिरने वाले) और स्थावर (अचल) प्राणियों के शरीरों को तृप्त करते हैं; उन शरीरों में छह रस प्रकट होते हैं।

च. सू. २६/४०

। ॥ ४० ॥

उन छः रसों में से सोम के गुणों की अधिकता से मधुर (मीठा) रस होता है, पृथ्वी और अग्नि की अधिकता से अम्ल (खट्टा), जल और अग्नि की अधिकता से लवण (नमकीन), वायु और अग्नि की अधिकता से कटुक (तीखा), वायु और आकाश के अधिक होने से तिक्त (कड़वा), और वायु और पृथ्वी की अधिकता से कषाय (कसैला) रस होता है। इस प्रकार महाभूतों की न्यूनता और अधिकता के विशेष भेद से इन रसों का छः होना सिद्ध होता है, जैसे (इसी भेद से) स्थावर और जङ्गम भूतों के रंग और आकार के अनेक प्रकार के भेद होते हैं; और काल के छः ऋतुओं वाला होने के कारण महाभूतों की न्यूनता और अधिकता का (यह) विशेष भेद बनता है।

च. सू. २६/४१

॥ ४१ ॥

उनमें अग्नि और वायु के स्वभाव वाले रस प्रायः ऊपर की ओर जाने वाले होते हैं, वायु के हल्केपन और ऊपर उठने के स्वभाव के कारण, और अग्नि के ऊपर की ओर जलने के स्वभाव के कारण; परन्तु जल और पृथ्वी के स्वभाव वाले रस प्रायः नीचे की ओर जाने वाले होते हैं, पृथ्वी के भारीपन के कारण और जल के नीचे की ओर बहने के स्वभाव के कारण; और मिले-जुले स्वभाव वाले (रस) दोनों ओर जाने वाले होते हैं।

च. सू. २६/४२

॥ ४२ ॥

उन छः रसों में से एक-एक के गुणों और कर्मों की, द्रव्य के अनुसार, हम आगे व्याख्या करेंगे।

च. सू. २६/४३

। ; । ; । ; । ; । ; । ॥ ४३ ॥

उनमें (छह रसों में), मधुर रस शरीर के लिए सात्म्य (स्वभाव से अनुकूल) होने के कारण रस, रुधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, ओज और शुक्र को बढ़ाता है; यह आयुष्य (आयु के लिए हितकर) है, छहों इन्द्रियों को प्रसन्न (निर्मल) करता है, बल और वर्ण देता है, पित्त, विष और वात को नष्ट करता है, तृष्णा (प्यास) और दाह (जलन) को शान्त करता है, त्वचा, केशों और कण्ठ के लिए हितकर है, बल्य (बल बढ़ाने वाला), प्रीणन (तृप्ति और प्रसन्नता देने वाला), जीवन (जीवन देने वाला), तर्पण (तृप्त करने वाला), बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाला) और स्थिरता देने वाला है, क्षीण और क्षत (घायल) का सन्धान करता (उन्हें जोड़ता) है, नाक, मुख, कण्ठ, होंठ और जीभ को आह्लादित करता है, दाह और मूर्च्छा को शान्त करता है, भौंरों और चींटियों को सबसे प्रिय है, तथा स्निग्ध, शीत और गुरु है। ऐसे गुणों वाला होने पर भी, यदि अकेले इसी का अत्यधिक सेवन किया जाए, तो यह स्थौल्य (मोटापा), मृदुता (शिथिलता), आलस्य, अधिक नींद, भारीपन, भोजन की इच्छा न होना, अग्नि की दुर्बलता, मुख और कण्ठ में मांस की वृद्धि, श्वास, कास (खाँसी), प्रतिश्याय (जुकाम), अलसक, शीतज्वर, आनाह (अफारा), मुख का मीठापन, वमथु (मिचली), संज्ञा और स्वर का नाश, गलगण्ड, गण्डमाला, श्लीपद, गले की सूजन, बस्ति, धमनियों और गले पर लेप-सा चढ़ जाना, नेत्र-रोग और अभिष्यन्द, इस प्रकार के कफज (कफ से उत्पन्न) विकारों को उत्पन्न करता है। अम्ल रस भोजन को रुचिकर बनाता है, अग्नि को दीप्त करता है, देह को पुष्ट करता है, ऊर्जा देता है, मन को जाग्रत करता है, इन्द्रियों को दृढ़ करता है, बल बढ़ाता है, वात का अनुलोमन करता है (उसे सही दिशा में चलाता है), हृदय को तृप्त करता है, मुँह में पानी लाता है, खाए हुए (भोजन) को नीचे ले जाता है, (उसे) गीला करता है, पचाता है, तृप्ति और प्रसन्नता देता है, तथा लघु, उष्ण और स्निग्ध है। ऐसे गुणों वाला होने पर भी, यदि अकेले इसी का अत्यधिक सेवन किया जाए, तो यह दाँतों को खट्टा कर देता है, प्यास बढ़ाता है, आँखें मिचवा देता है, रोंगटे खड़े कर देता है, कफ को पिघलाता है, पित्त को बढ़ाता है, रक्त को दूषित करता है, मांस में विदाह (जलन) करता है, शरीर को शिथिल करता है, और क्षीण, क्षत (घायल), कृश और दुर्बल लोगों में श्वयथु (सूजन) उत्पन्न कर देता है; इसके अतिरिक्त अपने आग्नेय (अग्नि जैसे) स्वभाव के कारण यह क्षत (घायल), अभिहत (चोट खाए), दष्ट (डसे हुए), दग्ध (जले), भग्न (टूटे), शून (सूजे), प्रच्युत (अपनी जगह से हटे), अवमूत्रित (जिन पर मूत्र पड़ा हो), परिसर्पित (जिन पर कोई जीव रेंगा हो), मर्दित (कुचले), छिन्न (कटे), भिन्न (फटे), विश्लिष्ट (जोड़ से अलग हुए), उद्विद्ध (बिंधे) और उत्पिष्ट (पिसे) आदि (अंगों) को पका देता है, और कण्ठ, छाती और हृदय में जलन उत्पन्न करता है। लवण रस पाचन (पचाने वाला), क्लेदन (गीलापन लाने वाला), दीपन (अग्नि को बढ़ाने वाला), च्यावन (बहाकर निकालने वाला), छेदन (चिपके दोषों को काटने वाला), भेदन (कठोर को तोड़ने वाला), तीक्ष्ण, सर (सरकाने वाला), विकासी (खोलने या फैलाने वाला), अधःस्रंसी (नीचे की ओर गिराने वाला), अवकाशकर (खाली स्थान बनाने वाला), वात को हरने वाला, स्तम्भ (जकड़न), बन्ध (रुकावट) और सङ्घात (जमाव) को नष्ट करने वाला, और सब रसों का प्रत्यनीक (विरोधी) है; यह मुँह में पानी लाता है, कफ को पिघलाकर बहाता है, मार्गों (स्रोतों) को शुद्ध करता है, शरीर के सब अवयवों को मृदु (कोमल) करता है, आहार को रुचिकर बनाता है, आहार के साथ प्रयुक्त होता है, बहुत गुरु नहीं है, तथा स्निग्ध और उष्ण है। ऐसे गुणों वाला होने पर भी, यदि अकेले इसी का अत्यधिक सेवन किया जाए, तो यह पित्त को प्रकुपित करता है, रक्त को बढ़ाता है, प्यास बढ़ाता है, मूर्च्छा लाता है, ताप (गरमी) उत्पन्न करता है, (त्वचा आदि को) फाड़ता है, मांस को नोचता है, कुष्ठों (त्वचा-रोगों) को गलाकर बहाता है, विष को बढ़ाता है, शोफों (सूजनों) को फोड़ देता है, दाँतों को गिरा देता है, पुंस्त्व (पौरुष) को नष्ट करता है, इन्द्रियों को अवरुद्ध करता है, वलि (झुर्रियाँ), पलित (बालों की सफेदी) और खालित्य (गंजापन) उत्पन्न करता है, और लोहितपित्त (रक्तपित्त), अम्लपित्त, वीसर्प, वातरक्त, विचर्चिका, इन्द्रलुप्त आदि विकारों को भी उत्पन्न करता है। कटु रस मुख को शुद्ध करता है, अग्नि को दीप्त करता है, खाए हुए (भोजन) को सुखाता है, नाक से स्राव कराता है, आँखों को (स्राव कराकर) साफ करता है, इन्द्रियों को स्पष्ट (सक्रिय) करता है, अलसक, श्वयथु (सूजन), उपचय (वृद्धि), उदर्द (चकत्ते), अभिष्यन्द, स्नेह (चिकनाई), स्वेद (पसीना), क्लेद (गीलापन) और मलों को नष्ट करता है, भोजन को रुचिकर बनाता है, कण्डू (खुजली) को नष्ट करता है, व्रणों (घावों) को बैठा देता है, क्रिमियों (कृमियों) को मारता है, मांस को खुरचकर घटाता है, रक्त के थक्के को तोड़ता है, बन्धों (रुकावटों) को काटता है, मार्गों (स्रोतों) को खोलता है, श्लेष्मा (कफ) को शान्त करता है, तथा लघु, उष्ण और रूक्ष है। ऐसे गुणों वाला होने पर भी, यदि अकेले इसी का अत्यधिक सेवन किया जाए, तो यह विपाक के प्रभाव से पुंस्त्व को नष्ट करता है; रस और वीर्य के प्रभाव से मोह (मूढ़ता) उत्पन्न करता है, ग्लानि (थकान) लाता है, अवसाद (शिथिलता) लाता है, कृश (दुबला) करता है, मूर्च्छा लाता है, (शरीर को) झुका देता है, अँधेरा-सा छा जाने की अवस्था लाता है, चक्कर लाता है, कण्ठ में जलन उत्पन्न करता है, शरीर में ताप उत्पन्न करता है, बल को क्षीण करता है, प्यास उत्पन्न करता है; और वायु और अग्नि के गुणों की अधिकता के कारण पैरों, भुजाओं, पार्श्वों (बगलों) और पीठ आदि में भ्रम (चक्कर), दवथु (जलन), कम्प (कँपकँपी), तोद (चुभन) और भेद (फटने जैसी पीड़ा) के साथ मारुतज (वात से उत्पन्न) विकारों को उत्पन्न करता है। तिक्त रस स्वयं रुचिकर न होते हुए भी अरोचक (अरुचि) को नष्ट करता है; यह विष को नष्ट करने वाला, क्रिमियों को नष्ट करने वाला, मूर्च्छा, दाह, कण्डू (खुजली), कुष्ठ और तृष्णा को शान्त करने वाला, त्वचा और मांस को स्थिर करने वाला, ज्वर को नष्ट करने वाला, दीपन, पाचन, स्तन्य (माता के दूध) को शुद्ध करने वाला, लेखन (खुरचकर घटाने वाला), तथा क्लेद, मेद, वसा, मज्जा, लसीका, पूय (मवाद), स्वेद, मूत्र, पुरीष (मल), पित्त और श्लेष्मा को सुखाने वाला है, और रूक्ष, शीत और लघु है। ऐसे गुणों वाला होने पर भी, यदि अकेले इसी का अत्यधिक सेवन किया जाए, तो यह अपनी रूक्षता तथा खर (खुरदरे) और विशद (चिपचिपाहट मिटाने वाले) स्वभाव के कारण रस, रुधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र को सुखा देता है, स्रोतों में खरता (खुरदरापन) उत्पन्न करता है, बल को हर लेता है, कृश करता है, ग्लानि लाता है, मोह उत्पन्न करता है, चक्कर लाता है, मुख को सुखा देता है, और अन्य वात-विकारों को भी उत्पन्न करता है। कषाय रस संशमन (दोषों को शान्त करने वाला), संग्राही (मल को बाँधने वाला), सन्धान करने (जोड़ने) वाला, पीडन (दबाने वाला), रोपण (घाव भरने वाला), शोषण (सुखाने वाला), स्तम्भन (रोकने वाला), श्लेष्मा, रक्त और पित्त को शान्त करने वाला, और शरीर के क्लेद (गीलेपन) का उपयोग करने (उसे सोख लेने) वाला है, तथा रूक्ष, शीत और अलघु (जो हल्का नहीं) है। ऐसे गुणों वाला होने पर भी, यदि अकेले इसी का अत्यधिक सेवन किया जाए, तो यह मुख को सुखाता है, हृदय को पीड़ा देता है, पेट को फुला देता है, वाणी को रोक देता है, स्रोतों को बाँध (अवरुद्ध कर) देता है, श्यावता (धूसर-काला रंग) उत्पन्न करता है, पुंस्त्व को नष्ट करता है, विष्टम्भ (रुकावट) करके पचता है, वात, मूत्र, पुरीष (मल) और रेतस् (वीर्य) को रोक देता है, कृश करता है, ग्लानि लाता है, प्यास बढ़ाता है, जकड़न लाता है, और खर, विशद और रूक्ष होने के कारण पक्षवध (लकवा), ग्रह (जकड़न), अपतानक, अर्दित आदि वात-विकारों को उत्पन्न करता है।

च. सू. २६/४४

॥ ४४ ॥

इस प्रकार ये छह रस, अलग-अलग या मिलाकर, उचित मात्रा में और ठीक प्रकार से उपयोग किए जाने पर अध्यात्मलोक (देहधारी प्राणियों) के उपकार के लिए होते हैं; परन्तु इससे भिन्न प्रकार से उपयोग किए जाने पर वे हानि करने वाले होते हैं। विद्वान् (जानकार व्यक्ति) उनका उपयोग उपकार के लिए ही, उचित मात्रा में और ठीक प्रकार से करे।

च. सू. २६/४५

। ॥ ४५ ॥

और यहाँ (इस विषय पर ये श्लोक) हैं। जो द्रव्य वीर्य में शीत है और रस तथा पाक (विपाक) दोनों में मधुर है; जो (द्रव्य) उन दोनों में अम्ल है और (वीर्य में) उष्ण है; और जो द्रव्य उन दोनों में कटुक है

च. सू. २६/४६

। ॥ ४६ ॥

उन (द्रव्यों) के गुणों का समूह रस के कथन से बताया जाना चाहिए। जो (द्रव्य) वीर्य और पाक (विपाक) में (अपने रस के) विपरीत नहीं हैं, उनका (गुण-समूह इसी प्रकार रस से) बताया जाएगा।

च. सू. २६/४७

। ॥ ४७ ॥

जैसे दूध, जैसे घी, या जैसे चव्य और चित्रक; इन जैसे और अन्य (द्रव्यों) को भी वैद्य रस के आधार पर बताए।

च. सू. २६/४८

। ॥ ४८ ॥

कोई-कोई मधुर (द्रव्य) उष्ण भी हो सकता है, और (कोई-कोई) कषाय और तिक्त भी; जैसे महत् पञ्चमूल (पाँच मूलों का बड़ा समूह), और जैसे जल में उत्पन्न होने वाले तथा आनूप (जलबहुल प्रदेश के) प्राणियों का मांस।

च. सू. २६/४९

। ॥ ४९ ॥

लवण (रस वाला) सैन्धव (सेंधा नमक) उष्ण नहीं है, वैसे ही अम्ल (रस वाला) आमलक (आँवला) भी (उष्ण नहीं है)। तिक्त अर्क (आक), अगुरु (अगर) और गुडूची (गिलोय) का (वीर्य) उष्ण कहा जाता है।

च. सू. २६/५०

। ॥ ५० ॥

कोई-कोई अम्ल (द्रव्य) संग्राही (बाँधने वाला) होता है, और कोई-कोई अम्ल भेदन करता है; जैसे कपित्थ (कैथ) संग्राही है, और वैसे ही आमलक (आँवला) भेदी (भेदन करने वाला) है।

च. सू. २६/५१

। ॥ ५१ ॥

पिप्पली और नागर (सोंठ) वृष्य (पुंसत्व बढ़ाने वाले) हैं, (यद्यपि) कटु (रस) अवृष्य कहा जाता है। कषाय (रस) स्तम्भन (रोकने वाला) और शीत होता है, (परन्तु) अभया (हरीतकी) में वह इससे भिन्न है।

च. सू. २६/५२

। ॥ ५२ ॥

इसलिए हर द्रव्य (के गुणों) को रस के कथन से न बताए; (क्योंकि) इस प्रकार समान रस वाले (द्रव्यों) में भी, द्रव्य-द्रव्य में गुणों का अन्तर देखा गया है।

च. सू. २६/५३

कषायो । ॥ ५३ ॥

रूक्षता (रूखेपन) के आधार पर, रूक्ष (रसों) में कषाय सबसे ऊपर है, कटु मध्यम और तिक्त सबसे नीचे। वैसे ही उष्ण (रसों) में, उष्णता के आधार पर, लवण सबसे बढ़कर है

च. सू. २६/५४

। ॥ ५४ ॥

अम्ल मध्यम है और कटुक अन्तिम। स्निग्ध (रसों) में मधुर सबसे बढ़कर है, अम्ल मध्यम और लवण अन्तिम; (इस प्रकार) स्नेह (चिकनाई) के आधार पर रस (का क्रम) बताया जाता है।

च. सू. २६/५५

। ॥ ५५ ॥

शैत्य (शीतलता) के आधार पर कषाय, स्वादु (मधुर) और तिक्त क्रम से मध्यम, सबसे बढ़कर और सबसे नीचे हैं। गुरुता (भारीपन) के आधार पर स्वादु (मधुर) सबसे अधिक है, और लवण कषाय से नीचे है।

च. सू. २६/५६

। ॥ ५६ ॥

लघुता (हल्केपन) के आधार पर अम्ल से कटु, और उससे तिक्त, (ये) उत्तरोत्तर बढ़कर हैं। कुछ (आचार्य) लघु (रसों) में लवण रस को सबसे नीचे मानते हैं।

च. सू. २६/५७

। ॥ ५७ ॥

गौरव (भारीपन) और लाघव (हल्केपन), इन दोनों में ही वह (लवण) सबसे नीचे है। और इसके बाद विपाकों का लक्षण बताया जाएगा।

च. सू. २६/५८

। ॥ ५८ ॥

कटु, तिक्त और कषाय (रसों) का विपाक प्रायः कटु होता है। अम्ल पचकर अम्ल होता है, स्वादु (पचकर) मधुर, और लवण भी वैसे ही (मधुर होता है)।

च. सू. २६/५९

। ॥ ५९ ॥

मधुर, लवण और अम्ल, ये तीनों रस स्निग्ध होने के कारण वात (अधोवायु), मूत्र और पुरीष (मल) के निकलने में प्रायः सुखकर (सहायक) माने गए हैं।

च. सू. २६/६०

। ॥ ६० ॥

परन्तु कटु, तिक्त और कषाय, ये तीनों रस रूक्ष होने के कारण वात (अधोवायु), विट् (मल), मूत्र और रेतस् (शुक्र) के निकलने में कष्ट देने वाले देखे जाते हैं।

च. सू. २६/६१

। ॥ ६१ ॥

कटु विपाक शुक्र को नष्ट करने वाला, मल और मूत्र को बाँधने (रोकने) वाला और वात बढ़ाने वाला है। मधुर विपाक मल और मूत्र को खुलकर निकालने वाला, और कफ तथा शुक्र को बढ़ाने वाला है।

च. सू. २६/६२

। ॥ ६२ ॥

अम्ल पाक (विपाक) पित्त उत्पन्न करने वाला, मल और मूत्र को खुलकर निकालने वाला और शुक्र को नष्ट करने वाला है। उन (विपाकों) में मधुर गुरु (भारी) होता है, कटुक और अम्ल इससे भिन्न (हैं)।

च. सू. २६/६३

। ॥ ६३ ॥

विपाक के लक्षण के थोड़े, मध्यम या सबसे अधिक होने के विषय में, (वैद्य) द्रव्यों के गुणों की विशेषता से हर स्थिति में (अलग-अलग) पहचान करे।

च. सू. २६/६४

। ॥ ६४ ॥

कुछ (आचार्य) वीर्य को मृदु, तीक्ष्ण, गुरु, लघु, स्निग्ध, रूक्ष, उष्ण और शीतल, इस प्रकार आठ प्रकार का मानते हैं; कुछ (उसे) दो प्रकार का मानते हैं

च. सू. २६/६५

। ॥ ६५ ॥

(अर्थात्) शीत और उष्ण। वीर्य तो वह है जिसके द्वारा कोई भी क्रिया की जाती है। वीर्यहीन (द्रव्य) कुछ भी नहीं करता; सारी क्रिया वीर्य द्वारा की गई होती है।

च. सू. २६/६६

। ॥ ६६ ॥

द्रव्यों का रस (जीभ से) सम्पर्क होते ही, विपाक कर्म की अन्तिम परिणति से, और वीर्य (शरीर में द्रव्य के) ठहरे रहने तक तथा सम्पर्क से भी जाना जाता है।

च. सू. २६/६७

। ॥ ६७ ॥

जहाँ (दो द्रव्यों में) रस, वीर्य और विपाक की समानता दिखाई दे, और फिर भी कर्मों में विशेषता (भिन्नता) हो, वह उस (द्रव्य) का प्रभाव माना गया है।

च. सू. २६/६८

। ॥ ६८ ॥

चित्रक (रस में) कटु, विपाक में कटु और उष्ण वीर्य वाला माना गया है; दन्ती भी वैसी ही है, परन्तु वह प्रभाव से मनुष्य को विरेचन कराती है।

च. सू. २६/६९

। प्रभावप्रभावितम् ॥ ६९ ॥

विष को जो विषघ्न (विष का नाश करने वाला) कहा गया है, उसमें प्रभाव कारण है; और जो (द्रव्य) ऊर्ध्वानुलोमिक (ऊपर और नीचे, दोनों ओर से निकालने वाला) है, वह (भी) प्रभाव से प्रभावित है।

च. सू. २६/७०

। ॥ ७० ॥

धारण किए जाने वाले मणियों का जो अनेक प्रकार का कर्म है, वह प्रभाव से किया हुआ है; उनका प्रभाव अचिन्त्य (सोच-विचार से परे) कहा जाता है।

च. सू. २६/७१

। ॥ ७१ ॥

विपाक और वीर्य, और प्रभाव भी, भली-भाँति बता दिए गए। (द्रव्य) कोई कर्म रस से करता है, और दूसरा वीर्य से,

च. सू. २६/७२

। ॥ ७२ ॥

(और) द्रव्य कोई (कर्म) गुण से, (कोई) विपाक से और (कोई) प्रभाव से (करता है)। विपाक रस को, वीर्य उन दोनों को, और प्रभाव उन (तीनों) को दबा देता है।

च. सू. २६/७३

। ॥ ७३ ॥

रस आदि का बल समान होने पर, यह (उनका) स्वाभाविक बल है। इसके बाद मैं छह रसों की पहचान (के लक्षण) बताऊँगा।

च. सू. २६/७४

। ॥ ७४ ॥

मधुर (रस) स्निग्धता, तृप्ति, आह्लाद (प्रसन्नता) और मृदुता से जाना जाता है; और मुख में रहते हुए वह मुख में फैलता हुआ मानो (उस पर) लेप कर देता है।

च. सू. २६/७५

। ॥ ७५ ॥

दाँत खट्टे होने से, मुँह में लार बहने से, पसीना आने से, मुख के जाग उठने से, और मुख तथा कण्ठ की जलन से, चखते ही (उस) रस को अम्ल (खट्टा) कहे।

च. सू. २६/७६

। ॥ ७६ ॥

जो (रस) घुलता हुआ शीघ्र ही मुख में क्लेद (गीलापन), विष्यन्द (स्राव) और मार्दव (कोमलता) उत्पन्न करता है, उसे लवण (नमकीन) जानना चाहिए; और मुख की जलन से भी (वह जाना जाता है)।

च. सू. २६/७७

। ॥ ७७ ॥

रसों में से जो सम्पर्क होते ही (जीभ को) उद्विग्न कर दे और मानो चुभता है, और मुख, नाक और आँखों में जलन करता हुआ (उनसे) स्राव कराने वाला है, वह कटु (तीखा) माना गया है।

च. सू. २६/७८

। ॥ ७८ ॥

जो (रस) सम्पर्क होते ही रसना (जीभ) को कुण्ठित कर देता है और रुचिकर नहीं लगता, वह तिक्त (कड़वा) है, (जो) मुख में विशदता, शोष (सूखापन) और प्रह्लाद (ताज़गी) लाने वाला है।

च. सू. २६/७९

। ॥ ७९ ॥

जो रस रसना (जीभ) को विशदता, स्तम्भ (जकड़न) और जड़ता से युक्त कर दे, और जो मानो कण्ठ को बाँध देता है, वह कषाय (कसैला) है; वह विकासी भी है।

च. सू. २६/८०

॥ ८० ॥

ऐसा कह चुके भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा: भगवन्, द्रव्य, गुण और कर्म के प्रकरण में आप भगवान् का यह यथोचित, सत्य और अर्थ-सम्पदा से युक्त वचन (हमने) सुन लिया; परन्तु आगे हम वैरोधिक (विरोधी) आहार-द्रव्यों का लक्षण सुनना चाहते हैं, जो (आप) बहुत संक्षेप में नहीं (बल्कि कुछ विस्तार से) बताएँ।

च. सू. २६/८१

॥ ८१ ॥

भगवान् आत्रेय ने उनसे कहा: शरीर के धातुओं के विरोधी बने हुए द्रव्य शरीर के धातुओं से विरोध को प्राप्त होते हैं। (इनमें) कुछ आपस में गुणों से विरुद्ध होते हैं, कुछ संयोग से, दूसरे संस्कार से, दूसरे देश, काल, मात्रा आदि से, तथा दूसरे स्वभाव से (विरुद्ध होते हैं)।

च. सू. २६/८२

॥ ८२ ॥

उनमें, जो (द्रव्य) आहार के रूप में सबसे अधिक उपयोग में लाए जाते हैं, उनके एक अंश को वैरोधिक (विरोध) के विषय में (हम) बताएँगे। मछलियों को दूध के साथ न खाए; क्योंकि ये दोनों मधुर, मधुर विपाक वाले और महाभिष्यन्दी (अत्यधिक अभिष्यन्दी) हैं; (एक के) शीत और (दूसरे के) उष्ण होने से (ये) विरुद्ध वीर्य वाले हैं; विरुद्ध वीर्य होने से (यह मेल) रक्त को दूषित करता है, और महाभिष्यन्दी होने से (शरीर के) मार्गों का अवरोध करता है।

च. सू. २६/८३

॥ ८३ ॥

आत्रेय का वह वचन सुनकर, उसके बाद भद्रकाप्य ने अग्निवेश से कहा: एक चिलिचिम को छोड़कर सभी मछलियों को दूध के साथ खाया जा सकता है। वह (चिलिचिम) शल्कों वाला, लाल आँखों वाला, सब ओर लाल धारियों वाला और रोहित (मछली) के आकार का होता है, और प्रायः भूमि पर चलता है। यदि (कोई) उसे दूध के साथ खाए, तो निःसन्देह (वह) रक्त से उत्पन्न और विबन्ध से उत्पन्न रोगों में से किसी एक को, अथवा मृत्यु को प्राप्त होगा।

च. सू. २६/८४

। । । । । । । । । । । । । । । । । । ॥ ८४ ॥

भगवान् आत्रेय (ने कहा): नहीं, किसी भी मछली को दूध के साथ न खाए, और चिलिचिम को तो विशेष रूप से (न खाए); क्योंकि वह (चिलिचिम) अत्यन्त अभिष्यन्दी होने के कारण इन्हीं रोगों को और भी स्थूल लक्षणों के साथ उत्पन्न करता है, और आमविष को भी उभारता है। ग्राम्य (गाँव के पालतू), आनूप (जल-बहुल प्रदेश के) और औदक (जल में रहने वाले) प्राणियों के मांस को मधु (शहद), तिल, गुड़, दूध, माष (उड़द), मूलक (मूली) और बिस (कमल की नाल) के साथ, अथवा अंकुरित अनाजों के साथ, एक साथ न खाए; क्योंकि इसी के कारण (मनुष्य) बहरापन, अंधापन, कँपकँपी, जड़ता, कलमूकता (अस्पष्ट बोलना या गूँगापन), मैण्मिण्य (नाक से मिनमिनाकर बोलना) अथवा मृत्यु को प्राप्त होता है। पौष्कर और रोहिणीक शाक को, या सरसों के तेल में भुने कबूतरों को, मधु और दूध के साथ न खाए; क्योंकि इसी के कारण (मनुष्य) शोणिताभिष्यन्द, धमनीप्रविचय, अपस्मार (मिर्गी), शङ्खक, गलगण्ड (घेंघा) और रोहिणी में से किसी एक (रोग) को, अथवा मृत्यु को प्राप्त होता है। मूलक (मूली), लशुन (लहसुन), कृष्णगन्धा, अर्जक, सुमुख, सुरसा (तुलसी) आदि खाकर दूध का सेवन नहीं करना चाहिए, कुष्ठ रोग के भय से। जातुक शाक और पके हुए निकुच को मधु और दूध के साथ प्रयोग नहीं करना चाहिए; क्योंकि यह मृत्यु का, अथवा बल, वर्ण, तेज और वीर्य की हानि का, किसी गम्भीर रोग का और नपुंसकता का कारण होता है। वही पका हुआ निकुच माष (उड़द) के सूप, गुड़ और घी के साथ प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि (यह संयोग) विरुद्ध है। उसी प्रकार आम्र (आम), आम्रातक, मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू), निकुच, करमर्द (करौंदा), मोच, दन्तशठ, बदर (बेर), कोशाम्र, भव्य, जाम्बव (जामुन), कपित्थ (कैथ), तिन्तिडीक, पारावत, अक्षोड (अखरोट), पनस (कटहल), नालिकेर (नारियल), दाडिम (अनार) और आमलक (आँवला), और इसी प्रकार के अन्य द्रव्य, तथा हर अम्ल (खट्टी) वस्तु, चाहे द्रव (तरल) हो या अद्रव (ठोस), दूध के साथ विरुद्ध है। उसी प्रकार कङ्गु (कँगनी), वनक, मकुष्ठक (मोठ), कुलत्थ (कुलथी), माष (उड़द) और निष्पाव दूध के साथ विरुद्ध हैं। पद्मोत्तरिका का शाक, शार्कर, मैरेय और मधु एक साथ लेना विरुद्ध है और वात को अत्यधिक प्रकुपित करता है। सरसों के तेल में भुना हारिद्रक विरुद्ध है और पित्त को अत्यधिक प्रकुपित करता है। पायस (खीर), जिसके बाद अनुपान के रूप में मन्थ (सत्तू का घोल) पिया जाए, विरुद्ध है और श्लेष्मा (कफ) को अत्यधिक प्रकुपित करता है। तिल के कल्क (पिसी लुगदी) के साथ पकाई गई उपोदिका अतीसार (दस्त) का कारण है। बलाका वारुणी के साथ, और कुल्माष के साथ भी, विरुद्ध है; वही (बलाका) सूअर की चर्बी में भुनी हुई तुरन्त मार डालती है। एरण्ड (अरंड) के सीसक पर टाँगा गया, एरण्ड की आग पर भुना गया और एरण्ड के तेल से युक्त मयूर (मोर) का मांस तुरन्त मार डालता है। हारिद्र के सीसक पर टाँगा गया और हारिद्र की आग पर भुना गया हारिद्रक का मांस तुरन्त मार डालता है; वही (मांस) राख और धूल से लिपटा हुआ, मधु के साथ, तुरन्त मृत्यु का कारण होता है। मछली के निस्तालन में पकाई गई पिप्पलियाँ, उसी प्रकार काकमाची (मकोय) और मधु, मृत्यु का कारण होते हैं। गरम किया हुआ मधु, और गर्मी से पीड़ित (व्यक्ति) के लिए मधु, मृत्यु का कारण होता है। बराबर मात्रा में मधु और घी; बराबर मात्रा में मधु और आन्तरिक्ष (आकाश से बरसा) जल; मधु और पुष्करबीज (कमल के बीज); मधु पीकर (ऊपर से) गरम पानी; भल्लातक (भिलावा) और गरम पानी; तक्र (छाछ) में पकाया गया कम्पिल्लक (कमीला); बासी काकमाची; और अंगारों पर सीख में भुना भास, ये (सब) विरुद्ध हैं। इस प्रकार, जैसा पूछा गया था, यह बता दिया गया।

च. सू. २६/८५

। ॥ ८५ ॥

और इस (विषय) में (ये श्लोक) हैं: जो कोई भी आहार-द्रव्य दोष को (उसके स्थान से) बहाकर (उभारकर) शरीर से बाहर नहीं निकालता, वह सब अहित (हानि) के लिए होता है।

च. सू. २६/८६

। ॥ ८६ ॥

और जो (आहार) देश, काल, अग्नि, मात्रा, सात्म्य और अनिल (वात) आदि (दोषों) से, संस्कार से और वीर्य से, तथा कोष्ठ, अवस्था और क्रम से भी

च. सू. २६/८७

। ॥ ८७ ॥

परिहार और उपचार से, पाक से और संयोग से भी विरुद्ध हो, वह हितकर नहीं है; और वह भी (हितकर नहीं है) जो हृत् (मन की रुचि), सम्पद् और विधि से (विरुद्ध हो)।

च. सू. २६/८८

। ॥ ८८ ॥

देश से विरुद्ध, पहले तो, वह भेषज है जो धन्व (सूखे, कम जल वाले प्रदेश) में रूक्ष, तीक्ष्ण आदि (गुणों वाला) और आनूप (जल-बहुल प्रदेश) में स्निग्ध, शीत आदि (गुणों वाला) सेवन किया जाता है।

च. सू. २६/८९

। ॥ ८९ ॥

काल से भी विरुद्ध वह है, जो शीत काल में शीत, रूक्ष आदि (पदार्थों) का सेवन है, और उसी प्रकार उष्ण (काल) में कटुक, उष्ण आदि (पदार्थों) का सेवन।

च. सू. २६/९०

। ॥ ९० ॥

उसी प्रकार चार प्रकार की अनल (अग्नि, पाचन-शक्ति) के प्रति अन्न-पान विरुद्ध होता है। मधु और सर्पि (घी) बराबर तौल में हों, तो वह मात्रा से विरुद्ध होता है।

च. सू. २६/९१

। सात्म्यविरुद्धं ॥ ९१ ॥

कटुक, उष्ण आदि (पदार्थ) जिसके लिए सात्म्य हैं, उसके द्वारा स्वादु (मधुर), शीत आदि (पदार्थों) का जो सेवन है, वह तो सात्म्य से विरुद्ध है। और अनिल (वात) आदि (दोषों) से विरुद्ध (वह है)

च. सू. २६/९२

। ॥ ९२ ॥

जो अन्न, औषध और क्रिया (वात आदि दोषों के) समान गुणों वाली होने और बार-बार प्रयोग (अभ्यास) के कारण विरुद्ध हो। संस्कार से विरुद्ध वह है, जो भोज्य (भोजन) विष के समान हो जाए

च. सू. २६/९३

। ॥ ९३ ॥

जैसे कि एरण्ड (अरंड) के सीसक पर लगाया गया शिखी (मोर) का मांस। वीर्य से विरुद्ध उसे जानना चाहिए जो वीर्य से शीतल स्वभाव वाला (द्रव्य है और)

च. सू. २६/९४

संयोज्योष्णवीर्येण । ॥ ९४ ॥

वह उष्ण वीर्य वाले द्रव्य के साथ मिलाकर सेवन किया जाता है। और क्रूर कोष्ठ वाले (व्यक्ति) के लिए बहुत थोड़ा, मन्द वीर्य वाला और अभेदन (मल को न तोड़ने वाला) (द्रव्य)

च. सू. २६/९५

। कोष्ठविरुद्धं ॥ ९५ ॥

और मृदु कोष्ठ वाले के लिए गुरु (भारी), भेदनीय (मल को तोड़कर निकालने वाला) तथा बहुत (मात्रा में) (द्रव्य), यह तो कोष्ठ से विरुद्ध है। अवस्था से विरुद्ध (यह) होगा:

च. सू. २६/९६

। ॥ ९६ ॥

श्रम, व्यवाय (मैथुन) और व्यायाम में लगे (व्यक्ति) के लिए अनिल (वात) को कुपित करने वाला भोजन, और निद्रा से अलसाए तथा आलसी (व्यक्ति) के लिए श्लेष्मा (कफ) को कुपित करने वाला भोजन।

च. सू. २६/९७

। ॥ ९७ ॥

और जो मल-मूत्र का त्याग किए बिना भोजन करता है, और जो भूख न होने पर (भोजन करता है), और जो अत्यधिक भूख के वश में होकर (भोजन करता है), वह क्रम से विरुद्ध होगा।

च. सू. २६/९८

। ॥ ९८ ॥

परिहार से विरुद्ध तो वह है, जो (कोई) वराह (सूअर) आदि (के मांस) का सेवन करके उष्ण (वस्तु) का सेवन करे; और (जो) घी आदि पीकर शीत (वस्तु) का सेवन करता है।

च. सू. २६/९९

। । ॥ ९९ ॥

पाक से भी विरुद्ध (वह है) जो दूषित या बुरी लकड़ी (के ईंधन) से पकाया गया हो, और जो कच्चे चावलों वाला, अत्यधिक पका हुआ या जला हुआ हो। संयोग से विरुद्ध वह है, जैसे दूध के साथ अम्ल (खट्टा पदार्थ)।

च. सू. २६/१००

। ॥ १०० ॥

जो मन को रुचिकर न हो, वह हृत् (हृदय) से विरुद्ध कहा जाता है। सम्पद् से विरुद्ध उसे जानना चाहिए, जिसका रस उत्पन्न ही न हुआ हो

च. सू. २६/१०१

। । ॥ १०१ ॥

या जिसका रस (अपना समय) बीत चुका हो, या जिसका रस बिगड़ ही गया हो। विधि से विरुद्ध तो उसे जानना चाहिए, जो (भोजन) निभृत (एकान्त) स्थान में नहीं खाया जाता। इस प्रकार का अन्न उपयोग में लाया जाए, तो विरुद्ध होता है।

च. सू. २६/१०२

। ॥ १०२ ॥

षाण्ढ्य (नपुंसकता), आन्ध्य (अन्धापन), वीसर्प, दकोदर (जलोदर), विस्फोटक (फफोले), उन्माद, भगन्दर, मूर्च्छा, मद, आध्मान (पेट का फूलना), गलग्रह (गले की जकड़न), पाण्डु रोग और आमविष का भी

च. सू. २६/१०३

। ॥ १०३ ॥

किलास, कुष्ठ और ग्रहणी रोगों का, शोथ (सूजन), अम्लपित्त, ज्वर और पीनस का, सन्तान-दोष का, और उसी प्रकार मृत्यु का भी हेतु (कारण) (विद्वान) विरुद्ध अन्न को बताते हैं।

च. सू. २६/१०४

। ॥ १०४ ॥

इन और दूसरे भी वैरोधिक (विरुद्ध आहार से होने वाले) रोगों के ये उपाय प्रतिकार (उपचार) होते हैं। वे इस प्रकार हैं: वमन और विरेचन, और उनके विरोधी द्रव्यों का संशमन (शान्त करने) के लिए प्रयोग, और उसी प्रकार के द्रव्यों से पहले से ही शरीर का अभिसंस्कार (तैयारी)।

च. सू. २६/१०५

। ॥ १०५ ॥

और इस (विषय) में (ये दो श्लोक) हैं: विरुद्ध भोजन से उत्पन्न रोगों को विवेचन (शोधन), वमन और शमन, अथवा पहले से ही हितकर (पदार्थों) का सेवन नष्ट करते हैं।

च. सू. २६/१०६

। ॥ १०६ ॥

सात्म्य होने से, या थोड़ी मात्रा (में लिए जाने) से भी, और प्रदीप्त अग्नि वाले, तरुण (युवा), तथा स्निग्ध, व्यायाम करने वाले और बलवान लोगों के लिए विरुद्ध (आहार) वितथ (निष्फल) हो जाता है।

च. सू. २६/१०७

। ॥ १०७ ॥

इस विषय में (सार रूप) श्लोक (हैं): रसों के निर्णय में महर्षियों का जो-जो मत था, गुणों और कर्मों के अनुसार द्रव्य, रसों पर आधारित द्रव्यों की संख्या

च. सू. २६/१०८

। ॥ १०८ ॥

रसों की संख्या का कारण, रस और अनुरस का लक्षण, और पर आदि गुणों के अलग-अलग लक्षण

च. सू. २६/१०९

। ॥ १०९ ॥

पाँच (महाभूतों) से बने रसों का छह होना जिस कारण से (है), और जिस गुण की अधिकता से रस ऊर्ध्व (ऊपर की ओर) और अनुलोम (नीचे की ओर) जाने वाले (होते हैं)

च. सू. २६/११०

। ॥ ११० ॥

और छह रसों के छह होने के विषय में विभागों सहित (उनकी) विभक्तियाँ (विभाजन); द्रव्यों के गुण और कर्म के विषय में उद्देश (सामान्य नियम) और अपवाद

च. सू. २६/१११

। ॥ १११ ॥

गौरव (भारीपन) आदि (गुणों) में रसों का प्रवर (उत्तम), अवर (निम्न) और मध्य होना; पाक (विपाक) और प्रभाव का लिङ्ग (लक्षण); वीर्य की संख्या का निर्णय

च. सू. २६/११२

स्वलक्षणम् । ॥ ११२ ॥

चखे जाने वाले छह रसों का जो अपना लक्षण है; जो-जो (द्रव्य) जिस कारण से (और) जिसके साथ विरुद्ध होता है, और जो (विरुद्ध आहार) जो (हानि) करने वाला है

च. सू. २६/११३

। ॥ ११३ ॥

और वैरोधिक (विरुद्ध आहार से होने वाले) रोगों की जो औषध (उपचार) है, वह सब मुनि (आत्रेय) ने आत्रेयभद्रकाप्यीय (अध्याय) में कहा।

च. सू. २६

॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में आत्रेयभद्रकाप्यीय नामक छब्बीसवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।