भारत संहिता

अध्याय २७

अन्नपानविधिः

अन्न-पान की विधि (आहार-द्रव्यों के गुण)

इस पृष्ठ का हिन्दी पाठ AI (Claude) द्वारा तैयार किया गया ड्राफ्ट है। चिह्न वाले अंशों की सम्पादक द्वारा जाँच अभी बाकी है।

भूमिका

अन्नपानविधि चरक संहिता के सूत्रस्थान का सत्ताईसवाँ अध्याय है। इसका नाम इसके विषय से है: 'अन्न' यानी खाने की वस्तु, 'पान' यानी पीने की वस्तु, और 'विधि' यानी नियम या ढंग; यह अध्याय आहार-द्रव्यों, यानी खाने-पीने के पदार्थों, के गुण बताता है। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है, जो अपने शिष्य अग्निवेश को सम्बोधित करते हैं। आरम्भ में वे अन्न-पान का महत्त्व बताते हैं: मन को भाने वाले रंग, गन्ध, स्वाद और स्पर्श वाले और विधि से बने अन्न-पान को जानकार लोग प्राणियों का प्राण कहते हैं, क्योंकि उसका फल आँखों के सामने है; शरीर के भीतर की अग्नि उसी ईंधन से टिकी है, और वह मन को भी बल देता है। ठीक ढंग से लिया जाए तो वह धातुओं, बल, वर्ण और इन्द्रियों की निर्मलता को बनाता है, और उलटे ढंग से लिया जाए तो हानि करता है। इसलिए हित और अहित समझाने के लिए आत्रेय अन्न-पान की पूरी विधि बताने को कहते हैं। पहले वे कुछ द्रव्यों का स्वाभाविक काम एक-एक शब्द में बताते हैं, जैसे जल गीला करता है, घी चिकनाई देता है, दूध जीवन देता है और मांस शरीर को पुष्ट करता है; फिर रसों के सामान्य नियम उनके अपवादों सहित आते हैं, जैसे यह कि खट्टा प्रायः पित्त बढ़ाता है, पर अनार और आँवला नहीं।

इसके बाद अध्याय आहार-द्रव्यों को बारह वर्गों में बाँटता है, और कहता है कि हर द्रव्य उसके रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव से बताया जाएगा। वर्ग क्रम से ये हैं: शूकधान्य (बालियों वाले अन्न, जैसे शालि धान, जौ और गेहूँ), शमीधान्य (फलियों वाले अन्न, जैसे मूँग और उड़द), मांस, शाक, फल, हरित (ताज़ी हरी वस्तुएँ, जैसे अदरक, मूली और लहसुन), मद्य, जल, गोरस (दूध और उससे बनी वस्तुएँ), ईख से बनी वस्तुएँ (जिनके साथ मधु भी है), कृतान्न (पकाकर तैयार किया भोजन, जैसे पेया, भात और सत्तू) और आहारयोगी (भोजन के साथ या उसे बनाने में काम आने वाले द्रव्य, जैसे तेल, मसाले, लवण और क्षार)। हर वर्ग में द्रव्यों के नाम और गुण गिनाए गए हैं, और कई जगह उनमें श्रेष्ठ भी बताया गया है: धानों में रक्तशालि, दालों में मूँग, स्नेहों में घी और लवणों में सैन्धव। मांस का वर्ग पहले पशु-पक्षियों को उनके रहने और खाने के ढंग से आठ समूहों में बाँटता है, जैसे झपटकर खाने वाले प्रसह, बिलों में रहने वाले भूशय और भोजन बिखेरकर खाने वाले विष्किर पक्षी, और कहता है कि शरीर को पुष्ट करने में मांस से बढ़कर कोई खाद्य नहीं। जल का वर्ग बताता है कि सारा जल आकाश से एक ही प्रकार का गिरता है और फिर स्थान, ऋतु और भूमि के अनुसार अलग-अलग गुण लेता है; नदियों के जल को उनके उद्गम और बहाव से परखा गया है। गोरस का वर्ग गाय के दूध के दस गुण गिनाकर कहता है कि ओज के गुण भी यही हैं, इसलिए दूध ओज को बढ़ाता है। कई वर्गों में चेतावनियाँ भी हैं: मद्य को अमृत के समान उस दशा में कहा गया है जब सात्त्विक लोग उसे विधि और युक्ति से पिएँ; शरद्, ग्रीष्म और वसन्त में दही प्रायः निन्दित कहा गया है; और गरम किया हुआ मधु, या गरमी से पीड़ित व्यक्ति को दिया गया मधु, मार सकता है, ऐसा अध्याय कहता है।

बारह वर्गों के बाद अध्याय सामान्य नियमों पर आता है। एक वर्ष पुराना अनाज अच्छा माना गया है; मरे हुए, बहुत दुबले, बूढ़े या विष से मारे गए पशु का मांस, और कीड़ों या धूप से बिगड़े, बेमौसम या बहुत पुराने शाक और फल त्यागने योग्य कहे गए हैं। फिर अनुपान का विषय आता है, यानी भोजन के साथ या उसके बाद पिया जाने वाला पेय: अध्याय के अनुसार वह भोजन के गुणों से विपरीत हो और शरीर की धातुओं का विरोधी न हो, और दोष, थकान, दुबलेपन या मोटापे के अनुसार चुना जाए। अध्याय अनुपान के कर्म गिनाता है, और यह भी बताता है कि किन रोगियों को, और बहुत गाने, बोलने और पढ़ने वालों को, भोजन के बाद जल नहीं पीना चाहिए। अध्याय स्वयं कहता है कि उसने केवल वे द्रव्य गिनाए हैं जो प्रायः उपयोग में आते हैं; बाकी के लिए वह कहता है कि कोई द्रव्य ऐसा नहीं जो औषध न हो, और उन्हें उस देश के लोगों के कथन से भी जाना जाए। अन्त के पास गुरु-लाघव का, यानी भोजन के पचने में भारी या हल्का होने का, विचार है: वह प्राणी के रहने और खाने के ढंग, शरीर के अंग, स्वभाव, धातु, सक्रियता, नर या मादा होने, आकार, तैयार करने की विधि और मात्रा पर निर्भर बताया गया है, और मात्रा स्वयं पाचन की अग्नि पर, जिस पर बल, आरोग्य और आयु टिके हैं। अध्याय यह भी कहता है कि यह विचार मुख्यतः दुर्बल, कम परिश्रम करने वाले, अस्वस्थ और सुकुमार लोगों के लिए है; तेज़ अग्नि वाले और नित्य परिश्रम करने वालों के लिए यह उतना अनिवार्य नहीं।

अध्याय अन्न की महिमा के साथ समाप्त होता है। भोजन को भीतर की अग्नि में होम की तरह बताया गया है, जो मात्रा और समय का विचार करके, हितकर अन्न-पान रूपी समिधाओं से नित्य किया जाए; अध्याय के अनुसार ऐसा हितकर भोजन करने वाला, मन को वश में रखने वाला व्यक्ति छत्तीस हज़ार रातों तक, यानी लगभग सौ वर्ष, नीरोग जीता है। अन्न प्राणियों का प्राण है; वर्ण, सुख, बल और बुद्धि ही नहीं, सांसारिक, वैदिक और मोक्ष के लिए किए जाने वाले कर्म भी अन्न पर टिके हैं। इस अध्याय से यह बात साथ ले जाने योग्य है कि चरक संहिता में किसी आहार का हित या अहित केवल उस द्रव्य से तय नहीं होता: उसकी अवस्था (कच्चा या पका, नया या पुराना, गीला या सूखा), उसे तैयार करने का ढंग, उसकी मात्रा, ऋतु और खाने वाले की अग्नि, ये सब मिलकर तय करते हैं कि वह शरीर पर कैसा काम करेगा।

मुख्य शब्द (२७) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

सामान्य
सामान्य - समानता; जो वृद्धि का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: समान + य (भाव) - समान होने का भाव।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: सामान्य सदा सब भावों की वृद्धि का कारण है, और एकत्व (एक जैसा बनाना) करता है (सू. १/४४-४५)। उदाहरण के लिए, जिस गुण वाला द्रव्य लिया जाए, वह शरीर में उसी गुण को बढ़ाता है।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

आरोग्य
आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार

शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।

अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।

चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. सू. २७/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम अन्नपानविधि (खाने-पीने के द्रव्यों की विधि) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. २७/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. २७/३

॥ ३ ॥

इष्ट (मनचाहे) वर्ण (रंग), गन्ध, रस (स्वाद) और स्पर्श वाले, और विधि के अनुसार विहित (तैयार किए गए) अन्न-पान को कुशल (जानकार) लोग प्राणी कहलाने वाले जीवों का प्राण कहते हैं, क्योंकि इसका फल प्रत्यक्ष दिखाई देता है; अन्तरग्नि (शरीर के भीतर की अग्नि) की स्थिति (बने रहना) निश्चय ही उसी (अन्न-पान) रूपी ईंधन पर टिकी है। वह सत्त्व (मन) को बल देता है। यथोक्त (जैसा बताया गया है, वैसे) सेवन किया जाए तो वह शरीर के धातुओं के व्यूह (संगठन), बल, वर्ण (रंग-रूप) और इन्द्रियों की प्रसन्नता (निर्मलता) को करने वाला होता है; (इसके) विपरीत (सेवन किया गया) वह अहित (हानि) का कारण बनता है।

च. सू. २७/४

!। , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ॥ ४ ॥

इसलिए, हे अग्निवेश! हित और अहित का बोध कराने के लिए हम अन्न-पान की विधि का पूरा उपदेश करेंगे। उसमें, अपने स्वभाव से उदक (जल) गीला करता है, लवण (नमक) (द्रवों को) बहाता है, क्षार पकाता है, मधु (शहद) जोड़ता है, सर्पि (घी) स्नेहन करता (चिकनाई देता) है, क्षीर (दूध) जीवन देता है, मांस बृंहण करता (शरीर को पुष्ट करता) है, रस (मांस-रस) तृप्त करता है, सुरा जर्जर करती है, शीधु घटाता है, द्राक्षासव (अंगूर का आसव) (अग्नि को) दीप्त करता है, फाणित (दोषों का) संचय करता है, दधि (दही) शोफ (सूजन) उत्पन्न करता है, पिण्याक (खली) का शाक ग्लानि (थकावट) लाता है, माष (उड़द) का सूप बहुत अधिक भीतरी मल वाला होता है, और क्षार दृष्टि और शुक्र का नाश करने वाला है। अम्ल (खट्टा) प्रायः पित्त बढ़ाने वाला होता है, दाडिम (अनार) और आमलक (आँवला) को छोड़कर; मधुर (मीठा) प्रायः श्लेष्मा (कफ) बढ़ाने वाला होता है, मधु (शहद) और पुराने शालि, षष्टिक, यव (जौ) और गोधूम (गेहूँ) को छोड़कर; तिक्त (कड़वा) प्रायः वात बढ़ाने वाला और अवृष्य (पुरुषत्व न बढ़ाने वाला) होता है, वेगाग्र, अमृता (गिलोय) और पटोल (परवल) के पत्तों को छोड़कर; कटुक (तीखा) प्रायः वात बढ़ाने वाला और अवृष्य होता है, पिप्पली और विश्वभेषज (सोंठ) को छोड़कर।

च. सू. २७/५

॥ ५ ॥

इसके आगे हम आहार-द्रव्यों को वर्गों में संग्रह करके (बाँटकर) उनकी क्रम से व्याख्या करेंगे।

च. सू. २७/६

। ॥ ६ ॥

शूकधान्य (बालियों वाले अन्न), शमीधान्य (फलियों वाले अन्न), मांस, शाक और फल पर आधारित वर्गों को, और हरित (ताज़े हरे पदार्थ), मद्य, अम्बु (जल), गोरस (दूध आदि) और इक्षु (ईख) के विकारों (से बनी वस्तुओं) के (वर्गों को)

च. सू. २७/७

। ॥ ७ ॥

(इन) दस (वर्गों) को, और कृतान्न (पकाकर तैयार किया भोजन) और आहारयोगी (आहार के साथ प्रयोग होने वाले द्रव्यों) के दो अन्य वर्गों को, हम (उनके) रस, वीर्य और विपाक के द्वारा और प्रभावों के द्वारा भी बताते हैं।

च. सू. २७/८

- । ॥ ८ ॥

अब शूकधान्यवर्ग (बालियों वाले अन्नों का वर्ग)। रक्तशालि, महाशालि, कलम, शकुनाहृत, तूर्णक, दीर्घशूक, गौर, पाण्डुक और लाङ्गुल

च. सू. २७/९

। ॥ ९ ॥

सुगन्धक, लोहवाल, सारिवा नाम वाला (धान), प्रमोदक, पतङ्ग और तपनीय, और जो दूसरे उत्तम शालि (धान) हैं

च. सू. २७/१०

। ॥ १० ॥

(ये शालि) शीत (ठण्डे), रस में और विपाक में मधुर, थोड़ा वात उत्पन्न करने वाले, बँधा हुआ और थोड़ा मल बनाने वाले, स्निग्ध (चिकनाई वाले), बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाले) और शुक्र तथा मूत्र को बढ़ाने वाले होते हैं।

च. सू. २७/११

। ॥ ११ ॥

उनमें रक्तशालि श्रेष्ठ है, (जो) तृष्णा (प्यास) को नष्ट करने वाला और तीनों मलों (दोषों) को दूर करने वाला है। उसके बाद महान् (महाशालि) है, उसके भी बाद कलम, और उसके बाद दूसरे (शालि)।

च. सू. २७/१२

। ॥ १२ ॥

यवक, हायन, पांसु, वाप्य, नैषधक आदि शालि (धान) गुणों और अगुणों (दोषों) से (ऊपर कहे) शालियों का अनुकरण करते हैं।

च. सू. २७/१३

। ॥ १३ ॥

षष्टिक (साठ दिन में पकने वाला धान) शीत (ठण्डा), स्निग्ध (चिकनाई वाला), अगुरु (भारी नहीं), स्वादु (मधुर), तीनों दोषों को नष्ट करने वाला और स्थिर स्वभाव वाला होता है। (षष्टिकों में) गौर (सफ़ेद) सबसे श्रेष्ठ है, और उसके बाद कृष्णगौर (काला-सफ़ेद)।

च. सू. २७/१४

। ॥ १४ ॥

वरक और उद्दालक, चीन, शारद, उज्ज्वल और दर्दुर, गन्धन और कुरुविन्द, (ये सब) गुणों में षष्टिक से थोड़े ही भिन्न हैं।

च. सू. २७/१५

। ॥ १५ ॥

व्रीहि (धान की एक जाति) मधुर और अम्ल विपाक वाला, पित्त को बढ़ाने वाला, गुरु, और अधिक मूत्र, पुरीष (मल) तथा ऊष्मा (गर्मी) वाला है; पाटल तो त्रिदोष (तीनों दोषों को बढ़ाने वाला) ही है।

च. सू. २७/१६

। ॥ १६ ॥

कोरदूष (कोदो) सहित श्यामाक (सावाँ) कषाय और मधुर, लघु, वातल (वात को बढ़ाने वाला), कफ और पित्त को नष्ट करने वाला, शीत, संग्राही (मल को बाँधने वाला) और शोषण (सुखाने वाला) है।

च. सू. २७/१७

।॥ १७ ॥

हस्तिश्यामाक, नीवार (जंगली धान), तोयपर्णी और गवेधुका, प्रशान्तिका, अम्भःश्यामाक, लौहित्य, अणु और प्रियङ्गु,

च. सू. २७/१८

। ॥ १८ ॥

मुकुन्द, झिण्टि, गर्मूटी, वरुक और वरक, तथा शिबिर, उत्कट और जूर्णाह्व, (ये सब) गुणों में श्यामाक के समान हैं।

च. सू. २७/१९

। सकषायश्च ॥ १९ ॥

यव (जौ) रूक्ष, शीत, अगुरु (भारी नहीं), स्वादु, अधिक वात और मल उत्पन्न करने वाला, स्थिरता देने वाला, कुछ कषाय, बल्य (बल देने वाला) और श्लेष्मा (कफ) के विकारों को दूर करने वाला है।

च. सू. २७/२०

। ॥ २० ॥

वेणुयव (बाँस के बीज) रूक्ष, कषाय अनुरस वाला, मधुर, कफ और पित्त को नष्ट करने वाला, मेद, क्रिमि और विष को नष्ट करने वाला, और बल्य (बल देने वाला) माना गया है।

च. सू. २७/२१

। ॥ २१ ॥

गोधूम (गेहूँ) सन्धानकृत् (टूटे को जोड़ने वाला), वात को हरने वाला, स्वादु और शीतल, जीवन देने वाला, बृंहण (पुष्ट करने वाला), वृष्य, स्निग्ध, स्थिरता देने वाला और गुरु है।

च. सू. २७/२२

। ॥ २२ ॥

नान्दीमुखी और मधूली मधुर, स्निग्ध और शीतल हैं। इस प्रकार शूकधान्यों का यह पहला वर्ग समाप्त होता है।

च. सू. २७/२३

- । ॥ २३ ॥

अब शमीधान्यवर्ग (फलियों वाले अन्नों का वर्ग)। मुद्ग (मूँग) कषाय और मधुर, रूक्ष, शीत, विपाक में कटु, लघु, विशद, श्लेष्मा (कफ) और पित्त को नष्ट करने वाला, और सूप्य अन्नों (दालों) में उत्तम माना गया है।

च. सू. २७/२४

। ॥ २४ ॥

माष (उड़द) परम वृष्य (पुरुष-शक्ति बढ़ाने वाला), वात को हरने वाला, स्निग्ध और उष्ण, मधुर, गुरु, बल्य (बल देने वाला) और अधिक मल बनाने वाला है, और शीघ्र पुंस्त्व (पुरुष-शक्ति) देता है।

च. सू. २७/२५

। ॥ २५ ॥

राजमाष सर (मल को सरकाने वाला), रुच्य (रुचि बढ़ाने वाला), कफ, शुक्र और अम्लपित्त को दूर करने वाला, उस (माष) के समान स्वादु, वातल (वात को बढ़ाने वाला), रूक्ष, कषाय, विशद और गुरु है।

च. सू. २७/२६

। ॥ २६ ॥

कुलत्थ (कुलथी) उष्ण, कषाय, विपाक में अम्ल, कफ, शुक्र और अनिल (वात) को दूर करने वाले, ग्राही (मल को बाँधने वाले), और कास, हिक्का, श्वास तथा अर्श (के रोगियों) के लिए हितकर हैं।

च. सू. २७/२७

। ॥ २७ ॥

मकुष्ठक (मोठ) (रस में) मधुर, विपाक में मधुर, ग्राही, रूक्ष और शीतल होते हैं; रक्तपित्त, ज्वर आदि में (ये) प्रशस्त माने जाते हैं।

च. सू. २७/२८

। ॥ २८ ॥

चणक (चना) और मसूर, और हरेणु सहित खण्डिका, (ये सब) लघु, शीत और मधुर, कुछ कषाय और विरूक्षण (रूखापन लाने वाले) हैं।

च. सू. २७/२९

। ॥ २९ ॥

(ये) पित्त और श्लेष्मा (के विकार) में, सूपों में और आलेपनों (लेपों) में प्रशस्त माने जाते हैं। उनमें मसूर संग्राही है, और कलाय अत्यन्त वातल (वात को बढ़ाने वाला) है।

च. सू. २७/३०

। ॥ ३० ॥

तिल स्निग्ध और उष्ण, मधुर, तिक्त, कषाय और कटु है; त्वचा के लिए हितकर, केशों के लिए हितकर और बल्य (बल देने वाला) है, वात को नष्ट करने वाला और कफ-पित्त को बढ़ाने वाला है।

च. सू. २७/३१

। ॥ ३१ ॥

अनेक प्रकार की शिम्बी-जातियाँ (फलियों की किस्में) मधुर, शीतल, गुरु, बल को घटाने वाली और रूक्षण स्वभाव वाली (रूखापन लाने वाली) हैं; बलवान लोगों को (इन्हें) स्नेह (घी-तेल) के साथ खाना चाहिए।

च. सू. २७/३२

। ॥ ३२ ॥

शिम्बी रूक्ष और कषाय है, कोष्ठ में वात को प्रकुपित करने वाली है; (वह) न वृष्य है, न चक्षुष्य (आँखों के लिए हितकर), और विष्टम्भ करके पचती है।

च. सू. २७/३३

, । , ॥ ३३ ॥

आढकी (अरहर) कफ और पित्त को नष्ट करने वाली और वातल (वात को बढ़ाने वाली) है; एडगज सहित अवल्गुज कफ और वात को दूर करने वाला है; निष्पाव वात और पित्त को बढ़ाने वाले हैं।

च. सू. २७/३४

। ॥ ३४ ॥

काकाण्ड, उमा और आत्मगुप्ता (कौंच) का फल (गुण-प्रभाव) माष (उड़द) के समान बताना चाहिए। यह दूसरा, शमीधान्य-वर्ग, महर्षि ने कहा है।

च. सू. २७/३५

- । ॥ ३५ ॥

अब मांसवर्ग। गो (गाय-बैल), खर (गधा), अश्वतर (खच्चर), उष्ट्र (ऊँट), अश्व (घोड़ा), द्वीपी, सिंह, ऋक्ष (भालू) और वानर (बन्दर), वृक (भेड़िया), व्याघ्र (बाघ) और तरक्षु, बभ्रु, मार्जार (बिल्ली) और मूषिक (चूहा),

च. सू. २७/३६

। ॥ ३६ ॥

लोपाक, जम्बुक (सियार), श्येन (बाज), वान्ताद, चाष (नीलकण्ठ) और वायस (कौआ), शशघ्नी, मधुहा, भास, गृध्र (गिद्ध), उलूक (उल्लू) और कुलिङ्गक

च. सू. २७/३७

। ॥ ३७ ॥

धूमिका और कुरर - इस प्रकार (ये सब) प्रसह पशु-पक्षी हैं। श्वेत (सफ़ेद), श्याम (साँवला), चित्रपृष्ठ (चितकबरी पीठ वाला), कालक (काला), काकुलीमृग

च. सू. २७/३८

। ॥ ३८ ॥

कूर्चिका, चिल्लट, भेक (मेंढक), गोधा (गोह), शल्लक और गण्डक, कदली, नकुल (नेवला) और श्वाविध् (साही) - इस प्रकार ये भूमिशय (भूमि में रहने वाले) माने गए हैं।

च. सू. २७/३९

। ॥ ३९ ॥

सृमर, चमर (याक), खङ्ग (गैंडा), महिष (भैंसा), गवय, गज (हाथी), न्यङ्कु और वराह (सूअर), तथा रुरु भी - ये सभी मृग (पशु) आनूप हैं।

च. सू. २७/४०

।॥ ४० ॥

कूर्म (कछुआ), कर्कटक (केकड़ा), मत्स्य (मछली), शिशुमार, तिमिङ्गिल, और शुक्ति (सीप), शङ्ख, उद्र (ऊदबिलाव), कुम्मीर, चुलुकी, मकर आदि

च. सू. २७/४१

, । ॥ ४१ ॥

इस प्रकार वारिशय (जल में रहने वाले प्राणी) कहे गए। (अब) वारिचारी (जल में विचरने वाले पक्षी) कहे जाएँगे - हंस, क्रौञ्च, बलाका और बक (बगुला), कारण्डव, प्लव

च. सू. २७/४२

। ॥ ४२ ॥

शरारि, पुष्कराह्व और केशरी, मणितुण्डक, मृणालकण्ठ, मद्गु और कादम्ब, काकतुण्डक

च. सू. २७/४३

। ॥ ४३ ॥

उत्क्रोश, पुण्डरीकाक्ष, मेघराव, अम्बुकुक्कुटी, आरा, नन्दीमुखी, वाटी, (और) झुंड में साथ-साथ रहने वाले सुमुख

च. सू. २७/४४

॥ ॥ ४४ ॥

रोहिणी, कामकाली और सारस, रक्तशीर्षक, चक्रवाक (चकवा), और इसी प्रकार दूसरे पक्षी भी हैं जो जल में विचरते हैं।

च. सू. २७/४५

। ॥ ४५ ॥

पृषत (चित्तीदार हिरन), शरभ, राम, श्वदंष्ट्र, मृगमातृका, शश (खरगोश) और उरण, कुरङ्ग और गोकर्ण, कोट्टकारक

च. सू. २७/४६

। ॥ ४६ ॥

चारुष्क, हरिण और एण, शम्बर (साँभर), कालपुच्छक, ऋष्य और वरपोत - (इन्हें) जाङ्गल मृग जानना चाहिए।

च. सू. २७/४७

। ॥ ४७ ॥

लाव (लवा), वर्तीरक और वार्तीक, साथ में कपिञ्जल, चकोर और उपचक्र, कुक्कुभ, रक्तवर्त्मक

च. सू. २७/४८

। ॥ ४८ ॥

ये लाव आदि (पक्षी) तो विष्किर हैं। (अब) वर्तक आदि कहे जाएँगे - वर्तक (बटेर) और वर्तिका भी, बर्ही (मोर), तित्तिरि (तीतर) और कुक्कुट (मुर्गा)

च. सू. २७/४९

। ॥ ४९ ॥

कङ्क, शारपद, इन्द्राभ, गोनर्द, गिरिवर्तक, क्रकर, अवकर और वारड भी - इस प्रकार (ये) विष्किर हैं।

च. सू. २७/५०

। ॥ ५० ॥

शतपत्र, भृङ्गराज, कोयष्टि, जीवजीवक, कैरात, कोकिल (कोयल), अत्यूह, गोपापुत्र, प्रियात्मज

च. सू. २७/५१

। ॥ ५१ ॥

लट्टा, लट्टषक (या लटूषक), बभ्रु, वटहा, डिण्डिमानक, जटी, दुन्दुभि, पाक्कार, लोहपृष्ठ, कुलिङ्गक

च. सू. २७/५२

। ॥ ५२ ॥

कपोत (कबूतर), शुक (तोता), शारङ्ग, चिरटी, कङ्कुयष्टिक, सारिका (मैना), कलविङ्क और चटक, अङ्गारचूडक

च. सू. २७/५३

। ॥ ५३ ॥

पारावत और पाण्डविक (या पानविक) - इस प्रकार (ये) प्रतुद पक्षी कहे गए। (जो प्राणी भोजन को) बलपूर्वक (झपटकर) खाते हैं, इस कारण वे प्रसह नाम से जाने जाते हैं।

च. सू. २७/५४

। ॥ ५४ ॥

बिलों में रहने के कारण (कुछ प्राणी) भूशय (कहलाते हैं), अनूप (जल-बहुल) प्रदेश में आश्रय के कारण आनूप, जल में निवास के कारण जलज, और जल में विचरण के कारण जलेचर।

च. सू. २७/५५

। ॥ ५५ ॥

स्थल (सूखी भूमि) पर उत्पन्न, जाङ्गल प्रदेश में विचरने वाले मृग जाङ्गल कहे गए हैं; और (भोजन को) बिखेरकर (खाने के कारण) विष्किर, तथा (चोंच से) चोट मारकर (खाने के कारण) प्रतुद माने गए हैं।

च. सू. २७/५६

। ॥ ५६ ॥

मांसों की यह योनि (स्रोत, अर्थात् जिन प्राणियों से मांस मिलता है) तो आठ प्रकार की बताई गई है। प्रसह, भूशय, आनूप, वारिज (जल में रहने वाले) और वारिचारी (जल में विचरने वाले)

च. सू. २७/५७

। ॥ ५७ ॥

(ये पाँचों, अर्थात् इनका मांस) गुरु, उष्ण, स्निग्ध और मधुर होते हैं, बल और उपचय (शरीर की पुष्टि) को बढ़ाते हैं, वृष्य होते हैं, अत्यन्त वातहर (वात को हरने वाले) होते हैं, और कफ तथा पित्त को बढ़ाते हैं।

च. सू. २७/५८

। ॥ ५८ ॥

(ये) नित्य व्यायाम करने वालों के लिए और उन मनुष्यों के लिए हितकर हैं जिनकी अग्नि दीप्त है। वैद्य विशेष रूप से मांस खाने वाले प्रसहों का मांस

च. सू. २७/५९

। ॥ ५९ ॥

पुराने अर्श, ग्रहणी दोष और शोष से पीड़ित लोगों के लिए प्रयोग करे। लाव (लवा) आदि वाला विष्किर वर्ग, प्रतुद (पक्षी) और जाङ्गल मृग

च. सू. २७/६०

। ॥ ६० ॥

लघु, शीत, मधुर और कुछ कषाय होते हैं, और मनुष्यों के लिए उस सन्निपात में हितकर हैं जिसमें पित्त सबसे अधिक बढ़ा हो, वात मध्यम हो और कफ सबसे पीछे (सबसे कम) हो।

च. सू. २७/६१

। ॥ ६१ ॥

परन्तु वर्तक (बटेर) आदि विष्किर (पक्षी) गुणों में प्रसहों से थोड़ा ही भिन्न हैं। आज (बकरे का) मांस न बहुत शीत, न बहुत गुरु और न बहुत स्निग्ध है, और दोषों को नहीं बढ़ाता,

च. सू. २७/६२

। ॥ ६२ ॥

शरीर की धातुओं से समानता के कारण अभिष्यन्दी नहीं है और बृंहण है। आविक (भेड़ का) मांस मधुर और शीत होने के कारण गुरु और बृंहण है।

च. सू. २७/६३

। ॥ ६३ ॥

बकरी और भेड़ मिले-जुले प्रदेशों में विचरने के कारण योनि (वर्ग) के विषय में अनिश्चित हैं। सामान्य रूप से (वर्गों के अनुसार) बताए गए मांसों में से, अपने गुणों सहित अलग से

च. सू. २७/६४

।॥ ६४ ॥

कुछ का, (उनके) गुणों की विशेषता के कारण, विशेष (वर्णन) किया जाएगा। दर्शन (देखने की शक्ति), श्रोत्र (सुनने की शक्ति), मेधा, अग्नि, वय, वर्ण, स्वर और आयु के लिए

च. सू. २७/६५

। ॥ ६५ ॥

बर्ही (मोर) सबसे अधिक हितकर है; (वह) बल्य, वात को नष्ट करने वाला और मांस तथा शुक्र को बढ़ाने वाला है। गुरु, उष्ण, स्निग्ध और मधुर, स्वर, वर्ण और बल देने वाले,

च. सू. २७/६६

। ॥ ६६ ॥

हंस बृंहण, शुक्रल और मारुत (वात) का नाश करने वाले कहे गए हैं। स्निग्ध, उष्ण, वृष्य, बृंहण और स्वर को जगाने वाले,

च. सू. २७/६७

। ॥ ६७ ॥

चरणायुध (मुर्गे) बल्य, वात को अत्यन्त दूर करने वाले और स्वेदन (पसीना लाने वाले) हैं। न बहुत गुरु और उष्ण, न बहुत मधुर, धन्व (सूखे) और आनूप (जलबहुल) प्रदेशों में रहने के कारण

च. सू. २७/६८

। ॥ ६८ ॥

तित्तिरि (तीतर) अनिल (वात) की अधिकता वाले तीनों दोषों को शीघ्र जीत लेता है। रक्त से युक्त पित्त और श्लेष्मा (कफ) के विकारों में कपिञ्जल

च. सू. २७/६९

। ॥ ६९ ॥

(उन विकारों में) जिनमें वात मन्द हो, शीतलता, मधुरता और लघुता के कारण प्रशस्त माने जाते हैं। लाव (लवा) कषाय और मधुर, लघु और अग्नि को बढ़ाने वाले,

च. सू. २७/७०

। ॥ ७० ॥

सन्निपात को शान्त करने वाले और विपाक में कटु हैं। गोधा (गोह) विपाक में मधुर और रस में कषाय तथा कटु,

च. सू. २७/७१

। ॥ ७१ ॥

वात और पित्त को शान्त करने वाली, बृंहण और बल बढ़ाने वाली है। शल्लक (साही) मधुर और अम्ल है, और विपाक में कटु माना गया है,

च. सू. २७/७२

। ॥ ७२ ॥

तथा वात, पित्त और कफ का नाश करने वाला और कास तथा श्वास को हरने वाला है। कषाय, विशद, शीत और रक्तपित्त को दूर करने वाले,

च. सू. २७/७३

। कपोता ॥ ७३ ॥

घर में रहने वाले कपोत (कबूतर) विपाक में मधुर भी हैं। वन में रहने वाले कपोत उनसे कुछ अधिक लघु हैं,

च. सू. २७/७४

। ॥ ७४ ॥

वे शीत और संग्राही भी हैं, और मूत्र को बहुत कम करने वाले हैं। शुक (तोते) का मांस कषाय और अम्ल, और विपाक में रूक्ष तथा शीतल है,

च. सू. २७/७५

। ॥ ७५ ॥

शोष, कास और क्षय में हितकर, संग्राही, लघु और दीपन है। चटक (गौरैया) मधुर, स्निग्ध, और बल तथा शुक्र को बढ़ाने वाले,

च. सू. २७/७६

। ॥ ७६ ॥

सन्निपात को शान्त करने वाले और मारुत (वात) को भी शान्त करने वाले हैं। कषाय, विशद, रूक्ष, शीत, पाक (विपाक) में कटु और लघु,

च. सू. २७/७७

। ॥ ७७ ॥

शश (खरगोश) स्वादु (मधुर) है, और उस सन्निपात में प्रशस्त है जिसमें अनिल (वात) सबसे कम हो। मधुर, पाक (विपाक) में मधुर, त्रिदोष को शान्त करने वाले और शिव (कल्याणकारी),

च. सू. २७/७८

। ॥ ७८ ॥

एण (एक जाति के हिरण) लघु, मल और मूत्र को बाँधने वाले और शीत कहे गए हैं। स्नेहन, बृंहण, वृष्य, श्रम (थकान) को नष्ट करने वाला और अनिल (वात) को दूर करने वाला,

च. सू. २७/७९

। ॥ ७९ ॥

वराह (सूअर) का मांस बल्य, रोचन, स्वेदन और गुरु है। गव्य (गाय का मांस) केवल वात के (विकारों) में, पीनस में और विषमज्वर में

च. सू. २७/८०

। ॥ ८० ॥

और वह (गाय का मांस) सूखी खाँसी, थकान, अत्यग्नि (बहुत तीव्र जठराग्नि) और मांस-क्षय में हितकर है। भैंस का मांस स्निग्ध, उष्ण, मधुर, वृष्य, गुरु (भारी) और तर्पण (तृप्ति देने वाला) है।

च. सू. २७/८१

। ॥ ८१ ॥

(भैंस का मांस) दृढ़ता, शरीर का बढ़ना, उत्साह और नींद भी उत्पन्न करता है। (मछलियाँ) गुरु (भारी), उष्ण, मधुर, बल देने वाली, बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाली) और वात को दूर करने वाली,

च. सू. २७/८२

। ॥ ८२ ॥

मछलियाँ स्निग्ध, वृष्य और बहुदोष (बहुत दोषों वाली) कही गई हैं। शैवाल (काई) और घास खाने के कारण, और नींद से बचे रहने के कारण,

च. सू. २७/८३

। ॥ ८३ ॥

रोहित (रोहू) मछली दीपनीय (जठराग्नि को बढ़ाने वाली), पचने में हल्की, महाबल (बहुत बल वाली), वर्ण को निखारने वाली, वात को हरने वाली, वृष्य, आँखों के लिए हितकर और बल बढ़ाने वाली है।

च. सू. २७/८४

। ॥ ८४ ॥

कूर्म (कछुआ) मेधा और स्मृति को बढ़ाने वाला, पथ्य (हितकर) और शोष को नष्ट करने वाला कहा जाता है। खड्ग (गैंडे) का मांस अभिष्यन्दी, बल देने वाला और मधुर माना गया है,

च. सू. २७/८५

। ॥ ८५ ॥

(वह गैंडे का मांस) स्नेहन, बृंहण, वर्ण्य, थकान को मिटाने वाला और वात को दूर करने वाला (भी है)। धार्तराष्ट्र, चकोर, दक्ष और मोर के भी,

च. सू. २७/८६

। ॥ ८६ ॥

और चटक (गौरैया) के जो अण्डे हों, वे वीर्य के क्षीण होने पर, खाँसी में, हृदय रोगों में और क्षत (चोट) में हितकर हैं,

च. सू. २७/८७

। खाद्यं ॥ ८७ ॥

(ये अण्डे) मधुर, अविदाही (जलन न करने वाले) और तुरन्त बल देने वाले हैं। शरीर को पुष्ट करने में मांस से बढ़कर कोई दूसरा खाद्य नहीं है।

च. सू. २७/८८

। - ॥ ८८ ॥

इस प्रकार मांसों का यह तीसरा वर्ग कहा गया। अब शाकवर्ग। पाठा, शुषा और शटी का शाक, वास्तुक (बथुआ) और सुनिषण्णक,

च. सू. २७/८९

। ॥ ८९ ॥

(इन्हें) ग्राही और त्रिदोषघ्न (तीनों दोषों को नष्ट करने वाला) जानना चाहिए, परन्तु वास्तुक (बथुआ) मल को ढीला करने वाला है। काकमाची (मकोय) तीनों दोषों को शान्त करने वाली, वृष्य और रसायन,

च. सू. २७/९०

। ॥ ९० ॥

(काकमाची) न बहुत उष्ण और न बहुत शीत वीर्य वाली, भेदिनी और कुष्ठ को नष्ट करने वाली है। राजक्षवक का शाक तीनों दोषों को शान्त करने वाला और लघु (हल्का),

च. सू. २७/९१

। ॥ ९१ ॥

(वह) ग्राही है, और विशेष रूप से ग्रहणी और अर्श (बवासीर) के रोगियों के लिए प्रशस्त है। कालशाक कटुक (तीखा), दीपन और गर (कृत्रिम विष) तथा शोफ (सूजन) को जीतने वाला है।

च. सू. २७/९२

। ॥ ९२ ॥

कलाय का शाक लघु (हल्का), उष्ण, वातल (वात को बढ़ाने वाला) और रूक्ष (रूखा) कहा जाता है। (अम्लचाङ्गेरी) दीपनी (जठराग्नि बढ़ाने वाली), उष्ण वीर्य वाली और ग्राही है, और कफ तथा वात (के विकारों) में,

च. सू. २७/९३

। ॥ ९३ ॥

अम्लचाङ्गेरी (कफ और वात के विकारों में) प्रशस्त मानी जाती है, और वह ग्रहणी और अर्श (बवासीर) में हितकर है। (उपोदिका) रस में मधुर, पाक में मधुर, भेदिनी और श्लेष्मा (कफ) को बढ़ाने वाली,

च. सू. २७/९४

। ॥ ९४ ॥

उपोदिका वृष्य, स्निग्ध, शीत और मद को नष्ट करने वाली भी है। (तण्डुलीयक) रूक्ष, मद और विष को नष्ट करने वाला और रक्तपित्त के रोगियों के लिए प्रशस्त,

च. सू. २७/९५

। ॥ ९५ ॥

तण्डुलीयक (चौलाई) रस में मधुर, पाक में मधुर और शीतल है। मण्डूकपर्णी, वेत्राग्र (बेंत का कोमल अगला भाग), कुचेला, वनतिक्तक,

च. सू. २७/९६

। ॥ ९६ ॥

कर्कोटक (ककोड़ा) और अवल्गुजक, पटोल (परवल), शकुलादनी, वृष के फूल, शार्ङ्गेष्टा, और कठिल्लक सहित केम्बूक,

च. सू. २७/९७

। ॥ ९७ ॥

नाडी, कलाय, गोजिह्वा, वार्ताक (बैंगन), तिलपर्णिका, और कौलक, कार्कश (कर्कश का), नैम्ब (नीम का) तथा पार्पटक (पर्पट का) जो शाक है,

च. सू. २७/९८

। ॥ ९८ ॥

(वह) कफ और पित्त को हरने वाला, तिक्त (कड़वा) और शीत है, और पचकर कटु हो जाता है। सभी सूप्य (दाल वाले) पौधों के शाक, फञ्जी, चिल्ली, कुतुम्बक,

च. सू. २७/९९

। ॥ ९९ ॥

पत्तों सहित सभी आलुक (कन्द), कुटिञ्जर, शण (सन) और शाल्मलि (सेमल) के फूल, कर्बुदार, सुवर्चला,

च. सू. २७/१००

। ॥ १०० ॥

निष्पाव और कोविदार (कचनार), पत्तूर, चुच्चुपर्णिका, कुमारजीव, लोट्टाक, पालङ्क्या तथा मारिष,

च. सू. २७/१०१

। ॥ १०१ ॥

कलम्ब, नालिका और सूर्य, कुसुम्भ (कुसुम) और वृकधूमक, लक्ष्मणा और प्रपुन्नाड, नलिनीका, कुठेरक,

च. सू. २७/१०२

। ॥ १०२ ॥

लोणिका, यवशाक और कुष्माण्डक (पेठा), अवल्गुज, यातुक, शालकल्याणी, त्रिपर्णी, पीलुपर्णिका,

च. सू. २७/१०३

। ॥ १०३ ॥

(ऊपर गिनाए गए इन पौधों का) शाक गुरु (भारी) और रूक्ष (रूखा) होता है, प्रायः विष्टम्भ करके (पेट में रुककर) पचता है, मधुर और शीतवीर्य होता है, और पुरीष (मल) का भेदन करने वाला (उसे ढीला करके निकालने वाला) होता है।

च. सू. २७/१०४

। ॥ १०४ ॥

उबाला हुआ, रस निचोड़ा हुआ और स्नेह (घी, तेल आदि) से भरपूर वह (शाक) प्रशस्त माना जाता है। शण (सन), कोविदार (कचनार), कर्बुदार और शाल्मलि (सेमल) का

च. सू. २७/१०५

।॥ १०५ ॥

(इनका) फूल ग्राही है और प्रशस्त है, विशेष रूप से रक्तपित्त में। न्यग्रोध (बरगद), उदुम्बर (गूलर), अश्वत्थ (पीपल), प्लक्ष (पाकड़), पद्म (कमल) आदि के पल्लव (कोमल नए पत्ते)

च. सू. २७/१०६

। कफं ॥ १०६ ॥

(वे) कषाय, स्तम्भन (बहाव को रोकने वाले) और शीत होते हैं, और पित्तातिसार के रोगियों के लिए हितकर हैं। वत्सादनी वायु (वात) को नष्ट करती है, गण्डीर और चित्रक कफ को

च. सू. २७/१०७

। ॥ १०७ ॥

श्रेयसी और बिल्वपर्णी भी (कफ को नष्ट करती हैं); परन्तु बिल्वपत्र (बेल का पत्ता) वात को दूर करने वाला है। भण्डी, शतावरी का शाक, बला और जो जीवन्तिक (शाक) है,

च. सू. २७/१०८

। ॥ १०८ ॥

और पर्वणी तथा पर्वपुष्पी का (शाक), (ये सब) वात और पित्त को हरने वाले माने गए हैं। लाङ्गलकी और उरुबूक का (शाक) लघु, मल को ढीला करने वाला और तिक्त होता है।

च. सू. २७/१०९

। ॥ १०९ ॥

तिल और वेतस (बेंत) का शाक और पञ्चाङ्गुल का शाक वातल (वात को बढ़ाने वाला), कटु, तिक्त और अम्ल (रस वाला) तथा अधोमार्ग को प्रवृत्त करने वाला (मल को नीचे की ओर निकालने वाला) होता है।

च. सू. २७/११०

। ॥ ११० ॥

कुसुम्भ (कुसुम) का (शाक) रूक्ष, अम्ल और उष्ण होता है, कफ को नष्ट करता है और पित्त को बढ़ाता है। त्रपुस (खीरा) और एर्वारुक (ककड़ी) स्वादु, गुरु, विष्टम्भी और शीतल होते हैं।

च. सू. २७/१११

। ॥ १११ ॥

त्रपुस (खीरा) तो मुख को प्रिय (स्वादिष्ट लगने वाला), रूक्ष और अत्यधिक मूत्रल (मूत्र बढ़ाने वाला) होता है। और भली-भाँति पका हुआ एर्वारुक (ककड़ी) दाह (जलन), तृष्णा (प्यास), क्लम (थकान) और आर्ति (पीड़ा) को दूर करता है।

च. सू. २७/११२

। ॥ ११२ ॥

अलाबु (लौकी) वर्चस् (मल) का भेदन करने वाले (उसे ढीला करने वाले) और रूक्ष, शीत तथा गुरु होते हैं। चिर्भट और एर्वारुक (ककड़ी) भी वैसे ही हैं, परन्तु वे दोनों वर्चोभेद (मल के पतले होकर निकलने) में हितकर हैं।

च. सू. २७/११३

। ॥ ११३ ॥

पका हुआ कूष्माण्ड (पेठा) क्षार-युक्त, मधुर और अम्ल तथा लघु होता है; वह मूत्र और पुरीष (मल) को निकालने वाला और सब दोषों को दूर करने वाला है।

च. सू. २७/११४

। ॥ ११४ ॥

केलूट, कदम्ब, नदीमाषक और ऐन्दुक (का शाक) विशद, गुरु, शीत और समभिष्यन्दी (स्रोतों को बहुत अवरुद्ध करने वाला) कहा जाता है।

च. सू. २७/११५

। ॥ ११५ ॥

उत्पल कषाय और रक्तपित्त को दूर करने वाले होते हैं। उसी प्रकार ताल (ताड़) का प्रलम्ब उरःक्षत (छाती के घाव) की पीड़ा को दूर करने वाला होता है।

च. सू. २७/११६

।॥ ११६ ॥

खर्जूर (खजूर) और ताल (ताड़) का शस्य (गूदा) रक्तपित्त और क्षय को दूर करने वाले हैं। तरूट, बिस (कमल का डंठल), शालूक (कमल का कन्द), क्रौञ्चादन और कशेरुक (कसेरू),

च. सू. २७/११७

। ॥ ११७ ॥

और शृङ्गाटक (सिंघाड़ा) तथा अङ्कलोड्य गुरु, विष्टम्भी और शीतल होते हैं। कुमुद और उत्पल के नाल (डंठल) तो, फूलों सहित और फलों सहित, माने गए हैं

च. सू. २७/११८

। ॥ ११८ ॥

शीत, स्वादु और कषाय, तथा कफ और मारुत (वात) को कुपित करने वाले। (यह) कषाय, थोड़ा विष्टम्भी और रक्तपित्त को दूर करने वाला माना गया है।

च. सू. २७/११९

। ॥ ११९ ॥

पौष्कर (कमल का) बीज तो रस और पाक (दोनों) में मधुर होता है। बल्य (बल देने वाला), शीत, गुरु, स्निग्ध, तर्पण (तृप्ति देने वाला) और बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाले) स्वभाव का,

च. सू. २७/१२०

। ॥ १२० ॥

(ऐसा) मुञ्चातक वात और पित्त को हरने वाला, स्वादु और परम वृष्य है। जीवन (जीवन-शक्ति देने वाला), बृंहण, वृष्य, कण्ठ्य (गले और स्वर के लिए हितकर) और रसायन में प्रशस्त,

च. सू. २७/१२१

। ॥ १२१ ॥

(ऐसा) विदारीकन्द बल्य (बल देने वाला) भी है, मूत्रल (मूत्र बढ़ाने वाला) और स्वादु तथा शीतल है। अम्लिका का कन्द ग्रहणी और अर्श में हितकर और लघु माना गया है,

च. सू. २७/१२२

। ॥( ।)

(वह) बहुत उष्ण नहीं है, कफ और वात को नष्ट करने वाला, ग्राही और मदात्यय में प्रशस्त है। सार्षप (सरसों का) शाक त्रिदोषकारी (तीनों दोषों को बिगाड़ने वाला) और मल-मूत्र को बाँधने वाला कहा जाता है। [रक्तनाल का (शाक) भी वैसा ही होता है, विशेष रूप से रूक्ष और अम्ल।]

च. सू. २७/१२३

। ॥ १२३ ॥

पिण्डालुक को भी वैसा ही जानना चाहिए, और कन्द होने के कारण (वह) मुख को प्रिय (स्वादिष्ट) है। सर्पच्छत्रक को छोड़कर छत्रकों (कुकुरमुत्तों) की अन्य बहुत-सी जातियाँ तो

च. सू. २७/१२४

। ॥ १२४ ॥

(सर्पच्छत्रक को छोड़कर छत्रक की वे बहुत-सी जातियाँ) शीत, पीनस (नाक का एक रोग) उत्पन्न करने वाली, मधुर और गुरु ही होती हैं। पत्तों, कन्दों और फलों पर आधारित यह चौथा शाकवर्ग (शाकों का वर्ग) है।

च. सू. २७/१२५

- । ॥ १२५ ॥

अब फलवर्ग। तृष्णा (अधिक प्यास), दाह (जलन), ज्वर, श्वास, रक्तपित्त, क्षत, क्षय, वातपित्त, उदावर्त, स्वरभेद (आवाज़ का बिगड़ना), मदात्यय

च. सू. २७/१२६

। ॥ १२६ ॥

(इन सबको,) मुख के कड़वेपन, मुख के सूखने और कास (खाँसी) को मृद्वीका (अंगूर) शीघ्र दूर करती है; (वह) बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाली), वृष्य (वीर्य बढ़ाने वाली), मधुर, स्निग्ध और शीतल है।

च. सू. २७/१२७

। ॥ १२७ ॥

खर्जूर (खजूर) मधुर, बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाला), वृष्य (वीर्य बढ़ाने वाला), गुरु और शीतल है; क्षय, अभिघात (चोट), दाह (जलन) और वातपित्त (के विकार) में वह हितकर है।

च. सू. २७/१२८

। ॥ १२८ ॥

फल्गु तर्पण (तृप्ति देने वाला), बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाला), गुरु, विष्टम्भी (पेट में रुकावट करने वाला) और शीतल है; परूषक (फालसा) और मधूक (महुआ) (भी ऐसे ही हैं), और वातपित्त में प्रशस्त माने जाते हैं।

च. सू. २७/१२९

। ॥ १२९ ॥

आम्रात मधुर, बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाला), बल्य (बल देने वाला), तर्पण (तृप्ति देने वाला), गुरु, स्नेह (चिकनाई) से युक्त, श्लेष्मल (कफ बढ़ाने वाला), शीत और वृष्य (वीर्य बढ़ाने वाला) है; वह विष्टम्भ करके (पेट में रुककर) पचता है।

च. सू. २७/१३०

। ॥ १३० ॥

सिद्ध (पके हुए) तालशस्य (ताड़ के फल) और नारिकेल (नारियल) के फल बृंहण, स्निग्ध, शीत, बल्य (बल देने वाले) और मधुर होते हैं।

च. सू. २७/१३१

। ॥ १३१ ॥

भव्य (नामक फल) मधुर, अम्ल और कषाय, विष्टम्भी (पेट में रुकावट करने वाला), गुरु और शीतल है; वह पित्त और श्लेष्मा (कफ) को बढ़ाने वाला, ग्राही (मल को बाँधने वाला) और मुख को शुद्ध करने वाला है।

च. सू. २७/१३२

। ॥ १३२ ॥

अम्ल (खट्टे) परूषक (फालसा), द्राक्षा (अंगूर), बदर (बेर) और आरुक, और कर्कन्धु तथा निकुच भी, पित्त और श्लेष्मा (कफ) को प्रकुपित करने वाले हैं।

च. सू. २७/१३३

। ॥ १३३ ॥

भली-भाँति पका हुआ आरुक बहुत उष्ण नहीं है, गुरु है, प्रायः स्वादु (मधुर) है, मुख को प्रिय है और बृंहण है; वह शीघ्र पच जाता है और दोषों को बहुत नहीं बढ़ाता।

च. सू. २७/१३४

। ॥ १३४ ॥

पारावत को दो प्रकार का जानना चाहिए: शीत और उष्ण, तथा मधुर और अम्ल; (वह) गुरु है और अरुचि (भोजन में रुचि न रहना) तथा अत्यग्नि (अग्नि का बहुत तीव्र होना) को नष्ट करने वाला है।

च. सू. २७/१३५

। ॥ १३५ ॥

काश्मर्य (गम्भारी) का फल भव्य से थोड़े ही भिन्न गुणों वाला कहा जाता है। उसी प्रकार अम्ल (खट्टा) तूद (शहतूत) परूषक (फालसा) से थोड़े ही भिन्न गुणों वाला है।

च. सू. २७/१३६

। ॥ १३६ ॥

टङ्क कषाय और मधुर, वातल (वात बढ़ाने वाला), गुरु और शीतल है। कच्चा कपित्थ (कैथ) कण्ठ के लिए हानिकर, विष को नष्ट करने वाला, ग्राही (मल को बाँधने वाला) और वातल है।

च. सू. २७/१३७

। ॥ १३७ ॥

मधुर, अम्ल और कषाय होने के कारण और सुगन्ध के कारण (कपित्थ) रुचि देने वाला है; और पूरी तरह पका हुआ (कपित्थ) दोषों को नष्ट करने वाला, विष को नष्ट करने वाला, ग्राही (मल को बाँधने वाला) और गुरु भी है।

च. सू. २७/१३८

। ॥ १३८ ॥

पका हुआ बिल्व (बेल) तो कठिनाई से पचने वाला, दोषल (दोषों को बढ़ाने वाला) और दुर्गन्ध वाली वायु उत्पन्न करने वाला है। वह (बिल्व) कच्चा हो तो स्निग्ध, उष्ण, तीक्ष्ण, दीपन (अग्नि को बढ़ाने वाला) और कफ तथा वात को जीतने वाला है।

च. सू. २७/१३९

। ॥ १३९ ॥

बाल (कच्चा) आम्र (आम) रक्तपित्त उत्पन्न करता है; आपूर्ण (पूरा बढ़ा हुआ) पित्त को बढ़ाता है; पका हुआ आम वायु (वात) को जीतता है और मांस, शुक्र तथा बल देने वाला है।

च. सू. २७/१४०

। ॥ १४० ॥

जाम्बव (जामुन का फल) प्रायः कषाय और मधुर, गुरु, विष्टम्भी (पेट में रुकावट करने वाला) और शीतल है; वह कफ और पित्त को नष्ट करने वाला, ग्राही (मल को बाँधने वाला) और अत्यधिक वात बढ़ाने वाला है।

च. सू. २७/१४१

। ॥ १४१ ॥

बदर (बेर) मधुर, स्निग्ध, भेदन (मल को तोड़कर निकालने वाला) और वात तथा पित्त को जीतने वाला है। वह सूखा हो तो कफ और वात को नष्ट करता है, और पित्त में विरुद्ध (हानिकर) नहीं होता।

च. सू. २७/१४२

। ॥ १४२ ॥

सिम्बितिका (या सिञ्चितिका) का फल कषाय और मधुर, शीत और ग्राही (मल को बाँधने वाला) है। गाङ्गेरुकी, करीर (करील), बिम्बी (कुंदरू), तोदन और धन्वन

च. सू. २७/१४३

। ॥ १४३ ॥

(ये) मधुर, कुछ कषाय, शीत और पित्त तथा कफ को दूर करने वाले हैं। भली-भाँति पका हुआ पनस (कटहल), मोच (केला) और राजादन के फल

च. सू. २७/१४४

। ॥ १४४ ॥

(वे) स्वादु (मधुर), कुछ कषाय, और स्निग्ध, शीत तथा गुरु होते हैं। कषाय और विशद होने के कारण और सुगन्ध के कारण रुचि देने वाला

च. सू. २७/१४५

। ॥ १४५ ॥

लवली का फल अवदंश (साथ में खाए जाने वाले चटपटे पदार्थ) के योग्य, हृद्य (हृदय को प्रिय) और वातल (वात बढ़ाने वाला) है। नीप (कदम्ब), शताह्वक, पीलु, तृणशून्य, विकङ्कत

च. सू. २७/१४६

। ॥ १४६ ॥

और प्राचीनामलक भी, (ये) दोषों का नाश करने वाले और गर (विष) को हरने वाले हैं। ऐङ्गुद (इङ्गुदी का फल) तिक्त और मधुर, स्निग्ध और उष्ण, तथा कफ और वात को जीतने वाला है।

च. सू. २७/१४७

। ॥ १४७ ॥

तिन्दुक कफ और पित्त का नाश करने वाला, कषाय, मधुर और लघु है। आमलक (आँवला) में लवण को छोड़कर सभी रसों को जानना चाहिए।

च. सू. २७/१४८

। ॥ १४८ ॥

(यह) रूक्ष, स्वादु, कषाय और अम्ल है, और कफ तथा पित्त को अत्यधिक हरने वाला है। बिभीतक (बहेड़ा) रस, असृक् (रक्त), मांस और मेद में उत्पन्न दोषों को नष्ट करता है।

च. सू. २७/१४९

। ॥ १४९ ॥

(यह) स्वरभेद (आवाज़ का बैठना), कफ के उत्क्लेद और पित्त के रोगों का नाश करने वाला, अम्ल, कषाय और मधुर, वात का नाश करने वाला, ग्राही और दीपन है।

च. सू. २७/१५०

। ॥ १५० ॥

दाडिम (अनार) स्निग्ध और उष्ण, हृद्य, और कफ तथा पित्त का अविरोधी (उन्हें न बिगाड़ने वाला) है। परन्तु जो दाडिम रूक्ष और अम्ल है, वह पित्त और अनिल (वात) को कुपित करने वाला है।

च. सू. २७/१५१

। ॥ १५१ ॥

मधुर (दाडिम) पित्त को दूर करने वाला है; उनमें पूर्व (पहले वाला) दाडिम उत्तम है। वृक्षाम्ल ग्राही, रूक्ष और उष्ण है, और वात-श्लेष्मा (के विकारों) में प्रशस्त माना जाता है।

च. सू. २७/१५२

। ॥ १५२ ॥

अम्लिका (इमली) का पका हुआ फल गुणों में उससे (वृक्षाम्ल से) थोड़ा ही भिन्न है। अम्लवेतस उन्हीं गुणों से युक्त है, परन्तु भेदन है।

च. सू. २७/१५३

। ॥ १५३ ॥

शूल, अरुचि और विबन्ध में, अग्नि के मन्द होने पर, मद्यविप्लव (मद्य से हुए विकार) में, हिक्का और श्वास में, कास में, वमि (उल्टी) में और मल के रोगों में

च. सू. २७/१५४

। ॥ १५४ ॥

तथा वात और श्लेष्मा (कफ) से उत्पन्न सभी (रोगों) में ही (यह) बताया जाता है। मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू) का केसर (भीतरी गूदा) लघु है; शेष (भाग) इससे विपरीत (गुरु) है।

च. सू. २७/१५५

। ॥ १५५ ॥

त्वचा (छिलके) से रहित कर्चूर (कचूर) रोचन, दीपन, हृद्य और सुगन्धित है; (वह) कफ और वात का नाश करने वाला, और श्वास, हिक्का तथा अर्श (बवासीर) में हितकर है।

च. सू. २७/१५६

। ॥ १५६ ॥

नागरङ्ग (नारंगी) का फल मधुर और थोड़ा अम्ल, हृद्य, भोजन में रुचि जगाने वाला, कठिनाई से पचने वाला, वात को शान्त करने वाला और गुरु है।

च. सू. २७/१५७

। ॥ १५७ ॥

वाताम (बादाम), अभिषुक, अक्षोट (अखरोट), मुकूलक और निकोचक, उरुमाण के साथ, गुरु, उष्ण, स्निग्ध, मधुर, बल देने वाले

च. सू. २७/१५८

। ॥ १५८ ॥

वात का नाश करने वाले, बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाले), वृष्य और कफ तथा पित्त को बढ़ाने वाले हैं। प्रियाल (चिरौंजी) को, उष्णता को छोड़कर, गुणों में इनके समान जानना चाहिए।

च. सू. २७/१५९

। ॥ १५९ ॥

श्लेष्मातक (लसोड़े) का फल श्लेष्मल (कफ बढ़ाने वाला), मधुर, शीत और गुरु है। और अङ्कोट का फल श्लेष्मल, गुरु, विष्टम्भी और अग्नि को जीतने (मन्द करने) वाला है।

च. सू. २७/१६०

। ॥ १६० ॥

शमी का फल गुरु, उष्ण, मधुर, रूक्ष और केशों का नाश करने वाला है। कारञ्ज (करञ्ज का फल) विष्टम्भ करता है और वात तथा श्लेष्मा का अविरोधी है।

च. सू. २७/१६१

। ॥ १६१ ॥

आम्रातक, अम्ल दन्तशठ, करमर्दक (करौंदे) के साथ, और ऐरावतक को भी रक्तपित्त उत्पन्न करने वाला जानना चाहिए।

च. सू. २७/१६२

। पर्पटकीफलम्॥ १६२ ॥

वार्ताक (बैंगन) वात का नाश करने वाला और दीपन भी है, (तथा) कटु और तिक्त है। पर्पटकी के फल को वातल और कफ तथा पित्त का नाश करने वाला जानना चाहिए।

च. सू. २७/१६३

। ॥ १६३ ॥

आक्षिकी का फल पित्त और श्लेष्मा का नाश करने वाला, अम्ल और वातल है। मधुर, अम्लपाकी (पचने पर अम्ल होने वाले) और पित्त तथा श्लेष्मा को हरने वाले

च. सू. २७/१६४

। ॥ १६४ ॥

और अश्वत्थ (पीपल), उदुम्बर (गूलर), प्लक्ष और न्यग्रोध (बरगद) के फल कषाय, मधुर और अम्ल, वातल और गुरु हैं।

च. सू. २७/१६५

। ॥ १६५ ॥

भल्लातक (भिलावे) की अस्थि (गुठली) अग्नि के समान है; उसका मांस (गूदा) स्वादु और शीतल है। प्रायः उपयोग में आने वाला यह पाँचवाँ फलवर्ग कहा गया।

च. सू. २७/१६६

- । ॥ १६६ ॥

अब हरितवर्ग (हरी वस्तुओं का वर्ग)। आर्द्रक (अदरक) रोचन, दीपन और वृष्य है, (वह) विश्वभेषज (सबकी औषधि) है। वात, श्लेष्मा और विबन्ध में उसका रस बताया जाता है।

च. सू. २७/१६७

। ॥ १६७ ॥

जम्बीर रोचन, दीपन, तीक्ष्ण, सुगन्धित और मुख को शुद्ध करने वाला है; (वह) कफ और वात का नाश करने वाला, क्रिमियों का नाश करने वाला और भोजन को पचाने वाला है।

च. सू. २७/१६८

, , ।, ॥ १६८ ॥

मूलक (मूली) कोमल (कच्ची) हो तो दोषों को हरती है, बड़ी (पुरानी) होने पर त्रिदोष (तीनों दोषों को बिगाड़ने वाली) होती है, स्नेह (घी-तेल) के साथ पकाई जाए तो मारुत (वात) को दूर करती है, और सूखी हुई तो कफ और वात को जीतती है।

च. सू. २७/१६९

। कफवातघ्नः ॥ १६९ ॥

सुरस हिक्का (हिचकी), कास (खाँसी), विष, श्वास और पार्श्वशूल (बगल का दर्द) को नष्ट करने वाला, पित्त को बढ़ाने वाला, कफ और वात को नष्ट करने वाला, और दुर्गन्ध को दूर करने वाला है।

च. सू. २७/१७०

। ॥ १७० ॥

यवानी (अजवायन), अर्जक और शिग्रु (सहजन), शालेय तथा मृष्टक, (ये) हृद्य (हृदय को प्रिय) और स्वादिष्ट हैं, और पित्त को उत्क्लेशित करते (उभारते) हैं।

च. सू. २७/१७१

। ॥ १७१ ॥

गण्डीर, जलपिप्पली, तुम्बरु और शृङ्गवेरिका, (ये) तीक्ष्ण, उष्ण, कटु और रूक्ष हैं, और कफ तथा वात को हरने वाले हैं।

च. सू. २७/१७२

। ॥ १७२ ॥

भूस्तृण पुंस्त्व (पुरुषत्व) को नष्ट करने वाला, कटु, रूक्ष, उष्ण और मुख को शुद्ध करने वाला है। खराह्वा कफ और वात को नष्ट करने वाली और बस्ति (मूत्राशय) के रोगों की पीड़ा को दूर करने वाली है।

च. सू. २७/१७३

। ॥ १७३ ॥

धान्यक (धनिया), अजगन्धा और सुमुख, ये रोचन (रुचि बढ़ाने वाले), सुगन्धित और बहुत अधिक कटु न होने वाले हैं, और दोषों को उत्क्लेशित करते (उभारते) हैं।

च. सू. २७/१७४

। ॥ १७४ ॥

गृञ्जनक ग्राही (मल को बाँधने वाला) और तीक्ष्ण है, और वात तथा श्लेष्मा (कफ) से हुए अर्श (बवासीर) में हितकर है। जिन्हें पित्त का रोग न हो, उनके लिए उसे स्वेदन (पसीना लाने की चिकित्सा) में और भोजन में प्रयोग करना चाहिए।

च. सू. २७/१७५

। ॥ १७५ ॥

पलाण्डु (प्याज़) श्लेष्मा (कफ) बढ़ाने वाला और मारुत (वात) को नष्ट करने वाला है, और पित्त को दूर करने वाला नहीं है; यह आहार में प्रयोग के योग्य, बलकारक, गुरु (भारी), वृष्य (पुरुषत्व बढ़ाने वाला) और रोचन (रुचि बढ़ाने वाला) भी है।

च. सू. २७/१७६

। ॥ १७६ ॥

लशुन (लहसुन) क्रिमि (कीड़े), कुष्ठ और किलास को नष्ट करने वाला, वात को नष्ट करने वाला, गुल्म को नष्ट करने वाला, स्निग्ध, उष्ण, वृष्य, कटु और गुरु (भारी) है।

च. सू. २७/१७७

। ॥ १७७ ॥

सूखे हुए ये (हरित द्रव्य) कफ और वात को नष्ट करने वाले होते हैं, और इनके फल भी। और यह हरितों (हरी वनस्पतियों) का छठा वर्ग समाप्त होता है।

च. सू. २७/१७८

- । ॥ १७८ ॥

अब मद्यवर्ग। सामान्य रूप से सारा मद्य प्रकृति (स्वभाव) से अम्ल (खट्टा) और उष्ण, और विपाक में भी अम्ल कहा गया है; उसकी विशेषता (हर मद्य के विशेष गुण) आगे बताई जाएगी।

च. सू. २७/१७९

। ॥ १७९ ॥

कृश (दुबले) लोगों के लिए, जिनका मूत्र रुका हुआ हो उनके लिए, और ग्रहणी तथा अर्श के विकार वालों के लिए सुरा प्रशस्त (उत्तम) है; वह वात को नष्ट करने वाली है, और स्तन्य (माँ के दूध) तथा रक्त के क्षय में भी (प्रशस्त है)।

च. सू. २७/१८०

। ॥ १८० ॥

हिक्का, श्वास, प्रतिश्याय (जुकाम), कास, वर्चोग्रह (मल का रुकना) और अरुचि में, और वमि (उल्टी), आनाह तथा विबन्ध में वात को नष्ट करने वाली मदिरा हितकर है।

च. सू. २७/१८१

। ॥ १८१ ॥

जगल शूल, प्रवाहिका, आटोप और कफ-वात से हुए अर्श के लिए हितकर है; यह ग्राही, रूक्ष, उष्ण, शोफ (सूजन) को नष्ट करने वाला और भक्त (भोजन) को पचाने वाला है।

च. सू. २७/१८२

। ॥ १८२ ॥

अरिष्ट शोष, अर्श, ग्रहणीदोष, पाण्डुरोग, अरुचि और ज्वर को, और कफ से उत्पन्न रोगों को नष्ट करता है; यह रोचन और दीपन (पाचन की अग्नि बढ़ाने वाला) है।

च. सू. २७/१८३

। ॥ १८३ ॥

शार्कर मुख को प्रिय, सुखद मद देने वाला, सुगन्धित, बस्ति के रोगों को दूर करने वाला, जरणीय (सरलता से पचने वाला), परिणत (भली भाँति पका हुआ), हृद्य और वर्ण्य (रंग निखारने वाला) है।

च. सू. २७/१८४

। ॥ १८४ ॥

पक्वरस रोचन, दीपन, हृद्य, शोष, शोफ और अर्श में हितकर, स्नेह और श्लेष्मा (कफ) के विकारों को नष्ट करने वाला और वर्ण्य माना गया है।

च. सू. २७/१८५

। ॥ १८५ ॥

शीतरसिक जरणीय, विबन्ध को नष्ट करने वाला, स्वर और वर्ण को निर्मल करने वाला, लेखन (शरीर की बढ़ी हुई धातुओं को घटाने वाला), और शोफ, उदर तथा अर्श में हितकर है।

च. सू. २७/१८६

। ॥ १८६ ॥

गौड (गुड़ से बना मद्य) मल और वात को निकालने वाला और (मल को) तोड़ने वाला, तर्पण (तृप्ति देने वाला) और दीपन है। आक्षिकी पाण्डुरोग और व्रण (घाव) में हितकर और दीपन मानी गई है।

च. सू. २७/१८७

। ॥ १८७ ॥

सुरासव तीव्र मद (तेज़ नशा) वाला, वात को नष्ट करने वाला और मुख को प्रिय है। मध्वासव छेदी और तीक्ष्ण है। मैरेय मधुर और गुरु (भारी) है।

च. सू. २७/१८८

। ॥ १८८ ॥

धातकी से अभिषुत (धातकी डालकर तैयार किया गया आसव) हृद्य (हृदय को प्रिय), रूक्ष (रूखा), रोचन (रुचि बढ़ाने वाला) और दीपन (अग्नि को दीप्त करने वाला) होता है। मृद्वीका (अंगूर) और इक्षु-रस (गन्ने के रस) का आसव माध्वीक के समान है और अत्यधिक उष्ण नहीं होता।

च. सू. २७/१८९

। ॥ १८९ ॥

मधु (नाम का मद्य) रोचन (रुचि बढ़ाने वाला), दीपन (अग्नि को दीप्त करने वाला), हृद्य (हृदय को प्रिय), बल्य (बल देने वाला) और पित्त का अविरोधी (पित्त के प्रतिकूल नहीं) है; वह विबन्ध (मल की रुकावट) को नष्ट करने वाला और कफ को नष्ट करने वाला, लघु (हल्का) और अल्प-मारुत (थोड़ा ही वात बढ़ाने वाला) है।

च. सू. २७/१९०

। ॥ १९० ॥

जौ (यव) की मण्ड-सहित (ऊपर के स्वच्छ भाग के साथ) सुरा रूक्ष (रूखी) और उष्ण (गरम) होती है और वात तथा पित्त को बढ़ाती है; वह गुरु (भारी) है और विष्टम्भ (रुकावट) करके पचती है। परन्तु मधूलिका श्लेष्मा (कफ) बढ़ाने वाली है।

च. सू. २७/१९१

। ॥ १९१ ॥

सौवीरक और तुषोदक (अनाज से बने खट्टे पेय) दीपन (अग्नि को दीप्त करने वाले) और जरणीय (पाचन में सहायक) हैं; वे हृदय-रोग, पाण्डु-रोग और क्रिमि-रोग को दूर करते हैं, ग्रहणी (रोग) और अर्श (बवासीर) में हितकर हैं, और भेदी (मल को तोड़कर निकालने वाले) हैं।

च. सू. २७/१९२

। ॥ १९२ ॥

खट्टा काञ्जिक (काँजी) स्पर्श से (शरीर को छूने पर) दाह (जलन) और ज्वर को दूर करता है, और पीने से वात और कफ को दूर करता है; वह विबन्ध (मल की रुकावट) को नष्ट करने वाला, अवस्रंसी (मल को नीचे की ओर सरकाने वाला) और दीपन (अग्नि को दीप्त करने वाला) है।

च. सू. २७/१९३

। ॥ १९३ ॥

प्रायः नया मद्य गुरु (भारी) और दोषों को उभारने वाला होता है; पुराना (मद्य) स्रोतों (शरीर के भीतर के मार्गों) को शुद्ध करने वाला, दीपन (अग्नि को दीप्त करने वाला), लघु (हल्का) और रोचन (रुचि बढ़ाने वाला) होता है।

च. सू. २७/१९४

।॥ १९४ ॥

मद्य हर्षण (प्रसन्नता देने वाला) और प्रीणन (तृप्ति देने वाला) है; वह भय, शोक और श्रम (थकान) को दूर करता है, और प्रागल्भ्य (निडरता), वीर्य (पराक्रम), प्रतिभा (सूझ-बूझ), तुष्टि (सन्तोष), पुष्टि (शरीर की पुष्टता) और बल देने वाला है।

च. सू. २७/१९५

। ॥ १९५ ॥

सात्त्विक (सत्त्व-गुण वाले) लोगों द्वारा विधि के अनुसार और युक्ति (उचित ढंग) से पिया गया (मद्य) अमृत के समान होता है। मद्य को विषय बनाकर यह सातवाँ वर्ग कहा गया है।

च. सू. २७/१९६

- । ॥ १९६ ॥

अब जलवर्ग। सारा जल एक ही प्रकार का है: (वह) ऐन्द्र (इन्द्र सम्बन्धी, वर्षा के रूप में) आकाश से गिरता है। वह (जल) गिरते हुए और गिरने के बाद भी देश (स्थान) और काल (समय) पर निर्भर करता है।

च. सू. २७/१९७

। ॥ १९७ ॥

आकाश से गिरता हुआ (जल) काल (ऋतु) के अनुसार चलने वाले सोम (चन्द्रमा), वायु और अर्क (सूर्य) से स्पृष्ट (प्रभावित) होता है; और (गिरने के बाद) जो निकट हो उसके अनुसार पृथ्वी के शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष आदि गुणों से (स्पृष्ट होता है)।

च. सू. २७/१९८

। , ॥ १९८ ॥

दिव्य (आकाश का) जल प्रकृति से (स्वभाव से) शीत (ठण्डा), शुचि (पवित्र), शिव (कल्याणकारी), मृष्ट (स्वादिष्ट), विमल (निर्मल) और लघु (हल्का), इन छह गुणों वाला होता है; गिरने पर वह पात्र (जिस आधार पर या जिसमें वह गिरे) पर निर्भर करता है।

च. सू. २७/१९९

। ॥ १९९ ॥

(भूमि) श्वेत (सफ़ेद) हो तो (जल) कषाय (कसैला) होता है, और पाण्डर (पीलापन लिए सफ़ेद) हो तो तिक्त (कड़वा) होता है; कपिल (भूरी) हो तो क्षार से मिला हुआ, और ऊषर (खारी भूमि) में लवण (नमकीन स्वाद) से युक्त होता है।

च. सू. २७/२००

। । ॥ २०० ॥

पर्वतीय फैलाव (पहाड़ी भूमि) में (जल) कटु (तीखा) और काली मिट्टी वाली (भूमि) में मधुर (मीठा) होता है। पृथ्वी पर स्थित जल का यही षाड्गुण्य (छह प्रकार का गुण) कहा गया है। और जो (जल) ऐन्द्र (वर्षा का), कार (सम्भवतः ओलों का) और हिम (बर्फ़ का) है, उसे अव्यक्त रस वाला (जिसका स्वाद प्रकट न हो) जानना चाहिए।

च. सू. २७/२०१

। ॥ २०१ ॥

जो जल इन्द्र द्वारा छोड़ा जाकर अन्तरिक्ष (आकाश) से गिरता है और बताए गए पात्रों में एकत्र किया जाता है, उसे धीर (बुद्धिमान) लोग 'ऐन्द्र' ही कहते हैं; वह नरेन्द्रों (राजाओं) के पीने योग्य प्रधान (श्रेष्ठ) जल है।

च. सू. २७/२०२

। ॥ २०२ ॥

थोड़ा कषाय (कसैला) और मधुर (मीठा), अत्यन्त सूक्ष्म, विशद (स्वच्छ), लघु (हल्का), अरूक्ष (जो रूखा न हो) और अनभिष्यन्दी (जो स्रोतों को अवरुद्ध न करे), (ऐसा) सब पानीय (पीने का जल) उत्तम है।

च. सू. २७/२०३

। ॥ २०३ ॥

वर्षा ऋतु का नया पानीय (पीने का जल) गुरु (भारी), अभिष्यन्दी (स्रोतों को अवरुद्ध करने वाला) और मधुर (मीठा) होता है। शरद् ऋतु में (जो जल) बरसता है, (वह) प्रायः तनु (पतला), लघु (हल्का) और अनभिष्यन्दी होता है।

च. सू. २७/२०४

। ॥ २०४ ॥

जो लोग सुकुमार (कोमल प्रकृति के) हों और जिनके भोजन में स्निग्ध (चिकने) पदार्थ अधिक रहते हों, उनके भोज्य (भोजन के पदार्थ), भक्ष्य (चबाकर खाए जाने वाले पदार्थ), लेह्य (चाटकर खाए जाने वाले पदार्थ) और पेय (पीने के पदार्थ) में वह (शरद् का जल) तो प्रशस्त (उत्तम माना गया) है।

च. सू. २७/२०५

। ॥ २०५ ॥

हेमन्त ऋतु में जल स्निग्ध (चिकनाई वाला), वृष्य (पौरुष बढ़ाने वाला), बल के लिए हितकर और गुरु (भारी) होता है। शिशिर ऋतु में (वह) उससे कुछ अधिक लघु (हल्का) और कफ तथा वात को जीतने वाला होता है।

च. सू. २७/२०६

। ॥ २०६ ॥

वासन्तिक (वसन्त ऋतु के) जल को कषाय (कसैला), मधुर (मीठा) और रूक्ष (रूखा) जानना चाहिए; परन्तु ग्रैष्मिक (ग्रीष्म ऋतु का) जल अनभिष्यन्दी (स्रोतों को अवरुद्ध न करने वाला) होता है, ऐसा ही निश्चय है।

च. सू. २७/२०७

। ॥ २०७ ॥

परन्तु विभ्रान्त (अपने स्वभाव से भटके हुए) कालों (ऋतुओं) में तोयद (बादल) जो जल देते हैं, वह तो दोष (विकार) का कारण बनता है; इसमें संशय नहीं है।

च. सू. २७/२०८

। ॥ २०८ ॥

राजाओं, राजमात्रों (राजा के समान प्रतिष्ठा वाले लोगों) और सुकुमार (कोमल प्रकृति के) मनुष्यों को विशेष रूप से शरद् ऋतु में भली-भाँति संग्रह किए गए जल का प्रयोग करना चाहिए।

च. सू. २७/२०९

। ॥ २०९ ॥

जिन नदियों का जल पत्थरों से कटता (टूटता), विक्षुब्ध (उथल-पुथल) होता और टकराता है, और जो हिमवत् (हिमालय) से निकलती हैं, वे नदियाँ पथ्य (हितकर), पुण्य (पवित्र) और देवर्षियों द्वारा सेवित हैं।

च. सू. २७/२१०

। ॥ २१० ॥

जो नदियाँ पत्थर और रेत बहाकर ले जाती हैं और विमल (निर्मल) जल वाली हैं, और जो मलय (पर्वत) से निकलती हैं, उनमें जल अमृत के समान होता है।

च. सू. २७/२११

। ॥ २११ ॥

और जो (नदियाँ) पश्चिम की ओर मुख किए (बहती) हैं, वे निर्मल जल वाली (नदियाँ) पथ्य (हितकर) हैं। और जो पूर्व समुद्र (पूर्व दिशा के समुद्र) में जाती हैं, वे प्रायः मृदु (धीमी) गति से बहने वाली और गुरु (भारी जल वाली) होती हैं।

च. सू. २७/२१२

। ॥ २१२ ॥

और जो (नदियाँ) पारियात्र (पर्वत) से निकलती हैं, और जो विन्ध्य तथा सह्य (पर्वतों) से निकलती हैं, वे सिर के रोगों, हृदय के रोगों, कुष्ठ और श्लीपद (हाथीपाँव) का हेतु (कारण) हैं।

च. सू. २७/२१३

। ॥ २१३ ॥

जिन नदियों का जल धरती (मिट्टी), कीड़ों, साँपों, चूहों और मल (गन्दगी) से दूषित हो और जो वर्षा का जल बहाकर लाती हों, वे नदियाँ सब दोषों को समीरण (प्रकुपित) करने वाली होती हैं।

च. सू. २७/२१४

। ॥ २१४ ॥

वापी (बावड़ी), कूप (कुआँ), तडाग (तालाब), उत्स (सोता), सरस् (सरोवर), प्रस्रवण (झरना) आदि में (जल को) आनूप (जल-बहुल), शैल (पहाड़ी) और धन्व (मरु) (प्रदेशों) के गुणों और दोषों से परखना चाहिए।

च. सू. २७/२१५

। ॥ २१५ ॥

जो जल पिच्छिल (चिपचिपा), कीड़ों से भरा, पत्तों, शैवाल (काई) और कीचड़ से क्लिन्न (गला-सड़ा), विवर्ण (बदरंग), विरस (बेस्वाद), सान्द्र (गाढ़ा) और दुर्गन्ध वाला हो, (वह) जल हितकर नहीं है।

च. सू. २७/२१६

। ॥ २१६ ॥

जो अम्बु (जल) वरुणालय (समुद्र) का है, वह विस्र (कच्चे मांस जैसी गन्ध वाला), त्रिदोष (तीनों दोषों को कुपित करने वाला) और लवण (खारा) होता है। इस प्रकार यह आठवाँ, सुविनिश्चित (भली-भाँति निश्चित किया हुआ) अम्बुवर्ग (जल का वर्ग) कहा गया।

च. सू. २७/२१७

- । ॥ २१७ ॥

अब गोरसवर्ग (दूध और उससे बनी वस्तुओं का वर्ग)। गाय का दूध दस गुणों वाला है: स्वादु (मधुर), शीत, मृदु, स्निग्ध, बहल (गाढ़ा), श्लक्ष्ण (चिकना), पिच्छिल (लसदार), गुरु, मन्द और प्रसन्न (निर्मल)।

च. सू. २७/२१८

। ॥ २१८ ॥

इन्हीं गुणों वाले ओज को वह (दूध) सामान्य (समानता) के कारण बढ़ाता है। क्षीर (दूध) को जीवनीय (जीवन-शक्ति देने वाले) द्रव्यों में श्रेष्ठ (और) रसायन कहा गया है।

च. सू. २७/२१९

। ॥ २१९ ॥

भैंसों का दूध गाय के दूध से अधिक गुरु (भारी) और अधिक शीत होता है। वह स्नेह (चिकनाई) में कम नहीं होता, और अनिद्रा (नींद न आने) वाले के लिए तथा अत्यग्नि (अत्यधिक तीव्र पाचन-अग्नि) वाले के लिए हितकर है।

च. सू. २७/२२०

। ॥ २२० ॥

ऊँटनियों का दूध रूक्ष (रूखा), उष्ण, थोड़ा लवण (नमकीन) और लघु होता है। वह वात और कफ (के विकारों) में, तथा आनाह (पेट का फूलना और मल-वायु का रुकना), क्रिमि (कृमि), शोफ (सूजन), उदर (उदर रोग) और अर्श (बवासीर) में प्रशस्त है।

च. सू. २७/२२१

। ॥ २२१ ॥

एक खुर वाले (पशुओं) का सारा दूध बल्य (बल देने वाला), स्थैर्य (स्थिरता, दृढ़ता) देने वाला और उष्ण होता है; वह अम्ल (खटास) और लवण (नमकीनपन) लिए हुए, रूक्ष, शाखाओं (हाथ-पैरों) के वात को दूर करने वाला और लघु होता है।

च. सू. २७/२२२

। ॥ २२२ ॥

छाग (बकरी का) दूध कषाय और मधुर, शीत, ग्राही (मल को बाँधने वाला) और लघु होता है; वह रक्तपित्त और अतिसार को नष्ट करता है, और क्षय, कास (खाँसी) तथा ज्वर को दूर करता है।

च. सू. २७/२२३

। ॥ २२३ ॥

परन्तु आविक (भेड़ का) दूध उष्ण होता है, हिक्का (हिचकी) और श्वास (साँस फूलने का रोग) उत्पन्न करता है, और पित्त तथा श्लेष्मा (कफ) को बढ़ाता है। हथिनियों का दूध बल्य (बल देने वाला), गुरु और अत्यन्त स्थैर्य देने वाला होता है।

च. सू. २७/२२४

। ॥ २२४ ॥

मानुष (स्त्री का) दूध जीवन (जीवन-शक्ति देने वाला), बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाला), सात्म्य (प्रकृति के अनुकूल) और स्नेहन (स्निग्धता देने वाला) होता है। रक्तपित्त में (वह) नावन (नाक में डालने की औषधि) है, और आँख के शूल (तीव्र पीड़ा) वालों के लिए तर्पण (तृप्ति देने वाला)।

च. सू. २७/२२५

। ॥ २२५ ॥

दधि (दही) रोचन (रुचि बढ़ाने वाला), दीपन (पाचन-अग्नि को जगाने वाला), वृष्य (पौरुष बढ़ाने वाला), स्नेहन, बल बढ़ाने वाला, पाक में अम्ल, उष्ण, वात को नष्ट करने वाला, मङ्गल्य (शुभ) और बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाला) होता है।

च. सू. २७/२२६

। ॥ २२६ ॥

पीनस (नाक का जुकाम), अतिसार, शीतक (ठंड लगकर आने वाले) विषमज्वर, अरुचि, मूत्रकृच्छ्र (कष्ट से पेशाब होना) और कार्श्य (दुबलेपन) में दधि (दही) प्रशस्त माना जाता है।

च. सू. २७/२२७

। ॥ २२७ ॥

शरद्, ग्रीष्म और वसन्त (ऋतुओं) में दधि (दही) प्रायः गर्हित (निन्दित) है; और रक्त, पित्त तथा कफ से उत्पन्न विकारों में वह अहितकर है।

च. सू. २७/२२८

, , ।, ॥ २२८ ॥

मन्दक (ठीक से न जमा दही) त्रिदोष (तीनों दोषों को बिगाड़ने वाला) है, जात (भली भाँति जमा हुआ) दधि वात को नष्ट करता है, सर (दही के ऊपर की गाढ़ी परत) शुक्रल (शुक्र बढ़ाने वाला) है, और मण्ड (दही का पानी) श्लेष्मा (कफ) और अनिल (वात) को नष्ट करता है तथा स्रोतों को शुद्ध करता है।

च. सू. २७/२२९

। ॥ २२९ ॥

शोफ (सूजन), अर्श (बवासीर), ग्रहणी-दोष, मूत्रग्रह (पेशाब का रुकना), उदर (उदर रोग) और अरुचि में, स्नेह-व्यापद् (स्नेह के प्रयोग से हुए उपद्रव) में, पाण्डुत्व (पाण्डु रोग) में और गर (कृत्रिम विष से होने वाले रोगों) में तक्र (छाछ) देना चाहिए।

च. सू. २७/२३०

।॥ २३० ॥

नवोद्धृत (ताज़ा निकाला हुआ) नवनीत (मक्खन) संग्राही (मल को बाँधने वाला), दीपन (पाचन-अग्नि को जगाने वाला) और हृद्य (हृदय के लिए हितकर) होता है; वह ग्रहणी और अर्श के विकारों को नष्ट करता है, और अर्दित (मुँह का लकवा) तथा अरुचि को मिटाता है।

च. सू. २७/२३१

।॥ २३१ ॥

(घृत) स्मृति, बुद्धि, अग्नि, शुक्र, ओज, कफ और मेद को बढ़ाने वाला, तथा वात, पित्त, विष, उन्माद, शोष, अलक्ष्मी (अशुभता) और ज्वर को दूर करने वाला

च. सू. २७/२३२

। ॥ २३२ ॥

(ऐसा) घृत सब स्नेहों में उत्तम, शीत, और रस तथा पाक में मधुर है; विधियों से वह सहस्र (हज़ार) वीर्यों (शक्तियों) वाला (और) सहस्र कर्म करने वाला (होता है)।

च. सू. २७/२३३

। ॥ २३३ ॥

जीर्ण (पुराना) घृत मद, अपस्मार, मूर्च्छा, शोष, उन्माद, गर (एक प्रकार का विष) और ज्वर को, तथा योनि, कान और सिर के शूल (दर्द) को दूर करता है।

च. सू. २७/२३४

। ॥ २३४ ॥

बकरी, भेड़ और भैंस के अपने-अपने घृतों (के गुणों) को उनके दूध के समान बताना चाहिए। पीयूष, मोरट और जो अनेक प्रकार के किलाट हैं

च. सू. २७/२३५

। ॥ २३५ ॥

(वे) सब ही दीप्त अग्नि वालों (जिनकी पाचन-शक्ति तेज़ है) और अनिद्रा वालों (जिन्हें नींद नहीं आती) के लिए सुखदायक हैं; (वे) गुरु, तर्पण, वृष्य, बृंहण और पवन (वात) को दूर करने वाले हैं।

च. सू. २७/२३६

। ॥ २३६ ॥

तक्रपिण्डक (छाछ के ठोस पिण्ड) विशद, गुरु, रूक्ष और ग्राही होते हैं। गोरसों (दूध और उससे बने पदार्थों) का यह नौवाँ वर्ग कहा गया है।

च. सू. २७/२३७

- । ॥ २३७ ॥

अब इक्षुवर्ग (ईख और उससे बने पदार्थों का वर्ग)। (चबाकर) खाए गए इक्षु (ईख) का रस वृष्य, शीत, सर, स्निग्ध, बृंहण, मधुर और श्लेष्मल (कफ बढ़ाने वाला) होता है; परन्तु यन्त्र से (पेरकर निकाला गया रस) विदग्ध होता है (पचते समय जलन पैदा करता है)।

च. सू. २७/२३८

। ॥ २३८ ॥

शीतलता, निर्मलता और मधुरता के कारण वंशक (ईख) पौण्ड्रक (ईख) से श्रेष्ठ है। गुड क्रिमि, मज्जा, रक्त, मेद और मांस को अधिक मात्रा में उत्पन्न करता है।

च. सू. २७/२३९

। ॥ २३९ ॥

क्षुद्र गुड, और (उबालकर) चौथाई, तिहाई तथा आधा शेष रखा गया (ईख का) रस, (इनमें) जो पहले कहा गया है वह (बाद वाले से) अधिक गुरु है। धोया हुआ गुड बहुत थोड़े मल वाला होता है।

च. सू. २७/२४०

। ॥ २४० ॥

उस (धौत गुड) से आगे मत्स्यण्डिका, खण्ड और शर्करा (क्रमशः) और अधिक विमल (मल-रहित) हैं। इनकी विमलता जैसे-जैसे (अधिक) हो, वैसे-वैसे (इनकी) शीतलता (भी अधिक) होती है।

च. सू. २७/२४१

। ॥ २४१ ॥

गुडशर्करा (गुड से बनी शर्करा) वृष्य है, क्षीण और क्षत (रोगियों) के लिए हितकर है, और स्नेह (चिकनाई) से युक्त है। यासशर्करा (यास से बनी शर्करा) कषाय-मधुर (कसैली-मीठी), शीत और कुछ तिक्त (कड़वी) है।

च. सू. २७/२४२

। ॥ २४२ ॥

मधुशर्करा (मधु से बनी शर्करा) रूक्ष, वमि (उल्टी) और अतिसार (दस्त) को नष्ट करने वाली, और छेदन है। तृष्णा, असृक्पित्त (रक्तपित्त) और दाह में सभी शर्कराएँ प्रशस्त (उत्तम) हैं।

च. सू. २७/२४३

। ॥ २४३ ॥

माक्षिक, भ्रामर, क्षौद्र और पौत्तिक, ये मधु की जातियाँ (प्रकार) हैं। उनमें माक्षिक सबसे श्रेष्ठ है, और भ्रामर विशेष रूप से गुरु है।

च. सू. २७/२४४

। ॥ २४४ ॥

माक्षिक (मधु) तेल के रंग का होता है, और पौत्तिक घी के रंग का; क्षौद्र कपिल (भूरे-पीले) रंग का होता है, और भ्रामर श्वेत (सफ़ेद) कहा जाता है।

च. सू. २७/२४५

। ॥ २४५ ॥

मधु वातल (वात बढ़ाने वाला), गुरु और शीत है, और रक्तपित्त तथा कफ को दूर करने वाला है; (वह) सन्धाता (जोड़ने वाला), छेदन, रूक्ष, कषाय और मधुर है।

च. सू. २७/२४६

। ॥ २४६ ॥

विष से (अपने) सम्बन्ध के कारण उष्ण (गरम किया हुआ) मधु (मनुष्य को) मार सकता है, अथवा (मधु) उष्णता से पीड़ित (व्यक्ति) को (मार सकता है)। गुरु, रूक्ष और कषाय होने के कारण, तथा शीत होने के कारण, मधु थोड़ी मात्रा में (ही) हितकर है।

च. सू. २७/२४७

। ॥ २४७ ॥

इस मध्वाम (मधु से उत्पन्न आम) से अधिक कष्टदायक कुछ भी नहीं है, क्योंकि उपक्रम (चिकित्सा) का विरोधी होने के कारण वह मनुष्य को विष की तरह तुरन्त मार सकता है।

च. सू. २७/२४८

। ॥ २४८ ॥

आम में उष्णता वाली (गरमी देने वाली) चिकित्सा करनी चाहिए, (परन्तु) मध्वाम (मधु से बने आम) में वह (चिकित्सा) विरुद्ध पड़ती है। इसलिए मध्वाम भयंकर है; वह विष की तरह तुरन्त मार सकता है।

च. सू. २७/२४९

। ॥ २४९ ॥

और अनेक द्रव्यों के स्वभाव वाला होने के कारण मधु सबसे बढ़कर योगवाही है। इस प्रकार मुख्य रूप से ईख के विकारों (ईख से बने पदार्थों) वाला यह दसवाँ वर्ग माना गया है।

च. सू. २७/२५०

- । ॥ २५० ॥

अब कृतान्नवर्ग (पकाकर तैयार किए गए अन्नों का वर्ग)। पेया भूख, प्यास, ग्लानि (थकावट), दुर्बलता, कुक्षि (पेट) के रोगों और ज्वर को दूर करने वाली, स्वेद (पसीना) और अग्नि (पाचन-शक्ति) को उत्पन्न करने वाली, तथा वात और मल का अनुलोमन करने वाली (उन्हें नीचे की ओर ठीक दिशा में ले जाने वाली) है।

च. सू. २७/२५१

। ॥ २५१ ॥

विलेपिका (विलेपी) तृप्ति देने वाली, ग्राही (मल को बाँधने वाली), लघु (हल्की) और हृद्य (हृदय को प्रिय) भी है। मण्ड तो अग्नि को दीप्त करता है और वात का अनुलोमन भी करता है।

च. सू. २७/२५२

। ॥ २५२ ॥

(मण्ड) स्रोतों को मृदु (कोमल) करता है और स्वेद (पसीना) भी उत्पन्न करता है। लङ्घन किए हुए (उपवास आदि से हल्के किए गए) लोगों के लिए, विरेचन किए हुए लोगों के लिए, और स्नेह के पच जाने पर प्यासे लोगों के लिए

च. सू. २७/२५३

। ॥ २५३ ॥

दीपन (अग्नि को जगाने वाला) और लघु (हल्का) होने के कारण मण्ड (उनके लिए) प्राणों को धारण करने वाला होता है। सूखे (क्षीण) कण्ठ वाले व्यक्ति के लिए लाजपेया (खील की पेया) तो थकान मिटाने वाली है।

च. सू. २७/२५४

। ॥ २५४ ॥

लाजमण्ड (खील का माँड) तृष्णा (प्यास) और अतीसार (दस्त) को शान्त करने वाला, धातुओं को सम (सन्तुलित) करने वाला, शिव (हितकर), अग्नि को उत्पन्न करने वाला, तथा दाह (जलन) और मूर्च्छा (बेहोशी) को दूर करने वाला है।

च. सू. २७/२५५

। ॥ २५५ ॥

मन्द अग्नि और विषम अग्नि वालों को, बालकों, वृद्धों और स्त्रियों को, और सुकुमार (कोमल प्रकृति वाले) लोगों को भली-भाँति तैयार किया हुआ लाजमण्ड देना चाहिए।

च. सू. २७/२५६

। ॥ २५६ ॥

पिप्पली और शुण्ठी (सोंठ) के साथ पकाया गया और लाजा (खील) तथा खट्टे दाडिमों (अनारों) से युक्त (लाजमण्ड) भूख और प्यास को दूर करने वाला, पथ्य (हितकर), और शुद्ध (शोधन किए गए) लोगों के मल को दूर करने वाला है।

च. सू. २७/२५७

। ॥ २५७ ॥

लाजसक्तु (खील के सत्तू) कषाय और मधुर, शीत और लघु होते हैं। भली-भाँति धोया हुआ, (पकने पर माँड) निथारा हुआ, ठीक से पका हुआ और गरम ओदन (भात) लघु होता है।

च. सू. २७/२५८

। ॥ २५८ ॥

गर (कृत्रिम विष) और श्लेष्म (कफ) के रोगों में भी (वैद्य) भुने हुए चावल (का भात) चाहते हैं (उचित मानते हैं)। बिना धोया हुआ, बिना (माँड) निथारा हुआ, ठीक से न पका हुआ और ठण्डा ओदन (भात) गुरु (भारी) होता है।

च. सू. २७/२५९

। ॥ २५९ ॥

मांस, शाक, वसा, तैल, घृत, मज्जा और फलों के साथ (बने) ओदन बल देने वाले, सन्तर्पण (भली-भाँति तृप्त करने वाले), हृद्य (हृदय को प्रिय) और गुरु (भारी) होते हैं, और (शरीर को) पुष्ट करते हैं।

च. सू. २७/२६०

। ॥ २६० ॥

उसी प्रकार माष (उड़द), तिल, क्षीर (दूध) और मुद्ग (मूँग) के संयोग से बनाए गए (ओदन भी होते हैं)। कुल्माष गुरु (भारी), रूक्ष (रूखे), वात बढ़ाने वाले और मल को भेदने वाले (पतला करने वाले) होते हैं।

च. सू. २७/२६१

। ॥ २६१ ॥

सूप्य (दालों), गेहूँ और जौ से बने जो कोई भी स्विन्न भक्ष्य (उबालकर या भाप में पकाए गए खाद्य) हैं, वैद्य उनका गुरुत्व और लघुत्व (भारीपन और हल्कापन) उनके द्रव्य के अनुसार बताए।

च. सू. २७/२६२

। ॥ २६२ ॥

अकृत (बिना संस्कार किए) और कृत (संस्कार किए हुए) यूष को, पतले और सांस्कारिक (संस्कार किए हुए) रस को, तथा अम्ल (खट्टे) और अनम्ल (बिना खट्टे) सूप को उत्तरोत्तर (क्रम से) गुरु (भारी) जानना चाहिए।

च. सू. २७/२६३

। ॥ २६३ ॥

सक्तु (सत्तू) वातल (वात बढ़ाने वाले), रूक्ष, अधिक मल बनाने वाले और (मल का) अनुलोमन करने वाले होते हैं। पिए जाने पर वे मनुष्य को तुरन्त तृप्त करते हैं और तुरन्त बल देते हैं।

च. सू. २७/२६४

। ॥ २६४ ॥

शालि (धान) से बने सक्तु मधुर, लघु, शीत और ग्राही (मल को बाँधने वाले) होते हैं; वे रक्तपित्त को नष्ट करते हैं और तृष्णा (प्यास), छर्दि (उल्टी) तथा ज्वर को दूर करते हैं।

च. सू. २७/२६५

।॥ २६५ ॥

जौ का अपूप, यावक और वाड्य भी उदावर्त, प्रतिश्याय (जुकाम), कास (खाँसी), मेह (मूत्र के रोग) और गलग्रह (गले की जकड़न), इन रोगों को नष्ट करते हैं।

च. सू. २७/२६६

। ॥ २६६ ॥

धाना नाम वाले जो भक्ष्य हैं, वे तो प्रायः लेखन (शरीर को कृश करने वाले) स्वभाव के होते हैं; सूखे होने के कारण वे तर्पण भी हैं, और विष्टम्भी होने के कारण कठिनाई से पचते हैं।

च. सू. २७/२६७

। ॥ २६७ ॥

विरूढधाना (अंकुरित अन्न की धाना), शष्कुलियाँ, पिण्डकों सहित मधुक्रोड, पूप और पूपलिका आदि पैष्टिक (आटे से बने भक्ष्य) अत्यन्त गुरु होते हैं।

च. सू. २७/२६८

। ॥ २६८ ॥

फल, मांस, वसा (चर्बी), शाक, पलल और क्षौद्र (शहद) से तैयार किए गए भक्ष्य वृष्य, बल्य (बल देने वाले), गुरु और बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाले) स्वभाव के होते हैं।

च. सू. २७/२६९

। ॥ २६९ ॥

वेशवार गुरु, स्निग्ध और बल तथा उपचय (शरीर की पुष्टि) को बढ़ाने वाला है। दूध और इक्षुरस (ईख के रस) के पूपक गुरु, तर्पण और वृष्य होते हैं।

च. सू. २७/२७०

। ॥ २७० ॥

गुड़ सहित, तिल सहित, और दूध, क्षौद्र (शहद) तथा शर्करा (शक्कर) सहित (बनाए गए) भक्ष्य वृष्य और बल्य होते हैं, परन्तु (वे) अत्यन्त गुरु माने गए हैं।

च. सू. २७/२७१

। ॥ २७१ ॥

स्नेह (घी, तेल आदि) सहित और स्नेह में पकाए गए, अनेक प्रकार के, गेहूँ से बने भक्ष्य गुरु, तर्पण, वृष्य और हृद्य माने गए हैं।

च. सू. २७/२७२

। ॥ २७२ ॥

गेहूँ और आटे से बने भक्ष्य संस्कार (बनाने की विधि) के कारण लघु (भी) होते हैं। धाना, पर्पट (पापड़), पूप आदि (जो भक्ष्य हैं), उन्हें समझकर (वैद्य उनके गुण) वैसे ही बताए।

च. सू. २७/२७३

। ॥ २७३ ॥

पृथुक (चिउड़ा) गुरु होते हैं; उन्हें भूनकर, और थोड़ी मात्रा में ही, खाना चाहिए। जौ के (पृथुक) विष्टम्भ करके (रुकावट पैदा करते हुए) पचते हैं, सरस होते हैं और मल को पतला करते हैं।

च. सू. २७/२७४

। ॥ २७४ ॥

सूप्य अन्न (दालों) से बने भक्ष्य वातल (वात बढ़ाने वाले), रूक्ष और शीतल होते हैं। उन्हें तो कटु (तीखे पदार्थों), स्नेह और लवण के साथ, थोड़ी मात्रा में खाना चाहिए।

च. सू. २७/२७५

। ॥ २७५ ॥

जो भक्ष्य मृदु पाक वाले (हल्के पके) हैं, और जो स्थूल (मोटे) और कठिन (कड़े) हैं, वे गुरु होते हैं; उनका पाक देर से होता है, और वे पुष्टि तथा बल देते हैं।

च. सू. २७/२७६

। ॥ २७६ ॥

द्रव्यों के संयोग और संस्कार को, तथा द्रव्यों के मान (मात्रा) को अलग-अलग समझकर, (वैद्य) भक्ष्यों की गुरुता और लघुता (उनके) अपने-अपने अनुसार बताए।

च. सू. २७/२७७

( । ॥)

[पके, कच्चे, भिगोए हुए और भुने हुए अनेक द्रव्यों से युक्त विमर्दक गुरु, हृद्य और वृष्य होता है; (यह) बलवान लोगों के लिए हितकर है।]

च. सू. २७/२७८

। ॥ २७८ ॥

रसाला बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाली), वृष्य (वीर्य बढ़ाने वाली), स्निग्ध (चिकनाई वाली), बल्य (बल देने वाली) और रुचि देने वाली होती है। गुड़ सहित दधि (दही) स्नेहन (चिकनाई पहुँचाने वाला), तर्पण (तृप्त करने वाला), हृद्य (हृदय को प्रिय) और वात को नष्ट करने वाला होता है।

च. सू. २७/२७९

। ॥ २७९ ॥

द्राक्षा (अंगूर), खर्जूर (खजूर) और कोल (बेर) का, परूषक (फालसा) का, क्षौद्र (मधु) का, और जो इक्षु के विकारों (गन्ने से बने द्रव्यों) से (बनता है), (वह) पानक (पेय) गुरु (भारी) और विष्टम्भी (पेट में रुकावट करने वाला) होता है।

च. सू. २७/२८०

। ॥ २८० ॥

उन पानकों के कटु (तीखे) और अम्ल (खट्टे) (द्रव्यों के साथ) संयोगों को, और (उनके) द्रव्य और मान (मात्रा) को अलग-अलग जानकर, (वैद्य उनके) गुण और कर्म बताए।

च. सू. २७/२८१

। ॥ २८१ ॥

कटु, अम्ल, स्वादु (मधुर) और लवण (रसों वाले) राग और षाडव लघु (हल्के), मुख को प्रिय, हृद्य (हृदय को प्रिय), दीपन (अग्नि को जगाने वाले) और भोजन में रुचि जगाने वाले होते हैं।

च. सू. २७/२८२

। ॥ २८२ ॥

और आम्र (आम) तथा आमलक (आँवला) के लेह (चाटकर खाए जाने वाले अवलेह) (अपनी) स्निग्धता, मधुरता और गुरुता (भारीपन) के कारण बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाले), बल बढ़ाने वाले, रोचन (रुचि जगाने वाले) और तर्पण (तृप्त करने वाले) कहे गए हैं।

च. सू. २७/२८३

। ॥ २८३ ॥

संयोग (द्रव्यों का मेल) और संस्कार (तैयार करने की विधि) को, और उन पर आश्रित द्रव्यों के मान (मात्रा) को जानकर, (वैद्य) उन-उन लेहों के गुण और कर्म उसी प्रकार बताए।

च. सू. २७/२८४

। ॥ २८४ ॥

शुक्त रक्त, पित्त और कफ का उत्क्लेद करने वाला (उन्हें उभारने वाला) और वात का अनुलोमन करने वाला (उसे सही दिशा में चलाने वाला) है। और उसमें आसुत (रखकर खमीर उठाए गए) कन्द, मूल, फल आदि को भी (वैद्य) वैसा ही जाने।

च. सू. २७/२८५

। ॥ २८५ ॥

शिण्डाकी और दूसरा आसुत (खमीर उठाकर बनाया गया द्रव्य), जो समय बीतने से अम्ल (खट्टा) हो गया हो, रोचन (रुचि जगाने वाला) और लघु (हल्का) होता है। वैद्य इसे कृतान्नों (तैयार किए गए भोजनों) का ग्यारहवाँ वर्ग जाने।

च. सू. २७/२८६

। ॥ २८६ ॥

(तैल) कषाय (कसैले) अनुरस वाला, स्वादु (मधुर), सूक्ष्म, उष्ण और व्यवायी, पित्त बढ़ाने वाला, मल और मूत्र को बाँधने वाला, और श्लेष्मा (कफ) को न बढ़ाने वाला,

च. सू. २७/२८७

। ॥ २८७ ॥

वात को नष्ट करने वाले (द्रव्यों) में उत्तम, बल्य (बल देने वाला), और मेधा (बुद्धि) तथा अग्नि को बढ़ाने वाला (है)। संयोग (दूसरे द्रव्यों के साथ मेल) और संस्कार (तैयार करने की विधि) से तैल सब रोगों को दूर करने वाला माना गया है।

च. सू. २७/२८८

। ॥ २८८ ॥

प्राचीन काल में दैत्यों के अधिपति (राजा) तैल के प्रयोग से अजर (बुढ़ापे से रहित), निर्विकार (रोगों से रहित) और थकान को जीत लेने वाले थे, और युद्ध में अत्यन्त बलवान थे।

च. सू. २७/२८९

। ॥ २८९ ॥

ऐरण्ड तैल (अरंडी का तेल) मधुर, गुरु (भारी) और श्लेष्मा (कफ) को बढ़ाने वाला है; (वह) वातासृक् (वातरक्त), गुल्म, हृद्रोग (हृदय के रोग) और जीर्णज्वर (पुराने ज्वर) को हरने में श्रेष्ठ है।

च. सू. २७/२९०

। ॥ २९० ॥

सार्षप (सरसों का) तैल कटु (तीखा) और उष्ण है, रक्त और पित्त को दूषित करने वाला है, कफ, शुक्र और अनिल (वात) को हरने वाला है, और कण्डू (खुजली) तथा कोठ (त्वचा पर उभरे चकत्तों) को नष्ट करने वाला है।

च. सू. २७/२९१

। ॥ २९१ ॥

प्रियाल (चिरौंजी) का तैल मधुर, गुरु (भारी) और श्लेष्मा (कफ) को बढ़ाने वाला है। अत्यधिक उष्ण न होने के कारण (वैद्य) इसे वात और पित्त के संयोग में हितकर मानते हैं।

च. सू. २७/२९२

। ॥ २९२ ॥

आतस्य (अलसी का तैल) मधुर और अम्ल है, परन्तु विपाक में कटु है; तथा (वह) उष्ण वीर्य वाला, वात में हितकर और रक्त तथा पित्त को प्रकुपित करने वाला है।

च. सू. २७/२९३

। ॥ २९३ ॥

कुसुम्भ (कुसुम) का तैल उष्ण, विपाक में कटु और गुरु (भारी) है; और विदाही (जलन उत्पन्न करने वाला) है, और विशेष रूप से सब दोषों को प्रकुपित करने वाला है।

च. सू. २७/२९४

। ॥ २९४ ॥

और फलों के जो अन्य तेल आहार की व्यवस्था (भोजन बनाने) में प्रयोग किए जाते हैं, उन्हें गुण और कर्म की दृष्टि से (उनके अपने) फल के अनुसार बताना चाहिए।

च. सू. २७/२९५

। ॥ २९५ ॥

मज्जा तथा वसा (चर्बी) मधुर, बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाली), वृष्य (वीर्य बढ़ाने वाली) और बल देने वाली हैं। परन्तु वसा और मज्जा की शीतलता और उष्णता (जिस) प्राणी (की वे हैं, उस) के अनुसार बतानी चाहिए।

च. सू. २७/२९६

। ॥ २९६ ॥

विश्वभेषज (सोंठ) स्नेह (चिकनाई) से युक्त, दीपन (जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाला), वृष्य, उष्ण, वात और कफ को दूर करने वाला, विपाक में मधुर, हृद्य (हृदय को प्रिय) और रोचन (रुचि बढ़ाने वाला) है।

च. सू. २७/२९७

। ॥ २९७ ॥

गीली (ताज़ी) पिप्पली श्लेष्मा (कफ) बढ़ाने वाली, मधुर, गुरु (भारी) और स्निग्ध होती है। वही सूखी (होने पर) कफ और वात को नष्ट करने वाली, कटु और उष्ण है, और वृष्य मानी गई है।

च. सू. २७/२९८

। ॥ २९८ ॥

मरिच (काली मिर्च) बहुत अधिक उष्ण नहीं है; (वह) अवृष्य (वीर्य न बढ़ाने वाला), लघु और रोचन (रुचि बढ़ाने वाला) है। छेदी (काटने वाला) और शोषण (सुखाने वाला) होने के कारण (वह) दीपन और कफ तथा वात को जीतने वाला है।

च. सू. २७/२९९

। ॥ २९९ ॥

हिङ्गु (हींग) को वात, श्लेष्मा (कफ) और विबन्ध (मल-वायु की रुकावट) को नष्ट करने वाला, कटु, उष्ण, दीपन, लघु, शूल (तीव्र पीड़ा) को शान्त करने वाला, पाचन और रोचन जानना चाहिए।

च. सू. २७/३००

। ॥ ३०० ॥

लवणों में उत्तम सैन्धव (सेंधा नमक) रोचन, दीपन, वृष्य, चक्षुष्य (आँखों के लिए हितकर) और अविदाही (जलन न करने वाला) है, तीनों दोषों को नष्ट करने वाला है और मधुरता लिए हुए है।

च. सू. २७/३०१

। ॥ ३०१ ॥

सूक्ष्मता, उष्णता, लघुता और सुगन्ध के कारण सौवर्चल रुचि देने वाला है; (वह) विबन्ध (मल-वायु की रुकावट) को नष्ट करने वाला, हृद्य और उद्गार (डकार) को शुद्ध करने वाला (भी) है।

च. सू. २७/३०२

। ॥ ३०२ ॥

तीक्ष्णता, उष्णता और व्यवायी (शीघ्र पूरे शरीर में फैलने वाला) होने के कारण बिड दीपन और शूल को नष्ट करने वाला है, और ऊपर तथा नीचे (दोनों ओर) वातों का आनुलोम्य (स्वाभाविक दिशा में गति) करने वाला है।

च. सू. २७/३०३

। ॥ ३०३ ॥

औद्भिद (लवण) तिक्त और कटु (रस) से युक्त, क्षार से युक्त, तीक्ष्ण और उत्क्लेदी (क्लेद उभारने वाला) है। काललवण में गन्ध नहीं होती, और (उसके) वे (गुण) सौवर्चल के (ही) गुण हैं।

च. सू. २७/३०४

, । ॥ ३०४ ॥

सामुद्रक (समुद्र का लवण) मधुरता लिए हुए है; पांशुज (मिट्टी से उत्पन्न लवण) कटु है और तिक्तता लिए हुए है। सब (प्रकार का) लवण रोचन, पाकी (पकाने वाला), स्रंसी (मल को नीचे खिसकाने वाला) और अनिल (वात) को दूर करने वाला है।

च. सू. २७/३०५

। ॥ ३०५ ॥

यावशूक (यवक्षार) हृदय-रोग, पाण्डु, ग्रहणी रोग, प्लीहा (तिल्ली के रोग), आनाह (पेट का फूलना), गलग्रह (गले की जकड़न), कफ से उत्पन्न कास (खाँसी) और अर्श (बवासीर) को दूर करता है।

च. सू. २७/३०६

। ॥ ३०६ ॥

सब (प्रकार का) क्षार तीक्ष्ण, उष्ण, लघु और रूक्ष, क्लेदी (गीलापन उत्पन्न करने वाला), पक्ता (पकाने वाला), विदारण (फाड़ने वाला), दाहन (जलाने वाला), दीपन और छेत्ता (काटने वाला) है; (वह) अग्नि के समान है।

च. सू. २७/३०७

। ॥ ३०७ ॥

कारवी, कुञ्चिका, अजाजी, यवानी (अजवायन), धान्य (धनिया) और तुम्बुरु (ये सब) रोचन, दीपन और वात, कफ तथा दुर्गन्ध को नष्ट करने वाले हैं।

च. सू. २७/३०८

। ॥ ३०८ ॥

परन्तु आहारयोगियों (आहार के साथ प्रयोग होने वाले द्रव्यों) की भक्ति (रुचि) का कोई निश्चय नहीं है। और यह आहारयोगियों का बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ।

च. सू. २७/३०९

। ॥ ३०९ ॥

शूकधान्य (शूक वाले अनाज) और शमीधान्य (फली वाले अनाज) एक वर्ष बीत जाने पर प्रशस्त माने जाते हैं। पुराना (अनाज) प्रायः रूक्ष होता है, (और) नया प्रायः गुरु (भारी) होता है।

च. सू. २७/३१०

। ॥ ३१० ॥

जो-जो (अनाज) जल्दी आता है, वह-वह अधिक लघु माना गया है। भूसी रहित और युक्ति से (उचित ढंग से) भुना हुआ सूप्य (दाल बनाने योग्य अन्न) लघु रूप से (सहजता से) पचता है।

च. सू. २७/३११

। ॥ ३११ ॥

मरे हुए, दुबले, बहुत अधिक चर्बी वाले, बूढ़े, बहुत छोटी आयु के, विषों से मारे गए, अपने गोचर (विचरण-क्षेत्र) से बाहर पाले गए और व्याल (हिंसक जन्तु) द्वारा मारे गए (पशु के) मांस को त्याग देना चाहिए।

च. सू. २७/३१२

। ॥ ३१२ ॥

इनसे भिन्न (पशुओं का) मांस हितकर, बृंहण (शरीर को पुष्ट करने वाला) और बल बढ़ाने वाला है। मांसरस सब प्राणियों को तृप्त करने वाला, हृद्य (मन को भाने वाला) और परम (सर्वोत्तम) है।

च. सू. २७/३१३

। ॥ ३१३ ॥

जो सूखते (क्षीण होते) जा रहे हैं, जो रोग से मुक्त हुए हैं, जो कृश (दुबले) हैं, जिनका रेतस् (शुक्र) क्षीण हो गया है, और जो बल तथा वर्ण (शरीर की कान्ति) चाहते हैं, उनके लिए रस (मांसरस) को अमृत के समान जानना चाहिए।

च. सू. २७/३१४

। ॥ ३१४ ॥

यथास्व (अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार) दिए गए रस (मांसरस) को सब रोगों को शान्त करने वाला, स्वर के लिए हितकर, और वय (आयु की अवस्था), बुद्धि, इन्द्रियों तथा आयु को बल देने वाला जानना चाहिए।

च. सू. २७/३१५

। ॥ ३१५ ॥

जो मनुष्य नित्य व्यायाम करने वाले, नित्य स्त्री-सेवन करने वाले और नित्य मद्य पीने वाले हैं, वे (यदि) नित्य मांसरस का आहार लें तो न आतुर (रोगी) होंगे, न दुर्बल।

च. सू. २७/३१६

। ॥ ३१६ ॥

कृमि, वात (हवा) और आतप (धूप) से नष्ट हुआ, सूखा, जीर्ण (पुराना), अनार्तव (बेमौसम), बिना स्नेह (घी-तेल) के पकाया हुआ, और जो अपरिस्रुत (निचोड़ा न गया) हो, ऐसा शाक त्याग देना चाहिए।

च. सू. २७/३१७

। ॥ ३१७ ॥

जो फल पुराना, कच्चा, कृमि, व्याल (हिंसक जन्तुओं), हिम (पाले) और आतप (धूप) से बिगड़ा हुआ, अनुचित देश और काल में उत्पन्न, और क्लिन्न (गला हुआ) हो, वह अच्छा नहीं है।

च. सू. २७/३१८

। ॥ ३१८ ॥

हरितों (हरी वनस्पतियों) का निर्देश, साधन (तैयार करने की विधि) को छोड़कर, शाक के समान है। मद्य, जल, गोरस आदि का विनिश्चय अपने-अपने वर्ग में (किया गया) है।

च. सू. २७/३१९

। ॥ ३१९ ॥

जो पान (पेय) आहार के गुणों से विपरीत हो, वह (अनुपान के रूप में) इष्ट है; और अन्न का अनुपान (वह हो) जो धातुओं का विरोधी न देखा गया हो।

च. सू. २७/३२०

। ॥ ३२० ॥

(पहले) बताए गए चौरासी आसवों की, और पीने योग्य तथा न पीने योग्य जल की परीक्षा करके, (मनुष्य) हितकर (पेय) को अनुपान के रूप में पिए।

च. सू. २७/३२१

। ॥ ३२१ ॥

मारुत (वात) में स्निग्ध और उष्ण (अनुपान) प्रशस्त है, पित्त में मधुर और शीतल, कफ में अनुपान रूक्ष और उष्ण (हो), और क्षय में मांसरस परम (सर्वोत्तम) है।

च. सू. २७/३२२

। ॥ ३२२ ॥

उपवास, मार्ग चलने, (अधिक) बोलने, स्त्री-सेवन, वायु, धूप और (शारीरिक) कर्म से थके हुए लोगों के लिए अनुपान के रूप में पयस् (दूध) अमृत के समान पथ्य (हितकर) है।

च. सू. २७/३२३

। ॥ ३२३ ॥

कृश (दुबले) लोगों के लिए पुष्टि के लिए सुरा अनुपान के रूप में विहित की जाती है; और स्थूल शरीर वालों के लिए कार्श्य (शरीर घटाने) के लिए बाद में मधूदक (मधु मिला जल) प्रशस्त है।

च. सू. २७/३२४

। ॥ ३२४ ॥

जिनकी अग्नि (पाचन-शक्ति) मन्द है, जिन्हें तन्द्रा, शोक, भय और क्लम (थकान) के कारण नींद नहीं आती, और जो मद्य तथा मांस के अभ्यस्त हैं, उनके लिए (अनुपान के रूप में) मद्य ही प्रशस्त माना जाता है।

च. सू. २७/३२५

, , , , , , , , , , ॥ ३२५ ॥

अब हम अनुपान के कर्म और गुण कहेंगे। अनुपान तृप्त करता है, प्रसन्न करता है, ऊर्जा देता है, बृंहण करता (शरीर को पुष्ट करता) है, पर्याप्ति (भरपूर तृप्ति) उत्पन्न करता है, खाए हुए (भोजन) को नीचे बैठाता है, अन्न के संघात (ठोस पिंड) को तोड़ता है, मृदुता लाता है, क्लेदन करता (गीला करता) है, पचाता है, और आहार में सुख से परिणत होने (पचने) का गुण और आशु-व्यवायिता (शीघ्र फैलने का गुण) उत्पन्न करता है।

च. सू. २७/३२६

। ॥ ३२६ ॥

और यहाँ (इस विषय में यह श्लोक) है: हितकर और उचित रीति से दिया गया अनुपान मनुष्य को शीघ्र तृप्त करता है, आहार को सुख से पचाता है, और आयु तथा बल के लिए (होता) है।

च. सू. २७/३२७

। ॥ ३२७ ॥

न तो शरीर के ऊपरी अंगों में मारुत (वात) से ग्रस्त (लोग), न हिक्का, श्वास और कास (खाँसी) के रोगी, न गीत, भाष्य (बोलने) और अध्ययन में लगे रहने वाले, (और) न उरस् (छाती) में क्षत (घाव) वाले (लोग)

च. सू. २७/३२८

। ॥ ३२८ ॥

भोजन करके जल (न) पिएँ; क्योंकि वह (जल) कण्ठ और उरस् (छाती) में ठहरकर, आहार से उत्पन्न स्नेह (चिकनाई) को नष्ट करके, और अधिक दोष (विकार) का कारण बनता है।

च. सू. २७/३२९

। ॥ ३२९ ॥

यह अन्न-पान (के विषय) का एक अंश कहा गया है, जो प्रायः उपयोग में आता है; क्योंकि द्रव्यों को नामों से पूरी तरह बताना सम्भव नहीं है।

च. सू. २७/३३०

। ॥ ३३० ॥

जैसे कोई भी (द्रव्य) ऐसा नहीं जो औषध न हो, और जैसा (उस) देश में जन्मे (लोगों) का वचन हो, वैसे ही जो द्रव्य यहाँ नहीं कहा गया हो, उस-उस (द्रव्य) का वर्णन करना चाहिए।

च. सू. २७/३३१

। ॥ ३३१ ॥

चर, शरीर के अवयव, स्वभाव, धातुएँ, क्रिया, लिङ्ग, प्रमाण, संस्कार और मात्रा - इस (आहार-द्रव्य) में (इनकी) परीक्षा की जाती है।

च. सू. २७/३३२

। ॥ ३३२ ॥

चर (का अर्थ है) अनूप (जल-भरी भूमि), जल, आकाश, धन्व (सूखी भूमि) आदि (विचरण-स्थान), (और) भक्ष्य-संविधि (भोजन का प्रकार)। जल में जन्मे और अनूप में जन्मे, तथा जो जल और अनूप में विचरने वाले हैं

च. सू. २७/३३३

। ॥ ३३३ ॥

और जो प्राणी गुरु (भारी) भोजन खाने वाले हैं, वे सब गुरु माने गए हैं। परन्तु लघु (हल्का) भोजन खाने वाले, धन्व (सूखी भूमि) में जन्मे और धन्व में विचरने वाले (प्राणी) लघु (होते हैं)।

च. सू. २७/३३४

। ॥ ३३४ ॥

इसी प्रकार शरीर के अवयव (से अभिप्राय) सक्थि (जाँघ), शिर (सिर), स्कन्ध (कन्धा) आदि (अंगों) से है। सक्थि के मांस से स्कन्ध गुरु (भारी) है, उससे (अधिक गुरु) क्रोड (छाती का भाग), (और) उससे (अधिक गुरु) सिर।

च. सू. २७/३३५

। ॥ ३३५ ॥

वृषण (अण्डकोष), चर्म (चमड़ी), मेढ्र (शिश्न), श्रोणि (कूल्हे), वृक्क (गुर्दे), यकृत् (जिगर) और गुद (गुदा), तथा मध्य (भाग) और अस्थि (हड्डी) को भी, अपने-अपने मांस से अधिक गुरु (भारी) जानना चाहिए।

च. सू. २७/३३६

। ॥ ३३६ ॥

मुद्ग (मूँग), और वैसे ही लाव (लवा) और कपिञ्जल, स्वभाव से लघु (हल्के) हैं; माष (उड़द), और वैसे ही वराह (सूअर) और महिष (भैंसा), स्वभाव से गुरु (भारी) हैं।

च. सू. २७/३३७

। ॥ ३३७ ॥

शोणित (रक्त) आदि धातुओं में उत्तरोत्तर (हर अगली धातु) को (पिछली से) गुरु (भारी) जानना चाहिए। जो प्राणी बहुत क्रियाशील हैं, वे आलसी (प्राणियों) से विशिष्ट (बढ़कर) होते हैं।

च. सू. २७/३३८

। ॥ ३३८ ॥

लिङ्ग की समानता में (एक ही प्रकार के प्राणियों में) नरों में गौरव (भारीपन) होता है, परन्तु मादाओं में लाघव (हल्कापन)। अपनी जाति में बड़े प्रमाण (आकार) वाले (प्राणी) गुरु (भारी) होते हैं, अन्यथा (छोटे आकार वाले) लघु (हल्के)।

च. सू. २७/३३९

। ॥ ३३९ ॥

संस्कार (तैयार करने की प्रक्रिया) से गुरु (द्रव्यों) का लाघव (हल्का होना) जानना चाहिए, और इसका उलटा भी; जैसे व्रीहि (धान) से लाजा (खील) होती हैं, और सक्तु (सत्तू) से सिद्ध पिण्डिकाएँ (पकाए हुए गोले)।

च. सू. २७/३४०

। ॥ ३४० ॥

गुरु (द्रव्यों) को थोड़ा लेने में और लघु (द्रव्यों) के अधिक सेवन में, द्रव्यों के गुरु-लाघव (भारीपन और हल्केपन) में मात्रा को कारण बताया गया है।

च. सू. २७/३४१

। ॥ ३४१ ॥

गुरु (द्रव्यों) का थोड़ा (भाग) लेना चाहिए, लघु (द्रव्यों) की तृप्ति (तृप्त होने तक लेना) उचित मानी जाती है। द्रव्य मात्रा की अपेक्षा रखते हैं, और मात्रा अग्नि की अपेक्षा रखती है।

च. सू. २७/३४२

। ॥ ३४२ ॥

बल, आरोग्य (नीरोगता), आयु और प्राण अग्नि में प्रतिष्ठित (टिके हुए) हैं। और अग्नि अन्न-पान रूपी इन्धन से जलती है, अन्यथा (उसके बिना) बुझ जाती है।

च. सू. २७/३४३

। ॥ ३४३ ॥

गुरु-लघु (भारी और हल्के) का यह विचार प्रायः उन (लोगों) के लिए है जो अल्प बल वाले, मन्द क्रिया (कम परिश्रम) वाले, अस्वस्थ, सुकुमार (कोमल) और सुख के अभ्यस्त हैं।

च. सू. २७/३४४

। ॥ ३४४ ॥

जो मनुष्य दीप्त (तेज) अग्नि वाले, खर (कठोर, रूखा) आहार करने वाले, नित्य कर्म (परिश्रम) में लगे रहने वाले और बड़े उदर (पेट) वाले हैं, उनके प्रति गुरु-लाघव (भारीपन और हल्केपन) का विचार अवश्य करने योग्य नहीं है।

च. सू. २७/३४५

। ॥ ३४५ ॥

मनुष्य समाहित (एकाग्र) होकर, मात्रा और काल का विचार करते हुए, हितकर अन्न-पान रूपी समिधाओं से नित्य अन्तराग्नि (भीतर की अग्नि) में होम करे।

च. सू. २७/३४६

। ॥ ३४६ ॥

जो सदा पथ्य (हितकर वस्तुओं) का अन्तराग्नि (भीतर की अग्नि) में होम करता है, (वह) आहिताग्नि (है); (वह) दिन-प्रतिदिन ब्रह्म (वेद-मन्त्रों) का जप करता है और (दान) देता है।

च. सू. २७/३४७

। ॥ ३४७ ॥

निःश्रेयस (परम कल्याण) में लगे हुए और खान-पान में सात्म्य (अपने अनुकूल) को जानने वाले मनुष्य को कोई (भी) रोग, भावी (होने वाले) रोग भी, किसी अन्तर (अवसर या कारण) के बिना नहीं घेरते।

च. सू. २७/३४८

। ॥ ३४८ ॥

हितकर भोजन करने वाला, जितात्मा (अपने मन को वश में रखने वाला), सज्जनों द्वारा सम्मानित प्राणी छत्तीस हज़ार रातों तक अनातुर (रोग-रहित) होकर जीता है।

च. सू. २७/३४९

। ॥ ३४९ ॥

प्राणभृतों (प्राणियों) के प्राण अन्न है; लोक (संसार) अन्न की ओर दौड़ता है। वर्ण (कान्ति), प्रसाद (प्रसन्नता), सौस्वर्य (स्वर की मधुरता), जीवन, प्रतिभा, सुख,

च. सू. २७/३५०

। ॥ ३५० ॥

तुष्टि (सन्तोष), पुष्टि (पोषण), बल, मेधा (बुद्धि), (यह) सब अन्न में प्रतिष्ठित है। जो लौकिक (सांसारिक) कर्म वृत्ति (आजीविका) के लिए है, और जो वैदिक (कर्म) स्वर्ग-प्राप्ति के लिए है,

च. सू. २७/३५१

। ॥ ३५१ ॥

और जो कर्म अपवर्ग (मोक्ष) के लिए कहा गया है, वह भी अन्न में प्रतिष्ठित है। यहाँ (अध्याय के सार का) श्लोक है: अन्न-पान के गुण, अग्र्य (श्रेष्ठ द्रव्यों) सहित निश्चित किए गए बारह वर्ग,

च. सू. २७/३५२

। ॥ ३५२ ॥

गुणों सहित अनुपान, और गुरु-लाघव (भारीपन और हल्केपन) का संग्रह (सार), (यह सब) अन्नपानविधि (इस अध्याय) में कहा गया है; उसे विशेष रूप से परखना चाहिए।

च. सू. २७

॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में अन्नपानविधि नामक सत्ताईसवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।