भारत संहिता

अध्याय २८

विविधाशितपीतीयोऽध्यायः

विविध खाद्य और पेय (आहार से धातुओं का पोषण)

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भूमिका

विविधाशितपीतीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का अट्ठाईसवाँ अध्याय है। इसका नाम इसके पहले विषय-वाक्य के आरम्भिक शब्दों 'विविधम् अशितं पीतम्' से बना है, जिनका अर्थ है 'विविध प्रकार से खाया और पिया गया (आहार)'; और इसका विषय भी यही है: आहार शरीर की धातुओं का पोषण कैसे करता है, और हित (हितकर) या अहित (अहितकर) आहार से क्या अन्तर पड़ता है। उपदेश भगवान् आत्रेय का है, और बीच में उनके शिष्य अग्निवेश एक प्रश्न रखते हैं। अध्याय क्रम से चार बातें बताता है: आहार से धातुओं का पोषण; हर धातु के बिगड़ने से होने वाले रोग और उनकी चिकित्सा; दोषों का कोष्ठ और शाखाओं के बीच आना-जाना; और परखकर चलने वाले तथा साधारण मनुष्य का भेद, जिससे आहार को परखकर लेने की बात निकलती है।

आत्रेय बताते हैं कि अशित (खाया), पीत (पिया), लीढ (चाटा) और खादित (चबाया) गया हितकर आहार, भीतर की अग्नि से प्रज्वलित ऊष्मा से भली-भाँति पचकर, शरीर को पुष्टि, बल, वर्ण, सुख और आयु से युक्त करता है। पचे आहार से दो भाग बनते हैं: रस, जो उसका सार (प्रसाद) है, और किट्ट, यानी असार भाग, जिसे मल कहा गया है। किट्ट से स्वेद, मूत्र, पुरीष, वात, पित्त और कफ, कान, आँख, नाक आदि के मल, और केश, नख जैसे अवयव पुष्ट होते हैं; रस से रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र और ओज, इन्द्रियों के द्रव्य, और शरीर की सन्धियाँ जैसे अवयव। अध्याय दोनों समूहों को धातु कहता है: एक को मल नाम वाली, दूसरी को प्रसाद नाम वाली। अपने उचित परिमाण में रहकर रस और मल शरीर का धातु-साम्य, यानी धातुओं का सन्तुलन, बनाए रखते हैं; किसी कारण से धातुएँ घट या बढ़ जाएँ, तो रस उनमें फिर साम्य लाता है, और किट्ट यही मलों के लिए करता है। पोषण स्रोतों, यानी शरीर के भीतर के मार्गों, से होकर धातुओं तक पहुँचता है। आत्रेय का निष्कर्ष है कि यह शरीर भी आहार से बना है और इसके रोग भी आहार से होते हैं, और शुभ और अशुभ का अन्तर हित और अहित आहार के उपयोग से पड़ता है।

इस पर अग्निवेश पूछते हैं कि हितकर आहार लेने वाले भी रोगी और निरोग, दोनों तरह के दिखते हैं, और अहितकर आहार लेने वाले भी, तो यह अन्तर आहार से बना कैसे माना जाए? आत्रेय उत्तर देते हैं कि हितकर आहार से रोग नहीं होते, पर केवल उसी से सब रोगों का भय नहीं मिटता, क्योंकि रोग के और भी कारण हैं: काल का विपर्यय (उलट-फेर), प्रज्ञापराध (बुद्धि का अपराध), और असात्म्य (प्रतिकूल) शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध। और अहितकर आहार तुरन्त हानि नहीं करता, क्योंकि सब अपथ्य एक-से हानिकर नहीं होते, सब दोष एक-से बलवान् नहीं होते, और सब शरीर रोग का सामना करने में एक-से समर्थ नहीं होते। देश, काल, संयोग, वीर्य और प्रमाण के अतियोग से अपथ्य और अधिक हानिकर हो जाता है; गहराई तक पहुँचा, पुराना, या मर्मों पर आघात करने वाला दोष अधिक कष्टकारी होता है; और बहुत मोटे, बहुत दुबले, दुर्बल या अल्प सत्त्व वाले शरीर रोग नहीं सह पाते। इन्हीं भेदों से कोई रोग मृदु होता है, कोई दारुण, कोई जल्दी उठता है और कोई देर से।

फिर आत्रेय गिनाते हैं कि दोष किस धातु में बिगड़कर कौन-से रोग उत्पन्न करते हैं: रस में अश्रद्धा, अरुचि, भारीपन, ज्वर, पाण्डुता, असमय झुर्रियाँ और बालों का पकना; रक्त में कुष्ठ, वीसर्प, रक्तपित्त, कामला और त्वचा के कई विकार; मांस में अर्बुद, गण्ड, गण्डमाला और मांस का सड़ना; मेद में निन्दित विकार और प्रमेह के पूर्वरूप; अस्थि में हड्डी पर हड्डी और अतिरिक्त दाँत, और दाँतों और हड्डियों की पीड़ा; मज्जा में जोड़ों की पीड़ा, चक्कर और मूर्छा; और शुक्र में नपुंसकता, जिसका कष्ट सन्तान और पत्नी तक पहुँचता है। इसके बाद इन्द्रियों के, स्नायु, सिरा और कण्डरा के, और मलों के विकार आते हैं। अध्याय कहता है कि ये सब अहितकर आहार से होते हैं, और फिर हर समूह की चिकित्सा संक्षेप में बताता है, कई जगह दूसरे अध्यायों का नाम लेकर, जैसे विधिशोणितीय, अष्टौनिन्दितीय, त्रिमर्मीय और नवेगान्धारणीय। उसके बाद वह बताता है कि व्यायाम, ऊष्मा की तीक्ष्णता, हितकर आचरण के पालन न करने और वायु की तेज़ गति से दोष कोष्ठ से शाखाओं में चले जाते हैं (सूत्रस्थान का ग्यारहवाँ अध्याय कोष्ठ को शरीर का मध्य भाग और शाखा को रक्त आदि धातुएँ और त्वचा कहता है); वहाँ वे कुपित होने के लिए हेतु की प्रतीक्षा करते हैं, और वृद्धि, विष्यन्दन, पाक, स्रोतों के मुखों के खुलने और वायु के वश में आने से फिर कोष्ठ में लौट आते हैं।

अन्तिम भाग कहता है कि सब प्राणियों की सब प्रवृत्तियाँ सुख के लिए होती हैं, पर ज्ञान और अज्ञान के भेद से कोई सही मार्ग पर चलता है और कोई गलत पर। परीक्षक, यानी परखकर चलने वाले, हित को अपनाते हैं, और उनमें श्रुत, बुद्धि, स्मृति, धृति, शम और धैर्य जैसे गुण रहते हैं; लौकिक, यानी साधारण लोग, जिनका मन रज और मोह से ढका है, प्रिय के पीछे चलते हैं, और प्रज्ञापराध से इन्द्रियों के विषयों का अहितकर सेवन, वेगों को रोकना और दुस्साहस करते हैं, जिससे बहुत-से शारीरिक और मानसिक रोग होते हैं। इसलिए अध्याय कहता है कि आहार न लालसा से लिया जाए, न बिना जाने, बल्कि परखकर, क्योंकि देह आहार से ही बनता है; और आहार की विधि में आठ विशेष बातें शुभ और अशुभ की हेतु हैं। अपथ्य से सदा बचने वाला सज्जनों के प्रति ऋण से मुक्त होता है, और जिस रोग-कारण को कोई टाल नहीं सकता, उस पर बुद्धिमान शोक नहीं करते। अध्याय संग्रह के श्लोकों से समाप्त होता है, जो इन्हीं विषयों को फिर गिनाते हैं। अध्याय के अनुसार साथ ले जाने योग्य बातें ये हैं: शरीर और उसके रोग, दोनों आहार से बनते हैं; हितकर आहार रोग नहीं करता, पर अकेले उससे सब रोगों का भय नहीं मिटता; अहितकर आहार की हानि आहार, दोष और शरीर, तीनों पर निर्भर है; और सही मार्ग ज्ञान से मिलता है। ये चरक संहिता के कथन हैं, किसी उपचार की सलाह नहीं।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ४५-४८)

तत्र श्लोकाःआहारसंभवः वस्तु रोगाश्चाहारसंभवाः ।हिताहितविशेषाच्च विशेषः सुखदुःखयोः ॥

श्लोक ४५ →

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक हैं: वस्तु (शरीर) आहार से उत्पन्न होता है और रोग भी आहार से उत्पन्न होते हैं, और हित तथा अहित के भेद से सुख और दुःख का भेद (होता है),

सहत्वे चासहत्वे च दुःखानाम्ं देहसत्त्वयोः ।विशेषो रोगसङ्घाश्च्च धातुजा ये पृथक्पृथक् ॥

श्लोक ४६ →

दुःखों को सहने और न सह पाने में देह और सत्त्व (मन) का भेद, और जो रोगों के समूह अलग-अलग धातुओं से उत्पन्न होते हैं (वे),

तेषां चैव प्रशमनं कोष्ठाच्छाखा उपेत्य च ।दोषा यथा प्रकुप्यन्ति शाखाभ्यः कोष्ठमेत्य च ॥

श्लोक ४७ →

और उनका प्रशमन (शान्त करने का उपाय) भी, और दोष जिस प्रकार कोष्ठ से शाखाओं में पहुँचकर और शाखाओं से कोष्ठ में आकर प्रकुपित होते हैं (वह),

प्राज्ञाज्ञयोर्विशेषश्च स्वस्थातुरहितं च यत् ।विविधाशितपीतीये तत् सर्वं संप्रकाशितम् ॥

श्लोक ४८ →

और प्राज्ञ (बुद्धिमान) तथा अज्ञ (अज्ञानी) का भेद, और जो स्वस्थ तथा आतुर (रोगी) के लिए हितकर है (वह), यह सब विविधाशितपीतीय (अध्याय) में भली-भाँति प्रकाशित किया गया है।

मुख्य शब्द (२४) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

आरोग्य
आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार

शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।

अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।

चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

स्वस्थ
स्वस्थ - अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित; निरोगी
विस्तार

शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।

अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

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च. सू. २८/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम विविधाशितपीतीय (विविध प्रकार से खाए और पिए गए आहार सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. २८/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. २८/३

। ॥ ३ ॥

विविध (प्रकार का) अशित (खाया हुआ), पीत (पिया हुआ), लीढ (चाटा हुआ) और खादित (चबाया हुआ) (आहार), जो प्राणी के लिए हितकर है, अन्तरग्नि (भीतर की अग्नि) से प्रज्वलित बल वाली अपनी-अपनी ऊष्मा से भली-भाँति पचता हुआ, सम्पूर्ण शरीर को, जिसमें काल (समय) की तरह सब धातुओं का पाक (पचना) बिना रुके चलता रहता है और जिसमें सब धातुओं की ऊष्मा, मारुत (वायु) और स्रोत (मार्ग) अनुपहत (बिना बिगड़े) हैं, उपचय (पुष्टि), बल, वर्ण, सुख और आयु से युक्त करता है, और शरीर की धातुओं को ऊर्जा (बल) देता है। क्योंकि धातुएँ, जिनका आहार धातु है, अपनी प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) का अनुसरण करती हैं।

च. सू. २८/४

। । । । । । ॥ ४ ॥

उस (आहार) में आहार-प्रसाद (आहार का सार) नाम का रस और मल नाम का किट्ट (असार भाग) बनते हैं। किट्ट से स्वेद (पसीना), मूत्र, पुरीष (विष्ठा), वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ); कान, आँख, नाक, मुख, लोमकूप (रोमछिद्र) और प्रजनन-अंग के मल; और केश, श्मश्रु (दाढ़ी-मूँछ), लोम (रोएँ), नख आदि अवयव पुष्ट होते हैं। परन्तु आहार-रस से रस, रुधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र, ओज और पाँच इन्द्रियों के द्रव्य, जो धातु-प्रसाद (धातुओं का सार) कहलाते हैं; और शरीर की सन्धि, बन्ध, पिच्छा आदि अवयव पुष्ट होते हैं। मल नाम वाली और प्रसाद नाम वाली वे सभी धातुएँ, रस और मल से पुष्ट होती हुई, उम्र और शरीर के अनुसार अपने मान (परिमाण) में बनी रहती हैं। इस प्रकार अपने प्रमाण में स्थित रस और मल, सम धातुओं वाले अपने आश्रय (शरीर) के धातु-साम्य (धातुओं के सन्तुलन) को बनाए रखते हैं। परन्तु किसी निमित्त (कारण) से क्षीण हुई या बढ़ी हुई प्रसाद नाम वाली धातुओं का साम्य, रस आहार पर आधारित वृद्धि और क्षय के द्वारा, आरोग्य के लिए उत्पन्न करता है; और किट्ट मलों का (साम्य) ठीक इसी प्रकार (उत्पन्न करता है)। और अपने मान से बढ़े हुए मल, उत्सर्ग (बाहर निकाले जाने) वाले होकर और शीत और उष्ण के पर्याय-गुणों से उपचारित होकर, शरीर की धातुओं का साम्य करने वाले पाए जाते हैं।

च. सू. २८/५

। । । शरीरे । ॥ ५ ॥

और मल नाम वाली तथा प्रसाद नाम वाली उन धातुओं के स्रोत (उनके) अयनमुख (आने-जाने के मार्ग और द्वार) हैं। वे (स्रोत) विभाग के अनुसार अपने-अपने धातुओं को भरते हैं। इस प्रकार यह शरीर अशित, पीत, लीढ और खादित (खाए, पिए, चाटे और चबाए गए आहार) से उत्पन्न है। और इस शरीर में व्याधियाँ (रोग) भी अशित, पीत, लीढ और खादित से उत्पन्न होती हैं। परन्तु इसमें हित और अहित (आहार) के उपयोग के अन्तर, शुभ और अशुभ (परिणामों) का अन्तर करने वाले होते हैं, ऐसा (आत्रेय ने कहा)।

च. सू. २८/६

॥ ६ ॥

ऐसा कहने वाले भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा: भगवन्, निश्चय ही हितकर कहे गए आहार का उपयोग करते हुए भी (लोग) रोगी भी देखे जाते हैं और निरोग भी; और वैसे ही अहितकर कहे गए (आहार का उपयोग करते हुए भी)। ऐसा देखे जाने पर हम शुभ और अशुभ के अन्तर को हित और अहित के उपयोग के अन्तर से बना हुआ कैसे समझते हैं?

च. सू. २८/७

। । । । । । । । ॥ ७ ॥

भगवान् आत्रेय ने उनसे (अग्निवेश से) कहा: हे अग्निवेश, हित आहार का सेवन करने वालों को उस (हित आहार) के कारण व्याधियाँ उत्पन्न नहीं होतीं; और न केवल हित आहार के सेवन से ही सब व्याधियों का भय पार हो जाता है; क्योंकि अहित आहार के सेवन के बिना भी दूसरी रोग-प्रकृतियाँ (रोग के कारण) हैं, जैसे: काल का विपर्यय (उलट-फेर), प्रज्ञापराध (बुद्धि का अपराध), और असात्म्य (प्रतिकूल) शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध। और वे रोग-प्रकृतियाँ रसों का (आहार का) ठीक प्रकार से सेवन करने वाले पुरुष को भी अशुभ (रोग) से युक्त कर देती हैं; इसलिए हित आहार का सेवन करने वाले भी व्याधिग्रस्त देखे जाते हैं। फिर, अहित आहार का सेवन करने वालों का अपचार (अनुचित सेवन) (कुछ) कारणों से तुरन्त दोषकारी (हानिकारक) नहीं होता। क्योंकि न सब अपथ्य समान दोष वाले (एक-सी हानि करने वाले) होते हैं, न सब दोष समान बल वाले होते हैं, और न सब शरीर व्याधिक्षमत्व में (व्याधि का सामना करने में) समर्थ होते हैं। वही अपथ्य देश, काल, संयोग, वीर्य और प्रमाण के अतियोग (अधिकता) से और अधिक अपथ्य हो जाता है। वही दोष संसृष्टयोनि (मिले-जुले उद्गम वाला), विरुद्धोपक्रम (परस्पर विरुद्ध चिकित्सा वाला), गहराई तक पहुँचा हुआ, चिरस्थित (बहुत समय से टिका हुआ), प्राणायतनों (प्राण के स्थानों) से उठा हुआ और मर्मों पर आघात करने वाला (होकर) अत्यन्त कष्टकारी और सबसे शीघ्र (हानि) करने वाला हो जाता है। और अति स्थूल, अति कृश, जिनके मांस, शोणित और अस्थि ठीक से जमे न हों, दुर्बल, असात्म्य आहार से पले-बढ़े, अल्प आहार वाले और अल्प सत्त्व वाले शरीर व्याधि को न सह सकने वाले होते हैं; और इनसे विपरीत (शरीर) व्याधि को सह सकने वाले होते हैं। और अपथ्य आहार, दोष और शरीर की इन्हीं विशेषताओं से व्याधियाँ मृदु, दारुण, शीघ्र उत्पन्न होने वाली और देर से (प्रभाव) करने वाली होती हैं। हे अग्निवेश, वे ही वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ) किसी विशेष स्थान में प्रकुपित होकर विशेष-विशेष व्याधियों को उत्पन्न करते हैं।

च. सू. २८/८

॥ ८ ॥

इस विषय में, रस आदि स्थानों में प्रकुपित दोषों से जिस स्थान में जो-जो व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं, उन-उन को (अब हम) ठीक-ठीक क्रम से बताएँगे।

च. सू. २८/९

। ॥ ९ ॥

अश्रद्धा (भोजन की इच्छा न होना), अरुचि और मुँह का बेस्वाद होना, स्वाद न पहचान पाना, हृल्लास (जी मिचलाना), गौरव (भारीपन), तन्द्रा, अङ्गमर्द (बदन टूटने) के साथ ज्वर, तम (आँखों के आगे अँधेरा छाना),

च. सू. २८/१०

। ॥ १० ॥

पाण्डुता, स्रोतों का रुकना, क्लैब्य (नपुंसकता), साद (शिथिलता), शरीर का कृश (दुबला) होना, अग्नि का नाश, असमय (होने वाली) झुर्रियाँ और पलित (बालों का पकना),

च. सू. २८/११

। ।

(ये) रस के प्रदोष (दूषित होने) से उत्पन्न होने वाले रोग (हैं)। (अब) रक्त के दोष (दूषित होने) से उत्पन्न होने वाले (रोग) कहे जाएँगे: कुष्ठ, वीसर्प, पिडका (फुंसियाँ), रक्तपित्त, असृग्दर,

च. सू. २८/१२

॥ ॥ १२ ॥

गुदा, मेढ्र (लिङ्ग) और मुख का पाक (पकना), प्लीहा (तिल्ली का रोग), गुल्म और विद्रधि, नीलिका, कामला (पीलिया), व्यङ्ग, पिप्लु, तिलकालक

च. सू. २८/१३

। ॥ १३ ॥

दद्रु (दाद), चर्मदल, श्वित्र (सफेद दाग), पामा, कोठ और अस्रमण्डल - (ये रोग) रक्त के प्रदोष (बिगड़ने) से उत्पन्न होते हैं। (अब) मांस के प्रदोष से उत्पन्न होने वाले (रोगों) को सुनो।

च. सू. २८/१४

। ॥ १४ ॥

अधिमांस और अर्बुद, कील, गलशालूक और शुण्डिका, पूतिमांस, अलजी, गण्ड, गण्डमाला और उपजिह्विका

च. सू. २८/१५

। ॥ १५ ॥

(इन्हें) मांस पर आश्रित (रोग) जानना चाहिए। मेद पर आश्रित (रोगों) को तो (हम) बताते हैं: निन्दित (विकार), और जो प्रमेहों के पूर्वरूप हैं (वे)।

च. सू. २८/१६

। ॥ १६ ॥

अध्यस्थि (हड्डी पर हड्डी का बढ़ना) और अधिदन्त (अतिरिक्त दाँत), दाँतों और हड्डियों में भेद (टूटन) और शूल (तेज़ पीड़ा), विवर्णता (रंग का बिगड़ना), और केश, लोम (रोएँ), नख और श्मश्रु (दाढ़ी-मूँछ) के दोष - (ये) अस्थि के प्रदोष से उत्पन्न होते हैं।

च. सू. २८/१७

। ॥ १७ ॥

पर्वों (जोड़ों) में पीड़ा, भ्रम (चक्कर), मूर्छा, और अन्धकार का दिखना (आँखों के आगे अँधेरा छाना), तथा पर्वों (जोड़ों) में होने वाले, मोटी जड़ वाले घावों का दिखना

च. सू. २८/१८

। ॥ १८ ॥

(ये) मज्जा के प्रदोष (बिगड़ने) से (होते हैं)। शुक्र (वीर्य) के दोष से क्लैब्य (नपुंसकता) और अहर्षण (मैथुन में हर्ष का न होना) (होते हैं); अथवा (सन्तान) रोगी, क्लीब (नपुंसक), अल्पायु या विरूप (कुरूप) उत्पन्न होती है।

च. सू. २८/१९

। ॥ १९ ॥

और इस (पुरुष) से गर्भ नहीं ठहरता; (ठहरे तो) गिर जाता है, या स्रवित (बहकर बाहर) भी हो जाता है। क्योंकि दूषित शुक्र पुरुष को सन्तान और पत्नी सहित पीड़ा देता है।

च. सू. २८/२०

। ॥ २० ॥

जब मल (दोष) इन्द्रियों का आश्रय लेकर प्रकुपित होते हैं, तब वे इन्द्रियों को उपघात (शक्ति की हानि) और उपताप (पीड़ा) से युक्त कर देते हैं।

च. सू. २८/२१

। ॥ २१ ॥

स्नायु में और सिराओं तथा कण्डराओं में दूषित हुए (दोष) मनुष्य को स्तम्भ (जकड़न), संकोच (सिकुड़न), खल्ली (ऐंठन वाली पीड़ा), ग्रन्थि (गाँठ), स्फुरण (फड़कना) और सुप्ति (सुन्नपन) से कष्ट देते हैं।

च. सू. २८/२२

। ॥ २२ ॥

मलों का आश्रय लेकर कुपित हुए दोष मलों का भेद (टूटना), शोष (सूखना) और प्रदूषण (बिगड़ना) करते हैं, और (उनका) अत्यधिक सङ्ग (रुकना) और उत्सर्ग (निकलना) भी (करते हैं)।

च. सू. २८/२३

। ॥ २३ ॥

मनुष्यों के ये विकार, जो (ऊपर) बताए गए हैं, अनेक प्रकार के अहितकर खाए, पिए, चाटे और चबाए गए (आहार) से होते हैं।

च. सू. २८/२४

। ॥ २४ ॥

उन (विकारों) की उत्पत्ति न हो, यह चाहने वाला बुद्धिमान (मनुष्य) सदा हितकर अशित आदि (खाने, पीने, चाटने और चबाने की वस्तुओं) का ही सेवन करे, जिससे उनसे उत्पन्न होने वाले रोग न हों।

च. सू. २८/२५

। ॥ २५ ॥

रस (धातु) से उत्पन्न विकारों का औषध (उपचार) सब (प्रकार का) लङ्घन है; रक्त से उत्पन्न (विकारों) की चिकित्सा विधिशोणितीय अध्याय में (कही गई है)।

च. सू. २८/२६

। ॥ २६ ॥

मांस से उत्पन्न (विकारों) का (उपचार) तो संशुद्धि (शरीर का शोधन) और शस्त्रकर्म, क्षारकर्म और अग्निकर्म है; मेद से उत्पन्न (विकारों) की चिकित्सा अष्टौनिन्दितीय अध्याय में (कही गई है)।

च. सू. २८/२७

। ॥ २७ ॥

अस्थि पर आश्रित व्याधियों का औषध (उपचार) पञ्चकर्म, बस्तियाँ, और तिक्त (कड़वे द्रव्यों) से युक्त क्षीर (दूध) और सर्पि (घी) हैं।

च. सू. २८/२८

। ॥ २८ ॥

मज्जा और शुक्र से उत्पन्न (विकारों) का औषध (उपचार) है: स्वादु (मधुर) और तिक्त (कड़वा) अन्न, व्यवाय (मैथुन) और व्यायाम, और शुद्धि (शरीर का शोधन), उचित समय पर और उचित मात्रा में।

च. सू. २८/२९

। ॥ २९ ॥

इन्द्रियों से उत्पन्न (विकारों) की शान्ति (उपचार) तो त्रिमर्मीय (अध्याय) में कही जाएगी; स्नायु आदि से उत्पन्न (विकारों) का प्रशम (उपचार) वातरोगिक (अध्याय) में कहा जाएगा।

च. सू. २८/३०

। ॥ ३० ॥

मल से उत्पन्न विकारों की चिकित्सा का संग्रह (संक्षेप) नवेगान्धारणीय अध्याय में किया गया है, और (उनकी) सिद्धि (उपचार) जहाँ-तहाँ (भी) कही गई है।

च. सू. २८/३१

। ॥ ३१ ॥

व्यायाम से, ऊष्मा (शरीर की गर्मी) की तीक्ष्णता से, हितकर (आचरण) का पालन न करने से, और मारुत (वायु) की द्रुतता (तेज़ गति) से मल (दोष) कोष्ठ से शाखाओं में जाते हैं।

च. सू. २८/३२

। ॥ ३२ ॥

और वहाँ (शाखाओं में) स्थित (वे मल), (किसी कारण से) प्रेरित न किए जाने पर, कभी-कभी (वहीं) ठहरे रहते हैं। वे अनुपयुक्त देश और काल में कुपित नहीं होते, (बल्कि) फिर से हेतु (कुपित करने वाले कारण) की प्रतीक्षा करते रहते हैं।

च. सू. २८/३३

। ।

वृद्धि (बढ़ जाने) से, विष्यन्दन (पिघलकर बहने) से, पाक (पकने) से, स्रोतों के मुखों के विशोधन (खुलकर साफ होने) से और वायु के निग्रह (वश में आने) से मल शाखाओं को छोड़कर कोष्ठ में चले जाते हैं।

च. सू. २८/३४

। ॥ ३४ ॥

जो रोग अभी उत्पन्न नहीं हुए, उनकी अनुत्पत्ति (उत्पन्न न होने) के लिए, और जो उत्पन्न हो चुके हैं, उनकी निवृत्ति (समाप्ति) के लिए जो विधि देखी (बताई) गई है, सुख चाहने वाला (मनुष्य) उसका भली-भाँति आचरण करे।

च. सू. २८/३५

। ॥ ३५ ॥

सब प्राणियों की सभी प्रवृत्तियाँ (चेष्टाएँ) सुख के लिए मानी गई हैं; परन्तु ज्ञान और अज्ञान के भेद से प्रवृत्तियाँ सही मार्ग की और गलत मार्ग की (हो जाती) हैं।

च. सू. २८/३६

। ॥ ३६ ॥

परीक्षक (परखकर चलने वाले) लोग भली-भाँति परखकर हित (लाभकारी) को ही अपनाते हैं; परन्तु रज और मोह से ढके मन वाले लौकिक (साधारण) लोग प्रिय (मन को अच्छा लगने वाले) को ही (अपनाते हैं)।

च. सू. २८/३७

। ॥ ३७ ॥

श्रुत (शास्त्र का ज्ञान), बुद्धि, स्मृति, दाक्ष्य (कुशलता), धृति (मन की स्थिरता), हित का सेवन, वाणी की शुद्धि, शम (मन की शान्ति) और धैर्य (ये गुण) परीक्षक (परखकर चलने वाले व्यक्ति) का आश्रय लेते हैं।

च. सू. २८/३८

। ॥ ३८ ॥

ये गुण मोह और रज के आश्रित लौकिक (साधारण) व्यक्ति का आश्रय नहीं लेते। जिनका मूल वही है, ऐसे बहुत-से शारीरिक और मानसिक रोग (उसे) प्राप्त होते हैं।

च. सू. २८/३९

। ॥ ३९ ॥

क्योंकि (वह) प्रज्ञापराध (बुद्धि के अपराध) के कारण पाँचों अर्थों (इन्द्रियों के विषयों) का अहितकर सेवन करता है, वेगों (स्वाभाविक आवेगों) को रोकता है और साहस के (दुस्साहस भरे) काम करता है।

च. सू. २८/४०

। ॥ ४० ॥

अज्ञ (अज्ञानी) मनुष्य उन भावों (विषयों) में अनुरक्त (आसक्त) होता है जिन्हें उसी समय सुख देने वाला कहा जाता है; परन्तु विज्ञाता (जानने वाला) आसक्त नहीं होता, क्योंकि (उसका) विज्ञान (समझ) निर्मल हो चुका होता है।

च. सू. २८/४१

। ॥ ४१ ॥

न राग (लालसा) से और न ही अविज्ञान से (बिना जाने-समझे) आहारों का उपयोग करे; परखकर हितकर (आहार) खाए, क्योंकि देह आहार से उत्पन्न होता है।

च. सू. २८/४२

। ॥ ४२ ॥

आहार की विधि में आठ विशेष (विशेष बातें) हैं, जो शुभ और अशुभ (परिणाम) की उत्पत्ति में हेतु (कारण) कहलाते हैं; उन्हें परखकर (आहार का) प्रयोग करे।

च. सू. २८/४३

। ॥ ४३ ॥

त्यागने योग्य अपथ्यों (अहितकर वस्तुओं) को सदा त्यागता हुआ बुद्धिमान मनुष्य यहाँ (इस लोक में) साधुओं (सज्जनों) के प्रति अनृणता (ऋण से मुक्ति) को प्राप्त होता है।

च. सू. २८/४४

। प्राप्य ॥ ४४ ॥

परन्तु रोग का जो समुत्थान (कारण) यहाँ (इस लोक में) किसी के द्वारा भी टाला नहीं जा सकता, उसके आ पड़ने पर मनीषियों (बुद्धिमानों) को शोक नहीं करना चाहिए।

च. सू. २८/४५

। ॥ ४५ ॥

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक हैं: वस्तु (शरीर) आहार से उत्पन्न होता है और रोग भी आहार से उत्पन्न होते हैं, और हित तथा अहित के भेद से सुख और दुःख का भेद (होता है),

च. सू. २८/४६

। ॥ ४६ ॥

दुःखों को सहने और न सह पाने में देह और सत्त्व (मन) का भेद, और जो रोगों के समूह अलग-अलग धातुओं से उत्पन्न होते हैं (वे),

च. सू. २८/४७

। ॥ ४७ ॥

और उनका प्रशमन (शान्त करने का उपाय) भी, और दोष जिस प्रकार कोष्ठ से शाखाओं में पहुँचकर और शाखाओं से कोष्ठ में आकर प्रकुपित होते हैं (वह),

च. सू. २८/४८

। ॥ ४८ ॥

और प्राज्ञ (बुद्धिमान) तथा अज्ञ (अज्ञानी) का भेद, और जो स्वस्थ तथा आतुर (रोगी) के लिए हितकर है (वह), यह सब विविधाशितपीतीय (अध्याय) में भली-भाँति प्रकाशित किया गया है।

च. सू. २८

॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के सूत्रस्थान में विविधाशितपीतीय नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।