व्याख्या
इस अध्याय में भगवान् आत्रेय पहले (२९/५) बता चुके हैं कि वैद्य दो प्रकार के होते हैं: कुछ 'प्राणों के अभिसर और रोगों के नाशक' होते हैं, और कुछ 'रोगों के अभिसर और प्राणों के नाशक'। 'अभिसर' का अर्थ है साथ देने वाला या बचाने वाला; प्राणों का अभिसर रोगी के जीवन का रक्षक है, जबकि रोगों का अभिसर रोग का साथी बनकर रोगी के प्राण ले लेता है। तब अग्निवेश पूछते हैं (२९/६) कि इन दोनों को कैसे पहचाना जाए। यह लम्बा गद्य-सूत्र उस प्रश्न का पहला उत्तर है: इसमें आत्रेय अच्छे वैद्य की पहचान बताते हैं, और अगला सूत्र (२९/८) इसके उलटे, वैद्य का वेश धरे लोगों की। पहले वे ऐसे वैद्य के निजी गुण गिनाते हैं। वह कुलीन (अच्छे कुल का) होता है; उसका श्रुत, यानी गुरु से सुना और पढ़ा हुआ शास्त्र-ज्ञान, निर्मल और स्पष्ट होता है; उसने चिकित्सा का काम (कर्म) स्वयं भली-भाँति देखा होता है; वह दक्ष (कुशल और फुर्तीला), शुचि (शुद्ध, साफ़-सुथरा), जितहस्त (जिसका हाथ सधा हुआ हो) और जितात्मा (जिसने अपने मन को वश में किया हो) होता है; उसके पास चिकित्सा के सब उपकरण (साधन) होते हैं और उसकी सब इन्द्रियाँ (आँख, कान आदि) ठीक होती हैं; वह प्रकृति को जानता है, और प्रतिपत्ति को, यानी किस स्थिति में क्या करना है। 'प्रकृति' का अर्थ यहाँ रोगी का स्वाभाविक शरीर-स्वभाव भी हो सकता है और किसी बात का मूल कारण भी; सूत्र इसे स्पष्ट नहीं करता। फिर 'क्योंकि' कहकर आत्रेय बताते हैं कि ऐसे वैद्य किन-किन विषयों में निःसंशय होते हैं। वे सम्पूर्ण शरीर को जानते हैं, शरीर कैसे बनता है (उसकी उत्पत्ति) यह जानते हैं, और प्रकृति-विकार को जानते हैं; 'प्रकृति-विकार' का अर्थ सम्भवतः सृष्टि के मूल तत्त्व और उनसे बने पदार्थ हैं, पर यह निश्चित नहीं है। वे रोगों के चार वर्ग पहचानते हैं: सुखसाध्य (जो आसानी से ठीक हों), कृच्छ्रसाध्य (जो कठिनाई से ठीक हों), याप्य (जो पूरी तरह ठीक न हों, बस उपचार से दबे रहें) और प्रत्याख्येय (असाध्य, जिन्हें वैद्य चिकित्सा के लिए अस्वीकार कर दे); और हर रोग का समुत्थान (कारण), पूर्वरूप (रोग प्रकट होने से पहले के संकेत), लिङ्ग (लक्षण), वेदना (पीड़ा) और उपशय (वे उपाय जिनसे रोग में आराम मिले) अलग-अलग जानते हैं। इसके बाद 'त्रिविधस्यायुर्वेदसूत्रस्य' से 'तन्त्रोद्देशलक्ष्णस्य' तक का लम्बा भाग सूत्रस्थान के तीसों अध्यायों के विषयों को लगभग उन्हीं के क्रम से गिनाता है; इस अध्याय का अन्तिम श्लोक (२९/१४) भी कहता है कि इसमें 'श्लोकस्थान' (सूत्रस्थान का ही दूसरा नाम) का अर्थ-संग्रह, यानी सार, है। अध्याय १ से ४ के विषय: आयुर्वेद का तीन प्रकार का सूत्र (पहले अध्याय, १/२४, में आयुर्वेद को हेतु, लिङ्ग और औषध के ज्ञान वाला 'त्रिसूत्र' कहा गया है), उसका संग्रह (संक्षेप में कथन) और व्याकरण (विस्तार), तीन प्रकार का औषध-समूह; सोलह मूलिनी और उन्नीस फलिनी, यानी जिनकी जड़ या जिनके फल काम आते हैं ऐसी पैंतीस औषधियाँ; चार स्नेह (घी, तेल, वसा और मज्जा, यानी चिकनाई वाले पदार्थ), पाँच लवण (नमक), आठ मूत्र, आठ प्रकार के दूध, और वे छह वृक्ष जिनका दूध (क्षीर) या छाल (त्वचा) काम आती है; शिरोविरेचन (सिर की शुद्धि के लिए नाक से दी जाने वाली औषध) आदि पञ्चकर्म (शरीर-शुद्धि की पाँच क्रियाओं) में काम आने वाली औषधियाँ और अट्ठाईस यवागू (पतली लपसी); बत्तीस चूर्ण-प्रदेह (चूर्ण से बने लेप); छह सौ विरेचन (दोषों को शरीर से बाहर निकालने वाले योग) और पाँच सौ कषाय (पचास समूहों में दस-दस करके गिनाए गए औषध-द्रव्य)। अध्याय ५ से ८ के विषय: स्वस्थवृत्त, यानी स्वस्थ व्यक्ति के जीने के नियम: भोजन-पान के नियम, खड़े होने, चलने, सोने और बैठने के ढंग, मात्रा (भोजन की उचित मात्रा), द्रव्य (सेवन के पदार्थ), अञ्जन (आँखों में लगाने की औषध), धूम (औषधीय धुआँ लेना), नावन (नाक में औषध डालना), अभ्यञ्जन (तेल की मालिश), परिमार्जन (शरीर की सफ़ाई), मल-मूत्र जैसे प्राकृतिक वेगों को न रोकना और लोभ, क्रोध जैसे वेगों को रोकना, व्यायाम, सात्म्य (जो शरीर के अनुकूल हो), इन्द्रियों की परीक्षा और उनकी देखभाल (उपक्रमण), और सद्वृत्त (सदाचार)। अध्याय ९ से १२ के विषय: भेषज, जो यहाँ चिकित्सा के अर्थ में है और चार पादों (वैद्य, द्रव्य, परिचारक और रोगी) पर टिका है, जिनके चार-चार गुण मिलकर सोलह कलाएँ (अंश) बनते हैं; उससे जुड़ा विनिश्चय (निर्णय); तीन पर्येषण, यानी वे तीन एषणाएँ (जीवन, धन और परलोक की इच्छाएँ) जिनकी खोज, ग्यारहवें अध्याय (११/३) के अनुसार, मनुष्य को करनी चाहिए; और वात की कला-अकला का ज्ञान, जो वातकलाकलीय अध्याय का विषय है। अध्याय १३ से १६ के विषय: चार प्रकार का स्नेह; उसके चौबीस उपनय (स्नेहाध्याय, १३/२३-२५, में स्नेह के प्रयोग की चौबीस 'प्रविचारणाएँ' गिनाई गई हैं: भात, दूध, दही जैसे आहार के साथ, और अभ्यञ्जन, बस्ति, गण्डूष, नस्य जैसे रूपों में; 'उपनय' सम्भवतः इन्हीं के लिए है); उसके चौंसठ तक के भेद (उसी अध्याय, १३/२७-२८, के अनुसार छह रसों में से एक या अधिक के मेल से स्नेह के तिरसठ भेद बनते हैं, और बिना मेल का केवल स्नेह एक, कुल चौंसठ); और स्नेहन (चिकनाई देना), स्वेदन (पसीना लाना), वमन (उल्टी कराना) और विरेचन (दस्त कराना) के योग्य रोगियों के अनेक विधियों वाले उपचार। अध्याय १७ से २० के विषय: शिरोरोग (सिर के रोग) आदि, और दोषों (वात, पित्त और कफ, शरीर के वे तीन तत्त्व जिनका सन्तुलन स्वास्थ्य है) के अंशों के भिन्न-भिन्न मेल से होने वाले रोगों का संग्रह, साथ में क्षय (शरीर के तत्त्वों का घटना), पिडका (फुंसी जैसे उभार) और विद्रधि (फोड़ा); तीन प्रकार के शोफ (सूजन) और उनसे जुड़ी अनेक स्थितियाँ; अड़तालीस रोगाधिकरण (रोगों के वर्ग); और एक सौ चालीस नानात्मज रोग, यानी वे रोग जो केवल एक ही दोष से होते हैं (अस्सी वात के, चालीस पित्त के और बीस कफ के)। अध्याय २१ से २४ के विषय: निन्दित (बुरे माने गए) अति-स्थूल (बहुत मोटे) और अति-कृश (बहुत दुबले) लोग, उनके हेतु, लक्षण और उपक्रम (उपचार); हितकर और अहितकर नींद, और अस्वप्न (नींद न आना) तथा अतिस्वप्न (बहुत नींद) के कारण और उपचार; लङ्घन (शरीर को हल्का करना, जैसे उपवास) आदि छह उपक्रम; संतर्पण (अधिक पोषण) और अपतर्पण (कम पोषण) से होने वाले रोग, उनके रूप और शान्ति के उपाय; रक्त से होने वाले रोग; और मद (नशे जैसी अवस्था), मूर्च्छा (बेहोशी) और संन्यास (गहरी अचेतना), उनके कारण, रूप, औषध और उपचार। अध्याय २५ से २८ के विषय: आहार-विधि का विनिश्चय; स्वभाव से हितकर और अहितकर आहार-द्रव्य; अग्र्य-संग्रह (अपने-अपने काम में सबसे श्रेष्ठ वस्तुओं की सूची); चौरासी आसव (खमीर उठाकर बनाए गए पेय); द्रव्य, गुण और कर्म का विनिश्चय; रस (स्वाद) और अनुरस (गौण स्वाद) का आश्रय; वैरोधिक, यानी एक-दूसरे के विरुद्ध आहार, और उसके भेद; बारह वर्गों में बँटे अन्न-पान (खाने-पीने के पदार्थ), उनके गुण और प्रभाव, और अनुपान (भोजन या औषध के साथ या बाद में पिया जाने वाला पेय) के गुण; नौ प्रकार का अर्थ-संग्रह (सम्भवतः वे नौ बातें जिनसे अन्नपानविधि अध्याय में आहार-द्रव्य की परीक्षा होती है); आहार की गति (खाया हुआ आहार शरीर में कैसे बदलता है); हितकर और अहितकर उपयोग के भेद से होने वाले शुभ और अशुभ परिणाम; और धातुओं (रस, रक्त आदि, जो शरीर को धारण करते हैं) में आश्रित रोग और उनकी औषधियाँ। अध्याय २९ और ३० के विषय: प्राणों के दस आयतन (वे दस स्थान जिनमें प्राण टिके हैं, जो इसी अध्याय के आरम्भ, २९/३, में गिनाए गए हैं), और वह विषय जिसे आत्रेय तीसवें अध्याय अर्थेदशमहामूलीय में कहेंगे: पूरे तन्त्र (शास्त्र) का उद्देश (विषयों की गिनती) और लक्षण। ध्यान देने की बात है कि यहाँ आत्रेय स्वयं अगले अध्याय का नाम और उसकी संख्या बताते हैं। अन्त में वे बताते हैं कि ऐसे वैद्य तन्त्र के ग्रहण (सीखना), धारण (याद रखना), विज्ञान (अर्थ समझना), प्रयोग (व्यवहार में लाना), कर्म (चिकित्सा का काम), कार्य (जो सिद्ध करना है), काल (उचित समय), कर्ता (करने वाला) और करण (साधन) में कुशल होते हैं; और स्मृति (याद), मति (बुद्धि), शास्त्र और युक्ति (तर्क से उचित योजना) के ज्ञान में भी। अन्तिम वाक्य की बनावट कुछ कठिन है: वह कहता है कि ऐसे वैद्य अपने शील (आचरण) और गुणों के साथ 'अविसंवाद' रखते हैं, यानी उनके ज्ञान और आचरण में मेल रहता है, और सब प्राणियों के प्रति उनका मन वैसा ही मैत्री-भरा रहता है जैसा माता, पिता, भाई या किसी अपने बन्धु के प्रति; इसके शब्दों का आपसी सम्बन्ध पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। सूत्र उसी बात पर समाप्त होता है जिससे आरम्भ हुआ था: अग्निवेश, ऐसे गुणों से युक्त वैद्य प्राणों के अभिसर और रोगों के नाशक होते हैं। हमारे पाठ में कुछ शब्द टंकण की भूल लगते हैं: 'केलवे', 'अष्टाणां', 'प्रकृत्य', 'लक्ष्णस्य' और 'बवन्ति' के स्थान पर मुद्रित संस्करण (१९४१) में 'केवले', 'अष्टानां', 'प्रकृत्या', 'लक्षणस्य' और 'भवन्ति' हैं, और 'व्याधिशतस्त' सम्भवतः 'व्याधिशतस्य' है। अनुवाद इन्हीं शुद्ध रूपों के अनुसार किया गया है।