भारत संहिता

अध्याय २९

दशप्राणायतनीयोऽध्यायः

प्राणों के दस आयतन

इस पृष्ठ का हिन्दी पाठ AI (Claude) द्वारा तैयार किया गया ड्राफ्ट है। चिह्न वाले अंशों की सम्पादक द्वारा जाँच अभी बाकी है।

भूमिका

दशप्राणायतनीय अध्याय चरक संहिता के सूत्रस्थान का उनतीसवाँ अध्याय है, और इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। इसका नाम तीन शब्दों से बना है: 'दश' यानी दस, 'प्राण' यानी जीवन, और 'आयतन' यानी आश्रय या ठिकाना; इसका हिन्दी शीर्षक 'प्राणों के दस आयतन' है। अध्याय शरीर के उन दस स्थानों को गिनाकर आरम्भ होता है जिनमें प्राण टिके हैं, पर इसका बड़ा भाग वैद्यों के विषय में है: सच्चा वैद्य कैसा होता है, और वैद्य का वेश धरे उन लोगों को कैसे पहचाना जाए जिन्हें अध्याय प्राणों का नाश करने वाला कहता है। अध्याय की पुष्पिका सूत्रस्थान को उसके दूसरे नाम, श्लोकस्थान, से पुकारती है।

पहला श्लोक बताता है कि प्राण दस ही आयतनों में प्रतिष्ठित (टिके हुए) हैं: दोनों शङ्ख (कनपटियाँ), तीन मर्म, कण्ठ, रक्त, शुक्र, ओज और गुद। तीन मर्मों के नाम अध्याय नहीं लेता। ध्यान देने की बात है कि इस सूची में अंगों के साथ रक्त, शुक्र और ओज जैसे शरीर के तत्त्व भी गिने गए हैं। जो इन आयतनों को, इन्द्रियों को, विज्ञान (समझ) को, चेतना के हेतु (कारण) को और रोगों को जानता है, वह विद्वान् 'प्राणाभिसर', यानी प्राणों का साथ देने वाला, कहलाता है। फिर आत्रेय अग्निवेश से कहते हैं कि वैद्य दो प्रकार के होते हैं: कुछ प्राणों के अभिसर (साथ देने वाले) और रोगों का नाश करने वाले होते हैं, और कुछ रोगों के अभिसर और प्राणों का नाश करने वाले। अग्निवेश पूछते हैं कि इन दोनों को कैसे पहचाना जाए, और शेष अध्याय इसी प्रश्न का उत्तर है।

आत्रेय का उत्तर पहले सच्चे वैद्य का लम्बा चित्र खींचता है। ऐसा वैद्य अच्छे कुल का होता है, उसका शास्त्र-ज्ञान निर्मल होता है, और उसने चिकित्सा का काम स्वयं भली-भाँति देखा होता है; वह दक्ष, शुचि, सधे हुए हाथ वाला और मन को जीते हुए होता है, सब उपकरणों और सब इन्द्रियों से सम्पन्न होता है, और प्रकृति तथा प्रतिपत्ति (उचित कार्यवाही) को जानता है। वह शरीर, उसकी उत्पत्ति और प्रकृति-विकार के ज्ञान में संशय-रहित होता है, और रोगों के चारों वर्ग, सुखसाध्य, कृच्छ्रसाध्य, याप्य और प्रत्याख्येय, तथा हर रोग के कारण, पूर्वरूप, लक्षण, वेदना और उपशय पहचानता है। इसके बाद एक बहुत लम्बी सूची आती है, जो लगभग सूत्रस्थान के अध्यायों के क्रम से उनके विषयों से होकर चलती है: आयुर्वेद का तीन प्रकार का सूत्र, औषधियाँ और उनके योग, स्वस्थवृत्त, चिकित्सा के चार पाद, स्नेह, स्वेद, वमन और विरेचन के उपचार, रोगों के वर्ग, लङ्घन आदि छह उपक्रम, आहार और उसके गुण, और प्राणों के दस आयतन; यहाँ तक कि आत्रेय अगले, तीसवें अध्याय का नाम लेकर बताते हैं कि उसमें वे क्या कहेंगे। सच्चा वैद्य इन सबमें कुशल होता है, शास्त्र को सीखने, याद रखने, समझने और व्यवहार में लाने में कुशल होता है, और सब प्राणियों के प्रति उसका मन माता, पिता, भाई और बन्धु की तरह मैत्री-भरा रहता है। आत्रेय कहते हैं कि ऐसे वैद्य प्राणों के अभिसर और रोगों के नाशक होते हैं।

इनसे उलटे लोग रोगों के अभिसर और प्राणों के नाशक हैं। आत्रेय बताते हैं कि वे वैद्य के छद्म वेश में छिपे रहते हैं, संसार के लिए काँटे जैसे हैं, और राजाओं के प्रमाद (असावधानी) के कारण राज्यों में घूमते हैं। उनकी पहचान के लक्षण अध्याय विस्तार से गिनाता है: वे अपनी बड़ाई करते हुए काम की तलाश में गली-गली घूमते हैं; किसी के रोगी होने की खबर पाते ही उसके पास आ पहुँचते हैं, रोगी को सुनाकर अपने गुण गाते हैं और उसकी चिकित्सा कर रहे वैद्य के दोष गिनाते हैं; रोगी के मित्रों को प्रसन्न करके अपने पक्ष में करना चाहते हैं और जताते हैं कि वे बहुत थोड़ा ही चाहते हैं; अपना अज्ञान छिपाने के लिए बार-बार देखने का दिखावा करते हैं; रोग ठीक न कर पाएँ तो दोष रोगी पर डालते हैं, और उसे मृत्यु के निकट देखकर कोई बहाना बनाकर चले जाते हैं। वे साधारण लोगों के बीच अपनी कुशलता का बखान करते हैं, पर विद्वानों की सभा से ऐसे बचते हैं जैसे राहगीर भयानक वन से; शास्त्र का जो थोड़ा-सा अंश उन्हें याद होता है उसे बेमौके दोहराते हैं, प्रश्न से मृत्यु की तरह डरते हैं, और उनका कोई आचार्य, शिष्य या साथ पढ़ने वाला ज्ञात नहीं होता। इसके बाद के श्लोक इन्हें उन बहेलियों जैसा बताते हैं जो जाल की ओट लेकर पक्षियों की ताक में रहते हैं, और कहते हैं कि श्रुत (शास्त्र की शिक्षा), दृष्ट (देखा हुआ चिकित्सा-कर्म), क्रिया, काल और मात्रा के ज्ञान से वंचित ये लोग निश्चय ही त्याग देने योग्य हैं; वे पृथ्वी पर मृत्यु के अनुचर बनकर घूमते हैं। एक श्लोक कहता है कि समझदार रोगी उन मूर्खों को त्याग दे जो जीविका के लिए वैद्य बने हैं, वैद्य होने के घमण्ड से भरे हैं और विशारद (निपुण) बने फिरते हैं, और उन्हें 'पीतमारुत' (शाब्दिक अर्थ: वायु पिए हुए) सर्प कहता है।

अध्याय सच्चे वैद्यों को नमस्कार करके समाप्त होता है: जो शास्त्र के ज्ञाता, दक्ष, शुचि, कर्म में निपुण, सधे हुए हाथ वाले और जितात्मा हैं, उन्हें सदा नमस्कार है। अन्तिम संग्रह-श्लोक कहता है कि इस अध्याय में श्लोकस्थान के विषयों का संग्रह, दो प्रकार के वैद्य और प्राण के आयतन कहे गए हैं; सम्भवतः पहली बात सच्चे वैद्य के वर्णन वाली उसी लम्बी सूची की ओर संकेत है। इस अध्याय से पाठक यह बात ले जा सकता है कि चरक संहिता के अनुसार जीवन शरीर के कुछ विशेष आयतनों पर टिका है, और सच्चे वैद्य की पहचान उसके वेश या दावों से नहीं, उसके शास्त्र-ज्ञान, देखे हुए अनुभव, कुशलता और आचरण से होती है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १४)

तत्र श्लोकःदशप्राणायतनिके श्लोकस्थानार्थसंग्रहः ।द्विविधा भिषजश्चोक्ताः प्राणस्यायतनानि च ॥

श्लोक १४ →

इस विषय में (संग्रह-)श्लोक: दशप्राणायतनीय (अध्याय) में श्लोकस्थान के विषयों का संग्रह, दो प्रकार के वैद्य और प्राण के आयतन (स्थान) कहे गए हैं।

मुख्य शब्द (२३) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

आयुर्वेद
आयु का ज्ञान - जीवन और स्वास्थ्य का शास्त्र
विस्तार

शब्द-रचना: आयुस् (आयु, जीवन) + वेद (ज्ञान; √विद् 'जानना' से)।

अर्थ: आयु का वेद, अर्थात् जीवन का ज्ञान।

चरक संहिता में: आयुर्वेद वह शास्त्र है जिसमें हित और अहित, सुख और दुःख वाली आयु, आयु के लिए क्या हितकर और क्या अहितकर है, आयु का मान, और स्वयं आयु बताई गई हो (सू. १/४१)। इसलिए आयुर्वेद केवल रोगों की दवा नहीं, पूरे जीवन को स्वस्थ और सार्थक रखने की विद्या है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

स्वस्थ
स्वस्थ - अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित; निरोगी
विस्तार

शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।

अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. सू. २९/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम दशप्राणायतनीय (प्राणों के दस आयतनों सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. २९/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. २९/३

। ॥ ३ ॥

(विद्वान्) आयतन (आश्रय-स्थान) दस ही बताते हैं, जिनमें प्राण प्रतिष्ठित (टिके हुए) हैं: दोनों शङ्ख (कनपटियाँ), तीन मर्म, कण्ठ, रक्त, शुक्र और ओज, तथा गुद।

च. सू. २९/४

। ॥ ४ ॥

जो उन (दस प्राणायतनों) को, इन्द्रियों को, विज्ञान (बुद्धि, समझ) को, चेतना के हेतु (कारण) को और रोगों को जानता है, वह विद्वान् ही प्राणाभिसर (प्राणों का साथ देने वाला) कहलाता है।

च. सू. २९/५

॥ ५ ॥

हे अग्निवेश, वैद्य तो निश्चय ही दो प्रकार के होते हैं: कुछ प्राणों के अभिसर (साथ देने वाले) और रोगों का नाश करने वाले होते हैं, और कुछ रोगों के अभिसर (साथ देने वाले) और प्राणों का नाश करने वाले।

च. सू. २९/६

॥ ६ ॥

ऐसा कहने वाले भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा: 'भगवन्, वे (दोनों प्रकार के वैद्य) हमें किस प्रकार पहचानने चाहिए?'

च. सू. २९/७

, , , , ॥ ७ ॥

भगवान् (आत्रेय) ने कहा: जो ये (वैद्य) कुलीन, निर्मल शास्त्र-ज्ञान वाले, (चिकित्सा) कर्म को भली-भाँति देखे हुए, दक्ष, शुचि (शुद्ध), सधे हुए हाथ वाले, मन को जीते हुए, सब उपकरणों से युक्त, सब इन्द्रियों से सम्पन्न, प्रकृति को जानने वाले और प्रतिपत्ति (उचित कार्यवाही) को जानने वाले हैं, उन्हें प्राणों के अभिसर (साथ देने वाले) और रोगों के नाशक जानना चाहिए। क्योंकि ऐसे (वैद्य) सम्पूर्ण शरीर-ज्ञान में, शरीर की उत्पत्ति के ज्ञान में और प्रकृति-विकार के ज्ञान में संशय-रहित होते हैं; सुखसाध्य, कृच्छ्रसाध्य, याप्य और प्रत्याख्येय रोगों के समुत्थान (कारण), पूर्वरूप, लिङ्ग, वेदना और उपशय के विशेष ज्ञान में संदेह-रहित होते हैं; संग्रह और व्याकरण सहित तथा तीन प्रकार के औषध-समूह सहित, तीन प्रकार के आयुर्वेद-सूत्र के प्रवक्ता होते हैं; पैंतीस मूल-फलों (मूल और फल वाली औषधियों), चार स्नेहों, पाँच लवणों, आठ मूत्रों, आठ दूधों, दूध और छाल (के लिए प्रयुक्त) छह वृक्षों, शिरोविरेचन आदि पञ्चकर्म पर आश्रित औषध-समूह, अट्ठाईस यवागुओं, बत्तीस चूर्ण-प्रदेहों, छह सौ विरेचनों और पाँच सौ कषायों के प्रयोक्ता होते हैं; स्वस्थवृत्त में बताए गए भोजन-पान के नियम, खड़े होने, चलने, सोने, बैठने, मात्रा, द्रव्य, अञ्जन, धूम, नावन, अभ्यञ्जन, परिमार्जन, वेगों को न रोकने और (कुछ वेगों को) रोकने, व्यायाम, सात्म्य, इन्द्रियों की परीक्षा, उपक्रमण और सद्वृत्त में कुशल होते हैं; चार पादों से युक्त, सोलह कलाओं वाले, विनिश्चय सहित, तीन पर्येषणों सहित और वात की कला-अकला के ज्ञान सहित भेषज (चिकित्सा) में संदेह-रहित होते हैं; चार प्रकार के स्नेह की, जिसके चौबीस उपनय हैं, जो (विधिपूर्वक) तैयार किया जाता है और जिसके चौंसठ तक (भेद) हैं, व्यवस्था करने वाले होते हैं; और स्नेहन, स्वेदन, वमन और विरेचन के योग्य (रोगियों) के, अनेक प्रकार की विधियों से युक्त, विविध औषध-उपचारों में कुशल होते हैं; शिरोरोग आदि वाले और दोषों के अंशों के विकल्प से उत्पन्न, क्षय, पिडका और विद्रधि सहित व्याधि-संग्रह के, अनेक प्रकार के शोफ-अनुबन्धों वाले तीन शोफों के, अड़तालीस रोगाधिकरणों के, एक सौ चालीस नानात्मज व्याधियों के, तथा हेतु, लक्षण और उपक्रम सहित निन्दित अति-स्थूल और अति-कृश (व्यक्तियों) के, हितकर और अहितकर स्वप्न (नींद) के, हेतु और उपक्रम सहित अस्वप्न और अतिस्वप्न के, लङ्घन आदि छह उपक्रमों के, रूप और प्रशमन सहित संतर्पण और अपतर्पण से उत्पन्न रोगों के, और कारण, रूप, औषध और उपचार सहित शोणित (रक्त) से उत्पन्न व्याधियों के तथा मद, मूर्च्छा और संन्यास के (विषय में) कुशल होते हैं; और आहार-विधि के विनिश्चय के, स्वभाव से हितकर और अहितकर आहार-द्रव्यों के, अग्र्य-संग्रह के, चौरासी आसवों के, द्रव्य, गुण और कर्म के विनिश्चय के, रस और अनुरस के आश्रय के, भेदों सहित वैरोधिक के, बारह वर्गों में बँटे, गुण और प्रभाव सहित तथा अनुपान के गुणों सहित अन्न-पान के, नौ प्रकार के अर्थ-संग्रह के, आहार की गति के, हितकर और अहितकर उपयोग के भेद से होने वाले शुभ और अशुभ के भेद के, औषध-संग्रह सहित धातुओं में आश्रित रोगों के, प्राणों के दस आयतनों के, और (उस विषय के) जिसे मैं तीसवें अध्याय अर्थेदशमहामूलीय में कहूँगा, और वहाँ (कहे जाने वाले) सम्पूर्ण तन्त्र के उद्देश और लक्षण के (विषय में भी) कुशल होते हैं; और तन्त्र के ग्रहण, धारण, विज्ञान, प्रयोग, कर्म, कार्य, काल, कर्ता और करण में कुशल होते हैं; और अपने शील और गुणों से अविसंवाद (मेल) रखते हुए तथा सब प्राणियों के प्रति माता, पिता, भाई और बन्धु की तरह मैत्री-भरा मन बनाए रखते हुए, स्मृति, मति, शास्त्र और युक्ति के ज्ञान में कुशल होते हैं। अग्निवेश, इस प्रकार (के गुणों से) युक्त (वैद्य) प्राणों के अभिसर और रोगों के नाशक होते हैं।

च. सू. २९/८

॥ ८ ॥

इनसे विपरीत (वैद्य) रोगों के अभिसर (साथ देने वाले) और प्राणों के हन्ता (नाश करने वाले) होते हैं। वैद्य के छद्म वेश में छिपे हुए, संसार के लिए काँटे बने हुए, प्रतिरूपकों (नकली रूप धरकर ठगने वालों) जैसे स्वभाव वाले वे राजाओं के प्रमाद (असावधानी) के कारण राष्ट्रों में घूमते फिरते हैं।

च. सू. २९/९

, ॥ ९ ॥

उनकी पहचान का विशेष लक्षण यह है: वे वैद्य के वेश में अपनी बहुत अधिक बड़ाई करते हुए, काम के लोभ से एक गली से दूसरी गली में घूमते हैं। किसी के रोगी होने की बात सुनकर वे उसके चारों ओर आ टूटते हैं, और उस (रोगी) के सुनते हुए ऊँचे स्वर में अपने वैद्य-गुणों का बखान करते हैं। जो वैद्य उसकी चिकित्सा कर रहा होता है, उसके दोषों को वे बार-बार गिनाते हैं। रोगी के मित्रों को वे प्रसन्न करके, उनके कान भरकर, उनकी सेवा-टहल करके, इत्यादि उपायों से अपना बनाना चाहते हैं, और अपने बारे में यह प्रचार करते हैं कि वे बहुत थोड़ा ही चाहते हैं। काम पाकर, चतुराई (के दिखावे) से अपना अज्ञान छिपाने की इच्छा से वे (रोगी को) बार-बार देखते हैं। रोग को दूर न कर पाने पर वे रोगी को ही साधनहीन, सेवकहीन और असंयमी बताते हैं। उसे अन्त (मृत्यु) के निकट देखकर वे अपना कोई बहाना बनाकर दूसरे स्थान पर चले जाते हैं। साधारण लोगों की भीड़ में वे अनाड़ियों की तरह अपनी कुशलता का बखान करते हैं, और अधीर लोगों की तरह धीर पुरुषों के धैर्य की निन्दा करते हैं। विद्वानों की सभा से वे दूर से ही ऐसे बचते हैं जैसे राहगीर भयानक बीहड़ वन से। सूत्र (शास्त्र-वचन) का जो कोई अंश इन्हें याद होता है, उसे वे बेमौके या किसी दूसरे प्रसंग में लगातार उद्धृत करते रहते हैं। वे न तो (अपने से) प्रश्न किया जाना चाहते हैं, न (दूसरों से) प्रश्न करना, और प्रश्न से ऐसे घबराते हैं जैसे मृत्यु से। इनका कोई आचार्य, शिष्य, सब्रह्मचारी (साथ पढ़ने वाला) या वैवादिक (शास्त्रार्थ का साथी) भी ज्ञात नहीं होता।

च. सू. २९/१०

- । ॥ १० ॥

और इस विषय में (ये श्लोक) हैं: जो इस प्रकार वैद्य के छद्म वेश में घुसकर रोगियों की ताक में रहते हैं, जैसे वन में बहेलिये जाल की ओट लेकर पक्षियों की (ताक में रहते हैं),

च. सू. २९/११

। ॥ ११ ॥

श्रुत (शास्त्र की शिक्षा), दृष्ट (प्रत्यक्ष देखा हुआ चिकित्सा-कर्म), क्रिया (चिकित्सा की विधि), काल (समय) और मात्रा के ज्ञान से वंचित वे (लोग) निश्चय ही त्याग देने योग्य हैं; वे पृथ्वी पर मृत्यु के अनुचर (सेवक) बनकर घूमते हैं।

च. सू. २९/१२

। ॥ १२ ॥

समझदार रोगी उन मूर्खों को त्याग दे जो जीविका के लिए (वैद्य बने हैं), वैद्य होने के घमण्ड से भरे हैं और विशारद (निपुण) बने फिरते हैं; वे पीतमारुत (वायु पिए हुए) सर्प हैं।

च. सू. २९/१३

। ॥ १३ ॥

परन्तु जो शास्त्र के ज्ञाता, दक्ष, शुचि (पवित्र), कर्म में निपुण, सधे हुए हाथ वाले और जितात्मा (मन को वश में रखने वाले) हैं, उन्हें सदा नमस्कार है।

च. सू. २९/१४

। ॥ १४ ॥

इस विषय में (संग्रह-)श्लोक: दशप्राणायतनीय (अध्याय) में श्लोकस्थान के विषयों का संग्रह, दो प्रकार के वैद्य और प्राण के आयतन (स्थान) कहे गए हैं।

च. सू. २९

॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में दशप्राणायतनीय नामक उनतीसवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।