व्याख्या
भगवान् आत्रेय यहाँ वह बात खोलकर बताते हैं जो अध्याय के आरम्भ (सू. ४/३) में केवल गिनती के रूप में कही गई थी: 'पचास महाकषाय'। इस अध्याय में कषाय का अर्थ कसैला स्वाद नहीं है; यहाँ कषाय वे औषध-द्रव्य हैं जिनसे स्वरस, कल्क, काढ़ा आदि कल्पनाएँ (preparations) बनती हैं (सू. ४/७)। महाकषाय ऐसे द्रव्यों का एक बड़ा समूह है, और हर महाकषाय का नाम उस काम से रखा गया है जो उसके द्रव्य करते हैं। ये पचास नाम दस वर्गों में रखे गए हैं। पहले वर्ग में छह हैं: जीवनीय (जीवन-शक्ति देने वाले), बृंहणीय (शरीर को पुष्ट करके बढ़ाने वाले), लेखनीय (लेखन यानी खुरचना; जो बढ़ा हुआ हो उसे खुरचकर घटाने वाले), भेदनीय (भेदन यानी तोड़ने वाले), सन्धानीय (टूटे हुए को जोड़ने वाले) और दीपनीय (अग्नि, यानी पाचन की शक्ति को दीप्त करने वाले)। दूसरे वर्ग में चार हैं: बल्य (बल देने वाले), वर्ण्य (वर्ण, यानी शरीर के रंग-रूप और कान्ति के लिए हितकर), कण्ठ्य (कण्ठ, यानी गले के लिए हितकर) और हृद्य (हृदय के लिए हितकर)। तीसरे वर्ग के छह नाम 'घ्न' (नष्ट करने वाला) से बने हैं: तृप्तिघ्न (तृप्ति को दूर करने वाले; तृप्ति यहाँ स्वस्थ सन्तोष नहीं, कोई रोग-दशा है, सम्भवतः वह जिसमें बिना खाए ही पेट भरा-सा लगता है; यह सूत्र उसे नहीं समझाता), अर्शोघ्न (अर्श, यानी बवासीर को), कुष्ठघ्न (कुष्ठ, यानी त्वचा के रोगों के एक बड़े समूह को), कण्डूघ्न (कण्डू, यानी खुजली को), क्रिमिघ्न (कृमि, यानी कीड़ों को) और विषघ्न (विष को नष्ट करने वाले)। चौथे वर्ग में चार हैं: स्तन्यजनन (स्तन्य, यानी माँ का दूध उत्पन्न करने वाले), स्तन्यशोधन (माँ के दूध को शुद्ध करने वाले), शुक्रजनन (शुक्र, यानी वीर्य उत्पन्न करने वाले) और शुक्रशोधन (शुक्र को शुद्ध करने वाले)। पाँचवें वर्ग के सात नाम 'उपग' से बने हैं, जिसका शब्दार्थ है 'पास जाने वाला'; यहाँ इसका अर्थ है किसी चिकित्सा-कर्म में सहायक: स्नेहोपग (स्नेहन में, यानी घी-तेल आदि स्नेह से शरीर को चिकना करने की चिकित्सा में), स्वेदोपग (स्वेदन, यानी पसीना लाने की चिकित्सा में), वमनोपग (वमन, यानी उल्टी कराकर दोष बाहर निकालने में), विरेचनोपग (विरेचन, यानी दस्त कराकर दोष बाहर निकालने में), आस्थापनोपग (आस्थापन में, यानी काढ़े आदि की बस्ति में; बस्ति वह औषध है जो गुदा के रास्ते दी जाती है), अनुवासनोपग (अनुवासन, यानी घी-तेल आदि स्नेह की बस्ति में) और शिरोविरेचनोपग (शिरोविरेचन, यानी नाक के रास्ते सिर का शोधन करने में सहायक)। छठे वर्ग के तीन नाम 'निग्रहण' (रोकने वाला) से बने हैं: छर्दिनिग्रहण (छर्दि, यानी उल्टी को), तृष्णानिग्रहण (तृष्णा, यानी बहुत प्यास को) और हिक्कानिग्रहण (हिक्का, यानी हिचकी को रोकने वाले)। सातवें वर्ग में पाँच हैं: पुरीषसंग्रहणीय (पुरीष, यानी मल को बाँधने वाले), पुरीषविरजनीय (मल के बिगड़े रंग को ठीक करने वाले; विरजन का शब्दार्थ है रंग हटाना), मूत्रसंग्रहणीय (मूत्र को थामने वाले), मूत्रविरजनीय (मूत्र के बिगड़े रंग को ठीक करने वाले) और मूत्रविरेचनीय (मूत्र को बाहर निकालने वाले)। आठवें वर्ग के पाँच नाम 'हर' (हरने, यानी दूर करने वाला) से बने हैं: कासहर (कास, यानी खाँसी को), श्वासहर (श्वास, यानी साँस फूलने के रोग को), शोथहर (शोथ, यानी सूजन को), ज्वरहर (ज्वर, यानी बुखार को) और श्रमहर (श्रम, यानी थकान को दूर करने वाले)। नौवें वर्ग के पाँच नाम 'प्रशमन' (शान्त करने वाला) से बने हैं: दाहप्रशमन (दाह, यानी जलन को), शीतप्रशमन (शीत, यानी ठण्ड लगने को), उदर्दप्रशमन (उदर्द को, जो त्वचा का एक रोग है; यह सूत्र उसका स्वरूप नहीं बताता), अङ्गमर्दप्रशमन (अङ्गमर्द, यानी अंगों के टूटने जैसे दर्द को) और शूलप्रशमन (शूल, यानी चुभने जैसे तेज़ दर्द को शान्त करने वाले)। दसवें वर्ग के पाँच नाम 'स्थापन' (स्थिर करने, ठीक दशा में टिकाने वाला) से बने हैं: शोणितस्थापन (शोणित, यानी रक्त को स्थिर करने वाले), वेदनास्थापन (वेदना, यानी पीड़ा को थामकर शान्त करने वाले), संज्ञास्थापन (संज्ञा, यानी होश या चेतना को फिर से स्थिर करने वाले), प्रजास्थापन (प्रजा, यानी गर्भ और सन्तान को स्थिर रखने वाले) और वयःस्थापन (वयस्, यानी उम्र की अवस्था को स्थिर रखने वाले)। इन दस वर्गों में क्रम से छह, चार, छह, चार, सात, तीन, पाँच, पाँच, पाँच और पाँच महाकषाय हैं, जो मिलकर पचास होते हैं। आत्रेय कहते हैं कि ये पचास महाकषाय महान् कषायों के लक्षण (पहचान) और उदाहरण दिखाने के लिए बताए गए हैं। फिर वे बताते हैं कि आगे हर महाकषाय के दस-दस द्रव्य गिनाए जाएँगे: 'दशावयविक' का शब्दार्थ है 'दस अवयवों (अंगों) वाला', यानी हर महाकषाय दस द्रव्यों से मिलकर बनता है। पचास महाकषायों में दस-दस द्रव्य होने से कुल पाँच सौ होते हैं, और यही वे 'पाँच सौ कषाय' हैं जिनकी गिनती अध्याय के आरम्भ (सू. ४/३) में दी गई थी। ये सूचियाँ अगले सूत्रों (सू. ४/९ से) में दी गई हैं; यहाँ केवल वर्गों के नाम हैं। मूल में 'अर्शोघ्नः' के स्थान पर 'अर्शोघ्रः' छपा है; यह सम्भवतः छपाई की भूल है (सू. ४/११ में 'अर्शोघ्नानि' है), इसलिए अनुवाद 'अर्शोघ्न' पढ़ता है।