भारत संहिता

अध्याय ४

षड्विरेचनशताश्रितीयोऽध्यायः

छह सौ विरेचन-योग (और पचास महाकषाय)

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भूमिका

षड्विरेचनशताश्रितीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का चौथा अध्याय है। इसका नाम इसके पहले विषय से पड़ा है: 'षड्' यानी छह, 'विरेचन-शत' यानी सौ विरेचन, और 'आश्रित' यानी उन पर आधारित; अर्थात् छह सौ विरेचन-योगों पर आधारित अध्याय। विरेचन का अर्थ है शरीर से दोषों को बाहर निकालना, और योग का अर्थ है किसी द्रव्य को दूसरे द्रव्यों के साथ मिलाकर बनाया गया नुस्खा। पर अध्याय का सबसे बड़ा भाग पचास महाकषायों का है। इस अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है। इसमें 'कषाय' शब्द बार-बार आता है; कसैला स्वाद इसका एक अर्थ है, पर यहाँ यह प्रायः औषधि-द्रव्य या उससे बनी औषधि के लिए आया है, जैसा कषाय-कल्पना के पाँच रूपों और महाकषायों की सूचियों से दिखता है।

अध्याय एक संग्रह, यानी छोटी विषय-सूची, से आरम्भ होता है, जिसमें छह विषय गिनाए गए हैं: छह सौ विरेचन, विरेचन के छह आश्रय, कषाय की पाँच योनियाँ, पाँच प्रकार की कषाय-कल्पना, पचास महाकषाय और पाँच सौ कषाय। फिर भगवान् आत्रेय इन्हें एक-एक करके खोलते हैं। छह सौ विरेचनों के लिए बारह द्रव्य या द्रव्यों के जोड़े गिनाए गए हैं, जैसे फल, जीमूतक, इक्ष्वाकु, कुटज, श्यामा और त्रिवृत्, और दन्ती और द्रवन्ती, और हर एक के योगों की संख्या दी गई है; इनकी विस्तृत व्याख्या आगे कल्पस्थान में करने की बात कही गई है। विरेचन के छह आश्रय पौधे के छह भाग हैं: क्षीर (दूध जैसा रस), मूल (जड़), त्वक् (छाल), पत्र (पत्ते), पुष्प (फूल) और फल। कषाय की पाँच योनियाँ पाँच रसों के नाम से हैं: मधुर, अम्ल, कटु, तिक्त और कषाय; छह रसों में से लवण इनमें नहीं गिना गया। कषाय-कल्पना, यानी द्रव्य से औषधि तैयार करने के पाँच ढंग हैं: स्वरस (यन्त्र से निचोड़ा हुआ रस), कल्क (पीसकर बनाई गई लुगदी), शृत (आग पर उबाला हुआ), शीत (तपाए हुए जल में रात भर रखे द्रव्य से निकला कषाय) और फाण्ट (गरम जल में डालकर मसला हुआ)। अध्याय के अनुसार इस क्रम में पहली कल्पना बाद वाली से अधिक बलवान् है, इसलिए कल्पना का चुनाव रोग और रोगी के बल पर निर्भर है, और हर कल्पना हर जगह उपयोगी नहीं होती।

इसके बाद पचास महाकषाय आते हैं, जो दस वर्गों में रखे गए हैं। हर महाकषाय का नाम उस काम पर है जो उसके द्रव्य करते हैं: जैसे जीवनीय (जीवन-शक्ति देने वाले), बृंहणीय (शरीर को पुष्ट करने वाले), दीपनीय (पाचन की अग्नि को दीप्त करने वाले), कुष्ठघ्न (त्वचा के रोगों को दूर करने वाले), स्तन्यजनन (माँ का दूध उत्पन्न करने वाले), वमनोपग (वमन में सहायक), ज्वरहर (ज्वर दूर करने वाले), शूलप्रशमन (तेज़ पीड़ा शान्त करने वाले) और वयःस्थापन (उम्र की अवस्था को स्थिर रखने वाले)। हर महाकषाय में दस-दस द्रव्य गिनाए गए हैं, जो मिलकर पाँच सौ कषाय होते हैं। ये पचास समूह महान् कषायों के लक्षण और उदाहरण के लिए कहे गए हैं। कारण यह बताया गया है कि विस्तार की कोई सीमा नहीं है, और बहुत संक्षेप कम समझ वाले के काम का नहीं होता; इसलिए न बहुत संक्षेप रखा गया, न बहुत विस्तार। इतने समूह कम समझ वाले के व्यवहार के लिए पर्याप्त हैं, और जो बुद्धिमान् द्रव्यों के अपने लक्षणों से अनुमान करने और युक्ति में कुशल है, वह इन्हीं के सहारे वे बातें भी जान लेता है जो यहाँ नहीं कही गईं।

इस पर अग्निवेश आपत्ति करते हैं कि पाँच सौ कषाय पूरे नहीं होते, क्योंकि वे ही द्रव्य अलग-अलग महाकषायों में फिर-फिर आते हैं। भगवान् आत्रेय उत्तर देते हैं कि बुद्धिमान् को इसे इस प्रकार नहीं देखना चाहिए: एक ही वस्तु अलग-अलग कार्य करते हुए अनेक नाम पाती है, जैसे एक पुरुष जो-जो कर्म करता है, उस-उस कर्म से बना विशेष नाम पाता है; औषध-द्रव्य को भी ऐसे ही देखना चाहिए। और वे पूछते हैं कि यदि कोई एक ही द्रव्य ऐसा मिल जाता जो सब कर्म कर सके, तो उसे छोड़कर दूसरा द्रव्य कौन जानना या शिष्यों को सिखाना चाहता।

अध्याय के अन्त के संग्रह-श्लोक इन सब विषयों को दोहराते हैं, और अन्तिम श्लोक कहता है कि वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो इन कषायों का बाहरी और भीतरी कर्मों में उपयोग, उनका संयोग और उनका प्रयोग जानता है। इस अध्याय से दो बातें साथ ले जाने योग्य हैं: महाकषायों की सूचियाँ सम्पूर्ण नहीं, लक्षण और उदाहरण हैं, जिनके सहारे समझदार वैद्य न कही गई बातें भी जान सके; और एक ही द्रव्य अपने अलग-अलग कर्मों के कारण कई समूहों में आ सकता है। अध्याय की अन्तिम पुष्पिका बताती है कि इसके साथ भेषजचतुष्क, यानी औषध सम्बन्धी चार अध्यायों का समूह, पूरा होता है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २३-२९)

तत्र श्लोकाः -यतो यावन्ति यैर्द्रव्यैर्विरेचनशतानि षट्।उक्तानि संग्रहेणेह तथैवैषां षडाश्रयाः॥

श्लोक २३ →

इस विषय में (ये) श्लोक हैं - जिस (स्रोत) से, जितने और जिन द्रव्यों से (बनने वाले) छह सौ विरेचन (योग) यहाँ संक्षेप में कहे गए हैं, उसी प्रकार इनके छह आश्रय भी (कहे गए हैं)।

रसा लवणवर्ज्याश्च कषाय इति संज्ञिताः।तस्मात् पञ्चविधा योनिः कषायाणामुदाहृता॥

श्लोक २४ →

और लवण को छोड़कर (शेष पाँच) रस 'कषाय' नाम से कहे गए हैं; इसलिए कषायों की योनि (उत्पत्ति का स्रोत) पाँच प्रकार की बताई गई है।

तथा कल्पनमप्येषामुक्तं पञ्चविधं पुनः।महतां च कषायाणां पञ्चाशत् परिकीर्तिता॥

श्लोक २५ →

उसी प्रकार इन (कषायों) की कल्पना (तैयार करने की विधि) भी फिर पाँच प्रकार की कही गई है; और महान् कषायों (महाकषायों) की (संख्या) पचास बताई गई है।

पञ्च चापि कषायाणां शतान्युक्तानि भागशः।लक्षणार्थं, प्रमाणं हि विस्तरस्य न विद्यते॥

श्लोक २६ →

और कषायों के पाँच सौ (द्रव्य) भी वर्गों में बाँटकर लक्षण (पहचान) बताने के लिए कहे गए हैं, क्योंकि विस्तार की कोई सीमा नहीं है।

न चालमतिसंक्षेपः सामर्थ्यायोपकल्पते।अल्पबुद्धेरयं तस्मान्नातिसंक्षेपविस्तरः॥

श्लोक २७ →

और अति संक्षेप अल्प बुद्धि वाले (व्यक्ति) की सामर्थ्य के लिए पर्याप्त उपयोगी नहीं होता; इसलिए यह (वर्णन) न अति संक्षिप्त है, न अति विस्तृत।

मन्दानां व्यवहाराय, बुधानां बुद्धिवृद्धये।पञ्चाशत्को ह्ययं वर्गः कषायाणामुदाहृतः॥

श्लोक २८ →

मन्द (धीमी बुद्धि वालों) के व्यवहार (काम में लाने) के लिए और बुधों (बुद्धिमानों) की बुद्धि की वृद्धि के लिए ही कषायों का यह पचास वाला वर्ग बताया गया है।

तेषां कर्मसु बाह्येषु योगमाभ्यन्तरेषु च।संयोगं च प्रयोगं च यो वेद स भिषग्वरः॥

श्लोक २९ →

जो उन (कषायों) के बाहरी और भीतरी कर्मों (उपचारों) में योग (उपयोग) को, और संयोग तथा प्रयोग, दोनों को जानता है, वह भिषग्वर (श्रेष्ठ वैद्य) है।

मुख्य शब्द (१३) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
विरेचन
विरेचन - दस्त कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √रिच् (खाली करना)।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से दस्त कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: ग्यारह मूलिनी और दस फलिनी औषधियाँ विरेचन के लिए बताई गई हैं (सू. १/८०, १/८५)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

मूल पाठ के किसी शब्द पर टैप करें - उसका अर्थ दिखेगा।

च. सू. ४/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम षड्विरेचनशताश्रितीय (छह सौ विरेचन-योगों पर आश्रित) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. ४/२

॥ २ ॥

ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. ४/३

, , , , , , ॥ ३ ॥

यहाँ (इस शास्त्र में) निश्चय ही छह सौ विरेचन (योग) हैं, विरेचन के छह आश्रय, कषाय की पाँच योनियाँ (उद्गम), पाँच प्रकार की कषाय-कल्पना (कषाय बनाने की विधि), पचास महाकषाय, (और) पाँच सौ कषाय; यह (इस अध्याय का) संग्रह (संक्षेप) है।

च. सू. ४/४

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'छह सौ विरेचन' ऐसा जो (पहले) कहा गया, उसे यहाँ संक्षेप में बताकर (हम) कल्पोपनिषद् (कल्पस्थान) में विस्तार से (उसकी) व्याख्या करेंगे; [उनमें] फलों (मदनफल) में एक सौ तैंतीस योग बताए गए हैं, जीमूतकों में उनतालीस योग, इक्ष्वाकुओं में पैंतालीस, धामार्गव साठ प्रकार के योगों से युक्त होता है, कुटज तो अठारह प्रकार से योग में आता है, कृतवेधन साठ प्रकार के योगों से युक्त होता है, श्यामा और त्रिवृत् (निशोथ) के सौ योग बताए गए हैं और इनमें दस दूसरे योग भी हैं, चतुरङ्गुल (अमलतास) बारह प्रकार से योग में आता है, लोध्र (प्रयोग की) विधि में सोलह योगों से युक्त है, महावृक्ष (थूहर) बीस योगों से युक्त होता है, सप्तला और शङ्खिनी के उनतालीस योग, (और) दन्ती और द्रवन्ती के अड़तालीस; इस प्रकार (ये) छह सौ विरेचन (योग) हैं।

च. सू. ४/५

॥ ५ ॥

'विरेचन के छह आश्रय' (जो कहे गए, वे) क्षीर (दूध जैसा रस), मूल (जड़), त्वक् (छाल), पत्र (पत्ते), पुष्प (फूल) और फल हैं।

च. सू. ४/६

॥ ६ ॥

'कषाय की पाँच योनियाँ' (जो कही गईं, वे) मधुर कषाय, अम्ल कषाय, कटु कषाय, तिक्त कषाय और कषाय कषाय हैं; यह तन्त्र (इस शास्त्र) में (इनकी) संज्ञा (पारिभाषिक नाम) है।

च. सू. ४/७

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'पाँच प्रकार की कषाय-कल्पना (कषाय बनाने की विधि)' (जो कही गई, वह) इस प्रकार है: स्वरस, कल्क, शृत, शीत और फाण्ट; (ये) कषाय (हैं)। [यन्त्र से निचोड़े गए द्रव्य से (निकला) रस स्वरस कहा जाता है। रस (द्रव) के साथ पीसे गए (द्रव्यों) का जो पिण्ड (गोला) है, वह कल्क कहा गया है। अग्नि पर उबाले गए द्रव्य को चिकित्सक शृत कहते हैं। कुचले हुए द्रव्य से, जो तपाए हुए जल में रात भर रखा गया हो, जो कषाय निकलता है, वह शीत कहा गया है। गरम जल में डालकर मसला गया (द्रव्य), वह फाण्ट कहा गया है।] उनमें (क्रम से) पहले-पहले वाले का बल अधिक है; इसलिए कषाय-कल्पना व्याधि (रोग) और आतुर (रोगी) के बल की अपेक्षा रखती है; परन्तु ऐसा नहीं है कि सब (कल्पनाएँ) सब जगह उपयोगी होती हैं।

च. सू. ४/८

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'पचास महाकषाय' - ऐसा जो कहा गया था, उसकी हम आगे व्याख्या करेंगे; वह इस प्रकार है - जीवनीय, बृंहणीय, लेखनीय, भेदनीय, सन्धानीय, दीपनीय, यह छह का कषाय-वर्ग है; बल्य, वर्ण्य, कण्ठ्य, हृद्य, यह चार का कषाय-वर्ग है; तृप्तिघ्न, अर्शोघ्न, कुष्ठघ्न, कण्डूघ्न, क्रिमिघ्न, विषघ्न, यह छह का कषाय-वर्ग है; स्तन्यजनन, स्तन्यशोधन, शुक्रजनन, शुक्रशोधन, यह चार का कषाय-वर्ग है; स्नेहोपग, स्वेदोपग, वमनोपग, विरेचनोपग, आस्थापनोपग, अनुवासनोपग, शिरोविरेचनोपग, यह सात का कषाय-वर्ग है; छर्दिनिग्रहण, तृष्णानिग्रहण, हिक्कानिग्रहण, यह तीन का कषाय-वर्ग है; पुरीषसंग्रहणीय, पुरीषविरजनीय, मूत्रसंग्रहणीय, मूत्रविरजनीय, मूत्रविरेचनीय, यह पाँच का कषाय-वर्ग है; कासहर, श्वासहर, शोथहर, ज्वरहर, श्रमहर, यह पाँच का कषाय-वर्ग है; दाहप्रशमन, शीतप्रशमन, उदर्दप्रशमन, अङ्गमर्दप्रशमन, शूलप्रशमन, यह पाँच का कषाय-वर्ग है; शोणितस्थापन, वेदनास्थापन, संज्ञास्थापन, प्रजास्थापन, वयःस्थापन, यह पाँच का कषाय-वर्ग है; इस प्रकार पचास महाकषाय बता दिए गए हैं, और (यह) महान् कषायों के लक्षण और उदाहरण (दिखाने) के लिए (किया गया है)। उनमें से एक-एक महाकषाय में (उसके) दस अवयवों (घटकों) के रूप में दस कषायों की हम आगे व्याख्या करेंगे; वे ही पाँच सौ कषाय होते हैं।

च. सू. ४/९

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वे इस प्रकार हैं - जीवक और ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुद्गपर्णी और माषपर्णी, जीवन्ती तथा मधुक - ये दस (द्रव्य) जीवनीय (जीवन-शक्ति देने वाले) होते हैं (१); क्षीरिणी, राजक्षवक, अश्वगन्धा, काकोली, क्षीरकाकोली, वाठ्यायनी, भद्रौदनी, भारद्वाजी, पयस्या और ऋष्यगन्धा - ये दस बृंहणीय (शरीर को पुष्ट करने वाले) होते हैं (२); मुस्त (नागरमोथा), कुष्ठ (कूठ), हरिद्रा (हल्दी), दारुहरिद्रा (दारुहल्दी), वचा (वच), अतिविषा (अतीस), कटुरोहिणी (कुटकी), चित्रक, चिरबिल्व और हैमवती - ये दस लेखनीय (खुरचकर घटाने वाले) होते हैं (३); सुवहा, अर्क (आक), उरुबुक (एरण्ड), अग्निमुखी, चित्रा, चित्रक, चिरबिल्व, शङ्खिनी, शकुलादनी और स्वर्णक्षीरी - ये दस भेदनीय (तोड़ने वाले) होते हैं (४); मधुक, मधुपर्णी, पृश्निपर्णी, अम्बष्ठकी, समङ्गा, मोचरस, धातकी (धाय), लोध्र, प्रियङ्गु और कट्फल (कायफल) - ये दस सन्धानीय (जोड़ने वाले) होते हैं (५); पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, शृङ्गवेर (अदरक), अम्लवेतस, मरिच (काली मिर्च), अजमोदा, भल्लातकास्थि (भिलावे की गुठली) और हिङ्गुनिर्यास (हींग) - ये दस दीपनीय (अग्नि को प्रदीप्त करने वाले) होते हैं (६); इस प्रकार यह छह (महाकषायों) का कषाय-वर्ग है।

च. सू. ४/१०

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ऐन्द्री, ऋषभी, अतिरसा, ऋष्यप्रोक्ता, पयस्या, अश्वगन्धा, स्थिरा, रोहिणी, बला और अतिबला - ये दस (द्रव्य) बल्य (बल देने वाले) होते हैं (७); चन्दन, तुङ्ग, पद्मक, उशीर (खस), मधुक, मञ्जिष्ठा (मजीठ), सारिवा, पयस्या, सिता और लता - ये दस वर्ण्य (वर्ण अर्थात् रंगत सुधारने वाले) होते हैं (८); सारिवा, इक्षुमूल (ईख की जड़), मधुक, पिप्पली, द्राक्षा (अंगूर), विदारी, कैटर्य, हंसपादी, बृहती और कण्टकारिका (कटेरी) - ये दस कण्ठ्य (कण्ठ के लिए हितकर) होते हैं (९); आम्र (आम), आम्रातक, लिकुच, करमर्द (करौंदा), वृक्षाम्ल, अम्लवेतस, कुवल, बदर (बेर), दाडिम (अनार) और मातुलुङ्ग (बिजौरा) - ये दस हृद्य (हृदय के लिए हितकर) होते हैं (१०); इस प्रकार यह चार (महाकषायों) का कषाय-वर्ग है।

च. सू. ४/११

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गागर (सम्भवतः नागर अर्थात् सोंठ), चव्य, चित्रक, विडङ्ग (वायविडंग), मूर्वा, गुडूची (गिलोय), वचा (वच), मुस्त (नागरमोथा), पिप्पली और पटोल (परवल), ये दस तृप्तिघ्न (तृप्ति नामक विकार को दूर करने वाले) हैं (११); कुटज, बिल्व (बेल), चित्रक, नागर (सोंठ), अतिविषा (अतीस), अभया (हरीतकी), धन्वयासक, दारुहरिद्रा (दारुहल्दी), वचा और चव्य, ये दस अर्शोघ्न (अर्श अर्थात् बवासीर को दूर करने वाले) हैं (१२); खदिर (खैर), अभया, आमलक (आँवला), हरिद्रा (हल्दी), अरुष्कर (भिलावा), सप्तपर्ण, आरग्वध (अमलतास), करवीर (कनेर), विडङ्ग और जाती (चमेली) की कोंपलें, ये दस कुष्ठघ्न (कुष्ठ अर्थात् त्वचा के रोगों को दूर करने वाले) हैं (१३); चन्दन, नलद (जटामांसी), कृतमाल, नक्तमाल (करंज), निम्ब (नीम), कुटज, सर्षप (सरसों), मधुक, दारुहरिद्रा और मुस्त, ये दस कण्डूघ्न (खुजली को दूर करने वाले) हैं (१४); अक्षीव, मरिच (काली मिर्च), गण्डीर, केबुक, विडङ्ग, निर्गुण्डी, किणिही, श्वदंष्ट्रा (गोखरू), वृषपर्णिका और आखुपर्णिका, ये दस क्रिमिघ्न (कृमि अर्थात् कीड़ों को नष्ट करने वाले) हैं (१५); हरिद्रा, मञ्जिष्ठा (मजीठ), सुवहा, सूक्ष्मैला (छोटी इलायची), पालिन्दी, चन्दन, कतक (निर्मली), शिरीष (सिरस), सिन्धुवार और श्लेष्मातक (लसोड़ा), ये दस विषघ्न (विष को नष्ट करने वाले) हैं (१६)। इस प्रकार यह छह (महाकषायों) वाला कषाय-वर्ग है।

च. सू. ४/१२

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वीरण, शालि (धान), षष्टिक (साठी धान), इक्षुवालिका, दर्भ, कुश, काश, गुन्द्रा, इत्कट और कत्तृण की जड़ें, ये दस स्तन्यजनन (स्तन्य अर्थात् माँ का दूध उत्पन्न करने वाले) हैं (१७); पाठा, महौषध (सोंठ), सुरदारु (देवदारु), मुस्त (नागरमोथा), मूर्वा, गुडूची (गिलोय), वत्सक का फल, किराततिक्तक (चिरायता), कटुरोहिणी (कुटकी) और सारिवा, ये दस स्तन्यशोधन (माँ के दूध को शुद्ध करने वाले) हैं (१८); जीवक, ऋषभक, काकोली, क्षीरकाकोली, मुद्गपर्णी, माषपर्णी, मेदा, वृद्धरुहा, जटिला और कुलिङ्ग, ये दस शुक्रजनन (शुक्र अर्थात् वीर्य उत्पन्न करने वाले) हैं (१९); कुष्ठ (कूठ), एलवालुक, कट्फल (कायफल), समुद्रफेन, कदम्ब का निर्यास (गोंद), इक्षुकाण्ड, इक्षु (ईख), इक्षुरक, वसुक और उशीर (खस), ये दस शुक्रशोधन (शुक्र को शुद्ध करने वाले) हैं (२०)। इस प्रकार यह चार (महाकषायों) वाला कषाय-वर्ग है।

च. सू. ४/१३

), ), ), ), ), ), ), ॥ १३ ॥

मृद्वीका (अंगूर), मधुक, मधुपर्णी, मेदा, विदारी, काकोली, क्षीरकाकोली, जीवक, जीवन्ती और शालपर्णी, ये दस स्नेहोपग (स्नेहन में सहायक) होते हैं (२१); शोभाञ्जनक (सहजन), एरण्ड (अरंड), अर्क (आक), वृश्चीर, पुनर्नवा, यव (जौ), तिल, कुलत्थ (कुलथी), माष (उड़द) और बदर (बेर), ये दस स्वेदोपग (स्वेदन में सहायक) होते हैं (२२); मधु (शहद), मधुक, कोविदार (कचनार), कर्बुदार, नीप (कदम्ब), विदुल, बिम्बी, शणपुष्पी, सदापुष्पा और प्रत्यक्पुष्पा, ये दस वमनोपग (वमन में सहायक) होते हैं (२३); द्राक्षा (अंगूर), काश्मर्य, परूषक (फालसा), अभया (हरीतकी), आमलक (आँवला), बिभीतक (बहेड़ा), कुवल, बदर (बेर), कर्कन्धु और पीलु, ये दस विरेचनोपग (विरेचन में सहायक) होते हैं (२४); त्रिवृत् (निशोथ), बिल्व (बेल), पिप्पली, कुष्ठ (कूठ), सर्षप (सरसों), वचा (वच), वत्सक के फल, शतपुष्पा, मधुक और मदनफल (मैनफल), ये दस आस्थापनोपग (आस्थापन बस्ति में सहायक) होते हैं (२५); रास्ना, सुरदारु (देवदारु), बिल्व (बेल), मदन (मैनफल), शतपुष्पा, वृश्चीर, पुनर्नवा, श्वदंष्ट्रा (गोखरू), अग्निमन्थ और श्योनाक, ये दस अनुवासनोपग (अनुवासन बस्ति में सहायक) होते हैं (२६); ज्योतिष्मती (मालकांगनी), क्षवक, मरिच (काली मिर्च), पिप्पली, विडङ्ग (वायविडंग), शिग्रु (सहजन), सर्षप (सरसों), अपामार्ग (चिरचिटा) के तण्डुल (बीज), श्वेता और महाश्वेता, ये दस शिरोविरेचनोपग (शिरोविरेचन में सहायक) होते हैं (२७); इस प्रकार यह सात (महाकषायों) का कषाय-वर्ग (हुआ)।

च. सू. ४/१४

), ), ), ॥ १४ ॥

जम्बू (जामुन) और आम्र (आम) के पल्लव (कोमल पत्ते), मातुलुङ्ग (बिजौरा), अम्लबदर (खट्टा बेर), दाडिम (अनार), यव (जौ), यष्टिका, उशीर (खस), मृत् (मिट्टी) और लाजा (खील), ये दस छर्दिनिग्रहण (उल्टी को रोकने वाले) होते हैं (२८); नागर (सोंठ), धन्वयवासक, मुस्त (नागरमोथा), पर्पटक, चन्दन, किराततिक्तक (चिरायता), गुडूची (गिलोय), ह्रीवेर, धान्यक (धनिया) और पटोल (परवल), ये दस तृष्णानिग्रहण (प्यास को रोकने वाले) होते हैं (२९); शटी, पुष्करमूल, बदर (बेर) के बीज, कण्टकारिका (कटेरी), बृहती, वृक्षरुहा, अभया (हरीतकी), पिप्पली, दुरालभा और कुलीरशृङ्गी, ये दस हिक्कानिग्रहण (हिचकी को रोकने वाले) होते हैं (३०); इस प्रकार यह तीन (महाकषायों) का कषाय-वर्ग (हुआ)।

च. सू. ४/१५

), ), ), ), ), ॥ १५ ॥

प्रियङ्गु, अनन्ता, आम्र (आम) की अस्थि (गुठली), कट्वङ्ग, लोध्र, मोचरस, समङ्गा, धातकी (धाय) के पुष्प, पद्मा और पद्मकेशर (कमल के केसर), ये दस पुरीषसंग्रहणीय (मल को बाँधने वाले) होते हैं (३१); जम्बु (जामुन) और शल्लकी की त्वक् (छाल), कच्छुरा, मधूक (महुआ), शाल्मली (सेमल), श्रीवेष्टक, भृष्टमृत् (भुनी हुई मिट्टी), पयस्या, उत्पल और तिलकण (तिल के दाने), ये दस पुरीषविरजनीय (मल के बिगड़े रंग को ठीक करने वाले) होते हैं (३२); जम्बु, आम्र, प्लक्ष (पाकड़), वट (बरगद), कपीतन, उडुम्बर (गूलर), अश्वत्थ (पीपल), भल्लातक (भिलावा), अश्मन्तक और सोमवल्क, ये दस मूत्रसंग्रहणीय (मूत्र को बाँधने वाले) होते हैं (३३); पद्म, उत्पल, नलिन, कुमुद, सौगन्धिक, पुण्डरीक, शतपत्र, मधुक, प्रियङ्गु और धातकी के पुष्प, ये दस मूत्रविरजनीय (मूत्र के बिगड़े रंग को ठीक करने वाले) होते हैं (३४); वृक्षादनी, श्वदंष्ट्रा (गोखरू), वसुक, वशिर, पाषाणभेद, दर्भ, कुश, काश, गुन्द्र और इत्कट के मूल (जड़ें), ये दस मूत्रविरेचनीय (मूत्र को बाहर निकालने वाले) होते हैं (३५)। इस प्रकार यह पाँच (महाकषायों) का कषाय-वर्ग है।

च. सू. ४/१६

), ), ), ), ), ॥ १६ ॥

द्राक्षा (अंगूर), अभया (हरीतकी), आमलक (आँवला), पिप्पली, दुरालभा, शृङ्गी, कण्टकारिका (कटेरी), वृश्चीर, पुनर्नवा और तामलकी, ये दस कासहर (खाँसी दूर करने वाले) होते हैं (३६); शटी, पुष्करमूल, अम्लवेतस, एला (इलायची), हिङ्गु (हींग), अगुरु (अगर), सुरसा, तामलकी, जीवन्ती और चण्डा, ये दस श्वासहर (श्वास रोग दूर करने वाले) होते हैं (३७); पाटला, अग्निमन्थ, श्योनाक, बिल्व (बेल), काश्मर्य, कण्टकारिका, बृहती, शालपर्णी, पृश्निपर्णी और गोक्षुरक (गोखरू), ये दस श्वयथुहर (सूजन दूर करने वाले) होते हैं (३८); सारिवा, शर्करा (शक्कर), पाठा, मञ्जिष्ठा (मजीठ), द्राक्षा, पीलु, परूषक (फालसा), अभया, आमलक और बिभीतक (बहेड़ा), ये दस ज्वरहर (ज्वर दूर करने वाले) होते हैं (३९); द्राक्षा, खर्जूर (खजूर), प्रियाल (चिरौंजी), बदर (बेर), दाडिम (अनार), फल्गु, परुषक, इक्षु (ईख), यव (जौ) और षष्टिक (साठी धान), ये दस श्रमहर (थकान दूर करने वाले) होते हैं (४०)। इस प्रकार यह पाँच (महाकषायों) का कषाय-वर्ग है।

च. सू. ४/१७

), ), ), ), ), ॥ १७ ॥

लाजा (खील), चन्दन, काश्मर्य का फल, मधूक (महुआ), शर्करा (शक्कर), नीलोत्पल (नीला कमल), उशीर (खस), सारिवा, गुडूची (गिलोय) और ह्रिबेर, ये दस दाहप्रशमन (जलन शान्त करने वाले) हैं (४१); तगर, अगुरु (अगर), धान्यक (धनिया), शृङ्गवेर (अदरक), भूतीक, वचा (वच), कण्टकारी (कटेरी), अग्निमन्थ, श्योनाक और पिप्पली, ये दस शीतप्रशमन (ठण्ड शान्त करने वाले) हैं (४२); तिन्दुक, प्रियाल (चिरौंजी), बदर (बेर), खदिर (खैर), कदर, सप्तपर्ण, अश्वकर्ण, अर्जुन, असन और अरिमेद, ये दस उदर्दप्रशमन (उदर्द रोग शान्त करने वाले) हैं (४३); विदारीगन्धा, पृश्निपर्णी, बृहती, कण्टकारिका, एरण्ड (अरंड), काकोली, चन्दन, उशीर, एला (इलायची) और मधुक, ये दस अङ्गमर्दप्रशमन (बदन टूटना शान्त करने वाले) हैं (४४); पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, शृङ्गवेर, मरिच (काली मिर्च), अजमोदा, अजगन्धा, अजाजी और गण्डीर, ये दस शूलप्रशमन (शूल यानी तीव्र पीड़ा शान्त करने वाले) हैं (४५)। इस प्रकार यह पाँच (महाकषायों) का कषाय-वर्ग है।

च. सू. ४/१८

), ), ), ), ), ॥ १८ ॥

मधु (शहद), मधुक, रुधिर, मोचरस, मृत्कपाल (मिट्टी का ठीकरा), लोध्र, गैरिक (गेरू), प्रियङ्गु, शर्करा (शक्कर) और लाजा (खील), ये दस शोणितस्थापन (रक्त को स्थिर करने वाले) हैं (४६); शाल (साल), कट्फल (कायफल), कदम्ब, पद्मक, तुम्ब, मोचरस, शिरीष (सिरस), वञ्जुल, एलवालुक और अशोक, ये दस वेदनास्थापन (पीड़ा को थामने वाले) हैं (४७); हिङ्गु (हींग), कैटर्य, अरिमेद, वचा (वच), चोरक, वयस्था, गोलोमी, जटिला, पलङ्कषा और अशोकरोहिणी, ये दस संज्ञास्थापन (चेतना को बनाए रखने वाले) हैं (४८); ऐन्द्री, ब्राह्मी, शतवीर्या, सहस्रवीर्या, अमोघा, अव्यथा, शिवा, अरिष्टा, वाट्यपुष्पी और विष्वक्सेनकान्ता, ये दस प्रजास्थापन (सन्तान को स्थापित करने वाले) हैं (४९); अमृता, अभया (हरीतकी), धात्री (आँवला), मुक्ता, श्वेता, जीवन्ती, अतिरसा, मण्डूकपर्णी, स्थिरा और पुनर्नवा, ये दस वयःस्थापन (वय यानी उम्र की अवस्था को स्थिर रखने वाले) हैं (५०)। इस प्रकार यह पाँच (महाकषायों) का कषाय-वर्ग है।

च. सू. ४/१९

॥ १९ ॥

इस प्रकार पाँच सौ कषायों को (दस-दस के समूहों में) मिलाकर पचास महाकषायों की व्याख्या की गई है, और (यह) महान् कषायों के लक्षण और उदाहरण (देने) के लिए (की गई है)।

च. सू. ४/२०

, , । , ॥ २० ॥

क्योंकि विस्तार की कोई सीमा नहीं है, और अति संक्षेप भी अल्पबुद्धि (कम समझ वाले) लोगों की सामर्थ्य (समझने की क्षमता) के लिए उपयुक्त नहीं होता, इसलिए (ये महाकषाय) न अति संक्षेप से और न अति विस्तार से उपदेश किए गए हैं। क्योंकि इतने (महाकषाय) अल्पबुद्धि लोगों के व्यवहार (प्रयोग) के लिए पर्याप्त हैं, और उन बुद्धिमानों के लिए भी, जो (द्रव्यों के) अपने विशेष लक्षणों से अनुमान करने और युक्ति में कुशल हैं, न कहे गए विषयों को जानने के लिए (पर्याप्त हैं)।

च. सू. ४/२१

- ! , ॥ २१ ॥

ऐसा कहने वाले भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा - भगवन्! ये पाँच सौ कषाय पूरे नहीं होते, क्योंकि वे-वे ही अङ्ग (द्रव्य) उन-उन महाकषायों में फिर-फिर आ जाते हैं।

च. सू. ४/२२

- । , - , , । , ॥ २२ ॥

उनसे (अग्निवेश से) भगवान् आत्रेय ने कहा - अग्निवेश! बुद्धिमान् को इसे इस प्रकार नहीं देखना चाहिए। क्योंकि एक (वस्तु) भी भिन्न-भिन्न कार्य करते हुए अनेक संज्ञाएँ (नाम) पाती है; जैसे - पुरुष बहुत-से कर्मों को करने में समर्थ होता है, (और) वह जो-जो कर्म करता है, उस-उस कर्म के कर्ता, करण (साधन) और कार्य (फल) से जुड़ा हुआ वह-वह गौण (कर्म से बना) विशेष नाम पाता है; उसी प्रकार औषध-द्रव्य को भी देखना चाहिए। और यदि हमें कोई एक ही द्रव्य ऐसे गुणों से युक्त मिल जाता, जो सब कर्मों को करने में समर्थ होता, तो उसके अतिरिक्त दूसरा (द्रव्य) कौन जानना या शिष्यों को सिखाना चाहता?

च. सू. ४/२३

- । ॥ २३ ॥

इस विषय में (ये) श्लोक हैं - जिस (स्रोत) से, जितने और जिन द्रव्यों से (बनने वाले) छह सौ विरेचन (योग) यहाँ संक्षेप में कहे गए हैं, उसी प्रकार इनके छह आश्रय भी (कहे गए हैं)।

च. सू. ४/२४

। ॥ २४ ॥

और लवण को छोड़कर (शेष पाँच) रस 'कषाय' नाम से कहे गए हैं; इसलिए कषायों की योनि (उत्पत्ति का स्रोत) पाँच प्रकार की बताई गई है।

च. सू. ४/२५

। ॥ २५ ॥

उसी प्रकार इन (कषायों) की कल्पना (तैयार करने की विधि) भी फिर पाँच प्रकार की कही गई है; और महान् कषायों (महाकषायों) की (संख्या) पचास बताई गई है।

च. सू. ४/२६

।, ॥ २६ ॥

और कषायों के पाँच सौ (द्रव्य) भी वर्गों में बाँटकर लक्षण (पहचान) बताने के लिए कहे गए हैं, क्योंकि विस्तार की कोई सीमा नहीं है।

च. सू. ४/२७

। ॥ २७ ॥

और अति संक्षेप अल्प बुद्धि वाले (व्यक्ति) की सामर्थ्य के लिए पर्याप्त उपयोगी नहीं होता; इसलिए यह (वर्णन) न अति संक्षिप्त है, न अति विस्तृत।

च. सू. ४/२८

, । ॥ २८ ॥

मन्द (धीमी बुद्धि वालों) के व्यवहार (काम में लाने) के लिए और बुधों (बुद्धिमानों) की बुद्धि की वृद्धि के लिए ही कषायों का यह पचास वाला वर्ग बताया गया है।

च. सू. ४/२९

। ॥ २९ ॥

जो उन (कषायों) के बाहरी और भीतरी कर्मों (उपचारों) में योग (उपयोग) को, और संयोग तथा प्रयोग, दोनों को जानता है, वह भिषग्वर (श्रेष्ठ वैद्य) है।

च. सू. ४

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में षड्विरेचनशताश्रितीय नामक चौथा अध्याय (पूरा हुआ)।

च. सू. ४

॥॥

इस प्रकार भेषजचतुष्क (औषध सम्बन्धी चार अध्यायों का समूह) (पूरा हुआ)।