भूमिका
मात्राशितीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का पाँचवाँ अध्याय है। इसका नाम इसके पहले उपदेश 'मात्राशी स्यात्' से पड़ा है: मनुष्य मात्राशी हो, यानी उचित मात्रा (परिमाण) में भोजन करने वाला हो। इस अध्याय का उपदेश भी भगवान् आत्रेय का है। अध्याय के दो विषय हैं: मात्रा के अनुसार भोजन, और दिनचर्या, यानी वे काम जिन्हें अध्याय स्वस्थ मनुष्य के लिए अपने शरीर की देखभाल में नियम से करने योग्य बताता है। हर काम के साथ उसके गुण, यानी लाभ, भी बताए गए हैं।
भगवान् आत्रेय बताते हैं कि आहार की मात्रा अग्नि, यानी पाचन की शक्ति, के बल पर निर्भर है: किसी व्यक्ति के लिए उचित मात्रा उतनी है जितना भोजन उसकी स्वाभाविक अवस्था को बिगाड़े बिना ठीक समय पर पच जाए। स्वभाव से लघु (हल्के) द्रव्य, जैसे शालि और साठी धान, मूँग और कुछ पशु-पक्षियों का मांस, और स्वभाव से गुरु (भारी) द्रव्य, जैसे आटे, ईख और दूध से बने पदार्थ, तिल, उड़द और दलदली तथा जलीय प्रदेशों के जीवों का मांस, दोनों मात्रा की अपेक्षा रखते हैं। पर इससे हल्कापन और भारीपन महत्त्वहीन नहीं हो जाते। अध्याय के अनुसार लघु द्रव्यों में वायु और अग्नि के गुण अधिक होते हैं, वे अग्नि को प्रदीप्त करते हैं और पेट भरकर खाने पर भी कम हानि करते हैं; गुरु द्रव्यों में पृथ्वी और जल के गुण अधिक होते हैं, और पेट भरकर खाने पर वे बहुत हानि करते हैं, सिवाय तब जब व्यायाम से अग्नि का बल बढ़ा हुआ हो। इसीलिए गुरु द्रव्यों के लिए तृप्ति के एक-तिहाई या आधे तक खाना बताया गया है, और लघु द्रव्यों के लिए भी बहुत पेट भरकर खाना नहीं; और उचित मात्रा में खाया गया भोजन खाने वाले को बल, वर्ण (रंग-रूप), सुख और आयु देता है। फिर श्लोक गिनाते हैं कि भोजन कर चुका व्यक्ति आटे से बनी चीज़ें, चावल और चिउड़ा कभी न खाए; सूखे मांस, सूखी सब्ज़ियों, कमल के कन्द और नाल, मछली, दही, उड़द और यवक का नियमित सेवन न हो, और दुबले पशु का मांस बिल्कुल नहीं; और साठी तथा शालि धान, मूँग, सेंधा नमक, आँवला, जौ, वर्षा का जल, दूध, घी, सूखे प्रदेश के पशु-पक्षियों का मांस और मधु नियम से लिए जाएँ। इन सूचियों के पीछे अध्याय का सामान्य नियम है: उसी का नित्य प्रयोग हो जिससे स्वास्थ्य बना रहे और जो अभी न हुए रोगों को उत्पन्न ही न होने दे।
अध्याय का दूसरा भाग स्वस्थवृत्त, यानी स्वस्थ मनुष्य के आचरण, का है, और यह आँखों से आरम्भ होता है। अध्याय के अनुसार आँख तेज से बनी है और उसे कफ से भय है, इसलिए सौवीराञ्जन नित्य लगाया जाए, और स्राव कराने वाला रसाञ्जन पाँच या आठ रातों में एक बार, और वह भी रात में ही। सबसे विस्तार से धूमपान का वर्णन है, यानी औषधियों से बनी बत्ती का धुआँ नली से पीना: तीन प्रकार की बत्तियाँ (प्रायोगिकी, स्नैहिकी और सिर का शोधन करने वाली) और उनके द्रव्य; वे अनेक रोग, अधिकतर सिर, आँख, कान, नाक, मुँह और गले के, जिन्हें अध्याय धूमपान से शान्त होने वाला बताता है; दिन के आठ समय और कितने कश लिए जाएँ; ठीक से, कम और अधिक पिए गए धूम के लक्षण; असमय या अधिक पीने के उपद्रव और उनके उपाय; वे लोग और अवस्थाएँ जिनमें धूमपान वर्जित है; धुआँ नाक से लिया जाए या मुँह से; और नली की लम्बाई और बनावट। इसके बाद नस्य, यानी नाक के रास्ते औषध देने, का वर्णन है: वर्ष में तीन ऋतुओं में अणुतैल का प्रयोग, उसके लाभ, उसे बनाने की विधि और नस्य देने का ढंग।
फिर दिनचर्या के और काम एक-एक करके आते हैं: कषाय (कसैले), कटु और तिक्त रस वाले वृक्षों की दातुन; सोने, चाँदी, ताँबे जैसी धातुओं के बने, जीभ खुरचने के साधन; मुँह की स्वच्छता, रुचि और सुगन्ध के लिए मुँह में रखी जाने वाली वस्तुएँ, जैसे सुपारी, लौंग, पान और छोटी इलायची; तेल का गण्डूष, यानी मुँह में तेल भरकर रोके रखना; सिर पर तेल और कानों का तर्पण; अभ्यङ्ग, यानी तेल की मालिश, और पैरों की मालिश; शरीर को रगड़कर साफ़ करना; स्नान; साफ़ वस्त्र; सुगन्ध और माला; रत्न और आभूषण; पैरों और मलमार्गों की सफ़ाई; बाल, दाढ़ी-मूँछ और नाखून काटना-सँवारना; और जूते, छाता और लाठी। अभ्यङ्ग को अध्याय एक उदाहरण से समझाता है: जैसे तेल लगाने से घड़ा, चमड़ा और गाड़ी का धुरा मज़बूत होकर कष्ट सह लेते हैं, वैसे ही अभ्यङ्ग से शरीर दृढ़ होता है और कष्ट और व्यायाम सह लेता है; और स्पर्श की इन्द्रिय त्वचा में रहती है, जिसके लिए अभ्यङ्ग परम हितकर कहा गया है।
अध्याय के अन्त में एक उपमा है: जैसे नगर का स्वामी नगर के और रथी रथ के कामों में सावधान रहता है, वैसे ही बुद्धिमान् मनुष्य अपने शरीर के कार्यों में सावधान रहे। एक श्लोक जीवन के दूसरे पक्ष की ओर भी ध्यान दिलाता है: जीविका के वे उपाय अपनाए जाएँ जो धर्म के विरोधी न हों, और शम (मन की शान्ति) और अध्ययन भी, जिससे मनुष्य सुख पाता है। अन्त के सार-श्लोक अध्याय के सब विषयों को क्रम से दोहराते हैं। इस अध्याय से दो बातें साथ ले जाने योग्य हैं: भोजन की उचित मात्रा कोई एक तौल नहीं, वह हर व्यक्ति की अग्नि पर और भोजन के हल्केपन या भारीपन पर निर्भर है; और अध्याय का ज़ोर उन नित्य कामों पर है जो स्वास्थ्य को बनाए रखें और रोगों को उत्पन्न ही न होने दें।
इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १०५-१११)
तत्र श्लोकाः - मात्रा द्रव्याणि मात्रां संश्रित्य गुरुलाघवम्।द्रव्याणां गर्हितोऽभ्यासो येषां, येषां च शस्यते॥
श्लोक १०५ →इस विषय में (सार रूप) श्लोक (हैं): मात्रा, (आहार के) द्रव्य, मात्रा के आश्रय से (उनका) गुरुत्व और लाघव (भारीपन और हल्कापन), (वे) द्रव्य जिनका अभ्यास (नियमित सेवन) निन्दित है, और जिनका (अभ्यास) प्रशंसित है,
अञ्जनं धूमवर्तिश्च त्रिविधा वर्तिकल्पना।धूमपानगुणाः कालाः पानमानं च यस्य यत्॥
श्लोक १०६ →अञ्जन, और धूमवर्ति (धूमपान की बत्ती), तीन प्रकार की वर्तिकल्पना (बत्ती बनाने की विधि), धूमपान के गुण, (उसके) काल, और जिस (धूमपान) का जो पानमान (पीने का परिमाण) है,
व्यापत्तिचिह्नं भैषज्यं धूमो येषां विगर्हितः।पेयो यथा यन्मयं च नेत्रं यस्य च यद्विधम्॥
श्लोक १०७ →व्यापत्ति (धूमपान से होने वाले उपद्रवों) के लक्षण, (उनकी) चिकित्सा, जिनके लिए धूम निषिद्ध है, (धूम) जिस प्रकार पिया जाए, और नेत्र (धूमपान की नली) जिस (द्रव्य) का बना हो, और जिस (धूमपान) के लिए जैसा (नेत्र हो),
नस्यकर्मगुणा नस्तःकार्यं यच्च यथा यदा।भक्षयेद्दन्तपवनं यथा यद्यङ्गुणं च यत्॥
श्लोक १०८ →नस्यकर्म (नाक से औषध देने) के गुण, नाक से जो (प्रयोग) करना है, (वह) जिस प्रकार और जब (करना है), दन्तपवन (दातुन) को जिस प्रकार चबाना चाहिए, (उसके) जो-जो गुण हैं, और जो (वृक्ष उसके लिए प्रशस्त) है,
यदर्थं यानि चास्येन धार्याणि कवलग्रहे।तैलस्य ये गुणा दिष्टाः शिरस्तैलगुणाश्च ये॥
श्लोक १०९ →जो (द्रव्य) जिस प्रयोजन से मुख में धारण करने चाहिए, कवलग्रह (तेल को मुख में भरकर रखने) में तेल के जो गुण बताए गए हैं, और सिर पर तेल (लगाने) के जो गुण हैं,
कर्णतैले तथाऽभ्यङ्गे पादाभ्यङ्गेऽङ्गमार्जने।स्नाने वाससि शुद्धे च सौगन्ध्ये रत्नधारणे॥
श्लोक ११० →कर्णतैल (कान में तेल डालने) में, तथा अभ्यङ्ग (शरीर की तेल-मालिश) में, पादाभ्यङ्ग (पैरों की मालिश) में, अङ्गमार्जन (शरीर को रगड़कर साफ़ करने) में, स्नान में, और शुद्ध वस्त्र में, सौगन्ध्य (सुगन्धित द्रव्यों) में, रत्नधारण (रत्न पहनने) में,
शौचे संहरणे लोम्नां पादत्रच्छत्रधारणे।गुणा मात्राशितीयेऽस्मिंस्तथोक्ता दण्डधारणे॥
श्लोक १११ →शौच (सफ़ाई) में, लोमों (बालों) के संहरण (काटने) में, पादत्र (जूते) और छत्र (छाता) धारण करने में, तथा दण्ड (लाठी) धारण करने में जो गुण हैं, वे इस मात्राशितीय (अध्याय) में कहे गए हैं।