भारत संहिता

अध्याय ७

नवेगान्धारणीयोऽध्यायः

वेगों को न रोकना

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भूमिका

नवेगान्धारणीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का सातवाँ अध्याय है। इसका नाम इसके पहले श्लोक के आरम्भिक शब्दों 'न वेगान् धारयेत्' (वेगों को न रोके) से पड़ा है, और इसका विषय है वेगों को न रोकना। वेग का अर्थ है शरीर का स्वाभाविक आवेग, यानी वह भीतरी दबाव या प्रवृत्ति जिससे शरीर मल, मूत्र या छींक जैसी किसी चीज़ को बाहर निकालना चाहता है, या भूख, प्यास और नींद जैसी अपनी ज़रूरत जताता है। इस अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है। वे बताते हैं कि किन वेगों को रोकना नहीं चाहिए और किन्हें रोकना चाहिए, और फिर स्वस्थ रहने और रोगों को उत्पन्न ही न होने देने के कई नियम देते हैं: व्यायाम की मात्रा, आदतें बदलने का क्रम, प्रकृति के अनुसार आहार, दोषों का शोधन, बुद्धि की भूल से बचना, संगति का चुनाव, और दही खाने की विधि।

अध्याय तेरह ऐसे वेग गिनाता है जिन्हें उत्पन्न होने पर बुद्धिमान मनुष्य न रोके: मूत्र, पुरीष (मल), शुक्र, वात (गुदा से निकलने वाली वायु), छर्दि (उल्टी), क्षवथु (छींक), उद्गार (डकार), जृम्भा (जम्हाई), क्षुधा (भूख), पिपासा (प्यास), बाष्प (आँसू), निद्रा (नींद), और श्रम के बाद आने वाली तेज़ साँस। फिर भगवान् आत्रेय एक-एक करके बताते हैं कि किस वेग को रोकने से कौन-से लक्षण और रोग होते हैं, और उसमें क्या हितकर है। जैसे, मूत्र रोकने से मूत्राशय और मूत्रेन्द्रिय में शूल, कष्ट से मूत्र आना और सिर में दर्द बताए गए हैं; छींक रोकने से गर्दन की जकड़न, सिर का दर्द, अर्दित (चेहरे का लकवा) और आधे सिर का दर्द; भूख रोकने से दुबलापन, दुर्बलता, रंग का बिगड़ना और चक्कर; और नींद रोकने से जम्हाई, अंगों में टूटन, ऊँघ और आँखों का भारीपन। उपचारों में स्वेद (सेंककर पसीना लाना), अभ्यङ्ग (तेल की मालिश), अवगाह (जल में बैठना), बस्तिकर्म और वात को उसकी स्वाभाविक दिशा में चलाने वाले उपाय आते हैं; कहीं स्निग्ध, गरम और हल्का भोजन, कहीं नींद, मद्य और प्रिय बातचीत, तो कहीं विश्राम। यह भाग इस निष्कर्ष पर समाप्त होता है कि जो इन रोगों से बचना चाहता है, वह इन वेगों को न रोके।

इसके बाद अध्याय दूसरी ओर से देखता है: कुछ वेग ऐसे हैं जिन्हें रोकना ही चाहिए। इस लोक में और परलोक में अपना हित चाहने वाला मनुष्य मन, वाणी और शरीर के दुःसाहस भरे और निन्दित कर्मों के वेग रोके। मन में ये लोभ, शोक, भय, क्रोध, अहंकार, निर्लज्जता, ईर्ष्या, अत्यधिक आसक्ति और दूसरे की वस्तु की लालसा के वेग हैं; वाणी में कठोर, बहुत अधिक, चुगली भरे, झूठे और असमय वचन के; और शरीर में दूसरों को पीड़ा देने वाले हर काम के, जैसे स्त्री-भोग, चोरी और हिंसा। जिसके कर्म इस तरह निष्पाप होते हैं, उसे अध्याय पुण्यशब्द (अच्छी कीर्ति वाला) कहता है, जो सुखी रहकर धर्म, अर्थ और काम का भोग और संचय करता है। फिर व्यायाम की बात आती है: शरीर की वह चेष्टा जो स्थिरता के लिए हो और बल बढ़ाए, व्यायाम कहलाती है, और उसे मात्रा में करने को कहा गया है। उचित व्यायाम से हल्कापन, काम करने की सामर्थ्य, स्थिरता, कष्ट सहने की शक्ति, दोषों का क्षय और अग्नि (पाचन शक्ति) की वृद्धि बताई गई है, और अति व्यायाम से थकान, क्षय, प्यास, रक्तपित्त, खाँसी, ज्वर और उल्टी जैसे रोग। व्यायाम, हँसी, बोलना, पैदल चलना, मैथुन और रात में जागना आदत होने पर भी अति मात्रा में न करने को कहा गया है, इस उपमा के साथ कि ऐसा करने वाला हाथी को खींचने वाले सिंह की तरह सहसा नष्ट हो जाता है। अहितकर आदत को एकदम नहीं, धीरे-धीरे, चौथाई-चौथाई भाग करके और बीच में अन्तर देते हुए छोड़ने की, और हितकर को भी इसी क्रम से अपनाने की विधि बताई गई है, ताकि घटाए गए दोष फिर न लौटें और बढ़ाए गए गुण अडिग हो जाएँ।

आगे प्रकृति की बात है। कुछ मनुष्य गर्भ से ही सम वात, पित्त और कफ वाले होते हैं और रोग से मुक्त रहते हैं, जबकि वातल, पित्तल और श्लेष्मल, यानी जिनमें कोई एक दोष प्रधान हो, सदा आतुर कहे गए हैं; उनके लिए उनके दोष के विपरीत गुणों वाली विधि हितकर कही गई है। मलों के निकलने के मार्ग दूषित और बढ़े हुए मलों से पीड़ित होते हैं, और उनके भारीपन और हल्केपन से मलों की वृद्धि और क्षय पहचाने जाते हैं। रोगों को उत्पन्न न होने देने के लिए अध्याय स्वस्थवृत्त (स्वस्थ रहने के नियमों) के पालन पर ज़ोर देता है, और वर्ष के तीन नियत मासों में, स्नेहन और स्वेदन के बाद, शरीर में जमा दोषों को ऊपर और नीचे के मार्ग से निकालने, फिर बस्ति और नस्य, और उसके बाद रसायन और वृष्य योगों के प्रयोग की विधि देता है; इसका फल यह बताया गया है कि धातुएँ अपनी स्वाभाविक अवस्था में रहती हैं, रोग नहीं होते और बुढ़ापा मन्द पड़ जाता है। भूत, विष, वायु, अग्नि और चोट जैसे बाहरी कारणों से होने वाले आगन्तु रोगों में, और ईर्ष्या, शोक, भय और क्रोध जैसे मनोविकारों में, भगवान् आत्रेय प्रज्ञापराध, यानी बुद्धि की भूल, को कारण बताते हैं। आगन्तु रोगों को उत्पन्न न होने देने का मार्ग बताया गया है: प्रज्ञापराधों का त्याग, इन्द्रियों का संयम, स्मृति, देश, काल और अपने आप का ठीक ज्ञान, और सद्वृत्त (अच्छे आचरण) का पालन; और आप्तों, यानी विश्वसनीय ज्ञानियों, के उपदेश को जानना और अपनाना रोगों को रोकने और शान्त करने का कारण कहा गया है। अध्याय के अनुसार पापी, चुगलखोर, झगड़ालू, लोभी, दूसरों की उन्नति से जलने वाले और धूर्त लोगों से दूर रहना चाहिए, और बुद्धि, विद्या, आयु, शील, धैर्य, स्मृति और समाधि में बढ़े-चढ़े, शान्त और सन्मार्ग बताने वाले लोगों की संगति करनी चाहिए। अन्त में दही का नियम है: अध्याय के अनुसार दही रात में नहीं खाना चाहिए, न घी और शक्कर, मूँग के यूष, शहद या आँवले के बिना, और न गरम करके; इस विधि को छोड़कर दही खाने वाले को ज्वर, रक्तपित्त, वीसर्प, कुष्ठ, पाण्डु रोग, चक्कर और उग्र कामला हो सकते हैं।

अध्याय के अन्त के संग्रह-श्लोक इन सब विषयों को गिनाकर कहते हैं कि यह सब अत्रि के पुत्र मुनि, यानी आत्रेय, ने इस अध्याय में कहा। इससे साथ ले जाने योग्य बात यह है कि अध्याय दो तरह के वेगों को अलग करता है: शरीर के स्वाभाविक वेग, जिन्हें रोकना रोग का कारण बताया गया है, और मन, वाणी और शरीर के अहितकर कर्मों के वेग, जिन्हें रोकना ही हित है। साथ ही अध्याय बार-बार मात्रा और क्रम पर लौटता है, चाहे वह व्यायाम हो या आदतें बदलना, और रोग आने से पहले ही उपाय करने पर ज़ोर देता है: उसके शब्दों में, बुद्धिमान व्यक्ति जिसे अपने लिए हितकर जाने, उसे पहले ही करे।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ६३-६६)

तत्र श्लोकाःवेगा वेगसमुत्थाश्च रोगास्तेषां च भेषजम् ।येषां वेगा विधार्याश्च यदर्थं यद्धिताहितम् ॥

श्लोक ६३ →

यहाँ (अध्याय के संग्रह के) श्लोक हैं: वेग, वेगों (को रोकने) से उत्पन्न रोग और उनकी भेषज (चिकित्सा), जिनके वेग रोकने योग्य हैं और किस लिए, जो हितकर और अहितकर है

उचिते चाहिते वर्ज्ये सेव्ये चानुचिते क्रमः ।यथाप्रकृति चाहारो मलायनगदौषधम् ॥

श्लोक ६४ →

अभ्यस्त अहितकर (वस्तु) के विषय में, जो वर्ज्य (छोड़ने योग्य) है, और अनभ्यस्त (वस्तु) के विषय में, जो सेव्य (अपनाने योग्य) है, क्रम; प्रकृति के अनुसार आहार; मलायनों के रोग और (उनकी) औषध

भविष्यतामनुत्पत्तौ रोगाणामौषधं च यत् ।वर्ज्याः सेव्याश्च पुरुषा धीमताऽऽत्मसुखार्थिना ॥

श्लोक ६५ →

भविष्य में होने वाले रोगों की अनुत्पत्ति के लिए जो औषध है; और अपना सुख चाहने वाले बुद्धिमान (व्यक्ति) के लिए वर्ज्य (दूर रखने योग्य) और सेव्य (संगति करने योग्य) पुरुष

विधिना दधि सेव्यं च येन यस्मात्तदत्रिजः ।नवेगान्धारणेऽध्याये सर्वमेवावदन्मुनिः ॥

श्लोक ६६ →

और जिस विधि से तथा जिस कारण से दही का सेवन करना चाहिए, वह सब अत्रि के पुत्र मुनि (आत्रेय) ने नवेगान्धारण (वेगों को न रोकने सम्बन्धी) अध्याय में कहा।

मुख्य शब्द (२०) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

कफ
कफ दोष - शरीर में स्थिरता, चिकनाई और जोड़ देने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे 'क' (जल) + 'फ' (फलना, बढ़ना) से समझाया जाता है - जो जल से बढ़े।

अर्थ: आयुर्वेद में कफ, जिसे श्लेष्मा भी कहते हैं, तीन शारीरिक दोषों में से एक है।

चरक संहिता में: कफ गुरु (भारी), शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर और पिच्छिल (चिपचिपा) है, और विपरीत गुणों से शान्त होता है (सू. १/६१)।

सामान्य बोलचाल में 'कफ' बलगम को भी कहते हैं।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

स्वस्थ
स्वस्थ - अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित; निरोगी
विस्तार

शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।

अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

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च. सू. ७/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम नवेगान्धारणीय (वेगों को न रोकने सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. ७/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. ७/३

। ॥ ३ ॥

बुद्धिमान् (मनुष्य) उत्पन्न हुए मूत्र और पुरीष (मल) के वेगों को न रोके; न रेतस् (शुक्र) के, न वात (अधोवात) के, न छर्दि (उल्टी) के और न क्षवथु (छींक) के (वेगों को)

च. सू. ७/४

। ॥ ४ ॥

न उद्गार (डकार) के, न जृम्भा (जम्हाई) के, न क्षुधा और पिपासा (भूख और प्यास) के वेगों को, न बाष्प (आँसुओं) के, न निद्रा के, और न श्रम से (होने वाले) निःश्वास (तेज़ साँस) के (वेगों को रोके)।

च. सू. ७/५

। ॥ ५ ॥

इन उत्पन्न हुए वेगों को रोकने वाले (मनुष्य) को जो रोग होते हैं, उन्हें अलग-अलग चिकित्सा के लिए मैं बताता हूँ, (तुम) सुनो।

च. सू. ७/६

। ॥ ६ ॥

मूत्र (के वेग) को रोकने पर बस्ति (मूत्राशय) और मेहन (मूत्रेन्द्रिय) में शूल, मूत्रकृच्छ्र (कष्ट से मूत्र आना), सिर में दर्द, विनाम (शरीर का झुक जाना) और वंक्षण (पेट और जाँघ के जोड़) में आनाह (जकड़न), ये लक्षण होते हैं।

च. सू. ७/७

। ॥ ७ ॥

मूत्र (का वेग) रुक जाने पर स्वेद, अवगाहन और अभ्यङ्ग, घी का अवपीडक, और तीन प्रकार का बस्तिकर्म करे।

च. सू. ७/८

। ॥ ८ ॥

पुरीष (मल) को रोके जाने पर पक्वाशय और सिर में शूल, वात (अधोवात) और मल का न निकलना, पिण्डिकोद्वेष्टन (पिंडलियों में ऐंठन) और आध्मान (पेट का फूलना) होता है।

च. सू. ७/९

। ॥ ९ ॥

मल (का वेग) रुक जाने पर स्वेद, अभ्यङ्ग और अवगाह, वर्तियाँ, बस्तिकर्म और प्रमाथी (मथकर निकालने वाला) अन्न-पान हितकर है।

च. सू. ७/१०

। ॥ १० ॥

शुक्र (का वेग) रुक जाने पर मेढ्र (लिङ्ग) और वृषणों (अण्डकोषों) में शूल, अङ्गमर्द (अंगों में टूटन), हृदय में व्यथा (पीड़ा), और मूत्र का रुक जाना भी होता है।

च. सू. ७/११

। ॥ ११ ॥

उसमें अभ्यङ्ग, अवगाह, मदिरा, चरणायुध (मुर्गे), शालि (चावल), दूध, निरूह (बस्ति) और मैथुन भी प्रशस्त है।

च. सू. ७/१२

। ॥ १२ ॥

वात (अधोवात) को रोकने से मल, मूत्र और वात का सङ्ग (रुक जाना), आध्मान (पेट का फूलना), वेदना (दर्द), क्लम (थकावट), और जठर (पेट) में वात से उत्पन्न होने वाले अन्य रोग होते हैं।

च. सू. ७/१३

। ॥ १३ ॥

उसमें वात का अनुलोमन करने वाली स्नेह और स्वेद की विधि, वर्तियाँ, भोजन, पेय और बस्तियाँ भी प्रशस्त हैं।

च. सू. ७/१४

। ॥ १४ ॥

कण्डू (खुजली), कोठ (चकत्ते), अरुचि, व्यङ्ग (चेहरे की झाइयाँ), शोथ (सूजन), पाण्डु रोग, ज्वर, कुष्ठ, हृल्लास (जी मिचलाना) और वीसर्प, (ये) छर्दि (उल्टी) को रोकने से उत्पन्न होने वाले रोग (हैं)।

च. सू. ७/१५

। ॥ १५ ॥

इसमें भोजन करके प्रच्छर्दन (वमन कराना), धूम, लङ्घन, रक्तमोक्षण, रूक्ष अन्न-पान, व्यायाम और विरेक (विरेचन) प्रशस्त माने जाते हैं।

च. सू. ७/१६

। ॥ १६ ॥

क्षवथु (छींक) को रोकने से मन्यास्तम्भ (गर्दन की जकड़न), सिर में शूल, अर्दित (मुख का लकवा), अर्धावभेदक (आधे सिर का दर्द) और इन्द्रियों की दुर्बलता होती है।

च. सू. ७/१७

। ॥ १७ ॥

उसमें जत्रु (हँसली) से ऊपर के भाग में अभ्यङ्ग, स्वेद, नावन (नस्य) सहित धूम, वातनाशक आद्य (भोजन), और भोजन के बाद (लिया जाने वाला) घृत हितकर है।

च. सू. ७/१८

। ॥ १८ ॥

उद्गार (डकार) को रोकने से हिक्का (हिचकी), श्वास (साँस फूलना), अरुचि, कम्प (काँपना) और हृदय तथा छाती में विबन्ध (जकड़न) (होते हैं); उसमें हिक्का के समान (ही) औषध (है)।

च. सू. ७/१९

। ॥ १९ ॥

जृम्भा (जम्हाई) को रोकने से विनाम (शरीर का झुकना), आक्षेप (झटके), संकोच (सिकुड़न), सुप्ति (सुन्नता), कम्प और प्रवेपन (काँपना) (होते हैं); उसमें सारा वातनाशक औषध (हितकर है)।

च. सू. ७/२०

। ॥ २० ॥

क्षुधा (भूख) के वेग को रोकने से कार्श्य (दुबलापन), दौर्बल्य (दुर्बलता), वैवर्ण्य (रंग का बिगड़ना), अङ्गमर्द (अंगों में टूटन), अरुचि और भ्रम (चक्कर) (होते हैं); उसमें स्निग्ध, उष्ण और लघु भोजन (हितकर है)।

च. सू. ७/२१

। ॥ २१ ॥

पिपासा (प्यास) को रोकने से कण्ठ और मुख का शोष (सूखना), बाधिर्य (बहरापन), श्रम (थकान), साद (शिथिलता) और हृदय में व्यथा (पीड़ा) (होती है); उसमें शीत तर्पण (ठण्डा, तृप्ति देने वाला आहार) उचित माना जाता है।

च. सू. ७/२२

। ॥ २२ ॥

बाष्प (आँसुओं) को रोकने से प्रतिश्याय (जुकाम), अक्षिरोग (आँखों के रोग), हृद्रोग (हृदय के रोग), अरुचि और भ्रम (चक्कर) (होते हैं); उसमें स्वप्न (नींद), मद्य और प्रिय कथाएँ (हितकर हैं)।

च. सू. ७/२३

। ॥ २३ ॥

जृम्भा (जम्हाई), अङ्गमर्द (अंगों में टूटन), तन्द्रा (ऊँघ), सिर के रोग और आँखों का भारीपन निद्रा को रोकने से (होते हैं); उसमें स्वप्न (सोना) और संवाहन (शरीर दबाना) (हितकर हैं)।

च. सू. ७/२४

। ॥ २४ ॥

श्रम से उठी साँस (हाँफ) को रोकने से गुल्म, हृद्रोग (हृदय का रोग) और संमोह (बेहोशी जैसी अवस्था) उत्पन्न होते हैं; उसमें विश्राम और वात को नष्ट करने वाली क्रियाएँ हितकर हैं।

च. सू. ७/२५

। ॥ २५ ॥

वेगों को रोकने से उत्पन्न होने वाले जो ये रोग बताए गए हैं, उनकी अनुत्पत्ति (उत्पन्न न होना) चाहने वाला (व्यक्ति) इन वेगों को न रोके।

च. सू. ७/२६

। ॥ २६ ॥

परन्तु मृत्यु के बाद (परलोक में) और यहाँ (इस लोक में) भी (अपना) हित चाहने वाला (व्यक्ति) इन वेगों को रोके: मन, वाणी और शरीर के साहस (दुःसाहस) भरे और निन्दित कर्मों के (वेग)।

च. सू. ७/२७

। ॥ २७ ॥

बुद्धिमान (व्यक्ति) लोभ, शोक, भय, क्रोध और मान (अहंकार) के वेगों को, और नैर्लज्ज्य (निर्लज्जता), ईर्ष्या, अतिराग (अत्यधिक आसक्ति) और अभिध्या (दूसरे की वस्तु की लालसा) के (वेगों को) रोके।

च. सू. ७/२८

। ॥ २८ ॥

कठोर, अति मात्रा वाले (बहुत अधिक), चुगली करने वाले, असत्य और अनुचित समय पर कहे जाने वाले वाक्य (वचन) के उठे हुए वेग को रोके।

च. सू. ७/२९

। ॥ २९ ॥

शरीर की जो कोई भी प्रवृत्ति (क्रिया) दूसरों को पीड़ा देकर होती है, जैसे स्त्री-भोग, चोरी, हिंसा आदि, उसके वेगों को रोके।

च. सू. ७/३०

। ॥ ३० ॥

मन, वाणी और शरीर के कर्मों के निष्पाप होने के कारण पुण्यशब्द (अच्छी कीर्ति वाला) पुरुष सुखी (होकर) धर्म, अर्थ और काम का भोग करता है और (उन्हें) संचित करता है।

च. सू. ७/३१

। ॥ ३१ ॥

शरीर की जो चेष्टा (हलचल) स्थिरता के लिए (होने वाली), बल बढ़ाने वाली चेष्टा है, वह देह-व्यायाम कहलाती है; उसे (उचित) मात्रा में करना चाहिए।

च. सू. ७/३२

। ॥ ३२ ॥

लाघव (शरीर का हल्कापन), काम करने की सामर्थ्य, स्थिरता, दुःख (कष्ट) सहने की क्षमता, दोषों का क्षय और अग्नि की वृद्धि, (ये) व्यायाम से उत्पन्न होते हैं।

च. सू. ७/३३

। ॥( ।)( ॥)

अति व्यायाम से श्रम (थकान), क्लम (थकावट), क्षय, तृष्णा (प्यास), रक्तपित्त, प्रतामक, कास (खाँसी), ज्वर (बुखार) और छर्दि (उल्टी) उत्पन्न होते हैं। [पसीना आना, साँस का बढ़ना, तथा अंगों का लाघव (हल्कापन), और हृदय आदि का उपरोध (रुकावट), यह व्यायाम का लक्षण है।]

च. सू. ७/३४

। ॥ ३४ ॥

बुद्धिमान (व्यक्ति) व्यायाम, हास्य (हँसी), भाष्य (बोलना), अध्व (मार्ग चलना), ग्राम्यधर्म (मैथुन) और प्रजागर (रात में जागना) का, अभ्यस्त होने पर भी, अति मात्रा में सेवन न करे।

च. सू. ७/३५

। ॥( ।( ॥)( ।)( ॥)

जो इनका और इस प्रकार के अन्य (कामों) का अति मात्रा में सेवन करता है, वह हाथी को खींचते हुए सिंह की तरह सहसा नष्ट हो जाता है। [जो मनुष्य अति व्यवाय (मैथुन), भार (ढोने), अध्व (मार्ग चलने) और कर्म (परिश्रम) से अत्यन्त कृश (दुबले) हो गए हैं, और जो क्रोध, शोक, भय और आयास (थकाने वाले प्रयत्न) से घिरे हैं, और बालक, वृद्ध और प्रवात, और जो ऊँचे स्वर में बहुत बोलने वाले हैं, और जो भूखे और प्यासे हैं, वे व्यायाम न करें।]

च. सू. ७/३६

। ॥ ३६ ॥

बुद्धिमान मनुष्य अभ्यस्त (आदत बन चुके) अहित (वस्तु या आचरण) से क्रमशः (धीरे-धीरे) हटे, और हित का क्रम से सेवन करे; और यहाँ (वह) क्रम बताया जाता है।

च. सू. ७/३७

। ॥ ३७ ॥

उन दोनों (हित और अहित) के प्रक्षेप (जोड़ने) और अपचय (घटाने) में क्रम पादांशिक (चौथाई-चौथाई भाग का) होना चाहिए: (पहले) एकान्तर (एक के अन्तर से), और उसके बाद द्व्यन्तर (दो के अन्तर से), तथा त्र्यन्तर (तीन के अन्तर से)।

च. सू. ७/३८

। ॥ ३८ ॥

क्रम से घटाए गए दोष और क्रम से बढ़ाए गए गुण, ऐसे होकर, (क्रमशः) अपुनर्भाव (फिर न लौटने की अवस्था) को प्राप्त होते हैं और अप्रकम्प्य (अडिग) हो जाते हैं।

च. सू. ७/३९

। ॥ ३९ ॥

कुछ मनुष्य गर्भ से ही सम (संतुलित) पित्त, अनिल (वात) और कफ वाले देखे जाते हैं, कुछ वातल, (कुछ) पित्तल तथा (कुछ) श्लेष्मल।

च. सू. ७/४०

। ॥ ४० ॥

उनमें से पहले वाले (जिनके पित्त, वात और कफ सम हैं) अनातुर (रोगरहित) रहते हैं, और वातल आदि सदा आतुर (रोगी) रहते हैं; क्योंकि इनकी देहप्रकृति दोषानुशयित (किसी दोष से जुड़ी हुई) कही जाती है।

च. सू. ७/४१

। ॥ ४१ ॥

उनके (वातल आदि के) लिए स्वस्थवृत्त की ऐसी विधि हितकर है जो (उनके दोष के) विपरीत गुणों वाली हो। सम धातु वाले (व्यक्ति) के लिए वह सात्म्य प्रशस्त (उत्तम) माना जाता है जिसमें सब रस सम (बराबर मात्रा में) हों।

च. सू. ७/४२

। ॥ ४२ ॥

नीचे के दो और सिर के सात छिद्र, और स्वेद के मुख (पसीने के छिद्र), ये मलायन (मलों के निकलने के मार्ग) दूषित और मात्रा से अधिक (बढ़े हुए) मलों से बाधित (पीड़ित) होते हैं।

च. सू. ७/४३

। ॥ ४३ ॥

मलायनों के भारीपन से मलों की वृद्धि को, और हल्केपन से मलों के क्षय को जानना चाहिए; और (मलों के) अत्यधिक रुकने और (अत्यधिक) निकलने से भी।

च. सू. ७/४४

। ॥ ४४ ॥

उन व्याधियों (रोगों) को दोषों के लक्षणों से निश्चित करके, (उनमें से) साध्य (रोगों) की चिकित्सा, मात्रा और काल का विचार करते हुए, व्याधि और (उसके) हेतु के विरोधी (उपायों) से करे।

च. सू. ७/४५

। ॥ ४५ ॥

जिनका स्वस्थवृत्त विषम (अनियमित) है, उनमें ये और दूसरे रोग उत्पन्न होते हैं। इसलिए अनातुर (जो रोगी नहीं है, वह) स्वस्थवृत्त में तत्पर रहे।

च. सू. ७/४६

। ॥ ४६ ॥

माधव से पहले वाले मास में, फिर नभस्य से पहले वाले (मास) में, और सहस्य से पहले वाले (मास) में भी दोषों के संचय को निकलवाए

च. सू. ७/४७

। ॥ ४७ ॥

जिनके शरीर का स्नेहन और स्वेदन हो चुका है, उनके (दोषों को) नियमपूर्वक ऊपर (के मार्ग) से और नीचे (के मार्ग) से (निकाले)। उसके बाद बुद्धिमान (वैद्य) बस्तिकर्म और नस्यकर्म करे।

च. सू. ७/४८

। ॥ ४८ ॥

इसके बाद काल (उचित समय) को जानने वाला (वैद्य) क्रम के अनुसार और जैसा उचित हो, सिद्ध रसायनों और वृष्य योगों का प्रयोग करे।

च. सू. ७/४९

। ॥ ४९ ॥

इस प्रकार धातुओं के प्रकृतिस्थ (अपनी स्वाभाविक अवस्था में) रहने पर रोग उत्पन्न नहीं होते, धातुएँ बढ़ती (पुष्ट होती) हैं, और जरा (बुढ़ापा) मन्द पड़ जाती है।

च. सू. ७/५०

। ॥ ५० ॥

यह विधि निज विकारों की अनुत्पत्ति (उन्हें उत्पन्न न होने देने) के लिए दिखाई गई है; दूसरे (विकारों) की (विधि) तो अलग से ही बताई जाएगी।

च. सू. ७/५१

। ॥ ५१ ॥

मनुष्यों के जो आगन्तु रोग भूत, विष, वायु, अग्नि, सम्प्रहार (चोट, मार-पीट) आदि से उत्पन्न होते हैं, उनमें प्रज्ञा (बुद्धि) अपराध करती है।

च. सू. ७/५२

। ॥ ५२ ॥

और ईर्ष्या, शोक, भय, क्रोध, मान (अभिमान), द्वेष आदि जो मनोविकार हैं, वे भी सभी प्रज्ञापराध से उत्पन्न कहे गए हैं।

च. सू. ७/५३

। ॥ ५३ ॥

प्रज्ञापराधों का त्याग, इन्द्रियों का उपशम (संयम), स्मृति, देश, काल और अपने (आप) का विज्ञान (ठीक-ठीक ज्ञान), और सद्वृत्त (अच्छे आचरण) का अनुवर्तन (पालन)

च. सू. ७/५४

। ॥ ५४ ॥

आगन्तु (रोगों) की अनुत्पत्ति के लिए यह मार्ग दिखाया गया है। प्राज्ञ (बुद्धिमान व्यक्ति) जिसे अपने लिए हितकर जाने, उसे पहले ही करे।

च. सू. ७/५५

। ॥ ५५ ॥

आप्त (विश्वसनीय ज्ञानी) पुरुषों के उपदेश का ज्ञान और (उसकी) प्रतिपत्ति (उसे ठीक से समझकर अपनाना), विकारों की अनुत्पत्ति का और उत्पन्न हुए (विकारों) की शान्ति का कारण है।

च. सू. ७/५६

। ॥ ५६ ॥

जिनका आचरण, वचन और मन पापपूर्ण है, जो सूचक (चुगलखोर), कलहप्रिय (झगड़ालू), (दूसरों के) मर्म (दुखती बात) का उपहास करने वाले, लोभी, दूसरों की उन्नति से द्वेष करने वाले और शठ (धूर्त) हैं

च. सू. ७/५७

। ॥ ५७ ॥

दूसरों की निन्दा में रमने वाले, चपल (चञ्चल), शत्रुओं की सेवा करने वाले, निर्घृण (निर्दय) और धर्म को त्याग चुके, (ऐसे) नराधम (नीच मनुष्य) परिवर्ज्य (दूर रखने योग्य) हैं।

च. सू. ७/५८

। ॥ ५८ ॥

जो बुद्धि, विद्या, वय (आयु), शील, धैर्य, स्मृति और समाधि में वृद्ध (बढ़े-चढ़े) हैं, जो वृद्धों की सेवा करने वाले, स्वभाव को जानने वाले और व्यथा से रहित हैं

च. सू. ७/५९

। ॥ ५९ ॥

जो सब प्राणियों के प्रति सुमुख (प्रसन्नमुख), प्रशान्त, शंसितव्रत (प्रशंसित व्रतों वाले), सन्मार्ग बताने वाले और पुण्यश्रवणदर्शन (जिनके विषय में सुनना और जिनका दर्शन पुण्य देने वाला है) हैं, (वे) सेव्य (संगति करने योग्य) हैं।

च. सू. ७/६०

। ॥ ६० ॥

इस लोक में और परलोक में सुख चाहने वाला बुद्धिमान (व्यक्ति) आहार, आचार और चेष्टाओं में हितकर (बातों) के सेवन के लिए परम प्रयत्न करे।

च. सू. ७/६१

। ॥ ६१ ॥

रात में दही न खाए; और न घृत (घी) और शर्करा (शक्कर) के बिना, न मुद्ग (मूँग) के यूष के बिना, न क्षौद्र (शहद) के बिना, न गरम (करके), और न आमलक (आँवले) के बिना (खाए)।

च. सू. ७/६२

। ॥ ६२ ॥

(इस) विधि को छोड़कर (दही खाने वाला) दधिप्रिय (दही का शौकीन व्यक्ति) ज्वर, असृक्पित्त, वीसर्प, कुष्ठ, पाण्डु रोग, भ्रम और उग्र कामला को प्राप्त हो सकता है।

च. सू. ७/६३

। ॥ ६३ ॥

यहाँ (अध्याय के संग्रह के) श्लोक हैं: वेग, वेगों (को रोकने) से उत्पन्न रोग और उनकी भेषज (चिकित्सा), जिनके वेग रोकने योग्य हैं और किस लिए, जो हितकर और अहितकर है

च. सू. ७/६४

। ॥ ६४ ॥

अभ्यस्त अहितकर (वस्तु) के विषय में, जो वर्ज्य (छोड़ने योग्य) है, और अनभ्यस्त (वस्तु) के विषय में, जो सेव्य (अपनाने योग्य) है, क्रम; प्रकृति के अनुसार आहार; मलायनों के रोग और (उनकी) औषध

च. सू. ७/६५

। ॥ ६५ ॥

भविष्य में होने वाले रोगों की अनुत्पत्ति के लिए जो औषध है; और अपना सुख चाहने वाले बुद्धिमान (व्यक्ति) के लिए वर्ज्य (दूर रखने योग्य) और सेव्य (संगति करने योग्य) पुरुष

च. सू. ७/६६

। ॥ ६६ ॥

और जिस विधि से तथा जिस कारण से दही का सेवन करना चाहिए, वह सब अत्रि के पुत्र मुनि (आत्रेय) ने नवेगान्धारण (वेगों को न रोकने सम्बन्धी) अध्याय में कहा।

च. सू. ७

॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में नवेगान्धारणीय नामक सातवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।