भारत संहिता

अध्याय ८

इन्द्रियोपक्रमणीयोऽध्यायः

इन्द्रियों का उपक्रम (सद्वृत्त)

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भूमिका

इन्द्रियोपक्रमणीय चरक संहिता के सूत्रस्थान का आठवाँ अध्याय है। इसका नाम इसके विषय से पड़ा है: इन्द्रियों का उपक्रम, यानी इन्द्रियों और मन की ऐसी सँभाल जिससे वे अपनी स्वाभाविक, स्वस्थ अवस्था में रहें। इस अध्याय का उपदेश भगवान् आत्रेय का है, और इसके दूसरे भाग में वे अपने शिष्य अग्निवेश को सम्बोधित करके सद्वृत्त, यानी अच्छा आचरण, बताते हैं। इस अध्याय के साथ स्वस्थचतुष्क पूरा होता है: सूत्रस्थान के पाँचवें से आठवें अध्याय तक का वह समूह जो स्वस्थ व्यक्ति के विषय में है।

अध्याय पहले पञ्चपञ्चक गिनाता है, यानी इन्द्रियों से जुड़ी पाँच-पाँच चीज़ों की पाँच सूचियाँ: पाँच इन्द्रियाँ (चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, रसन और स्पर्शन); उनके पाँच द्रव्य, यानी वे महाभूत जिनसे वे बनी हैं (आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी); उनके पाँच अधिष्ठान, यानी शरीर में उनके स्थान (आँखें, कान, नाक, जीभ और त्वचा); उनके पाँच अर्थ, यानी विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध); और पाँच इन्द्रिय-बुद्धियाँ, यानी हर इन्द्रिय से होने वाला ज्ञान, जो इन्द्रिय, विषय, मन और आत्मा के मिलने से उत्पन्न होता है। हर इन्द्रिय पाँचों महाभूतों से बनी है, पर उसमें एक महाभूत विशेष होता है, जैसे चक्षु में तेज; और जो इन्द्रिय जिस महाभूत से विशेष रूप से बनी है, वह उसी महाभूत से बने विषय को ग्रहण करती है।

इन्द्रियों के साथ अध्याय मन का वर्णन करता है। मन इन्द्रियों से परे है; उसका नाम सत्त्व है, और कुछ आचार्य उसे चेतस् कहते हैं। इन्द्रियाँ मन के साथ जुड़कर ही अपने विषय ग्रहण कर पाती हैं। अपने विषयों, संकल्पों और रजस्, तमस् और सत्त्व गुणों के बदलने से मन अनेक जैसा लगता है, पर वह एक ही है, क्योंकि वह एक समय में अनेक विषयों में नहीं लगता; इसीलिए सब इन्द्रियाँ एक साथ काम नहीं करतीं। फिर अध्याय बताता है कि इन्द्रियाँ और मन कैसे बिगड़ते हैं और कैसे स्वस्थ रहते हैं: अपने विषय से अतियोग (बहुत अधिक सम्पर्क), अयोग या हीनयोग (सम्पर्क का न होना या बहुत कम होना) और मिथ्यायोग (गलत ढंग के सम्पर्क) से वे विकृत होते हैं और उनका ज्ञान बिगड़ता है, और उचित योग से वे अपनी प्रकृति, यानी स्वाभाविक अवस्था, में रहते हैं। इन्द्रियों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए अध्याय तीन उपाय बताता है: सात्म्य (अनुकूल) विषयों से संयोग, बुद्धि से बार-बार परखकर ठीक ढंग से कर्म करना, और देश, काल और अपने गुणों के विपरीत गुण वाली चीज़ों का सेवन। इसी से अध्याय का निष्कर्ष है कि अपना हित चाहने वाला सदा स्मृति (सजगता) के साथ पूरे सद्वृत्त का पालन करे।

शेष अध्याय सद्वृत्त है। भगवान् आत्रेय कहते हैं कि इसका पालन करने वाला एक साथ दो प्रयोजन सिद्ध करता है: आरोग्य और इन्द्रियों पर विजय। फिर वे करने और न करने योग्य बातों की लम्बी सूची देते हैं। करने योग्य बातों में देवताओं, गायों, ब्राह्मणों, गुरुओं, वृद्धों, सिद्धों और आचार्यों की पूजा, शरीर और वस्त्रों की स्वच्छता, उचित समय पर हितकर, थोड़ा, मधुर और सार्थक बोलना, और सब प्राणियों के प्रति बन्धु-भाव हैं। न करने योग्य बातों में असत्य, पराया धन और पराई स्त्री, बुरे लोगों की संगति, शरीर को संकट में डालने वाले काम, और भोजन, मल-मूत्र के त्याग, व्यवाय (सम्भोग) और अध्ययन के अनुचित समय, स्थान और ढंग हैं। मन को साधने के नियम भी हैं: इन्द्रियों के वश में न होना, सफलता में घमण्ड और असफलता में दीनता न लाना, और उत्साह न छोड़ना। हवन और जल से शुद्धि की विधि के बाद सद्वृत्त का उपदेश ब्रह्मचर्य, ज्ञान, दान, मैत्री, करुणा, हर्ष, उपेक्षा और प्रशम (मन की शान्ति) में तत्पर रहने की बात पर पूरा होता है।

अन्त के श्लोक अध्याय के विषय समेटते हैं, पञ्चपञ्चक, मन, चार हेतु और सम्पूर्ण सद्वृत्त, और सद्वृत्त के पालन का फल बताते हैं: जो बताए गए स्वस्थवृत्त को भली-भाँति निभाता है, वह सौ वर्ष तक रोगरहित रहकर आयु से अलग नहीं होता; सज्जनों से सम्मान पाकर संसार को अपने यश से भर देता है, धर्म और अर्थ पाता है, सब प्राणियों का बन्धु बनता है, और पुण्य कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होता है। इसलिए यह आचरण सबके लिए, सदा, निभाने योग्य कहा गया है, और जो प्रशंसित आचरण यहाँ नहीं गिनाया गया, उसे भी भगवान् आत्रेय मान्य करते हैं। अध्याय से यही बात साथ ले जाने योग्य है कि उसके अनुसार इन्द्रियाँ और मन अपने विषयों के उचित योग से स्वस्थ रहते हैं और अनुचित योग से बिगड़ते हैं, और अच्छा आचरण आरोग्य और इन्द्रियों पर विजय, दोनों का साधन है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ३०-३४)

तत्र श्लोकाःपञ्चपञ्चकमुद्दिष्टं मनो हेतुचतुष्टयम् ।इन्द्रियोपक्रमेऽध्याये सद्वृत्तमखिलेन च ॥

श्लोक ३० →

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक हैं: इन्द्रियोपक्रम (नामक इस) अध्याय में पञ्चपञ्चक (पाँच पञ्चकों का समूह), मन, हेतुचतुष्टय (चार हेतु) और सम्पूर्ण सद्वृत्त बताया गया है।

स्वस्थवृत्तं यथोद्दिष्टं यः सम्यगनुतिष्ठति ।स समाः शतमव्याधिरायुषा न वियुज्यते ॥

श्लोक ३१ →

जो (मनुष्य) जैसा बताया गया है वैसा स्वस्थवृत्त (स्वस्थ व्यक्ति का आचरण) भली-भाँति निभाता है, वह सौ वर्ष तक रोगरहित (रहकर) आयु से अलग नहीं होता।

नृलोकमापूरयते यशसा साधुसंमतः ।धर्मार्थावेति भूतानां बन्धुतामुपगच्छति ॥

श्लोक ३२ →

साधुओं (सज्जनों) द्वारा सम्मानित (वह व्यक्ति) मनुष्य-लोक को (अपने) यश से भर देता है, धर्म और अर्थ को प्राप्त करता है, और (सब) प्राणियों की बन्धुता को प्राप्त होता है (सबका बन्धु बन जाता है)।

परान् सुकृतिनो लोकान् पुण्यकर्मा प्रपद्यते ।तस्माद्वृत्तमनुष्ठेयमिदं सर्वेण सर्वदा ॥

श्लोक ३३ →

पुण्य कर्म करने वाला (वह व्यक्ति) सुकृती (पुण्यात्मा) के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होता है। इसलिए सबको सदा यह वृत्त (आचरण) निभाना चाहिए।

यच्चान्यदपि किंचित् स्यादनुक्तमिह पूजितम् ।वृत्तं तदपि चात्रेयः सदैवाभ्यनुमन्यते ॥

श्लोक ३४ →

और जो कुछ अन्य भी पूजित (सज्जनों द्वारा आदृत) आचरण यहाँ न कहा गया हो, उसे भी आत्रेय सदा ही स्वीकार करते हैं।

मुख्य शब्द (२०) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

द्रव्य
द्रव्य - पदार्थ; जिसमें गुण और कर्म रहें
विस्तार

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: द्रव्य वह है जिसमें कर्म और गुण आश्रित रहते हैं और जो समवायि कारण है (सू. १/५१)। द्रव्य नौ हैं: आकाश आदि पाँच महाभूत, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ (सू. १/४८)।

आयुर्वेद में 'द्रव्य' औषधि के रूप में प्रयुक्त पदार्थ के लिए भी आता है (सू. १/६७-६८)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

तमस्
तम - मन का एक दोष; जड़ता और अज्ञान
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अन्धकार' है। सांख्य दर्शन में तम प्रकृति के तीन गुणों में से एक है - जड़ता और आवरण का गुण।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

आरोग्य
आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार

शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।

अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।

चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

स्वस्थ
स्वस्थ - अपनी स्वाभाविक अवस्था में स्थित; निरोगी
विस्तार

शब्द-रचना: स्व (अपने) + स्थ (स्थित)।

अर्थ: जो अपनी स्वाभाविक अवस्था में हो, अर्थात् निरोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ का भी आश्रय है (सू. १/२४), और कुछ द्रव्य स्वस्थवृत्त - स्वास्थ्य की रक्षा - के लिए माने गए हैं (सू. १/६७)।

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च. सू. ८/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम इन्द्रियोपक्रमणीय (इन्द्रियों के उपक्रम सम्बन्धी) अध्याय की व्याख्या करेंगे।

च. सू. ८/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. सू. ८/३

॥ ३ ॥

यहाँ (इस शास्त्र में) निश्चय ही पाँच इन्द्रियाँ, पाँच इन्द्रिय-द्रव्य, पाँच इन्द्रिय-अधिष्ठान, पाँच इन्द्रियार्थ और पाँच इन्द्रिय-बुद्धियाँ होते हैं, ऐसा इन्द्रियाधिकार (इन्द्रियों के प्रकरण) में कहा गया है।

च. सू. ८/४

॥ ४ ॥

मन तो अतीन्द्रिय (इन्द्रियों से परे) है; उसका नाम सत्त्व है, और कुछ (आचार्य) उसे चेतस् कहते हैं। उसकी चेष्टा (क्रिया) उसके अपने विषय और आत्मा की सम्पद् (उपस्थिति) पर निर्भर है, और वह इन्द्रियों की चेष्टा का कारण है।

च. सू. ८/५

॥ ५ ॥

अपने विषय, इन्द्रियों के विषयों और संकल्पों के बदलते रहने से, और रजस्, तमस् तथा सत्त्व गुणों के योग से, एक ही पुरुष में सत्त्व (मन) अनेक (प्रतीत होता) है; परन्तु (उसमें) अनेकता नहीं है, क्योंकि एक (मन) एक ही समय में अनेक (विषयों) में प्रवृत्त नहीं होता। इसलिए सब इन्द्रियों की प्रवृत्ति एक समय में नहीं होती।

च. सू. ८/६

॥ ६ ॥

और जिस गुण वाला सत्त्व (मन) बार-बार पुरुष के साथ बना रहता है, मुनि उसे उस (गुण) का ही सत्त्व बताते हैं, (उस गुण की) अधिकता और (उसके) निरन्तर जुड़े रहने के कारण।

च. सू. ८/७

॥ ७ ॥

मन को आगे रखने वाली (मन के साथ चलने वाली) इन्द्रियाँ विषयों को ग्रहण करने में समर्थ होती हैं।

च. सू. ८/८

॥ ८ ॥

उनमें चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, रसन और स्पर्शन, ये पाँच इन्द्रियाँ हैं।

च. सू. ८/९

॥ ९ ॥

पाँच इन्द्रिय-द्रव्य हैं: ख (आकाश), वायु, ज्योति (तेज), आप (जल) और भू (पृथ्वी)।

च. सू. ८/१०

॥ १० ॥

पाँच इन्द्रिय-अधिष्ठान हैं: दोनों आँखें, दोनों कान, दोनों नासिका-छिद्र, जीभ और त्वचा।

च. सू. ८/११

॥ ११ ॥

पाँच इन्द्रियार्थ (इन्द्रियों के विषय) हैं: शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध।

च. सू. ८/१२

॥ १२ ॥

पाँच इन्द्रिय-बुद्धियाँ चक्षुर्बुद्धि (आँख से होने वाला ज्ञान) आदि हैं। और वे इन्द्रिय, इन्द्रियार्थ, सत्त्व (मन) और आत्मा के सन्निकर्ष (परस्पर सम्पर्क) से उत्पन्न होती हैं, क्षणिक होती हैं और निश्चयात्मक होती हैं। इस प्रकार यह पञ्चपञ्चक (पाँच-पाँच की पाँच सूचियाँ) है।

च. सू. ८/१३

॥ १३ ॥

मन, मनोऽर्थ (मन का विषय), बुद्धि और आत्मा, यह अध्यात्म द्रव्यों और गुणों का संग्रह है, और (यही) शुभ तथा अशुभ में प्रवृत्ति और निवृत्ति का हेतु है; और द्रव्य पर आश्रित कर्म (भी), जिसे क्रिया कहा जाता है।

च. सू. ८/१४

। ॥ १४ ॥

इस विषय में: इन्द्रियाँ अनुमान से जानी जाती हैं, और पाँच महाभूतों के विकारों के समुदाय से बनी होने पर भी उनमें चक्षु में तेज, श्रोत्र में ख (आकाश), घ्राण में क्षिति (पृथ्वी), रसन में आप (जल) और स्पर्शन में अनिल (वायु) विशेष रूप से पाया जाता है। वहाँ जो इन्द्रिय जिस-जिस (महाभूत) से बनी है, वह विशेष रूप से उसी-उसी (महाभूत) से बने विषय को ही ग्रहण करती है, क्योंकि उसका वैसा ही स्वभाव है और (उस पर) उसका विभुत्व (सामर्थ्य) है।

च. सू. ८/१५

॥ १५ ॥

अपने विषय के अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग से मन सहित इन्द्रिय विकृति को प्राप्त होकर अपनी-अपनी बुद्धि (ज्ञान) के उपघात (हानि) का कारण बनती है; परन्तु सामर्थ्ययोग (उचित योग) से प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) को प्राप्त होकर अपनी-अपनी बुद्धि को पुष्ट करती है।

च. सू. ८/१६

। ॥ १६ ॥

मन का विषय तो चिन्त्य (जिसका चिन्तन किया जाए) है। वहाँ मन और मनोबुद्धि (मन से होने वाले ज्ञान) की प्रकृति और विकृति के हेतु वही समयोग, अतियोग, हीनयोग और मिथ्यायोग होते हैं।

च. सू. ८/१७

। ॥ १७ ॥

इस विषय में, मन सहित और (अभी) पीड़ा रहित (अनुपतप्त) इन्द्रियों को पीड़ा न पहुँचे, इसके लिए (उन्हें) प्रकृति-भाव (स्वाभाविक अवस्था) में (रखने का) इन हेतुओं (उपायों) से प्रयत्न करना चाहिए; वह इस प्रकार: सात्म्य (अनुकूल) इन्द्रियार्थों के संयोग से, बुद्धि से भली-भाँति बार-बार देख-परखकर कर्मों को ठीक-ठीक करने से, और देश, काल तथा आत्मगुण (अपने गुणों) के विपरीत (गुण वाली चीज़ों) के सेवन से। इसलिए अपना हित करना चाहने वाले हर किसी को सदा स्मृति (सजगता) धारण करके सम्पूर्ण सद्वृत्त (अच्छे आचरण) का पालन करना चाहिए।

च. सू. ८/१८

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क्योंकि उस (सद्वृत्त) का पालन करता हुआ (मनुष्य) एक साथ दो प्रयोजन सिद्ध करता है: आरोग्य और इन्द्रियों पर विजय। हे अग्निवेश! उस सद्वृत्त का हम पूरी तरह उपदेश करेंगे। वह इस प्रकार है: देवताओं, गायों, ब्राह्मणों, गुरुओं, वृद्धों, सिद्धों और आचार्यों की पूजा करे; अग्नि की परिचर्या करे; प्रशस्त ओषधियाँ धारण करे; दो समय उपस्पर्श (जल से आचमन या स्नान) करे; मलायनों (मल निकलने के मार्गों) और पैरों की बार-बार स्वच्छता रखे; एक पक्ष (पखवाड़े) में तीन बार बाल, दाढ़ी-मूँछ, रोएँ और नाखून कटवाए; सदा बिना मैले वस्त्र पहने, प्रसन्न मन वाला और सुगन्धित रहे; (वह) अच्छी वेशभूषा वाला, सँवरे हुए बालों वाला, सिर, कानों, नाक और पैरों में नित्य तेल लगाने वाला, धूमपान करने वाला, (दूसरों से) पहले बोलने वाला, प्रसन्न मुख वाला, संकटों में (दूसरों की) सहायता करने वाला, होम करने वाला, यज्ञ करने वाला, दान देने वाला, चौराहों को नमस्कार करने वाला, बलि अर्पित करने वाला, अतिथियों का सत्कार करने वाला, पितरों को पिण्ड देने वाला, उचित समय पर हितकर, परिमित, मधुर और सार्थक बोलने वाला, मन को वश में रखने वाला, धर्मात्मा, कारण के प्रति ईर्ष्या करने वाला पर फल के प्रति ईर्ष्या न करने वाला, चिन्ता से रहित, निडर, लज्जाशील, बुद्धिमान, बड़े उत्साह वाला, कुशल, क्षमाशील, धार्मिक, आस्तिक और विनय, बुद्धि, विद्या, कुल और आयु में बड़े लोगों, सिद्धों और आचार्यों की सेवा करने वाला (हो); छाता, दण्ड, मौलि (शिरोभूषण) और जूते धारण किए हुए, युग (जुए) भर आगे तक देखता हुआ चले; मंगल आचरण के स्वभाव वाला, और मैले वस्त्र, हड्डी, काँटे, अपवित्र वस्तुओं, बाल, भूसी, कूड़े, राख, कपाल (खोपड़ी या ठीकरे), स्नान और बलि के स्थानों से बचने वाला (हो); थकावट से पहले ही व्यायाम छोड़ देने वाला हो; सब प्राणियों के प्रति बन्धु के समान हो; क्रुद्ध लोगों को मनाने वाला, डरे हुओं को ढाढ़स बँधाने वाला, दीनों की सहायता करने वाला, सत्य-प्रतिज्ञ (वचन का पक्का), साम (मेल-मिलाप) को प्रधान रखने वाला, दूसरों के कठोर वचन सहने वाला, अमर्ष (असहनशीलता) को मिटाने वाला, प्रशम (शान्ति) में गुण देखने वाला और राग तथा द्वेष के कारणों को नष्ट करने वाला (हो)।

च. सू. ८/१९

, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ॥ १९ ॥

असत्य न बोले, दूसरे का धन न ले, दूसरे की स्त्री की अभिलाषा न करे और न दूसरे की सम्पत्ति की, वैर (शत्रुता) को पसन्द न करे, पाप न करे, पापी के प्रति भी पापी न बने, दूसरों के दोष न कहे, दूसरे का रहस्य जानने का यत्न न करे; न अधार्मिकों के साथ बैठे, न राजा के द्वेषपात्रों (जिनसे राजा द्वेष करता है) के, न उन्मत्तों (पागलों) के, न पतितों के, न भ्रूणहत्या करने वालों के, न नीच (ओछे) लोगों के और न दुष्टों के साथ; दोषयुक्त वाहनों पर न चढ़े, घुटने के बराबर ऊँचे कठोर आसन पर न बैठे, बिना बिछावन के, बिना तकिए के, संकरे या ऊँचे-नीचे बिस्तर पर न लेटे, पर्वतों के ऊबड़-खाबड़ स्थानों और चोटियों पर न घूमे, पेड़ पर न चढ़े, जल के तेज़ बहाव में न उतरे, कुलच्छाया में (सम्भवतः नदी-तट की छाया में) न बैठे, आग लगने की जगह के आस-पास न घूमे, ज़ोर से न हँसे, आवाज़ के साथ वायु न छोड़े, मुँह ढके बिना जम्हाई, छींक या हँसी न करे, नाक न कुरेदे, दाँत न किटकिटाए, नाखून न बजाए, हड्डियों को न ठोके, भूमि न कुरेदे, तिनके न तोड़े, मिट्टी का ढेला न मसले, अंगों से बेढंगी चेष्टा न करे, ज्योतियों (प्रकाशमान पिण्डों) को तथा अप्रिय, अपवित्र और अशुभ (वस्तु) को न देखे, शव पर 'हुं' का शब्द न करे, चैत्य, ध्वज, गुरु, पूज्य (जन) और अशुभ (वस्तु) की छाया को न लाँघे, रात में देवालयों, चैत्यों, चौकों, चौराहों, उपवनों, श्मशानों और वधस्थलों में न जाए, अकेला न सूने घर में प्रवेश करे और न वन में, पाप-आचरण वाली स्त्रियों, मित्रों और सेवकों का संग न करे, श्रेष्ठ जनों से विरोध न करे, नीच जनों की सेवा न करे, कुटिल (व्यक्ति) को पसन्द न करे, अनार्य (अशिष्ट व्यक्ति) का आश्रय न ले, (दूसरों में) भय उत्पन्न न करे, दुस्साहस न करे और बहुत अधिक सोना, जागना, स्नान, पीना और खाना न करे, घुटने ऊपर उठाए हुए देर तक न रहे, व्यालों (साँपों या हिंसक जन्तुओं) के पास न जाए, न दाढ़ वाले और न सींग वाले पशुओं के पास, पुरोवात (सामने या पूर्व से आती हवा), धूप, ओस और बहुत तेज़ हवा से बचे, कलह आरम्भ न करे, भली-भाँति संयत (स्थिर) न होने पर अग्नि की उपासना न करे, न उच्छिष्ट (जूठे मुँह-हाथ) होने पर, (अग्नि को) नीचे रखकर (शरीर को) न तापे, थकान मिटे बिना, मुँह धोए बिना या नग्न होकर स्नान न करे, स्नान के वस्त्र से सिर को न छुए, बालों के सिरों को न फटकारे, स्नान करके वे ही दोनों वस्त्र न पहने, रत्न, घी, पूज्य (वस्तुओं), मंगल-द्रव्यों और फूलों को छुए बिना (घर से) बाहर न निकले, पूज्य और मंगल (वस्तुओं) को बाईं ओर रखकर न जाए और न दूसरी (वस्तुओं) को दाहिनी ओर रखकर।

च. सू. ८/२०

, , , , , ॥ २० ॥

हाथ में रत्न धारण किए बिना, स्नान किए बिना, मैले (दूषित) वस्त्र पहनकर, जप किए बिना, देवताओं को आहुति दिए बिना, पितरों के लिए (भाग) अर्पित किए बिना, गुरुओं, अतिथियों और आश्रितों को दिए बिना, पुण्य (शुभ) गन्ध लगाए बिना, माला पहने बिना, हाथ, पैर और मुख धोए बिना, अशुद्ध मुख से, उत्तर की ओर मुख करके, विमन (अनमना) होकर, और भक्ति-रहित, अशिष्ट, अशुचि (अपवित्र) या भूखे परिचारकों (सेवकों) के रहते अन्न ग्रहण न करे; न अमेध्य (अपवित्र) पात्रों में, न अनुचित स्थान में, न अनुचित समय पर, न भीड़ भरे (स्थान) में, न अग्नि को अग्र (पहला भाग) दिए बिना, न प्रोक्षण-जल से छिड़के बिना, न मन्त्रों से अभिमन्त्रित किए बिना, न (अन्न की) निन्दा करते हुए, न निन्दित (अन्न), और न प्रतिकूल (विरोधी) द्वारा परोसा गया अन्न ग्रहण करे। मांस, हरितक (हरे साग), सूखे शाक, फल और भक्ष्य (पकवानों) के सिवाय पर्युषित (बासी) (अन्न) न खाए। दधि (दही), मधु, लवण (नमक), सक्तु (सत्तू) और सर्पि (घी) के सिवाय (किसी भोजन को) बिना कुछ शेष छोड़े न खाए। रात में दही न खाए। सक्तु (सत्तू) न अकेले खाए, न रात में, न भोजन कर लेने के बाद, न अधिक मात्रा में, न दो बार, न बीच-बीच में जल लेते हुए; द्विजों (दाँतों) से काटकर न खाए।

च. सू. ८/२१

, , , , ॥ २१ ॥

टेढ़ा (शरीर सीधा न रखकर) न छींके, न खाए, न सोए; (मल-मूत्र आदि का) वेग उठने पर दूसरे काम में न लगा रहे; वायु, अग्नि, जल, सोम (चन्द्रमा), अर्क (सूर्य), द्विज और गुरु की ओर मुख करके थूक, मल और मूत्र न त्यागे; मार्ग पर मूत्र न करे, न लोगों से भरे स्थान में, न भोजन के समय; जप, होम, अध्ययन, बलि और मङ्गल-कर्मों के समय श्लेष्मा (कफ) और सिङ्घाणक (नाक का मैल) न निकाले।

च. सू. ८/२२

, , , । ॥ २२ ॥

स्त्री की अवज्ञा (अपमान) न करे, (उस पर) अत्यधिक विश्वास न करे, (उसे) गुप्त बात न सुनाए, (उसे) अधिकार न सौंपे। रजस्वला (मासिक धर्म वाली), आतुर (रोगी), अमेध्य (अपवित्र), अप्रशस्त, अप्रिय रूप, आचरण और व्यवहार वाली, अकुशल, अननुकूल, अनिच्छुक और किसी अन्य को चाहने वाली स्त्री के साथ, पराई स्त्री के साथ, और अन्य योनि (मनुष्य से भिन्न प्राणी) के साथ; न योनि से भिन्न अंग में; न चैत्य, चत्वर (चौक), चौराहे, उपवन, श्मशान, आघातन (वधस्थल), जल, औषधियों (वनस्पतियों), और द्विजों, गुरुओं और देवताओं के स्थानों में; न दोनों सन्ध्याओं में, न अतिथियों के रहते; न (स्वयं) अशुचि (अपवित्र) होकर, न भेषज (औषध) खाए बिना, न मन में संकल्प (इच्छा) बने बिना, न प्रहर्ष (काम-उत्तेजना) जागे बिना, न भोजन किए बिना, न बहुत अधिक खाकर, न विषम (असुविधाजनक) स्थिति में, न मूत्र और मल (के वेग) से पीड़ित होकर, न श्रम, व्यायाम, उपवास और क्लम (थकावट) से पीड़ित होकर, और न एकान्त के बिना (खुले में) व्यवाय (सम्भोग) करे।

च. सू. ८/२३

॥ २३ ॥

न सज्जनों की, न गुरुओं की निन्दा करे; अशुचि (अपवित्र) होकर अभिचार-कर्म, चैत्य और पूज्य जनों की पूजा, और अध्ययन न करे।

च. सू. ८/२४

॥ २४ ॥

असमय (ऋतु के बिना) बिजलियाँ चमकने पर, दिशाओं के अभ्युदित (उदित, प्रकाशित) होने पर, आग फैलने पर, भूकम्प में, महोत्सव में, उल्कापात के समय, महाग्रह के उपगमन (निकट आने) पर, चन्द्रमा से रहित (अमावस्या की) तिथि को और दोनों सन्ध्याओं में अध्ययन न करे; गुरु के मुख से (सीखे) बिना (अध्ययन) न करे; और (ऐसे) अध्ययन का अभ्यास न करे जो अवपतित (अक्षर गिराता-छोड़ता), अतिमात्र (मात्रा से अधिक), थका हुआ, विस्वर (बिगड़े स्वर वाला), अस्थिर पदों वाला, बहुत तेज़, विलम्बित (धीमा) या बहुत दुर्बल हो, और न बहुत ऊँचे, न बहुत नीचे स्वरों में (अभ्यास करे)।

च. सू. ८/२५

, , , , , , , , , , , , , ॥ २५ ॥

(मनुष्य) समय (स्वीकार की हुई मर्यादा या दिए हुए वचन) का उल्लंघन न करे, नियम (लिया हुआ व्रत) न तोड़े, न रात में और न अनुचित स्थान में घूमे, सन्ध्याओं (दिन और रात के सन्धि-कालों) में भोजन, अध्ययन, स्त्री-सहवास और निद्रा का सेवन करने वाला न हो, बालकों, वृद्धों, लोभियों, मूर्खों, क्लिष्टों (क्लेश से ग्रस्त लोगों) और क्लीबों (नपुंसकों) के साथ मित्रता न करे, मद्य, जुए और वेश्याओं की आसक्ति में रुचि रखने वाला न हो, गुप्त बात को प्रकट न करे, किसी का तिरस्कार न करे, न अहंकारी हो, न अदक्ष (अकुशल), न अदक्षिण (अनुदार), न असूयक (दूसरों के गुणों में दोष देखने वाला), ब्राह्मणों की निन्दा न करे, गायों पर डण्डा न उठाए, न वृद्धों का, न गुरुओं का, न गणों (समुदायों) का और न राजाओं का अपमान करे, न ही मर्यादा से बढ़कर (कटु) बोले, और बन्धुओं, (अपने प्रति) अनुरक्त लोगों, कठिनाई में साथ देने वालों और (अपनी) गुप्त बातें जानने वालों को (अपने से) बाहर न करे।

च. सू. ८/२६

, , , , , , , ॥ २६ ॥

(मनुष्य) न अधीर हो, न अति उच्छ्रित (बहुत ऊँचे उठे, यानी उत्तेजित या गर्वित) मन वाला; न ऐसा हो जो अपने भृत्यों (सेवकों, आश्रितों) का भरण-पोषण न करे, न ऐसा जो अपने लोगों पर विश्वास न करे; न अकेला सुख भोगने वाला हो, न दुःखद (दुःख देने वाले) स्वभाव, आचरण और व्यवहार वाला; न सब पर विश्वास करने वाला हो, न सब पर शंका करने वाला, और न हर समय विचार ही करते रहने वाला।

च. सू. ८/२७

, , , , , , , , , , , , , ॥ २७ ॥

(मनुष्य) कार्य के समय को न टाले (बीत जाने न दे), बिना परखे (किसी बात या काम) में न लगे, इन्द्रियों के वश में न हो, चंचल मन को (विषयों के पीछे) न भटकाए, बुद्धीन्द्रियों (ज्ञानेन्द्रियों) पर अति भार न डाले, और न अत्यधिक दीर्घसूत्री (काम को टालते रहने वाला) हो, क्रोध और हर्ष के वश में न चले, शोक में डूबा न रहे, सिद्धि (सफलता) में उत्सेक (घमण्ड) न करे और न असिद्धि (असफलता) में दैन्य (दीनता), प्रकृति (स्वभाव) का बार-बार स्मरण करे, हेतु (कारण) और (उसके) प्रभाव (फल) के विषय में निश्चय वाला हो और सदा हेतुओं (साधनों) का आरम्भ करने वाला हो, '(काम) हो गया' ऐसा (सोचकर) निश्चिन्त न हो, वीर्य (उत्साह, पराक्रम) न छोड़े, और अपवाद (अपनी हुई निन्दा) को बार-बार याद न करे।

च. सू. ८/२८

, , ॥ २८ ॥

अशुचि (अपवित्र) होकर उत्तम घी, अक्षत (साबुत चावल), तिल, कुश और सर्षप (सरसों) से अग्नि में हवन न करे; (पवित्र होकर हवन करते हुए) अपने लिए इन आशीर्वचनों की कामना करे: 'अग्नि मेरे शरीर से दूर न जाएँ, वायु मुझमें प्राणों को स्थापित करें, विष्णु मुझमें बल स्थापित करें, इन्द्र मुझमें वीर्य (स्थापित करें), कल्याणकारी जल मुझमें प्रवेश करें।' 'आपो हि ष्ठा' (इस मन्त्र) से जल का स्पर्श करे, दो बार होंठों को पोंछकर और पैरों पर (जल) छिड़ककर सिर के छिद्रों (इन्द्रियों के द्वारों) का, और जल से अपने (शरीर), हृदय और सिर का स्पर्श करे।

च. सू. ८/२९

॥ २९ ॥

और (मनुष्य) ब्रह्मचर्य, ज्ञान, दान, मैत्री, कारुण्य (करुणा), हर्ष (प्रसन्नता), उपेक्षा (तटस्थता) और प्रशम (मन की शान्ति) में तत्पर हो; (यहाँ सद्वृत्त का उपदेश पूरा हुआ)।

च. सू. ८/३०

। ॥ ३० ॥

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक हैं: इन्द्रियोपक्रम (नामक इस) अध्याय में पञ्चपञ्चक (पाँच पञ्चकों का समूह), मन, हेतुचतुष्टय (चार हेतु) और सम्पूर्ण सद्वृत्त बताया गया है।

च. सू. ८/३१

। ॥ ३१ ॥

जो (मनुष्य) जैसा बताया गया है वैसा स्वस्थवृत्त (स्वस्थ व्यक्ति का आचरण) भली-भाँति निभाता है, वह सौ वर्ष तक रोगरहित (रहकर) आयु से अलग नहीं होता।

च. सू. ८/३२

। ॥ ३२ ॥

साधुओं (सज्जनों) द्वारा सम्मानित (वह व्यक्ति) मनुष्य-लोक को (अपने) यश से भर देता है, धर्म और अर्थ को प्राप्त करता है, और (सब) प्राणियों की बन्धुता को प्राप्त होता है (सबका बन्धु बन जाता है)।

च. सू. ८/३३

। ॥ ३३ ॥

पुण्य कर्म करने वाला (वह व्यक्ति) सुकृती (पुण्यात्मा) के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होता है। इसलिए सबको सदा यह वृत्त (आचरण) निभाना चाहिए।

च. सू. ८/३४

। ॥ ३४ ॥

और जो कुछ अन्य भी पूजित (सज्जनों द्वारा आदृत) आचरण यहाँ न कहा गया हो, उसे भी आत्रेय सदा ही स्वीकार करते हैं।

च. सू. ८

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के श्लोकस्थान में इन्द्रियोपक्रमणीय नामक आठवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।

च. सू. ८

॥॥

इस प्रकार दूसरा (चतुष्क), स्वस्थचतुष्क (स्वस्थ व्यक्ति सम्बन्धी चार अध्यायों का समूह), (पूरा हुआ)।