भूमिका
जनपदोद्ध्वंसनीयविमान चरक संहिता के विमानस्थान का तीसरा अध्याय है, और हिन्दी शीर्षक में इसे 'जनपदों का विनाश (महामारी)' कहा गया है। 'जनपद' का अर्थ है किसी प्रदेश में बसा जनसमुदाय, और 'उद्ध्वंस' का अर्थ है विनाश; अध्याय का प्रश्न यह है कि एक ही रोग एक ही समय में पूरे जनसमुदाय को कैसे नष्ट कर देता है। 'विमान' का अर्थ है माप, यानी किसी बात का ठीक-ठीक ज्ञान। अध्याय का अन्तिम श्लोक इसी को 'देशोद्ध्वंसनिमित्तीय' विमान भी कहता है। यह उपदेश भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने पञ्चाल क्षेत्र की राजधानी काम्पिल्य में, गर्मी की ऋतु के अन्तिम महीने में, गङ्गा के तट पर वन में विचरण करते हुए अपने शिष्य अग्निवेश को दिया।
आरम्भ में आत्रेय चेतावनी देते हैं कि नक्षत्रों, ग्रहों, चन्द्रमा, सूर्य, वायु और दिशाओं में ऋतुओं के बिगड़ने के लक्षण दिख रहे हैं, और शीघ्र ही भूमि ओषधियों (वनस्पतियों) में उनके रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव ठीक से उत्पन्न नहीं करेगी; इसलिए वे पहले ही औषधों का संग्रह कर लेने को कहते हैं। फिर अग्निवेश अध्याय का मुख्य प्रश्न पूछते हैं: प्रकृति, आहार, देह, बल, सात्म्य, सत्त्व (मन) और आयु में भिन्न मनुष्यों का एक ही रोग से एक साथ विनाश कैसे होता है? आत्रेय उत्तर देते हैं कि चार भाव सब लोगों के लिए समान होते हैं: वायु, उदक (जल), देश (भूमि-प्रदेश) और काल (समय, ऋतु)। इनके बिगड़ने से ऐसे रोग उत्पन्न होते हैं जो सबको एक ही समय और एक जैसे लक्षणों के साथ होते हैं। वे चारों के बिगड़े रूप के लक्षण गिनाते हैं, जैसे धूल और धुएँ से दूषित हवा, जलचरों के छोड़े हुए बिगड़े जल, सूखती फसलों और भूकम्पों वाली भूमि, और ऋतु से उलटे लक्षणों वाला काल; और बताते हैं कि इनमें वायु से जल, जल से देश और देश से काल अधिक गम्भीर है, क्योंकि उससे बचना और कठिन है। अध्याय के अनुसार चारों बिगड़ जाएँ, तब भी जिनका औषध से उपचार होता रहे, वे रोगी नहीं होते। ऐसे समय का भेषज पञ्चकर्म (शरीर-शोधन के पाँच कर्म), रसायन, पहले से एकत्र औषध, और आचरण भी कहा गया है: सत्य, दया, दान, देवताओं का पूजन, सद्वृत्त, मन की शान्ति, मंगलमय प्रदेशों में रहना, ब्रह्मचर्य और सज्जनों का साथ। यह उन लोगों की आयु की रक्षा करता है जिनकी मृत्यु नियत नहीं है।
तब अग्निवेश पूछते हैं कि वायु आदि का यह बिगड़ना किस मूल से होता है। आत्रेय बताते हैं कि उसका मूल अधर्म है, या पहले किया गया बुरा कर्म, और इन दोनों का उद्गम प्रज्ञापराध, यानी बुद्धि का अपराध, है। जब देश और नगरों के प्रधान प्रजा से अधर्म का व्यवहार करते हैं और उनके आश्रित और प्रजा उस अधर्म को बढ़ाते हैं, तो धर्म ढक जाता है, देवता उन्हें छोड़ देते हैं, ऋतुएँ बिगड़ती हैं, वर्षा के देव समय पर नहीं बरसाते, और हवा, भूमि, जल और ओषधियाँ बिगड़ जाती हैं; तब छूने और खाने-पीने की वस्तुओं के दोष से जनपद उजड़ जाते हैं। शस्त्रों से और शाप से होने वाले विनाश का हेतु भी अध्याय अधर्म ही बताता है, और राक्षस आदि भी उन्हीं पर प्रहार करते हैं जिनमें उन्हें अधर्म या कोई दूसरा अपचार मिले। फिर आत्रेय दिखाते हैं कि आदि काल में भी अशुभ अधर्म के सिवा किसी कारण से नहीं आया। कृतयुग के आरम्भ में मनुष्य अदिति जी के पुत्रों (देवताओं) के समान ओज वाले, रोग, भय और लोभ से रहित और अमित आयु वाले थे। कृतयुग के ढलते समय कुछ सम्पन्न लोगों के अत्यधिक ग्रहण से भारीपन, फिर थकान, आलस्य, संचय, परिग्रह और लोभ आए; त्रेता में लोभ से वैर, असत्य, काम, क्रोध और भय चल पड़े। तब धर्म का एक पाद (चौथाई भाग) लुप्त हुआ, युग के वर्षों का प्रमाण और पृथ्वी आदि और अन्नों के गुण भी एक-एक पाद घटे, और शरीरों को पहली बार ज्वर आदि रोगों ने घेरा। इसी क्रम से युग-युग में धर्म और गुण घटते हैं और आयु भी घटती जाती है।
इसके बाद अग्निवेश पूछते हैं कि क्या सारी आयु पहले से नियत होती है। आत्रेय बताते हैं कि आयु दैव और पुरुषकार के मेल पर टिकी है: दैव पूर्व देह में अपना ही किया हुआ कर्म है, और पुरुषकार इस जन्म में किया जाने वाला कर्म। दोनों हीन, मध्यम या उत्तम हो सकते हैं, और उनके मेल के अनुसार आयु दीर्घ, मध्यम या उसके विपरीत होती है। दुर्बल दैव पुरुषकार से दब जाता है, और प्रबल दैव पुरुषकार को दबा देता है; इसी दूसरी स्थिति को देखकर कुछ लोग आयु को नियत मान लेते हैं। इसलिए आत्रेय कहते हैं कि केवल एक पक्ष को पकड़ना उचित नहीं। यदि सबकी आयु नियत होती, तो मन्त्र, औषध और खतरों से बचना व्यर्थ होता, रसायन पर महर्षियों का प्रयत्न व्यर्थ होता, इन्द्र जी नियत आयु वाले शत्रु को वज्र से न मारते, और दोनों अश्विनीकुमार रोगी को स्वस्थ न करते; और प्रत्यक्ष भी दिखता है कि युद्ध करने वालों और न करने वालों की, या विष खाने वालों और न खाने वालों की आयु एक-सी नहीं होती। इसलिए जीवन हितकर उपचार पर टिका है। गाड़ी के धुरे की उपमा से आत्रेय समझाते हैं कि अच्छा धुरा अपनी अवधि पूरी करके ही समाप्त होता है, पर बोझ, बुरे मार्ग या टूट-फूट से बीच में भी टूट जाता है; वैसे ही अपनी अवधि पूरी करके आई मृत्यु काल-मृत्यु है, और बल से बाहर काम, वेगों को रोकने, विष, चोट या गलत उपचार जैसे कारणों से बीच में आई मृत्यु अकाल-मृत्यु।
अन्त में अग्निवेश पूछते हैं कि वैद्य ज्वर में अधिकतर गरम पानी क्यों देते हैं। आत्रेय बताते हैं कि ज्वर आमाशय से उत्पन्न होता है और उसके लिए पाचन चाहिए; गरम पानी पाचन करता है, वात को अनुलोम करता है, अग्नि को जगाता है और श्लेष्मा (कफ) को सुखाता है; पर बहुत बढ़े पित्त वाले, या दाह, भ्रम, प्रलाप और अतिसार वाले ज्वर में वे इसे न देने को कहते हैं। इससे सामान्य नियम निकलता है कि औषध रोग के निदान (कारण) के विपरीत होता है: गरमी से हुए रोग ठंडक से, और अपतर्पण से हुए रोग पूरण (पोषण) से शान्त होते हैं, और उलटे भी। अपतर्पण के तीन भेद, लङ्घन, लङ्घन-पाचन और दोषावसेचन, दोष के कम, मध्यम या अधिक होने के अनुसार बताए गए हैं। यह सब ग्रन्थ का वर्णन है, कोई चिकित्सा-सलाह नहीं। फिर अध्याय उन रोगियों को गिनाता है जिनका उपचार वैद्य को अपयश देता है, कोष्ठक में छपे दो श्लोक जाङ्गल, अनूप और सम देश का भेद बताते हैं, और संग्रह-श्लोक अध्याय के विषय गिनाते हैं। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि उसके अनुसार महामारी उन भावों के बिगड़ने से आती है जो सबके लिए समान हैं, और उस बिगड़ने का मूल मनुष्यों का अधर्म है; समय रहते की गई तैयारी, औषध और सदाचार उनकी रक्षा करते हैं जिनकी मृत्यु नियत नहीं; और आयु पूरी तरह पहले से तय नहीं, बल्कि पिछले कर्म और इस जन्म के प्रयत्न के मेल पर, और हितकर आचरण पर, टिकी है।