भारत संहिता

अध्याय ३

जनपदोद्ध्वंसनीयविमानम्

जनपदों का विनाश (महामारी)

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भूमिका

जनपदोद्ध्वंसनीयविमान चरक संहिता के विमानस्थान का तीसरा अध्याय है, और हिन्दी शीर्षक में इसे 'जनपदों का विनाश (महामारी)' कहा गया है। 'जनपद' का अर्थ है किसी प्रदेश में बसा जनसमुदाय, और 'उद्ध्वंस' का अर्थ है विनाश; अध्याय का प्रश्न यह है कि एक ही रोग एक ही समय में पूरे जनसमुदाय को कैसे नष्ट कर देता है। 'विमान' का अर्थ है माप, यानी किसी बात का ठीक-ठीक ज्ञान। अध्याय का अन्तिम श्लोक इसी को 'देशोद्ध्वंसनिमित्तीय' विमान भी कहता है। यह उपदेश भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने पञ्चाल क्षेत्र की राजधानी काम्पिल्य में, गर्मी की ऋतु के अन्तिम महीने में, गङ्गा के तट पर वन में विचरण करते हुए अपने शिष्य अग्निवेश को दिया।

आरम्भ में आत्रेय चेतावनी देते हैं कि नक्षत्रों, ग्रहों, चन्द्रमा, सूर्य, वायु और दिशाओं में ऋतुओं के बिगड़ने के लक्षण दिख रहे हैं, और शीघ्र ही भूमि ओषधियों (वनस्पतियों) में उनके रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव ठीक से उत्पन्न नहीं करेगी; इसलिए वे पहले ही औषधों का संग्रह कर लेने को कहते हैं। फिर अग्निवेश अध्याय का मुख्य प्रश्न पूछते हैं: प्रकृति, आहार, देह, बल, सात्म्य, सत्त्व (मन) और आयु में भिन्न मनुष्यों का एक ही रोग से एक साथ विनाश कैसे होता है? आत्रेय उत्तर देते हैं कि चार भाव सब लोगों के लिए समान होते हैं: वायु, उदक (जल), देश (भूमि-प्रदेश) और काल (समय, ऋतु)। इनके बिगड़ने से ऐसे रोग उत्पन्न होते हैं जो सबको एक ही समय और एक जैसे लक्षणों के साथ होते हैं। वे चारों के बिगड़े रूप के लक्षण गिनाते हैं, जैसे धूल और धुएँ से दूषित हवा, जलचरों के छोड़े हुए बिगड़े जल, सूखती फसलों और भूकम्पों वाली भूमि, और ऋतु से उलटे लक्षणों वाला काल; और बताते हैं कि इनमें वायु से जल, जल से देश और देश से काल अधिक गम्भीर है, क्योंकि उससे बचना और कठिन है। अध्याय के अनुसार चारों बिगड़ जाएँ, तब भी जिनका औषध से उपचार होता रहे, वे रोगी नहीं होते। ऐसे समय का भेषज पञ्चकर्म (शरीर-शोधन के पाँच कर्म), रसायन, पहले से एकत्र औषध, और आचरण भी कहा गया है: सत्य, दया, दान, देवताओं का पूजन, सद्वृत्त, मन की शान्ति, मंगलमय प्रदेशों में रहना, ब्रह्मचर्य और सज्जनों का साथ। यह उन लोगों की आयु की रक्षा करता है जिनकी मृत्यु नियत नहीं है।

तब अग्निवेश पूछते हैं कि वायु आदि का यह बिगड़ना किस मूल से होता है। आत्रेय बताते हैं कि उसका मूल अधर्म है, या पहले किया गया बुरा कर्म, और इन दोनों का उद्गम प्रज्ञापराध, यानी बुद्धि का अपराध, है। जब देश और नगरों के प्रधान प्रजा से अधर्म का व्यवहार करते हैं और उनके आश्रित और प्रजा उस अधर्म को बढ़ाते हैं, तो धर्म ढक जाता है, देवता उन्हें छोड़ देते हैं, ऋतुएँ बिगड़ती हैं, वर्षा के देव समय पर नहीं बरसाते, और हवा, भूमि, जल और ओषधियाँ बिगड़ जाती हैं; तब छूने और खाने-पीने की वस्तुओं के दोष से जनपद उजड़ जाते हैं। शस्त्रों से और शाप से होने वाले विनाश का हेतु भी अध्याय अधर्म ही बताता है, और राक्षस आदि भी उन्हीं पर प्रहार करते हैं जिनमें उन्हें अधर्म या कोई दूसरा अपचार मिले। फिर आत्रेय दिखाते हैं कि आदि काल में भी अशुभ अधर्म के सिवा किसी कारण से नहीं आया। कृतयुग के आरम्भ में मनुष्य अदिति जी के पुत्रों (देवताओं) के समान ओज वाले, रोग, भय और लोभ से रहित और अमित आयु वाले थे। कृतयुग के ढलते समय कुछ सम्पन्न लोगों के अत्यधिक ग्रहण से भारीपन, फिर थकान, आलस्य, संचय, परिग्रह और लोभ आए; त्रेता में लोभ से वैर, असत्य, काम, क्रोध और भय चल पड़े। तब धर्म का एक पाद (चौथाई भाग) लुप्त हुआ, युग के वर्षों का प्रमाण और पृथ्वी आदि और अन्नों के गुण भी एक-एक पाद घटे, और शरीरों को पहली बार ज्वर आदि रोगों ने घेरा। इसी क्रम से युग-युग में धर्म और गुण घटते हैं और आयु भी घटती जाती है।

इसके बाद अग्निवेश पूछते हैं कि क्या सारी आयु पहले से नियत होती है। आत्रेय बताते हैं कि आयु दैव और पुरुषकार के मेल पर टिकी है: दैव पूर्व देह में अपना ही किया हुआ कर्म है, और पुरुषकार इस जन्म में किया जाने वाला कर्म। दोनों हीन, मध्यम या उत्तम हो सकते हैं, और उनके मेल के अनुसार आयु दीर्घ, मध्यम या उसके विपरीत होती है। दुर्बल दैव पुरुषकार से दब जाता है, और प्रबल दैव पुरुषकार को दबा देता है; इसी दूसरी स्थिति को देखकर कुछ लोग आयु को नियत मान लेते हैं। इसलिए आत्रेय कहते हैं कि केवल एक पक्ष को पकड़ना उचित नहीं। यदि सबकी आयु नियत होती, तो मन्त्र, औषध और खतरों से बचना व्यर्थ होता, रसायन पर महर्षियों का प्रयत्न व्यर्थ होता, इन्द्र जी नियत आयु वाले शत्रु को वज्र से न मारते, और दोनों अश्विनीकुमार रोगी को स्वस्थ न करते; और प्रत्यक्ष भी दिखता है कि युद्ध करने वालों और न करने वालों की, या विष खाने वालों और न खाने वालों की आयु एक-सी नहीं होती। इसलिए जीवन हितकर उपचार पर टिका है। गाड़ी के धुरे की उपमा से आत्रेय समझाते हैं कि अच्छा धुरा अपनी अवधि पूरी करके ही समाप्त होता है, पर बोझ, बुरे मार्ग या टूट-फूट से बीच में भी टूट जाता है; वैसे ही अपनी अवधि पूरी करके आई मृत्यु काल-मृत्यु है, और बल से बाहर काम, वेगों को रोकने, विष, चोट या गलत उपचार जैसे कारणों से बीच में आई मृत्यु अकाल-मृत्यु।

अन्त में अग्निवेश पूछते हैं कि वैद्य ज्वर में अधिकतर गरम पानी क्यों देते हैं। आत्रेय बताते हैं कि ज्वर आमाशय से उत्पन्न होता है और उसके लिए पाचन चाहिए; गरम पानी पाचन करता है, वात को अनुलोम करता है, अग्नि को जगाता है और श्लेष्मा (कफ) को सुखाता है; पर बहुत बढ़े पित्त वाले, या दाह, भ्रम, प्रलाप और अतिसार वाले ज्वर में वे इसे न देने को कहते हैं। इससे सामान्य नियम निकलता है कि औषध रोग के निदान (कारण) के विपरीत होता है: गरमी से हुए रोग ठंडक से, और अपतर्पण से हुए रोग पूरण (पोषण) से शान्त होते हैं, और उलटे भी। अपतर्पण के तीन भेद, लङ्घन, लङ्घन-पाचन और दोषावसेचन, दोष के कम, मध्यम या अधिक होने के अनुसार बताए गए हैं। यह सब ग्रन्थ का वर्णन है, कोई चिकित्सा-सलाह नहीं। फिर अध्याय उन रोगियों को गिनाता है जिनका उपचार वैद्य को अपयश देता है, कोष्ठक में छपे दो श्लोक जाङ्गल, अनूप और सम देश का भेद बताते हैं, और संग्रह-श्लोक अध्याय के विषय गिनाते हैं। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि उसके अनुसार महामारी उन भावों के बिगड़ने से आती है जो सबके लिए समान हैं, और उस बिगड़ने का मूल मनुष्यों का अधर्म है; समय रहते की गई तैयारी, औषध और सदाचार उनकी रक्षा करते हैं जिनकी मृत्यु नियत नहीं; और आयु पूरी तरह पहले से तय नहीं, बल्कि पिछले कर्म और इस जन्म के प्रयत्न के मेल पर, और हितकर आचरण पर, टिकी है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक ४९-५२)

तत्र श्लोकाः-पूर्वरूपाणि सामान्या हेतवः सस्वलक्षणाः।देशोद्ध्वंसस्य भैषज्यं हेतूनां मूलमेव च॥

श्लोक ४९ →

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक (ये हैं): पूर्वरूप, अपने-अपने लक्षणों सहित सामान्य हेतु, देशोद्ध्वंस (देश के विनाश) की चिकित्सा, और हेतुओं का मूल भी,

प्राग्विकारसमुत्पत्तिरायुषश्च क्षयक्रमः।मरणं प्रति भूतानां कालाकालविनिश्चयः॥

श्लोक ५० →

पहले (आदिकाल में) विकारों की उत्पत्ति, और आयु के घटने का क्रम, प्राणियों की मृत्यु के विषय में काल और अकाल का निर्णय,

यथा चाकालमरणं यथायुक्तं च भेषजम्।सिद्धिं यात्यौषधं येषां न कुर्याद्येन हेतुना॥

श्लोक ५१ →

और जिस प्रकार अकाल मृत्यु (होती है), और उचित रीति से प्रयोग किया गया भेषज (औषध) सिद्धि (सफलता) पाता है, जिनकी औषध (चिकित्सा) न करे, और जिस हेतु (कारण) से (न करे),

तदात्रेयोऽग्निवेशाय निखिलं सर्वमुक्तवान्।देशोद्ध्वंसनिमित्तीये विमाने मुनिसत्तमः॥

श्लोक ५२ →

मुनियों में श्रेष्ठ आत्रेय ने देशोद्ध्वंसनिमित्तीय विमान में अग्निवेश को यह सब पूरा-पूरा कहा।

मुख्य शब्द (२७) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

सामान्य
सामान्य - समानता; जो वृद्धि का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: समान + य (भाव) - समान होने का भाव।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: सामान्य सदा सब भावों की वृद्धि का कारण है, और एकत्व (एक जैसा बनाना) करता है (सू. १/४४-४५)। उदाहरण के लिए, जिस गुण वाला द्रव्य लिया जाए, वह शरीर में उसी गुण को बढ़ाता है।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

स्नेह
स्नेह - चिकनाई; घी, तेल, वसा, मज्जा
विस्तार

शब्द-रचना: √स्निह् (चिकना होना; प्रेम करना) से।

अर्थ: आयुर्वेद में चिकनाई वाले द्रव्य।

चरक संहिता में: चार महास्नेह हैं - सर्पि (घी), तैल, वसा और मज्जा (सू. १/८६); ये पीने, अभ्यञ्जन, बस्ति और नस्य में प्रयुक्त होते हैं (सू. १/८७)।

सामान्य अर्थ 'प्रेम' भी है।

मारुत
मारुत - वात दोष का दूसरा नाम
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा, पवन' (और वायु-देवता) है।

चरक संहिता में: मारुत वात दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/५९)। गुण और चिकित्सा के लिए 'वात' देखें।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

आरोग्य
आरोग्य - रोग का न होना; स्वास्थ्य
विस्तार

शब्द-रचना: अ (नहीं) + रोग + य (भाव)।

अर्थ: रोग से रहित होने की अवस्था, अर्थात् स्वास्थ्य।

चरक संहिता में: आरोग्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के चारों लक्ष्यों - का उत्तम मूल है (सू. १/१५); रोग इसी को हर लेते हैं (सू. १/१६)।

भिषज्
भिषक् - वैद्य, चिकित्सक
विस्तार

अर्थ: रोग दूर करने वाला, वैद्य।

चरक संहिता में: उत्तम भिषक् वह है जो औषधियों का योग देश, काल और प्रत्येक रोगी को देखकर जानता हो (सू. १/१२३); और वैद्यों में श्रेष्ठ वही है जो रोगी को रोगों से मुक्त कर दे (सू. १/१३४)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

वमन
वमन - उल्टी कराकर दोष बाहर निकालना
विस्तार

शब्द-रचना: √वम् (उगलना) से।

अर्थ: शोधन चिकित्सा की वह क्रिया जिसमें औषधि से उल्टी कराकर दोष बाहर निकाले जाते हैं।

चरक संहिता में: इस अध्याय में कई मूलिनी और फलिनी औषधियाँ वमन के लिए बताई गई हैं (सू. १/७९, १/८४)।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

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च. वि. ३/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम जनपदोद्ध्वंसनीय (जनपदों के विनाश सम्बन्धी) विमान की व्याख्या करेंगे।

च. वि. ३/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. वि. ३/३

॥ ३ ॥

जनपद-मण्डल (बसे हुए प्रदेशों के समूह) में, श्रेष्ठ द्विजातियों (द्विजों) से बसे हुए पञ्चाल क्षेत्र में, (उसकी) राजधानी काम्पिल्य में, शिष्यों के समूह से घिरे हुए भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने गर्मी की ऋतु के अन्तिम महीने में गङ्गा के तट पर वन में विचरण करते हुए (अपने) शिष्य अग्निवेश से कहा।

च. वि. ३/४

, , । । , । ॥ ४ ॥

हे सौम्य! निश्चय ही नक्षत्रों, ग्रहों के समूह, चन्द्रमा, सूर्य, वायु और अग्नि के, और दिशाओं के भी, जो अपनी प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) में नहीं रहे हैं, ऋतुओं के विकार सम्बन्धी भाव (परिवर्तन) दिखाई दे रहे हैं; और अब से शीघ्र ही भूमि भी ओषधियों के रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव को ठीक-ठीक उत्पन्न नहीं करेगी, और उनके अभाव से रोगों की बहुलता निश्चित है। इसलिए, हे सौम्य, (जनपद के) विनाश से पहले और भूमि के रसहीन होने से पहले, भैषज्यों (औषधों) का संग्रह कर लो, जब तक उनके रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव नष्ट नहीं हो जाते। और हम इनके रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव का उपयोग (उनके लिए) करेंगे जो हमसे (सहायता की) आशा रखते हैं और जिनकी (भलाई) हम चाहते हैं। क्योंकि, हे सौम्य, भैषज्यों के ठीक प्रकार से संग्रह किए जाने, ठीक प्रकार से तैयार किए जाने और ठीक प्रकार से प्रयोग किए जाने पर जनपदों का विनाश करने वाले विकारों (रोगों) के प्रतीकार (उपचार) में कुछ भी कठिनाई नहीं होती।

च. वि. ३/५

! , , ; ॥ ५ ॥

ऐसा कहने वाले भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा - भगवन्! भैषज्य (औषध) तो संग्रह कर लिए गए हैं, ठीक प्रकार से तैयार कर लिए गए हैं और ठीक प्रकार से प्रयोग में लाए गए हैं; परन्तु प्रकृति, आहार, देह, बल, सात्म्य, सत्त्व और आयु में एक-दूसरे से भिन्न मनुष्यों के जनपद का एक ही व्याधि से, एक साथ, विनाश किस कारण से होता है?

च. वि. ३/६

! । ; , , , ॥ ६ ॥

उनसे भगवान् आत्रेय ने कहा - अग्निवेश! इस प्रकार इन प्रकृति आदि भावों में असमान मनुष्यों के भी जो अन्य भाव सामान्य (सबके लिए एक समान) हैं, उनकी विगुणता (बिगड़ने) से एक ही समय में होने वाली और एक जैसे लिङ्गों (लक्षणों) वाली व्याधियाँ उत्पन्न होकर जनपद का विनाश कर देती हैं। और जनपदों में सामान्य होने वाले वे भाव ये हैं, जैसे - वायु, उदक (जल), देश और काल।

च. वि. ३/७

; ; ; ; ; ; ॥ ७ ॥

उनमें (उन चार भावों में), इस प्रकार के वात को अनारोग्यकर (रोग उत्पन्न करने वाला) जाने; जैसे कि: जो ऋतु के अनुरूप न हो, बहुत स्तिमित (थमा हुआ), बहुत चल (तेज़ बहने वाला), बहुत परुष (कठोर), बहुत शीत, बहुत उष्ण, बहुत रूक्ष और बहुत अभिष्यन्दी (नमी से भारी करने वाला) हो, बहुत भयंकर शब्द करता हो, जिसकी धाराएँ आपस में बहुत टकराती हों, जो बहुत चक्कर (बवंडर) बनाता हो, और जो असात्म्य (प्रतिकूल) गन्ध, भाप, बालू, धूल और धुएँ से दूषित हो; ऐसा (वात)। उदक (जल) को तो उसे (अनारोग्यकर) जाने जिसकी गन्ध, वर्ण, रस और स्पर्श बहुत विकृत हो गए हों, जिसमें क्लेद (सड़न-भरी चिपचिपाहट) बहुत हो, जिसे जलचर जीव और पक्षी छोड़ गए हों, जिसके जलेशय (जल में रहने वाले जीव) घट गए हों, जो अप्रिय लगे और जिसके गुण नष्ट हो गए हों। और देश को उसे अहितकर जाने जिसके वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श स्वाभाविक रूप से बदल गए हों, जिसमें क्लेद बहुत हो; जो सरीसृपों (रेंगने वाले जीवों), व्यालों (हिंसक जन्तुओं), मच्छरों, शलभों (टिड्डियों), मक्खियों, चूहों, उल्लुओं, श्मशान के पक्षियों, सियारों आदि से भर गया हो; जिसमें घास, उलूप (एक प्रकार की घास) और उपवन (झुरमुट) हों, प्रतान (बेलें) आदि बहुत हों; जो अनोखा (पहले जैसा नहीं) लगे; जिसकी फसलें गिर गई हों, सूख गई हों या नष्ट हो गई हों; जिसकी हवा धुएँ जैसी (धुँधली) हो; जहाँ पक्षियों के झुण्ड शोर मचाते हों; जहाँ तरह-तरह के पशु-पक्षियों के झुण्ड घबराए और पीड़ित होकर भटकते हों; जहाँ के लोगों ने धर्म, सत्य, लज्जा, आचार, शील और गुण छोड़ दिए हों या खो दिए हों; जिसके जलाशय निरन्तर क्षुब्ध रहते और उफनते हों; जहाँ लगातार उल्कापात, निर्घात (आकाश की भीषण कड़क) और भूकम्प होते हों; जहाँ बहुत भयानक शब्द और दृश्य हों; जहाँ सूर्य, चन्द्रमा और तारे रूखे, ताँबे जैसे, लाल और सफ़ेद बादलों के जाल से ढके रहते हों; जो बार-बार मानो हड़बड़ी और उद्वेग (व्याकुलता) से भरा, मानो भय और रुदन से भरा, मानो अन्धकार से भरा, मानो गुह्यकों से आक्रान्त हो, और जहाँ रोने-चिल्लाने के शब्द बहुत हों। और काल को तो अहितकर समझे जिसके लक्षण ऋतु के अनुरूप लक्षणों से विपरीत हों, अधिक हों या कम हों। कुशल (विद्वान्) लोग ऐसे दोषों से युक्त इन चार भावों को जनपदों का विनाश करने वाले कहते हैं; और इनसे भिन्न प्रकार के (भावों) को हितकर बताते हैं।

च. वि. ३/८

॥ ८ ॥

इन जनपद-विनाशक भावों के विगुण (दूषित) होने पर भी, जिनका भेषज (औषध) से उपचार किया जा रहा हो, उन्हें रोगों से अभय रहता है (रोगों का भय नहीं होता)।

च. वि. ३/९

- । ॥ ९ ॥

और यहाँ (इस विषय में ये श्लोक) हैं: वैगुण्य (दूषित दशा) को प्राप्त हुए देश, काल, अनिल (वायु) और अम्भस् (जल) का गरीयस्त्व (कौन किससे अधिक गम्भीर है) विशेष रूप से, कारण सहित, बताया जाएगा।

च. वि. ३/१०

।॥ १० ॥

अर्थ को जानने वाला (विद्वान्) स्वभाव से ही, दुष्परिहार्यता (बचना कठिन होने) के कारण, वात से जल को, जल से देश को और देश से काल को गरीयस्तर (अधिक गम्भीर) जाने।

च. वि. ३/११

। ॥ ११ ॥

विशेषों (भेदों) को जानने वाला (वैद्य) तो वायु आदि में जैसे बताए गए हैं, उन दोषों के लाघव (हल्केपन) का लक्षण (उनके) प्रतीकार (उपाय) की सुगमता में जाने।

च. वि. ३/१२

। ॥ १२ ॥

परन्तु काल तक के (वायु, जल, देश और काल) चारों के दूषित होने पर भी, जब मनुष्य भेषज (औषध) से उपचारित किए जाते हैं, तब वे आतुर (रोगी) नहीं होते।

च. वि. ३/१३

। ॥ १३ ॥

जिनकी मृत्यु (दूसरों के साथ) समान नहीं है, और न जिनके कर्मों में समानता है, उनके लिए पाँच प्रकार का कर्म (पञ्चकर्म) परम (सबसे उत्तम) भेषज कहा जाता है।

च. वि. ३/१४

। ॥ १४ ॥

रसायनों का विधिपूर्वक उपयोग भी प्रशस्त माना जाता है, और पहले से एकत्र किए गए भेषजों से देहवृत्ति (शरीर का पालन-पोषण) भी प्रशस्त मानी जाती है।

च. वि. ३/१५

। ॥ १५ ॥

सत्य, प्राणियों पर दया, दान, बलि (देवताओं आदि को अर्पित भेंट), देवताओं का पूजन, सद्वृत्त (अच्छे आचरण) का पालन, प्रशम (मन की शान्ति) और अपनी रक्षा,

च. वि. ३/१६

। ॥ १६ ॥

और मंगलमय (निरापद) जनपदों का हितकर सेवन (वहाँ निवास), ब्रह्मचर्य का पालन, और उसी प्रकार ब्रह्मचारियों की सेवा (संगति),

च. वि. ३/१७

। ॥ १७ ॥

धर्मशास्त्रों की और जितात्मा (अपने मन को जीत चुके) महर्षियों की चर्चा, और धार्मिक, सात्त्विक तथा वृद्धों द्वारा मान्य (लोगों) के साथ सदा उठना-बैठना,

च. वि. ३/१८

। ॥ १८ ॥

इस प्रकार, उस अत्यन्त भयंकर समय में, (उन लोगों के लिए) जिनकी मृत्यु नियत (पहले से निश्चित) नहीं है, यह (सब) आयु की रक्षा करने वाला भेषज कहा गया है।

च. वि. ३/१९

! ? ॥ १९ ॥

जनपदोद्ध्वंसन (जनपदों के विनाश) के कारणों को इस प्रकार सुनकर अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय से फिर कहा: भगवन्! अब (बताइए), इन वायु आदि का वैगुण्य (विकार) किस मूल से उत्पन्न होता है, जिससे युक्त होकर वे जनपद को उजाड़ देते हैं?

च. वि. ३/२०

! , ; । , , , ; ; , , , , ; ॥ २० ॥

भगवान् आत्रेय ने उनसे कहा: अग्निवेश! सभी वायु आदि में जो वैगुण्य उत्पन्न होता है, उसका मूल अधर्म है, अथवा उसका मूल पहले किया गया असत्कर्म (बुरा कर्म) है; और उन दोनों की योनि (उद्गम) प्रज्ञापराध ही है। जैसे: जब देश, नगर, निगम (बाज़ार वाले नगर) और जनपद के प्रधान (मुखिया) धर्म का उल्लंघन करके प्रजा के साथ अधर्म से व्यवहार करते हैं, तब उनके आश्रित और उन आश्रितों के भी आश्रित, नगरवासी और जनपदवासी, और व्यवहार (व्यापार, लेन-देन) से जीविका चलाने वाले उस अधर्म को और बढ़ाते हैं। तब वह अधर्म बलपूर्वक धर्म को ढक देता है। तब जिनका धर्म लुप्त हो गया है, वे (लोग) देवताओं द्वारा भी त्याग दिए जाते हैं। इस प्रकार जिनका धर्म लुप्त हो गया है, जिनमें अधर्म प्रधान है और जिन्हें देवता छोड़कर चले गए हैं, उनकी ऋतुएँ बिगड़ जाती हैं। इस कारण देव (वर्षा के देवता) समय पर जल नहीं बरसाते, या बरसाते ही नहीं, या विकृत रूप में बरसाते हैं; वायु (हवाएँ) ठीक से नहीं बहतीं, भूमि बिगड़ जाती है, जल सूख जाते हैं, और ओषधियाँ (वनस्पतियाँ) अपना स्वभाव छोड़कर विकृति को प्राप्त होती हैं। तब छूने और खाने-पीने की वस्तुओं के दोष से जनपद उजड़ जाते हैं।

च. वि. ३/२१

। , , ॥ २१ ॥

उसी प्रकार शस्त्रों से होने वाले जनपद-विनाश का हेतु भी अधर्म ही होता है। जिनके लोभ, क्रोध, मोह और मान (अहंकार) बहुत बढ़ गए हैं, वे दुर्बलों की अवहेलना करके, अपने, अपने स्वजनों और दूसरों के विनाश के लिए, शस्त्र से एक-दूसरे पर आक्रमण करते हैं, या दूसरों पर आक्रमण करते हैं, या दूसरों के द्वारा आक्रमण के शिकार होते हैं।

च. वि. ३/२२

॥ २२ ॥

या (लोग) राक्षसों के गण आदि, विविध भूत-समूहों के द्वारा मारे जाते हैं, जब वे (भूत उनमें) उस अधर्म को, या किसी दूसरे अपचार (अनुचित आचरण) को भी, पा लेते हैं।

च. वि. ३/२३

। ; , ॥ २३ ॥

इसी प्रकार अभिशाप (शाप) से उत्पन्न होने वाले (जनपद-विनाश) का भी हेतु अधर्म ही होता है। जो लोग धर्म खो चुके हैं और धर्म से हट गए हैं, वे गुरुओं, वृद्धों, सिद्धों, ऋषियों और पूज्य जनों का अपमान करके अहितकर आचरण करते हैं; तब गुरु आदि के द्वारा शाप दी गई वे प्रजाएँ तुरन्त ही भस्म हो जाती हैं, जिससे अनेक पुरुषों और कुलों का विनाश होता है; (कुछ) निश्चित कारण के मिलने से (ऐसे नष्ट होते हैं), और दूसरे अनियत (होते हैं)।

च. वि. ३/२४

। । । , , , , , । , , । । , । । । ॥ २४ ॥

और पहले (आदि काल में) भी अधर्म के सिवा किसी अन्य (कारण) से अशुभ की उत्पत्ति नहीं हुई। क्योंकि आदि काल में पुरुष अदिति के पुत्रों (देवताओं) के समान ओज वाले, अत्यन्त निर्मल और विपुल प्रभाव वाले, देवता, देवर्षि, धर्म, यज्ञ, विधि और विधान को प्रत्यक्ष देखने वाले, पर्वत के सार (चट्टान) जैसे ठोस और स्थिर शरीर वाले, निर्मल वर्ण और इन्द्रियों वाले, वायु के समान बल, वेग और पराक्रम वाले, सुन्दर नितम्बों वाले, सुन्दर प्रमाण (डील-डौल), आकृति, प्रसाद (प्रसन्नता) और उपचय (शरीर की पुष्टि) से युक्त, सत्य, आर्जव, आनृशंस्य, दान, दम, नियम, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य और व्रत में तत्पर, और भय, राग, द्वेष, मोह, लोभ, क्रोध, शोक, मान, रोग, निद्रा, तन्द्रा, श्रम, क्लम, आलस्य और परिग्रह से रहित, और अमित आयु वाले थे। उदार सत्त्व, गुण और कर्म वाले उन (पुरुषों) के लिए कृतयुग के आरम्भ में, पृथ्वी आदि के सब गुणों से सम्पन्न होने के कारण, अचिन्त्य रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव और गुणों से युक्त शस्य (अन्न) उत्पन्न हुए। परन्तु कृतयुग के ढलते समय कुछ सम्पन्न प्राणियों के अत्यादान (अत्यधिक ग्रहण) से शरीर में भारीपन हुआ; शरीर के भारीपन से श्रम, श्रम से आलस्य, आलस्य से संचय, संचय से परिग्रह, और परिग्रह से लोभ कृत (युग) में ही उत्पन्न हुआ। फिर त्रेता (युग) में लोभ से अभिद्रोह, अभिद्रोह से असत्य वचन, और असत्य वचन से काम, क्रोध, मान, द्वेष, पारुष्य, अभिघात, भय, ताप, शोक, चिन्ता, उद्वेग आदि प्रवृत्त हुए। तब त्रेता में धर्म का एक पाद अन्तर्धान हो गया। उसके अन्तर्धान से युग के वर्षों के प्रमाण में एक पाद की कमी हुई, और पृथ्वी आदि के गुणों के एक पाद का नाश हुआ। और उस नाश से शस्यों के स्नेह, वैमल्य, रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव और गुणों के एक पाद का ह्रास हुआ। तब घटते हुए गुण-पाद वाले आहार-विहार से पहले जैसा सहारा न पाते हुए प्रजा के वे शरीर, अग्नि और मारुत से घिरे हुए, पहले-पहल ज्वर आदि व्याधियों से आक्रान्त हुए। इसलिए प्राणी क्रमशः आयु के ह्रास को प्राप्त हुए।

च. वि. ३/२५

- । ॥ २५ ॥

और यहाँ (इस विषय में ये दो श्लोक) हैं: युग-युग में इस क्रम से धर्म का एक पाद (चौथाई भाग) घटता जाता है, और भूतों के गुणों का (एक) पाद भी; इस प्रकार लोक (संसार) का प्रलय (विनाश) होता है।

च. वि. ३/२६

। ॥ २६ ॥

जिस काल (युग) में (आयु का) जो मान माना जाता है, उस काल में सौ वर्ष पूरे होने पर देहधारियों की आयु (के उस मान) का एक वर्ष क्षय को प्राप्त होता है (घट जाता है)।

च. वि. ३/२७

॥ २७ ॥

इस प्रकार विकारों (रोगों) की पहली उत्पत्ति का कारण कह दिया गया है।

च. वि. ३/२८

! ॥ २८ ॥

ऐसा कहने वाले भगवान् (आत्रेय) से अग्निवेश ने कहा: हे भगवन्! क्या सारी आयु नियत काल-प्रमाण वाली (पहले से निश्चित अवधि की) होती है, या नहीं?

च. वि. ३/२९

-! । ॥ २९ ॥

भगवान् (आत्रेय) ने उनसे कहा: हे अग्निवेश! यहाँ (इस लोक में) प्राणियों की आयु युक्ति (उचित संयोग) की अपेक्षा रखती है (उस पर निर्भर है), क्योंकि इसका (आयु का) बल-अबल (प्रबलता और दुर्बलता) दैव और पुरुषकार पर टिका है।

च. वि. ३/३०

। ॥ ३० ॥

जो अपना ही किया हुआ, पूर्व देह का (पिछले जन्म का) कर्म है, उसे दैव जानना चाहिए; और जो दूसरा (कर्म) यहाँ (इस जन्म में) किया जाता है, वह पुरुषकार कहा गया है।

च. वि. ३/३१

। ॥ ३१ ॥

और उन दोनों कर्मों में भी बल और अबल (प्रबलता और दुर्बलता) का अन्तर होता है; क्योंकि कर्म तीन प्रकार का देखा गया है: हीन (निम्न), मध्यम और उत्तम।

च. वि. ३/३२

। ॥ ३२ ॥

उन दोनों (दैव और पुरुषकार) की, जब वे उदार (उत्तम, प्रबल) हों, युक्ति (मेल) दीर्घ, सुखमय और नियत आयु का कारण है; और दूसरी (युक्ति) उसके विपरीत (आयु) का (कारण है)।

च. वि. ३/३३

। ॥ ३३ ॥

मध्यम (युक्ति) मध्यम (आयु) का (कारण) मानी गई है। और एक दूसरा कारण (भी) सुनो: दुर्बल दैव पुरुषकार से निश्चय ही दबा दिया जाता है।

च. वि. ३/३४

। ॥ ३४ ॥

और दूसरा कर्म (पुरुषकार) विशिष्ट (प्रबल) दैव से दबा दिया जाता है; जिसे देखकर कुछ लोग मानते हैं कि आयु का मान (परिमाण) नियत (पहले से निश्चित) है।

च. वि. ३/३५

। ॥ ३५ ॥

कोई कर्म महान् (प्रबल) होता है, और अपने विपाक (फल देने) में किसी (निश्चित) समय पर नियत होता है; परन्तु कोई (कर्म) काल से नियत नहीं होता, (वह) प्रत्ययों (सहायक कारणों) से जगाया जाता है।

च. वि. ३/३६

। , ; , , , , , , , , ; , । , , , , , । , ; , , , ; , । , , , , , ॥ ३६ ॥

इसलिए, क्योंकि दोनों (बातें) देखी जाती हैं, एकान्त (केवल एक पक्ष) को पकड़ना उचित नहीं है। यहाँ हम एक निदर्शन (उदाहरण) भी प्रस्तुत करेंगे - यदि सारी आयु निश्चित काल-परिमाण वाली होती, तो आयु चाहने वाले लोग मन्त्र, ओषधि, मणि, मङ्गल-कर्म, बलि, उपहार, होम, नियम, प्रायश्चित्त, उपवास, स्वस्त्ययन, प्रणिपात, गमन आदि क्रियाओं और इष्टियों (यज्ञों) का प्रयोग न करते; न बिगड़े हुए, उग्र और चञ्चल गाय-बैलों, हाथियों, ऊँटों, गधों, घोड़ों, भैंसों आदि से और दूषित पवन (हवा) आदि से बचना पड़ता, न प्रपातों (खड़ी ढलानों), पर्वतों, ऊबड़-खाबड़ और दुर्गम स्थानों तथा जल के वेगों से; उसी प्रकार न उन (मनुष्यों) से जिनकी बुद्धि प्रमत्त, उन्मत्त, उद्भ्रान्त, उग्र, चञ्चल और मोह तथा लोभ से व्याकुल हो, न शत्रुओं से, न भड़की हुई अग्नि से, और (न) अनेक प्रकार के विषों के आश्रय सरीसृपों (रेंगने वाले जीवों), साँपों आदि से, न साहस से, न अनुचित देश और काल में किए आचरण से, न राजा के प्रकोप से; क्योंकि ऐसे (और इसी प्रकार के अन्य) भाव अभाव (मृत्यु) करने वाले न होते, क्योंकि सारी आयु निश्चित काल-परिमाण वाली होती। और अकाल मृत्यु के भय को दूर करने वाले (उपायों) का अभ्यास न करने वाले प्राणियों को अकाल मृत्यु का भय न आता, रसायन के प्रकरण में महर्षियों के आरम्भ, कथन, प्रयोग और विचार व्यर्थ होते, न ही इन्द्र नियत आयु वाले शत्रु को वज्र से मारते, न दोनों अश्विन पीड़ित (रोगी) को भेषज से (स्वस्थ) करते, न महर्षि तप से इच्छा के अनुसार आयु प्राप्त करते, और न जानने योग्य सब कुछ जान चुके महर्षि सुरेश (इन्द्र) सहित (इसे) ठीक-ठीक देखते, उपदेश करते या आचरण करते। और भी, सब चक्षुओं (जानने के साधनों) में यह श्रेष्ठ है, जो ऐन्द्र चक्षु है, और यह (बात) हमें उसी से प्रत्यक्ष भी है; जैसे - बार-बार उठकर युद्ध करने वाले और युद्ध न करने वाले हज़ारों पुरुषों में आयु की असमानता (दिखती है), उसी प्रकार तुरन्त जन्मे (शिशुओं) में प्रतीकार (उपचार) न होने से और प्रतीकार होने से, और विष न खाने वालों तथा विष खाने वालों में भी आयु की असमानता ही (दिखती है); और कुएँ से पानी भरने के घड़ों और चित्रित घड़ों का, (जो दोनों ही) नष्ट होते हैं, योगक्षेम (टिके और सुरक्षित रहना) समान नहीं होता; इसलिए जीवन हितकर उपचार पर टिका है, और इसी कारण उसके विपर्यय (उलटे आचरण) से मृत्यु होती है। और भी, देश, काल और आत्मा के गुणों के विपरीत (गुण वाले) कर्मों और आहार-विकारों (भोजन से बने पदार्थों) का क्रम से उचित उपयोग, सब (विषयों) के अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग का त्याग, सब प्रकार के अतियोग को रोकना, उभरे हुए और गतिशील (वेगों) को न रोकना, और साहसों से बचना - इन्हें हम आरोग्य के बने रहने में हेतु पाते हैं, (इन्हीं का) ठीक-ठीक उपदेश करते हैं और (इन्हें) ठीक-ठीक देखते हैं।

च. वि. ३/३७

! ॥ ३७ ॥

इसके बाद अग्निवेश ने कहा - हे भगवन्! ऐसा होने पर, जिन (प्राणियों) की आयु का काल-प्रमाण (अवधि) नियत नहीं है, उनकी काल-मृत्यु (उचित समय पर मृत्यु) या अकाल-मृत्यु (असमय मृत्यु) कैसे होती है?

च. वि. ३/३८

! , ; । , , ; ॥ ३८ ॥

भगवान् आत्रेय ने उन (अग्निवेश) से कहा - अग्निवेश! सुनो। जैसे गाड़ी में जुड़ा हुआ अक्ष (धुरा), जो स्वभाव से ही धुरे के गुणों से युक्त हो और सब गुणों से सम्पन्न भी हो, चलाए जाते हुए समय आने पर अपने प्रमाण (टिकने की अवधि) के क्षय से ही अन्त को प्राप्त हो, वैसे ही शरीर में स्थित आयु, जो स्वभाव से बलवान हो और ठीक प्रकार से सँभाली जा रही हो, अपने प्रमाण के क्षय से ही अन्त को प्राप्त होती है; वह काल (उचित समय) पर (होने वाली) मृत्यु है। और जैसे वही अक्ष अत्यधिक भार से लदा होने से, ऊबड़-खाबड़ मार्ग से, मार्ग के बिना (चलने) से, धुरे या पहिये के टूटने से, वाह्य (खींचने वाले पशु) और वाहक (चालक) के दोष से, अणि (धुरे की कील) के निकल जाने से, चिकनाई न देने से और उलट जाने से बीच में ही अन्त को प्राप्त हो जाता है, वैसे ही आयु भी बल के अनुसार न किए गए आरम्भ (कार्य) से, अग्नि (पाचन-शक्ति) के अनुसार न खाने से, विषम (अनियमित) ढंग से खाने से, शरीर को विषम (अनुचित) स्थिति में रखने से, अति मैथुन से, असत् (बुरे) का आश्रय लेने से, उभरे हुए वेगों को रोकने से, रोकने योग्य वेगों को न रोकने से, भूत, विष, वायु और अग्नि की पीड़ा से, चोट से, और आहार तथा प्रतीकार (उपचार) छोड़ देने से बीच में ही अन्त को प्राप्त हो जाती है; वह अकाल (असमय) मृत्यु है। इसी प्रकार मिथ्या (गलत) उपचार किए गए ज्वर आदि रोगों को भी हम अकाल-मृत्यु (के कारण) देखते हैं।

च. वि. ३/३९

! , ॥ ३९ ॥

तब अग्निवेश ने पूछा - हे भगवन्! भला वैद्य ज्वर से पीड़ित (रोगियों) को अधिकतर गरम जल क्यों देते हैं, उतना ठंडा (जल) क्यों नहीं, जबकि ज्वर उत्पन्न करने वाली ऐसी धातु भी है जो शीत (ठंडक) से ठीक होने योग्य है?

च. वि. ३/४०

। , ; , । , , , , ; , , ॥ ४० ॥

भगवान् आत्रेय ने उनसे (अग्निवेश से) कहा: ज्वर के रोगी के काय (शरीर), समुत्थान (रोग के उद्भव), देश और काल को भली-भाँति देखकर वैद्य पाचन के लिए गरम पानी देते हैं। क्योंकि ज्वर आमाशय से उत्पन्न होता है, और आमाशय से उत्पन्न विकारों के औषध प्रायः पाचन, वमन और अपतर्पण करने में समर्थ होते हैं; और गरम पानी पाचन के लिए है, इसलिए वैद्य ज्वर के रोगियों को अधिकतर यही देते हैं। क्योंकि वह उनके वात को अनुलोम करता है (सही दिशा में चलाता है), उदर की अग्नि को जगाता है, जल्दी पच जाता है, श्लेष्मा (कफ) को सुखाता है, और थोड़ा-सा पिया हुआ भी तृष्णा (प्यास) को शान्त करने में समर्थ होता है। और ऐसा उपयोगी होने पर भी यह (गरम पानी) उस ज्वर में नहीं देना चाहिए जिसमें पित्त अत्यधिक बढ़ा हुआ हो, या जो दाह (जलन), भ्रम (चक्कर), प्रलाप (बड़बड़ाना) और अतिसार (दस्त) के साथ हो; क्योंकि गरम (पानी) से दाह, भ्रम, प्रलाप और अतिसार और अधिक बढ़ते हैं, और शीतल (पानी) से शान्त होते हैं।

च. वि. ३/४१

- । ॥ ४१ ॥

और इस विषय में (यह श्लोक) है: चिकित्सा को जानने वाले वैद्य उष्ण (गरमी) से उत्पन्न रोगों को शीत (ठंडे उपचार) से शान्त करते हैं; और जो रोग शीत से उत्पन्न होते हैं, उनकी चिकित्सा उष्ण (गरम उपचार) है।

च. वि. ३/४२

; , ॥ ४२ ॥

इसी प्रकार दूसरी व्याधियों का भी औषध निदान (रोग के कारण) के विपरीत होता है; जैसे अपतर्पण (पोषण की कमी) के कारण होने वाली व्याधियों की शान्ति पूरण (पोषण देकर भरने) के बिना नहीं होती, वैसे ही पूरण के कारण होने वाली व्याधियों की (शान्ति) अपतर्पण के बिना (नहीं होती)।

च. वि. ३/४३

, , ॥ ४३ ॥

और अपतर्पण भी तीन प्रकार का है: लङ्घन, लङ्घन-पाचन और दोषावसेचन।

च. वि. ३/४४

, ; , ; , , ॥ ४४ ॥

उनमें से लङ्घन अल्प बल वाले दोष वाले (रोगियों) के लिए है; क्योंकि लङ्घन से अग्नि और मारुत (वात) की वृद्धि होती है, और उससे अल्प दोष वैसे ही सूख जाता है जैसे हवा और धूप से घिरा थोड़ा-सा जल। और लङ्घन और पाचन मध्यम बल वाले दोष वाले (रोगियों) के लिए हैं; क्योंकि लङ्घन और पाचन से मध्यम बल वाला दोष वैसे ही सूख जाता है जैसे बहुत अधिक न हो ऐसा जल सूर्य के ताप और हवा से, और धूल और राख डालने से (सूख जाता है)। और बहुत दोष वालों के लिए तो दोषावसेचन ही करना चाहिए; क्योंकि केदार (खेत की क्यारी) की मेड़ तोड़े बिना पल्वल (भरे हुए छोटे जलाशय) का पानी नहीं निकलता; दोषावसेचन भी वैसा ही है।

च. वि. ३/४५

। । ॥ ४५ ॥

इस प्रकार के रोगी का दोषावसेचन या कोई दूसरा औषध (उपचार), उसका समय आ जाने पर भी, (वैद्य) न करे। जैसे: जिसकी चिकित्सा करने पर निन्दा से बचा न जा सके, जो निर्धन हो, जिसका कोई परिचारक (सेवा करने वाला) न हो, जो स्वयं को वैद्य मानता हो, जो क्रोधी हो, जो दूसरों में दोष ढूँढ़ता हो, जिसकी अधर्म में तीव्र रुचि हो, जिसका बल, मांस और रक्त अत्यन्त क्षीण हो गया हो, जो असाध्य रोग से ग्रस्त हो, और जिसमें मरणासन्न व्यक्ति के लक्षण हों। क्योंकि ऐसे रोगी की चिकित्सा करने वाला वैद्य बहुत बुरे अपयश का भागी होता है।

च. वि. ३/४६

- । ॥ ४६ ॥

और इस विषय में (यह श्लोक) है: जिस कर्म का फल तत्काल या आगे चलकर (परिणाम में) अशुभ हो, वह (कर्म) नहीं करना चाहिए; यह बुद्धिमानों का मत है।

च. वि. ३/४७

( । ॥ ४७ ॥

(जो देश थोड़े जल और थोड़े वृक्षों वाला, खूब हवा वाला और बहुत धूप वाला हो, उसे जाङ्गल देश जानना चाहिए, और सबसे कम रोगों वाला भी।

च. वि. ३/४८

। , ॥)

जो देश बहुत जल और बहुत वृक्षों वाला हो, जहाँ हवा न चलती हो और धूप दुर्लभ हो, वह अनूप देश है, और बहुत दोषों वाला; और सम देश साधारण माना गया है।)

च. वि. ३/४९

- । ॥ ४९ ॥

इस विषय में (संग्रह के) श्लोक (ये हैं): पूर्वरूप, अपने-अपने लक्षणों सहित सामान्य हेतु, देशोद्ध्वंस (देश के विनाश) की चिकित्सा, और हेतुओं का मूल भी,

च. वि. ३/५०

। ॥ ५० ॥

पहले (आदिकाल में) विकारों की उत्पत्ति, और आयु के घटने का क्रम, प्राणियों की मृत्यु के विषय में काल और अकाल का निर्णय,

च. वि. ३/५१

। ॥ ५१ ॥

और जिस प्रकार अकाल मृत्यु (होती है), और उचित रीति से प्रयोग किया गया भेषज (औषध) सिद्धि (सफलता) पाता है, जिनकी औषध (चिकित्सा) न करे, और जिस हेतु (कारण) से (न करे),

च. वि. ३/५२

। ॥ ५२ ॥

मुनियों में श्रेष्ठ आत्रेय ने देशोद्ध्वंसनिमित्तीय विमान में अग्निवेश को यह सब पूरा-पूरा कहा।

च. वि. ३

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के विमानस्थान में जनपदोद्ध्वंसनीय विमान नामक तीसरा अध्याय (पूरा हुआ)।