भारत संहिता

अध्याय ४

त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीयं विमानम्

रोग को जानने के तीन उपाय

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भूमिका

त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीय विमान चरक संहिता के विमानस्थान का चौथा अध्याय है, और इसका उपदेश भगवान् आत्रेय का है। नाम का अर्थ है 'रोग को विशेष रूप से जानने के तीन प्रकारों सम्बन्धी', और अध्याय इसी बात से आरम्भ होता है: किसी रोग को उसकी विशेषताओं सहित ठीक-ठीक जानने के तीन साधन हैं, आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष और अनुमान। पूरा अध्याय इन्हीं तीनों को समझाता है: हर एक क्या है, उनका क्रम क्या है, और हर एक से रोग और रोगी के बारे में क्या-क्या जाना जाता है।

पहले भगवान् आत्रेय तीनों की परिभाषा देते हैं। आप्तोपदेश आप्त जनों का वचन है: आप्त वे हैं जो सन्देहरहित स्मृति से विषयों के विभाग को जानते हैं और लगाव या विरोध के बिना देखते हैं, इसलिए उनका वचन प्रमाण है; नशे में चूर, विक्षिप्त, मूर्ख, राग से भरे और दुष्ट व्यक्ति का वचन प्रमाण नहीं है। प्रत्यक्ष वह है जो व्यक्ति स्वयं अपनी इन्द्रियों और मन से जानता है, और अनुमान युक्ति पर आधारित तर्क है। फिर वे बताते हैं कि तीनों के मेल से रोग की सब प्रकार से पूरी परीक्षा करने पर ही बाद का निश्चय दोषरहित होता है, क्योंकि ज्ञान के एक अंश से पूरे विषय का ज्ञान नहीं होता। क्रम भी तय है: पहले उपदेश से ज्ञान, फिर प्रत्यक्ष और अनुमान से परीक्षा, क्योंकि जिस बात का पहले उपदेश ही न हुआ हो, उसे कोई परीक्षा करके भी नहीं जान सकता। इसीलिए ज्ञानवानों की परीक्षा दो प्रकार की कही गई है, प्रत्यक्ष और अनुमान, या उपदेश को भी गिनें तो तीन प्रकार की।

इसके बाद अध्याय बताता है कि हर साधन से क्या जाना जाता है। बुद्धिमान् आचार्य उपदेश करते हैं कि वैद्य हर रोग को उसके प्रकोपण, योनि, उत्थान, आत्मा (स्वरूप), अधिष्ठान, वेदना, संस्थान, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध, उपद्रव, वृद्धि, स्थान और क्षय, उदर्क, नाम और योग सहित जाने, और यह भी कि उस रोग में उपचार में लगना है या उससे रुकना; यह सब उपदेश से जाना जाता है। प्रत्यक्ष से रोगी की परीक्षा सब इन्द्रियों से की जाती है, केवल रस (स्वाद) को छोड़कर: कान से आँतों की गुड़गुड़ाहट, जोड़ों का चटकना और स्वर, आँख से वर्ण, आकृति, माप, कान्ति और शरीर की प्रकृति और विकार, नाक से गन्ध, और हाथ से स्पर्श। रोगी के शरीर का रस प्रत्यक्ष से नहीं जाना जा सकता, इसलिए ग्रन्थ उसे अनुमान से जानने को कहता है: मुँह का स्वाद रोगी से पूछकर, शरीर की विरसता जूँओं के हट जाने से, मधुरता मक्खियों के पास आने से, और निकला हुआ रक्त धारिलोहित है या लोहितपित्त, यह इससे कि कुत्ते और कौए उसे खाते हैं या नहीं।

फिर एक लम्बी सूची उन भावों की है जो अधिकतर अनुमान से जाने जाते हैं, हर एक अपने संकेत के साथ: अग्नि भोजन पचाने की शक्ति से, बल व्यायाम की शक्ति से, इन्द्रियाँ अपने विषयों के ग्रहण से, क्रोध, शोक, भय, धैर्य, श्रद्धा, मेधा और स्मृति जैसे मन के भाव अपने बाहरी लक्षणों से, छिपे लक्षणों वाला रोग उपशय और अनुपशय से, दोषों की मात्रा अपचार (अनुचित आहार-विहार) की विशेषता से, और आयु का क्षय अरिष्टों से। कुछ बातें केवल रोगी से पूछकर जानी जाती हैं: उसकी ग्रहणी का मृदु या दारुण होना, उसके स्वप्न, उसकी इच्छा, और उसे क्या प्रिय है, क्या अप्रिय, क्या सुख और क्या दुःख।

अध्याय के अन्त के श्लोक इसका सार कहते हैं। उनके अनुसार विचक्षण वैद्य आप्त के उपदेश, प्रत्यक्ष और अनुमान, तीनों से रोगों को भली-भाँति जाने, और जितना सम्भव हो सब कुछ परखकर पहले तत्त्व का, यानी रोग वास्तव में क्या है, और उसके तुरन्त बाद कार्य का, यानी क्या करना है, निश्चय करे। जो कार्य और तत्त्व को जानता है, वह चिकित्सा के निर्णय में भ्रमित नहीं होता और भ्रम न होने का फल पाता है; और जो ज्ञान और बुद्धि के दीपक से रोगी की अन्तरात्मा में प्रवेश नहीं करता, वह रोगों की चिकित्सा नहीं करता। अन्तिम दो श्लोक कहते हैं कि उदार बुद्धि वाले मुनि ने ये सब बातें इस त्रिरोगविज्ञान विमान में कही हैं। इस अध्याय से ये बातें साथ ले जाने योग्य हैं: अध्याय के अनुसार रोग का ज्ञान तीनों साधनों के मेल से होता है, और कोई एक साधन अकेले पूरा नहीं; उपदेश पहले आता है और परीक्षा उसके बाद; और चिकित्सा का निर्णय पूरी परीक्षा के बाद ही होता है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक १३-१४)

तत्र श्लोकौ-सर्वरोगविशेषाणां त्रिविधं ज्ञानसंग्रहम्।यथा चोपदिशन्त्याप्ताः प्रत्यक्षं गृह्यते यथा॥

श्लोक १३ →

इस विषय में (सार के) दो श्लोक (हैं): सब रोगों की विशेषताओं के तीन प्रकार के ज्ञान-संग्रह (जानने के उपायों) को, आप्त जन जिस प्रकार उपदेश देते हैं उसे, और प्रत्यक्ष (रूप से कोई बात) जिस प्रकार ग्रहण की जाती है उसे,

ये यथा चानुमानेन ज्ञेयास्तांश्चाप्युदारधीः।भावांस्त्रिरोगविज्ञाने विमाने मुनिरुक्तवान्॥

श्लोक १४ →

और जो (भाव) जिस प्रकार अनुमान से जानने योग्य हैं, उन भावों को भी उदार (श्रेष्ठ) बुद्धि वाले मुनि ने त्रिरोगविज्ञान (रोग को तीन प्रकार से जानने के) विमान में कहा है।

मुख्य शब्द (१४) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

इन्द्रिय
इन्द्रिय - जानने और करने के साधन, जैसे आँख, कान
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में 'इन्द्र' (आत्मा) से - आत्मा का चिह्न या साधन।

अर्थ: पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) संसार को जानने के साधन हैं; कर्मेन्द्रियाँ काम करने के।

चरक संहिता में: इन्द्रियाँ आयु के चार घटकों में से एक हैं (सू. १/४२)। इन्द्रियों के विषयों का गलत, कम या अधिक योग रोगों का एक कारण है (सू. १/५४)।

युक्ति
युक्ति - उचित योजना; सही ढंग से प्रयोग
विस्तार

शब्द-रचना: √युज् (जोड़ना) से - ठीक से जोड़ना।

अर्थ: चिकित्सा में रोगी, रोग, देश, काल और मात्रा देखकर औषध का सही प्रयोग।

चरक संहिता में: शरीर के दोषों के औषध युक्ति पर आश्रित हैं (सू. १/५८); और युक्ति से रहित वैद्य की दी हुई औषध नहीं लेनी चाहिए (सू. १/१२७)।

आत्मन्
आत्मा - चेतना का स्रोत, नित्य द्रष्टा
विस्तार

अर्थ: सामान्य संस्कृत में 'आत्मन्' का अर्थ 'स्वयं' भी होता है।

चरक संहिता में: आत्मा निर्विकार (न बदलने वाला), नित्य और द्रष्टा (देखने-जानने वाला) है; वह मन, भूतों के गुणों और इन्द्रियों के साथ मिलकर चेतना का कारण बनता है (सू. १/५६)। आत्मा, मन और शरीर का संयोग ही 'पुरुष' है, जिसके लिए आयुर्वेद कहा गया है (सू. १/४६-४७)। आत्मा नौ द्रव्यों में से एक भी है (सू. १/४८)।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

आतुर
आतुर - रोगी
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'व्याकुल, पीड़ित' है; आयुर्वेद में रोगी।

चरक संहिता में: आयुर्वेद स्वस्थ और आतुर दोनों का परम आश्रय है (सू. १/२४) - स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा, और आतुर के रोग का शमन।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

रजस्
रज - मन का एक दोष; चंचलता और उत्तेजना
विस्तार

अर्थ: सांख्य दर्शन में रज प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से एक है - गति और उत्तेजना का गुण। सामान्य अर्थ 'धूल' भी है।

चरक संहिता में: रज और तम मन के दो दोष हैं (सू. १/५७), जो ज्ञान, विज्ञान, धैर्य, स्मृति और समाधि से शान्त होते हैं (सू. १/५८)। रज के बढ़ने के लक्षण आगे के अध्यायों में आते हैं।

लिङ्ग
लिङ्ग - चिह्न; रोग या स्वास्थ्य का लक्षण
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'चिह्न, पहचान' है।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में दूसरा - वे लक्षण जिनसे रोग या स्वास्थ्य पहचाना जाता है (सू. १/२४)।

व्याकरण में 'लिङ्ग' का अर्थ पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग आदि भी है।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

आयुस्
आयु - जीवन; शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग
विस्तार

अर्थ: जीवन, और वह अवधि जितनी जीवन चलता है।

चरक संहिता में: आयु शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व (मन) और आत्मा का संयोग है - जब तक ये चारों जुड़े हैं, तब तक जीवन है (सू. १/४२)। इसके पर्याय भी दिए गए हैं: धारि, जीवित, नित्यग और अनुबन्ध।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

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च. वि. ४/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीय (रोग के विशेष ज्ञान के तीन प्रकारों सम्बन्धी) विमान की व्याख्या करेंगे।

च. वि. ४/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. वि. ४/३

; , , ॥ ३ ॥

रोग का विशेष ज्ञान निश्चय ही तीन प्रकार का होता है; वह इस प्रकार है: आप्तोपदेश (आप्त जनों का उपदेश), प्रत्यक्ष और अनुमान।

च. वि. ४/४

। । । ; । ॥ ४ ॥

उनमें आप्तोपदेश का अर्थ है आप्त (विश्वसनीय) जनों का वचन। आप्त तो वे हैं जो सन्देहरहित स्मृति से (विषयों के) विभाग को जानते हैं, और प्रीति (लगाव) तथा उपताप (विरोध) से रहित होकर देखते हैं। ऐसे गुणों से युक्त होने के कारण उनका जो वचन है, वह प्रमाण है। परन्तु मत्त (नशे में चूर), उन्मत्त (विक्षिप्त), मूर्ख, रक्त (राग से भरे) और दुष्ट (व्यक्ति) का वचन अप्रमाण है, ऐसा (आप्तोपदेश के विषय में कहा गया); (और) प्रत्यक्ष तो वह है जो स्वयं इन्द्रियों और मन से जाना जाता है। अनुमान तो युक्ति पर आधारित तर्क है।

च. वि. ४/५

, । , । । , ; ॥ ५ ॥

निश्चय ही, इस तीन प्रकार के ज्ञान-समुदाय (ज्ञान के साधनों के समूह) से पहले रोग की सब प्रकार से पूरी परीक्षा करके, फिर बाद में (किया गया) निश्चय दोषरहित होता है; क्योंकि ज्ञान के एक अवयव (अंश) से पूरे ज्ञेय (जानने योग्य विषय) का ज्ञान उत्पन्न नहीं होता। इस तीन प्रकार के ज्ञान-समुदय में तो पहले आप्तोपदेश से ज्ञान (होता है), उसके बाद प्रत्यक्ष और अनुमान से परीक्षा सम्भव होती है। क्योंकि ऐसा क्या है, जिसका पहले उपदेश न किया गया हो, जिसे प्रत्यक्ष और अनुमान से परीक्षा करने वाला जान ले? इसलिए ज्ञानवानों की परीक्षा दो प्रकार की है: प्रत्यक्ष और अनुमान; अथवा उपदेश सहित तीन प्रकार की।

च. वि. ४/६

; ॥ ६ ॥

इस विषय में बुद्धिमान् (आचार्य) यह उपदेश करते हैं: (वैद्य) प्रत्येक रोग को जाने कि (वह) ऐसे प्रकोपण (उभारने वाले कारण) वाला, ऐसी योनि (उत्पत्ति के स्रोत) वाला, ऐसे उत्थान (आरम्भ) वाला, ऐसी आत्मा (स्वरूप) वाला, ऐसे अधिष्ठान (आश्रय स्थान) वाला, ऐसी वेदना (पीड़ा) वाला, ऐसे संस्थान (आकृति) वाला, ऐसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध वाला, ऐसे उपद्रव वाला, ऐसी वृद्धि, स्थान (ठहराव) और क्षय (घटाव) से युक्त, ऐसे उदर्क (आगे के परिणाम) वाला, ऐसे नाम वाला (और) ऐसे योग वाला (है); उस (रोग) में प्रतीकार (उपचार) के लिए यह प्रवृत्ति (उपचार में लगना) है अथवा निवृत्ति (उपचार से रुकना), यह (भी) उपदेश से जाना जाता है।

च. वि. ४/७

, ; , , , ; , , ; , , , , , , ; ; । ॥ ७ ॥

प्रत्यक्ष से तो रोग का तत्त्व (वास्तविक स्वरूप) जानने की इच्छा रखने वाला (वैद्य) रोगी के शरीर में स्थित सभी इन्द्रियार्थों (इन्द्रियों के विषयों) की सभी इन्द्रियों से परीक्षा करे, रस (स्वाद) के ज्ञान को छोड़कर; जैसे: आँतों की गुड़गुड़ाहट, अँगुलियों के पोरों की सन्धियों का चटकना, और स्वर की विशेषताएँ, और शरीर से सम्बन्धित जो कोई अन्य शब्द (ध्वनियाँ) भी हों, उनकी श्रोत्र (कान) से परीक्षा करे; वर्ण (रंग), संस्थान (आकृति), प्रमाण (माप) और छाया (कान्ति), शरीर की प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) और विकार, और आँख के विषय वाली जो अन्य (बातें) यहाँ नहीं कही गईं, उनकी चक्षु (आँख) से परीक्षा करे; परन्तु रोगी के शरीर में स्थित रस को, इन्द्रिय का विषय होने पर भी, अनुमान से जाने, क्योंकि प्रत्यक्ष से उसका ग्रहण सम्भव नहीं होता; इसलिए रोगी से पूछकर ही रोगी के मुख का रस (स्वाद) जाने, और जूँओं के (शरीर से) हट जाने से उसके शरीर की विरसता (बुरे स्वाद) को, (और) मक्खियों के पास आने से शरीर की मधुरता को (जाने); और लोहितपित्त का सन्देह होने पर, कि क्या (यह) धारिलोहित (शरीर को धारण करने वाला रक्त) है या लोहितपित्त, (तो) कुत्ते और कौए के खा लेने से धारिलोहित और न खाने से लोहितपित्त, ऐसा अनुमान करना चाहिए; इसी प्रकार रोगी के शरीर में स्थित अन्य रसों का भी अनुमान करे; और रोगी के सारे शरीर में स्थित, प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) और विकार से सम्बन्धित गन्धों की घ्राण (नाक) से परीक्षा करे; और प्रकृति और विकृति (बिगड़ी अवस्था) से युक्त स्पर्श की हाथ से (परीक्षा करे)। इस प्रकार प्रत्यक्ष से, अनुमान से और उपदेश से परीक्षा (का वर्णन) कहा गया।

च. वि. ४/८

। , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ॥ ८ ॥

ये दूसरे भाव (विषय) भी निश्चय ही इसी प्रकार अधिकतर अनुमान से जानने योग्य होते हैं। जैसे: अग्नि को (भोजन) पचाने की शक्ति से परखे, बल को व्यायाम करने की शक्ति से, श्रोत्र आदि (इन्द्रियों) को शब्द आदि विषयों के ग्रहण से, मन को विषयों से (उसके) अव्यभिचरण से, विज्ञान को व्यवसाय (निश्चय करके काम में लगने) से, रज को सङ्ग (आसक्ति) से, मोह को अविज्ञान (न समझ पाने) से, क्रोध को अभिद्रोह (अहित करने की प्रवृत्ति) से, शोक को दीनता से, हर्ष को आमोद (उल्लास) से, प्रीति को सन्तोष से, भय को विषाद (घबराहट) से, धैर्य को अविषाद (घबराहट न होने) से, वीर्य को उत्थान (उद्यम) से, अवस्थान (स्थिरता) को अविभ्रम (न डगमगाने) से, श्रद्धा को अभिप्राय (इच्छा) से, मेधा को ग्रहण (समझ लेने) से, संज्ञा को नाम लेने से, स्मृति को स्मरण से, ह्री (लज्जा) को अपत्रपण (लजाने) से, शील को अनुशीलन (बार-बार के आचरण) से, द्वेष को प्रतिषेध (विरोध) से, उपधि (छल) को अनुबन्ध से, धृति को अलौल्य (चञ्चलता या लोलुपता न होने) से, वश्यता (वश में रहने) को विधेयता (कहा मानने) से, वय (उम्र), भक्ति (रुचि), सात्म्य और रोग के समुत्थान (कारण) को काल, देश, उपशय और वेदना की विशेषता से, छिपे लक्षणों वाले रोग को उपशय और अनुपशय से, दोषों की मात्रा की विशेषता को अपचार की विशेषता से, आयु के क्षय को अरिष्टों से, कल्याण के निकट होने को शुभ (कार्यों) में लगन से, और निर्मल सत्त्व को अविकार (विकार न होने) से; परन्तु ग्रहणी की मृदुता या दारुणता, स्वप्नों का दिखना, अभिप्राय, और अप्रिय, प्रिय, सुख तथा दुःख को रोगी से पूछकर ही जाने।

च. वि. ४/९

- । ॥ ९ ॥

और इस विषय में (ये श्लोक) हैं: विचक्षण (कुशल वैद्य) आप्त (विश्वसनीय जन) के उपदेश से, प्रत्यक्ष करने से और अनुमान से रोगों को भली-भाँति जाने।

च. वि. ४/१०

। ॥ १० ॥

विषय को जानने वाला (वैद्य) सब प्रकार से, जितना सम्भव हो उतना, सब कुछ परखकर, तब तत्त्व (रोग की वास्तविकता) के विषय में और उसके तुरन्त बाद कार्य (क्या करना है) के विषय में निश्चय करे।

च. वि. ४/११

। ॥ ११ ॥

कार्य और तत्त्व की विशेषता को जानने वाला (वैद्य) प्रतिपत्ति (क्या करना है, इसके निर्णय) में मोहित नहीं होता। मोह में न पड़ा हुआ (वैद्य) वह फल पाता है जो अमोह (मोह न होने) के कारण उत्पन्न होता है।

च. वि. ४/१२

। ॥ १२ ॥

जो तत्त्ववित् (तत्त्व को जानने वाला वैद्य) ज्ञान और बुद्धि के दीपक से रोगी की अन्तरात्मा में प्रवेश नहीं करता, वह रोगों की चिकित्सा नहीं करता।

च. वि. ४/१३

- । ॥ १३ ॥

इस विषय में (सार के) दो श्लोक (हैं): सब रोगों की विशेषताओं के तीन प्रकार के ज्ञान-संग्रह (जानने के उपायों) को, आप्त जन जिस प्रकार उपदेश देते हैं उसे, और प्रत्यक्ष (रूप से कोई बात) जिस प्रकार ग्रहण की जाती है उसे,

च. वि. ४/१४

। ॥ १४ ॥

और जो (भाव) जिस प्रकार अनुमान से जानने योग्य हैं, उन भावों को भी उदार (श्रेष्ठ) बुद्धि वाले मुनि ने त्रिरोगविज्ञान (रोग को तीन प्रकार से जानने के) विमान में कहा है।

च. वि. ४

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के विमानस्थान में त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीय विमान नामक चौथा अध्याय (पूरा हुआ)।