भारत संहिता

अध्याय ५

स्रोतोविमानम्

स्रोतों का ज्ञान

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भूमिका

स्रोतोविमान चरक संहिता के विमानस्थान का पाँचवाँ अध्याय है, और हिन्दी शीर्षक में इसे 'स्रोतों का ज्ञान' कहा गया है। इसका नाम इसके विषय से पड़ा है: स्रोत शरीर के भीतर के वे मार्ग (channels) हैं जिनसे होकर धातु आदि पदार्थ बहते और एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचते हैं, और स्रोतोविमान का अर्थ है स्रोतों का विशेष ज्ञान। इसका उपदेश भगवान् आत्रेय देते हैं। आरम्भ में वे बताते हैं कि शरीर में जितने मूर्तिमान्, यानी आकार वाले, भाव हैं, उतने ही स्रोतों के प्रकार हैं, क्योंकि कोई भी भाव स्रोतों के बिना न उत्पन्न होता है और न क्षय को प्राप्त होता है; और स्रोत ही मार्ग बनकर उन धातुओं को ले जाते हैं जो एक रूप से दूसरे रूप में बदल रही होती हैं।

फिर भगवान् आत्रेय दूसरों के मत परखते हैं। कुछ विद्वान् पुरुष (शरीर) को स्रोतों का समूह ही मानते हैं, क्योंकि स्रोत पूरे शरीर में फैले हैं और दोषों को कुपित या शान्त करने वाले पदार्थ सब जगह पहुँचते हैं। आत्रेय यह मत नहीं मानते, क्योंकि जिसके स्रोत हैं, जिसे वे ले जाते और पहुँचाते हैं, और जहाँ वे स्थित हैं, वह सब स्रोतों से भिन्न है। स्रोतों की गिनती पर भी मत अलग हैं: कुछ उन्हें अगणित कहते हैं और दूसरे गिने जा सकने वाले। आत्रेय सब स्रोत नहीं गिनाते, बल्कि मोटे तौर पर तेरह प्रकार बताते हैं, जिनके नाम उस पदार्थ पर हैं जिसे वे ले जाते हैं: प्राण, उदक (जल), अन्न, रस, रुधिर (रक्त), मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र, मूत्र, पुरीष (मल) और स्वेद (पसीना)। पूरे शरीर में विचरने वाले वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ) के लिए सभी स्रोत मार्ग हैं, और इन्द्रियों से परे सत्त्व (मन) आदि के लिए पूरा चेतनायुक्त शरीर ही मार्ग और आश्रय है। अध्याय के अनुसार जब तक स्रोत अपनी प्रकृति, यानी स्वाभाविक अवस्था, में रहते हैं, शरीर विकारों से ग्रस्त नहीं होता।

इसके बाद हर स्रोत का मूल, यानी उसका आधार-स्थान, और उसके दूषित होने की पहचान बताई गई है। प्राणवह स्रोतों का मूल हृदय और महास्रोतस् है, और दूषित होने पर साँस बहुत अधिक या बहुत रुककर, विक्षुब्ध, थोड़ी-थोड़ी या बार-बार, आवाज़ और शूल के साथ चलती है। उदकवह स्रोतों का मूल तालु और क्लोम है, और दूषित होने पर जीभ, तालु, होंठ, कण्ठ और क्लोम सूखते हैं और प्यास बहुत बढ़ जाती है। अन्नवह स्रोतों का मूल आमाशय और बायाँ पार्श्व है, और दूषित होने पर अन्न की इच्छा नहीं रहती, और अरोचक, विपाक (सम्भवतः अपच) और छर्दि (उल्टी) होते हैं। रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र, इन सात धातुओं के स्रोतों के केवल मूल दिए गए हैं: हृदय और दस धमनियाँ, यकृत् और प्लीहा, स्नायु और त्वचा, दोनों वृक्क और वपावहन, मेद और जघन, अस्थियाँ और सन्धियाँ, और दोनों वृषण और शेफ; इनके दूषित होने की पहचान वही है जो उन धातुओं के दूषित होने की है, और वह विविधाशितपीतीय अध्याय में कही जा चुकी है। मूत्रवह स्रोतों का मूल बस्ति और दोनों वङ्क्षण हैं, पुरीषवह स्रोतों का पक्वाशय और स्थूलगुद, और स्वेदवह स्रोतों का मेद और लोमकूप। इनके दूषित होने पर मूत्र बहुत अधिक या बहुत रुककर, थोड़ा-थोड़ा, गाढ़ा और शूल के साथ आता है; मल कठिनाई से, थोड़ा-थोड़ा, आवाज़ और शूल के साथ निकलता है और बहुत पतला, बहुत गाँठदार या बहुत अधिक होता है; और पसीना नहीं आता या बहुत आता है, शरीर खुरदरा या बहुत चिकना हो जाता है, सब ओर जलन होती है और रोंगटे खड़े होते हैं। फिर अध्याय बताता है कि स्रोत, सिरा, धमनी, रसायनी, रसवाहिनी, नाडी, पथ, मार्ग, शरीर-छिद्र, संवृतासंवृत, स्थान, आशय और निकेत, ये सब शरीर की धातुओं के दिखने वाले और न दिखने वाले अवकाशों के नाम हैं। स्रोतों के बिगड़ने से उनमें स्थित और उनमें चलने वाली धातुएँ बिगड़ती हैं; बिगड़े स्रोत दूसरे स्रोतों को और बिगड़ी धातुएँ दूसरी धातुओं को दूषित करती हैं; और इन सबको दूषित करने वाले बिगड़े हुए वात, पित्त और श्लेष्मा हैं, क्योंकि यह दोषों का स्वभाव है।

फिर श्लोकों में हर स्रोत के दूषित होने के कारण अलग-अलग गिनाए गए हैं। इनमें आहार की बातें हैं, जैसे बहुत अधिक, असमय या अहित भोजन, भारी, ठण्डा और बहुत चिकना भोजन, विदाही, अभिष्यन्दी और मेद बढ़ाने वाले पदार्थ, वारुणी (एक मदिरा) का अति-सेवन और विरुद्ध पदार्थों का सेवन; रहन-सहन की बातें, जैसे दिन में सोना, व्यायाम न करना, भूखे रहकर व्यायाम करना, धूप और आग का सेवन, मूत्र आदि को रोक रखना और अति-मैथुन; मन के भाव, जैसे भय, बहुत अधिक चिन्तन, क्रोध और शोक; और चोट, कुचला जाना, दबाया जाना, और शस्त्र, क्षार और अग्नि। फिर एक सामान्य नियम आता है: जो आहार और विहार गुणों में दोषों के समान और धातुओं के विपरीत हो, वह स्रोतों को दूषित करता है। किसी भी स्रोत के दूषित होने के चार सामान्य लक्षण बताए गए हैं: अतिप्रवृत्ति (अत्यधिक बहाव), सङ्ग (रुकावट), सिराओं में ग्रन्थियाँ (गाँठें), और विमार्गगमन (अपना मार्ग छोड़कर दूसरे मार्ग पर जाना)। स्रोतों का रूप भी बताया गया है: वे अपनी-अपनी धातु के रंग के, गोल, स्थूल और अणु, आकृति में लम्बे, और बेल की फैली हुई शाखाओं जैसे होते हैं।

अन्त में दूषित स्रोतों की चिकित्सा के लिए ग्रन्थ के दूसरे भागों की ओर संकेत है: प्राणवह, उदकवह और अन्नवह स्रोतों के लिए श्वास की, तृष्णा को शान्त करने वाली और आमप्रदोष की चिकित्सा; रस आदि धातुओं के स्रोतों के लिए वही उपक्रम जो विविधाशितपीतीय अध्याय में उन धातुओं के लिए बताया गया है; और मूत्र, मल और स्वेद के स्रोतों के लिए मूत्रकृच्छ्र, अतिसार और ज्वर की चिकित्सा। यह सब ग्रन्थ का वर्णन है, कोई चिकित्सा-सलाह नहीं। फिर संग्रह-श्लोक अध्याय के विषय गिनाते हैं, और अन्तिम श्लोक कहता है कि जिसे पूरा शरीर हर पक्ष से विदित है, और शरीर के सब रोग भी, वह चिकित्सा के कर्मों में भ्रमित नहीं होता। अध्याय से साथ ले जाने योग्य बात यह है कि उसके अनुसार शरीर के हर मूर्तिमान् भाव के अपने स्रोत हैं, स्रोतों के अपनी प्रकृति में रहने पर शरीर विकारों से बचा रहता है, और आहार, रहन-सहन, मन के भाव और चोट उन्हें बिगाड़ते हैं, जिसे हर स्रोत के मूल और लक्षणों से पहचाना जाता है।

इस अध्याय में (अध्याय का अपना सार, श्लोक २९-३१)

तत्र श्लोकाः-त्रयोदशानां मूलानि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम्।सामान्यं नामपर्यायाः कोपनानि परस्परम्॥

श्लोक २९ →

इस विषय में (सार के) श्लोक (हैं): तेरह स्रोतों के मूल, (उनकी) दुष्टि (विकृति) के लक्षण, सामान्य (बातें), नामों के पर्याय, (स्रोतों और धातुओं का) एक-दूसरे को कुपित करना,

दोषहेतुः पृथक्त्वेन भेषजोद्देश एव च।स्रोतोविमाने निर्दिष्टस्तथा चादौ विनिश्चयः॥

श्लोक ३० →

दोष (सम्भवतः स्रोतों के दूषित होने) के हेतु (कारण) अलग-अलग, और भेषज (चिकित्सा) का उद्देश (संक्षिप्त निर्देश) भी, तथा आरम्भ में (किया गया) विनिश्चय (निर्णय), (ये सब) स्रोतोविमान में बताए गए हैं।

केवलं विदितं यस्य शरीरं सर्वभावतः।शारीराः सर्वरोगाश्च स कर्मसु न मुह्यति॥

श्लोक ३१ →

जिसे सम्पूर्ण शरीर सर्वभाव से (हर पक्ष से) विदित (ज्ञात) है, और शरीर के सब रोग भी, वह (वैद्य) कर्मों (चिकित्सा के कामों) में मोहित (भ्रमित) नहीं होता।

मुख्य शब्द (१५) - इस अध्याय के पारिभाषिक शब्द और उनके अर्थ
विशेष
विशेष - भिन्नता; जो ह्रास का कारण है
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √शिष् (अलग करना) - अलग करने वाला।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: विशेष ह्रास (घटने) का कारण है और पृथक्त्व (अलग करना) करता है (सू. १/४४-४५)। इसीलिए दोष अपने से विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होते हैं (सू. १/५९-६२)।

धातु
धातु - शरीर को धारण करने वाले घटक
विस्तार

शब्द-रचना: √धा (धारण करना) से - जो धारण करे।

अर्थ: आयुर्वेद में धातुएँ शरीर के धारक घटक हैं; उनका विस्तृत वर्णन आगे के अध्यायों में है।

चरक संहिता में: इस शास्त्र का कार्य (लक्ष्य) धातुसाम्य है - धातुओं को सम अवस्था में रखना (सू. १/५३)।

व्याकरण में 'धातु' का अर्थ 'क्रिया का मूल' (root) भी है।

दोष
दोष - शरीर या मन को बिगाड़ने वाले तत्त्व: वात, पित्त, कफ; रज, तम
विस्तार

शब्द-रचना: √दुष् (दूषित होना, बिगड़ना) से - जो बिगड़कर दूषित करे।

चरक संहिता में: शरीर के तीन दोष हैं - वात, पित्त और कफ - और मन के दो - रज और तम (सू. १/५७)। सम अवस्था में ये शरीर को चलाते हैं; विषम होने (बढ़ने या घटने) पर रोग उत्पन्न करते हैं।

सामान्य बोलचाल में 'दोष' का अर्थ 'कमी, गलती' भी है।

रस
रस - स्वाद; मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'रस, सार' भी है। आयुर्वेद में रस मुख्यतः जीभ से जाना जाने वाला स्वाद है (सू. १/६४)।

चरक संहिता में: छह रस हैं - मधुर (स्वादु), अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय (सू. १/६५)। हर रस किसी दोष को शान्त करता है और किसी को बढ़ाता है; जैसे मधुर, अम्ल और लवण वात को शान्त करते हैं (सू. १/६६)।

वात
वात दोष - शरीर में गति और संचार करने वाला तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: √वा (बहना, चलना) से - जो बहता है।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'हवा' है; आयुर्वेद में वात तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो शरीर की हर गति से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: वात रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद और खर है, और इसके विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/५९)। वायु, मारुत और समीरण भी इसी के नाम हैं।

पित्त
पित्त दोष - शरीर में पाचन और ताप से जुड़ा तत्त्व
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में इसे √तप् (तपना, गर्म होना) से जोड़ा जाता है।

अर्थ: आयुर्वेद में पित्त तीन शारीरिक दोषों में से एक है, जो पाचन, शरीर की गर्मी और परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है।

चरक संहिता में: पित्त कुछ चिकनाई लिए, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव, अम्ल, सर (बहने वाला) और कटु है, और विपरीत गुणों वाले द्रव्यों से शान्त होता है (सू. १/६०)।

सामान्य अर्थ 'शरीर का पित्त रस' (bile) भी है।

श्लेष्मन्
श्लेष्मा - कफ दोष का दूसरा नाम
विस्तार

शब्द-रचना: √श्लिष् (चिपकना, जोड़ना) से - जो जोड़े रखे।

चरक संहिता में: यह कफ दोष का ही दूसरा नाम है (सू. १/६१)। गुण और चिकित्सा के लिए 'कफ' देखें।

शरीर
शरीर - देह
विस्तार

शब्द-रचना: परम्परा में √शॄ (क्षीण होना) से - जो निरन्तर क्षीण होता रहे।

चरक संहिता में: शरीर आयु के चार घटकों में से एक है (सू. १/४२), और मन के साथ रोगों तथा सुखों का आश्रय (सू. १/५५)।

सत्त्व
सत्त्व - मन
विस्तार

शब्द-रचना: सत् (होना, सत्य) + त्व (भाव)।

अर्थ: सामान्य अर्थ 'अस्तित्व, सार' है; सांख्य में यह तीन गुणों में पहला, निर्मलता का गुण भी है।

चरक संहिता में: सत्त्व प्रायः मन के लिए आता है। सत्त्व, आत्मा और शरीर त्रिदण्ड (तिपाई) की तरह मिलकर जीवन को थामे रखते हैं (सू. १/४६); शरीर और सत्त्व रोगों के आश्रय हैं (सू. १/५५)।

विकार
विकार - बिगाड़; रोग
विस्तार

शब्द-रचना: वि + √कृ (बदलना)।

अर्थ: स्वाभाविक अवस्था से बदल जाना।

चरक संहिता में: 'विकार' प्रायः रोग के लिए आता है; साध्य विकार विपरीत गुणों वाले, देश, मात्रा और काल के अनुसार दिए गए भेषजों से दूर होते हैं (सू. १/६२)।

गुण
गुण - द्रव्य की विशेषता, जैसे भारी, ठण्डा
विस्तार

अर्थ: सामान्य अर्थ 'धागा, विशेषता, अच्छाई' है। दर्शन और आयुर्वेद में गुण छह पदार्थों में से एक है।

चरक संहिता में: गुण द्रव्य में रहता है पर स्वयं क्रिया नहीं करता (सू. १/५१)। गुणों में इन्द्रियों के विषय, गुरु (भारी) आदि, बुद्धि से प्रयत्न तक, और पर आदि गिनाए गए हैं (सू. १/४९)।

सांख्य के सत्त्व, रज, तम को भी 'गुण' कहा जाता है।

औषध
औषध - दवा; रोग दूर करने का साधन
विस्तार

शब्द-रचना: ओषधि (पौधा, जड़ी-बूटी) से बना - जो ओषधियों से सम्बन्धित हो।

अर्थ: रोग दूर करने का साधन।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्रों में तीसरा (सू. १/२४)। औषध केवल पौधों से नहीं, पशुओं (जङ्गम) और पृथ्वी (पार्थिव) से भी मिलते हैं (सू. १/६८-७१); और शरीर के दोषों के लिए औषध दैव और युक्ति पर आश्रित होते हैं (सू. १/५८)।

हेतु
हेतु - कारण; रोग या स्वास्थ्य का कारण
विस्तार

अर्थ: कारण।

चरक संहिता में: आयुर्वेद के तीन सूत्र (त्रिसूत्र) हैं - हेतु (कारण), लिङ्ग (लक्षण) और औषध (सू. १/२४)। किसी रोग को समझने के लिए पहले उसका हेतु जानना होता है।

भेषज
भेषज - औषध, उपचार
विस्तार

शब्द-रचना: भिषज् (वैद्य) से सम्बन्धित - जो वैद्य देता है।

अर्थ: औषध, उपचार।

चरक संहिता में: सही योग से तीक्ष्ण विष भी उत्तम भेषज बन सकता है, और गलत प्रयोग से भेषज भी तीक्ष्ण विष (सू. १/१२६)।

कर्मन्
कर्म - क्रिया, गति
विस्तार

शब्द-रचना: √कृ (करना) से।

अर्थ: छह पदार्थों में से एक।

चरक संहिता में: कर्म द्रव्य में रहने वाली वह क्रिया है जो संयोग और विभाग (जुड़ने और अलग होने) का कारण है (सू. १/५२)।

आयुर्वेद में 'कर्म' किसी द्रव्य के प्रभाव (जैसे वमन, विरेचन) और चिकित्सा-कार्य के लिए भी आता है।

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च. वि. ५/१

॥ १ ॥

अब इसलिए हम स्रोतों के विमान (स्रोतों के ज्ञान सम्बन्धी अध्याय) की व्याख्या करेंगे।

च. वि. ५/२

॥ २ ॥

ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था।

च. वि. ५/३

। , । ॥ ३ ॥

पुरुष (शरीर) में जितने मूर्तिमान् (आकार वाले) भाव-विशेष हैं, इसमें स्रोतों के उतने ही प्रकार-भेद हैं। क्योंकि पुरुष में सभी भाव स्रोतों के बिना न तो उत्पन्न होते हैं और न ही क्षय को प्राप्त होते हैं। स्रोत ही, मार्ग के रूप में, परिणाम को प्राप्त हो रही (रूप बदल रही) धातुओं को वहन करने वाले होते हैं।

च. वि. ५/४

, । , , , , , । , ॥ ४ ॥

इसके अतिरिक्त, कुछ (विद्वान्) पुरुष को स्रोतों का ही समुदाय (समूह) मानते हैं, क्योंकि (स्रोत) सर्वगत (पूरे शरीर में व्याप्त) हैं, और दोषों का प्रकोप करने वाले तथा उनका प्रशमन करने वाले (द्रव्य) सब जगह पहुँचते हैं। परन्तु यह ऐसा नहीं है; क्योंकि जिसके स्रोत हैं, जिसे वे वहन करते हैं, जिसे वे (किसी स्थान तक) पहुँचाते हैं, और जहाँ वे स्थित हैं, वह सब उन (स्रोतों) से भिन्न है। अत्यधिक संख्या के कारण कुछ (विद्वान्) स्रोतों को अगणित (जिन्हें गिना न जा सके) कहते हैं, तो दूसरे (उन्हें) गिने जा सकने वाले (कहते हैं)।

च. वि. ५/७

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उन स्रोतों में से तो हम कुछ प्रकारों की, मोटे तौर पर (यथास्थूल), उनके मूल (उद्गम-स्थान) के अनुसार और उनके प्रकोप (दूषित होने) की पहचान के अनुसार, आगे व्याख्या करेंगे; जो (प्रकार) ज्ञानवान् लोगों के लिए न कही गई बातों को जानने में, और अल्पज्ञ लोगों के लिए (विषय को) समझने में पर्याप्त होंगे। वे इस प्रकार हैं: प्राणवह, उदकवह, अन्नवह, रसवह, रुधिरवह, मांसवह, मेदोवह, अस्थिवह, मज्जवह, शुक्रवह, मूत्रवह, पुरीषवह और स्वेदवह (स्रोत)। पूरे शरीर में विचरण करने वाले वात, पित्त और श्लेष्मा के लिए तो सभी स्रोत मार्ग-रूप हैं; उसी प्रकार इन्द्रियों से परे (अतीन्द्रिय) सत्त्व आदि के लिए तो सम्पूर्ण चेतनायुक्त शरीर ही मार्ग-रूप और अधिष्ठान (आश्रय)-रूप है। ऐसा यह शरीर स्रोतों के प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) में रहने के कारण विकारों से ग्रस्त नहीं होता।

च. वि. ५/८

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उनमें, प्राणवह स्रोतों (प्राण को ले जाने वाले मार्गों) का मूल हृदय है और महास्रोतस्; दूषित होने पर तो इनकी विशेष पहचान यह होती है, जैसे: बहुत अधिक या बहुत रुककर, कुपित (विक्षुब्ध) ढंग से, थोड़ी-थोड़ी या बार-बार, शब्द और शूल के साथ साँस लेते हुए (व्यक्ति को) देखकर (वैद्य) जाने कि इसके प्राणवह स्रोत दूषित हैं। उदकवह स्रोतों का मूल तालु है और क्लोम; दूषित होने पर तो इनकी विशेष पहचान यह होती है, जैसे: जीभ, तालु, होंठ, कण्ठ और क्लोम का सूखना और बहुत बढ़ी हुई प्यास देखकर जाने कि इसके उदकवह स्रोत दूषित हैं। अन्नवह स्रोतों का मूल आमाशय है और बायाँ पार्श्व; दूषित होने पर तो इनकी विशेष पहचान यह होती है, जैसे: अन्न की इच्छा न होना, अरोचक और विपाक (सम्भवतः अपच), और छर्दि (उल्टी) देखकर जाने कि इसके अन्नवह स्रोत दूषित हैं। रसवह स्रोतों का मूल हृदय है और दस धमनियाँ। शोणितवह स्रोतों का मूल यकृत् (जिगर) है और प्लीहा (तिल्ली)। और मांसवह स्रोतों का मूल स्नायु है और त्वचा। मेदोवह स्रोतों का मूल दोनों वृक्क (गुर्दे) हैं और वपावहन। अस्थिवह स्रोतों का मूल मेद है और जघन। मज्जवह स्रोतों का मूल अस्थियाँ हैं और सन्धियाँ। शुक्रवह स्रोतों का मूल दोनों वृषण (अण्डकोष) हैं और शेफ (शिश्न)। परन्तु दूषित हुए इन रस आदि को ले जाने वाले स्रोतों की पहचानें विविधाशितपीतीय (अध्याय) में कही जा चुकी हैं; क्योंकि जो धातुओं के दूषित होने की पहचानें हैं, वही अपनी-अपनी (धातु के अनुसार) दूषित धातु-स्रोतों की (पहचानें) हैं। मूत्रवह स्रोतों का मूल बस्ति (मूत्राशय) है और दोनों वङ्क्षण (जाँघ के जोड़); दूषित होने पर तो इनकी विशेष पहचान यह होती है, जैसे: बहुत अधिक या बहुत रुककर, प्रकुपित (विक्षुब्ध) ढंग से, थोड़ा-थोड़ा या बार-बार, गाढ़ा और शूल के साथ मूत्र त्यागते हुए (व्यक्ति को) देखकर जाने कि इसके मूत्रवह स्रोत दूषित हैं। पुरीषवह स्रोतों का मूल पक्वाशय है और स्थूलगुद; दूषित होने पर तो इनकी विशेष पहचान यह होती है, जैसे: कठिनाई से, थोड़ा-थोड़ा, शब्द और शूल के साथ, बहुत पतला, बहुत गाँठदार और बहुत अधिक मल त्यागते हुए (व्यक्ति को) देखकर जाने कि इसके पुरीषवह स्रोत दूषित हैं। स्वेदवह स्रोतों का मूल मेद है और लोमकूप (रोमछिद्र); दूषित होने पर तो इनकी विशेष पहचान यह होती है, जैसे: पसीना न आना, बहुत पसीना आना, अङ्ग (शरीर) का खुरदरापन, बहुत अधिक चिकनापन, सब ओर जलन और रोमाञ्च देखकर जाने कि इसके स्वेदवह स्रोत दूषित हैं।

च. वि. ५/९

। । । , ॥ ९ ॥

स्रोत, सिरा, धमनी, रसायनी, रसवाहिनी, नाडी, पथ, मार्ग, शरीर-छिद्र, संवृतासंवृत (बन्द और खुले), स्थान, आशय और निकेत, ये शरीर की धातुओं के दिखने वाले और न दिखने वाले अवकाशों (रहने और चलने के स्थानों) के नाम हैं। उनके (स्रोतों के) प्रकोप से अपने स्थानों में स्थित और मार्गों में चलने वाली, दोनों ही प्रकार की शरीर-धातुएँ प्रकोप को प्राप्त होती हैं, और दूसरों के प्रकोप से दूसरे भी। प्रदुष्ट (बिगड़े हुए) स्रोत (दूसरे) स्रोतों को, और (प्रदुष्ट) धातुएँ (दूसरी) धातुओं को दूषित करती हैं। उन सभी को दूषित करने वाले प्रदुष्ट वात, पित्त और श्लेष्मा (कफ) होते हैं, दोषों के स्वभाव के कारण।

च. वि. ५/१०

- । ॥ १० ॥

और इस विषय में (ये श्लोक) हैं: क्षय (क्षीणता) से, संधारण (रोक रखने) से, रूक्षता से, भूखे (व्यक्ति) के व्यायाम से, और अन्य दारुण (कठोर) (कारणों) से प्राणवाही स्रोत दूषित होते हैं।

च. वि. ५/११

। ॥ ११ ॥

औष्ण्य (गर्मी) से, आम से, भय से, पान (पीने) से, बहुत सूखे अन्न के सेवन से, और तृष्णा (प्यास) को बहुत अधिक दबाने से अम्बुवाही (जल ले जाने वाले स्रोत) दूषित होते हैं।

च. वि. ५/१२

। ॥ १२ ॥

अतिमात्र (बहुत अधिक मात्रा में) भोजन करने से, अकाल (अनुचित समय) में भोजन करने से और अहित (हानिकर) भोजन करने से, तथा पावक (पाचन की अग्नि) के वैगुण्य (बिगड़ने) से अन्नवाही (स्रोत) दूषित होते हैं।

च. वि. ५/१३

। ॥ १३ ॥

गुरु (भारी), शीत (ठण्डा) और बहुत स्निग्ध (चिकनाई वाला) (भोजन) बहुत अधिक मात्रा में खाने वालों के, और चिन्त्य (सोचने योग्य) बातों के बहुत अधिक चिन्तन से, रसवाही (स्रोत) दूषित होते हैं।

च. वि. ५/१४

। ॥ १४ ॥

विदाही (जलन पैदा करने वाले), स्निग्ध (चिकने), उष्ण (गर्म) और द्रव (पतले) अन्न-पान का, और आतप (धूप) तथा अनल (आग) का सेवन करने वालों के रक्तवाही (स्रोत) दूषित होते हैं।

च. वि. ५/१५

। ॥ १५ ॥

अभिष्यन्दी, स्थूल (भारी-भरकम) और गुरु (भारी) भोज्य पदार्थों का (सेवन करने वालों के), और खाकर दिन में सोने वालों के मांसवाही (स्रोत) दूषित होते हैं।

च. वि. ५/१६

। ॥ १६ ॥

अव्यायाम (व्यायाम न करने) से, दिवास्वप्न (दिन में सोने) से, मेद्य (मेद बढ़ाने वाले) पदार्थों को बहुत अधिक खाने से, और वारुणी (एक मदिरा) के अति-सेवन से मेदोवाही (स्रोत) दूषित होते हैं।

च. वि. ५/१७

। ॥ १७ ॥

व्यायाम से, अति-संक्षोभ (बहुत अधिक झटकों) से, अस्थियों (हड्डियों) के अति-विघट्टन (बहुत अधिक टकराने या रगड़ खाने) से, और वातल (वात बढ़ाने वाले) पदार्थों के सेवन से अस्थिवाही (स्रोत) दूषित होते हैं।

च. वि. ५/१८

। ॥ १८ ॥

उत्पेष (कुचले जाने) से, अति-अभिष्यन्द से, अभिघात (चोट) से, प्रपीडन (ज़ोर से दबाए जाने) से, और विरुद्ध (आपस में मेल न खाने वाले) पदार्थों के सेवन से मज्जवाही (स्रोत) दूषित होते हैं।

च. वि. ५/१९

। ॥ १९ ॥

अकाल (अनुचित समय) में और (अनुचित) योनि में गमन (सम्भोग) से, निग्रह (रोकने) से, अति-मैथुन (बहुत अधिक सम्भोग) से, तथा शस्त्र, क्षार और अग्नि से शुक्रवाही (स्रोत) दूषित होते हैं।

च. वि. ५/२०

। ॥ २० ॥

मूत्र का वेग होते हुए जल, भक्ष्य (भोजन) और स्त्री का सेवन करने से, और मूत्र (के वेग) को रोकने से मूत्रवाही (मूत्र ले जाने वाले स्रोत) दूषित होते हैं; क्षीण (दुर्बल) और अभिक्षत (चोट खाए हुए) व्यक्ति के भी।

च. वि. ५/२१

। ॥ २१ ॥

(मल के वेग को) रोकने से, बहुत अधिक खाने से, तथा अजीर्ण (अपच) और अध्यशन (पहले का भोजन पचे बिना फिर खाने) से वर्चोवाही (मल ले जाने वाले स्रोत) दूषित होते हैं; दुर्बल अग्नि वाले और कृश (दुबले) व्यक्ति के भी।

च. वि. ५/२२

। ॥ २२ ॥

व्यायाम से, अति-संताप (बहुत अधिक गर्मी) से, शीत और उष्ण का बिना क्रम के सेवन करने से, तथा क्रोध, शोक और भय से स्वेदवाही (पसीना ले जाने वाले स्रोत) दूषित होते हैं।

च. वि. ५/२३

। ॥ २३ ॥

जो आहार और विहार दोषों के गुणों के समान हो और धातुओं के विपरीत गुणों वाला (विगुण) भी हो, वह स्रोतों को दूषित करने वाला है।

च. वि. ५/२४

। ॥ २४ ॥

अतिप्रवृत्ति (अत्यधिक बहाव), या सङ्ग (रुकावट), या सिराओं में ग्रन्थियाँ (गाँठें), और विमार्गगमन (अपना मार्ग छोड़कर दूसरे मार्ग पर जाना) भी स्रोतों की दुष्टि (विकृति) के लक्षण हैं।

च. वि. ५/२५

। ॥ २५ ॥

स्रोत अपनी-अपनी धातु के समान वर्ण (रंग) वाले, गोल, स्थूल (मोटे) और अणु (अत्यन्त सूक्ष्म), आकृति में दीर्घ (लम्बे) और प्रतान (बेल की फैली हुई शाखाओं) के समान होते हैं।

च. वि. ५/२६

। ॥ २६ ॥

दूषित प्राणवह, उदकवह और अन्नवह (स्रोतों) की (क्रमशः) श्वास (रोग) की चिकित्सा, तृष्णा (प्यास) को शान्त करने वाली चिकित्सा, और उसी प्रकार आमप्रदोष की चिकित्सा करनी चाहिए।

च. वि. ५/२७

। ॥ २७ ॥

विविधाशितपीतीय (अध्याय) में रस आदि (धातुओं के विकारों) की जो औषध (बताई गई है), वही उपक्रम (चिकित्सा) (वैद्य) रस आदि के स्रोतों में यथास्व (हर एक के अपने अनुसार) करे।

च. वि. ५/२८

। ॥ २८ ॥

मूत्र, विट् (मल) और स्वेद (पसीना) ले जाने वाले (स्रोतों) की चिकित्सा (क्रमशः) मूत्रकृच्छ्र की, उसी प्रकार अतिसार की, और उसी प्रकार ज्वर की चिकित्सा (के अनुसार) करनी चाहिए।

च. वि. ५/२९

- । ॥ २९ ॥

इस विषय में (सार के) श्लोक (हैं): तेरह स्रोतों के मूल, (उनकी) दुष्टि (विकृति) के लक्षण, सामान्य (बातें), नामों के पर्याय, (स्रोतों और धातुओं का) एक-दूसरे को कुपित करना,

च. वि. ५/३०

। ॥ ३० ॥

दोष (सम्भवतः स्रोतों के दूषित होने) के हेतु (कारण) अलग-अलग, और भेषज (चिकित्सा) का उद्देश (संक्षिप्त निर्देश) भी, तथा आरम्भ में (किया गया) विनिश्चय (निर्णय), (ये सब) स्रोतोविमान में बताए गए हैं।

च. वि. ५/३१

। ॥ ३१ ॥

जिसे सम्पूर्ण शरीर सर्वभाव से (हर पक्ष से) विदित (ज्ञात) है, और शरीर के सब रोग भी, वह (वैद्य) कर्मों (चिकित्सा के कामों) में मोहित (भ्रमित) नहीं होता।

च. वि. ५

॥॥

इस प्रकार अग्निवेश द्वारा रचित और चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत (संशोधित) तन्त्र के विमानस्थान में स्रोतोविमान नामक पाँचवाँ अध्याय (पूरा हुआ)।